उष नगर राज्य के पुर्व श नरेश राजा शिवी अपनी उदारता और परोपकार के लिए विख्यात थे वे अपनी प्रजा की हर संभव सहायता करते थे और किसी को भी निराश नहीं लौटा थे उनकी संपत्ति और जीवन परोपकार के लिए समर्पित थे और उनकी भगवान से यही प्रार्थना थी कि वे दुखी प्राणियों के कष्ट हमेशा दूर कर सकें स्वर्ग में इंद्र को राजा शिवी के धर्म और कर्म से अपने सिंहासन के छीनने का भय हुआ इसलिए उन्हों ने राजा की परीक्षा लेने का निश्चय किया और अग्निदेव के साथ उष नगर की यात्रा पर निकले इंद्र ने
बाज का रूप धारण किया और अग्नि ने कबूतर का बाज ने कबूतर का पीछा किया और भयभीत कबूतर उड़ता हुआ राजा शिवी की गोद में गिर पड़ा और उनके वस्त्रों में छिप गया राजा ने उसे प्यार से सहला इतने में पीछा करता हुआ बाज वहां आ पहुंचा राजन मैं भूखा हूं और यह कबूतर मेरा भोजन है कृपया मुझे दे दीजिए ताकि मैं अपनी भूख मिटा सकूं यह कबूतर मेरी शरण में आया है और उसकी रक्षा करना मेरा कर्तव्य है मैंने इसे अभयदान दिया है और इसे तुम्हें सौंपना मेरे धर्म के विरुद्ध होगा महाराज यदि शरणागत
की रक्षा करना आपका धर्म है तो भूखे का भोजन छीनना अधर्म है यहां आपका धर्म है कि मुझ भूखे को आहार दें अन्यथा मेरी हत्या का पाप आपको लगेगा मर जाने के बाद मेरे बच्चे भी भूखे मरेंगे उनकी हत्या का पाप भी आपको लगेगा अतः आप इतना अधिक पाप ना करें और मेरा आहार सौंपकर अपने धर्म का पालन करें मैं शरणागत को तुम्हें कदापि नहीं दे सकता आहार के लिए इसके स्थान पर मैं अपना मांस तुम्हें देता हूं तुम भर पेट खा लो बाज ने सहमति जताते हुए कहा मैं मांसाहारी हूं कबूतर का मांस या
अन्य मांस मेरे लिए समान है आप चाहे तो कबूतर के बराबर अपना मांस मुझे दे सकते हैं राजा शिवी को यह सुनकर खुशी हुई आपकी यह कृपा मेरे लिए महान है इस नश्वर शरीर से अविनाशी धर्म की रक्षा हो रही है राजधानी में कोला हल मच गया कि राजा एक कबूतर की प्राण रक्षा के लिए अपने शरीर का मांस तराजू पर तोलने जा रहे हैं पूरा नगर यह दृश्य देखने के लिए उमड़ पड़ा तराजू मंगाया गया एक पलड़े में कबूतर को रखा गया और दूसरे पलड़े पर राजा ने अपने शरीर का मांस काट कर रखा
मांस कम पड़ने पर और मांस काटना पड़ा वह भी कम पड़ गया इस प्रकार राजा अपने शरीर का मांस काट कर रखते गए और तराजू का पलड़ा हमेशा कबूतर की तरफ झुका रहा वह जैसे राजा का मांस पाकर अधिकाधिक और भारी होता जा रहा था प्रजा आंसुओं के साथ यह दृश्य देख रही थी राजा के चेहरे पर तनिक भी शिकन नहीं थी अंत में राजा स्वयं तराजू पर बैठ गए उसी समय आकाश से पुष्प वृष्टि होने लगी और चारों ओर प्रकाश फैल गया दोनों पक्षी अदृश्य हो गए और उनके स्थान पर इंद्र और अग्नि प्रकट
हुए महाराज आपकी परीक्षा लेने के लिए मैंने बाज का और और अग्निदेव ने कबूतर का रूप धारण किया था आप सच्चे धर्मात्मा हैं और आप जैसे परोपकारी व्यक्ति ही जगत की रक्षा के लिए जन्म लेते हैं राजा शिवि तराजू से उतरे और उनका शरीर सामान्य हो गया दोनों देवता अंतर्ध्यान हो गए भद्रपुर नाम के नगर में रेशम नाम की एक महिला थी जो गलत काम करती थी लेकिन भगवान के प्रति उसकी श्रद्धा गहरी थी वह प्रतिदिन सुबह नहा धोकर पूजा करती और फिर अपने गलत काम में लग जाती इसी कारण वह नगर में बदनाम थी
उसी नगर में एक संत रहते थे वे प्रतिदिन सुबह नदी में स्नान करते मंदिर जाते और प्रवचन देते उनके प्रवचन सुनने दूर दूर से लोग आते थे वे हमेशा लोगों को अच्छे संस्कार सिखाते और भगवान के प्रति श्रद्धा बढ़ाने का काम करते थे यह संत कितनी अच्छी बातें बताते हैं इनके प्रवचन सुनकर बुरे से बुरे लोग भी सुधर जाते हैं बिल्कुल सही कहा पिछले सपता मैंने अपने बिगड़ैल बेटे को संत का प्रवचन सुनने जबरदस्ती ले आया था प्रवचन सुनने के बाद तो जैसे जादू हो गया उसके मन पर संत की बातों का गहरा असर पड़ा
और वह सुधर गया संत की बातों का ही प्रभाव था कि लोग दूर दूर से उनका प्रवचन सुनने आते थे वे अपनी खुशी से संत को कुछ ना कुछ दक्षिणा में देते एक दिन जब संत मंदिर में थे रेशम भी वहां आई और प्रणाम करने के बाद संत के पैर छूने लगी तभी मंदिर के पुजारी ने कहा तुम संत के पैर नहीं छू सकती तुम्हारे छूने से वे अपवित्र हो जाएंगे ऐसा क्यों कह रहे हैं आप बाबा आपको नहीं पता यह औरत गलत काम करती है यह तो पापन है तुम्हें देखकर लगता है कि तुम
भगवान में विश्वास रखती हो कल मेरी कुटिया में सत्संग सुनने आना जरूर आऊंगी बाबा जब संत का सत्संग शुरू हुआ रेशम भी आई और पूरा सत्संग सुना सबके जाने के बाद रेशम ने संत को प्रणाम किया बेटी तुम जो गलत काम करती हो उसे छोड़ दो नहीं तो तुम्हें नर्क भोगना पड़ेगा लेकिन बाबा फिर मैं क्या करूंगी और खाऊंगी कहां से भगवान पर भरोसा रखो बेटी वे कोई ना कोई राह जरूर दिखाएंगे संत की बात मानकर रेशम ने अगले ही दिन से गलत काम छोड़ दिया और अपने जमा पैसे से ठेला खरीदकर फल बेचने लगी
नगर के लोग उससे फल नहीं खरीदते थे इसलिए वह बाहर जाकर सस्ते दामों पर फल बेचती थी उसकी अच्छी खासी बिक्री हो जाती और जो फल बचते वे गरीबों को दे देती वह प्रतिदिन मंदिर जाकर भगवान के सामने माथा टेक और रोज प्रवचन सुनती इससे उसकी बुद्धि निर्मल और पवित्र हो गई उसने अपनी आमदनी का कुछ हिस्सा गरीबों की मदद में लगाना शुरू कर दिया धीरे-धीरे नगर के लोग भी उसका सम्मान करने लगे जो लोग पहले उसे देखना भी पाप समझते थे अब उसकी तारीफ करने लगे थे देखो यह वही महिला है जो कभी गलत
काम करती थी लेकिन अब गरीबों की मदद करती है भगवान हर किसी को उसके जैसा दिलदार बनाए अब हर कोई रेशम की प्रशंसा करने लगा था समय बीतता गया और रेशम बूढ़ी हो गई एक दिन उसकी मृत्यु हो गई संयोग से उसी दिन संत की भी मृत्यु हो गई दोनों की आत्मा यमलोक पहुंची यमराज ने संत और रेशम के कर्मों का हिसाब निकाला और आदेश दिया इस महिला को दो दिन के लिए नर्क में और फिर सदा के लिए स्वर्ग में भेज दो और इस संत को हमेशा के लिए में भेज दो हे धर्मराज मैंने
अपना पूरा जीवन लोगों को सही मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित किया फिर भी मुझे नर्क क्यों हे धर्मराज आपके दरबार में यह कैसा अन्याय हो रहा है मैंने तो अपना पूरा जीवन ही लोगों को सही राह पर लाने में लगा दिया मैंने हमेशा लोगों को भक्ति का मार्ग दिखाया लेकिन फिर भी मुझे नर्क भेजा जा रहा है ऐसा क्यों महाराज जबकि इस औरत ने तो अपने जीवन में कई पाप कर्म किए हैं फिर भी आप इसे स्वर्ग में भेज रहे हैं तुमने अपने पूरे जीवन में लोगों को सही राह दिखाई पर खुद उस पर
नहीं चले ना तुमने कभी किसी की मदद की ना दान किया ना सच्चे दिल से ईश्वर की भक्ति की तुम धर्म की आड़ में केवल धन दौलत और शोहरत कमाते रहे जबकि इस महिला ने अपनी गलती सुधारकर गरीबों की मदद की दान पुण्य किया और सच्चे मन से ईश्वर की भक्ति की उसके पुण्य उसके पाप पर भारी पड़े इसलिए उसे स्वर्ग मिला दोस्तों अगर आप अभी तक तक हमारे साथ इस कहानी में बने हुए हैं तो कृपया हमें बताएं कि आपको यमराज का न्याय सही लगा कि गलत यमराज की बात सुनकर संत खामोश हो गए
उनकी आंखों से आंसू बहने लगे उन्होंने खुद को महान समझा था लेकिन एक महिला के सामने खुद को तुच्छ महसूस कर रहे थे वहीं रेशम अपने पुण्य कर्मों के कारण स्वर्ग को प्राप्त हुई इस कहानी से हमें यही सीख मिलती है कि सिर्फ बातें बनाने से कुछ नहीं होता बल्कि बातों को खुद पर अमल भी करना पड़ता है सारंगपुर नामक एक गांव में उद्धव नाम के एक ब्राह्मण रहते थे वे पीपल के पेड़ की बहुत पूजा करते थे उनके परिवार में उनकी पत्नी और दो पुत्र थे लेकिन समय के साथ उनके सभी प्रियजन बीमारियों के
कारण चल बसे इस त्रासदी से उद्धव को मौत का भय सताने लगा वह हर पल चिंतित रहते और अपनी पूजा में अधिक समय बिताने लगे एक दिन जब वह पीपल की पूजा कर रहे थे तो अचानक पीपल देवता उनके सामने प्रकट हुए और बोले वत्स उद्धव मैं तुम्हारी भक्ति से अत्यंत प्रसन्न हूं बताओ क्या वरदान चाहते हो हे पीपल देवता मुझे मृत्यु का बहुत भय है कृपया मुझे अमृता का वरदान दीजिए उद्धव मैं तुम्हें अमृता का वरदान नहीं दे सकता इसके बदले में कुछ और मांग लो उद्धव थोड़ी देर सोच में पड़े और फिर बोले
ठीक है भगवान अगर आप मुझे अमर नहीं बना सकते तो मुझे यह वरदान दीजिए कि मेरे अलावा जो भी मेरे बिस्तर पर बैठे वह मेरी अनुमति के बिना उठ ना सके तथास्तु पीपल देवता अंतर्ध्यान हो गए उद्धव अब निडर होकर अपनी जिंदगी जीने लगे कई साल बीत गए एक दिन जब उद्धव अपने कमरे की सफाई कर रहे थे यमराज उनके प्राण लेने आ पहुंचे यमराज को देखकर उद्धव ने पूछा महाराज आप कौन हैं उद्धव मैं यमराज हूं तुम्हारा जीवन समाप्त हो चुका है मैं तुम्हें लेने आया हूं मृत्यु को सामने देखकर उद्धव डर गए लेकिन
उन्होंने देवता का वरदान याद किया और चालाकी से बोले मैंने सुना है कि प्राण लेने के लिए यमदूत आते हैं पर आप स्वयं यहां कैसे उद्धव तुमने अच्छे कर्म किए हैं इसलिए मैं खुद तुम्हें लेने आया हूं महाराज आप पहली बार मेरे घर आए हैं मुझे सेवा का अवसर दीजिए कृपया थोड़ी देर मेरे बिस्तर पर आराम करें यमराज उनकी बातों में आ गए और बिस्तर पर बैठ गए उद्धव मुस्कुराते हुए बोले यमराज जी अब आप मुझे यहां से नहीं ले जा सकते और खुद भी नहीं जा सकते उद्धव तुम क्या कह रहे हो पीपल देवता
ने वरदान दिया था कि मेरे अलावा इस बिस्तर पर जो भी बैठेगा वह मेरी अनुमति के बिना उठ नहीं सकेगा इसलिए यमराज जी आप यहां से तभी उठ सकते हैं जब मैं चाहूं यमराज ने उठने की कोशिश की लेकिन विफल रहे आखिरकार यमराज बोले उद्धव मुझे यहां से उठने दो मेरा काम ठप हो जाएगा सृष्टि का संतुलन बिगड़ जाएगा नहीं यमराज जी आपका काम लोगों को मृत्यु देना है और मैं आपको बिठाकर लोगों को मरने से बचा रहा हूं यह सोचकर वह मजे से खेत पर रहने लगते हैं और इधर यमराज उसके घर में कैद
थे एक दिन उद्धव ने देखा कि उनकी गाय को एक जंगली सूअर आकर काटने लगा है ऐसे में वह अपना डंडा उठाते हैं और सूअर को निडर होकर मारने के लिए चले जाते हैं वह सूअर को अपने डंडे से जोर-जोर से मारने लगते हैं लेकिन सूअर को कुछ नहीं होता आखिरकार उनका डंडा टूट जाता है तब वो सोचने लगते हैं अगर इसने मुझे काट लिया तो भले ही मैं मरू नहीं लेकिन दर्द बहुत ज्यादा होगा यह सोचकर वह वहां से भागने लग जाते हैं भागते भागते वह देखते हैं कि जंगल से ढेर सारे जानवर गांव
में घुस आए हैं जिसके डर से गांव के लोग इधर-उधर भागने में लगे हैं उद्धव भी भागते भागते अपने घर पहुंचते हैं तेजी से भागने की वजह से वह हाफ लगते हैं ऐसे में उसे देखकर यमराज उससे पूछते हैं उद्धव क्या हुआ मेरे पीछे एक जंगली सूअर पड़ गया था मैंने तो उसे बहुत मारा लेकिन वह मर ही नहीं रहा था यही नहीं गांव में जंगल से निकलकर बहुत सारे जानवर घुस आए हैं जिसके डर से लोग यहां से वहां भाग रहे हैं मैंने तुमसे कहा था ना कि मैंने अगर अपना काम नहीं किया तो
पूरी सृष्टि का संतुलन बिगड़ जाएगा मैं कुछ समझा नहीं यमराज जी आप क्या कहना चाह रहे हैं उद्धव कोई भी प्राणी अमर नहीं हो सकता जिसने भी जन्म लिया उसकी एक ना एक दिन मृत्यु निश्चित है जीवन और मृत्यु संसार का नियम है अगर मैं किसी को मृत्यु ना दूं तो पूरी पूरी दुनिया में हर तरह के प्राणी भर जाएंगे जिससे हर ओर हंगामा मच जाएगा इसलिए मैं सबको बारी-बारी से मृत्यु देकर सृष्टि का संतुलन बनाए रखता हूं उद्धव ने समझ लिया कि जन्म और मृत्यु संसार के नियम है यमराज जी मुझे क्षमा कर दीजिए
कृपया करके आप इस बिस्तर से उठिए और मुझे अपने साथ लेकर चलिए अब मैं इस बात को काफी अच्छे से समझ चुका हूं कि जो कोई भी यहां जन्म लेता है उसे सही समय आने पर मौत के मुंह में जाना ही पड़ता है यमराज उद्धव के प्राण लेकर यमलोक चले गए एक शहर में एक धनी व्यापारी अपनी दो पत्नियों और उनकी एक-एक बेटी के साथ रहता था बड़ी बेटी सुखिया और छोटी बेटी दुखिया थी बड़ी बहू चालाक थी और अपनी बेटी के साथ मिलकर उसने सारी संपत्ति पर कब्जा कर लिया और छोटी बहू को दुखिया
के साथ घर से बाहर निकाल दिया छोटी बहू साधारण और धार्मिक स्वभाव की थी जीवनयापन के लिए वह सूत काटती थी एक दिन उसकी एक पड़ोसन ने उसे धर्मराज के बारे में बताया जो सभी दुखों को दूर करते हैं तब से छोटी बहू रोज धर्मराज की कथा सुनने जाने लगी एक दिन छोटी बहू ने दुखिया से कहा बेटी मैं कथा सुनने जा रही हूं मैंने धूप में रुई सुखाने के लिए डाली है उसकी देखभाल करना छोटी बहू के जाने के थोड़ी देर बाद तेज हवा चली और रुई उड़ गई दुखिया ने उसे पकड़ने की कोशिश
की लेकिन सफल नहीं हो पाई वह रोने लगी उसकी यह हालत देखकर पवन पुत्र हनुमान जी ने कहा बेटी मेरे पीछे पीछे आओ दुखिया ने चलना शुरू किया और रास्ते में एक गाय मिली गाय ने कहा मेरा गोबर साफ कर दो दुखिया ने साफ किया और उसे घास और पानी दिया गाय खुश हो गई फिर उसे एक केला का पेड़ मिला जिसने कहा मेरे चारों तरफ गिरे हुए सूखे पत्तों को साफ करो दुखिया ने पत्ते साफ किए और आगे बढ़ी आगे उसे एक घोड़ा मिला जिसने कहा मैं भूखा हूं मुझे कुछ खिलाओ दुखिया ने उसे
घास खिलाया और पानी पिलाया आगे जाकर दुखिया को एक बुढ़िया मिली जो सूत कात रही थी हनुमान जी के इशारे पर दुखिया ने उसके पैर छुए और रुई मांगी बुढ़िया ने कहा पहले बालों में तेल लगाकर नहा लो और नई साड़ी पहन लो फिर खाना खा लो दुखिया ने तालाब में डुबकी लगाई और परी जैसी सुंदर हो गई दूसरी डुबकी से उसका शरीर गहनों से भर गया उसने नई साड़ी पहनी और सिर्फ रोटी सब्जी खाई बुढ़िया ने उसे दो डिब्बों में से एक चुनने को कहा दुखिया ने छोटा डिब्बा चुना वापसी में घोड़े ने उसे
सोने की अशरफियां दी केले के पेड़ ने सोने का गुच्छा और गाय ने अपना बछड़ा दिया जब दुखिया घर पहुंची तो मां बहुत खुश हुई क्योंकि उसके दुख के दिन खत्म हो गए थे दुखिया ने डिब्बा खोला और उसमें से एक राजकुमार निकला जिससे दुखिया का विवाह हो गया तीनों खुशी खुशी रहने लगे यह देखकर सुखिया की मां को जलन हुई उसने भी धर्मराज की कथा सुनने का निश्चय किया उसने भी रुई को धूप में सुखाया और कथा सुनने गई सुखिया ने पहरेदारी की तो हनुमान जी ने रुई उड़वा दी सुखिया ने हनुमान जी का
पीछा किया उसे भी रास्ते में गाय पेड़ और घोड़ा मिले सबने सुखिया से मदद मांगी लेकिन उसने उन्हें ठुकरा दिया और बुढ़िया के पास पहुंची उसने रुई और डिब्बा मांगा बुढ़िया ने उसे भी नहाने को कहा तालाब में डुबकी लगाते ही सुखिया कुरूप हो गई उसने सबसे महंगी साड़ी पहनी और स्वादिष्ट भोजन खाया जब बुढ़िया ने उसे दो डिब्बों में से एक चुनने को कहा तो उसने बड़ा डिब्बा चुना वापसी पर घोड़े ने उसे लात मारी केले के पेड़ ने पत्तों की बारिश की और गाय ने उसे सींग मारकर भगा दिया घर लौटने पर सुखिया
ने डिब्बा खोला तो उसमें से एक अजगर निकला जिसने उसे निगल लिया उसकी मां ने उसे गायब देखकर रोना पीटना शुरू कर दिया