यह कहानी एक ऐसे गांव की है जहां जाहिलियत के डर से हर नए साल एक मासूम लड़की की कुर्बानी दी जाती थी। कुर्बानी भी ऐसी कि उस लड़की को पेड़ के नीचे लिटा दिया जाता था और शेर आता था और उसका दिल निकालकर एक पेड़ के नीचे छुपा देता था। लेकिन उस वक्त क्या हुआ जब शेर ने एक हाफिजा एक कुरान लड़की का दिल निकाला तो जमीन हिल गई। आसमान कांपने लगा। वाक्या बहुत ही सबक आमोज और दिलचस्प है। इसलिए इसे दिल के कानों से सुनिएगा। यह कहानी एक ऐसे गांव की है जो एक घने
खामोश और रहस्यमय जंगल के किनारे बसा हुआ था। उस गांव का नाम भंवरगढ़ था। लेकिन लोग उसे कुर्बानी वाला गांव कहते थे। यहां हर साल की शुरुआत में कुछ ऐसा होता था जो बाकी दुनिया के लिए शायद एक अफसाना था। मगर यहां के लोगों के लिए वह हकीकत से भी ज्यादा खौफनाक हकीकत थी। नए साल की पहली रात जब आसमान स्याही में डूबा होता, सितारे गायब और हवाएं खामोश होती। गांव के बीचों-बीच एक बुजुर्ग बांसुरी बजाकर ऐलान करता वक्त हो चुका है। पेड़ भूखा है। पेड़ के करीब शेर गुर्राने लगा है। वह एक लड़की की
कुर्बानी मांग रहा है। जल्दी करो। लड़की को तैयार करो। लोग कांपते हुए दरवाजे बंद कर देते। चिराग बुझा देते और फिर एक बेटी चुपचाप जंगल के हवाले कर दी जाती। कहा जाता था कि अगर एक नौजवान लड़की की कुर्बानी ना दी जाए तो जंगल से एक शेर निकलेगा जो गांव में घुसकर सब कुछ चीर फाड़ डालेगा और गांव वाले उस शेर को पेड़ का निगाहान कहते थे। वह शेर सिर्फ लड़की को मारता नहीं था बल्कि उसका दिल निकालकर जंगल के बीचों-बीच मौजूद काले पेड़ के नीचे रख देता था और वह पेड़ उसमें कोई चमकता हुआ
साया उस दिल को चूस लेता था। यह रिवाज 100 सालों से चला आ रहा था और किसी में हिम्मत नहीं थी कि कोई सवाल करे। इस साल जिस लड़की का नाम निकला वह थी हफ्सा। हफ्सा सिर्फ 17 साल की थी मगर हाफिजा एक कुरान थी। नरम मिजाज पर्देदार मुत्तकी और नेक सीरत उसकी मां एक विधवा थी और हफ्सा ही उसका सहारा थी। बदकिस्मती से गांव के एक बुजुर्ग ने जब बांसुरी बजाई और इस साल का नाम ऐलान किया पूरे गांव में सन्नाटा छा गया। लोग कहने लगे हफ्तसा का नाम कैसे निकल सकता है? कुछ लोगों
ने सिर्फ फुसफुसा कर बात की। मगर इतनी हिम्मत किसी में नहीं थी कि खुलकर बोले गांव के सरदार कमालदीन ने कहा पेड़ खुद चुनता है। हम तो सिर्फ जरिया बनते हैं। अगर रोकेंगे तो शेर आएगा और फिर कुछ ना बचेगा। हफ्सा की मां रोती रही। गिड़गिड़ाती रही। मेरी बेटी कुरान सुनाती है। उसे कैसे दे सकते हो? मगर किसी ने नहीं सुना। गांव वालों ने हफ्सा की मां को जवाब दिया, हमारी बेटियां भी तो एक-एक करके कुर्बान हुई है। तेरी बेटी को कौन सा फूल लगे हैं जो तू इस तरह रो रही है? यह हमारे गांव
का सवाल है। गांव के मर्द खामोश थे और औरतें कांपती नजरों से दीवारों से लगी रही। हफ्सा खामोश थी। उसने अपनी मां का चेहरा देखा। कुरान का एक वर्क चूमा और सिर्फ इतना कहा। अगर मेरी कुर्बानी से सब बचते हैं तो शायद यही मेरा नसीब है। लेकिन रात को हफ्सा ने एक ख्वाब देखा। क्या देखती है कि जंगल में एक शेर है और हफ्सा का दिल निकाल रहा है। शेर की आंखों में खून उतरा हुआ है। उसकी आंखें लाल थी। मगर जब वह झपटने को आया तो एक बुजुर्ग सामने आ गए। सब इमामा हाथ में
चमक दी। तस्बीह और आंखों में रोशनी। उन्होंने कहा यह अल्लाह की बंदी है। तुम इसे हाथ नहीं लगा सकते। उसी वक्त शेर रुक गया। घर आया और पेड़ की तरफ देखने लगा। हफ्तसा की आंख खुल गई। माथे पर पसीना और लबों पर आयतुल कुर्सी थी। दिन जैसे तैसे गुजर गया था। अब रात हो चुकी थी। अब हफसा की कुर्बानी के लिए सब लोग तैयारियां कर रहे थे। यह कोई आम पेड़ नहीं था। यह खून पीता पेड़ था। इसके साए में शैतान सांस लेता था। जहां हफ्सा की कुर्बानी होने वाली थी। हफ्सा घर के बाहर एक
कोने में बैठी डरी हुई थी और झाड़ो कतार रो रही थी। इतने में धूल उड़ाती हुई एक पुरानी लकड़ी की छड़ी थामे सफेद कपड़ों में लिपटे बाबा आरिफ दमदार हुए। चेहरे पर नूर माथे पर सजदों का निशान और आंखों में ऐसा सुकून जो किसी तूफान को भी थमा दे। बाबा आरिफ ने जब हवसा को रोते देखा तो उसके पास पहुंचे लड़की ने चौंक कर उनकी तरफ देखा जैसे किसी ख्वाब का दरवाजा खुल गया हो। आप आप वही बुजुर्ग हैं ना जो मुझे ख्वाब में नजर आते थे। बाबा आरिफ ने शफकत से मुस्कुरा कर कहा, हां
बेटी अल्लाह ने मुझे तुम तक पहुंचाया है। क्यों रो रही हो? लड़की हिचकियां ले लेकर रोने लगी। बाबा आज मेरी कुर्बानी है। मुझे उस शेर के पास ले जाया जाएगा। कहते हैं अगर मैं ना गई तो गांव बर्बाद हो जाएगा। बाबा आरिफ का चेहरा सख्त हो गया। उन्होंने लड़की के आंसू अपने रुमाल से पछे और कहा आज ना तुम मरोगी ना तुम्हारा ईमान बिकेगा। बाबा आरिफ को देखकर पूरा गांव मैदान में जमा हो चुका था और बीच में वह लड़की झाड़ू कतार रो रही थी। उसका जिस्म कांप रहा था और आंखों से टपकती सिसकियां सन्नाटे
में गूंज रही थी। बाबा आरिफ ने सब गांव वालों को ऊंची आवाज में कहा ऐ लोगों रुक जाओ यह जुल्म मत करो। अल्लाह के नाम पर रुक जाओ। गांव के सरदार ने दांत पीसते हुए कहा, तू कौन है हमें रोकने वाला? क्या यह तेरी अपनी बेटी है जो तुझे इतनी तकलीफ हो रही है? बाबा आरिफ ने गहरी सांस ली। हां, यह मेरी बेटी जैसी है। हर वो बेटी जो बेगुनाह हो, मेरी बेटी है। लेकिन तुम लोग अंधों की तरह शर्क की दलदल में डूब चुके हो। शेर तुम्हारी आजमाइश है। माबूद नहीं। तुम अल्लाह को छोड़कर
एक जानवर से डर रहे हो। एक और शख्स चीख पड़ा। अगर यह रस्म ना होती तो शेर हमें चीर देता। पिछले साल भी नाम ना दिया गया था तो दो मर्द हलाक हो गए थे। बाबा आरिफ ने आसमान की तरफ हाथ उठाए। अल्लाह के बंदो यह सब तुम्हारा वहम है या किसी शैतान का जाल अल्लाह की मखलूक तुम्हें मार सकती है। हम अपनी जाने जोखिम में नहीं डाल सकते। बाबा आरिफ ने अपना असर जमीन पर मारा। आंखें बंद की और कहा अगर किसी को जान देनी है तो मेरी ले लो। मगर इस नेक हाफिज कुरान
बेटी का खून मत बहाओ। अब फिजा में सनसनी फैल गई। कुछ औरतें चीखने लगी। कुछ मर्द पीछे हटने लगे। मगर सरदार और उसके साथी भड़क उठे। एक ने बाबा आरिफ को धक्का दिया। दूसरा चिल्ला पड़ा। यह हमें हमारी रस्म से रोक रहा है। यह शैतान है। इसे गांव से बाहर निकालो। इसकी बातों में मत आओ। असल में यह वही गांव का हकीम था जो ज्यादा ही उभर रहा था। लोगों ने बाबा आरिफ को घसीटना शुरू कर दिया। वो गिरते संभलते रहे मगर जुबान से कलमा नहीं हटा। ला इलाहा इल्लल्लाह मोहम्मदुर रसूल्लाह यह शर्क है अल्लाह
के नाम पर जुल्म बंद करो और इसी सना में वो लड़की दौड़ती हुई आई और बाबा आरिफ के कदमों में लिपट गई बाबा मुझे मत छोड़ें आप ही तो मेरे ख्वाब का सच थे मुझे बचा लें बाबा आरिफ ने उसे सीने से लगा लिया और आसमान की तरफ देखकर कहा ऐ रब्बे करीम अगर यह तेरी रजा है कि मैं इस बेटी को बचाने के लिए मारा जाऊं तो मेरी जान हाजिर है। मगर इस धरती पर एक और नाहक खून ना गिरे। उतने में एक जोरदार दहाड़ सुनाई दी। शेर की गूंजदार आवाज जंगल के कोने से
आई। गांव वाले सहम गए। कुछ दौड़े कुछ ठिठक गए। हैरत की बात यह थी कि जब गांव का एक बुजुर्ग जो हकीम था बांसुरी बजाकर लड़की को शेर के आगे फेंकने को तैयार होता था। उसकी अपनी बेटी का कभी भी कौरंदाजी में पर्ची नहीं आई थी। बस वह दूसरों की बेटियों की कौरानियां देता था। रात के अंधेरे में गांव के कुछ मर्द बांसुरी वाले के कहने पर टिमटिमाते मशालों के साथ हफ्सा को बांसों से बंधी हुई एक चारपाई पर उठाए जंगल की तरफ जा रहे थे। उनके चेहरों पर ना कोई शर्मिंदगीगी की थी ना रहम।
बस एक खौफ था। एक ऐसा डर जो नस्लों से उनके अंदर बसा हुआ था। वो डर जो दरख्तों के दरमियान बसने वाले उस शेर से था जो हर नए साल के चांद के साथ एक कुर्बानी मांगता था। पीछे बाबा आरिफ भी थे। वही अल्लाह वाले जिन्हें गांव वालों ने मारने की धमकी देकर कहा था अगर इतना ही दर्द है तुझे इस लड़की का तो जा उसके साथ जान दे दे अब ना हम रुकेंगे ना वो शेर बाबा आरिफ खामोश थे उनके चेहरे पर ना तो खौफ था ना गुस्सा बस आंखों में एक सवाल था क्या
वाकई उनका ईमान इतना कमजोर है कि शेर को रब का शरीक मान बैठे जंगल में दाखिल होते ही फिजा में एक बोझिल खामोशी छा गई दरख्तों की शाखे जैसे सरगोशी कर रही थी और जमीन जैसे सांस रोक कर इंतजार में थी। दरख्त के नीचे वही मनहूस मुकाम था जहां हर साल कुर्बानी दी जाती थी। एक जगह साफ की गई। वहां चारपाई रख दी गई। हफ्सा को रस्सियों से बांध दिया गया। हफ्सा की चीखें जंगल के सन्नाटे में घुल रही थी। बाबा मुझे बचा लें। मैंने कुछ नहीं किया। मैं तो हाफिज कुरान हूं। मैंने तो बस
अल्लाह की बातें याद रखी हैं। बाबा आरिफ करीब आए। उसके पास बैठकर उसके आंसू साफ किए। बेटी क्या तुमने मुझे पहले कभी देखा है? हफ्सा की आंखों में हैरत थी। आप वही बुजुर्ग हो जिन्हें मैं ख्वाब में देखती आई हूं। जो मुझे कहते थे सब्र करो। सच जरूर जीतेगा। बाबा आरिफ की आंखों में नमी आ गई। हां बेटी मैं वहीं हूं और आज वो लम्हा आ गया है। जब सच झूठ से टकराएगा। अचानक पेड़ों के पीछे से एक धीमी गरज सुनाई दी। फिर जमीन कांप उठी। मशालों की रोशनी डगमगाने लगी और फिर वो आया। वही
शेर जिसकी आंखों में खून की पुरानी लकीरें, अंगारों की तरह दहकती हुई नजरें और कदम ऐसे जैसे जमीन भी उसके पीछे दबती जा रही हो। उसने हफ्सा को देखा। उसके करीब आया और झपट्टा मारने को तैयार हुआ। लेकिन उसी लम्हे बाबा आरिफ ने अपनी आंखें बंद की और बुलंद आवाज में तिलावत शुरू कर दी। जैसे ही कुरान की आवाज गूंजी, शेर के कदम रुक गए। पहले तो उसने अपना सर झटका जैसे किसी तकलीफ में हो और फिर पीछे हट गया और बाबा आरिफ के सामने बैठ गया। जैसे कोई नौकर अपने बादशाह के सामने बैठता है।
बाबा आरिफ की आवाज और बुलंद होती गई। ऐ शेर तू तो अल्लाह की मखलूकन है। फिर क्यों बेगुनाहों का खून करता है? लड़की तो हाफिज कुरान है। तू इसका खून कैसे कर सकता है? कौन है जो तुझे मजबूर करता है? किसके कहने पर तू हर साल दिल निकालता है? शेर का जिस्म कांपने लगा। उसकी आंखों में जैसे आंसू आ गए। फिर उसने गर्दन मोड़ी और आसमान की तरफ एक तेज चीख मारी। बाबा आरिफ आगे बढ़े। बता ए जंगल के बादशाह तेरे पीछे कौन है? तब शेर जमीन पर बैठ गया और अपनी अगली दोनों टांगे उस
दरख्त के नीचे मौजूद एक खास जगह पर मारी। जमीन फट गई और वहां से एक दरवाजा खुल गया। नीचे तहखाना था। अंधेरा बदबूदार और खून से लथपथ एक कमरा। बाबा आरिफ नीचे झुके और उनकी आंखें हैरानी से फैल गई। वहां एक छोटा सा कमरा था। कमरे में इंसानी अजा, अंगों के डिब्बे, दिल, गुर्दे, जिगर सब जमे हुए हाल में रखे थे। और एक पुरानी किताब जिस पर लिखा था कुर्बानी का खेल नस्ल दर नस्ल तजारत। बाबा आरिफ ने किताब खोली और पता चला कि यह सब गांव का ही एक बुजुर्ग शुरू कर गया था। जो
काला जादू जानता था। उसने शेर को काबू किया और गांव वालों को इस बात पर मजबूर किया कि हर साल एक लड़की का दिल निकालकर उस दरख्त के नीचे चढ़ाया जाए ताकि गांव में अमन रहे। लेकिन दरअसल वो दिल और अजा बेच दिए जाते थे। और यह सब शेर की कुर्बानी के नाम पर नस्लों से चलता आ रहा था। शेर ने आखिरी बार बाबा आरिफ को देखा। फिर हफ्तसा के करीब आया। उसके माथे को अपनी जुबान से छुआ जैसे माफी मांग रहा हो और फिर खामोशी से दरख्तों के पीछे गुम हो गया और कुछ देर
बाद वहां से बाहर निकला। हफ्सा की रस्सी खुल चुकी थी। बाबा आरिफ ने उसे गले से लगाया और कहा बेटी तुम्हारा ईमान तुम्हारी ताकत है। आज अगर शेर एक हाफिजे कुरान बच्ची का दिल निकाल लेता तो कहर मच जाता। गांव में झलझला आ जाता। लेकिन उधर गांव वाले बहुत ज्यादा खुश थे कि हाफिजा के साथ-साथ अल्लाह वाला भी अब तक शेर के हाथों निपट चुका होगा। ना रहेगा बांस ना बजेगी बांसुरी। यह अल्लाह वाला आया था। बड़ा हमें समझाने के लिए अब खुद ही अपनी जान गवा बैठा। अगर इतना ही ताकतवर था तो शेर उसे
बचा लेता। लेकिन इन लोगों को यह नहीं पता था कि मौजजा और चमत्कार होना तो अभी बाकी था। इतने में गांव वाले अचानक क्या देखते हैं कि अल्लाह वाला और हफ्सा शेर को अपनी सवारी बनाकर शेर के ऊपर बैठकर गांव वालों की तरफ आ रहे हैं। गांव वालों के मुंह खुले के खुले रह गए। यह क्या हो गया? इस शेर ने हफ्सा को खाया नहीं। ना ही अल्लाह वाले को। यह माजरा क्या है? असली हकीकत क्या है? लोग डर कर अपने बने घरों की तरफ भागने लगे। अल्लाह वाले की आवाज गूंजी। रुको ऐ लोगों तुम
लोग क्यों डर रहे हो? यह शेर मजबूर था और इसे किसने मजबूर किया? यही अब तुम लोगों को बताया जाएगा। इस शेर की जुबानी यह किसी को कुछ नहीं कहेगा। गांव वाले भागते-भागते वहीं रुक गए। उनके जिस्म कांप रहे थे। इतने में शेर उनके दरमियान आकर रुका और हफ्सा नीचे उतरी। अल्लाह वाले भी साथ ही नीचे उतरे। वही बांसुरी वाला अकड़ कर बोला, "यह कोई जादूगर है। इसकी कोई चाल है? तुम लोग इसकी बातों में मत आओ। यह शेर हम सबको निगल जाएगा। और यह जो अल्लाह वाला बना फिरता है यही तो चाहता है। चलो
हम सब भाग चले। लेकिन वो शैतानी चाले चल रहा था। किसी को कुछ इल्म नहीं था कि आखिरकार उस बांसुरी वाले का राज क्या है और उसने शेर को किस तरह मजबूर किया और किस तरह यह बांसुरी वाला अपना ही एक कारोबार चला रहा था। शेर ने जब इस बात का खुलासा किया तो सबके रोंगटे खड़े हो गए। अल्लाह वाले उन लोगों के बीच शेर के पास बैठ गए। हाथ ऊपर उठा दिए और दुआ में मशगूल हो गए। ऐ अल्लाह आज तू इस बेजुबान शेर को जुबान अता कर ताकि यह अपनी जुबान से बोलकर बताए
कि यह बेजुबान जानवर किसके कहने पर इतना मजबूर हो गया। ऐ अल्लाह आज तू इस शेर को जुबान दे ताकि इस गांव से शर्क को खत्म किया जा सके। जैसा तूने वादा किया है कि हर गुनाह की माफी होगी। लेकिन शर्क की माफी नहीं। जब अल्लाह वाले दुआ मांगकर फारग हुए तो इतने में शेर के मुंह में जुबान आ गई और वह बोलने लगा सुनो ए गांव वालों मैं जंगल का बादशाह हूं और नबी का कलमा पढ़ने वाला हूं और अल्लाह के हुक्म के बगैर कभी किसी की जान नहीं ले सकता लेकिन यह जो बांसुरी
वाला है इसका बाप काला इल्म करता था और उसने मुझे पेड़ के नीचे एक तहखाने में अपने जादू से कैद कर रखा था और अपने इशारों पर मुझे नचाता था। मैं मजबूर था और यह लड़कियों की कोई कुर्बानी पेड़ नहीं मांगता था बल्कि इसका बाप लड़कियों के दिल बेचकर और उन पर तंत्र मंत्र पढ़कर जादू भी करता था और इसका कारोबार चल निकला था। यह संगदिल हो चुका था और जब यह दुनिया से चला गया, तो इसने अपनी गद्दी का वारिस अपने बेटे को बना दिया। गांव की फिजा में एक अजीब सी बेचैनी फैल चुकी
थी। बांसुरी वाला, गांव के चौराहे पर खड़ा शोर मचा रहा था। यह सब एक साजिश है। यह अल्लाह वाला खुद जादूगर है। शेर को इसी ने काबू में किया है। तुम लोग मेरी बात मानो वरना सब तबाह हो जाएगा। कुछ लोग बांसुरी वाले की बातों पर यकीन कर रहे थे। उनके चेहरों पर शक और खौफ साफ नजर आ रहा था। यह सब शेर का खेल नहीं। यह अल्लाह वाले का खेल है। एक बूढ़ा शख्स चीखा। लेकिन हफ्सा जो अब खुद हिम्मत और रोशनी की अलामत बन चुकी थी, शेर के साथ खड़ी थी। शेर ने एक
दहाड़ मारी। लेकिन यह दहाड़ दहशत की नहीं बुलावे की थी। अल्लाह वाला खामोशी से सामने आया और आसमान की तरफ देखकर बोला ऐ लोगों अगर तुम्हें सच पर यकीन नहीं तो चलो उस पेड़ के नीचे जहां हर साल तुम अपनी बेटियों को कुर्बान कर दे रहे हो। आज वही पेड़ तुम्हें हकीकत दिखाएगा। शेर आगे बढ़ा। उसने बांसुरी वाले को घूरा और पेड़ की तरफ रवाना हो गया। लोग पीछे चलने लगे। कुछ खौफजदा, कुछ हैरान। जब सब पेड़ के करीब पहुंचे तो शेर एक झाड़ी के पास रुका। जमीन पर पंजा मारा और मिट्टी खोदने लगा। कुछ
ही देर में वहां एक लोहे का दरवाजा बरामद हुआ। अल्लाह वाला आगे बढ़ा और कुरान की आयतें पढ़ते हुए दरवाजा खोला। नीचे एक सीढ़ी जाती थी। सब नीचे उतरे। जो मंजर वहां था वो किसी कयामत से कम ना था। दीवारों पर खून की लकीरें, काले जादू के नक्श और एक कोने में एक बड़ी मेज जिस पर कई दिल रखे हुए थे। कुछ सड़े हुए, कुछ ताजा, कुछ जार्स में लड़कियों के अजा रखे हुए थे। एक तरफ बांसुरी वाला चीखने लगा। यह सब झूठ है। यह सब मेरे खिलाफ साजिश है। अल्लाह का खौफ करो। लेकिन अल्लाह
वाले ने एक पोसीदा किताब उठाई। वही किताब जिस पर इंसानी खून से कुछ मंत्र लिखे हुए थे। यह देखो तुम्हारे बाप की वही किताब है जिससे तुम अब काला इल्म चला रहे हो। तुमने लोगों को एक अफसाना में उलझाकर मासूम लड़कियों को ज़बाह किया। उनके दिल निकाल कर बेचे। तुम्हारे बाप का धंधा तुमने विरासत में लिया। तब शेर दहाड़ा और इंसानी जुबान में बोला मैं शेर हूं। रब की मखलूका मुझे अल्लाह ने ताकत दी है। लेकिन अक्ल नहीं इस इंसान ने मेरे ऊपर मंत्र पढ़े। मुझे वसवसों में उलझाया और अपने गुनाहों में शरीक बना लिया।
आज मैं गवाह हूं कि यह सब इस बांसुरी वाले की करतूत है। लोग कानों को हाथ लगाने लगे। कुछ औरतें जमीन पर गिर कर रोने लगी। हमने अपनी ही बेटियों को ज़बा कर दिया। इन दरिंदों के हाथों हाय हम कैसे मां-बाप थे। एक नौजवान लड़का जिसकी बहन पिछले साल कुर्बान हुई थी। बांसुरी वाले की तरफ लपका। मेरी बहन का दिल कहां है? तुमने मेरी बहन को मारा। मैं आज तुम्हारा दिल निकालूंगा। सारी भीड़ बांसुरी वाले पर टूट पड़ी। कोई पत्थर मार रहा था। कोई लातों से पीट रहा था। बांसुरी वाला चीखने लगा। मुझे माफ कर
दो। मैंने सब लालच में किया। मुझे बखश दो। अल्लाह वाले ने सबको रोका। खून का बदला खून नहीं होता। यह गुनाह का बदला गुनाह है। तुम सबको तौबा करनी होगी। और इस गुनाह का अजाला इल्म और इंसाफ से करना होगा। लेकिन उसी वक्त एक बूढ़ी औरत आगे बढ़ी और कहने लगा हम खून का बदला खून से लेंगे। उसकी आंखों के सामने उसकी बेटी को भी शेर के आगे डालेंगे ताकि उसका भी दिल निकाला जाए ताकि उसे पता चले कि दूसरों की बेटियों के यह दिल कैसे निकालता रहा। हमारी बेटियां जान से जा चुकी हैं। अल्लाह
वाले फौरन बोले इसमें उसकी बेटी का क्या कसूर। अगर तुम भी ऐसा करोगे तो इसमें और तुम लोगों में क्या फर्क रह जाएगा? बुढ़िया बोली नहीं बाबा जी अगर हमने इसे छोड़ दिया तो फिर कोई नहीं बचेगा। आज एक मां की कोख ने अगर ऐसी औलाद पैदा की है तो वही आज उसका अंजाम देखेगी। इतने में शेर बोला ऐ अल्लाह के बुजुर्ग मैं भी यही चाहता हूं कि इसने जितनी जाने ली है। अगर आप चाहते हो कि मैं इस जंगल से चुपचाप चला जाऊं तो इस आदमी को मेरे हवाले किया जाए बल्कि इसी तहखाने में
इसे और मुझे बंद कर दिया जाए। फिर मैं जानू और यह आदमी रात के सन्नाटे में जब सारी हकीकतें खुल चुकी थी। बांसुरी वाले की चालाकियां, उसके बाप की स्याह तारीख और काले जादू का खौफनाक चेहरा बेनकाब हो चुका था। तब गांव की फिजा में सिर्फ एक ही नाम गूंज रहा था। इंसाफ बांसुरी वाला घुटनों के बल गिर चुका था। उसके कपड़े खून से लथपट थे। चेहरे पर खौफ और नदामत की चमक थी। मगर लोगों की आंखों में सिर्फ नफरत और इंतकाम की आग सुलग रही थी। तभी शेर आहिस्ता से आगे बढ़ा। उसकी आंखें अब
वैसी नहीं थी बल्कि जैसे सदियों की थकन बोझ और गमली हुए थी। वो अल्लाह वाले के करीब आकर झुका। अपनी गर्दन नीची की और आहिस्ता से कहा ऐ अल्लाह के बंदे मेरी आखिरी ख्वाहिश है। अल्लाह वाले ने मोहब्बत भरी नजरों से उसे देखा और बोले ऐ रब की मखलूका तेरा दिल क्या कहता है? शेर ने पूरी बस्ती की तरफ देखा और बोला अगर यह लोग उस शख्स को जिसने मेरे ऊपर जुल्म किया मुझे मेरे रब के खिलाफ चलाया। मासूमों का खून बहाया। अगर यह शख्स मुझे हवाले कर दे तो मैं वादा करता हूं। हमेशा हमेशा
के लिए इस गांव को छोड़ दूंगा। ना कभी पलट कर आऊंगा ना किसी को नुकसान दूंगा। मेरी रूह को सुकून सिर्फ उसके खून से मिलेगा जिसने मुझे एक दरिंदा बनाया। खामोशी छा गई। फिर एक मां की चीख गूंजी। मेरी बेटी का खून मेरे सीने का सुकून लौटा कर नहीं आएगा। लेकिन उसका बदला इस जालिम का अंजाम। हां, वो मुझे चैन दे सकता है। एक नौजवान लड़की जिसके बाजू पर कुर्बानी के लिए निशान लगा था। रो पड़ी इस दरिंदे ने। मेरे ख्वाब, मेरे वालिदैन की नींद सब छीन लिया। आज हमें इंसाफ चाहिए और इंसाफ इसी शेर
की जुबान से आया है। लोगों ने बांसुरी वाले को खींचते हुए उसी तहखाने की तरफ घसीटा जहां उसने सैकड़ों बेकसूरों को बेरहमी से मारा था। अल्लाह वाला बार-बार आवाज देता रहा। जुल्म का बदला जुल्म मत बनाओ। मगर अगर यह अद्ल है और इस जानवर के दिल में भी इंसाफ है तो जाने दो शेर पीछे हटा। तहखाने का दरवाजा खुला। बांसुरी वाला चीखने लगा। मुझे माफ कर दो। मुझे बख्श दो। मैं तुम लोगों को दौलत से मालामाल कर दूंगा। बस मुझे शेर के हवाले मत करो। लेकिन अब लोगों के दिलों में रहम बाकी ना रहा था।
वही रहम जो इसने खुद मार दिया था। बांसुरी वाला तहखाने में फेंक दिया गया। दरवाजा बंद हुआ। कुछ ही लम्हों बाद एक गरज, एक दहाड़, एक चीख, फिर खामोशी कुछ लम्हे ऐसे गुजरे जैसे हवा भी रुक गई हो। फिर दरवाजा खुला। शेर बाहर आया। उसके जबड़े पर खून था। आंखों में सुकून अल्लाह वाले के पास आया और अपनी गर्दन झुकाई। मैं जा रहा हूं। ऐ अल्लाह के बंदे अपने जंगल में अपने रब के हुक्म से अब यह बस्ती आजाद है। बस एक वादा करना क्या अल्लाह वाले ने नरमी से पूछा। शेर बोला उन मासूम बच्चियों
की कब्रें मत भूलना। उन्हें दुआ देना और उनको इल्म देना जो अभी जिंदा है। ताकि फिर कोई जालिम किसी हवसा को ना लूटे। अल्लाह वाले की आंखों में आंसू आ गए। मैं वादा करता हूं ऐ रब की बनाई मखलूकत शेर ने एक आखिरी बार आसमान की तरफ देखा। एक दहाड़ मारी जो अब दहशत की नहीं बल्कि आजादी की थी और फिर जंगल की तरफ रवाना हो गया। पीछे मुड़कर भी ना देखा। लोग साखित खड़े थे। कुछ के चेहरों पर शर्मिंदगी की। कुछ पर सुकून किसी ने एक दूसरे से कहा। हमने अल्लाह वाले को झुठलाया। हफ्सा
को धक्का दिया। शेर को दरिंदा समझा। लेकिन दरिंदा तो वह था जो इंसान होते हुए भी इंसान ना रहा। अल्लाह वाले ने हफ्सा के सर पर हाथ रखा। बेटी तुम्हारा सफर यहीं नहीं रुका। अब तुम उन लड़कियों को पढ़ाओगी जिन्हें कभी कुर्बानी के लिए चुना जाता था। अब वो कुरान की हाफिजा बनेगी। हफ्सा ने सर झुका दिया। आंखों में आंसू मगर दिल में सुकून था। गांव बदलने लगा। तहखाने को बंद करके उस पर एक कुरान मजीद का नुस्खा रखा गया। बांसुरी वाले का नाम तक मिटा दिया गया और शेर वो कहीं दूर जंगलों में था।
एक नया अफसाना बन चुका था। मगर सच्चाई का कुर्बानी का और इंसाफ का अल्लाह वाले ने शेर के सर पर हाथ रखा और कुछ लम्हे आंखें बंद किए। कुरान की तिलावत करते रहे। फिर बोले जा तेरे रब ने तुझे माफ कर दिया। तू एक निशानी बनकर आया था और अब एक सबक बनकर जा रहा है शेर ने एक बार हाफिजा की तरफ देखा। जिसकी आंखों में अब खौफ की जगह आंसू थे। मगर वो आंसू रहमत और शुक्र के थे। शेर ने अपना सर झुकाया और गांव की हद से बाहर निकल गया और फिर कभी वापस
नहीं आया। गांव की फिजा जैसे बदल गई। बांसुरी वाले की असलियत जाहिर होने के बाद लोग कांप गए थे। जो लोग उसके झूठ पर यकीन करते थे। अब सजदे में गिर कर अल्लाह से माफी मांगने लगे। कभी जादुई पेड़ के नीचे लड़कियां कुर्बान की जाती थी। साफ करवाया वहां। अब एक छोटी सी मस्जिद बनवाई गई और वहां रोज का कुरान की तिलावत की आवाज गूंजने लगी। अब वक्त है कि तुम लोग रोशनी की तरफ लौटो, इल्म हासिल करो, दीन को समझो और शर्क जैसे बड़े गुनाह से हमेशा के लिए तौबा करो। और वो लड़की हाफिजा
जो कभी कुर्बानी के लिए चुनी गई थी। अब गाम की अलमबरदार बन गई। उसने मदरसा कायम किया जहां वो खुद लड़कियों को कुरान पढ़ाती, हदीस सिखाती और शर्क के खिलाफ आगाही देती। कुछ दिन बाद अल्लाह वाला हाफिजा के मदरसे के बाहर जमा लोगों से मुखातिब हुआ। सुन लो ए लोगों तुमने जो जुल्म किया जो जाहिलियत में लड़कियों की कुर्बानी दी वो सब शर्क था। रबुल आलमीन फरमाता है इल्लाह यकीनन अल्लाह शर्क को माफ नहीं करता। बाकी जो चाहे माफ कर दे। तुमने अल्लाह के साथ शेर को शरीक किया। दरख्त को माबूद बनाया और झूठे खौफ
के ताबे हो गए। एक बूढ़ा शख्स रोते हुए बोला बाबा जी हम जाहिल थे माफ कर दें। हमें ना दीन आया ना इल्म। अल्लाह वाले ने नरमी से जवाब दिया इल्म ना होना गुनाह नहीं इल्म ना सीखना गुनाह है आज से। यह मदरसा तुम सबकी पनाहगाह है। जहां तुम्हारे बच्चे बेटियां बीवियां सब दीन सीखेंगे। अल्लाह वाला कुछ दिन बाद अगले गांव के लिए रवाना हुआ। मगर जाने से पहले हाफिजा को सीने से लगाकर कहा। बेटी मैंने अपना काम किया। अब तुम्हारी बारी है। तुम्हारी आवाज बनेगी। रोशनी की रोश तुम्हारे सबक बनेंगे। नस्लों की हिदायत लोगों
को बताना सबसे बड़ा गुनाह शर्क है। अगर फिर कभी कोई बांसुरी वाला किसी और रंग में आ जाए तो तुम कहान की रोशनी लेकर उसके सामने खड़ी होना। हाफिजा की आंखों से आंसू रवा थे। लेकिन उसका चेहरा नूर से जगमगा रहा था। वक्त गुजरा और वही गांव जो कभी शैतानी रस्मों का गढ़ था। अब इल्म का मरकज बन गया। वहां के लोग आज भी अपनी नस्लों को वो दिन याद दिलाते हैं जब शेर बोल पड़ा और अल्लाह का बंदा आया। वो बताते हैं कि कैसे शर्क इंसान को हैवानियत में गिरा देता है और कैसे कुरान
इंसान को इंसान बनाता है। हाफिजा के मदरसे के दर्रो दीवार पर आज भी एक जुमला लिखा है। शर्क सबसे बड़ा जुल्म है और इल्म सबसे बड़ी रोशनी संगीत अल्लाह। आमीन दोस्तों। आज का वाकया आपको अच्छा लगा तो उसे लाइक करें दोस्तों। शर्क से जितना वजह जा सकता है, इतना बच्चे अपना और अपने प्यारों का बहुत सारा ख्याल रखें। मिलते हैं अगली वीडियो में और मजीद ऐसी वीडियोस देखने के लिए हमारे चैनल को सब्सक्राइब कर लें। शुक्रिया।