ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओओ माओ माओ माओ माओ माओ माओ माओ माओ माओ माओ माओ माओ माओ माओ ओम श्री परमात्मने नमः ओम श्री परमात्मने नमः ओमकार मंत्र मंत्र गायत्री छंद गायत्री छंद परमात्मा ऋषि परमात्मा ऋषि अंतर्यामी देवता अंतर्यामी देवता ईश्वर प्रीति अर्थे ईश्वर प्रीति अर्थे अंतर्यामी प्रीति अर्थे अंतर्यामी प्रीति अर्थे जपे विनियोग मंत्र में शक्ति होती है और मंत्र का देवता होता है मंत्र की छंद होती है जो मंत्र भगवत परक होते हैं उनकी छंद गायत्री होती है तो ओमकार मंत्र की छंद गायत्री है गायत्री मंत्र की छंद भी गायत्री जिसमें भगवान
की विशेषता होती जिस मंत्र में लगभग उसकी छंद गायत्री होती है मंत्रों के महत्व को जानने वाले ऋषि होते तो गायत्री मंत्र से लाभ उठाने और महत्व जानने वाले विश्वमित्र ऋषि थे ओमकार मंत्र का महिमा और लाभ उठाने वाले भगवान नारायण स्वयं है तो मंत्र का देवता भी होता है जैसे गायत्री मंत्र का देवता सूर्य है ओमकार मंत्र का देवता अंतर्यामी परमात्मा तो आप किसलिए जप कर रहे हैं उसका विनियोग होता ईश्वर प्रीति अर्थे जपे विनियोग पुत्र प्राप्ति अर्थे जपे विनियोग तो आप विनियोग करते मतलब किस लिए मंत्र जप रहे तो जिसके लिए करते मंत्र
उसका विनियोग होता है उसका संकल्प होता तो फिर उसी प्रकार का लाभ होता है तोय ओमकार मंत्र में 19 शक्तियों के बीज छुपे हैं आपनी शक्ति जगत पालिनी शक्ति अंतर आनंद दयनी शक्ति अंतर अनुभूति शक्ति इस प्रकार की 19 शक्तियां ओमकार मंत्र की गुरु मंत्र में च 15 शक्तिया नर को धारणी शक्ति सर्व तीर्थ वेद अर्थ फल दयनी शक्ति सारे पृथ्वी के तीर्थ कर लो सारे वेद पढ़ लो उससे जो फल होता है वही जप करने से ऐसे ही फल हो जाता है तो इस प्रकार का भगवत जप से लाभ होता है मंत्र जाप मनम
दृढ़ विश्वासा पंचम भक्ति वेद प्रकाश मंत्र जाप य पांचवी भक्ति भक्ति का पांचवा सोपान है और दृढ़ विश्वास से जप हरि ओम ओम ओ [संगीत] ओओओओ ओम ओ ओ ओ ओ ओओ ओओ ओम ओ हरि ओम ओम ओम ओम ओम माओ मा मा मा मा माओ मा मा माओ ओम ओम ओम ओ ओम ओम [संगीत] माओ हरि ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम म ओम ओम ओम ओम ओओ ओम [संगीत] ओ ओम नमो भगवते वासुदेवाय [संगीत] हरि ओम हरि ओम हरि ओम ह हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि
ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओ हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम भगवान में डुबाने वाला ये मंत्र है हरि ओम ये शोर करने के लिए नहीं ध्यान करने के लिए मंत्र का प्रयोग है हरि ओम भीतर ही भीतर खोते जाओ हरि ओम हरि के ध्यान में ह हरि के प्रेम में हरि के रस में हरि हरि की मधुर पाप ताप हरने वाली ध्वनि में हरि ओम हरि ओम हरि ओम ह भीतर कुछ होने लगेगा तो होने देना हरि ओम ह भावना
करना हरि ओ हदय कमल खिल रहा है ह अष्टदल कमल खिल रहा है ह प्रसन्नता शांति हरि ओम हरि ओम भगवत रसरा है हरि ओम शांति मधुर शांति में डूबते जाएंगे हरि के नाम में हरि के हेत में हरि के प्रेम में हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम साज के साथ मन को मिलाते जाओ डोलने दो मन मयूर को हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम ओम ओम ओम ओम ओ
ओ ओ ओ ओ ओ ओ ओम ओम ओम ओम ओ ओम ओम ओ ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओ ओम हरि ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम हरि ओम ओम ओम ओम ओम ओ ओ ओ ओ ओम ओ ओ ओम ओ ओम ओम ओम ओम ओ ओम [प्रशंसा] शवास देखने से शवास ताल बद चलते हैं शवास ताल ब होने से शवास कम खर्च होते हैं एक मिनट में 13 से 14 शवास खर्च हो जाते हैं लेकिन जो स्वासो शवास को देखने की साधना करेंगे तो उनका 25 पर स्वास
कम खर्च होगा तो समझो 60 साल आयुष [संगीत] है तो 75 साल तक जी लेगा समझो स्वासो स्वास 50 साल का है तो 62 साल जी लेगा और जो जरा जरा बात में इधर देखेगा उधर देखेगा चंचल होगा चलते चलते बातें करेगा बे मौसम के खाएगा खड़े-खड़े पानी पिएगा खड़े-खड़े पेशाब करेगा खड़े-खड़े खाएगा उसके स्वास्थ की शक्ति ज्यादा खर्च होती है व चिड़चिड़ी हो जाएगा गुस्से बाज हो जाएगा जिसकी दुर्गति होने वाली है वह विपरीत खोराक करता है जैसे कार्तिक में दही खाना चाहिए भादों में देही नहीं खाना चाहिए तो व बाद में देही खाएगा
फिर को सोएगा तो त्रिदोष बढ़ेंगे कार्तिक में करेला खाएगा करेला कार्तिक में खाए तो मरे नहीं तो बीमार तो हो जाए तो विपरीत आहार करेगा रात का उजागर करेगा दिन को [संगीत] सोएगा अमावस्या है पूर्णम है अष्टमी है संसार व्यवहार करेगा जल्दी बूढ़ा होगा जल्दी बीमार होगा जल्दी मरेगा जिनको स संग नहीं है वो विपरीत खोराक विपरीत कर्म करके अशांति लेते जिनको सत्संग है फिर व द्वेष नहीं करते कपट का स्वभाव भी धीरे-धीरे छोड़ देते सत्संग की बलिहारी सत्संगति किम न करोति पुन साम मनुष्य का क्या मंगल नहीं करती सत्संगति तो सत्संग बहुत पुण्य जोर
करते तब सत्संग मिलता है या तो भगवान की कृपा होती तब सत्संग मिलता है बिनु हरि कृपा मिले नहीं संता बिनु पुण्य पुंज मिले नहीं संत और जा सुज पर सत्य स्नेह हो जिसका जिस चीज के लिए सत्य स्नेह है वह उसे मिल जाता है तो अति अंदर में उत्कंठा होगी तो भी सत्संग मिलेगा पुण्य जोर होगा तो भी सत्संग मिलेगा भगवान की कृपा तो भी सत्संग मिलेगा अपना पुरुषार्थ पुण्य जोर और भगवान की कृपा तीनों में से कुछ होगा तभी आदमी सत्संग में जा सकता है बैठ सकता है और सत्संग में जब यह साधना
होती है जप होता है तो रक्त के कण पवित्र होते मन पवित्र होता है फिर शवास उ शवास की साधना करें 20 टका 25 टका 15 टका जितना स्वास ताल बंद होगा उतना टका शवास कम खर्च होगा समझो एक मिनट में 13 स्वास खर्च रहे थे तो स्वास गिनते जाओगे तो आदत पड़ जाएगी थोड़ी तो फिर स्वास ताल बध चलेंगे तो 10 शवास में काम हो जाएगा तो जहा 130 श्वास खर्च होते थे वहां 100 होंगे 13 की जगह पर 10 हो गया न हो गया 12 हो गया तो जितना ताल बध श्वास होगा उतना
मन भी चंचल कम होगा उतना दूसरे के मन के भाव को भी समझ सकेंगे कि हमको पटाता है हमको घुमाता है द्वेष वाला क्या करता है सब पता चल जाएगा सहज में तो इंद्रियों का स्वामी मन है और मन का स्वामी प्राण है और प्राण कई लोग ऐसे स्वास खर्च कर लेते हैं ऐसा नहीं कि 60 साल लिख के आता है नहीं 10 करोड़ या 10 अरब छ करोड़ 13 लाख 12 212 स्वास है आपके तो आप 13 नहीं ले सकते एक शवास भी आप ज्यादा नहीं ले सकते फिर चाहे धीरे-धीरे शवास खर्च करें समझो
इतने पैसे आप धीरे-धीरे खर्च करें या होटल में जल्दी खर्च करें होटल खाली करना पड़ेगा ऐसे शरीर छोड़ना पड़ेगा इसी कारण चांग देव ने स्वासो की उपास धारणा किया और 1300 साल तक जी वशिष्ठ महाराज 6 हज वर्ष तक जी चौन ऋषि भी काफी जी दूसरे भी कई महापुरुष काया कल्प करके शरीर के कणों को बदल के स्वास की उपासना करके फिर से लंबा समय लेकिन अंत में शरीर तो मरने वाला है लंबा समय जीने के बाद भी शरीर तो मरता है शरीर मरने पर भी जो नहीं मरता है उस सोहम की साधना व मैं
ही हूं सब में अनेक रूपों में मैं वासुदेव मही माना सब में बस रहा है वह आत्मा वासुदेव सब वासुदेव बंदर में भी वासुदेव है तो बंदर को क्यों मारते हैं क्यों बंदर से मजाक करते हैं ये करते हैं सब वासुदेव की लीला है एकही वासुदेव अनेक रूप में लीला कर जैसे आप ही चैतन्य आत्मा है फिर स्वपने में कोई मारने वाला कोई मरने वाला कोई देखने वाला कोई हंसने वाला कोई रोने वाला यह स्वपने की लीला उस समय बड़ा दुख सुख देती है लेकिन सब आत्मा की सत्ता से ही होता है ऐसे यह सब
आत्म सत्ता का विलास है स हम स्वरूप की उपासना करके समझ जाता स्वास ले फिर आकाश की तरफ एक टक देखे देखे देखे अपने को आकाश रूप चिंतन करने से भी हृदय आकाश चिता आकाश और चैतन्य आकाश की एकता हो जाती है प्राण पान को सम करते हैं शवास लिया रोग का धीरे-धीरे छोड़ा धीरे-धीरे प्राण पान की गति सम करने से सक्षम का द्वार चल पड़ता है स्वभाव में बड़ा आनंद आता है और बाह्य सुख की गुलामी का हो जाती शरीर को साफ सुथरा पवित्र रखे जिस किसी को छुए नहीं तो फिर और शरीरों से
घृणा होने लगेगी काम विकार आदि से बेटा अच्छा चलता है तो इतना फायदा नहीं जितना बेटा या पत्नी या परिवार वाले अपने से गलत चलते हैं अच्छा चलेंगे तो मोह ममता में समय बीत जाएगा बुरा चलेंगे तो वैराग होगा इसीलिए भगवान की कृपा है राजे लोग देखते थे कि हमारा बेटा हमारा कहना नहीं मानता है ऐसा है वैसा है दुखी होते थे फिर जब सत्संग मिलता था तो समझते कि भगवान की कृपा है कहना मानता तो हम ममता में मर जाते नहीं मानता तो ठीक है वैराग हो गया आजकल का जमाना तो बच्चों का बच्चियों
का स्वभाव ऐसा बना दिया टीवी ने और अखबारों ने और वातावरण ने कि मां-बाप का कहना ही नहीं मानू उल्टा चले तो मां-बाप को भी वैराग आवे पहले तो सत्संग से विवेक से वैराग आता था कि लोग एकांत में चले जाते थे अब तो इतना विवेक वैराग नहीं रहा तो गड़बड़ से वैराग दिलाते भगवान कि चलो बेटे गड़बड़ करो बेटियां गड़बड़ करो भाई गड़बड़ करो संसार से वैराग आए महाभारत में लिखा है दो शब्दों से बंधन है और तीन शब्दों से मुक्ति ममा यह मेरा है बेटा मेरा है पत्नी मेरा है धन मेरा है ममता
मम मम से बंधन है ना ममा य मेरा नहीं है मुक्त हो गए हमको मुक्ति चाहिए तो मुक्ति कोई आकाश पाताल में नहीं है ममता का त्याग हो गया तो आ सक्ति का त्याग हो गया मुक्त है तो ऐसे ही समय पाकर मुक्त हो ही जाएगा मर ही जाएगा और मन में आसक्ति नहीं तो दोबारा जन्मना नहीं है भगवान का ध्यान भजन आनंद लिया तो उस आनंद में लीन होना है तीन चीजें बहुत दुर्लभ है एक तो मनुष्यवकाशा मेरा सिर दर्द है मेरा छोकरा मैं कहना नहीं मानता मेरा धंधा नहीं चलता तो महा पुरुष का
संपर्क का फायदा ऊंचा नहीं लिया मोक्ष की इच्छा नहीं है मनुष्यवकाशा तो ऐसे कंकड़ पत्थर चाहता है दुख आए तो दुख में डूब ना जाए सुख आए तो सुख में चिपक ना जाए सुख और दुख को बीतने वाला समझे आखिर कब तक संसार बड़े-बड़े राजे ऐसा बनू वैसा बनू लेकिन जो बने उनका क्या है मैं ऐसा बन जाऊं मैं ऐसा बन जाऊ लेकिन तू बन जाए उसके पहले जो बन गए वो कहां गए कुछ बनने की इच्छा आवे उसके पहले विवेक हो कि वो बन गए ऐसे बन गए फिर क्या हो जाएगा मैं नेता बन
जाऊ मिनिस्टर बन जाऊंगा तो आज तक के मिनिस्टर उने क्या ले लिया मैं बड़ा सेठ बन जाऊ तो क्या झक मार लेगा अरे मैं कौन हूं अपने आत्मा को जानल अपने परमात्मा को पा मैं डॉक्टर बन जाऊं मैं वकील बन जाऊं मैं फलाना बन जाऊं मैं फलानी बन जाऊं तो क्या झक मार लेगा बनेगा वो बिगड़ेगा जानेगा वो अपने आत्मा को जानो जक मिले तो राम मिले अगर मिले तो प्रभु मिले रानी मिली राजा मिला बेटा मिला बेटी मिली आखिर क्या झक मारा ज कर मिले त राम मिले सब मिल तो छा थयो दुनिया में
दिल जो मतलब पूरो थयो तो मन की वासना पूरी हो गई तो इच्छाएं पूरी हुई तो क्या बड़ी बात ई भगवान मिले भगवान का ज्ञान मिले भगवत शांति मिले भगवत सु सुख मिले ऐसा मिले कि बिछड़े नहीं पत्नी भी बिछड़ जाएगी पति भी बिछड़ जाएगा पद भी बिछड़ जाएगा जो नहीं बिछड़े व है अपना आत्मा उस आत्मा में शांति उस आत्मा को सोहम स्वरूप जाने वही हूं मैं जो इन आंखों से देखता हूं वह सभी की आंखों से मैं ही देखता हूं मन अलग अलग है शरीर के मॉडल अलग अलग है लेकिन मैं एक ही
हूं सब ओम ओम ओम इस प्रकार का दृढ़ ज्ञान करें प्रीति पूर्वक भक्ति करें सत्संग का तो आदर करें सेवा भाव से काम करने से मन में आनंद रहता है काम में लापरवाही नहीं करना चाहिए काम में चोरी नहीं करना चाहिए जब काम करे तो ईमानदारी से करे तत्परता से करे और द्वेष नहीं रखना चाहिए कपट रखने से अंतःकरण मलीन होता है कपट गांठ मन में नहीं सबसे सहज स्वभाव नारायण ता दास की लगी किनारे ना हो कपट गांठ मन में नहीं द्वेष कपट मन में नहीं सबसे सहज स्वभाव जो अंदर है वही बाहर कपट
गांठ मन में नहीं सबसे सहज स्वभाव नारायण दास की लगी किनारे ना व जन्म मरण के किनारे लग जाएगा संसार के दुखों से किनारे हो जाएगा शांत बैठे रहो शवास गिनो मानसिक थकान मिटेगी बौधिक थकान मिटेगी भगवान में दृढ़ भक्ति हो जाएगी सुबह नींद में से उठकर शवास गिन और शांत मथा टेक कार्यक्रम में पड़े रहो नींद में से उठ दो पाच मिनट तो जरूरी बड़ी शांति मिलेगी फिर बैठ के स्वासो स्वास गिनो श्वर दुनिया की चीजों की क्या इच्छा करना अपने परमात्मा में आत्मा में खुश र की करना है मरे तो पिया याद करे
मरा पिया क है व थारा बाप पड़िया है कि कर लेयो थे कौन ले गयो मरा पिया क है मरा सरा क है मरा टाबरा कटे व मारी खेमी कटे रे ख रेमी कटे रे अरे चोपो कटे चपा जी अरे चपाया बेटा क जा र बेटो की कर भेड़ो आवे के चप कटे मयो कटे है यो कटे है म चिक कटे है छलो कटे है अरे मैं अमर आत्मा हूं शरीर मरे र मैं तो अपने आप में मस्त हूं मने मारे वो कोई तलवार नहीं कोई मौत नहीं मौत री मौत हो जाए मरा आत्मा रे
ह तो मैं तो अर आत्मा हूं ओम हरी ओम ओ हमारा आत्मा रो विचार करे तो हमारा आत्मा रे पाम चकला चोपान विचार कर तो अपन सख सखो विचार कर तो सखो याद आवे तो ही मरे कबीर जी कहा कि भाई तुम आया करो कथा में बोला हां महाराज मेरा छोकरे की सगाई हो गई है शादी हो जाए फिर आऊंगा छोकरे की शादी हो गई बोले अब तो आओ बोले वो जरा मेहमान आता जाता है परणा महाराज थोड़ा दिन के बाद आऊंगा ऐसे दो साल बीत गए बोले अब तो आओ बोलो वो छोकरा की महाराज
बह है ना बह मेरी वो मां होने वाली छोकरा मेरा बाप होने वाला है मैं दादा होने वाला हूं घरे टाबरा टाबरा टाबरा वो जरा भाले फिर कथा में आंगे टाबरा का टाबरा हुआ पोटो थयो अब तो कथा में आओ अरे बोले महाराज आप मेरे पीछे क्यों पड़े दूसरे नहीं मिलते क्या कभीर ने हाथ जोड़ लिए दो पाच साल सात साल गुजर गए कबीर फिर क देखा कि व कहां गया खेत वाला दुकाने भी थी खेत भी ता बोले वह तो मर गया कबीर बोला मर गया क्या कि मरते मरते वह सोचता था कि मेरा
खेत का क्या होगा दुकान का क्या होगा कबीर ने ध्यान लगाकर देखा कि दुकान में चूहा बनाए के खेत में बना ध्यान करके देखा तो आरट में बंधा है बैल बन गया उसके पहले बोले हल में जूता था फिर गाड़ी में जूता अब बूढ़ा हो गया क्या कबीर देखा के थोड़े थोड़े दिन में आते जाते रहे फिर व बुढे बेल को बेच दिया आपके काम नहीं करता तो तेली के पास बेच दिया 50 तेली ने भी थोड़ा तेल निकाला उसमें से फिर तेली ने भी बेच दिया और कसाई ने बिस्मिल्लाह अल्लाह अकबर चुरा फिरा दिया
चमड़ा उतार के नगार वाले को बेच दिया और टुकड़ा टुकड़ा करके मास बेच लिया कबीर जी ने साखी बनाई कथा में तो आए नहीं मरकर बैल बने हल में जूते ले गाड़ी में दीन फिर गाड़ी में दिया हल नहीं खींच सका तो छकड़ा में दिया बेल बने हल में जूते ले गाड़ी में दीन तेली के कोलू बने फिर कसाई घर लीन मास बिका बोटी कटी मास बिका बूटी कटी मास बिका चमन मढी नगार कुछ कर्म बाकी रहे तिस पर पड़ रहे हो मा धम ममम वो डंडे पड़ रहे हैं क से नगार पर डंडे पड़
रहे हैं अभ कर्म बाकी है तो डंडे पड़ रहे पुट के डा मुझ रानी के ड राजा के डंडे पड़ेंगे फिर मेरा परमात्मा कहां है हमारा आत्मा कहां है यह तो मरने वाला शरीर मर रहा है सपने जैसा बेटे बेटी का सपना संसार सपना हो गया लेकिन वो बच बन में जो मेरे साथ था शादी में साथ था बुढ़ापा में साथ है मरने के बाद भी जो साथ नहीं छोड़ेगा वो मेरा प्रभु आत्मा कैसा है ओम आनंद ओम शांति ऐसे करके उस आत्मा को जाने तो मुक्त हो जावे अने छोरा का क्या होगा अने खेती
का क्या होगा तो बैल बनो बेटा जा बैल बन के भी तो खेती तो संभाले नहीं बुढा हो गया तेली का कुल बना फिर कसा घर बिका इसलिए मन को संसार में नहीं लगाना नाव पानी में रहे लेकिन पानी नाव में नहीं रहे शरीर संसार में रहे लेकिन अपने दिमाग में संसार नहीं उ अपने दिमाग में तो ओ आनंद ओम शांति ओम माधुरी संसार स्वपना परमात्मा अपना मन त ज्योति स्वरूप अपना मूल पछा अपने आत्मा मूल को जाने की कर मर मरा पिया कटे है वो लक्ष्मी चंद सेठ कलकता रो मरवा पयो तो शवास निकले
कोई नहीं स्वास परट मरा पिया क पिया क ब्राह्मण ने देखा कि इसका तो मन पिया में लगा है कंठ में स्वास है डोकरा मरता नहीं तो छोरों ने द रुप का पाच रुपए का बंडल दो चार रखे तो बोले अत पया मैं तो करोड़ ब अ जी तोले नहीं कप [संगीत] भ कंजूस री औलाद कंजूस नोटरी थापी का क्या डक ले मरे के दान करना पड़ेगा के छाती रो तो फिर अ में देना पड़ेगा आश्रम में देना पड़े कटे तो फिर नोट की गड्डी खोली 50 50 और छूटा किया छूटा करके इतना ऐसा छाती
पर रखा क्या अया पया तोरि थे तो भी आ गया मराया क थारा बाप थारी छाती है की कर ले जाए तोत अरे भगवान में मन लगा आया पिया में मन लगावे बेईमानी में कपट में मन लगावे सेवा करे तो आनंद आवे भगवान तो देखे कोई नहीं देखे तो भी कर्म तो भगवान तो देखे भगवान मार आत्मा है हरि ओम हरि ओम ओ ओम शांति शिव जी कहते हैं उमा कह में अनुभव अपना सत्य हरि भजन जगत सब सपना भगवान का सुख भगवान का शांति आनंद सच्चा है जगत सारा सपना है ओम शांति