सो टुडे वी हैव अ वेरीेंट एंड अ रनाउन डिग्निटरी डॉक्टर प्रशांत गोयल विथ अस। व्हाट इज द बिगेस्ट रीज़ जो यंग एडल्ट्स को बहुत ज्यादा स्ट्रोक्स आ रहे हैं। लाइक ब्रेन स्ट्रोक और एनी सॉर्ट ऑफ स्ट्रोक्स। बहुत बहुत इजीली सफर कर रहे हैं वो लोग। यूजली अ जो पहले स्ट्रोक्स होते थे वो आप सही कह रहे हैं कि ओल्ड एज में ज्यादा होते थे। हम हम लेकिन आजकल ऐसा देखा गया है कि जो हमारे पास केसेस आ रहे हैं वह 40 30 में भी स्ट्रोक्स अब कॉमन हो गए हैं। हम हम तो उसका कुछ रीज़ंस
है जैसे कि अब जैसे जनरेशन बढ़ती जा रही है आज के ऐज में लोग स्ट्रेस बहुत ज्यादा लेने लगे हैं। हम हम तो जितना ज्यादा स्ट्रेस होता है स्ट्रेस बहुत बड़ा रीजन है कि स्ट्रोक हो। हम हम और दूसरी चीज के इतना स्ट्रेसफुल लाइफ है कि लोगों को अपने लिए एक्टिविटी अपनी फिजिकल एक्टिविटी पे ध्यान नहीं दे पा रहा है। तो वो भी एक रीजन रहता है। साथ में आजकल स्मोकिंग, अल्कोहल, सब्सटेंस अब्यूज ये भी चीजें बढ़ गई है। लोग अपने इतने फिजिकल एक्टिविटी नहीं दे पा रहे हैं अपने आपको और काफी जेंजीस ओबेसिटी भी
शिकार हो रहे हैं। तो ऐसे इन रीज़ंस की वजह से हम देखते हैं कि आजकल 40ज में भी पेशेंट्स स्ट्रोक्स के साथ आते हैं और वो काफी पेशेंट्स के और उनकी फैमिली के लिए भी काफी रिस्की रहता है। तो इसके पहले भी ऐसा होता था कि यू नो पहले भी लोग यू नो जब जैसे हमारे बुजुर्ग होते थे जैसे मेरी जो ग्रैंडफादर थे वो तो ये तंबाकू और ये बीड़ी वगैरह सब पीते थे। मतलब जस्ट आउट ऑफ क्योंकि यह सवाल मेरा नहीं है। यह सवाल एक्चुअली मोस्टली यूथ का ही होगा क्योंकि इनकी तो लाइफस्टाइल हो
चुकी है एंड इनको तो चाहिए ही चाहिए। लाइक इनके लिए तो लाइक मंडे टू फ्राइडे इन्हें काम करना है और सैटरडे संडे इनको एंजॉय करना है। मतलब इनके लिए वो थेरेपी होती है। राइट? सो ये पहले भी तो करते थे पर तब इतना प्रॉब्लम नहीं होता था जितना आज ये हो चुका है। व्हाई दिस इज सो? देखिए पहले की लाइफ स्टाइल काफी अलग थी। जैसे हमारे जो बुजुर्ग लोग हैं उनकी लाइफ स्टाइल काफी अलग थी। अर्ली टू बेड, अर्ली टू राइस। वो तो बहुत पहले खाना खा लेते थे। जल्दी सोने लगते थे। जल्दी उठते थे।
आज तो आप यूथ देखेंगे रात को 12 1 2:00 बजे तक सिर्फ अपने मोबाइल पे ही लगा हुआ है। हम Facebook, Instagram, तो एक जितना लेट आप सोएंगे और जितनी कम स्लीप लेंगे उतना बॉडी में कॉर्टिसोल लेवल ज्यादा इनक्रीस होगा जो कि हार्मफुल रहता है। तो यह भी कुछ रीज़ंस हैं। दूसरा अब एडल्टेशन फूड का एडल्टेशन इतना ज्यादा हो गया है। पहले आपको काफी हेल्दी फूड्स मिलते थे। ठीक है? पहले आपका फास्ट फूड वगैरह नहीं थे। अब फास्ट फूड बहुत ज्यादा जजी ज्यादा एज अब लोग फास्ट फूड ज्यादा ले लेते हैं। स्मोकिंग अल्कोहल पहले के
समय कम था। अब तो स्मोकिंग, अल्कोहल और वीड्स यह इस इन सबका सब्सटेंस अब्यूज का इन सबका सेवन ज्यादा हो चुका है। अच्छा। तो और पहले की लाइफ इतनी स्ट्रेसफुल नहीं थी। इतना लोग मटेरियलिस्टिक वर्ल्ड पे नहीं थे। अब की लाइफ ऐसा है कि लोग मटेरियलिस्टिक वर्ल्ड में है और उनका प्रेशर वर्क प्रेशर भी इतना ज्यादा है। तो वो स्ट्रेस भी पहले कम था अभी ज्यादा है अब की जनरेशन में। तो यह सब एक कंपाउंडिंग रिस्क है जो कि एक मिलाके एक बहुत बड़ा रिस्क बनता है स्ट्रोक। इसीलिए पहले के में आप देखते हैं कि
ओल्ड एज में और पहले की कम आते थे और अब ये रिस्क इसीलिए बढ़ गए। क्या आपका मानना यह भी है कि पहले जो फूड की क्वालिटी होती थी जो दाल राइस इसके लिए अभी यू नो बहुत ट्रांसफॉर्म हो के अभी ऑर्गेनिक फूड्स आने लगे हैं। सो जो फूड की क्वालिटी होती थी वो भी चेंज हो गई है क्योंकि पहले के दाल राइस और यू नो रोटी गेहूं ये सब बहुत अलग इससे मिलता था और अभी कुछ अलग एरीना से मिलता है। इस पे आप कुछ कहना चाहेंगे? देखिए पहले के समय और अभी के समय
में फूड में एडल्टेशन तो हो ही गया है। हां हां ठीक है। आप घी वगैरह और दाल ये सब किस चीज में एडल्टेशन अब तो ये कहा भी नहीं जा सकता है। आपको हेल्दी शुद्ध सब्जी या वेजिटेबल्स आपको घी फ्रूट्स अब ये सब नहीं मिल सकते हैं। पहले पैक्ड फूड्स नहीं होते जो जो भी पैक फूड्स होते हैं उसमें पैकेजिंग आपके प्रिजर्वेटिव्स मिलाए जाते हैं और टेस्ट फूड आजकल ज्यादा लोग खाते हैं। तो ये सब रिस्क है स्ट्रोक के। सो यह बहुत ही इंपॉर्टेंट क्वेश्चन है और यह आई थिंक इंडिया में कम से कम एटलीस्ट
80 टू 90% यू नो मेल्स और फीमेल्स ये मतलब ये सफर करते ही हैं या फिर तो वो किसी हेडेक को भी यू नो समझ लेते हैं कि यह माइग्रेन ही हो सकता है। सो आर माइग्रेन जस्ट हेडेक्स और अ साइन ऑफ डीपर मतलब वह एक हेडेक है या फिर वह एक डीप एक ब्रेन इशू है। मतलब कोई बहुत बड़ा इशू चल रहा है आपके ब्रेन में? देखिए माइग्रेन एक नॉर्मल हेडेक तो नहीं है। हेडेक अलग और माइग्रेन एक टाइप का हेडेक है। इट सिग्निफाई सम एब्नॉर्मल ब्रेन एक्टिविटी। हम हम एंड अ इट अकर्स बिकॉज़
ऑफ़ द अह नर्व्स अह सराउंडिंग द ब्लड वेसल्स इन द ब्रेन। ओके? अ दैट लीड टू सडन हेडेक। तो ये हेडेक नॉर्मल माइग्रेन इज नॉट नॉर्मल हेडेक इट सिग्निफाई एबनॉर्मल ब्रेन एक्टिविटीज। सो जैसे माइग्रेन का जो पेन होता है वो कैसा होता है? माइग्रेन देखिए टू थ्री टाइप्स के माइग्रेन होते हैं। मोस्ट कॉमन जो माइग्रेन होता है उसका पेन होता है। इट स्लोली अकर्स एंड विद टाइम हाफ एन आवर टू वन आवर इट इंक्रीसेस एंड टू सम सीवियर इंटेंसिटी। एंड इट्स मोस्टली सब साइड टू वन साइड ऑफ द वेन। एक साइड रहेगा और धीमे-धीमे स्टार्ट
होगा। स्टार्ट होने के बाद काफी तेज हो जाएगा। लाइट और साउंड से इरिटेशन होगी। इस समय कभी-कभी आंखों में रेडनेस या टियर्स भी आ सकते हैं और किसी किसी पेशेंट्स में वोमिटिंग हेडेक के साथ वोमिटिंग भी आ जाता है जब कोई माइग्रेन होता है तो वो एक्सेसिव स्टेज पे जाता है ना यू नो वोमिटिंग और फीलिंग यू नो वेरी नजियाटिक एंड एवरीथिंग वो एक्सेसिव माइग्रेन होता है। धीमे-धीमे माइग्रेन जब बढ़ता है तो इस फॉर्म ये फॉर्म ले लेता है। अगर अगर मेडिकेशंस पेशेंट कोई मेडिकेशंस नहीं ले रहा है उसको ओमिट कर रहा है तो धीमे-धीमे
माइग्रेन अह इस फॉर्म में आ ही जाता है। सो माइग्रेन बेसिकली सबसे ज्यादा ये ब्रेन स्ट्रोक पे ही जाएगा। मतलब अगर माइग्रेन एक्सेसिव बढ़ रहा है तो सबसे मतलब सीधे अटैक ये स्ट्रोक पे ही जाएगा। नहीं नहीं ऐसा नहीं है। माइग्रेन इज अ रिस्क फॉर स्ट्रोक। लेकिन ऐसा नहीं है कि एव्री माइग्रेन विल लीड टू स्ट्रोक। ओके। ये एक रिस्क फैक्टर हो सकता है स्ट्रोक के लिए। लेकिन ऐसा नहीं है कि हर माइग्रेन अगर ट्रीटमेंट नहीं लेगा तो उसको स्ट्रोक भी होगा। ओके। सो व्हाट व्हाट आर द रिस्क फैक्टर दैट कॉजेस माइग्रेन? रिस्क माइग्रेन कुड
बी इनक्रीस इन पेशेंट्स हु आर टेकिंग वेरी लेस स्लीप एंड हैविंग अह मच स्ट्रेस इन देयर लाइफ। दीज़ आर द कॉर्सेस दैट कैन लीड टू माइग्रेन। व्हेन मोस्टली फीमेल्स हैव अह माइग्रेन इन बिकॉज़ ऑफ़ द हॉर्मोनल चेंजेस दैट कैन आल्सो लीड टू माइग्रेन। ये बहुत ही इंपॉर्टेंट क्वेश्चन है जो हर कोई जानना चाहेगा। कैन एक्सेसिव स्क्रीन टाइम कॉज परमानेंट ब्रेन डैमेज? नो एक्सेसिव स्क्रीन टाइम डस नॉट लीड टू अ ब्रेन डैमेज। हां। बेसिकली स्किन दे एमिट नॉन आयनाइजिंग रेडिएशंस तो दे डज नॉट पेनिट्रेट ब्रेन टिश्यू एंड डज नॉट डैमेज ब्रेन या लेकिन जो स्क्रीन टाइम
है इससे अ ये हार्मफुल है। स्क्रीन टाइम एक्सेसिव स्क्रीन टाइम हमारी बॉडी को हमारे माइंड को कंसंट्रेशन की एबिलिटी हमारी कम कर देता है। अलर्टनेस कम कर देता है। हमारा एडिक्शन ज्यादा हो जाता है और जितना हम स्क्रीन टाइम ज्यादा अगर लेट नाइट यूज़ करते हैं इसको तो जो हमारा कॉर्टिसोल लेवल है ब्रेन का बॉडी का वो इनक्रीस होता है जो कि हमें हर समय एक स्ट्रेसफुल लेवल पे रखता है। तो इसलिए भी जो हमारी मेमोरी पावर कम हो जाती है, अलर्टनेस कम होता है। थिंकिंग एबिलिटीज भी हमारी अगर एक्सेसिव स्किन टाइम है वो भी
कहीं ना कहीं अफेक्ट होता है। थैंक यू सो मच कि आपने बहुत ही इंसाइटफुल और बहुत ही यू नो मतलब यहां पर जितने भी हमारे ऑडियंस है यह सब आज यू नो एनलाइटन हो चुके हैं वि यू नो स्ट्रोक नॉलेज थैंक यू सो मच वंस अगेन