संतो को आकर परिचय देते मैं यह था यह था ये था अरे तू अपना अनश्वर परिचय मत दे तू पूछ कि मैं कौन हूं यह कमाया खाया मर जाऊंगा फिर भी मैं रहने वाला कौन हूं बाबा दुख कैसे मिटे अज्ञान कैसे मिटे यह घर के लोग देखते नहीं और रिटायरमेंट के बाद अन वैलिड हो गया हूं और अंदर में चिंता में और निराशा में पच रहा हूं उससे बाहर कैसे निकल ऐसा पूछ मूर्ख नंदन रिटायर होने के बाद लाइफ गुजार रहा है घर में और पीड़ित भी है और फिर आकर वट मारता कि मैं फलाना
हू कैसी बुद्धि मारी गई आई वास द डायरेक्टर जनरल ऑफ आई वा फ फलाना फलाना वो भी अंग्रेजी में सुनाएगा मूर्ख अरे मैं हिंदी भासी हूं मैं भारतवासी हूं अंग्रेज का गुलाम तू क्यों बन रहा बुढ़ापे में उनका विचारों का कसूर नहीं वातावरण ऐसा माहौल ऐसा हो गया सुखदेव जी महाराज ने राजा परीक्षित का सम्मान मिला तो चित में कुछ उसना नहीं और मन चले आवारा लड़कों का अपमान मिला तो मन में कुछ नहीं ऐसे सुखदेव जी महाराज नारद जी को प्रसन्न करने में सफल हो गए नारद जी तो प्रसन्नता की मूर्ति और विशेष छल
के वत्स तुमको जो चाहिए मैंने दे दिया मांग लो तो यह बुद्धिमान सुखदेव जी क्या कहते जिसमें मेरा कल्याण हो वह आप दीजिए मैं जो मांगू व नहीं नाथ जिसमें मेरा मंगल हो मेरा कल्याण हो और समस्त प्रजा का कल्याण क्या बोलते हैं सुखदेव जी महाराज के चरणों में प्रणाम करो मेरा कल्याण हो और समस्त प्रजा का मंगल कल्याण आप वही उपदेश मुझे दीजिए तब ये महापुरुष शिरोमणि नारद जी और प्रसन्न होते प्रश्न करता पर उत्तर देने वाले के चित्त की भूमिका बन जाती है बोले मुनीश्वर लोगों के लिए मनुष्य मात्र के लिए जो तुमने
हित कर पूछा है तो यह हित कर उपदेश तो यही है कि पूर्व काल में ऐसा ही जैसा तुमने महान प्रश्न किया है ऐसा ही ऋषि मुनियों की जतियो की जोगियों की बड़े-बड़े विद्वानों की सर्वश्रेष्ठ पुरुषों की सभा में और ज्ञान शिरोमणि सनत कुमार जी के चरणों में ऋषियों ने प्रश्न रखा था तुम हराई जैसा तुम कहते हो वैसा ही प्रश्न हुआ था मैं भी था उस सभा में तो उन्ही श्रेष्ठ संत कुमार जी ने ब्रह्म ऋषि देव ऋषि राज ऋषि अंतर शांति अंतर ज्योत के तरफ चले तो हम अपने आप के मित्र हैं श्री
कृष्ण ने गीता में कहा है सुखदेव जी महाराज को नारद जी सुना रहे हैं कि सनकारी ऋषियों ने देव ऋषि ब्रह्म ऋषि और राज ऋषियों को कहा कि मनुष्य का तो इसी में कल्याण है कि अपने चित्त को योग अभ्यास करके वैराग्य ईश्वर प्रधान से काम क्रोध और लोभ से अपना पिंड छुड़ाए काम क्रोध और लोभ यह महा वैरी है मनुष्य के आत्म धन को लुट जाते और मनुष्य को गुलाम बना देते हैं दास बना देते हैं किंग कर बना देते तुच्छ बना देते कहां तो भगवान का गुरु होने की क्षमता भगवान का मायबाप बनने
की क्षमता भगवान का स्नेही बनकर भगवान को छ छिन भर छाछ पर नचाने की क्षमता वाला जीवात्मा लेकिन काम विकार में क्रोध में और लोभ में ऐसा लुट जाता है कि न जाने कितने कितनों की खुशा करने के बाद भी दुखों से नहीं छूटता बेचारा जिसका दीदार करके देवता अपना भाग्य बना ले ऐसा ब्रह्म वेता बन सकता है लेकिन इन तीन दुर्गुणों के कारण मनुष्य कहीं का नहीं रहता काम क्रोध और लोभ यह सब अ विचार से ही अच्छे वासते काम विकार पैदा होता है विचार करके देखो स्त्री अगर पुरुष पर काम विकार की नजर
से मन आए तो विचार करो कि पुरुष के शरीर में क्या है उसकी चमड़ी हटाकर मन से सोचो तो क्या भरा है ऐसे स्त्री के शरीर से मन से चमड़ी हटाकर देखो तो क्या भरा है नाक ऊपर करके मन से देखो तो क्या भरा है मुंह में क्या थूक और मरे बैक्टीरिया की बदबू भरी ऐसा कौन सा शुद्ध स्वभाव बिना मलिन के साथ एकाकार का के बिना संसार का सुख दिखता ही नहीं होता ही नहीं आपकी मति में मलिन को महत्व देने का जब तक बेवकूफी नहीं आती तब तक ये विकारों में सुखाई नहीं दिखती
ऐसा कोई संसार का सुख भोग नहीं कि मलिन अंगों से तादात में किए बिना आप भोग सके और सुख की झलक मिलती है शुद्ध ब्रह्म की लेकिन मलिन अंगों के साथ एकाकार होकर इसीलिए फिर मलिन को ही प्राप्त होते संका आदि ऋषियों ने कहा कि मनुष्य को योग अभ्यास करके अपनारा विवेक प्रखरता जगानी चाहिए हम दीक्षा देते हैं तो योग अभ्यास का थोड़ा सा अंश डाल देते उसमें गर्दन पीछे द बोज के प्राणायाम करवाते यह भी बुद्धि में थोड़ी प्रखरता आ जाए गर्दन आग तोज के प्राणायाम कराते स्मृति का केंद्र विकसित हो समता का केंद्र
विकसित हो यहां बुद्धि में सात्विकता और य समता का केंद्र बहुत मार्मिक जगह पर असर होती इसीलिए दीक्षा लिए हुए साधकों को फायदे होते होते हैं लेकिन दुर्भाग्य यह है कि ईश्वर की चाह नहीं है तो संसारी फायदों में ही रुक जाते परम फायदा भूले रहते ईश्वर को पाने का उद्देश्य हो तो ईश्वर प्राप्ति हो जाएगी हम ऐसा है सब गुरु का प्रसाद लिए हुए घूम रहे नानक जी भी उप गए ग्राहक नहीं मिले फिर 60 साल में निवृत हो गए हमको 9 हो रहा है इतनी बुद्धि खींच गई नश्वर चीजों के पीछे मलिन अंगों
से सुखी होने की बेवकूफी इतनी दृढ़ हो गई कि बस कुए में ही भांग पड़ी बेवकूफ को बेवकूफ कहना भी बेवकूफी है बेवकूफ के टोलो में जाकर आप उनको बोलो तुम सब बेवकूफ हो तो य आपका बेवकूफ कहना ही बेवकूफी टोला 100 दो स का नहीं लाख दो लाख का नहीं करोड़ों का नहीं अरबों अरबों का टोला है मलिन अंगों से जड़ सुखी होने के पीछे लगना य बेवकूफी और आज वही हो रहा है हाय पिक्चर तू सुख दे रात को गंदे स्वपने आते हैं कमर तोड़ स्वपन दोष हो जाता है बेवकूफी हुई ना फलानी
फलानी की याद में दिल मलिन हो गया भगवान से हट गया तो बेवकूफी हुई अथवा फलाने फलाने की याद में एक दूसरे के शरीर को नोचा और फिर शक्तिहीन हो गए तो बेवकूफी हुई ना कौन सी बुद्धिमानी संतान को जन्म देने के लिए तो वशिष्ठ जी ने और कबीर जी ने भी संसार में प्रवेश किया था वो अलग बात है लेकिन मजा लेने के लिए पत्नी का शरीर निचो देना या पति के शरीर को निचो ना य बेवकूफी नहीं तो और क्या है ऐसे मजा लेने के लिए खाते रहना मजा लेने के लिए पिक्चर देखते
रहना तो अंदर की मजा तो गई और बाहर की मजा भर भर के अंदर की मजा से वंचित हो गई आंखें खराब हो गई पिक्चर देख देख के स्वादिष्ट खा खा के डायबिटीज हो गई चिंता हो गई तो बेवकूफी हो गई य बेवकूफी से बीमारिया तो बढ़ती है तो योग अभ्यास करके विवेक जगाए वैराग्य जगाए ईश्वर प्रधान हो जाए और इन तीन शत्रुओं से अपना पिंड छुड़ाए काम क्रोध और लोभ क्रोध से अपने गए क्रोध से बचकर अपने तप की रक्षा करें कामनाओं से बचकर अपने जीवन की रक्षा कर लोभ से बचकर व्यर्थ भोग और
संग्रह में समय ना बर्बाद करे उनको संभाल संभाल कर मर जाते जीर्ण शीर्ण हो जाते फिर भी वह पैसों का क्या होगा उनका क्या होगा फरयाद करते करते संभालते संभालते थक जाते विवश होकर सब छोड़ देते विवश होकर रिटायरमेंट लेना पड़ता है विवश होकर संसार छोड़ देना पड़ता है और निराश होकर मर जाना पड़ता है य सब पराधीनता है पराधीन स्वपने सुखना का अर्थ यह है कि काम क्रोध और लोभ के आधीन होना ही पराधीन है गुरु के अथवा धर्म के अनुकूल चलना नियंत्रण में रहना यह पराधीनता नहीं विकारों के पराधीन होना ही पराधीनता है
व महा मुनि राज ऋषि ब्रह्म ऋषि देव ऋषियों के बीच बैठे कहते हैं यह बात सुखदेव जी महाराज को सुना रहे हैं नारद जी और मैं आपको सुना रहा हूं सं कादी ऋषि सुना रहे हैं ब्रह्म ऋषियों को मनुष्य को मत्सर से रहित होना चाहिए क्योंकि मत्सर लक्ष्मी का नाश करता है गृहस्ती को धन का मत्सर सत्ता का मत्सर ना आए यह भी उस सभा में सका आदि ऋषियों ने उपदेश में कहा मान अपमान में सम रहने की विद्या आत्म विद्या का आश्रय लेना चाहिए आत्म विद्या का आश्रय लेकर मान अपमान में सम रहे प्रमाद
से बचकर शरीर को सुरक्षित करना चाहिए प्रमाद हो जाता है जरा यह खा ले जरा यह भोग ले इससे फिर शरीर जल्दी बूढ़ा हो जाता है जल्दी बीमार हो जाता है जल्दी पातक हो जाता है अध और पाप करने से कोई नहीं देखता किसी किसी की औरत से कु कर्म किया उसका पति नहीं देखता है लेकिन जगत का पति अंदर भी देख रहा है नहीं देखता तो यह प्रमाद है कि जगतपति मेरे गुरु जी ने एक उपदेश कहा वो मैंने वो छपा है निरोग रहने की कुंजी नाम का उपदेश एक व्यक्ति ने से पूछा कि
तुम इतने बहादुर इतने बलवान इतने यशस्वी कैसे हुए उसने अपना पल खोल के सुना दिया बोले मैं बहादुर यशस्वी भलवान कैसे व आपको क्या बताऊ मैं व्यापारी था बड़ा कामी था मेरे यहां एक भाई आती थी बड़ी सुंदर थी नई शादी थी मैं उसको फसाने में ल लेकिन वो फसी नहीं मैंने बहुत प्रलोभन दिए एक दिन उसके पति को पैसे की जरूरत पड़ी पति ने कहा कुछ भी करके पैसे इतने मेरे को ला दे नहीं तो मेरी इज्जत का सवाल है मैं जर खाकर मर जाऊंगा तो उसने अपने पति को बोला कि वो दुकानदार मेरे
पर मोहित है मैं अगर उसके साथ को कर्म करूं तो दे देगा तो उसके पति ने से तो मेरे पास आई और मैंने उसने बोला तुम अपनी इच्छा पूरी कर लेना मेरे को इतने पैसे दे दो मैंने टाक से उसको पैसे दे दिया और मैं रात्रि का इंतजार करने लगा और वो आई और मैंने अपने कमरे को भोग विलास काडा बना रखा था मैंने खिड़कियां बंद की वोह देखती रही सुंदरी खिड़कियां बंद की दरवाजा बंद किया तो उसने कहा कि सब बंद किया अभी और भी कोई खिड़की खुली है देख लो सभी बंद करो मैंने
कहा मैंने कर लिया बोले नहीं फिर भी कोई देख रहा है मुझे ऐसा लगता है कोई देख रहा है उस सुंदरी ने मुझे कहा मैं क्या नहीं सुंदरी तेरे मेरे सिवा और कोई नहीं है कोई नहीं देख रहा है तब उस महा सुंदरी ने कहा कि वह देख रहा है वहां भी एक पर्दा डाल दो कि ना देखे यहां तो तुमने खिड़कियां बंद की पर्दे लगा दिए वहां भी एक पर्दा डाल दो कि ना देखे हृदय पर एक पर्दा डाल दो मेरे हृदय पर तुम्हारे हृदय पर ताकि वो परमेश्वर ना देखे हमारे को कर्मों को
मेरे को झट का लग गया क्या है उस परमेश्वर पर पर्दा अंतर्यामी पर पर्दा हे महा सुंदरी हे विवेक की धनी देवी मैं तो धरती पकड़ कर बैठ गया उसके चरणों पर मत्था लगा दिया देवी तूने मेरी आंख खोल दी मेरे हृदय के कपाट खुल गए उस पर पर्दा डाल दूं इस परमेश्वर पर पर्दा डाल दूं अंतर्यामी पर उसने में उस देवी से मैंने माफी ली और उसको मैंने बाइज्जत अपने घर पहुंचा दिया तब से मैं इस काम रूपी शत्रु से बचने के लिए भगवान को प्रार्थना किया हूं इसलिए मैं इतना तंदुरुस्त और इतना प्रभावशाली
हो गया मैं कोई दूध का धोया नहीं था मैं तो तुम्हारे से गया बीता था लेकिन भगवान जो है कृष्ण उनका नाम हैने सभी को आकर्षित करता है किसी को किसी के द्वारा तुलसीदास को रत्नावली के द्वारा सुना दिया तुलसीदास भी बड़े कामी थे और रत्नावली ने सुना दिया कि हाड मा सकी दे हमम ता में इतनी प्रीति या ते आधी ये शरीरों में जो प्रीति करते ना पति पत्नी में पत्नी पति में इससे आदि अगर आत्मा परमात्मा में हो जाए तो आप तो भगवान बन जाओ और तुलसीदास को लग गया पत्नी का वचन और
चले गर महान संत बन गए और रामायण लिख डाला हो तुलसीदास का रामायण कई परिवारों को आनंद माधुर्य ज्ञान प्रदान करता है क्या क्या भरा था माइया माताएं हाथ जोड़कर प्रार्थना करता हू देवया आप में बहुत शक्ति अपना जीवन उन्नत कर सकती हो बेटिया और पतियों का उन जीवन भी पतन से बचा सकती यह शरीर काम विकार का मजा भोगने के लिए खिलौना नहीं है यह शरीर तो भगवान को पाने का का एक साधन मिला है इसको हाड़ मास मल मूत्र चमड़ को चाटने में तबाह करने के लिए काय को खराब करो तन को काय
को खराब करो मन को काय को खराब करो बुद्धि को काय को नीचे के केंद्रों में लाओ बेटे बेटिया है पुंज हाल केे जिन वतन वे सार उनके हालत को धिक्कार देते फकीर जिन्होंने अपना आत्म वतन विसार दिया सत्य चित आनंद स्वभाव विसार कर असत जड़ दुख रूप मलिन शरीर में ममता आ गई क्या रखा है जो बहुत कामी होते हैं ना सुना है नर कों में फिर शरीरों को खोलकर वो सारा मसाला डाल दो चमड़ा मल मूत्र सारे शरीर खोल के होद में इकट्ठे कर दो और उस आदमी को तके मार्ग होते शरीरों में
प्रीति थी मार्ग होते कुछ ली होती है थूके होती है मल होता है मूत्र होता है मार्ग होते शरीरों में प्रेम किया तो ले स्त्री के शरीर में प्रीति है तो सुंदर लोहे की स्त्री की पुतली बनाकर उसम सुए लगे आलिंगन करवा देते हैं जो परनारी पर पछ कंपारी छूटे पछ बरोड़ा वाला बचावा नावे बचावा आवे बरोड़ा वाला कना दिल्ली वाला ना बचा मुंबई वाला भी ना बचावे कोई कोई ना ना बचावे बचावे कर्म ना फल कर्म का फल कर्ता को भोगना पड़ता है तो संका अधि ऋषि राज ऋषियों को ब्रह्म ऋषियों को देव ऋषियों
को कहते हैं कि मनुष्य विवेक जगाकर सत्संग के आश्रय से काम क्रोध लोभ आदि लुटेरों से अपने को बचाने वाला विवेक जगा दे यह बड़े लुटेरे तुलसीदास भगवान को प्रार्थना करते थे मम हृदय भवन प्रभु तोरा ताही बसी आई बहु चोरा ये मेरा हृदय तो तेरा घर है लेकिन तेरे घर में चोर घुस गए महाराज लुट गया महाराज अब मैं अकेला हूं और ये तीन तीन है और इनको लूटने की आदत पुरानी है और हम लुटे जाने वाले मूर्ख भी पुराने हैं ठगे जा रहे अब तो तुम्हारा आश्रय है महाराज मम हृदय भवन प्रभु तोरा
ताही बसे आई बहु चोरा मैं एकल अमित बट मारा को सुनत नहीं मोर पुकारा काम विकार में गिरे फिर समझते कि कुछ भी नहीं है बेकार है य अपना अनुभव अगर पकड़ रखे काम विकार के बाद जितना वैराग्य होता है समझ आती है उस समझ का आदर करो तो भी आपका कल्याण हो जाए अपनी समझ का आदर करो काम विकार भोगने के बाद क्या होता क्या बड़ी बहादुरी कर लि अरे बोले बहुत बेकार है क्रोध के बाद क्या लगता है क्रोध शांत होता है तो क्या लगता है मैंने क्रोध किया तो अच्छा किया अरे बेकार
हो गया और धन संग्रह कर कर के टेंशन कर कर के जब मरते हैं तो धन का टेंशन आता है चला ना जाए तब कैसा लगता है कि कोई सार नहीं संग्रह करो ग्रहस्ती की मर्यादा इतना साई ते इतना मांगो नव कोटि सुख है मैं भी भूखा ना रहू साधु भी भूखा ना जाए कोई शुभ कर्म सत्संग आदि पवित्र कर्म करने हैं बेवा आद सादगी से हो जाए बहुत हो गया बोले हम भंडारा करें भंडारा करें सत्संग में हमको भंडारा करना है बहुत लोग आते सत्संग करूं ना आप लोगों को रोज पूरी हलवा मंथल खीर
मुफत में खाना को मिल जाए ऐसे कई लोग है लेकिन मैं यह भंडारे स्वीकार नहीं करता मुझे आपके आपकी जय जय आप वाह वाह कर ले व आ जाए दाता आकर देसी घी इतने तीन मंगा ले काजू के इतने बूरे मंगा ले बादाम मंगा ले और भंडारा बने लेकिन मुझे ऐसा बापू बहुत बड़ा कहला करर आपकी जिंदगी तबाह नहीं कर घी के हलवा बनेगा काजू वाला यह बनेगा वो बनेगा लेकिन पैसे तो उनके होंगे पुण्य तो उनका होगा लेकिन तबीयत और पुण्य तो इनका खराब होगा खीर पूरी केसर बादाम चारोली भर पेट खाओ कार में
आपको छोड़ के आए ऐसे लोग भी मिल सकते हैं किसी दो नंबर वाले ने किसी संत की कथा करवाई थी और भंडारा कि भंडारा कि सवा करोड़ खर्चा गया कथा पा सा हजार आदमी थे सवा पा करोड़ गुटके का बड़ा व्यापारी था खाने वाले भी ऐसे देने वाला भी ऐसा बोलो तो मैं ऐसे लोगों को बोलू भाई आओ भले बंड रा करो आपका जीवन मुझे कीमती लगता है मुझे बादाम पिस्ता खीर मालपुए कीमती नहीं लगते जितना आपका मनुष्य त्व कीमती लगता और मनुष्य त्वक में ईश्वर की महिमा [संगीत] जितनी य गद्दी बनाई तो यहां बकमल
लगाया नेहा कोई जरूरत नहीं बकमल से हम बड़े महात्मा नहीं बनेंगे हम जो हैं ठीक है टाट का कवर चढ़ धोने में संभालने में कम समय जाए क्यों समय बर्बाद करो राम तीर्थ बोलते थे हे मूर्ख धनवान तुम अपने बड़े-बड़े महलों को मकानों को फर्नीचर को संभाल संभाल कर अपनी जिंदगी बर्बाद क्यों करते हो अपने आत्मा परमात्मा धन को संभालो ने मूर्खो यह फर्नीचर वो फर्नीचर वो नौकरानी वो नौकरानी फर्नीचर संभालने के लिए नौकरानी को संभालो नौकर को संभालो पैसों को संभालो काहे को इतनी आवश्यकता बढ़ाते क्या करिए क्या जोड़िए थोड़े जीवन काज छोड़ी छोड़ी
सब जात है देह गेह धन राज ये सब छूटने वाली चीजों पर कब तक आप अपने को ने छावर करते जाओ आज ऐसी होड लगी है कि मेरा पगार इतना है मेरे पास इतने कमरे मेरे पास इतने नौकर अरे मूर्ख तेरे पास कहने को तेरा शरीर भी तेरा नहीं रहेगा यह तो मरने वाली चीज है तेरे पिया को पहचानने का कोई ज्ञान पाले बाहर की चीजों से अपने को गला अपना मत घट मकान बढ़िया बनाकर तू बड़ा बनने की बेवकूफी क्यों करता है लाला धन की संख्या बढ़ाकर रुपयों की मैं बड़ा धनी मैं बड़ा मकान
वाला मैं बड़ी कुर्सी वाला मैं बड़ा परिवार वाला मैं बड़ी बुद्धि वाला अरे यह तो प्रकृति की है बुद्धि भी तो मैं बड़े में बड़ा भगवान वाला है और था और रहेगा मैं भगवान वाला और भगवान मेरे हैं बाहर से चाहे भीख मांग के टुकड़ा खाता हूं तो कोई फर्क नहीं पड़ता चाहे राज्य हो तो चाहे एक रंग हो लेकिन आप सचमुच में इतने बड़े हो इतने बड़े वाले के हो कि बाहर की चीजों से तुम बड़े बनने की बेवकूफी छोड़ी दोस मैं यह हूं मैं डीजीपी हूं मैं चीफ मिनिस्टर हूं मैं प्राइम मिनिस्टर हूं
मैं वर्ल्ड मिनिस्टर हूं मैं इंद्र देवता हूं तभी भी मैं धोखे में हूं मैं तो सत चित आनंद स्वरूप परमात्मा का अविभाज्य स्वरूप अपनी आत्मा की महिमा के आगे यह पद कोई किमत के नहीं आप धन से बड़े कहलाते हैं तो धन का ही बड़पन हुआना आपकी चेतना के उससे तो जड़ धन बड़ा हो गया कुर्सी से आप बड़े बने तो वो कुरसी का वैशा ही तो बड़ी हो गई आपसे कुरसी नहीं रही तो आपका बड़पन उस दिन चला गया ना धन से बड़े तो धन धन गया तो आप छोटे हो गए सत्ता से बड़े
तो सत्ता गई तो आप छोटे हो गए सौंदर्य से बड़े तो चमड़े में गड़बड़ी हुई तो आपका बड़ा पन गया नहीं बेटे यह सब मिट जाए फिर भी आपका बड़पन नहीं मिटता आप ऐसे अमृत पुत्र हो लाला लालिया देवियां बेटे ई को तुम अपने को नश्वर चीजों को अपने ऊपर हावी करके बड़ा बनने की मजदूरी कर रहे हो शबरी बेलन के पास क्या था फिर भी इसका बड़पन देखो राम जी झूठे बेर खा रहे धन्ना जाट के पास क्या था बड़ी नौकरी है बड़ा रेंजर हूं बड़ा डीएफ बड़ा कुछ भी नहीं है यह सब बड़पन
अपने को धोखे में रख रहे हो शराबी लोग शराब पीकर सो गए थे और चूहे निकले बिल से और व कहीं ब्रांडी की बूंदे ढली हुई पड़ी थी एक चूहे ने ब्रांडी की बूंदे चाट लि दो पैरों पर खड़ा हो गया और मुछ हटने लग गया बुलाओ बिल्ली के बच्चे को कहां रहती दो बूंदे ब्रांडी की पीकर चूहा भी बड़ा बन गया आप हम यह ब्रांडी तो नहीं पी रहे हैं कि मैं डीएफओ हूं मैं रेंजर हूं मैं डी आईजी हूं मैं आईजी हूं मैं सीएम हूं मैं बड़ा बापू जीी हूं मैं बड़ा महंत हूं
मैं बड़ा सावकार हूं मैं बड़े गहने वाली हूं क्या वह चूहे की बूंदों जैसा ही तो नहीं कर रहे अपन लोग चूहे पर हंसी आती है लेकिन ज्ञानवान को तुम्हारी भी वैसी दशा देती मुझे ऐसे बहुत अनुभव होते आई वा द हाई कोर्ट जज आई वा फलाना फलाना क्या नाम लेना उनके विचारों य आपका बड़पन नहीं है विवेक दबा हुआ है य आपको काम ने क्रोध ने लोभ ने अहंकार ने ठग रखा है लाला इन तुच्छ चीजों पर को अपने आत्मा के ऊपर हावी कर रहे हो यह अहंकार आपको उल्लू बना रहा है नौकरी को
आगे रखकर बड़ा बन रहे तो आपको अहंकार उल्लू बना रहा है धन को आगे रखकर आप बड़े बन रहे तो लोभ आपको उल्लू बना र है किसी भी बाहर की चीज को लेकर आप बड़ा बन रहे हैं तो यह बदमाश आपको उल्लू बना रहे हैं इनके चुंगल से छूटना हो तो तुलसीदास जी की नाई भगवान को कह दो मम हृदय भवन प्रभु तोरा ताही बसे आई बहु चोरा मैं एकल अमित बट मारा को सुनत नहीं मोर पुकारा रघुनायक बेगी करो संभरा मेरे को संभालो रक्षा करो महाराज सत बुद्धि दो अपनी प्रीति दो महाराज अपनी भक्ति
दो नहीं तो मुझे लुटे लुट जाए काम रस दिखाता है क्रोध बोलता है कि जरूरी हूं मैं लो बोलता है इतना तो रखना जरूरी है यह सब रख रखा के भी हम मृत्यु के समय अनाथ होकर मर जाते नाथ तेरे से बिछड़ के प्रेत हो के भटकते अथवा तो राजा आज सर्प हो के भटकता है राजा नृग किरकट होकर भटकता है अरे कोई नाली में जीवों के बटक अजनाभ खंड का एक छत्र सम्राट भरत मरने के बाद हिरण हो जाता है महाराज मेरी रक्षा करो दयालु तेरी भक्ति दे दे तेरी प्रीति दे दे तेरा ज्ञान
दे दे दीन दयाल विरद संभारी हर नाथ मम संकट भारी बड़े में बड़े संकट के दिन ात लुटेरे हम कुलू बना रहे कितने सर्टिफिकेट लेकर घूम रहे और क्याक बन गए फिर भी हमारा उल्लू पना तो चारही है हमको पता ही नहीं कि हम क्या है मरने वाले शरीर को तो हम मैं मानते हैं और मिटने वाली चीजों को हम मेरा मानते हैं ना यह मैं रहता है ना मेरा रहता है हम इतने उल्लू बने और यह पता ही नहीं कि हम उल्लू बने हुए इससे ज्यादा और क्या हो जा सकता है उपना मरने वाले
शरीर को तो मैं मान रहे हैं हम और मिटने वाली चीजों को और पदं को मेरी मान रहे हैं और हम उल्लू बन गए यह भी पता नहीं चलता कि हम उल्लू बने हुए हैं इससे ज्यादा और क्या होगा ठगों का खेल कहां तो जीवात्मा अमर है चैतन्य है विमल है सहज सुख रासी है शास्त्र कहते हैं महापुरुष कहते हैं और आपका अनुभव भी यह कहेगा क्या आप अमर है शरीर मरता है आप शाश्वत है काम आता है चला जाता है आप उसके पहले भी थे उस समय भी थे बाद में भी रहते क्रोध आता
है आपको नोच के अशांत करके चला जाता है आप रहने वाले य आने जाने वाले हरामखोर है लेकिन इन्हीं को चिपक एक से चिपके दूसरे दूसरे से दिन भर थके रात को बेहोश होके पड़े इसीलिए दीक्षा देते समय और सत्संग के समय मेरा यह नजरिया रहता कि रात को सोते समय आप योग निद्रा में चले जाए भगवान की गोद में चले जाए ताकि धीरे-धीरे उन बदमाशों से बचने का आपको थोड़ा विवेक जग जाए भगवान की गोद में आए विवेक प्रखर हो जाए बुद्धि में भगवान का तेज आ जाए इसीलिए मैं दीक्षा दीक्षा दीक्षा के समय
सत्संग के समय बार-बार और हर सत्संग में कहता हूं कितने भी कुछ करें देर सवेर बीज वृक्ष हो जाएगा मंगल हो जाएगा और होता है फायदा होता है नहीं तो चार चार घंटे आप कैसे बैठ सकते अगर वे अभी साथ में होते तो आप चार घंटे नहीं बैठ सकते थे लेकिन परमात्मा भी साथ में है ना साथ में अकेले हरामियों के साथ नहीं हो मेरे पिया के साथ भी रहते हो लाला लालिया भले उस पता नहीं है तो आते जाते लेकिन पिया तो रहता है पिया का पता नहीं है बस इसी से मार खा रहे
तो उस पया का नाम है कृष्ण वह आपको कषित करता है आकर्षित करता है कहीं ना कहीं जहां आप सेट हुए अच्छा हुआ वहां कहीं ना कहीं विघ्न डालकर आपको सत्संग में भेज देता वो उसकी कृपा आपको इन हरामियों में डूबे रहने नहीं देना चाहता इसीलिए विघ्न बाधा प्रॉब्लम कुछ ना कुछ गड़बड़ी कर देता है यह भी उसकी कृपा है कृपा सिंधु दीन दयाल विरद संभारी हर नाथ मम संकट भारी क्या संकट है कि महाराज बार-बार काम में क्रोध में लोभ में मोह में ममता में कमर तोती जा रही है आयुष्य बीती जा रही है
मृत्यु के समय अनाथ होकर मर जाएंगे नाथ मैं तुम्हारा हूं हे नाथ हम मैं अनाथ हो कर ना भटको दूसरा जन्म नहीं मिला तो प्रेतों के भटक जन्म मिला तो घोड़ा गदा कुत्ता मिला अथवा देवता देव शरीर में मिल गया पुण्य से तो फिर पुण्य का सुख भोग के फिर आके किसी के गर्भ में गिरेंगे गर्भ मिलेगा ना मिलेगा तो फिर गटर में जाएंगे और क्या होगा तुम्हारे कई भाई गटर में चले गए मैं बिल्कुल सच्चा बोलता तुम्हारी कई बहने गटरों में चली गई क्या ख्याल मानोगे नहीं मानोगे तुम्हारे कई चाचे गटर में बह गए
तु रे बाप अपनी मां के गर्भ में रह गए मेरे और तुम्हारे बाप अपने मां-बाप के गर्भ में रह गए बाकी तुम्हारे कई चाचे गटर में बह गए क्या ख्याल है तुम्हारे कई भाई और बहन गटर में बह गए नालियों में बह गए आई एम हैप्पी हैप्पी लेकिन बेटे मृत्यु का दुख पड़ा है फिर जन्म का और गटरों का दुख सामने दिख रहा है तू जागृत हो जा विवेक की कैची ले और यह जाल को काट ले तो तेरे लिए यूं हो जाएगा मनुष्य जीवन में इतनी योग्यता दी है भगवान मनुष्य जीवन में इतना बुद्धि
और इतना सत्संग और इतना महापुरुषों की भारत में कृपा है कि एक जन्म में आप 10 बार साक्षात्कार कर सकते दसों बार भगवान का दर्शन कर सकते तना समय दिया लेकिन उधर की भूख हो जाए इन हरामियों से बचने का इरादा हो जाए ज ज ईश्वर प्रीति बढ़ेगी त्यों त्यों ये फीके होते जाएंगे ज ज यह फीके होते जाएंगे त्यों ों ईश्वर रा सा आता जाएगा ज शुद्ध रस आता जाएगा त्य त्य मलिन फीका लगता जाएगा सत्संग से जो मिलता है ना वो हजार जन्म के बाप हजार जन्म के मां दादा दादी मिलकर भी नहीं
दे पाए जो सत्संग देवता देता है इसीलिए कहते हैं अन्न दान भूमि दान वस्त्र दान सुण दान कन्या दान गौ दान विद्या दान यह सब दान ठीक है कलयुग में दान की महिमा है लेकिन सत्संग दान मिल गया उसके आगे सब छोटे हो जाते जो जाने सत्संग प्रभाव लोक नवेद न आन पाऊ जो रामायण में आ सत्संग का ऐसा प्रभाव है इतना फायदा होता है कि लौकिक किसी कर्म से वह फायदा नहीं हो सकता जो सत्संग से फ आप दिन के द लाख रुपए कमाते तभी भी आपकी जिंदगी में वह सुख नहीं मिलेगा जो सत्संग
से मिलेगा रोज के 10 मिलते हो उसको लात मार के भी सत्संग सुनना चाहिए जो जाने सत्संग प्रभाव लोकन वेदन अन उ पाव वैदिक कर्म यज्ञ याग होम हवन तीर्थ व्रत से भी करोड़ों करोड़ों तीर्थ और व्रत करने का फल एक लवलेश ब्रह्म ज्ञान का सत्संग मात्र से हो जाता है ऐसा भागवत में भगवान कृष्ण धो और महाराष्ट्र के नर रत्न समर्थ रामदास जी के दास बोध में लिखा है कोटि कोटि तीर्थ फल हो तो ब्रह्म ज्ञान च सत्संग श्रवण मात्रण दास बध में भी लिखा और कबीर जी कहते तीर्थ नाए एक फल संत मिले
फल चार सतगुरु मिले अनंत फल जिस फल का अंत ना हो पुण्य के फल का अंत हो जाएगा सुख भोगे का तो अंत हो गया पाप के फल का अंत हो जाएगा दुख भोग कर लेकिन सत्संग के फल अनंत फल सतगुरु की कृपा का पुण्य तो सुख देकर नष्ट हो जाएगा पाप दुख देकर नष्ट हो जाएगा लेकिन सतगुरु मिले अनंत फल कहत कबीर विचार जिस फल का अंत ना हो ऐसा अनंत फल सतगुरु की कृपा से मुझे मिला है इसीलिए शरीर को कैसे भी पटा पटाकर 79 साल की उम्र में इतनी भागा दौड़ी कर रहा
इतनी दौड़ धप कौन करे क्या लेना है आपके जीवन का मूल्य जानते हो आपकी महिमा हम जानते हैं आपके इतने ठगे जाते हो तो हमारे हृदय में पीड़ा होती इसीलिए भागे जा रहे क्या आप ना ठगे जाओ और आप असली खजाना मेरे गुरु जी को साक्षात्कार हुआ और फिर ई पटला लेकर सिर पर वो तो मेरे पास तो थोड़ा चमक धमक है मेरे गुरु जी तो एकदम पक्कड़ शही एक बार रमण ष के पास पहुंचे और य आपस में गोषटी हुई आत्म विश्रांति आत्म प्रीति और आत्म तत्व का ज्ञान परमेश्वर का परमात्मा की सतता चेतन
आनंद का तो रमण महर्षि गदगद हो गए और मेरे गुरुदेव को गले लगाया बोले आपकी इतनी ऊंची स्थिति है फिर काहे को इतना देशा रटन कर रहे हो इतना इधर उधर घूम रहे आपको क्या जरूरत है ब्रह्म मिल गया जैसे नारायण अपने योग निद्रा में शिवजी अपने आत्म समाधि में वही तुम्हारी अनुभूति है जो शिवजी की अनुभूति है जो भगवान नारायण की अनुभूति है वही आपकी है फिर आप इतना भागा दौड़ क्यों कर रहे हैं बोले मैं चाहता हूं लोगों को भी मिल जाए हे लीला श बाबा अगर आप यह नहीं करते तो आज सुमल
को कैसे मिलता है ये खजाना और उनके द्वारा इतने लोगों को कैसे मिलता है महापुरुष आपके चरणों में आपकी उदारता में के च बारबार प्रणाम अगर यह उदार होकर इतना श्रम नहीं सहते और इधर उधर रटन नहीं करते तो हम उनके चरणों तक भी तो नहीं पहुंचते ईश्वर प्राप्ति के लिए भाग जाते घर छोड़ के फिर देखते पूजा पाठ वाले और मठ मंदिर वाले देखते इधर भी वही हाल है फिर घर वापस चले जाते फिर अंदर में अशांति होती कि जिंदगी बर्बाद हो रही ऐसे करते करते एक बार गोधरा में बापू जी आए गुरु जी
आए थे दर्शन हो गए फिर नैनीताल जाने का इच्छा हो गई और काम बन गया अपना तो अगर वो देशा रटन नहीं करते और हिमालय की गुफा में अनन जाल में बैठे रहते तो हमको तो पता ही नहीं [संगीत] चलता ये विचरण करते हैं तो उसका फल भी तो होता है तो भारत के सपूत हो राज विद्या राज गुह पवित्रम उत्तम और प्रत्यक्ष धर्म का फल देने वाले यज्ञ याग का तो कालांतर में फल होगा इस विद्या का फल यही हो जाता है सुनते सुनते हो जाता मनुष्य निर्भर हो जाएगा निरंकार हो [संगीत] जाए निश्चित
त नारायण में विश्रांति बालेगा यह वह विद्या संसार की वासना नित्य नवीन मुसीबत देती है यह विद्या नित्य नवीन सुख देती संसार की सुविधाएं जीव को पराधीन करती और यह जीव को परम स्वतंत्र कर देती संसार के वासना में जीव बंद मरता है और विद्या में सारे बंधन खुल जाते यह वह विद्या है आत्म विद्या जो शैंपू या साबू सिर पर लगाते हैं उनके टाल के बाल जड़े कमजोर हो जाती आंवले का रस टाल पर लगाकर थोड़ी देर बैठा करो जिससे ज्ञान तंतु और बाल की जड़े मजबूत हो य ब्रह्म विद्या में दूसरा कचरा विद्या
है व्यवहार विद्या कचरा विद्या यह टाल भी जल जाएगी और बाल भी जल जाएंगे बिना बाल वाली टाल भी शमशान की डिपॉजिट और बाल वाली टाल भी लेकिन वह भी बताना पड़ता है लेकिन यह बिल्कुल छोटी बात है ब्रह्म विद्या के आगे इसकी कोई माना नहीं ब्रह्म विद्या य कहती कि मन तू ज्योति स्वरूप अपना मूल पिछा गुरुवाणी में तो अपने मूल को पहचान मन में आ गया बोले मेरा निर्णय है नहीं बुद्धि में आ गया मेरा निर्णय है मन में भाव आ गया बोले मेरा भाव है ये तो कणों का है तेरा तो परमात्मा
है तू परमात्मा का है मौत का बाप भी यह विद्या का प्रभाव छीन नहीं सकता अष्टावक्र को मां के गर्भ में यह विद्या स् फुरित हो गई पिता वेद पाठी थे उसकी गलती बताने लगे आठवें महीने का बच्चा कल ब्राह्मण को बोलते हैं कि आप वेद का पाठ तो करते लेकिन ऐसे ऐसी नहीं एक दो बार टोका तो पिता को गुस्सा आया कि अभी मां के घर में आठवे महीने का और मेरे बांक निकालता है जा तेरे शरीर में आठ आठ बांक होंगे घर बस्त शिशु कहता है कि पिता श्री आपने इस शरीर पर अपना
कोप लेड़ा शरीर पर आठ खड़ खा पड़ हो के रहेंगे लेकिन मुझ चैतन्य का उसके बाद भी कुछ नहीं बिगड़ता सुरा की डिजाइन अलग होती है घड़े की डिजाइन अलग होती है उसमें आया हुआ आकाश भी अलग-अलग दिखता फिर भी आकाश वही का वही ऐसे ही मैं हूं सत चित आनंद वही का वही हर परिस्थिति का बाप अपना आप यह है ब्रह्म विद्या हम है अपने आप हर परिस्थिति के बाप य ब्रह्म विद्या है इतनी गरीबी आई अमीरी आई सुख आए दुख आए पाप आए पुण है सब चले गए लेकिन हम अपने आप से गए
क्या शरीर मिट गए फिर भी हम मिटे क्या यह ब्रह्म विद्या है ऐसे अमिट तत्व को पहचान के गुरु कृपा से उसमें टिक जा तेरा दीदार करके देवता अपना भाग्य बना लेंगे यह वह विद्या है लाला लालिया देवियां हे गुरु कृपा तू मेरे हृदय में सदैव निवास करना [संगीत] ओ परम माधुर्य परम [संगीत] शांति ओ रूपम मधुरम निपुर मधुरम ध्वनि मधुरम ओमकार मधुरम आत्मा मधुरम परमात्मा मधुरम मधुराधिपते अखिलम मधुरम निखिलम मधुरम अधरम मधुरम वनम मधुरम नयनम मधुरम हसित मधुरम हृदय मधुरम गमनम मधुरम मधुराधिपते अखिलम मधुरम [हंसी] [संगीत] ओ वचनं मधुरम चरितम मधुरम वनम मधुरम [संगीत]
वलित मधुरम चलित मधुरम भ्रमित मधुरम मधुरा दे पते अखिलम मधुरम हे मधुमय प्रभु हे अंतर्यामी हे गोविंदा हे कन्हैया हे गुरु रूपा शिव रूपा राम रूपा जग रूपा विश्वरूपा ओ उंडी शांति मधुर [संगीत] शांति खूब प्यार से जैसे बच्चा मां की गोद में निश्चिंत ऐसे हम ओमकार स्वरूप अंतरात्मा परमात्मा में निश्चिंत हो रहे चिंता गई भय गया कर्म कर्म सुकर्म कुकर्म सब स्वाहा हम प्रभु के परमात्मा हमारे ओ तुम्हारी रग रग पावन हो रही है तुम्हारा अंतर आत्मा तृप्त होता जाएगा कृष्ण चढ़े कदम के राडार ठा उतरो महाराज सुरत वर्धनम शोक नासनम हे [प्रशंसा] बंसीधर
बंसी में ओमकार की ध्वनि का गुंजन [संगीत] करते लीला माधुर्य रूप माधुर्य नाद ब्रह्म से परब्रह्म की मधुरता बरसाने वाले वेणु मधुरो रेणु मधुर पानी मधुरा पादो मधुर नृत्यम मधुरम सख्यम मधुरम मधुराधिपते अखिलम मधुरम [संगीत] ओ आप अपने अंतःकरण को मधुमय होने दीजिए प्रेम कला को जागृत होने दीजिए प्रेम रस का पान करते जाइए ओ मारा वालड़ा मारा गुरुदेव मारा तारण [संगीत] हार न खोदन न खोद जाए ू तो तारो मारा वालड़ा ध्यान मूलम गुरु मूर्ति पूजा मूलम गुरु पदम मंत्र मूलम गुरु वाक्यम मोक्ष मूलम गुरु कृपा गीतम मधुरम पीतम मधुरम मुक्त मधुरम सुक्तम मधुरम
रूपम मधुरम लकम मधुरम मधुराधिपते अखिलम मधुरम मरा अंतरात्मा देव गुरुदेव ओ [संगीत] [प्रशंसा] करणम मधुरम तरण मधुरम हरम मधुरम स्मरणम मधुरम ममित मधुरम सितम मधुरम मधुराधिपते मधुरम मधुरम [संगीत] ओ डूबते जाओ बाहर क्या झांकते बाहर क्या ताकते अंतर्यामी में खोते जाओ जिसके हो उसके होते जाओ ओ [संगीत] डूबते जा ध्यान में गुंजा मधुरा माला मधुरा यमुना मधुरा बीची मधुरा सलिलम मधुरा कमलम मधुरम मधुराधिपते अखिलम मधुरम गोपी मधुरा लीला मधुरा युक्त मधुरम भुक्त मधुरम दृष्म मधुरम शिम मधुरम मधुराधिपते ओम स्वरूपा अखिलम मधुरम [संगीत] ओ गोपा मधुरा गाओ मधुरा यष्टि मधुरा सृष्टि [संगीत] मधुरा ललितम मधुरम फलितम
मधुरम मधुराधिपते अखिलम मधुरम श्री वल्लभाचार्य कृत मधुरा अष्टकम [संगीत] ओ भगवान प्रेम स्वरूप हो मधु रूप हो नित्य नवीन रस नवीन ज्ञान नवा उत्साह नई चेतना नई मधुरता देने वाले ओम स्वरूप आत्मदेव मरा वालड़ा मेरे प्रियतम मेरे अंतरात्मा देव [संगीत] ओ कई कलाएं एक साथ विकसित होगी इसमें प्रेम कला का प्रेम रस पी लो दुनिया झख मारे निगरा जाय मरो जल मरो अंगीठी मैं तो चाल चलूंगी अनूठी बाई मीरा कहे दुर्जन निंदक जाए जल मरो अंगीठी साकली गली में सतगुरु मिलिया तास बाता करता ठी राणा जी या बदनामी लागे माने मीठी कोई निंदो कोई विंदो
मैं तो चलूंगी चाल अनूठी साकली गली में सतगुरु मिलिया क्यों कर फिरू अपति सतगुरु मिल गया अब तो हजारों पुत्रों की मां हो गई माता माता जी लोग बोलेंगे एक दो बच्चा कर लो य कर लो राणा जीय बात मैं नहीं जानती मेरे को तो सतगुरु मिल गए सतगुरु जी सु बाता करता दुर्जन लोगों ने दी थी मीरा के प्रभु गिरधर नागर दुर्जन जल मरो जाए अंगीठी मैं तो चाल चलूंगी अन दिल दे बैठे तो जो होगा देखा जाएगा [संगीत]