ओम श्री परमात्मने नमः ओम श्री परमात्मने नम ओमकार मंत्र ओमकार मंत्र गायत्री छंद गायत्री छंद परमात्मा ऋषि परमात्मा ऋषि अंतर्यामी देवता अंतर्यामी देवता अंतर्यामी प्रीति अर्थे अंतर्यामी प्रीति जपे विनियोग जपे विनियोग देव आधीन जगत सर्वम मंत्र आदिन स्य देवता सारा जगत उस अकाल पुरुष परब्रह्म परमात्मा देव के आधीन लेकिन वह परमात्मा देव अपने नाम के आधीन रामन सक नाम गुण गाए भगवान भी भगवान के नाम की महिमा का पूरा बयान नहीं कर सकते भगवान ने तो न पे तुले तारे लेकिन भगवान के नाम ने तो अगनि तारे हैं तार रहा है और तारता रहेगा भगवान
के नाम का इतना बड़ा भारी प्रभाव उस भगवान के नाम में अगर ओम भरा है तो हो ओम के साथ हरि मिल गया तो जो पाप को ताप को दुख को शोक को अयोग्यता को हर लेता है व हरति शोका नहीं दुखानी पात कानी इति श्री हरि वेद सबसे प्राचीन सद ग्रंथ है वेद के समान दुनिया में और कोई ग्रंथ था नहीं है नहीं हो नहीं सकता वैदिक संस्कृति अति प्राचीन सनातन संस्कृति मानी जाती है कई मजहब मत पंथ पैदा हो हो के कई लीन हो गए कोई 100 साल जिया कोई 200 साल कोई 50
साल कोई 500 साल तो कोई 2000 वर्ष लेकिन फिर विलय हो गया सनातन संस्कृति अनादि से चली उस सनातन संस्कृति का ऐसा बड़ा भारी प्रभाव है कि आप अब भी इस समय यही उसका महत्व समझ सकते मंत्रों में बड़ी भारी शक्ति एक मंत्र है जिसको निंद्रा नहीं आती वह अगर जप करने तो कंपोज फाई लेने [संगीत] वाला उदयपुर का बमन दास उद्योगपति नींद नहीं आती थी और इस मंत्र से उसको ऐसी अच्छी नींद आई कि अभी 70 साल का बोलता मैं 70 बात का मजे से सता हूं जवानों के जैसा काम कर मंत्र आयुष्य में
आरोग्य में पुष्टि में बुद्धि में शुद्धि में योग्यता में सब में सहायता करता है म मंत्र में चार बातें होती है व्यापक की श्रद्धा जितनी दृढ़ हो श्रद्धा फिर दूसरा सद चरित्र ऐसा नहीं कि धर्म के माल नाम पर माल दूसरे का अपने पास धर्म के नाम पर अपने बेटे बेटी की शादी अच्छी कराना यह उद्देश्य नीचा है धर्म के नाम पर धर्म ईश्वर के नाम पर ईश्व उद्देश्य हा हा ऐसे लोग होते हैं उद्देश जिन का ऊंचा तो गुरु की हृदय गद्दी पर अपना नाम लिख गुरु गोविंद सिंह के ऐसे से एक जमीदार था
बड़ा नाम धान थाम घर में उसने अपने कुल देवी का मंदिर भी बना उसके बाप दाद बड़ी थाम झाम से पूजा उसने सुना कि गुरु बिना गत नहीं शाह बिना पतनी गुरु गोविंद सिंह के पास आया कि मुझे [संगीत] आपका शिष्य बना बोले गुरु के शिष्य बनने की लाकात बोले महाराज तुसी जो आख दे में सारी शर्ता कबूल करना बोले पहले तो तुम्हारा जो कुल परंपरा का घर में मंदिर है और तुम बड़े जमीदार सेठ होके प्रतिष्ठित हो रहे हो धर्म के नाम से यश कमा रहे हो उस मंदिर को तोड़वा दो अगर मेरा चेला
बन जमींदार की छाती पर तुम्हारा पहाड़ गिरा ले कोई पुण्या होगी य कथा है शास्त्र में गुरुवाणी के ग्रंथों के आधार पर बोल रहा हूं मैं हलीमा वाली किताब पर नहीं उसका रूप है प्रमाण है मेरे पास उसने उस मंदिर मंदिर को हटवा दिया बाप रे बाप जमीदार का जो नाम शान मिट्टी में उसके बेटे की शादी के लिए कोई धनी का ऑफर था लेकिन धनी की जाति उस जमीदार से थोड़ी छोटी थी तो उसने बोला चल रहे ू मुझे इतनी अशरफिया दे देगा तो क्या मैं अपना बेटा तो बेचता हूं तुम्हारी जाति हमारे से
थोड़ा कस्टल की अब तो उसको अपनी जाति वाले जमीदार को कोई कन्या ना दे ब गुरु के पास आते जाते जमीन जागीर पर ध्यान कम हो माल मिलकर धीरे धीरे धीरे धीरे बिखरती लोग बोलते गए कि जब से गुरु गोविंद सिंह के पास गया तो कंगाल होने लग गया मने मेने लगे तो लगने अब तो उसकी जमीन जागीर तो बिक गई एक साधारण किसान की स्थिति में भी नहीं रहा फिर भी गुरु के पास आता साधन भजन करता सेवा कर गोविंद सिंह ने कहा मुझे 1000 रुपए मतलब आज के 7 हज उस समय उसके लिए
00 रुपए भी लाना कठिन था चांदी के रुप हजार रुपए चाहिए और इतनी अशरफ चाहिए गुरु जी को तो क्या चाहिए लेकिन देखा के गुरु को समर्पित हो रहा है कि गुरु को समर्पित कर रहा है समर्पित होना कोई बच्चों का काम नहीं गुरु को समर्पित होना यह जमीद बाद में तो बड़ा सिद्ध पुरुष बन गया गुरु गोविंद सिंह की तो जहां शादी ठुकरा दी थी अब पैसे तो है नहीं तो क्या करें कि बेटे की शादी उस जमींदार से करा दे मिलके जाती स्नान अ शर मिलेगी गुरुजी तो अपने बेटे की शादी नीच जाति
में गुरु कोशर देने दिन बीते महीने बीते बहु आईने तो रिश्ते नाते सब काट मंदिर तोड़वा दि जमीन चली नीच जाति में बहु लाया उस समय तो जाति पाति का बड़ा था छूत छात पड़ी और भी समय ने करवट ली अब तो खेत खली में काम करने के दिन आ गए मजदूर कहां तो बड़ा जिमीदार छोटा जिमीदार जमीने बिकी रुप पैसे भरने गुरु जी का आजय भंडारा करवा दो आज यह करवा दो सारा अपने को धन से चौपट कर दिया तन से गुरु के द्वार पर सेवा कर जितना विद्यार्थी आगे बढ़ता है उतनी परीक्षा के
अच्छे होते हैं बड़े हो केजी के पेपर से मिडल के मिडल से कॉलेज के कॉलेज से पीएचडी गुरु जी ने कहा अब मुझे इतने रुपए और इतनी अशरफिया और चाहिए गुरु जी जानते थे उसकी स्थिति नहीं इधर उधर करके अपना घर का समान विमान सब बेच बाच के भी वो शर तो नहीं हो सकते थे लेकिन क्या करें गुरुजी की सेवा में गुरु की सेवा साधु जाने गुरु सेवा क्या मुड [संगीत] पिछा उसने अपने पत्नी का जो कुछ पुराने जो कुछ थे ग बहु को जो मिला था वो सारा का सारा ले दे फिर भी
थोड़े से रुपए खट रहे थेसे भारी ब्याज प लाके दे दी मैं रोज दहन कीी कमाऊ उसमें चुकाऊ और मेरी पत्नी भी खेत में काम कर लेगी क्या फर्क पड़ता है आखिर महाराज वो पति पत्नी खेत खली में काम कर गुरु ने देखा कि खेत खली में काम करते हैं बोले तुम खेत खली में काम करते हो क्या गुरुजी गुजारा हो जाता इधर तो देर होती है लंगर की सेवा हां तो गुरु भी सुबह 4 बजे से 7:00 बजे तक लंगर का नाश्ता वास्ता बना के कुछ सेवा करके चले जाते खेत खली में काम करके
आते फर शाम की लंगर की सेवा कर श्रम अधिक होने से शरीर भी ऐसे वैसे हो गया गुरु ने कहा लंगर की सेवा तो करते लेकिन लकड़ियां है नहीं लकड़ियां खरीदनी पड़ती है अपने को लकड़िया लाया करो तो लकड़ियां लाते लाते एक बार चक्कर आए तो कुए में गिर पड़ा लंगर में लंगर बनाने वाला तो आया नहीं लकड़ियां भी नहीं आई क्या गुरु ने देखा कि रुकने वाला तो नहीं कहां से आता जंगल में च आवाज मारते मारते मंजू मंजू ओ मंजू बेटे मंज मंज तो कुए में से आवाज गुरुजी ओ बेटा कथे मंजे गुरुजी
कैसे लंगर बनाक फिर जाता था घर खाने को व पत्नी ने खेत से आई नहीं थी खाना नहीं बना दो दिन की भूख थी लंगर की सेवा करता था लेकिन खाता था घर का जय राम जी [संगीत] की फ बोले लोग बोलते हैं मंज पागल हो गया मूर्ख हो गया ऐसा हो गया लेकिन गुरु जी आपनी कृपा है गुरु ने कुछ भगत भेज दिए भिड़ा चढ़ा के गुरु जी खिसक गए बोले मंज अभी भी तू सावधान हो जा इतना बड़ा जमीदार था इतनी दुकान थी मंदिर था गहने गांठे थे सारे तबाह हो गए घर की
रोटी खाता है लंगर बनाता है फिर गुरु ने बोला लकड़ियां करब तू लकड़ियों सहित कुए में गिराया और गुरु जी सुन के चले गए अभी भी समाज के लोग तुझे समझाते उस रास्ते चल मंज ने कहा आप मेरे को अच्छी सीख समझ के देते वह तुम्हारे पास नहीं बोले तू ठगा जा रहा है बोले कई जन्मों तक अकाल ने ठगा है अकाल पुरुष को दिखाने वा वाले महापुरुष के हाथ से ठगे भी जाएंगे फर्क नहीं पहना तो सीधे से रास्ते आए चले जाओ श्रद्धा तोड़ने वाले सारे प्रसंग सुना के थक गए लेकिन मंज का चित्र
नाडोल नहीं गुरु जीी आए बोले मंजे क्या है बोले गुरु जी कुछ पागल लोग आए थे बोल रहे थे ऐसा वैसा मैं नहीं सुन तोब क्या करेगा गु जी आपकी जो जी लोग तो बोलते कि मंज तो डूब गया डूब गया गुरु जीी मैं लोग बकने दो मैं डबया नहीं मैं तो मेरे सारे संसार सागर से तारने वाले मेरे सतगुरु के ओट प आऊ यह पानी की डुबाना मैं कुए तो पानी की डुबाना है तो छाती तक है और संसार सागर से तारने वाले सच्चे पाशा द को शरण व बक र के तो डूब गया
कुए में डूब गया गुरु ने कहा बेटा मुंज गुरु दा बोय था मुंज गुरु द बोय था जग तारण हार तू दुनिया को तारने वाला हो जाएगा गुरु ने सीडी बीडी मंग मंज को बुलवाया बाहर गले लगाया मंत्र दीक्षा लेनी है तो मंज से र जाओ मंज गुरु द बोय था जग को तारण हार दूसरे को तारने का नाम दान देने की अथॉरिटी गुरु के द्वारा पा सकता है उसके ने का तो कई संशय भी नहीं लोग तो अपने आप गुरु बन जाते हैं गुरु जब कह देता तब गुरु खुद तरता है दूसरे को तार
सकता नहीं तो खुद भी डूबता है दूसरे भी डूबते मेरे गुरु जी कहते थे गोपो विजी टो स्कीट होगा धर्म को धंधा बना दिया धर्म को वावा का साधन बना दिया ऐसे लोग डूबते संसार चलो अच्छी जगह पर रहे गुरुजी के नजदीक रहे हमारे बेटी बेटी की शादी बढ़िया हो तो आप धर्म का दोहन करते धर्म की रक्षा नहीं करते धर्म का दोहन करते आपके जीवन में बरकत खुशी आना सचाई आना मुश्किल है ओ [संगीत] ओ वशिष्ठ जी बोले हे राम जी जिस पुरुष से शांति प्राप्त हो उसकी भली प्रकार से सेवा करनी चाहिए क्योंकि
उसका बड़ा उपकार है कि संसार समुद्र से निकाल लेता है परमात्मा शांति से बढ़कर और कोई सुख त्रिभुवन में नहीं परमात्मा शांति धन से बड़ी है सत्ता से बड़ी है परमात्मा शांति अष्ट सिद्धियों से बड़ी नव निधि से बड़ी ऐसा करके य लोहे को सोना बनाने वाले संतों से मेरी दोस्ती थी नारायण को लोहा को सोना बना के दि सचमुच मेरी अंगूठी भीले के बोले तो है ही सोने की इसको म य करके सोने का सामान निकाल के ऐसे संतो से लेकिन हम सब छोटी चीज लग परमात्मा शांति के आगे इसका [संगीत] क्या प्रधानमंत्री पद
से भी ऊंची है सोना बनाने की सोना बनाने की और य रिद्धि सिद्धि से भी अष्ट सिद्धि बहुत नव उससे भी भगवान का दर्शन ऊंचा है भगवान के दर्शन से भी भगवत शांति बड़ी चीज य भगवत शांति जिन पुरुषों के संपर्क से प्राप्त होती उनका बड़ा उपकार भगवत शांति नहीं मिली तो 84 में मटके जीव शांति और आनंद चाहता जहां भगवत शांति वहा आनंद है आनंद और भगवत शांति दोनों एक सिक्के के दो कहल राम जी जिनसे शांति प्राप्त हो उनकी भली प्रकार सेवा करनी चाहिए बड़ा आदर करना ब्रह्म ज्ञानी संग धर्म राज करे सेवा
ब्रह्म ज्ञानी का दर्शन ब भागी पा ब्रह्म ज्ञानी को बल बल जा ब्रह्म ज्ञानी महापुरुष के संग से शांति मिलती परमात्मा शांति लेकिन लोगों को कदर नहीं होती फर ज्ञानी अपने को समेट लेते छुपा लेते लोग घंट घड़िया बना बजाते रहते किताबें पढ़ते रहते हैं जलाश में नहाते रहते हैं तीर्थ में नहाते रहते ठाकुर जी का प्रसाद खाते रहते और जहां सब गए वही खप जाते हैं अपने आत्मा में नहीं जा पाते भटक मुआ भेदु बिना पावे कोन उपाय खोजत खोजत युग गए युगों से जीव भटक रहा है सच्चे सुख और शांति के नहीं मिला
तो फ कच्चे सुख और कच्चे सुविधा में तो जन्मो मरो जन्म म मेरा नाम हो मेरे चेले हो मे पैसा हो मेरी इजत हो मेरा लेकिन जो जल जाएगा शरीर उसी की इजत आब और क्या जो पानी की बूंद से बना है शरीर उसी का नाम होगा तेरे को क्या मि जिसको जला देना है उसी को थोड़ी सुविधा मिल गई उसी को थोड़ महल माया मिल गई तेरे को क्या मिला त ता रह गया तो कंगाल रह गया धन भाग ये है मुंज जो गुरु की महिमा को जाना था मेरे को मुंज मिले तो मैं
मुंज के पैर पक कैसा समर्पण सत शिष्य गुरु के कुछ कुछ वफादार ईमानदार शिष्य कृपा पात्र विशेष होते हैं एक कृपा पात्र शिष्य को देख के दूसरे शिष्यों को थोड़ा दाह होती थी गोरखनाथ सी शिष्यों को ले ग घूमने के बाने फ एक पेड़ के नीचे त्रिशूल गाड़ के दूर जाकर बैठ गए दोन शिष्यों को सत्संग सत्संग सुनाते हुए संदीपकुमार संदी पक हो गया वेद धर्म गुरु का चेला और ऐसा था समर्पित है य सुना के फिर गुरु ने कहा जो मेरा कोई चेला हो तो उस पेड़ पर डाली प चढ़ जाए और त्रिशूल के
ऊपर जंप मारे तो मैं मानूंगा कि समर्पित है नहीं तो सब आराम ख है तो सब एक दूसरे का मुंह देखने लगे एक ऐसा था जो सचमुच में समर्पित था मनही मन गुरुदेव का ध्यान करके पेड़ पर चढ़ दूसरे चेले देखने लगे गुरुजी देख लो बोले [संगीत] देखो उन्होंने सोचा कि गुरु उसको मना करेंगे य करेंगे वो तो जा रहा है और गोरखनाथ चले गए पीठ दे के शिश ने देखा अब तो पहुंच गया आप अब क देगा नहीं लेकिन वो सचमुच कूद गया सचमुच कद गया तो चीख लेन गोरखनाथ की अदृश्य संकल्प छोड़ दिया
महापुरुष जैसे आप उसी में बैठे बैठे उसको कुछ छट सारे समर्पित धोखे बाज जो थे रोटी तोड़ने वाले सारे पीले पड़ गए समर्पित कन है वो अलग से र गया रोटी तोड़ने वाले अलग हो गए और सच्चा समर्पित अलग हो गुरु गोविंद सिंह ने कहा कोई बात नहीं मेरी इस पर ज्यादा कृपा थी योग्यता थी उसमें पात्रता थी तुम भी भजन करो लेकिन जितना हो सके मन की बेईमानी से थोड़ा पि छड़ ल बाजी हल जतन यार फकीर साई अला खासर साही जिक्र फिक्र माल से भी भर दे और फिक्र से भी भर दे ऐसे
महापुरुष लिएने पतन के रास्ते नहीं जो समझ गुरु की कृपा के हमको सिखाने के लिए कैसा कैसे प्रयोग करते वो तो भाव से भर गए कुछ न फट थे तो बोले चलो आपने तो चले जाए तो अपना करेंगे क्या इर तो अपनी कोई वल नहीं ऐसा सोचने वाले तो भाग गए लेकिन जो समझते थे नहीं वैल्यू होहे नहीं अपना य जीवन मृत्यु अपना धर अच्छा है दूसरों को भी सुधारने में सफल हो ऐसे लोग दूसरों को भी सुधारने में सफल हो गए जो सीधा हर्थ लिए और लोग खुद भी तार गए दूसरों को भी र
जो लुंगे टाइप के थे फरियाद टाइप के थे व तो खुद भी डूबे दूसरों को भी डुबा दे और जिनकी फरियाद नहीं थी जो मिला पड़े रहे आचा को कोई फरयाद नहीं ऐसे लोग सीधा अर्थ लेकर त सुमति कुमति सब के रा रहे शुभ और अशुभ सबके अंदर में रहता है जब सीधा अर्थ लेते तो शुभ बलवान होता उल्टा अर्थ लेते तो अशुभ बलवान खंडू गांव में झाड़ों में तो सर्दी खूब पड़े बारिश इसमें बारिश एक बार खूब तड़के की हो गई तड़के की बारिश ने ऐसा वातावरण कर दिया महाराज एक दिन दो दिन पड़ती
रही बारिश तो दलदल इतना कि गायों के लिए चारा लाना मुश्किल हो गया नानक जी थोड़े चिंतित थे भाई लहना को पता चला चौधरी लना को उस समय तो पक्की सड़कें भी नहीं रही वो घुटने भर के दलदल को चीरते हुए चारा ले आए हम सोचते थे कि हमने गौशाला का झंझट मोल लिया लेकिन नानक जी भी यह सब करत ग गौशाला का आज यह हो गया आज वो हो गया सोचा कि यह क्या झंझट बढ़ा दिया लेकिन वह झंझट नानक जी के लिए भी था हमारा तो ट्रकों में आ जाता है चारा उनका तो
सिर पर उठा के लाते थे वो जमाना भाई लहना इतना नानक जी को ठीक से जानने में समर्थ सक्षम हुआ कि नानक जी के बेटे भी पीछे रह गए श्रीचंद और लक्ष्मी एक रात को नानक जी ने पस महीने की ठंडी पंजाब द ठंडी बेटों को उठाया कि जाओ मेरा कुर्ता और धोती धो किया वो बोले पिताजी तुसी ख्याल करो न राहत है उठ दे सीसी कुल्फी हो दे कुल्फी कुल्फी शब्द तो मैंने मिलावट की सवेरा होगा कर लेंगे बेटे तो सो गए लहना ने सुना सच्चे पातशाह मेन वो गए नदी पर धो धा के
आए वो रोते सूर्य के किरण लगे सखे उन्होंने पहना बेटे आए बोले लाओ पिताजी वो धो आए अरे बोले कितने कपड़े बोले बोले तो साफ है बोले वो धो के आया सक भी गए पहन तो भाई लना गुरु की सेवा की महिमा जानता था गुरु की सेवा साधु जाने गुरु सेवा क्या मुड बिछाने जो अपना नाम करना चाहते हैं तो समझो देह को सच्चा मान है और ईश्वर आत्मा का गला घोट अपना नाम करना चाहते हैं वे लोग ना गुरु की सेवा कर सकते ना आत्म साक्षात्कार कर सकते हैं वो मान के भगत हो जाते
हैं मान पुड़ी है जहर की खाए सो मर जाए चाह उसी की रागता वो भी अति दुख अमानी तोव अदा भी तोम आर जो हस्ते ब्रह्मचर्य सब सदगुण चाहिए तब सत्य में बराबर स्थिति होती ये सारा गुरु भक्ति योग से सदगुण भाई लना में आ गया था तो नानक जी ने परीक्षा लेना चा फिर नानक जी एकांत में रहते तो लोग भी चलो भाई बाबा जी आते नहीं तो असी जाओ अी जाओ खंडू गांव में सुबह सुबह ध्यान से उठ के जरा घूमने जाते तो लोगों के झुंड खड़े हो जाते बाबा जी कुछ वचन सुनाओ
चलो बैठो भाई सुना देखा किय तो सब प्रवृत्ति छोड़कर बैठे फिर भी यहां भी तो चालू हो गया आश्रम छोड़ के एकांत में बैठे प्रचार छोड़ के एकांत खंडू गांव में आए फिर भी थे भी तो एक दिन सवेरे जो ही लोग आए क्यों आए हो बाबा उठाया डंडा एक दो तीन को ठोक दिया बाल बिखर है गुस्से में सुना दिया कुछ का ऐसा उग्र रूप के लोग तोए कि क्या हो गया वैसे ही कुछ दिनों से तो ऐसे ही थे उग्र आज क्या हो गया कई इधर कई उधर हमारे यह दिन कमाएंगे अला जाने
लेकिन नानक जी का तो सुना तो हमको तोब क्या करें कई जगह ऐसी छुपी हुई बनाई एकांत लेक इन लोगों को पता चल के वहीं भी भीड़ बढ़ा ये भी इसीलिए लिया था जगह न रा की चलो एकदम एकांत यहां ज टीरी भी इसीलिए बनाया दूसरी भी दो चार जगह है इसीलिए बनाई लोक संपर्क नहीं शांति नानक जी को उग्र रूपवा भल भले के छूट जा बाह फिर भी कुछ लोग पीछे पीछे लगे बाल बिखरे हुए कुछ का कुछ सुनाते हुए हाथ में डंड आगे चलते गए नानक के पीछे उनके बेटे श्री चंद लक्ष्मी चंद
भाई लहना और कुछ लोग लगे चलते चलते चलते कोई गा किसी गांव के प दोपहर हो गई जान गए थे कि अभी पीछा नहीं छोड़ा क्यों पीछे पिछ रहे सच्चे पा भूख तो लगी होगी धर उधर देख शमशान के तरफ गए तो शमशान में मुर्दा ढका हुआ था बेटों को लोगों को बोला ले खा लो खालो भूख लगी तो बाकी के जो थे वह भी बिखरे लेकिन लेहणा और श्रीचंद और ये [संगीत] नहीं श्रीचंद लक्ष्मी चंद जरा मुह मोड़ किनारा क्या देखता है खा ले सच्चे पातशाह जो हुकम इधर उधर देखा शमशान के पास में
ज पानी थे हाथ पाथ धोके सच्चे पादशाह आज्ञा करो मुर्दे न पैरों से खावा कि सिर नाल खावा पैरों से शुरू करा कि सिर से शुरू करा सच्चे पा तुसी सचे पाशा प्रसाद सतनाम कता पुरख निर् निर् अकाल मूरत अनी गुरु प्रसाद गुरु प्रसाद है तो मुर्दा लेकिन गुरु प्रसाद गुरु की आज्ञा तो गुरु प्रसाद गुरु की आज्ञा तो मुर्दा भी गुरु प्रसाद होया के जानी जाना लेख कत छटिया किन किन भल हार बसरा तो बसले गुरु पार उतार पा खाते गए खाते गए खाते गए खाते गए मुर्दा तो नहीं है तुम [संगीत] मिठाई रखवा
दिया होगा परीक्षा के लिए कैसे भी होगा दूसरे रह गए भाई लहना को तो गुरु आज्ञा में दृढ़ मानकर गुरु जी का हृदय प्रसन्न हो गया गले लगा लिए और चौधरी लहना तेनू मैं अंग में लगाया सी आज से तुसी अंगत देव होए कौन हुए अंगत देव होए चौधरी लैना का ऐसा भाग्य चमका कि गुरु नानक के बाद गुरु गादी पर गुरु अंगत देव बैठे सिख लोक जानते फर अंगत जो आत्म सुख का अनुभव था वो भी उसको पच गया अगर भाई लहना अपने को पुजवा के लिए गुरु की सेवा करता तो पूजा नहीं होती
लेकिन गुरु की कृपा के लिए ही गुरु की प्रसन्नता के लिए करता था तो अंगत देव बन गए ऐसे ही अमरदास रामदास ये 10 गुरुओं तक पूजवा की वासना नहीं थी कोई भी अच्छे गीत निकलते तो कह नानक नानक जी का नाम डाल देते थे दसों गुरुओं ने अपने नाम की पूजने की वासना छोड़ी तब जब फिर देखा कि अब गड़बड़ हो रही है तो गुरु ग्रंथ बना दिया बस कोई पात्र नहीं मिले ना गुरु गद्दी के योग्य सब अपने को पुजवा की वासना वाले मिले जो अपने को पुजवा की वासना वाले होंगे तो उनका
देह अध्यास होगा दे अध्यास होगा तो सत्य समाज को दे नहीं सकते सत्य के सुख में रह नहीं सकते व्यक्तिगत मान जो है ना दे देह में ले आता है आत्म सुख ऊंची चीज देह में जो रहेगा वह तो फिर भिखारी रहेगा ना बाबाई के सुख चाहिए सुविधा का सुख चाहिए हम बड़े गुरु हैं हमारी सेवा करो हमारा अधिकार है तो कर्तव्य भी है ना गुरु गुरु बनक शिष्य से सेवा का अधिकार चाहता है वह गुरु नहीं है वो तो गुरु है तो फिर नरक गामी होगा मैं गुरु हूं मेरा अधिकार है ऐ से वाले
ने का मेरा अधिकार है दक्षिणा लेने का मेरा अधिकार है ठाट से रहने का वो गुरु नहीं है गुरु है गुरु गुरु लेने के लिए नहीं होते देने के लिए होते शिष्य को ऐसा चाहिए गुरु को सब कुछ दे गुरु को ऐसा चाहिए शिष्य का कछू ना ले और कभी लेते हैं तभी भी शिष्यों के समाज के शिष्यों के हित के लिए लगा दे अपने व्यक्तिगत के लिए ज्यादा आजकल तो लोग भाषण देकर गुरु बन के भी मौज मारने के लिए एक धंधा खोल दिए बिजनेस बना दिया धर्म को तो फिर वह [संगीत] धर्म बिजनेस
की वस्तु रखने से बिजनेस नहीं होता लेकिन बिजनेस के भाव से ही बिजनेस होता है ऐसे तो गांधी जी गांधी जी के आश्रम में कितने ही कुछ कातन होता था साबुन बिकता है यह करते वो करते और भी कई जगह पर सामने वाले की सहूलियत के लिए सामने वाले के सुख के लिए अब आ गए एक सेवक दो सेवक तो चले सैकड़ों और हजारों सेवक आ गए तो उनको काम तो चाहिए रोटी भी चाहिए तो क्या व सेवक भीख मांगे रोटी की हां जी आगे जो भी तुम्हारी इच्छा है सो करो यहां सब गुरुओं के
गुरु भी बैठे हैं उनसे पूछ देखो और जो मुझसे पूछो तो मैं सब शास्त्रों का सिद्धांत कहता हूं जिससे सिद्धता को प्राप्त हो गए हे राम जी संतों और जवानों के अनुसार संवेदन मन और इंद्रियों का विचार रखना और जो इनसे विरुद्ध हो उनको ना करना मान लो आप जो कर रहे हैं समझो गुरु जी देख रहे तो आपको खुश होंगे कि नाराज अग खुश होते वो करो नाराज होगे उससे बचो बस सीधी बात है उन्नति हो जाएगी हमारे गुरु जी को कैसा लगे [संगीत] तो हो गया समर्पण पटा के घटा के अपने मन का
करते रहे तो गुरु गुरु द्रोही बनते रहे गुरु गुरु कहो आत्मा कहो ईश्वर [संगीत] [संगीत] को निज मन माही विचार नारायण जो खोट है उसको तुरंत निकाल तो खोट निकालने का बल कहां से ला इसीलिए साधना है इसीलिए प्राणाया एक महीने के अंदर प्राण ताल ब 25 ट आयुष्य लंबी हो जाए ऐसी योग्यता मन प्रसन्न रहे बुद्धि में दिव्य ज्ञान आ रोग और शोक निवृत हो जाए एक वकील लड़का था उसको तो प्रैक्टिस भी नहीं हो रही [संगीत] थीक और केवली कुंभक पर प्रवचन चला उसने सुना वकील फिर वो करने लग जाता अभी तो अच्छी
वकीला भी करता और नगरा अध्यक्ष भी बना था अमदाबाद का केस ही वो जो ना भूपाल वाला उसका केस भी वही लड़ा था भोपाल के जेल में जो था ना फिर व उधर आ गया जेल से छूट के केस भी वही ल नारायण हरि [संगीत] नारायण हे राम जी दुख के नाश का उपाय यह है कि ज्ञानवान के वचनों की भावना और विचार करके हृदय में धारणा करें इससे मस दुखों के नाश का य सीधा उपाय है कि ज्ञानवान महापुरुष जो बोलते हैं उन वचनों की बराबर धारणा करके हृदय में स्थित करें ज्ञानवान बोलेंगे कि
भाई यह जो शरीर है वो तू नहीं है और यह सुख है वह सच्चा नहीं है दुख भी सच्चा नहीं है मान भी सच्चा नहीं अपमान भी सच्चा नहीं सत्य स्वरूप तेरा आत्मा ही सत्य है तू ज्योति स्वरूप है तू ज्ञान स्वरूप है दुख में विबल मत हो सुख में फस मत कपट करके अपनी आत्मा की अधोगति मत कर बेईमानी करके अधोगति मत कर संसार की लालच करके अपने को नीचे मत ग इस प्रकार का गुरुओ का ज्ञान आत्म साथ करते करते व साधारण जीव महा पद को पा लेते फिर [संगीत] तो मुंज इतना महापुरुष
हो गया कि मुंज की जिन्होंने संगति की और मुंज से मंत्र लिया तो कई लो को अमीर बनाने में सफल हो गया देवी देवताओं के दर्शन तो मुं की कृपा से किसी को भी हो जाए इतना सामर्थ सच्चे पाशा सतगुरु अपने अपने भगवानों का दर्शन कर ले मुंज के संकल्प मेंला फिर तो जो गांव वाले से जिमीदार थे यह वो थे सारे दे सारे बाबा मुझ भगवान द जय हो सच्चे पातशाह मुझे भगवान द गुरु था मुंज मुंज महाराज दी जय हो मेरे को भी कई लोग व्यापारी लोग आते थे अकल देने को भाई भाई
के साथ रहो ऐसा करो इतना भजन मत करो बड़ा सुधारने को आते थे हम तो चले गए जब गुरु की कृपा से लौट के आए तो वही लाइन में लग गए मथा टेकने लगे मैं एक दिन अपने घर में फोटो लगाया संत का तो मेरी भाभी बोलती क्या है ये साधु संतों के फोटो कौन महाराज के फोटो लगा रहे हो दी वालों प मैं क्या यह तो सभी संतों के फोटो लगा रहा हूं मैं भी एक दिन संत बनूंगा लोग मेरा भी फोटो लगाएंगे बोले छोटा मुंह बड़ी बात मेरा तो छोटा था मैं तो ऐसे
ही स्वाभाविक बोल न फिर जब समय बीता और हम गुरु के चरण में गए लौट के जब अहमदाबाद आए और थोड़े दिनों में तो संसार के पछड़ में भाई हो चा भाभी हो सभी को चोटे तो लगती रहती तो किसी ने बोला अरे भाई तुम्हारे वो साई के पास चले जा तो फिर वो साई के पास आते आते उनके थोड़े कोई प्रॉब्लम प्रॉब्लम थोड़े सॉल्व होही जाते हैं सत्संग में आने मनो फिर वो मेरे पास फोटो ले आए भाभी बड़े भाई की पत्नी हम दो भी भाई थे मेरे से बड़े थे मेरे को बोलते साई
साइन कर दो मैं क्या छोटा मु और बड़ी बात याद है ना तुमको मैंने बोला था कि अभी तो हम संतों के फोटो लगाते हम भी संत बनेंगे लोग हमारे भी फोटो लगाएंगे बोले साई अभी तक याद है माफ करो ने भूल जाओ मैं तो आपके भी शिष्या हो ग दया करो ना आप तो हमारे भगवान है मैं क छोटा मुह बड़ी बात मेरे भाई की दुकान पर तो आठ फोटो लग डिफरेंट पोज और भाई दे घर में भाभी के घर में न ल कभी कभार जिसको जिधर प्रीति होती उसके चित्र में उसको आनंद आता
है जिसको नेता बनने में प्रीति होती व नेता कर जिसको संत तो जगाना होता उनको संत में प्रीति होती है तो देर सबर जिसकी जहां प्रीति वैसे ही सदगुण आते हैं जिसका आप चिंतन करते हो तो भगवान में भगवान को पाए हुए महापुरुषों में प्रीति उनके वचनों में प्रीति इससे अपना मंगल हो जाता है कभी भी संत जो बताते तो उसका सीधा अर्थ लेना चाहिए विधे आत्मक निषेधात्मक लेने से सत्यानाश भाई कितनी ऊंची स्थिति वाले हमारी भलाई के लिए हमको बता रहे समझा रहे पामर जीव पापी पात की जीव है जानते नहीं मोह ममता में
पड़े जैसा हमारी मति को अच्छा लगता है ऐसे गुरु को घुमाते और क्या करते इसी का नाम है समर्पण नारायणा हरि नारायणा हरि नारायण ओम नमो प्रीति पूर्वक जो प्रीति पूर्वक मेरा भजन करता है जैसे गाली सुनते ही गुस्सा आ जाता है अपमान सुनते ही चेहरा उतर आता है ऐसे भगवान का नाम लेने से हृदय को मन खिल जाए तो समझो क्या प्रीति पूर्वक है भगवान का ओम नमो भगवते वासुदेवाय ओम नमो भगवते वासुदेवाय ओम नमो भग वासुदेवा वासुदेवाय इष्ट देवाय आत्म देवाय प्रभ देवाय माधुर देवाय ओम नमो भगवते [संगीत] वासुदेवाय ओमम नमो भगवते वासुदेवा
ना श दुरमति हरण भना दुरमति हरण कली में हरि को नाम कली में हरि को नाम निन नान का जो जपे नि दिन नानक जो जपे सफल हो सब का सफल हो सब काम हरि ओ ह ओ हरि ओ हरि सम जग कछु वस्तु नहीं हरि समज कछु वस्तु नहीं प्रेम पंथ सम पंथ प्रेम पंथ सम पंथ सदगुरु सम सज्जन नहीं सतगुरु सम सज्जन नहीं गीता सम नहीं ग्र गीता सम नहीं ग्रंथ हरि ओम हरि ओम [संगीत] हरि हरि [संगीत] ओम जीवन बड़ा कीमती है समय बीता जा रहा [संगीत] है ऊंचा काम बाकी रहा हुआ
है नीचा काम तो हर जन्मों में करते आए पेट भरना बच्चे करना अपनी हेकड़ी दिखाना ये तो हलकट काम तो कई सदियों से कर दि अब तो ऊंचा काम करना है ईश्वर को अर्पण करना है कपट छल छोड़कर ईश्वर में अपने आम को मिलाकर ईश्वर में होना है ऊंचा काम जीवन बीता जा रहा है समय बड़ा कीमती है अब की बिछड़ी कब मिलेगी जो जाए पड़ेगी दूर इस जन्म का बिछड़ा पटका कब मिलेगा [संगीत] इसलिए नारायण समय का खूब सत होगा राम राम