जो बाहर की परिस्थितियों को एकत्रित करके धन के ढग लगाकर सत्ता की कुर्सियां संभालकर रूप और लावण्य को और पफ और पाउडर और लिपस्टिक के थले बक्से बनाकर जो सुखी होना चाहता है वह तो ऐसा समझो कि अग्नि में कूदकर ठंडक चाता इतना बुद्धिमान है वह जय श्री कृष्ण आज तक ऐसा आदमी कोई सुखी मिला नहीं हर्षित मिलेगा थोड़ी देर के लिए हर्ष मिलेगा लेकिन उतना ही वह खिन्न स्वभाव का होगा उतना ही व विकृत स्वभाव का होगा अशांत स्वभाव का होगा जितना जितना बाहर के साधनों से सुख लेने का अंदर में आग्रह रहेगा उतना
उतना उसके अंदर में भय क्रोध इच्छा वासना उद्वेग ये सारा कचरा होगा जैसे मांस के टुकड़े को देखकर चीले लड़ती है ऐसे ही भोगों को देखकर एक दूसरे में लड़ अ तो मनमाया होने के लिए इन भोगों का इन वस्तुओं का सत उपयोग होना चाहिए तो सत उपयोग क्या करे कि शरीर पहले नहीं था बाद में नहीं रहेगा शरीर पांच भूतों की प्रकृति का है यह वस्तु भी प्रकृति की है संसार भी ये संसार की वस्तु संसार की है और शरीर भी संसार चीजों से अन्न जल मिट्टी से बना है तो शरीर को संसार की
सेवा में लगा दो भोगों को सुख के लिए नहीं लेकिन भोगों का सदुपयोग करके सेवा करके आप अपनी निष्काम बढ़ा दो जैसे कलकाता में विद्यासागर लेकिन विद्या में इतने कुशल थे इतने बुद्धिमान थे उनका नाम विद्यासागर पड़ा 1800 संवत 1820 में उनका जन्म हुआ था वह जब बालक थे तो अपने पिता के साथ टांगे में बैठकर कलकाता जा रहे थे उनका गांव सागर गांव कोलकाता से 192 माइल दूर था माइलस्टोन देखकर उस बच्चे ने पिता से पूछा कि पिताजी प यह पत्थर पर क्या लिखा है बोले बेटा य अंग्रेजी में 19 लिखे बोले अंग्रेजी में
19 ऐसे होते हैं हा बस 19 के बाद 18 देखता गया 17 देखता गया अंग्रेजी के अंकों को उसने टांगे में जाते जाते पक्का कर लिया ऐसा वो बुद्धिमान लड़का था वो जब थोड़ा बड़ा हुआ तो उसको यह कोई सत्संग का प्रभाव अगले जन्म का प्रभाव उसको पता चला कि यह संसार की चीजें छोड़कर मर जाना है अथवा तो इनका सदुपयोग करके अंदर आना है या तो इनका सेवा के द्वारा सदुपयोग करके अपने परमात्मा में आना है या तो इनकी मजूरी कर कर के पच पच के मर जाना है और फिर फिर घोड़ा गधा कुट्टा
सूअर बिल्ला होकर जन्म मरण के चक्कर में पड़ना है हम मध्य में है सचेतन अवस्था में इनका उपभोग अधिक करके अचेतन अवस्था में जाए अथवा इनका सदुपयोग करके परम चेतन अवस्था में जाए यह हमारे हाथ की बात है यूनिवर्सिटी में उनकी नियुक्ति हुई और उनको एक डिपार्टमेंट एक्स्ट्रा मिला तर्क शास्त्र पढ़ाने के लिए 4 माहे वार उनका पगार बढ़ाया गया उस जमाने के रप बहुत होते थे इतने अकलमंद आदमी थे और इतने समझू थे कि कुछ ही दिनों में ट्रियों को कहा कि मेरे से ज्यादा श्रीमान वाचस्पति जो है वह तर्क शस्त्र अच्छी तरह से
पढ़ा सकते हैं तो मैं अपने 40 रप के स्वार्थ के कारण बच्चों की पढ़ाई में खोट क्यों आने दू मेरे में तर्कशास्त्र पढ़ाने की क्षमताएं हैं लेकिन मुझसे ज्यादा जो मेरे ध्यान में है वाचस्पति नाम के एक सज्जन ट्रियों ने इनकी बात स्वीकार रखी वाचस्पति के लिए निमंत्रण लेकर गए वाचस्पति इनके निमंत्रण को सुनकर चकित हो गए कि इस पोस्ट के लिए तो लोग खींचा खींची करते हैं और तुमको मिली है और तुमने मेरे लिए य सजेशन देकर मेरे घर मेरे को बताने आए वास्तव में तुम विद्यासागर तुम मानव नहीं हो तुम देव हो मानव
जब भोगों में ठहरता है तो मानव होता है आसक्ति करता है तो दानव होता है और त्याग करता है तो देव होता होता है तुम देव हो देव कौन होता है पता है जो यज्ञ करता है इंद्र कौन बनता है जो यज्ञ करता है यज्ञ में क्या होता है त्यागना पड़ता है स्वाहा स्वाहा स्वाहा खूब स्वाहा स्वाहा करके त्यागा है तब देव हुआ है तो तुमने यह पदवी त्याग द बोले इसमें क्या बात है जिससे बहुजन हिताय प्रवृत्ति दूसरों का मंगल होता है इसी में तो मेरा मंगल है क्योंकि हम व्यापक समाज से जुड़े हैं
आप समाज से अलग नहीं रह सकते समाज के हित में आपका हित पड़ोस के हित में आपका हित है कुटुंब के हित में आपका हित है देश के हित में आपका हित है विश्व के हित में आपका हित है और विश्व के विनाश में अपना भी तो अहित होता है आप विश्व से जुड़े हुए हैं अगर इधर आप शुभ वातावरण में बैठे हैं चिंतन ध्यान भजन करते हैं तो आपके शुभ भाव शुभ स्वासो स्वास इर्दगिर्द जाकर अच्छा फैला वा करता है ऐसे ही हम अशुभ चिंतन करें तो वो भी वायुमंडल में फैलता और कोई ना
कोई व शवास लेगा तो एक आदमी अकेला नहीं है वोह पूरे विश्व से जुड़ा है जैसे आप सूर्य के किरण से जुड़े हैं सूरज वहां ठंडा हो जाए तो हम लोग कहने को नहीं रहेंगे सूरज ठंडा हो गया आप पूरी पृथ्वी से जुड़े हैं भले यहां दो बाय दो फीट पर बैठे हैं लेकिन यह पृथ्वी वरियाव गांव अथवा जहांगीरपुर से जुड़ी है जहांगीरपुर सूरत से जुड़ी है सूरत गुजरात से जुड़ी है गुजरात भारत से जुड़ी है और भारत की पृथ्वी क्या विश्व की पृथ्वी से अलग हो सकती है क्या और विश्व की पृथ्वी विश्वेश्वर से
अलग नहीं है तो सचमुच आपका फिजिकल शरीर भी विश्वेश्वर के साथ जुड़ा है लेकिन इस बात का पता नहीं यह जड़ जड़ प्रक्रिया से देखो तो जड़ शरीर भी विश्वेश्वर के साथ जुड़ा है और फिर आपकी आंख मन से जुड़ी है मन बुद्धि से जुड़ा है बुद्ध बुद्धि चिति से जुड़ी है और चिति चैतन्य से जुड़ी है आप यूं से देखो चेतना से तो भी आप परमात्मा से जुड़े हो फिर भी इतने जुड़े हुए दोनों तरफ से फिर भी आप ईश्वर से अथवा सुख से अपने को दूर कैसे पा रहे हैं राग भय और क्रोध
राग भय और क्रोध क्यों हो रहा है कि मिटने वालों में अमिट जैसा मोह और अमिट का ज्ञान नहीं एक ही बीमारी और एक ही दवा बीमारी एक है कि आस्था आसक्ति परिवर्तन परिस्थितियों में और दवा है कि परिवर्तन को परिवर्तन समझो और शाश्वत में प्रीति कर दो मन माया हो जाओ अर्जुन को यही तो दवाई दी गई थी युद्ध होने वाला है होने वाला है त हां ना करके यह करू यह ना करू य आग्रह क्यों करता है तेरा क्षत्रिय स्वभाव है उनके कर्म पक गए और तेरे द्वारा यह होना है हां ना करते
करते आखिर करना तो पड़ा लेकिन ज्ञान को उपलब्ध होकर किया तो करता भाव रहा नहीं महाभारत का युद्ध जब समाप्त हुआ तो कुंता जी गांधारी के साथ और अपने देवर के साथ अरण्य में जाने को तैयार हो गई धृतराष्ट्र ने कहा कि अब पुत्र तो मर गए सब विनाश हो गया अब अपना जीवन जरा संवार ले पति पत्नी अरण्य में एकांतवास में पवित्र जीवन बिताकर अपना जन्म करने का विचार की कुंता जी ने कहा कि आप श्रद्धा हो गई हो और धृतराष्ट्र जी देवर जी देख नहीं पाते हैं तो आपकी सेवा कौन करे मुझे आज्ञा
दो मैं चलू गांधारी को धृतराष्ट्र को आश्चर्य हुआ कि जिनके साथ हमने इतना जुल्म का व्यवहार किया वह कुंता हमारी चाकरी के लिए चल पड़ी कुंता ने जब यह निर्णय किया तो कुंता का निर्णय अधिक रहता था बड़ी निष्ठावान थी जरा जरा बात में अपना निश्चय बदलने वाली नहीं थी उसमें दृढ़ता थी और जिसके जीवन में दृढ़ता नहीं है वो तो सूखे पीपल के पत्ते जैसा इधर उधर झोका खाता रहता है जीवन में कोई दृढ़ता होना चाहिए इतना तो करना ही है ऐसा रहना है ब नथ पी न प मैं तो छोड़ी द पहला आग्रह
कर ले फूकी ली बीड़ी तने फूकी नाख से मैं तो प्याली छोड़ी दीी प पहला बहु आग्रह करो ने व जरा पछ न मान खवा माटे जरा प्याली ल ले अ प्याली तने ल जा याद राख पाछ जटलो तू ढीलो पोचो थने ला ब विकार ने व्यसन तने पकड़ी पाट ले थोड़ी दृढ़ता ला अने दृढ़ता माटे ली सवारे उठी नई धोवी पूर्व अभिमुख थई ज्ञान मुद्रा में बैसी उंड शवास लो अने हरि ओ फरी शवास भरो फेव मा हरि ओम री अंदर अद्भुत ब आ जसे 10 मिनट करो दररोज जो इच्छा शक्ति कितली विकसित बीड़ी
नहीं के प्याली नहीं के गप्पा सप्पा नहीं के बीजा तीजा बातो नहीं ताकत के तराया होली करे त पता ना संकल्पन सामर्थ्य भूली बैठा छ त रा दृढ़ता ना खजाना ने खोई बैठा भूली बैठा चा छोड़ छोड़ कर छूट नहीं तुम्हारे में ईश्वर का अथालय चाहा कम वक्त चाह के कब की क्या ताकत के तुमको जीत ले एक जरा सी प्याली या सिगरेट बीड़ी या छिक की क्या ताकत की तुम्हारा नाक पकड़ ले तुम अंदर से हार जाते हो तब परिस्थितियों को जीत मिलती है ईश्वर के लिए भले ईश्वर के आगे तुम दीन हीन हो
जाओ लेकिन लेकिन अंदर से तुम समझना कि सचमुच में तुम दीन हीन नहीं हो अगर तुम सचमुच में दीन हीन और तुच्छ होते तो मंदिर में प्रार्थना करके जो बाहर निकलते भगवान मैं कुछ नहीं मैं दीन हूं मैं हीन हूं मैं पापी हूं मैं तुच्छ हूं उस तुच्छ की प्रार्थना करके जो बाहर निकला मंदिर से उसको बुलाओ के दीन हीन तुच्छ जरा इधर आ जाओ फिर देखो वो खबर ले लेगा बदन कीी का दावा कर देगा उसकी गहराई में नहीं है तुच्छ होता तुम्हारी गहराई में तुच्छ होता नहीं है लेकिन तुम जब परिस्थितियों के तुच्छ
क्षणिक सुखों को आस्था देकर अपनी शक्तियां बटोर देते हो तब यह विषय विकार तुम पर धमा बोल देते हैं और तुम अपने को कुचले हुए दीन हीन मानते हो कितना भी कुछ हो गया आज तक कितना भी तुम्हारे पर अन्याय हो गया मन ने कई बार कसम खाकर तुम्हें गिरा दिया फिर भी अगर अभी आप तुम दृढ़ता करो तो तुम्हारे में वो ताकत है कि सदियों की यात्रा इसी जन्म में पूरी कर सकते हो बालिया लुटारा साढ़े सात बैल गाड़ियां भर जाए इतने लोगों की हत्या किया था इतनी हत्या तो तुमने नहीं की होगी नारद
जी को पेड़ के साथ बांध दिया था इतना क्रूर स्वभाव का था लेकिन जब संत का संग मिल गया और बात समझ में आ गई करवट ले ली जीवन ने वाल्मीकि ऋषि बन गए और उनकी लेखनी से जो टपका है वह शास्त्र बन गया वाल्मीकि रामायण हम लोग सिर झुकाते हैं तो तुम्हारे अंदर अथालय शक्ति पड़ी है किसी ने कह दिया कि तेरा लड़का भगत हो गया मैं तो रोके घर वापस आई अब तो मेरे लिए बड़ोदा जहर हो ग हो ओहो रुलाने वाला दुख देने वाला तो तुम्हारे दिल में ठेस पहुंचाना चाहता है और
उस ठेस को तुमने महत्व दे दिया तो उसकी जीत हो गई अरे जैसा वो ठेस पहुंचाता है उसके विपरीत बात तू अंदर अपने मन विचार कर तो वह बुा हो जाएगा ठेस पहुंचाने वाला और तेरी विजय हो जाएगी जो तेरे को मेना मारते हैं या कुछ करते अरे तेरा तेरा भाई तो देख माला करता भगत हो गया मेरे को बोलते तेरा भाई भगत हो गया मेरे को बड़ा दुख होता है तू सुख किया करके भगत होता है भगवान का भाई भगत होता है अ भाग का भाई और बेटा भगत थोड़ी होता है नारायण नारायण नारायण
ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओ अर्थात वस्तुओं का इज्जत आबरू का संसार की परिस्थितियों का राग मिटते ही भय और क्रोध मिट जाता है राग है कि हमको ऐसा कोई ना कहे इसलिए भय होता है इसलिए क्रोध होता है इसलिए चिंता होती क तो कहे उसका स्वभाव चिड़ाने का उसका स्वभाव है धन्यवाद देने का इस सज्जन का स्वभाव है कोई सज्जनता से मेरी खाण कर रहा है तो यह उसका सद्गुण है और कोई चिड़ा स्वभाव के कारण वो चिड़ा आता है तो उसका स्वभाव है तू अपने राम में मस्त
रह नहीं तो संसारी लोग तो वो घोड़े की बात मैंने सुनाई थी बाप और बेटा घोड़ा लिए जा रहे थे बेटा घोड़े पर था बाप पैदल था लोगों ने कहा घोर कलयुग आ गया जवान हट्टा कट्टा घोड़े पर बैठा बुड्ढा बाप बेचारा पैदल जा रहा है शर्म की बात छोरा नीचे उतरा बाप को बोला तुम बैठ जाओ प्लीज बाप बैठ गया लो को जो आ डो हो थयो प हजी घोड़ा ऊपर बसवान शौक गयो नहीं बापो ो छोक पग पड़ो जाए ोने हजी घोड़ा बैसन शोक कितनी आ सक्ति आहा हा तोबा तोबा खुदा खैर करे
बाकी तो भाई अवे चोकरो के उना बलो बाप के ना ब ो पछ आप डबल सवारी कर डबल सवारी बैठा के लाज शरम एक मंगू प्राणी बे बैठा लवा अवे के था आप उतर बेना बे बाप दक उत घोड़ो दोरी जा अकल छते घोड़े पग जाए [प्रशंसा] मा और घोड़ा है और पैदल जाे दोनों और घोड़ा है और दोनों बैठते और घोड़ा बाप बैठता तो भी नाराज बेटा बैठता तो नाराज दोनों बैठते तो नाराज और एकदम खाली जाते तो नाराज अब कहने वालों को चुप कैसे कराया जाए कोई उपाय बताओ वह क्यों खिलौने हो गए
कि उनका आग्रह था कि हमको कोई कहे नहीं अरे कोई कहे नहीं ऐसा तो दुनिया में आज तक कोई पैदा ही नहीं हुआ कि जिसके लिए कोई कहे नहीं कोई उसके लिए ना कहे ऐसा कोई दुनिया में पैदा ही नहीं हुआ फिर चाहे बुद्ध हो चाहे कबीर हो चाहे रामचंद्र जी के गुरु वशिष्ठ महाराज हो चाहे कृष्ण हो चाहे मीरा हो चाहे रोहिदास हो चाहे तुकाराम हो चाहे समर्थ रामदास हो चाहे कोई हो कहने वाले तो कहेंगे लेकिन तुम्हारे तरफ से नकटा पन भी नहीं होना चाहिए केवा वा के तो फको धमाधम ना ना ऐसा
नहीं तुम श समत जीवन जियो तो फिर कहने वालों का तुम्हारे चित् पर प्रभाव नहीं पड़ेगा और तुम्हारे जीवन के द्वारा कईयों को सद प्रेरणा मिलेगी जैसे विद्यासागर विद्यासागर बैठे थे एक लड़का आया के बोले बाबू जी दुष्का का मौका है बख मांगना मेरा स्वभाव नहीं है लेकिन हो सके तो एक पैसा दे दो विद्यासागर तो तो सज्जन पुरुष थे बोले बेटे एक पैसा अगर मैं तुझे दो पैसा दूं तो क्या करेगा एक पैसे के चने लेकर बले हुए चने खाऊंगा और एक पैसा मां को दूंगा बोले अगर मैं चार पैसे दे दूं तो बोले
दो पैसे के चने घर ले जाऊंगा और दो पैसे मां को दे दूंगा अच्छा अगर मैं तेरे को दोआने दे दूं तो बच्चा ने सिर नीचा किया और चलता भाई विद्यासागर ने हाथ पकड़ लिया क्यों जाता है कि आप एक पैसा तो देते नहीं दो आना कौन दे सकता है इस जमाने में आप मेरी मजाक उड़ाते हैं बोले नहीं नहीं समझ ले मैं तुझे दोवा ना दू तो क्या करेगा बोले एक पैसे के तो चने में अभी खा लूंगा बाकी तीन पैसे के ले जाऊंगा और एक आना मा को दूंगा समजो मैं तुझे चार आना
दे दूं तो क्या करेगा बोले दो आने का तो वही करूंगा और दो बचा के कल आम लेकर बेचूंगा और उससे अपना गुजारा चलाऊंगा विद्यासागर ने एक रुपया उसको दे दिया वो तो हैरान हो गया कि सचमुच ये आदमी अद्भुत है गया और उसने दो साल के बाद विद्यासागर जी जा रहे थे कलकाते की उस बाजार से एक युवक ने उनको रोका हाथा जोड़ी के कि आप पधारो मेरी दुकान बोले भाई मैं तो तेरे को पहचानता नहीं यह इतनी बड़ी दुकान किसकी है आप चलो आप ही की है विद्यासागर नजदीक आए आप बैठो इस दुकान
को पावन करो आपकी दुकान है मैं तुझे जानता नहीं कि मैं वह लड़का था जिसको आपने एक पैसा दो पैसा चार पैसा करके एक रुपया दिया था यह आपके एक रुपए का रूपांतर है य आपकी कृपा का प्रसाद विद्यासागर के चित्त से जो आनंद आया जो शांति मिली और जो उसकी प्रसिद्धि यहां कथा तक पहुंची अगर वोह रुपया फूक डालते तो क्या मिलता सीधी बात है सिधु गणित विद्यासागर को पता भी नहीं तप करे पाताल में प्रकट हुए आकाश जिसमें आपका स्वत्व है जिन वस्तुओं में रुपयों में भोग में वह अगर आप परहित के लिए
खर्च कर देते हैं तो आपकी कीर्ति स्थाई हो जाती है ऐसा नहीं खेदड़ या फरेब से किसी की कीर्ति होती है उसकी कीर्ति टेंपररी है राजाधिराज अन दता महाराज घनी खममा वो थोड़ी देर के लिए होगी सचमुच अपने पसीने का अपने स्वत्व का अगर भोग ना भोगे और सदुपयोग करता है तो उसका यश लंबा हो जाएगा साधे सुधे कपड़े पहनते थे अपने विषय में ज्यादा खर्च नहीं करते थे चांसलर तक की पोस्ट पर पहुंचे थे क्या क्या उनको पद मिले थे अधिक अ मिले थे लेकिन अधिकारों के कारण टाई बैक टाई नेक टाई नहीं आई
थे सादा जीवन पवित्र जीवन था रास्ते से जा रहे थे एक आदमी आंसू राता हुआ मिला पर दुख कातर का स्वभाव उनमें था व रास्ते चलते चलते भी खोजते कोई सेवा का मौका मिल जाए कहीं ईंट पत्थर है तो उसको किनारे लगा देते और कोई रोता दुखी दुखियारा देखते तो उसके तरफ सहानुभूति से बात करते थे सहानुभूति से बात करके उसका मार्गदर्शन करते समय उसको जो आनंद आता है उसको जो सुख मिलता है उससे ज्यादा मार्गदर्शक को सहानुभूति करने वाले को सुख होने लगता है उसको तो तुम रास्ता बताओ चले तब फायदा हो लेकिन तुमने
सहानुभूति से रास्ता बताया तो तुम्हारे हृदय में उसी समय फायदा होने लगता है भय राग और क्रोध रवाना होने लगता है भैया ईश्वर को पाने के लिए कोई मजदूरी नहीं करनी है टेक्निक समझनी है और कुछ नहीं मुक्ति के लिए कोई ज्यादा मेहनत नहीं है नश्वर का सदुपयोग और शाश्वत में प्रीति य दो ही छोटे से काम नश्वर वस्तुओ न सदुपयोग अने शाश्वत आत्मा मा प्रीति बे नानक काम करो पति मिनिस्टर होना प्राइम मिनिस्टर होना यह बड़े बड़े काम तुम्हारे बश की बात नहीं है लेकिन यह बड़े काम का नतीजा बिल्कुल छोटा है और यह
छोटे काम का नतीजा एकदम बड़ा है ब्राह्मण को थाम लिया क्यों ब्राह्मण मेरा कोई नहीं ऐसा कह रहे भैया क्या बात है तुम्हारे आंखों से कुछ भीगी आंखें दिखाई दे रही ब्राह्मण के आंख टपक पड़ी आंसुओं से बो भैया बताओ बोले अरे भाई मजदूर तू क्या हमारा दुख दूर करेगा उनको पता ही नहीं कि यह विद्यासागर बो फिर भी भैया बता देना मेरी जिज्ञासा है आग्रह किया बोले मैंने लड़की की शादी में देखा देखी में जरा खर्च कर दिया क्योंकि हम नात में ऐसा रिवाज है यह नाती गोती भी कभी-कभी आदमी को फांसा दे देते
नात में आक पड़े आक पड़ नाती गोती जो एक दूसरे का ख्याल करे बिना जो खर्चा कराते वो तो नाती गोती है कि दुश्मन है वो भगवान जाने न हमारी नात में रिवाज है य रिवाज है ऐसा करते हुए बच्ची की शादी में जरा खर्च ज्यादा हो गया कर्जा लिया और कर्जा जिससे लिया वो महाजन महाजन माना आपने सेठ क उस महाजन ने मेरे परदा कर दिया मेरी सात पीढ़ियों पर हम कोरट कचरी में नहीं गए और मैं ऐसा लड़का पैदा हुआ कि मां-बाप का दादा दादे का नाम नाग कटवा दि कोट कचरी में जाकर
खड़ा होंगा कैसा लगेगा बो अच्छा तो महाजन का नाम क्या है बोले तुम क्या करोगे महाजन का नाम जान के मेरा दुख मेरा भाग्य में फूंगा बोले कृपा करके तो बताओ ऐसा नहीं कह रहे कि मैं कर्जा चुंग मैं ठीक करूंगा मैं विद्या सागर हू नहीं नहीं महाजन का नाम बताओ महाजन का नाम पूछ लिया कोर्ट का नंबर तारीख पूछ ली वो ब्राह्मण जब कोर्ट में जाने के दिन था तो महाराज उसको घर बैठे पता चल गया कि तुम्हारा केस खारिज हो गया क्यों कि महाजन को रुपए मिल गया किसने दिए कि कोई पता नहीं
आखिर उसने पता चला कि अरे पर दुख कातर दुख भंजन ये विद्यासागर थे सड़क पर मिले थे मुझे पता ही नहीं उन्होंने भरपाई कर दिया और मेरा दुख दूर हो गया उसको जो चित्त में आनंद शांति मिली उस वक्त मिली जब उसे पता चला लेकिन महा विद्यासागर को तो उसी वक्त मिली जब उसके हित के लिए किया जय जय इस प्रकार उसके जीवन की तमाम सारी सुंदर सुंदर घटनाएं हैं जिससे हम लोगों को बोध लेना चाहिए एक बार वो स्टेशन पर कहीं किसी कार्य वसा स्टेशन से उतरे थे इतने में डॉक्टर वहां का हे मजदूर
मजदूर मजदूर अब सागर जैसे स्टेशन छोटे से स्टेशन मजदूर कहां हो यह धीरे धीरे चाल से आ रहे थे कपड़े साधे सुधे थे डॉक्टर ने डाका डांटा अरे क्या तुम मजदूर लोग बड़े आलसी होते हो चल उठाओ इधर आओ बैग उठाओ विद्यासागर बैग उठाकर सिर पर 11 नंबर की गाड़ी में उसके घर तक पहुंच गए और व डॉक्टर अकडू खान घर गया पैसे ले आकर जब देने लगा इतने में डॉक्टर का बड़ा भाई ने देखा कि विद्यासागर हमारे प्रांगण में खड़े उसने तो बड़े आदर से वे क म किया पैर छुए तब डॉक्टर को पता
चला कि अरे जिनका नाम सुना था विद्या सागर जीय पहले तो बोलता था मजदूरी कितनी दू विद्यासागर बोलते कि मैं मजदूरी तो यही चाहता हूं कि मेरे भारतवासी अहंकार रहित हो स्वावलंबी हो अपना काम आप करें और कर्तृत्व का अभिमान ना हो ऐसी मेरे को मजदूरी दे दो तो अच्छा है ऐसी मुझे मजदूरी दे दो दो पैसे चार रुपया दो रुप मजदूरी नहीं चाहिए डॉक्टर तो फुट फुट के रोने लगा कि मैंने आप जैसे को नहीं पहचाना अपमान किया बोले तुम अपने को नहीं पहचानो तो फिर अपने को पहचान लो हम उसी में आ गए
उसी के शरण है हम नारायण नारायण नारायण नारायण नारायण नारायण आकर्षण जो है स्त्री में पुरुष में पदार्थ में ही हमको भय शोक और जवाबदारी में डाल देता है जिससे स्त्री पुरुष और पदार्थ शोभायमान हो रहे हैं उसके आकर्षण का पता नहीं इसलिए इन बहारी आकर्षणों में हम हस्ताक्षर कर लेते हैं और बाह्य आकर्षणों में हस्ताक्षर कर लेते हैं तो मनमाया नहीं हो पाते हैं मनमाया नहीं हो पाते इसलिए सारे दुख और पापों की शुरुआत हो जाती है ओम ओम ओ ओ ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओ ओ ओ ज्ञान विवेक
बाहर मिलता सो मिले अंतर सब सो एक बाहर मिलने जुलने में सबसे ठीक लेकिन अंदर में समझे कि यह सब स्वपना है यह सब आने जाने वाली परिस्थितियां है मेरा तो मिलने हार वो है मेरा कृष्ण तत्व मेरा राम तत्व गुरु तत्व मेरा आत्मा देव ऐसा अगर सजगता से भान रहे तो भय राग क्रोध क्षीण होता जाएगा और जितनी जितनी आस्था मिटती जाएगी नश्वर वस्तुओं की उतना उतना भय राग क्रोध दूर होता जाएगा और जितना जितना भय राग क्रोध दूर होता जाएगा उतना उतना मन मया होता जाएगा और जितना मन मया होगा बहु ज्ञान तपसा
फिर एक बात और समझ लेना जरा सूक्ष्म है विद्यासागर की नाई सेवा करना अच्छा है लेकिन इसमें भी कुछ ना कुछ बाहर के वस्तुओं की पराधीनता रहती है धन की सेवा लेने वाले की सेवा करने वाले तन की और सेवा करने का निर्णय करने वाली बुद्धि की इनकी तो पराधीनता बनी रहती है पूर्ण सुख यहां भी नहीं मिलता सुख तब मिलता है जब पूर्ण तत्व का बोध होता है पूर्ण स्वतंत्रता तब मिलती है जब पूर्ण आत्मा को मैं रूप में साक्षात्कार करता है तो गीता का ने कहा आरु रुक्ष मुनि योगम कर्म कारण उच्च से
योग में आरूढ़ होना चाहे संसार में सफल होना चाहे तो निष्काम कर्म करो निष्काम कर्म करने से हृदय शुद्ध होगा और शुद्ध हृदय होने लगे तो फिर समय बचाकर ध्यान मग्न हो जाओ जय जय समय बचाकर ध्यान मग्न हो जाओ और फिर ध्यान करते करते ध्यान में जब आगे बढो तो फिर सांख्य को ले आओ विवेक विचार को और साक्षात्कार करके मुक्त हो जाओ ओम ओम ओ बधा झगड़ा मुसीबत न कारण श बाहार ना जगत ना व्यवहार ने आपनी वासना ना दोरे बराबर ए रीते बांधी खवानो जे आग्रह छ नाथ बधा दुख उत्पन्न य बोलो
एक तरफ एक दुख उत्पन्न थाय नी काजी राख अने बीजी तरफ ं कही द छ दुख उत्पन्न थानी काजी राख पण य सहली नथी हो जय श्री कृष्ण केम सहली नथी कि रू मन सुख इे अने ए बधू करीने त सुख पाम ो छ ले त आग्रह करो छ कोई ने पजवा माटे त आग्रह करता नथी सुख माटे आग्रह करो परिस्थितियों ने अनुकूल बनावा आग्रह उंडा मा सुखनी इच्छा रूपांतर छ तो हवे श करू के नो आग्रह न राखो छता सुखनी तो इच्छा अने सुख नहीं मले त्या सुधी इच्छा तो पछी श था के मन
माया थ जाऊ सुख लेव हो तो अंदर मा लो अने उपयोग करवो हो तो बहर आई जाओ तमारा हाथ मा बने हाथ मा लाडू बाहर ना व्यवहार थी कोई सुखी थवा इच्छे तोम समझी लो कि तन खला ना धगड़ा ने सड़ गावी होली बनावी मा कदी अने ठंडक लेवा अथवा तो अग्नि लागी हो पेट्रोल पंपन फुवा रो कर ओलावा चच ओ ओ ओ ओ ओ o