दोस्तों क्या आपने कभी सोचा है कि जब हमारी जिंदगी की सारी उम्मीदें खत्म हो जाती हैं जब चारों तरफ सिर्फ मौत दिखाई देती है तब हमारे अंदर वो कौन सी ताकत होती है जो हमें जिंदा रखती है आज मैं आपको एक ऐसी ही कहानी सुनाने जा रहा हूं यह कहानी किसी फिल्म की नहीं बल्कि एक हकीकत है। यह कहानी है आयशा की एक ऐसी लड़की जो अपने सपनों को पूरा करने निकली थी। लेकिन कुदरत ने उसके लिए एक ऐसा इम्तिहान तैयार कर रखा था जिसकी उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी। यह कहानी है थार
रेगिस्तान की जलती रेत पर 91 दिनों तक चले संघर्ष की दर्द की, हिम्मत की और आखिर में जीत की। तो कुर्सी की पेटी बांध लीजिए क्योंकि यह कहानी सुनने के बाद आप जिंदगी को एक नए नजरिए से देखने पर मजबूर हो जाएंगे। तारीख थी 15 मई 2018। 28 साल की आयशा दिल्ली के एक जानी मानी ट्रैवल ब्लॉगर और फोटोग्राफर अपनी जीप से राजस्थान के थार रेगिस्तान के लिए निकली थी। उसका सपना था कि वो रेगिस्तान के उन अनछुए हिस्सों की तस्वीरें ले जिन्हें दुनिया ने कभी नहीं देखा। वो बहुत खुश थी। उसकी आंखों में सपने
थे और दिल में जोश। जैसलमेर से लगभग 150 कि.मी. दूर एक सुनसान रास्ते पर आगे बढ़ते हुए अचानक उसकी जीप एक झटके के साथ बंद हो गई। उसने कई बार कोशिश की लेकिन गाड़ी स्टार्ट नहीं हुई। चारों तरफ मीलों तक सिर्फ रेत के टीले थे। मोबाइल में नेटवर्क नहीं था। शुरू में तो आयशा को लगा कि शायद कोई गाड़ी आ जाएगी लेकिन घंटों बीत गए और दूर-दूर तक कोई इंसान नहीं दिखा। सूरज अब आग उगलने लगा था और उसके पास पानी की सिर्फ दो बोतलें बची थी। उसने फैसला किया कि वह गाड़ी में इंतजार करने
के बजाय पैदल चलकर मदद ढूंढेगी। यह उसकी पहली और सबसे बड़ी गलती थी। उसे अंदाजा नहीं था कि वह रेगिस्तान के दिल में उतर रही थी जहां से वापस लौटना लगभग नामुमकिन था। पहले दिन की पैदल यात्रा ने ही आयशा की हालत खराब कर दी। रेगिस्तान की गर्मी वैसी नहीं होती जैसी हम शहरों में महसूस करते हैं। वहां ऐसा लगता है जैसे आसमान से आग बरस रही हो और जमीन किसी जलते हुए तवे की तरह हो। उसका गला सूख कर कांटा हो गया था। पानी की एक बोतल खत्म हो चुकी थी और दूसरी भी आधी
रह गई थी। रात हुई तो ठंड ने उसे कंपाना शुरू कर दिया। दिन में आग और रात में बर्फ। यह है रेगिस्तान की हकीकत। दूसरे दिन की सुबह तक उसके होंठ फट चुके थे और आंखों के सामने अंधेरा छाने लगा था। उसे पहली बार एहसास हुआ कि वो कितनी बड़ी मुसीबत में फंस चुकी है। मौत का डर पहली बार उसके दिल में बैठा। वो रेत पर गिर पड़ी। उसे लगा कि बस अब सब खत्म। उसके दिमाग में अपने परिवार का चेहरा घूमने लगा। वह रोना चाहती थी, लेकिन उसके शरीर में आंसू बनाने के लिए भी
पानी नहीं बचा था। यह मौत से उसकी पहली मुलाकात थी जो उसे घूर-घूर कर देख रही थी। जब इंसान को लगता है कि सब खत्म हो गया। तभी कुदरत उसे एक छोटा सा इशारा देती है। आयशा लगभग बेहोश थी, तभी उसे दूर कुछ चट्टानें दिखाई दी। उसने अपनी बची खुची हिम्मत जुटाई और घिसटते-घिसटते उस चट्टान की छांव तक पहुंची। वो छांव उस वक्त उसके लिए किसी जन्नत से कम नहीं थी। अगले दिन सुबह जब उसकी आंख खुली तो उसने देखा कि रात की नमी की वजह से कुछ जंगली झाड़ियों के पत्तों पर ओस की बूंदे
जमा थी। उसने अपनी चुनरी को उन पत्तों पर फेरा और उसे निचोड़कर कुछ बूंदे अपने सूखे होठों पर लगाई। वो पानी की कुछ बूंदे नहीं थी। वो जिंदगी की बूंदे थी। उसी पल आयशा को समझ आया कि अगर जिंदा रहना है तो रोने से काम नहीं चलेगा। उसे लड़ना होगा। उसे रेगिस्तान के नियम सीखने होंगे। उसने अपने बैग से एक छोटी सी डायरी निकाली और उस पर लिखा दिन तीन मैं अभी जिंदा हूं। यह सिर्फ एक लाइन नहीं थी। यह खुद से किया गया एक वादा था। अब आयशा एक टूरिस्ट नहीं एक सर्वाइवर बन चुकी
थी। उसने स्कूल में सीखी बातें और इंटरनेट पर देखे सर्वाइवल वीडियो याद करने की कोशिश की। उसे याद आया कि कैमरे के लेंस से सूरज की रोशनी को फोकस करके आग जलाई जा सकती है। कई घंटों की मशक्कत के बाद सूखी घास में से धुएं की एक पतली लकीर उठी और फिर एक छोटी सी आग जल गई। उस आग ने उसे सिर्फ गर्मी नहीं दी बल्कि एक उम्मीद दी। उसने सीखा कि सुबह और शाम को चलना चाहिए और दिन की तेज धूप में किसी छांव में रहना चाहिए। खाने के लिए कुछ नहीं था तो उसने
वो किया जो शायद हम सोच भी नहीं सकते। उसने कीड़े, टिड्डे और जो कुछ भी उसे लगा कि खाया जा सकता है, उसे भुनकर खाना शुरू किया। हर कौर एक जहर के घूंट जैसा लगता था लेकिन पेट की आग बुझाने के लिए यह जरूरी था। उसका खूबसूरत चेहरा धूप में झुलस गया था। शरीर पर जगह-जगह घाव बन गए थे और वजन तेजी से घट रहा था। वो अब वो आयशा नहीं थी जो दिल्ली से आई थी। रेगिस्तान में भूख और प्यास से भी बड़ा दुश्मन होता है अकेलापन। दिन बीतते जा रहे थे, हफ्ते बीतते जा
रहे थे। आयशा ने किसी इंसान की आवाज नहीं सुनी थी। चारों तरफ सिर्फ एक भयानक खामोशी थी जो कानों में शोर करती थी। वो अक्सर खुद से बातें करने लगी थी। कभी अपनी मां से तो कभी अपने पापा से। वो हवा में ही उनसे लड़ती, उनसे शिकायत करती और फिर रो पड़ती। कई बार उसे वहम होता कि कोई उसे आवाज दे रहा है। लेकिन वहां कोई नहीं होता था। यह अकेलापन इंसान को अंदर से खोखला कर देता है। एक दिन उसने अपनी डायरी में लिखा आज 30वां दिन है। मुझे नहीं पता कि मैं पागल हो
रही हूं या जिंदा रहने की कोशिश कर रही हूं। यहां की खामोशी कभी-कभी गोलियों से भी ज्यादा शोर करती है। क्या कोई मुझे ढूंढ रहा होगा या सबने मान लिया होगा कि मैं मर चुकी हूं। यह सवाल उसे हर पल खाए जा रहा था। उसका शरीर तो लड़ ही रहा था पर अब उसका दिमाग भी हार मानने लगा था। लगभग 45वें दिन जब आयशा अपनी बची खुची ताकत से एक टीले पर चढ़ी तो उसे दूर कुछ चमकता हुआ दिखाई दिया। उसे लगा कि वो किसी गाड़ी का शीशा है या किसी गांव की छत। एक नई
उम्मीद उसके अंदर दौड़ गई। वो पागलों की तरह उस दिशा में भागने लगी। वो गिरती, फिर उठती फिर भागती। घंटों चलने के बाद जब वह उस जगह के करीब पहुंची तो उसका दिल टूट कर बिखर गया। वो कोई गाड़ी या गांव नहीं था। वो एक मृग तृष्णा थी जिसे हम मिराज कहते हैं। रेगिस्तान का एक ऐसा धोखा जो प्यासे को और तड़पाता है। उस पल आयशा पूरी तरह से टूट गई। उसकी सारी हिम्मत जवाब दे गई। वो वहीं रेत पर गिर कर फूट-फूट कर रोने लगी। उसने पहली बार भगवान से कहा, बस अब और नहीं
मुझे उठा ले। मैं थक गई हूं। यह दिन उसके 91 दिनों के संघर्ष का सबसे बुरा दिन था। उम्मीद का टूटना मौत से भी ज्यादा दर्दनाक होता है। उस टूटी हुई हालत में आयशा कई घंटों तक बेहोश पड़ी रही। बेहोशी में उसे अपनी मां का चेहरा दिखाई दिया। उसे अपनी मां की कही एक बात याद आई। बेटा हारना तब होता है जब हम कोशिश करना छोड़ देते हैं। यह आवाज उसके कानों में गूंजने लगी। जब उसकी आंख खुली तो सूरज ढल रहा था। उसके अंदर से एक आवाज आई। मैं मर नहीं सकती। मैं हार नहीं
सकती। मैंने अपनी मां से वादा किया था कि मैं एक दिन बहुत बड़ा काम करूंगी। मैं ऐसे गुमनामी में नहीं मर सकती। उस एक पल ने सब कुछ बदल दिया। उसके अंदर की टूटी हुई लड़की मर चुकी थी और एक योद्धा ने जन्म लिया था। उसने फैसला किया कि अब वह मदद का इंतजार नहीं करेगी। वह खुद अपनी मदद करेगी। वह एक दिशा में चलती रहेगी जब तक कि या तो उसे मंजिल नहीं मिल जाती या मौत। उसने अपनी डायरी में लिखा दिन 50 आज मैं फिर से जन्मी हूं। अब यह लड़ाई सिर्फ जिंदा रहने
की नहीं बल्कि जीतने की है। लगभग 70वें दिन मौसम ने भयानक रूप ले लिया। एक भयानक रेतीला तूफान आया। आसमान पीला हो गया और हवा इतनी तेज थी कि आयशा को एक चट्टान से चिपकना पड़ा ताकि वह उड़ ना जाए। घंटों तक वो तूफान चलता रहा। उसे लगा कि आज उसका आखिरी दिन है। रेत उसके मुंह, नाक, कान हर जगह भर गई थी। लेकिन जब तूफान थमा तो एक चमत्कार हुआ। तूफान ने रेत की ऊपरी परत को उड़ा दिया था और एक जगह चट्टानों के बीच एक छोटा सा गड्ढा बन गया था जिसमें थोड़ा सा
पानी जमा था। वो पानी गंदा था, लेकिन आयशा के लिए वो अमृत था। उसने जी भरकर पानी पिया। यह कुदरत का एक अजीब खेल था। जिस रेगिस्तान ने उसे मौत के मुंह में धकेला था, उसी ने एक तूफान के जरिए उसे जीने का एक और मौका दिया था। उस पानी ने उसे अगले कुछ हफ्तों तक जिंदा रखा। वो समझ गई थी कि कुदरत जितनी क्रूर हो सकती है, उतनी ही दयालु भी। 90 दिन बीत चुके थे। आयशा अब एक चलता फिरता कंकाल बन चुकी थी। उसके कपड़े फटकर चिथड़े हो गए थे और शरीर पर मांस
लगभग खत्म हो चुका था। वो बस अपनी इच्छाशक्ति के दम पर जिंदा थी। एक सुबह जब वह आगे बढ़ रही थी तो उसकी नजर जमीन पर पड़ी। उसने जो देखा उसे अपनी आंखों पर यकीन नहीं हुआ। रेत पर ऊंट के पैरों के ताजा निशान थे। यह कोई वहम नहीं था। यह हकीकत थी। इसका मतलब था कि कोई इंसान हाल ही में यहां से गुजरा है। 90 दिनों में पहली बार उसने इंसानी सभ्यता का कोई निशान देखा था। उसकी आंखों से आंसू बहने लगे। लेकिन इस बार यह आंसू दुख या दर्द के नहीं थे। वो आंसू
खुशी के थे। उम्मीद के थे। उसने अपनी बची खुची सारी ताकत उन निशानों के पीछे चलने में लगा दी। उसे नहीं पता था कि यह रास्ता कहां जाएगा लेकिन यह उसकी आखिरी उम्मीद थी। वो बस चलती रही, चलती रही जब तक कि वह बेहोश होकर गिर नहीं पड़ी। 91 दिन की सुबह ऊंटों का एक काफिला लेकर जा रहे कुछ बंजारों ने रेत पर एक अजीब सी चीज पड़ी देखी। पास जाकर देखा तो उनके होश उड़ गए। वो एक औरत का शरीर था जो बस सांस ले रहा था। उन्होंने तुरंत उसे उठाया, पानी पिलाया और पास
के एक कस्बे के अस्पताल पहुंचाया। जब आयशा की आंख खुली तो वह एक बिस्तर पर थी। उसके चारों तरफ सफेद दीवारें थी और एक पंखा चल रहा था। उसे यकीन ही नहीं हुआ। उसने नर्स से पूछा, "आज क्या तारीख है?" नर्स ने जवाब दिया, 14 अगस्त 2018। यह सुनकर वह रो पड़ी। 91 दिन। 91 दिन वो मौत से लड़ी थी और आज वह जीत गई थी। जब वह ठीक होकर अपने घर लौटी तो वह एक अलग ही इंसान थी। उसने एक इंटरव्यू में कहा था उन 91 दिनों ने मुझे सिखाया कि हम जिन चीजों को
रोज बर्बाद करते हैं उनकी असली कीमत क्या है? एक गिलास साफ पानी एक रोटी का टुकड़ा अपने परिवार की आवाज यह दुनिया की सबसे कीमती चीजें हैं। मैं रेगिस्तान में कुछ तस्वीरें लेने गई थी। लेकिन रेगिस्तान ने मुझे जिंदगी की सबसे बड़ी तस्वीर दिखा दी।