जीव ब्रह्म की एकता यह आत्मा ही परब्रह्म परमात्मा का सनातन अंश है यह भारतीय संस्कृति ने घोषणा की और लोग मानते हैं आकाश में भगवान है सृष्टि बनाकर चले गए लेकिन भारतीय संस्कृति कहती है कि सृष्टि बनाकर उसको अनाथ छोड़कर नहीं गए नाथ हर दिल में दिल की धड़कने चलाने वाला और ज्ञान देने वाला मौजूद है मच्छर में भी ज्ञान शक्ति है और वह ज्ञान चैतन्य आत्मा का है क्रिया शक्ति मच्छर में भी है और क्रिया की अंधी क्रिया तो मशीन कर सकती है लेकिन ज्ञान मशीन के पास नहीं हां कंप्यूटर आदि और मशीनों में
जो प्रोग्राम फिट कर दो तो प्रोग्राम फिट करने वाला चैतन्य है जड़ अपने आप प्रोग्राम नहीं बनाता लेकिन मच्छर अपने आप प्रोग्राम बनाता है कि बोरिंग कहां करना मैंने बहुत ट्रा किया मच्छर मेरे गाल पर ललाट पर बैठता है और अंग पर बैठता है मेरी दाढ़ी पर मच्छर को कभी हमने बैठते नहीं देखा कई बार कोशिश किया कि बैठ भाई पर बाबानी दा म इधर क्या खाने को मिलेगा तो यह अकल मच्छर को किसने दी कीड़ी को अक्कल किसने दी कि बरसाद मौसम में बरसात आने वाली है बच्चों को उठाकर सेफ साइड करो कौन प्रेरणा
देता है मानना पड़ेगा कि इस चैतन्य ने सृष्टि बनाकर फेंक दिया और खुद हाथ धोकर साथ में अरस प अथवा वैकुंठ में जाकर बैठा है ऐसी बात नहीं भारतीय संस्कृति ने ईश्वर के तीन वैभवशाली देव दिखाए उत्पत्ति का देव स्थिति का देव और परलय का देव उत्पत्ति करने वाले देव को ब्रह्म देव कहते हैं पालन करने वाले देव को विष्णु देव कहते हैं और सफाया करके नए सर्जन की व्यवस्था का रास्ता खुला करने वाले देव को महादेव कहते कुछ मजहब या कुछ लोग यह मानते कि ईश्वर ने चार दिन में सृष्टि बना दी खुदा ने
और फिर वह चले गए जब कहीं बड़बड़ी होती है तो पैगंबर भेजते हैं ऐसा उनका मानना है लेकिन भारतीय संस्कृति का मानना है कि ईश्वर ने चार दिन में सृष्टि बनाकर हाथ धो डाले और सृष्टि को अनाथ छोड़कर चले गए ऐसी बात वैज्ञानिक ढंग से योगिक ढंग से मेल नहीं खाती ईश्वर ने सृष्टि की उसका पालन कौन कर रहा है जड़ से तो पालन होगा नहीं चेतन ही पालन की प्रेरणा देगा वही ईश्वर का चैतन्य स्वभाव ब्रह्मा होकर उत्पत्ति करता है वही ईश्वर का चैतन्य स्वभाव विष्णु होकर पालन करता है वही ईश्वर का रुद्र स्वभाव
चैतन्य स्वभाव रुद्र होकर संहार करता है जैसे एक सूरज और धरती उत्पत्ति का भी कारण बनता है सूरज पेड़ पौधों को उत्पन्न करता है सूरज और धरती उनका पालन भी होता है और समय पाकर वे सूख जाते हैं पेड़ पौधे जल जाते हैं संहार भी होता है ऐसे एक ही सच्चिदानंद परमात्मा उत्पत्ति का देव स्थिति का देव और प्रलय का देव महादेव होकर दिखाई देते हैं उत्पत्ति के देव ने तो उत्पत्ति कर दी अब उसकी पूजा करो ना करो चलेगा एकाद मंदिर है उत्पत्ति के देवता का लेकिन पालन तो रोज चाहिए इसलिए विष्णु के जो
मंदिर जितने हैं उतने ब्रह्मा जी के मंदिर धरती पर सनातन धर्म के नहीं होंगे हिंदू धर्म के नहीं राम जी के मंदिर होंगे कृष्ण जी के मंदिर होंगे गोवर्धन जी के होंगे न जाने भगवान के कई अवतार रूपों के मंदिर हो गए ये वैष्णव के मंदिर फिर शैव की पूजा शिव की पूजा करने वाले प्रलय का देवता जिसके हाथ में संहार है मौत है तो मौत देने वाला तो खतरनाक नहीं खतरनाक नहीं करुणा सिंधु है महादेव है भोलानाथ है जैसे बगीचे को सुंदर सुहावना रखना है तो उसकी काट छाट जरूरी है और शरीर को सुंदर
सुहावना रखना है तो उसको निरोग रखना जरूरी है ऐसे ही सृष्टि को सुंदर सुहावना रखना है तो कभी कभार सफाया करना जरूरी है जैसा जीवन पैदा होना जरूरी है वैसा ही धरती पर मर जाना भी हर चीज का जरूरी है इस धरती पर जो लोग पैदा हुए वह नहीं मरे होते तो आप हम जी नहीं सकते और आप हम अगर नहीं मरेंगे तो दूसरे कहां बैठेंगे जय राम जी की कितनी सुंदर व्यवस्था है एक सेठ ने अपने रसोय को कहा देख लग्जरी दो बस हम लोगों ने खड़ी की पहाड़ पर दर्शन करने जाते यह जंगल
है लकड़ियां खूब है तो बराबर आलू और टमाटर का और भिंडी का मिक्सचर साग बनाना और तुम पूरी बनाना देखो ध्यान से आग फिर बुझा देना आग बुझाना खूब ध्यान रखना जंगल है अपनी देश की संपत्ति है पागल कहीं गप्पे लगाने में लाग अर्जी ना करो कि जंगल जल जाए चूल्हा जलाना और फिर बुझा देना एक लोटा नहीं चार लोटे पानी डाल देना चूल्हे में आग ठीक से बुझाना जाते जाते देखो भैया आग का ख्याल करना सेठ और परिवार सारा गेस्ट सब जो थे मेहमान मेंबर दर्शन करने गए तीन घंटे के बाद आए देखा तो
दोनों रसोया हाथ पर हाथ रख के बैठे बोले रसोई क्यों नहीं बनाई बोले सेठ जी आपने कहा था ना कि आग बुझा देना चार लोटा पानी डाल देना जंगल का मामला है जब आग बुझा ही देना है तो जलाना क्यों सेठ ने कहा धत तेरे की जितना जलाना जरूरी है उतना उसका उपयोग करना जरूरी है उतना ही उसको बुझाना भी जरूरी है ऐसे जितना सृष्टि करना जरूरी है उतना उसका सदुपयोग करके सत्य को पाना प्रेम सदाचार बहुजन हिताय बहुजन सुखाए सत्कर्म करके अपने उस प्रियतम को पाना भी जरूरी है और उतना ही इस शरीर को
नश्वर समझकर आसक्ति छोड़ना भी जरूरी है तेन तन भुंजीथा मान इवास इदम सर्वम त किंचित जगत जगत ईवास उपनिषद का पहला मंत्र है अथर वेद के 39 में अध्याय यह सारा जगत उस ईश्वर से ओतप्रोत है अगर ईश्वर से उत प्रोत नहीं होता तो छोटे से मच्छर को ज्ञान कौन देता है बच्चे को मां का स्तन पारण करने की ट्रेनिंग कौन से स्कूल वाले आकर दे जाते हैं बच्चा मां के गोद में आता है और धावन धाने की अक्कल कौन देता है मुर्गी का बच्चा कड़ा करकट का पीछा करता है और बतक का बच्चा पानी
की तरफ जाता है यह प्रेरणा कौन देता है मुर्गी के शरीर से गुजरा है तो उसके संस्कार उस चैतन्य चित्त में पड़े हैं और बतक के शरीर से गुजरता है तो संस्कार उस चैतन्य के बच्चे में पड़े मोर का अंडा कितने कलर छुपाए हुए आता है यह किसी छोटे मोटे कारीगर की कारीगिरी नहीं है लेकिन विश्वव्यापी चैतन्य कारीगरों के कारीगर पर ब्रह्म परमात्मा की [संगीत] कारीगरी यह घड़ियाल किसने बनाई मैं नहीं जानता कौन सी फैक्ट्री में बनी मैं नहीं जानता आप भी नहीं जानते होंगे लेकिन यह घड़ियाल जरूर किसी ना किसी व्यक्ति ने बनाई होगी
इसका अस्तित्व बनाने वाले अस्तित्व की याद देता है इस घड़ियाल का अस्तित्व ही किसी ना किसी बनाने वाले को स्वीकार करने को मजबूर करता है यह माइक देखो या यह पंखा देखो यह कपड़ा देखो या यह डेस्क देखो किसी ना किसी मनुष्य की बनावट है यह आपको मानना पड़ेगा चाहे उस म को तुमने हमने ना देखा फैक्ट्री को तुमने हमने ना देखा लेकिन मानना पड़ेगा कि यह घड़ियाल किसी मनुष्य की कारीगिरी और किसी न किसी कल कारखाने में छोटी मोटी फैक्ट्री में बना हो ऐसे सूरज दिखता है वह किसी मनुष्य की बनावट है यह आप
नहीं सोच सकते किसी फैक्ट्री ने बनाया है यह आप नहीं कह सकते क्योंकि मानवी बुद्धि से वो अलग बनावट है मानवी फैक्ट्री से वह अलग बनावट है सूरज है चंदा है नक्षत्र है यह आ है और यह धरती है यह किसी मानवी फैक्ट्री में बनी होगी ऐसा आप हम नहीं बोल सकते लेकिन यह धरती दिखती है भला भले बनाने वाले को तुम नहीं देख सकते हो फैक्ट्री को या बनाने वाले को लेकिन बनाने वाले को मानना तो तुमको और हमको जरूरी हो जाता है कि कोई बनाने वाला सरज की किसी ने बनाया है चांद किसी
ने बनाया है धरती किसी ने बनाई है जल किसी ने बनाया है वायु किसी ने बनाया है तेज किसी ने बनाया है और वह किसी व्यक्ति की बनावट नहीं है यह तो नास्तिक भी मान लेगा जय राम जी तो बोलना पड़ेगा जब व्यक्ति की बनावट नहीं है फैक्ट्री की बनावट नहीं है तो इसकी बनावट का कोई विशेष है जो विशेष है जो क्ति और समाज से पार का है वही तो परमात्मा है और वही आत्मा होकर बैठा है और जो सूरज को चंदा को बनाकर उसी में व्याप रहा है वह तुम्हारे शरीर को बनाकर तुम
में भी वैसा व्याप रहा है और गाय के शरीर को बनाकर उसमें भी ऐसा व्याप रहा है गाय हरा घास खाते या तो सूखा पीला घास खाती है सफेद दूध बनता है फैक्ट्री वालों को अथवा विज्ञानियों को हम दो ट्रक घास देते हमको दो ग्राम सफेद दूध बनाक दो दिखाओ किसी फैक्ट्री में से और उस प्यारे ने कितनी फैक्ट्रियां बनाकर रख दी बकरी रूपी फैक्ट्रियां गाय रूपी फैक्ट्रियां है वो हरा हरा खाए और सफेद सफेद लाए मां अन्न फल फूल खाती रोटी सब्जी और बालक आता है तो मां के छाती में दू दूध बना देता
है और बालक अन्न खाने के काबिल होता है तो दूध सुखा देता है यह चैतन्य का काम है या किसी जड़ मशीन का काम है जरा सोचिए [प्रशंसा] भैया सो क्यों बिसरो जिसने सब कुछ किया सो क्यों बिसरो जिन सब कुछ दिया जो सो क्यों बिसरो जो गर्भ तेरा गर्भ में भी जिसने रखवाली की और मां के गोद में आते बालक के लिए मां के हृदय में वात्सल्य भर देता है और बच्चा जब बड़ा होता है तो पिता के हृदय में अनुशासन की प्रेरणा देता है वह जड़ चीज नहीं हो सकती वह चैतन्य है आत्मा
है और सब में और सदा बस रहा है इसलिए उसका नाम परमात्मा है य भारतीय संस्कृति कहती है आत्मा सु परमात्मा श्री कृष्ण कहते हैं ईश्वर सर्व भूता नाम हृदय अर्जुन तिष्ठति ब्राह्मण सर्व भूतानि यंत्र रूढ़ा नि मायाया मैं ईश्वर सबके हृदय में सब भूत प्राणी के हृदय में केवल मनुष्य के हृदय में नहीं भूतों के हृदय में भूत माना वो भूत प्रेत नहीं यह पंचभूत धरती के गहराई में और धरती के कण कण में जल में तेज में वायु में आकाश में इन पांच भूतों में सबके हृदय में मैं बसा हूं बोले बापू श्री
बंसीधर और धरती के अंदर कैसे यहां जब श्री कृष्ण कह रहे मैं सब में बसा हूं तो आप उनको छेल छबीला नट खटा केवल बंसीधर न माने वो निर्गुण निराकार अव्यक्त परब्रह्म अकाल पुरुष परमात्मा जब कहते मैं सब में बसा हूं अर्जुन को कह रहे मैं सब में बसा हूं सब धर्मों को छोड़कर तू शरण आ जा तो वहां रथ पर बैठे हुए नंद नंदन अपने शरीर के तरफ मैं नहीं कर रहे लेकिन अर्जुन को कह रहे मेरी शरण अर्थात जो तेरे हृदय में साक्षी चैतन्य हूं वह अकता अ भोक्ता भाव में आ जाए यह
लक्ष्य लेना पड़ेगा असंग आयम पुरुष उपनिषद कहती है असंग अयम पुरुष केवल निर्गुण य परब्रह्म परमात्मा असंग पु निर्गुण जैसे आकाश सब में बसा है लक्कड़ में भी आकाश घुसा है अगर आकाश अवकाश नहीं होता तो खील जाता नहीं दीवाल में भी आकाश तत्व है अगर नहीं होता तो खील नहीं घुसता लोहे में भी अवकाश आकाश है अगर लोहे में आकाश तत्व नहीं होता तो बट्टी में लोहा तपता है तो अग्नि मय क्यों हो जाता है अग्नि को प्रवेश करने की जगह मिलती है ना जैसे आकाश सब भूतों में है चार भूतों में आकाश है
ऐसे उससे भी चदा काश परमात्मा सूक्ष्म है अवकाश में भी वह परमात्मा है और पृथ्वी में भी है सब भूतों में जो सब भूतों में है तो सब देहो में भी है जो सब देहो में है वह सब जाति वालों में भी है चाहे मनुष्य जाति हो चाहे पशु जाति हो चाहे पक्षी जाति हो सब जाति वालो में कबीर जी ने ठीक कहा सब घट मेरा साइया खाली घट ना कोई बलिहारी वो घट की जा घट प्रगट होई जैसे लकड़ी में आग छुपी है तिलों में तेल छुपा है चकमक में आग छुपी लकड़ी की आग
अंधेरा नहीं मिटा सक्ति और ठंड नहीं हटा सकती अगर उसे जलाए तो अंधेरा मिटेगा और ठंड मिटेगी तिलों में तेल छुपा है लेकिन घने में जाएंगे तब तेल दीदार होगा तिलों में तेल चकमक में आग तेरा साई तुझ में छुपा जाग सके तो [प्रशंसा] जाग बेवकूफी यह हो जाती है कि ईश्वर और जगत के बीच में अहम रख देते हम लोग मैं देखती आंखें हैं ईश्वर की सत्ता से मैंने देखा सुनते कान है मनोवृति से मैंने सुना व जो मैं मैं मैं वह कड़ा जितना मैं हो जाता है उतना ही अशांति और झगड़ा और बेवकूफी
जीवन में भर जाती है हम लोगों की और जितना मैं मिटता है उतना एक दूसरे को समझकर एक दूसरे को सहयोग करके ईश्वर के रास्ते आगे बढ़ते हम लोग गांधी जी को पत्रकारों ने घेर लिया ब्रिटिश शासन का जमाना शासन की खुशा आमत करने वाले कई पत्रकार और कई पत्र थे और कुछ भारतीय संस्कृति के रंग से रंगे हुए भी पत्रकार लेकिन ज्यादातर वह लोग थे जो सरकार की नजर अच्छे दिखे दहशत थी उस समय ब्रिटिश की ऐसे गांधी जी के विरोधी अखबारों में घोर निंदा छपने वाले पत्रों ने पत्रकारों ने गांधी जी को घेर
लिया कि अरविंद गांधी समझौता अरविंद यह मानते हैं कि टट फॉर टेट अंग्रेजों ने हमारा शोषण किया सता है तो हम अलीगढ़ कांड बनाकर अंग्रेजों को भेजने में अरविंद का हाथ था ऐसा ब्रिटिश शासन ने भी किया तो अरविंद मानते थे ऐसा करें और गांधी जी मानते नहीं अहिंसा परमो धर्म किसी को सता करर किसी की बददुआ लेकर अथवा किसी को रंजक अपने सुखी नहीं हो सकते अपने युक्ति से सहन शक्ति से अपने भारत माता को आजाद कराना तो गांधी के विचार पूर्व और अरविंद घोष के विचार पश्चिम तो दोनों विपरीत विचार के थे और
उनके बीच समझौता हुआ तो गांधी जी तुमने अरविंद की क्या हिंसा ली और अरविंद ने तुम्हारा कौन सा अहिंसा का सिद्धांत लिया ऐसे ऐसे पत्रकारों ने और एडिटर ने प्रश्न पूछे और गांधी जी सर सराट उत्तर देते गए जो एंटी विचारले थे गांधी जी की निंदा लिखकर अपने को अकल वाला समझते थे ऐसे पत्रों ने भी धी की भरपेट प्रशंसा लिखी गांधी जी को किसी मित्रों ने घेर दिया कि आपके पास तो समय नहीं था अरविंद गांधी समझौता जब हो गया और एकाएक पत्रकार आ गए तुम्हारे पास तो वह क्या पूछेंगे और क्या जवाब देना
है ऐसा तो तुमने कोई पूर्व तैयारी तो की नहीं थी फिर भी तुम ऐसा सुंदर बोले कि तुम हरे निंदा करने वाले भी अगर शांत होकर विचा रहे हैं तो तुम्हारी प्रशंसा लिखते आखिर तुम्हारे पास क्या यह जादू कौन सी तैयारिया की थी गांधी जी ने नम्रता से कहा कि भैया सबने घेर लिया मैं शांत हो गया क्षण भर मैंने आंख बंद कर ली मन उस राम में लगाया य पूछने वालों में भी तू और बोलने वाले में भी तू तेरा ही हाथ काम करेगा मेरे हाथ तो छोटे हैं मेरे बोलने के बी मेरे राम
का हाथ था इसलिए काम बढ़िया हो [प्रशंसा] गया हम लोग क्या करते हैं कि सफलता मिलती है तो कहते मैंने किया और गड़बड़ होती कि भगवान ने बिगाड़ा जय राम जी की मैंने किया यह दुकान मेरी है ये बेटे को मैंने डॉक्टर बनाया इसको मैंने वकील बनाया इसको मैंने इंजीनियर बनाया इसका मैंने पालन पोषण किया और बीमार पड़ा लाचार होकर जा रहा है बोले क्या करें जो भगवान की मर्जी मतलब सफलता सफलता हम लोग करते हैं और जो मर जाते हैं उसमें भगवान की मर्जी होती है भगवान का हाथ देखें मां मिठाई देती है तभी
भी प्यार है और कभी थप्पड़ मारती तो वह भी एक प्यार का रूप है ऐसे जीवन में सुख सुविधा यश या वाहवा या और कुछ होता है तो यह भी ईश्वर का प्रसाद है और कभी कुछ जीवन में विक्षेप का वातावरण होता है यह भी ईश्वर का प्रसाद ईश्वर का हाथ देखें वास्तविक में हमारे कृत्यों के पीछे ईश्वर का हाथ होता है लेकिन अहम अपना हाथ डालकर गड़बड़ कर देता है इसलिए कर्म बंधन में फस जाता है कर्म बंधन में घसीटा जाता है बार-बार जन्मता है बार-बार मरता है अगर ईश्वर को सर्व का अंतर्यामी आत्मा
समझकर शरीर के निर्वाह के लिए ईमानदारी से कोशिश करें तो जो प्रारब्ध में होगा जो टिकना है वह टिकना है बड़ा आनंद बड़ी शांति बड़ा माधुर्य मय जीवन होगा लेकिन मेरा तेरा कावा दावा यह वो करके इसको नीचे दिखाना उसको गिराना यह करना वो करना यह वासना के वेग से जो होता है वह अपने को भी परेशान कर और समाज में भी परेशानी ले आता ऐसे समाज में एक दो अगर ईमानदार है तो लोग बोलते बेवकूफ है जय राम जी की एक दो अगर सज्जन और भगत आ जाते भोले भाले रह जाते सच्चाई सेता रहे
तेरे को पता नहीं तो सतयुग में जो लोग सुखी जीते थे आनंदित जीते थे उसका कारण था कि लोग धर्म परायण थे उस ईश्वर के हाथ को देखने की व्यवस्था को मानते थे धर्म नियंत्रण लाता है संयम लाता है सदाचार लाकर उस सत्य के तरफ यात्रा करवाता है अपनी सुश शक्तियां खोलने की व्यवस्था का नाम है धर्म य तो धर्म ततो जया यतो धर्म ततो अभुदया तो भारतीय संस्कृति के धर्म में एक स्तंभ है दर्शन शास्त्र दूसरा है उत्सव दिवाली आई होली आई सावन का महीना आया सावन के महीने में शिव की पूजा रखी विशेष
लाभ कहा क्योंकि सावन के महीने में धरती पर सूरज के किरण कम मात्रा में पड़ते जठरा अग्नि मंद रहती शरीर में वायु का वात पित का कोप होने की संभावना ज्यादा है शिव जी की पूजा करो बिल्ली पत्र चढ़ाओ और बिल्ली पत्र के अंदर वायु के कोप को दूर करने के गुण धर्म है जय राम जी की तो शिव जी पर जो लोटा जल का चढ़ाते अपना मन को द्रवी भूत करें भाव भरा और बली पत्र चढ़ाकर शिव मंदिर के उस वातावरण के स्वासो स्वास तो अपने को मिलने स्वास्थ्य की भी रक्षा होती और मन
भी मधुर होता है शिवरात्रि में पर्व रख दिए नाग पांचवी जहां त पानी की विपुलता से नागों के बिल में कहीं पानी भर गया इधर उधर बिचारे घूमते तुम्हारे घर के प्रांगण इधर उधर तो नाग को देखकर अपने चित् में रोश ना आए इसलिए नाग पंचमी का उत्सव सावन में रख दिया कि बेचारा जरा दूध का घूंट पीकर चला जाए थो उसका सत्कार करो ताकि उसके चित्त का वैर भाव ना रहे तुम्हारे प्रति बच्चों के प्रति सावन के महीने में रख दिए पर्व रामधन छट पची सातम सातम को खाया बना बना खाया जरा भारी पना
रहा हो तो आठम को उपवास करे अजीर को दूर कर दे और केवल उपवास करके भूखा मरी ना करे उपवास के साथ साथ कृष्ण कनैया लाल की जय डंका डांडिया रास कर दाया बाया बाया दाया पैर धरती पर पड़े ताली बजे अथवा डांडिया रास हो तो हाथ की हाथ के अंदर और पैर के अंदर हमारे सारे शरीर का स्विच बोर्ड है जैसे घर में अलग-अलग जगह पर लाइट ट्यूबलाइट पंखे होते हैं और स्विच बर्ड में सबका कंट्रोल वहां होता है ऐसे ही हमारे शरीर की सब नाड़ियों का कंट्रोल हाथों में और पैरों में तो नृत्य
करने से वो एक्यूप्रेशर सिस्टम से हमारी नाड़ियों में वो मूमेंट होती है जिससे रोग और वात पत कफ के कण दूर होकर हमारे शरीर में तंदुरुस्ती और प्रसन्नता का संचार होता है जैसे कल्पना करो कि आपको सर्दी है तो हाथ के अंदर जो नाड़ियों के स्विच है स्विच नंबर फलाना फलाना यह तीन आपने दबाए दो दो मिनट रोज सर्दी गायब हो जाएगी आपको बुखार है तो स्विच नंबर फलाना फलाना अब वो फलाना फलाना किताबों में लिखा है नक्शा है लेकिन सब लोग नक्शा और किताब कहां देखते फिरेंगे होलसेल में हाथ को मचल ले अथवा पैरों
से पंजों से जरा जंप मार ले कीर्तन कर ले एक्यूप्रेशर जिसको जरूरत होगी नाड़ी को वो सेटिंग हो जाएगी बाकी का कोई घाटा नहीं पड़ेगा फिर बैठे बैठे ताली बजाए अथवा नाचते नाचते कीर्तन करें तो यह कीर्तन का लाभ लेकर साथ-साथ में अंबे मात की जय भाव शक्ति का विकास भारतीय संस्कृति ने भगवान को मानने का जो सुंदर में सुंदर आविष्कार किया दुनिया की और जगह हमको नहीं दिखा भगवान को मां रूप में माना भारत ने अंबे मां बहुचर मा काली मां परात्पर जो ब्रह्म है उसको मां रूप में माना क्योंकि वह जब सब कुछ
है तो मां भी तो वही है बाप भी वही है कबीर ने सुंदर कहा कीड़ी में तू नानो लागे हाथी में तू मोटो क्यों बन महावत ने माथे बैठो हाक वालो तू को तू ऐसो खेल रचो मेरे दाता जहां देखू व तू को तू ले झोड़ी ने मागण लाग्यो देवा वालो दाता तू कर चोरी ने भागन लागयो पकड़ने वालो रो तू ऐसो खेल रचो मेरे दाता जा देखू [प्रशंसा] बन बालक ने रोवा लागयो बच्चा बनकर रोने लग गया बन बालक ने रोवा लागयो छानो राख वालो तुला करो ला करो हला करो भयो पले बनायो पलो
खसी पड़ने भासी हला करो हला करो हला कर लेकिन बच्चे का रोना चालू है तो परमात्मा ज्ञान सत्ता से प्रेरणा करता कि बच्चा कमरे में है उसके स्वासो स्वास में ऑक्सीजन की कमी है उसको परेशानी हो रही है चतुर माता प्रांगण में ले जाती खुली हवा में ले जाती और बच्चा चुप हो जाता है जय राम जी बोलना पड़ेगा बन बालक ने रोवा लागयो छानो राख वालो तम ले झोड़ी ने मागने लागयो ए ब कटको रोट आलो बा आ सातम भेल के तो आलो मारी बे शीतला सातम छ तुम्हारा छोकरा छैया सुखी रे मां शीतला
तुम्हारा हैया ने टाड काप बा आध कर तो खूब [प्रशंसा] रा जय श्री कृष्ण मा बाई बाले आज सुखी अने टा से चाललो गरीब मानस बा ब चाल से कारी देवीना सगन बा खा बाने दयावी मन ब गो ला सुख चार जा मा मारी जमाना ने वात करी नहीं काले नहीं तो मने डो दिखा से ले झोड़ी ने मागण लागयो देवा वालो दाता तू कर चोरी ने भागन लागयो पकड़ने वालो तू को तू ऐसो खेल रचो मेरे दाता जहां देखू वहां तू को तू जल थल में तू ही बिराजे कबीर जी ने कहा और कृष्ण
भी कहते हैं प्रभा अस्म शशि सूर्य हो प्रणव सर्व वेदेश शब्द ख पुरुषम दशु अब श्री कृष्ण की भाषा अपनी है और कबीर की भाषा अपनी है अनुभूति दोनों की वही की वही खबर दे र जल थल में तू ही बिराजे भूत जंत के भेड़ो तू कत कबीरा सुनो भाई साधु गुरु भी बन के बैठो त और चेला भी बन के बैठो त त यह भारतीय संस्कृति का जो अद्वैत ज्ञान है व्यवहार में परमार्थ जो लोग समझते कि भगवान का रास्ता बड़ा कठिन है वे लोग इस रास्ते को जानते ही नहीं जिनको संसार के भोग
और संसार की सत्यता दिखती उनके लिए कठिन है लेकिन जो भगवान ही सत्य जिनको दिखते हैं उनके लिए कठिन नहीं शूरवीर के लिए भगवान का रास्ता कठिन नहीं गोरखनाथ जी कहते हैं हसी बो खेली बो धरी बो ध्यान अहर्निश कथ ब्रह्म ज्ञान खावे पीवे न करे मन भंगा कहे नाथ में तीस के संग ईश्वर नी भक्ति ती हो सत्संग थ त्या चार डगला चाली ने श्रद्धा थ बैसे तोन एक एक शवास भगवान की भक्ति मा गना एक एक डगल श्रद्धा भक्ति थ जने बैसे कथा मा तो एक एक डगल चाले ने एक एक यज्ञ करवान
पुण्य प्राप्त थाय शास्त्र कछ ते स भाग मनुष शु ते स भाग्य मनु कृतार्था नप निश्चय नप सुमर सुमार अंती सुमर सुमार हरे नाम व केवलम हरे नाम वे सदभाव लोग है ते स भाग्य मनुष्य शु मनुष्य लोक में वो सौभाग्यशाली है जो इस कलयुग में हरि नाम स्मरण करते हैं अथवा स्मरण करवाने के देवी कार्य में भागीदार होते थे सौभाग्य शु भाग्यशाली स्वामी विवेकानंद बोलते थे कि तुम किसी भूखे को अन्न देते हो तो पुण्य है प्यासे को पानी देते हो तो पुण्य है हारे हुए को हिम्मत देते हो तो पुण्य है थके हुए
को विश्रांति देते हो तो पुण्य है भूखे को अन्न एक दिन का दिया तो पुण्य है लेकिन सप्ताह के लिए उसकी व्यवस्था करते हो तो ज्यादा पुण्य है दुख निवृत्ति जितना लंबा समय उतना पुण्य बड़ा अगर एक सप्ताह के लिए उसके खानपान की व्यवस्था करते तो एक दिन के खानपान की अपेक्षा आ दिन वाला पुण्य ज्यादा माना जाएगा अगर एक महीना करते तो और ज्यादा है साल भर की व्यवस्था करो तो और ज्यादा पुण्य कर्म है तुम धरती के लोगों की आजीवन तक पूरी जिंदगी के लिए खानपान रहन सहन गाड़ी मोटर सबकी व्यवस्था कर दो
फिर भी जब तक हृदय में अज्ञान है काम क्रोध लोभ मोह है और सच्चा सत्संग का ज्ञान नहीं तब तक आदमी का हृदय दुख की फैक्ट्री की नाई काम क्रोध बनाएगा लोभ मोह बनाएगा पाप ताप करेगा करवाएगा यह पुण्य कर्म तो है रोटी देना अनपढ़ को विद्या के रब से ले जाना बीमार के लिए औषधि तो अपने आश्रमों में यहां भी और दूसरी जगह भी होता है यह पुण्य कर्म तो है लेकिन जरूरी नहीं कि झोपड़े वाला ही दुखी है महल वाला भी दुखी है भैया फैक्ट्री वाला भी दुखी है झोपड़े वाले को तो खाने
का नहीं ऐसे कुछ लोग हैं कि आवक नहीं है दान कीी नहीं मिलती है या पति चला गया ऐसे लोग हैं लेकिन जिनका पति मौजूद है पत्नी मौजूद है फिर भी हृदय में गड़बड़ तो चालू है वह गड़बड़ निकलेगी सत्संग से और सत्संग के द्वारा सारी गड़बड़ निकालना और निकालने में भागीदार बनना मनुष्य जाति को जो सत्संग दिलाने में साझीदार बनता है वह बड़े में बड़ा पुण्य काम करता है एक स्तंभ है दर्शन शास्त्र और दूसरा स्तंभ है धर्म तीसरा स्तंभ है वर्ण व्यवस्था अपने अपने कार्य के द्वारा ईश्वर को संतुष्ट कर सकते हैं पिता
है तो पिता का कर्तव्य माता है तो माता का कर्तव्य बेटा है तो बेटा का कर्तव्य बहन है तो बहन का कर्तव्य भाई है तो भाई का कर्तव्य शिष्य है तो शिष्य का कर्तव्य गुरु है तो गुरु का कर्तव्य और दोस्त है तो दोस्त का कर्तव्य साथी है तो साथी का कर्तव्य अपना अपना कर्तव्य पालो अपने कर्तव्य के बदले में नश्वर चीज ना चाहो कर्तव्य पालकर आप अपने हृदय श्वर को संतुष्ट करो बदला तो तुम्हारे शरीर की रक्षा करने के लिए अपने आप आएगा जो चीज काम में आ जाती है अरे स्कूटर काम में आ
जाता है कार काम में आ जाती तो उसको पेट्रोल ऑयल मिलता है स्कूटर को पेट्रोल ऑयल मिलता है विकी को भी मिलता है और कभी कभार रखने के लिए उसको जगह भी मिलती है जब पत्थर और चूना काम में सीमेंट काम में आता है तो उसको भी रखने की जगह मिलती है तो तुम अगर ईश्वर के काम आ गए तो तुम्हारे शरीर को रखने और खाने की व्यवस्था बहुत समाज करेगा और ईश्वर करेगा मेरा क्या होगा धंधा नहीं चलेगा तो क्या होगा भूखे मर जाऊंगा अरे पगले भूखे कैसे मरेगा महाराज ईमानदारी करूंगा तो भूखे मर
जाऊंगा नहीं हो सकता खा खा के भी लोग मर रहे हैं खा खा के कोई अमर नहीं हुआ तो सच्चाई से अगर भूखा भी मर गया तो क्या घाटा है लेकिन भूखा मरेगा नहीं आटा दाल की चिंता मत कर सब्जी पालक की चिंता मत कर दूध दही की चिंता मत कर घर और मकान की चिंता मत कर मुर्दे को प्रभु देत है कपड़ा लकड़ा आग जिंदा नर चिंता करे तिस के बड़े अभग तू पुरुषार्थ कर और लोक और परलोक का संवारने का बाकी जो होगा जाएगा नि होर चलता अ तोय हाय सु रे दूध ड़
अ जरा जरा बात में एक तो दला दो रुप का नुकसान हुआ दूसरा हदय नुकसान सावधानी हो दूसरी बार ले कर बा नहीं दू ब बा नहीं रोटली ब गई तो मु प हय बाश नहीं अने प्रेस करता करता कपड़ू बली गय तो धो नहीं हय बाश नहीं न अर्थ नहीं कि बीजी बर प बाता थाव लापरवाही न करो काम करने में वर्क वाल यू वर्क प्ले वाल यू प्ले दैट इज द वे टू बी हैप्पी एंड गे जो काम करो तत्परता से करो बेवकूफी से उसको बिगड़ने मत दो लेकिन अगर कुछ घाटा पड़ गया
तो अपने दिल को संभालो [संगीत] अपने दिल को बिगड़ने मत दो भयभीत मत होने दो दुखी मत होने दो चिंतित मत होने दो अपने दिल की रक्षा करो अगर कुछ अच्छा मिल गया बढ़िया खाने को मिल गया तो अपने दिल को उसका गुलाम मत बनाओ ढेबरा सारा थ के फरी पाछा बनाओ नहीं नहीं बा गंगाधर एमनी पत्नी रका बीमा आपस केरी केसर केरी केसर आम और आपस आम संवार कर लाई सुधार कर एक फाक खाई दूसरी फाक दूसरे आम की चखी खाई मुस्कुराए पूरी प्लेट उठाकर पत्नी को दिया कि लो नौकरानी को दे दो और
पड़ोस के बच्चों को और अपने बच्चों को दे दो क्यों आम अच्छा नहीं लगा ये तो बहुत मीठे थे बोले बहुत मीठे सुगंधी भी काफी थी इनम हां उस जमाने में जहां अंग्रेजी खात नहीं था छानिया खातर से तो और फल मीठे और स्वादिष्ट और सुगंधी वाले केसरा अत्यार तो जाने घास खा दू आपस केरी खा दी जाने घास खा द ना करता देसी ली हरी थोड़ी घड़ किस मीठा नता कि मीठा ता सुगंध नती कि सुगंध होती सारा न तो के बहु सरस मजा ना आवी के बहु मजा आवी तो केम खाता नथी अरे
बहु मजाने खाए तो आसक्ति था थ वस्तु ची दए तो अनासक्ति योग थवा लागे कैसा व्यवहार में परमार्थ कर दिया भारतीय संस्कृति हरि ओम [संगीत] ंडी शांति गहरी शांति मधुर शांति परमेश्वरी शांति हरि स जग कछु वस्तु नहीं हरि सम कछ वस्तु नहीं प्रेम पंथ सम पंथ प्रेम पंथ समप सदगुरु सम सज्जन नहीं सदगुरु सम सज्जन नहीं गता नहीं ग्रंथ गीता सम नहीं ग्रंथ हरि हरि ओम [संगीत] ये भगवान के प्यारों की महफिल है हरि के दुलर की महफिल [संगीत] है ह हरि बो हरि बो पवन पावन नाम हरि हरि ओम अधम उधारण ना हरि
हरि ओम प्रेम से बोलो प्यारा नाम हरि हरि ओम दिल से बोलो दुलारा ना ह ह ह बो बो ह [संगीत] [संगीत] [संगीत] मंगल मंगल नाम हरि हरि ओमन नंद नाम हरे हरि ओम पतित पावन नाम हरि हरि बो प्रेम से बोलो प्यारा नाम हरि हरि हरि बो ओम हरि बोल हरि बोम हरि बो बंगाल में गौरंग गाए ह ह ओ पंजाब में नानक आपके हरि हरि ओम सौराष्ट्र मा नरसी बोल्या हरि हरि ओम पापी तट पर साधक बोले हरि हरि ओम ओम मंगल मंगल नाम ह हरि ओ ओ हरि ओम हरि ओ हरि [संगीत]
[प्रशंसा] [संगीत] [संगीत] [संगीत] प्रेम से बोलो प्यारा नाम हरीरी ओम दिल से बोलो दुल्हारा नाम हरीरी ओम ओम कली का किहारा नाम हरि पाप का निवारक नाम पतित पवन नाम ओम आनंद आनंद नाम हरि हरि हरि मंगलम मंगल नाम ह हरे मधुर मधुर नाम ह हरि ओम ओम प्रेम से बोलो प्यारा नाम ह ह कली का किनारा नाम ह [संगीत] ह हरि हरि हरिवन पावना हरि हरि ओम पावन नाम हरि हरि ओम मंगल मंगल नाम ह हरि ओ आनंद आनंद नाम [संगीत] [संगीत] [संगीत] [संगीत] राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम
राम राम राम राम राम राम राम रग रग में राम नाम की चेतना का संचार आनंद माधुर्य और आत्म शक्ति का विकास राम राम राम जीभ ऊपर और नीचे नहीं बीच में रहे उसी में मन को लगा दो शरीर की थकान मन की चंचलता चुटकी में मिटती है ये योग विज्ञान के प्रयोग से शरीर तंदुरुस्त मन प्रसन्न और बुद्धि में आत्मिक प्रकाश जीवन का सर्वांगी विकास उंडी शांति तुम्हारा पुण्य वधवा दो जे कीर्तन करे छ ते लोग को संध्या चौकस कर जोई जे लोग को ध्यान करे छ ते लोग को कीर्तन चौकस कर जो जो
ध्यान करते उनको कीर्तन जरूर करना चाहिए और जो कीर्तन करते उनको ध्यान जरूर करना चाहिए जो ध्यान कीर्तन करते उनको संध्या जरूर करना चाहिए बहुत बहुत लाभ होता है शरीर तो स्वस्थ बनता ही है रक्त के कण पवित्र होते हैं रोग प्रतिकारक शक्ति बढ़ती है मन के दोष निवृत होते हैं और बुद्धि तेजस्वी होती है और जीवात्मा का परमात्मा के प्रति दृढ़ विश्वास और सुंदर अनुभूतियों का द्वार खुल जाता है