[संगीत] होरे [संगीत] [हंसी] [संगीत] हरि [संगीत] [संगीत] सखी बिलारी अमृत की खान गुरु अमृत की धीरे-धीरे सतगुरु मिले श्री दीजिए सतगुरु मिले सस्ता जान तुम भी सजा यह शरीर कम क्रोध और लोग के sansaron sanskaron से संचालित है तो विश्व की बेलारी है कितने भी सुंदर पदार्थ खाओ अंत में रस बंटाए कम क्रोध लोभ में खर्च होता है चिंता बनाता है ढेर करता या कंगाल सहता है अंत में कष्ट सके मार्ता है 50 वर्ष 60 वर्ष शरीर मेरा अंत में छोड़ते समय जीवन भर जो छुपा कर रखा था वे तिजोरी अथवा कागजात saunp देने पड़ते
हैं कश्ती कष्ट janmt समय कष्ट बीमारी का कष्ट बुढ़ापे का कष्ट महंगाई का कष्ट अपमान का कष्ट एन पास होने का कष्ट एन जाने कितने कितने kashton से यह शरीर है इससे भी ज्यादा कष्ट और shariron में है मनुष्य शरीर में तो थोड़ी दावा दुआ और सुंदर व्यवस्था है भोजन पका के खाने की माटी गति और साधन है यातायात के साधन है नहीं तो पशुओं को विचारों को क्या और जीवन को क्या [संगीत] जन्म कष्ट के आरंभ से होता जहां davaiyan होती है उसे दुख डेल बोलते फिर भी निराशा से ऊपर उठो एक उपाय है
गुरु अमृत की खान गुरु का ज्ञान और गुरु का मार्गदर्शन मिल जाए तो अमृत की खान का संपर्क करने वाला भक्त कितना पवन हो जाता है की उसकी निगाह से उसके चरण राज से भूमि में तीर्थ तो ए जाता है भगवान कहते हैं narojyoti मैं yogon sankyam धर्म evach योग मुझे वश नहीं कर सकता धर्म का अनुष्ठान भी मुझे वश नहीं कर सकता एन स्वाध्याय एन तपस त्यागो सब कुछ त्याग दे अथवा सारे शास्त्र पर डालें तब भी मैं vashish नहीं होता nishthapurti एन दक्षिण दक्षिण danishtha पूर्ति करने से भी मैं वैसा वर्ष नहीं होता
हूं जितना मैं सत्संग से वश होता हूं जगत के asaktiyan नष्ट होते ही कम क्रोध और लोभी जो नरक के द्वार हैं उससे जीव का चित्त बच जाता है फिर तो जीव का जो स्वरूप है वो मेरा आत्मा ही है फिर वो मुझसे दूर नहीं मेरे आनंद से दूर नहीं मेरे माधुरी से दूर नहीं मेरी अमृता से दूर नहीं मलेशिया की बेल होने के गुरु अमृत की खान का आश्रय लेते ही ये जीव भगवती सुख में भगवती ज्ञान में भगवती आनंद में भगवती माधुर्य में इतना तो पवन हो जाता है की देवताओं को भी भारत
भूमि में संतों के इर्द-गिर्द जन्म लेने की इच्छा होती है दुख के भोग का मत बानो मैं सुखी हूं संसारी चीजे पाकर अपने को सुख का गुलाम मत बनाओ मैं दुखी हूं मैं सुखी हूं मैन का मैन त्यागो मैं कौन हूं उसको खोजो सुखी दुखी होने की कल्पना मैन करता है कभी वही मैन बोलता मैं सुखी हूं कभी बोलता है तू क्यों एक भक्त था उसने मेरे से पूछा की बापूजी मेरा बेटा मार गया और मेरे को सुनाई पड़ा तो मेरे को कोई दुख नहीं हुआ और मैंने उसे बेटे का जो क्रिया कर्म था करना
था 7 साल का बच्चा मार गया एक लोटा बेटा और मेरे को कोई दुख नहीं होगा बाद में 2 महीने के बाद उसकी याद आती और बहुत दुखी होता हूं अभी तो 2 साल से बहुत दुखी हूं रो पड़ा तो ऐसा क्यों हुआ जब वह मारा तो दुख नहीं उसके शमशान यात्रा विधिवत कर दी दुख नहीं तक कोई दुख नहीं चालू होता रहता है अभी दुख होता है इसका कारण है की उसे समय तुम्हारा खान-पान सात्विक था पढ़ना सात्विक था ध्यान भजन करते द तो सतोगुण था प्रकाश में तुम को सब ठीक दिखता था की
भाई जो जन्म है वह मार्ता है अपनी अपनी प्रारब्ध लेकर आता है छोटी टिकट वाला जल्दी उतर जाता है लंबी टिकट वाला देर से उतरता लेकिन गाड़ी से उतरना पड़ता है ऐसे ही संसार में कोई थोड़ी लेकर आता है तो बेटा चल बड़ा इस प्रकार की suzbuz थी सतोगुण प्रधानता जब खानपान थोड़ा हल्का हुआ और कम में क्रोध में और लोभ में तुम्हारी ऊर्जा और माटी थोड़ी नीचे हुई तो अब तुमको ममता आई मोह माया शोक नहीं रहा है अब तुम दवाई खाओ या दारू पी हो तो शोक नहीं दिखेगा लेकिन तुम तमस में चले
जाओ तो तमस में जाना भी हिट कर नहीं है शोक मऊ में पड़ा रहना हितकर नहीं है आप तो प्रकाश में जीव आप तो ज्ञान में जियो सुख स्वप्ना दुख बुलबुला दोनों है मेहमान ये सुखाकर paristhitiyan भी आती है गुजर जाती है dukhakar paristhitiyan आती है गुजर जाती है जैसे चौराहे पर अपना मकान है तो कभी बारात गुजरता है दुआ कामवाली गाड़ियां बिना दूल्हा की गाड़ियां गुजराती कभी बड़े लोग गुजरते तो कभी सज्जन लोग गुजरते चौराया है गुजरता ऐसे ये संसार में सारी paristhitiyan आकर चली जाती है अब चौराहे पर मकान है आप जहां अच्छा
आया तो उसको चिपक के बुरा आया तो छाती पीटने लगे तो फिर पागल बन जाओगे ऐसे संसार है अपने मैन का मैन त्यागो जिस किसी से चिपकने की आदत छोड़ो दरिया समुद्र के किनारे जाते हैं कभी ऊंची तरंग उठाती है तो कभी नीचे कभी कहीं से मैली तरंग उत्ते तो कभी साफ सुथरी आप दरिया के किनारे समुद्र के किनारे tarangon की उछाल कूद का आनंद लीजिए लेकिन आप tarangon में अपने को डालोगे तो katrangon के थप्पड़ आपको गिरा देंगे ऐसे संसार की परिस्थितियों को सच मानकर आप अपने को usmein थोक दोगे तो फिर चाहे कितना
तो मंदिरों में मस्जिदों में जाओ लेकिन संसार के आकर्षण अगर मैन में बने रहे और सतगुरु का ज्ञान नहीं मिला तो मस्जिदों में और कभी मंदिरों में भी कुछ का कुछ हो जाता है चंद तो होता गगन में है चांदनी सबके लिए बांसुरी चाहे paraai हो रागिनी सब के लिए बंद सकते हो तुम फूल लेकिन सुगंधी सबके लिए दीप चाहे तो किसी का भी हो रोशनी सब के लिए बेटा चाहे किसी का भी होली के ज्ञान की रोशनी मिले तो बापू सब के लिए गुरु सबके लिए चाय वासुदेव देव की का बेटा हूं लेकिन कृष्ण
कन्हैया सबके लिए है चाहे कालू जी का पुत्र हो लेकिन गुरु नानक सबके लिए है मीरा चाहे किसी की भी पुत्री हो लेकिन भाई मेरा सबके लिए है शबरी चाहे किसी की कन्या को लेकिन शबरी भीलन माता तो सबके लिए ऐसे आपने जब कम क्रोध और लोभ को छोड़ने की तरकीब सिख ली तो कम की जगह पर राम ए जाएगा क्रोध की जगह पर क्षमा ए जाएगी लोग की जगह पर आत्मा मस्ती के फुहारे footane लगेंगे वो आदमी तो वही का वाली के अंदर से badlahat हो गए यह तन विश्व की बेलहरी यह शरीर विश
की बेल है गुरु अमृत की खान श्रीदेवी सतगुरु मिले तो भी सस्ता जान सतगुरु क्या करते हैं सतगुरु मेरा सुरमा करें शब्द की चोट वैसे वचन सुनते की हमारा भ्रांति और अज्ञान मिटाने लगता है सतगुरु मेरा सुरमा करें शब्द की चोट मारे गुलाब प्रेम का प्रेम नहीं है कल्याणकारी जैसे मैन पुत्र पर प्रेम बरसाती है भगवान जीव पर प्रेम बरसते ऐसे सद्गुरु अपने भक्तों पर करुणा कृपा प्रेम बरसते हुए बोलते हैं बोले हुए शब्द चाहे वह भूल जाए लेकिन सतगुरु का प्रेम मैं sukhdae इनका मंगलो यह संकल्प भी लोगों का मंगल करता रहेगा सतगुरु मिले
तो भी सस्ता जान तो सतगुरु का उपदेश है साधु मैन का मैन त्यागो कम क्रोध संगति दुर्जन किता से भागो कम से क्रोध से लोभ से यह दुर्जन व्यक्तियों से अपने को बचाओ सुख दुख दोनों सैम करें हम तो आम सवार सुधार कर पत्नी आप उसे आम और केसर आम दो आम बड़े नहीं द क्या का रहे हैं बहुत सुगंध इसमें तो अंग्रेजी खास नहीं अपना देसी खाद है है तो फिर आपको अच्छे नहीं लगे अच्छे तो बहुत लगे तो फिर खाए क्यों नहीं खाए क्यों नहीं बोले जो सुख की चीज है वह अधिक खाने
से आदमी सुख का lanpatu बन जाता है सुख का भोक्ता होकर खोखला हो जाता है महादेव गोविंद रानाडे ने अपनी पत्नी को कहा सुख बांटने की चीज है और दुख पैरों तले kuchalne की चीज है हम लोग क्या करते सुख थोक थोक के अंदर भरते हैं और दुख का दोष दूसरे को देते हैं इसलिए दुख बढ़ जाता है और सुख हमें खोखला कर देता है तो वह जाएगा तो सुख दे जाएगा तो एक बार सूखने सुख दिया और एक बार दुखने सुख दिया एक बार सूखने दुख दिया गम की अंधेरी रात में दिल को ना
बेकरार कर सुबह जरूर आएगी सुबह का इंतजार कर धीरज रख तब मत दुखी मतों में मार गया परेशान हो गया बहुत दुखी हूं मैं तो परेशान हूं मैं परेशान हूं ऐसा जब तक सोचता रहेगा तब तक तो एक बापू जी क्या 10 बापू जी ए जाएं और 10 कृष्ण जी ए जाए तब भी दुख से पिंड नहीं छूटेगा सतगुरु मेरा सुरमा करें शब्द की चोट ये सत्संग के शब्दों की चोट से ही सुख-दुख का प्रभाव से प्राणी बचत है मैन अपमान के aakarshanon से प्राणी बचत है और अपने चित्त में क्षमता का संगीत गूंजता है
और वो जीव ढेर साबिर अपने ऐश्वर्या को पता है अपनी शांति को अपने माधुरी को अपने आत्मा के आनंद को पता है सुख दुख दोनों हारती ता हर्ष का प्रसंग आया लेकिन समझो कब तक हर्षित मैन और माटी के धर्म है और वातावरण में शुद्ध आती है इसलिए ज्योत जलाए जाते हैं ज्योत से ज्योत जगाओ आपके हृदय की जो ज्ञान की ज्योत जागे गुरुदेव उसी ज्योत से हमारी जोत भी जगह मेरा अंतर तिमिरा मिटाओ हृदय में जो ना समझी पड़ी है जो bevkufi पड़ी है कभी क्रोधी हो गए कभी कम ही हो गए कभी लोग
भी हो गए होता तो मैन है लेकिन अपने को मूर्छित करके उसी में bhatkate रहते हैं तो मेरा antrmometer में युग युग से सोई हृदय में कई युगों से वो मारी चेतना हमारी आत्मा सोई हुई antrm में युग युग से सोए चिट्ठी शक्ति को जगाओ आपके नाभि केंद्र के पास मूलाधार केंद्र नाभि के नीचे वह साधे तीन चक्कर मार कर कुंडली शक्ति सोई रहती है उसकी ऊर्जा थोड़ी सी लेकर जीव जीता है अगर वो जाग जाए तो उसकी kshamtaen बढ़ जाती है तो गुरु जी मंत्र दीक्षा दी कृपा दृष्टि करें हमारी स्वयं हर्ष सौगाते रहे
अतीत तीन जग तत्व पहचानो हर्ष और शोक से अतीत रहे मैं देखने वाला ज्योति स्वरूप आत्मा हूं मैन तो ज्योति स्वरूप अपना मूल विचार अपने आत्मा मुल्क को pichhad मनवा कब तक thapedon में बहता जाएगा हर्ष सौगाते रहे अतीत तीन jagtatvihan स्तुति को सच्चा मानो निंदा को सच्चा मानो ना किसी की स्तुति में बा जाओ एन किसी की निंदा में अंदर में गंदे हो जाओ स्तुति यह दो चक्की mithaaiyon की बात फैलाने का नाक बढ़िया तोते जैसा पलानी का नाक चिपटा है चीनी छाप है धनी गोरी है पलानी काली है यह फालतू बातें करके किसी
के चमड़े को अपने हृदय में क्यों भरो लेकिन उसके गहराई में जो अपना आत्मा देव है उसी आत्मा देव को अपने हृदय में निहार कर उसका नाम सुमिरन करते हुए अमृतपान करो unhen इधर उधर की फालतू बातें ज्यादा करके समय शक्ति जारी करते नहीं तो हमारे पास समय इतना है की एक बार नहीं चार-चार बार परमात्मा का साक्षात्कार कर ले इतना सारा समय लेकिन फालतू चीजों में stutiyon में इधर-उधर की है यह फूल बढ़िया है यह फलाना बढ़िया है यह फलाना बढ़िया है यह फलाना घटिया है यह ऐसा है वैसा है ये बाहर मत को
अंदर आओ स्तुति निरवाना जननायक से आम छुटकारा नहीं होगा संसार का आनंद टिकना असंभव है brahmgyan का आनंद जाना असंभव लेकिन उसको पाने के लिए थोड़ा सावधान रहना पड़ता है गुरु के ज्ञान को संभल कर रखना पड़ता आपको पता होगा की बारिश होती तो जहां तहां आप सुनाओ junglon में इधर उधर खेत खाली में फालतू घास हो जाता है लेकिन गुलाब के फूल आपके फूल तो वही उठाते जा कलम लगाए जाते और घोड़ी की जाती गुड़ाई बुराई खाट पानी वहां गुलाब के फूल खिलते ऐसे फालतू बातें तो संसार की जहां तुम मिलेगी channelon में भी
पिक्चर की बात इधर उधर की कम क्रोध को लोग को भड़काने वाली बात फैशन बढ़ाने वाली बात खर्चा बढ़ाने वाली बात ना करें कभी-कभी मिलती है कलम चाहे गुलाब की कभी मिले लेकिन लगा दी और उसकी संभल ली तो गुलाब की कलम में गुलाब का फूल खिलता ऐसे जीवात्मा के हृदय में परमात्मा अनुभव का फूल खिलेगा नेहाल हो जाएगा खुशहाल हो जाए इसलिए साधक को भक्त को संभल संभल कर कदम रखना चाहिए जैसे वो सत्संग रूपी कलम मिली है तो उसकी नींद आई गुड़ाई खत पानी आदि का अर्थात सत्संग का जप का नियम का आश्रय
लेकर उसको उभरता जाए बढ़ता जाए भगवान बोलते धान से दक्षिण से amukamukh कठोर साधना से भी इतना वश नहीं सत्संग सेवा सोता सत्संग जो सत्य स्वरूप ईश्वर की सच्चाई बता और बीतने वाले मिटाने वाले संसार को मिथ्या बताएं वह सत्संग उसे सत्संग में विश्रांति पाओ जब करते-करते आनंद आने लगे तो माला भूमि चाय नहीं मिली दो दाने भले रुक गए आनंद में दो किताब पढ़ते पढ़ते कोई अच्छी suhavni बात लगी तो कभी इस प्रकार करो तो कभी दांतों के मूल में जीव को लगाकर ध्यान करो कभी तालु और आलू में भी नहीं नीचे भी नहीं
बीच में जब को टिकाऊ मैन एकाग्र होगा अंदर का रस आने लगे गा भगवान की प्रीति जैन लगे कभी जप्त से कभी ध्यान से कभी सेवा से अपने हृदय को भागवत रस से भरते जाओ भागवत शांति से बढ़ते जाओ भागवत ज्ञान से बातें जाओ और यह कम आपको खुद करना है गुरु की सहायता आप जितने विद्यार्थी जितना अच्छा पढ़ता लिखता है उतना ही मास्टर की सहायता मिलती है इससे भी कई गुना भगवान और गुरु के सहायता साधक का पीछा करती रहते सदा केवल मैन का मैन त्यागे हल्की संगति का त्याग करें ऐसे बरसात में हल्का
घास पुश तो जहां तहां हो जाता है ऐसी हल्की संगति के संस्कार तो जहां ता मिल जाते ऊंची संगति के संस्कार मिले तो फिर उनको संभल के रखना चाहिए [संगीत]