दोस्तों हर दिन कुछ नया करने का एक मौका होता है अपने सपनों का पीछा करने का एक नया अवसर लेकिन कभी-कभी जीवन उलझनों और कठिनाइयों से भरा हो सकता है कभी-कभी ऐसे पल होते हैं जब हम पीछे मुड़कर महसूस करते हैं जैसे कि हमने अपना कीमती समय बर्बाद किया हो या महत्त्वपूर्ण अवसरों का फायदा नहीं उठाया हो यह ऐसा होता है जैसे कि हम अपने ही विचारों में खो गए हो किसी भ्रम में जैसे कि क्या हो सकता था अगर हमने ऐसा ना किया होता इन पलों में व्यक्ति खो जाता है और यह मानता है
कि उसने अपना अवसर गवा दिया है और यह एक भारी बोझ बन सकता है और कई बार हमें हारा हुआ महसूस होने के कारण ही हमें अलग-अलग भावनाएं महसूस करनी पड़ती है कभी निराशा तो कभी दुख कभी बीते हुए वक्त का पछतावा तो कभी हमारे खुद के क्षमता पर संदेह या फिर आने वाले कल की चिंता ऐसे कई सारे भावनाएं हमें सताते रहते हैं तो चलिए आज के इस बोध कहानी के माध्यम से यह जानते हैं कि छूटे हु मौकों पर गौर करने के बारे में गौतम बुद्ध ने हमें क्या सिखाया है लेकिन इससे पहले
कि हम कहानी में खो जाए आप जल्दी से बोध इंस्पायर्ड को सब्सक्राइब करें ताकि आपसे हमारी कोई कहानियां ना छूटे तो बिना किसी देरी के शुरू करते हैं बहुत समय पहले की बात है एक नगर में साबुन का एक व्यापारी रहता था जिसका एक बेटा भी था वह व्यापारी दिन रात मेहनत करता ताकि वह अपने परिवार को चला सके अपने परिवार का पालन पोषण कर सके लेकिन उधर दूसरी तरफ उस व्यापारी का पुत्र उसके काम में तनिक भी उसका हाथ नहीं बंटा आता था बल्कि वह तो अपने मित्रों के साथ मिलकर हमेशा मौज मस्ती किया
करता गप्पे लड़ा था और इसी में वह अपना सारा समय यूं ही व्यर्थ कर देता एक दिन अचानक उस व्यापारी की मृत्यु हो गई और अब से सारी जिम्मेदारियां व्यापारी के पुत्र अर्थात मोहन पर आ पड़ी मोहन अभी नौजवान था और अब तक उसने अपनी जिम्मेदारियों को नहीं पहचाना था एक दिन शाम के वक्त वह उस साबुन की दुकान पर बैठा हुआ था और मन ही मन यह सोच रहा था मैंने अपने जीवन में बहुत सी गलतियां की मैंने अपने जीवन में बहुत से मौके गवा दिए और अब तो लगता है कि जीवन भर मैं
केवल इसी दुकान पर बैठा रह जाऊंगा और मैं इससे आगे कुछ भी नहीं कर पाऊंगा मोहन यह सोच ही रहा था कि तभी उसकी आंखों में आंसू आ गए मोहन जोर-जोर से रोने लगा तभी अचानक उसने देखा कि उसकी दुकान पर एक गुरु खड़े हुए हैं और जब उन गुरु ने मोहन को रोते हुए देखा तो वह मोहन से कहते हैं क्या हुआ बेटा आखिर तुम इस तरह से क्यों रो रहे हो तुम्हारे जीवन का हर एक पल तुम्हारे लिए कीमती तोहफा है उसे इस तरह से यूं ही व्यर्थ मत करो अपने आंसू पूछो उन
गुरु की बात सुनकर मोहन शांत हो गया और अपने आंसू पोंछ करर वह गुरुवर से कहता है रहने दीजिए गुरुवर यह सब खाली कहने की बातें हैं आज मैं जहां हूं वहां से मेरा जीवन मुझे बहुत कठिन लग रहा है आज से ठीक एक वर्ष पहले मेरे पिताजी गुजर गए और उनके गुजरते ही इस दुकान पर लेनदार की लाइन लग गई और उन्होंने इस दुकान का सारा सामान उठा लिया इस दुकान पर कुछ भी नहीं बचा जिससे मेरे पास और कोई रास्ता भी नहीं बचा था इसलिए मैंने अपना घर गिरवी रख दिया और कुछ पैसे
उधार लिए और उससे मैंने एक बार फिर से यह व्यापार शुरू किया लेकिन अब ऐसा लगता है कि इसमें भी मेरा जीवन नहीं है क्योंकि इसमें कोई खास कमाई नहीं है मैंने तो सोचा था बड़े होकर मैं बहुत अच्छा पैसा कमाऊ मैं अपना नाम करूंगा लेकिन मुझे नहीं पता था कि मेरे साथ ऐसा हो जाएगा आगे मोहन उन गुरुवर से कहता है सच बताऊं तो मैं बचपन से ही बहुत तेज था हर बात में मैं हमेशा आगे रहता था बातें करने में मैं चतुर था क्लास में सबसे आगे रहता था चाहे बातें किसी भी प्रकार
की हो चाहे वह राजनीति की हो या फिर खेलकूद की मुझे बातों में कोई भी नहीं हरा पाता था मैं बातों में सबका गुरु था और मुझे अच्छी तरह से याद है मेरे पिताजी भी हमेशा मुझसे केवल एक ही बात कहते थे बेटा तुम बहुत चतुर हो लेकिन अपनी इस चतुराई का इस्तेमाल अपनी पढ़ाई पर करो अपनी बुद्धि पढ़ाई में लगाओ जिससे आगे चलकर तुम्हें इस दुनिया को देखने का मौका मिलेगा अन्यथा तुम्हें भी दुकान पर ही बैठना पड़ जाएगा लेकिन तब मैंने उनकी एक नहीं सुनी और आज मुझे अपने पिताजी की हर बात याद
आती है मैं तो कोई और ही व्यवसाय करना चाहता था और उसके बारे में मैंने पहले से ही सारी तैयारियां भी कर ली थी कितना कुछ था करने को लेकिन कुछ नहीं कर पाया बस मित्रों के साथ घूमता रहता उनके साथ समय बिताता रहता और गपशप करता लेकिन अब मुझे यह प्रतीत होता है कि मैंने अपना सारा समय यूं ही व्यर्थ कर दिया यहां तक कि मेरे सभी मित्र भी मेरे किसी काम के नहीं हैं जब भी मैं उन्हें कोई समस्या बताता हूं तो वह उसका समाधान तक मुझे नहीं दे पाते इसीलिए मुझे अब मेरी
मित्रता भी बहुत सी लगने लगी है लेकिन मुझे उम्मीद है कि एक ना एक दिन मेरे जीवन में फिर से बड़ा मौका आएगा फिर फिर से वह दिन आएगा जब मैं कुछ करके दिखाऊंगा जब लोग मेरा नाम झप लेंगे जब रातों रात मेरा समय बदल जाएगा और मैं सबको यह साबित करके दिखा दूंगा कि मैं कितना काबिल हूं और मेरे जैसा कोई नहीं उन गुरुवर ने मोहन की सारी बातें ध्यान पूर्वक सुनी और वह मोहन के भीतर के उस अहंकार को अच्छी तरह से देख पा रहे थे लेकिन मोहन इस बात से बिल्कुल अनजान था
तभी गुरुवर मोहन से कहते हैं बेटा तुम मेरे साथ चलो मैं तुम्हें कुछ दिखाना चाहता हूं इतना कहकर गुरुवर मोहन को एक तालाब के पास ले जा पहुंचे उस तालाब के किनारे बहुत सारे छोटे बड़े पत्थर पड़े हुए थे तभी उन पत्थरों की ओर इशारा करते हुए वह गुरुवर मोहन से कहते हैं बेटा तुम अपने जीवन में एक बड़े मौके की तलाश थी ना तो आज वह मौका आ गया है इस पर मोहन उन गुरुवर से कहता है कैसा मौका गुरुवर तभी गुरुवर उन पत्थरों की ओर इशारा करते हुए मोहन से कहते हैं बेटा तुम
इस तालाब के के किनारे यह पत्थर देख रहे हो इन पत्थरों में एक बहुत ही अमूल्य पत्थर है जो किसी भी धातु को सोने में बदलने में सक्षम है और यदि वह पारस पत्थर तुम्हें मिल गया तो तुम्हारी सारी समस्याएं हमेशा हमेशा के लिए खत्म हो जाएंगी और तुम जैसा चाहोगे वैसा अपना जीवन भी बिता पाओगे यह सुनकर मोहन बहुत खुश हुआ और वह उन गुरुवर से कहता है हे गुरुवर किंतु मैं इतने सारे पत्थरों में से उस पत्थर को कैसे पहचान हूंगा तभी गुरुवर इस प्रश्न का जवाब देते हुए कहते हैं मोहन पारस पत्थर
बाकी सभी पत्थरों से हल्का गर्म होगा जिसे तुम छूकर आसानी से पहचान सकते हो आगे गुरुवर मोहन को चेतावनी देते हुए कहते हैं लेकिन मेरी एक बात और याद रखना तुम्हारे पास केवल आज रात तक का ही वक्त है अगर इतने समय में तुम पारस पत्थर ढूंढ सके तो तुम अवश्य ही जैसा चाहोगे पैसा जीवन जी सकते हो अन्यथा आज का यह मौका भी तुम्हारे हाथ से निकल जाएगा उन गुरुवर की आवाज सुनकर मोहन की आंखों में चमक आ गई क्योंकि जिस मौके की तलाश उसे थी आज उसे वह मौका मिल चुका था उसने तुरंत
ही बिना देर किए उन सभी पत्थरों को जांचना शुरू किया उसने पास ही में बैठकर एक पत्थर को अच्छी तरह से देखा परखा और ऐसे ही करके बाहर एक पत्थर को देखता और परखता देखते-देखते करीब दो घंटे बीत गए लेकिन अब तक उसे वह पत्थर नहीं मिला था जिस कारण उसके मन में बेचैनी उत्पन्न होने लगी यह सोचने लगा कि कुछ ही देर में रात्रि हो जाएगी और ऐसे में यदि मुझे वह पत्थर नहीं मिला तो मेरे हाथ से यह सुनहरा मौका निकल जाएगा मुझे जल्दी करना होगा और अब मोहन ने अपनी गति बढ़ा दी
वह तेजी से हर पत्थर को देखता परखता और उसे महसूस करता और जब उसे लगता कि वह पारस पत्थर नहीं है तो वह उसे उठाकर तालाब में फेंक देता और लगातार ऐसा करते-करते अचानक उसके हाथ में एक गर्म पत्थर आया लेकिन जैसा कि अब उसी आदत हो चुकी थी कि वह फटा फटाफट किसी भी पत्थर को देखता और तालाब में फेंक देता अचानक उसने उस गर्म पत्थर को भी हाथ में लिया महसूस किया और तुरंत उठाकर तालाब में फेंक दिया और तभी उसे एहसास हुआ अरे यह क्या कर दिया इतना बेशकीमती पत्थर मेरे हाथों में
आ चुका था और मैंने उसे उठाकर तालाब में फेंक दिया वह तुरंत ही तालाब में कूद पड़ा और तालाब की गहराई में जाकर उसने वहां से वह सभी पत्थर निकालने की कोशिश की लेकिन अब तक मोहन को वह पत्थर नहीं मिल पाया था जो पत्थर ह का गर्म था और मिलता भी कैसे क्योंकि वह पारस पत्थर भी पानी में जाकर बाकी पत्थरों की तरह ठंडा पड़ चुका था व गुरुवर दूर बैठे मोहन की हर एक हरकत पर नजर रखे हुए थे तभी वह गुरुवर मोहन के पास आए और मोहन से कहने लगे रुक जाओ बेटा
यह तुमने क्या कर दिया वह पारस पत्थर तुम्हारे हाथों में था और तुमने उसे उठाकर तालाब में फेंक दिया अब तो तुम्हारे हाथों से वह पत्थर भी गया और यह मौका भी इस पर मोहन रोते हुए उन गुरुवर से कहता है हे गुरुवर कृपया करके मुझे एक और मौका दें कृपया करके मुझे कोई ऐसा उपाय बताएं जिससे मैं उस पत्थर को पहचान सकूं तभी गुरुवर स्वयं से कहते हैं बेटा यहां पर कोई पारस पत्थर नहीं है वह पत्थर जो तुमने गर्म महसूस किया था वह तो मैंने ही इस आग में गर्म करके तुम्हारे पास रखा
था यह सुनकर मोहन क्रोधित हो गया और उन गुरुवर से कहता है परंतु आपने मेरे साथ ऐसा क्यों किया इसके जवाब में वह गुरु और मोहन से कहते हैं बेटा जब मैं तुम्हारी दुकान पर आया था तो जिस प्रकार से तुमने अपनी सारी बातें मुझसे कही थी उसी दौरान मैंने तुम्हारे भीतर एक अहंकार देखा था और उसी अहंकार को खत्म करने के लिए मैं तुम्हें यहां पर लाया था क्योंकि मैं तुम्हें एक सीख देना चाहता था इस पर मोहन उन गुरुवर से कहता है सीख कैसी सीख इसके जवाब में वह गुरुवर मोहन से कहते हैं
बेटा जैसे तुमने गर्म पत्थर अपनी लापरवाही के कारण तुरंत ही उठाकर पानी में फेंक दिया ठीक ऐसे ही मौके गवा आने की लापरवाही भी तुम्हारी आदत बन चुकी है जैसे कि आज तुमने केवल पारस पत्थर को खोजने की तलाश में और किसी पत्थर पर ध्यान नहीं दिया जबकि इस तालाब के किनारे कई ऐसे बेशकीमती पत्थर हैं जिन्हें केवल बेचकर ही तुम्हारा पूरा जीवन आराम से कट सकता था लेकिन तुमने उन पर भी ध्यान नहीं दिया उन्हें उठाकर तुरंत ही तालाब में फेंक दिया ठीक इसी प्रकार तुम केवल बड़े मौकों की तलाश में रहते हो लेकिन
तुम्हारे सामने जो छोटे-छोटे मौके आते हैं तो उन पर ध्यान नहीं देते और तुम यह भूल जाते हो कि यदि तुम्हें कोई बड़ा अवसर प्राप्त करना है तो तुम्हें पहले छोटे-छोटे अवसरों पर ध्यान देना होगा उन छोटे-छोटे अवसरों पर काम करके ही तुम बड़े अवसर प्राप्त कर सकते हो उन गुरुवर की बात सुनकर मोहन को अपनी गलती का एहसास हो गया तभी आगे गुरुवर मोहन से कहते हैं बेटा तुम बचपन से ही केवल बड़े मौकों का इंतजार कर रहे हो जिस कारण तुम्हें हर दिन की कीमत दिखाई ही नहीं दे रही और इसी कारण तुम
आज तक अपने जीवन में कुछ नहीं कर पाए तुम अपने जीवन में जो भी करना चाहते थे वह सब तुमसे दूर होता चला गया क्योंकि तुम तो केवल बड़े मौके की तलाश कर रहे थे लेकिन तुम्हें ऐसा नहीं करना चाहिए कभी भी किसी बड़े मौके का इंतजार मत करो बल्कि तुम्हारे सामने जो कर्म है उसे ही सब कुछ मानकर उसमें डूब जाओ क्योंकि जब तुम इस कर में डूब जाओगे तभी जीवन में आने वाला सुनहरा मौका तुम्हें दिखाई देगा तभी मोहन उन गुरुवर से कहता है किंतु हे गुरुवर मैं तो बचपन से ही बहुत तेज
हूं मेरा दिमाग और उससे तेज चलता है मैं बातें करने में भी और से बहुत तेज हूं लोग मुझे बुद्धिमान और चतुर कहते हैं फिर आखिर मुझसे गलती कैसे हो गई मुझे आखिर अपनी कमियां क्यों नहीं दिखाई दी तभी गुरुवर मोहन से प्रश्न करते हुए कहते हैं बेटा क्या तुमने बचपन से होशियार और चतुर बनने के लिए कभी कोई प्रयास किया है या कोई अभ्यास किया है या ऐसा कोई भी काम जिससे तुम्हारी चतुराई या फिर होशियारी बढ़ सके मोहन से पहली बार उन गुरुवर ने प्रश्न किया था और मोहन चुपचाप उनके प्रश्नों का जवाब
ढूंढ रहा था कुछ देर शांत रहने के बाद बाद वह गुरुवर से कहता है हे गुरुवर मैंने तो कभी भी ऐसा कोई प्रयास नहीं किया तभी गुरुवर मोहन से कहते हैं बिल्कुल सही मेरी इस बात को अच्छी तरह से समझने का प्रयास करो जब भी कोई इंसानी शरीर धारण करके इस दुनिया में जन्म लेता है तो परमात्मा हर किसी को कुछ ना कुछ काबिलियत अवश्य देते हैं जिसका उपयोग करके वह अपने जीवन में अपना पेट पाल सके अपने परिवार का पालन पोषण कर सकें और दूसरों के काम आ सके इसलिए जो उपहार तुम्हें मिला है
उसके लिए तुम्हें कृतज्ञ होना चाहिए और अपनी बुद्धिमानी और चतुराई का अच्छी तरह से उपयोग करना चाहिए लेकिन याद रहे कि अहंकार को अपने ऊपर हावी मत होने देना और इसके लिए तुम्हें अपने भीतर विनम्रता उत्पन्न करनी होगी और बुद्धिमानी तो वही है जो व्यक्ति लगातार यह स्वीकार करता है कि मुझे कुछ नहीं आता और मुझे तो अभी बहुत कुछ सीखना है वास्तविकता में वही बुद्धिमान व्यक्ति है जो गुरु के सामने अपने बड़ों के सामने अपनी गलतियों के सामने अपने अहंकार को भूलकर उन गलतियों को स्वीकार करें और उनमें सुधार करें जिससे वह अपने जीवन
में आगे बढ़ता चला जाएगा और वह अपने जीवन में जो कुछ चाहता है उसे हासिल भी कर पाएगा तभी मोहन कहता है हे गुरुवर आप सही कहते हैं लेकिन अब मैं क्या करूं मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा मैं तो अपने साबुन के व्यापार में पूरी तरह से फंस चुका हूं अब मैं यहां से कैसे निकलूं इसके जवाब में गुरुवर मोहन से कहते हैं बेटा तुम्हें कहीं भी जाने की आवश्यकता नहीं है तुम जो काम कर रहे हो बस उसमें डूब जाओ अर्थात तुम अभी-अभी दुकान पर वापस जाओ और अपने काम को अच्छी तरह से
संभालने का प्रयास करो जब तुम इस काम में अच्छी तरह से डूब जाओगे तो तुम्हें बड़े-बड़े मौके भी दिखने लगेंगे इतना कहकर गुरुवर अपने मार्ग पर चल पड़े और मोहन वापस अपनी दुकान पर लौट आया अगले दिन से मोहन ने एक नई शुरुआत की अगले दिन सबसे पहले उसने उन चीजों की एक सूची तैयार की कि उसे अब क्या-क्या करना है तो उसे पता चला कि कि अब तक बहुत सारे काम रुके हुए हैं जिन्हें उन्हें सबसे पहले पूरा करना है देखते ही देखते अगले एक महीने की मोहन ने पूरी सूची तैयार कर ली और
वह सारे काम निपटाने लगा और अगले तीन दिनों में उसने नए-नए ग्राहकों और नए-नए व्यापारियों से बात की ताकि वह अपने इस व्यापार को और भी उन्नति तक ले जा सके और फिर जो भी छोटे-मोटे काम बचे हुए थे उसने उन कामों को पूरा करना शुरू किया और केवल कुछ ही दिनों के भीतर ही उसने वह सार काम भी पूरे कर लिए और अपने खाली समय में जब वह उन व्यापारियों से बात करता तब उसे इस बात का एहसास होता साबुन को बेचने से ज्यादा अधिक मुनाफा उन्हें बनाने में है अब मोहन इसी पर काम
करने लगा मोहन इस बात को अच्छी तरह से जानता था कि साबुन को बनाना इतना आसान नहीं है लेकिन फिर भी उसने हार नहीं मानी उसने अपने आसपास देखा तो उसे तरह-तरह के साबुन दिखे और उसने सभी साबुन के तरल पदार्थों के बारे में और अधिक जानकारी हासिल करनी शुरू की और फिर इन्हीं जानकारी की मदद से मोहन साबुन बनाना सीखने लगा देखते ही देखते मोहन ने केवल कुछ ही महीनों में अपना एक कारखाना भी शुरू कर दिया और उस कारखाने में मोहन अपने तरह-तरह के प्रयोग किया करता वह साबुन के तरल पदार्थों के बारे
में और अधिक जानने की कोशिश करता लेकिन जब वह ऐसा कर रहा था तब उसके मित्र उसका मजाक उड़ा रहे थे लेकिन मोहन को इस बात से तनिक भी फर्क नहीं पड़ रहा था एक दिन की बात है मोहन अपनी दुकान से अपने घर जा रहा था तभी रास्ते में उसे एक बड़ा सा गड्ढा नजर आया और उस गड्ढे में खूब पानी भरा हुआ था और इसी पानी के कारण वहां पर खूब सारे मच्छर भी थे जिस कारण मच्छरों के काटने से आसपास के लोग बीमार पड़ रहे थे तभी मोहन को यह याद आया कि
यदि पानी में वह थोड़ा सा साबुन डाल दे तो इससे पानी की सतह का तनाव कम हो जाएगा और मच्छरों के जो अंडे हैं वह पानी पर तय नहीं पाएंगे जिससे मच्छरों की तादाद दिन बदन कम हो जाएगी मोहन यह सोच रहा था कि तभी उसके दिमाग में एक और युक्ति आई उसने सोचा यदि मैं डिटर्जेंट और साबुन की छोटी-छोटी गोलियां बना दूं और रुके हुए पानी में डाल दूं तो इससे मच्छरों के अंडे पानी पर तैर नहीं पाएंगे और कितने ही लोग बीमारी से बच भी जाएंगे मोहन को क्या करना था उसे अच्छी तरह
से समझ में आ चुका था उसका लक्ष्य उसकी आंखों के सामने था उसने तुरंत ही बिना किसी की मदद का इंतजार किए हुए अपने मित्र से बात की इस पर उसका मित्र मोहन से कहता है मित्र साबुन तो इस देश की बड़ी-बड़ी कंपनियां बनाती हैं ऐसे में यह तेरे बस की बात नहीं है यह तुमसे बिल्कुल भी नहीं हो पाएगा इस पर मोहन ने अपने मित्र को समझाने की कोशिश की कि हर दिन एक नया अवसर होता है और उसे किसी तरह से मना लिया तभी मोहन का मित्र मोहन से कहता है देख मुझे कुछ
व्यापारियों के बारे में पता है और मैं कोशिश करूंगा कि तुझे वहां से वह रसायन मिल जाए जैसे ही मोहन को रसायन मिले मोहन काम पर लग गया और कुछ दिनों के प्रयोग के बाद आखिरकार वह सफल हुआ मोहन ने साबुन की छोटी-छोटी गोलियां बना ली और आसपास के लोगों में उसे बांट दिया मोहन का आविष्कार काम कर गया और जहां-जहां भी मोहन ने यह गोलियां पहुंचाई थी वहां के लोगों के बीमार होने की संख्या बहुत कम थी यह बात बड़े-बड़े अखबार में छपी मोहन ने किसी भी मौके या किसी की मदद का इंतजार नहीं
किया बल्कि मोहन तत्काल ही अपने काम में डूब गया और उसने अपने काम में कुछ नया कर दिखाया और उसके बाद उसने उस आविष्कार को अपने नाम करवा लिया और अपना काम और भी बढ़ा दिया और देखते ही देखते मोहन के इस आविष्कार के बारे में सभी को पता चलने लगा और देश के कई राज्यों से भी अब मोहन को नए-नए ऑन ऑर्डर्स आने लगे और केवल आठ सालों के भीतर ही मोहन अपने व्यापार में कई गुना तरक्की भी कर ली थी वह अपने व्यापार को उस उन्नति पर ले जा चुका था जिसकी उसने कल्पना
भी नहीं की थी उन गुरु की वह सीख जिसने मोहन की पूरी जिंदगी बदल दी मोहन ने उन्हें अपना आदर्श बना लिया जिसमें पहली सीख यह थी कि कभी किसी बड़े मौके का इंतजार मत करो जो काम तुम्हारे सामने है उस काम को सब कुछ मानकर उसमें पूरी तरह से डूब जाओ नए मौके खुद बखुदा क्योंकि बुद्धिमान वही है जो लगातार यह स्वीकार करें कि मुझे कुछ नहीं आता और अभी तो मुझे बहुत कुछ सीखना है अपनी गलतियों के सामने अपने अहंकार को झुकाओ जीवन में सुधार करो और आगे बढ़ो दोस्तों अगर आप भी यह
दोनों मंत्र अपने जीवन में अपना लेते हैं तो आपको भी सफल होने से कोई नहीं रोक सकता और दोस्तों यदि आप भी अपने जीवन में परेशानियों का हल करना चाहते हैं समस्याओं का समाधान करना चाहते हैं तो इसके लिए आप हमारी अगली वीडियो देख सकते हैं जिसका नाम है समस्याओं में ही समाधान है दोस्तों आपने आज के इस वीडियो से क्या सीखा वह मुझे आप कमेंट में बता सकते हैं इसी के साथ में उम्मीद है कि आपको आज की वीडियो पसंद आई होगी तो इस वीडियो को उस इंसान को शेयर करें जिससे यह कहानी सुनने
की जरूरत है और उसी के ठीक बाद चैनल को सब ब्राइब करें तो चलिए फिर मिलते हैं ऐसी एक और नई वीडियो में एक नए मैसेज के साथ तब तक के लिए अपना ख्याल रखें धन्यवाद और नमो बुद्धाय