[संगीत] ललित कुमार जी अलीगढ़ से राधे राधे महाराज जी महाराज जी आपके चरणों में कोटि कोटि प्रणाम महाराज जी क्या संतान से अधिक मोह या प्रेम करना गलत है जब भी उन्हें कोई चोट या बीमारी होती है तो अंदर बहुत दुख होता है महाराज का ऐसा ही हृदय होता है पर उसमें भगवत भाव कर ले तो मोह का नाश हो जाएगा अगर मोह के तो सब लोग ही मोह करते हैं सब पूरा संसार इसी में आप तो मान लो पुरुष स्वरूप में हो मनुष्य स्वरूप में हो सु कुत्ता भी अपने बच्चों से प्यार करते हैं
नहीं करते पशु पक्षी भी देखो बंदरिया को बच्चा मर जाए तो भी छाती से लगाए रहती कई दिन तक जी हर जीव अपने बच्चा से प्यार करता यह स्वाभाविक सृष्टि का नियम है अगर हम प्यार करते हैं और वही भगवान देख ले कि मेरे भगवान इस रूप में पक्की बात भगवान है नहीं तो भगवान चाहे जितना आप प्यार करते हो भगवान अंतर्ध्यान हो जाए तो उस शरीर को आप दो चार दिन भी नहीं रख सकते चाहे पुत्र हो चाहे पत्नी हो चाहे जिससे तो आप कहीं नान कहीं भगवान से ही प्यार करते हैं अनजाने में
भी तो जानकर प्यार करो तो वह प्यार जो मोह बंधन का कारण है वही मोक्ष का कारण बन जाएगा आप पुत्र में भगवान की भावना करके ऐसा ही प्यार करें जैसे जरा अब कोई हमारे ठाकुर जी जैसे हम लिए जा रहे हैं ऐसे थोड़ी सी ठोकर लग जा नहीं नहीं नहीं क्योंकि मेरे ठाकुर जी मेरे प्राण तो ऐसे बच्चा के प्रति जो अपना भाव आता है ना तो वोह हम भगवान की भावना कर मेरे भगवान इसमें विराजमान है और सच्ची मानिए इस शरीर रूपी मंदिर के हृदय देश में गर्भ गृह में भगवान सबके विराजमान है
हम भावना कर ले कि हमारे पुत्र में भगवान हमारी पत्नी में भगवान तो हम मोह पास में बंधे नहीं नहीं तो तो मोह पास बहुत विचित्र है अब क्या पता कितने दिन के लिए कौन शरीर है हम पूरे आसक्त हो गए और इसके बाद इस लोक का नाम क्या है क्या नाम है इस लोक का अवश्य होगी अवश्य होगी अब हमारी हालत क्या होगी थोड़ी देर के लिए सोचो जिससे हम प्यार करते हो हमसे बिछड़ जाए तो हमारी हालत क्या सुनना नहीं चाहेंगे होना तो बात अलग हम सुनना नहीं चाहेंगे यह संसार का खेल है
कब कहां क्या होता है कुछ पता नहीं चलता है तो हमें लगता है हमें तैयार रहना चाहिए कि श्री भगवान सबके अंतर में विराजमान है और भगवान सब समय हमारे साथ रहते हैं भगवान जब सर्वत्र है तो हमारे पास भी हैं भगवान सब समय में है तो इस समय भी है भगवान सबके हैं तो हमारे भी है तो फिर हमें थोड़ा ज्ञान हो जाएगा तो हम मोह पास में नहीं तो बहुत विचित्र मोह पास है एक 70 वर्ष के बाबा मतलब वृद्ध हम उस समय नेटिक ब्रह्मचर्य में थे तो आश्रम में तो वो सुबह नहा
के एक फोटो निकाले ऐसे और अगरबत्ती ऐसे करके रोने लगे तो हमें लगा इनकी गुरु माता होंगी क्योंकि जैसा भाव उनका देखा ना कि आज धूप बत्ती करना और रोना तो नजदीक पूछा नई अवस्था थी हमारी कि बाबा ये आपकी गुरु माता है उ कहा नहीं तो फिर उ कहा कौन है कुलदेवी है ने कहा नहीं हमारी पत्नी है अब वो पधार गई इतने आसक्त पत्नी के फोटो रखते उसे अगरबत्ती करके और रोते कोई भगवत भाव नहीं हमें लगा कि यार अगर ये इतना भाव थोड़ा सा ट्रांसफर हो जाए और इसी छवि में भगवान को
देखने लगे तो भगवान की प्राप्ति हो जाए पर मोह बहुत विचित्र होता है तो इसलिए हमें लगता है कि यह जो प्यार है ये चराचर जगत के हृदय में है इसी प्यार को और बढ़ाओ पर भगवत भाव कर लो तो तुम्हारा कल्याण हो जाएगा तुम्हारा मंगल हो जाएगा जी जसवंत सिंह जी दिल्ली से राधे राधे राधे राधे महाराज जी मराज जी आपके चरणों में कोटि कोटि प्रणाम मराज जी बचपन से ही मेरा लक्ष्य भगवत प्राप्ति और भगवत प्राप्त संतों को गुरु बनाने की जिज्ञासा थी ताकि मैं अपने जीवन के लक्ष्य को प्राप्त कर सकू और
भगवान श्री कृष्ण का भजन करूं बचपन में मुझे वैराग्य हो गया और यही धुन लगी कि मुझे संन्यास लेना भगवत प्राप्ति करनी है बच्चा था किसी धार्मिक पुस्त में पढ़ा कि संन्यास लेने के लिए माता-पिता का आशीर्वाद लेना जरूरी है नहीं तो संन्यास नहीं होता पिताजी नहीं रहे माताजी ने आशीर्वाद नहीं दिया मा महाराज जी क्या यह मेरा प्रारब्ध था जो मैं सन्यास नहीं ले पाया भगवत मार्ग पर चलने वाले के लिए संबंधियों का प्रार नहीं नहीं प्रारब्ध भाग्य में भगवत प्राप्ति किसी के नहीं लिखी इसमें दृढ़ता चाहिए इसमें प्रारब्ध काम नहीं करता किसके शरीर
संबंधी ऐसे सहज में बाबा जी बनने देते हैं सहज में थोड़ी बने हमारे पिताजी भक्त थे पर सहज में कौन चाहता है कट्टरता हमारे बड़े भ्राता इस शरीर के आए चलो घर चलो जा अब वो तो खोजबीन शुरू हुई तो पता ही चल जाता है बोले गोरा गोरा लड़का है वहां मंदिर में है तो पकड़े गए हम 13 वर्ष की अवस्था थी अभी चार पांच दिन घर से भागे हुए थे वहां तो सब तो पिता तो पिता ही होते जोही थोड़ी देर में देखा तो पिताजी आए खड़ी की साइकिल डंडा साथ में और डंडा साथ
रखते थे किसान आदमी फिर हिम्मत किया कि चाहे मार डाले ना उठेंगे ना जवाब देंगे बस हम निश्चय किया है मारेंगे जरूर लेकिन हम बोलेंगे नहीं उठेंगे नहीं चाहे मार डाले और जब नजदीक आए वो खड़े हो उनका स्वभाव बहुत हम कुछ नहीं बोले चुपचाप ऐसे बैठ सुना नहीं फिर भी नहीं बो बोले हम प्यार से कह रहे खड़े हो जाओ हमारे प्रश्नों का उत्तर दो तो हमें लगा गुंजाइश है तो खड़े हो गए तो उ मतलब एक तो भय उनका और दूसरा भगवान के प्रति समर्पण तो उन्होंने कहा चलो बैठो गाड़ी पर घर चलो
नहीं आप जीवन में कभी घर नहीं जाएंगे क्यों किसी ने कुछ कहा हम कहा नहीं और रोने लगे हम कहा हमें भगवान चाहिए हम भगवत प्राप्ति करना चाहते हैं आपका हमें आशीष मिले और आप जाओ हमें छोड़ दो भगवान के सारे पता नहीं क्या हुआ एकदम उनकी मतलब मती पलटी और ऐसे ऐसे छाती से लगाया और कहा सच्ची बात भगवान प्राप्त करना चाहते हो हम कहा सच्ची बात पर ऐसे ऐसे खोपड़े में हमारे हाथ फेरा और कहा अगर उसर में भी बैठोगे ना तो आशीर्वाद देता हूं फूलों की वर्षा होगी और एक बात जिंदगी में
अगर हमें सुनने को मिली कि किसी मां बहन की तरफ देखा है कि तुम्हें इतनी बात समझ लो तो हम कहा जिंदगी में यह बात आपको कभी सुनने को नहीं मिलेगी और बोले जिंदगी में कभी लौटकर गांव की तरफ मत देखना अगर वैराग्य लिया तो फिर भगवान की कृपा से उनके आशीर्वाद से यह मोहरा टल दूसरा मोहरा मां का बहुत बड़ा यह बहुत सबसे बड़ा होता है इसमें थप्पड़ का भय नहीं था इसमें आंसुओं का भह था क्योंकि यह टालना बहुत कठिन होता है जो सुना अम्मा आ रहे है क्योंकि जाग बता दिया वो नहीं
आएगा वो बाबा जी बन गया पक्का जो माता जी को तो हम फिर भगवान से प्रार्थना की कि हे भगवान मां से बात करने की हमें सामर्थ्य दो क्योंकि उसके आंखों की आंसुओं के सामने और वो कोई प्रवचन थोड़ी होते हैं वो तो हृदय की मार होती है ना अब जो ही आए स दौड़ के से बबुआ गले अ कहा अब तो ेर हो गए अब क्या उत्तर दे और रो रही ऐसे हम कहा बैठो बैठे हम कहा आप हमें बताओ जिस मार्ग में हम जा रहे क्या गलत है बोले कभी नहीं गलत है कभी
नहीं कहूंगी कि गलत है रात दिन भजन करना पर जब तक हम जीवित रहे हमारे सामने घर में रहो और तुम भजन करो केवल भजन करो हम कहा अम्मा ऐसा नहीं होता जब गांव गली में घर गृहस्थ में रह जाता है तो निरंतर भजन नहीं होता वो साधु संग और लक्ष्य से होता है तो हमका भया हम भगवान के में आप दोबारा कभी हमारे सामने मत आइएगा उठी और ऐसे मस्तक पर हाथ रखा और कहा जिंदगी में कभी हम तुम्हारे सामने नहीं आएंगे जाओ भगवान का भजन करो बस वो मरी की जी पिता मरे की
जीए परि जब से निकले तब से आज तक तो कट्टरता अपनी कट्टरता अपना लक्ष्य दृढ़ मर चहे जाऊ नहीं नए न भगवान के मार्ग में चलूंगा हमारे प्रारब्ध में नहीं लिखा कि हम भगवत प्राप्ति करेंगे मनुष्य ज भगवत प्राप्ति के उद्योग के द्वारा प्रयत्न के द्वारा होती है तो हम प्रयत्न के द्वारा अपने प्रारब्ध को शिथिल करके आए अगर उन्हीं की बात में आ जाते तो घर परिवार संसार जब भगवान के मार्ग में चले तो कितने कष्ट हुए पूरा जीवन जवानी गंगा के किनारे कष्ट प्रत बस गंगा के किनारे क्योंकि गांव गली में जा नहीं
सकते आज 13 से 55 वर्ष की आयु का यात्रा हो गई भगवान निपटा दे अब किडनी फेल है जब इतने दिन भगवान रखे इसमें कट्टरता चाहिए आप कट्टरता से चूक गए इसलिए गृहस्थ में चले गए प्रारब्ध इसम जोर ले कसता इसमें पुरुषार्थ काम करता है तनीशा जी राधे राधे मराज जी आपके चरणों में कोटि कोटि प्रणाम महाराज जी मेरा प्रश्न है कि भक्ति मार्ग पर कैसे टिके रहे और क्रोध मोह गिरा देते हैं कैसे कम करें इसको देखो अगर तूफान चल रहा हो किसी पर्वत का अडिग वस्तु का सहारा ले ले तो हम बच जाते
हैं ऐसे काम क्रोध लोभ मोह मद मत्सर य तूफान है तूफान ये हवा नहीं है यह तूफान है किसी को भी उड़ा सकते हैं किसी को भी भ्रष्ट कर सकते हैं तो सबसे बड़ा जो अडिग स्थान है वो भगवान बता रहे हैं सबकी ममता ताग बटोरी मम पद मनही बांधी बर री सबकी ममता बत करके रस्सी करके मन को मेरे चरणों में बांध दे भगवान के चरण अडिग है भगवान के चरणों को काम क्रोध लोभ मोह मध मत्सर कोई नहीं उखाड़ सकता भगवान के चरणों को उखाड़ना तो बात जाने भक्त के चरण को नहीं उखाड़
सकता जब बार-बार रावण ने कहा भगवान श्री राम को मनुष्य मनुष्य नर तो उ कहा तुम उनको केवल मनुष्य समझते हो मैं उनका एक दूत हूं मैं एक शुद्र दूत हूं और ताल ठोकी और कहा मैं पैर जमा रहा हूं तेरी सभा में कोई वीर हो तो उखाड़ के दिखा दे अगर मेरे पैर को हिला भी देगा तो राम जी वापस चले जाएंगे सिया जी हार जाएंगे कितनी बड़ी बात स्वामी की इतना बड़ा अधिकार थोड़ी सेवक को होता है सिया जी को हार जाएंगे वापस चले उखाड़ दे पैर राम प्रताप सुमिर पन रोपा किसीने किसी
की ताकत नहीं जब भक्त का चरण नहीं उठा पाए तो भगवान के चरण कौन हिला दे तो अगर हम काम क्रोध मोह मध मत्सर से बचना चाहते हैं तो हर समय नाम जप करते हुए भगवान के चरणों का आश्रय ले भगवान के चरण इतने मजबूत है कि हमें कोई हिला नहीं सकता हमें कोई डिगा नहीं सकता और अगर भगवान के चरण नहीं तो ना तपस्या रोक पाएगी ना कोई साधना रोक पाएगी जिस समय ये वेग आते हैं ना तो सब ज्ञान अपरत हो जाता है और वो वही करता है जो मन कहलाता है जो मन
कहलाते है भाई यह करना वही करना इसलिए भगवान के चरणों का आश्रय हरि शरण हरि शरणम हरि शरणम सन काद भी जपते रहते निरंतर सन काद भी जपते रहते तो हमें भगवान का नाम जपते रहना भगवान की शरण में रहना उसी से सब ठीक हो जाएगा जय प्रकाश प्रजापति जी गोरखे राधे राधे महाराज जी आपके चरणों में कोट कोटि प्रणाम गुरुदेव भगवान मुझे मेरे जीवन में ऐसा प्रतीत हो रहा है कि सब कुछ स्वप्न जैसा लग रहा है यह मेरा मन का कोई खेल है या वास्तविक जीवन है नाम जप करते हो कितनी देर सम
समय करते रहते समय समय पर करते रहते हैं माराज जी कौन सा समय होता है जिसमें नाम जप होता है जैसे कुछ काम किया फिर दिमाग हट गया फिर उसके बाद नाम जप और अभ्यास करो और क्या स्वपना आपको लग रहा है कुछ हो रहा तो ऐसा लग रहा है कि ऑटोमेटिक हो जा रहा है उसके बाद फिर अच्छा है अच्छा है भगवान की माया के द्वारा गुण में गुण बरत रहे हैं य ज्ञानी जन देखते हैं और भक्त जन देखते हैं कि भगवान की इच्छा से सब कुछ हो रहा है व अपने को करता
नहीं मानते हैं दोनों ना ज्ञानी और ना भक्त भक्त देखता है कि भगवान के द्वारा सब कुछ हो रहा है जैसे चराचर जगत में हो रहा है ऐसे शरीर में भी हो रहा है पर भक्त के द्वारा कभी पापा चरण नहीं होते ज्ञानी के द्वारा कभी अधर्मा चरण नहीं होते जो ज्ञानी देखता गुणन गुण वर्तन तो ऐसा नहीं कि व पाप को भी देख रहा है पाप उसके द्वारा हो ही नहीं सकता जो ऐसा देखता है भगवान के द्वारा सब कुछ हो रहा है तो अहंकार में ही काम क्रोध लोग होते हैं इस वृत्ति में
सब कामनाएं नष्ट हो जाती हैं अपने को देखो क्या आपकी ऐसी स्थिति है कि किसी भी तरह की कोई कामना नहीं रह गई ना भोग की ना पद प्रतिष्ठा की ना अर्थ की ना जीने की ना मरने की कोई आकांक्षा नहीं तब माना जाएगा कि आपको पूरी सृष्टि स्वप्न वत दिखाई दे रहे है ब्रह्म सत्यम जगन मिथ्या उमा कहू मैं अनुभव अपना सत हरि भजन जगत सब सपना आप देखोगे क्या आपकी स्थिति ऐसी है अगर नहीं है तो उसको प्राप्त करने के लिए मनुष्य जन्म मिला है सत्संग सुनो खूब नाम जप करो और यही भाव
आगे बढ़ाते चले जाओ तो जब पुष्ट हो जाएगा तो सिद्ध हो जाता है फिर स्वाभाविक प्रवृत्ति ही बनी एक एक वृत्ति भगवता का हो जाती है ठीक है साक्षत टिंकर जी राधे राधे महाराज जी महाराज जी मैं ये पूछना चाहता हूं कि कलयुग में तप कैसे किया जाए क्या सिर्फ नाम जप तप करने के बराबर माना गया है त तप बराबर कैसे हो सकता है नाम के बराबर तप कैसे हो सकता है ये तो नाम का मतलब अवहेलना करना होगा तप जो होता है वो तीन प्रकार का होता है एक होता है शरीर का तप
गर्मी सर्दी सहना जैसे देखो कुछ तपस्वी जन है गर्मी में आग लगाकर आसपास से बैठते हैं कुछ सर्दी में जल में गले तक खड़े होकर के भूक प्यास सहना बाहरी जो आगंतुक प्रकृति जनित कष्ट है उनको सहना उनसे विक्षिप्त ना होना उसे शारीरिक तप कहते हैं मानसिक तप के बिना शारीरिक तप का कोई महत्व नहीं बनता क्योंकि शरीर का स्थूल ढांचा ये क्रियात्मक कष्ट सहा लेकिन मना स्थिति क्या है तो मना स्थिति में जब काम का प्रहार हो क्रोध का प्रहार हो ये ताप है लोभ मोह मद मत्सर ईर्ष्या द्वेष मान अपमान स्तुति निंदा इनको
समान भाव से जो सह गया व मन का तपस्वी तन का तपस्वी तो कोई भी हो सकता है लेकिन उसका फल है मन का त और वाणी का तप है निरंतर भगवान का नाम जप करते हुए मौन रहना बोलना तो भगवत शब्दों में बोलना सत्य बोलना हितकर बोलना यह तो तप महत्व शली है बाहरी दिखावे को तप नहीं कहते व्रत संयम नियम ये अहंकार की पुष्टि अगर कर दिए तो सब बेकार हो गए लेने से क्या तपस्या पूर्ण हो गई यही खास बात है भगवान के आश्रित होकर दैन्य भाव से आप जल में रहो चाहे
फल में रहो चाहे रोटी में रहो चाहे उससे कोई फर्क नहीं पड़ता आपका चिंतन क्या हो रहा है आप चिंतन कहां में जहां चिंतन वही आपकी स्थिति हां भगवान के लिए किया जाए और दैन्य रहा जाए और नाम जप किया जाए तो यही तप भगवत प्राप्ति करा देगा कलयुग में सबसे बड़ा तप है पापा आचरण ना करते हुए नाम जप करलो बस हमारी बात मान लो चाहे रोटी खा के रहो चाहे फल खा के रहो चाहे पानी पी के रहो भगवान का स्मरण नहीं हो रहा तो सब बेकार है भगवत स्मृति हर समय नाम जप
करते रहो कलयुग केवल नाम आधारा सुमिर सुमिर नर उतरे पारा यह कलिकाल मला यतन मन कर देखि विचार श्री रघुनाथ नाम बिनु ना हिन आन आधार समझ रहे ना बच्चा अंदर काम सतार उसको सह गए भारी तपस्वी काम का ताप सह गए बाहर की आग सही जा सकती अंदर की आग नहीं सही जा सकती किसी ने गाली दी व अंदर जाकर जला रही सह गए चुपचाप तपस्वी यह तपस्या क्योंकि इसमें प्रदर्शन नहीं है प्रदर्शन में लोकरी झावा है लेकिन वह व्यक्ति मान अपमान सुख दुख लाभ हान सबको शांत भाव से सहकर भजन कर रहा है
उसको कोई नहीं जान पाएगा उसको भगवान जानेंगे उसे भगवत प्राप्ति होगी तो तपस्या का अर्थ है आए विकारों को सह जाना सच्ची तपस्या पर यह बहुत कठिन है यह बहुत कठिन है भगवान के लिए जो किया जाए कोई प्रदर्शन ना हो दिखावा ना हो तो हर बात भगवान को पसंद आ जाएगी तुम्हारा व्रत रहना तुम्हारा कष्ट सहना सब भगवान एक एक का हिसाब देंगे और दिखावे के लिए हो तो भारी से भारी तप भी किसी काम का नहीं है जी इस इस प्रसंग में हम देखते हैं कि दुर्वासा जी दूप का रस पीते थे और
बलक की लंगोटी लगाते थे अमरीश जी चक्रवर्ती सम्राट थे लेकिन महाराज दुर्वासा परास्त हो गए अमरीश जी की भक्ति के कारण क्यों निरंतर भगवान का स्मरण जितने व्रत संयम उपवास उपासना सब भगवान के लिए तो हार गए दुर्वासा जी चरणों में गिरे आक अमृत जी के पूरा चरित्र सुनो ना तपस्या वही सार्थक जो भगवान के लिए की जाए दिखावे के लिए नहीं दूसरे को दिखा ने के लिए तो फिर उ दंब पाखंड हो जाता है चंद्रेश जी लंडन से राधे राधे महाराज जी जैसे कोई बाहर से आते हैं तो काफी जगह मंदिरों में जाते हैं
तो वहां उनको पैसे चढ़ाने के लिए बोला जाता है यहां चढ़ाओ वहां चढ़ाओ बट वो ये बाहर से जो लोग आए हैं वो सोचते हैं कि एकदम भागवती होगा या ऐसा होगा क्योंकि सत्संग सुनते हैं वो भी बट उनके फिर वैसे वैसे हम आपको इतना बता दें अभी पीछे वाले बैच में बताया था इसके आपकी बात का खंडन भी करेंगे और आपकी बात का मंडन भी करेंगे पहले मंडन कर रहे हैं कि जो धाम आदि का सेवन करते हैं या मंदिर आदि का सेवन करते हैं अगर उनको भगवान पर भरोसा और प्यार नहीं है तो
रुपए पर भरोसा और आने वाले लोगों पर भरोसा होगा ना तो अब वो उनसे क्योंकि भोग सामग्री रूप से मिलेगी रुपय से मन माने अब मानव शरीर है तो अपनी वासनाओं की पूर्ति के लिए भगवान पर दृढ भरोसा ना होने के कारण वह सामने वालों पर ऐसा व्यवहार करते हैं अब हम उसको पलट करके आपकी भावना को शुद्ध करने के लिए कहते हैं कि यदि हमारे पास है तो हम उसे बिहारी जी का आदेश मानते हैं और उनकी आंख में आंख मिलाते हैं कि धन्य है आप अपनी वस्तु को ले रहे हैं सीधे बिहारी ले
रहे सीधे बिहारी व कहीं ना कहीं भगवत आश्रित ही बोलेगा ऐसा उनसे आंख मिलाओ कि हम समझ रहे आप बोल नहीं रहे यही बोल रहे हैं ये लो तो दिय बस्तु गोविंद तो परम मंगल हो जाएगा अगर हम कहीं विचार करें तो ठाकुर जी के सिवा उनका कोई व्यापार नहीं है परिवार है लड़का बच्चा है ठाकुर जी को भी भोग लगाना है पोशाक पहनी और लड़का बच्चा को भी पोशाक पहना नहीं उनको भी खवाना पियाना है तो अगर भगवान पर विश्वास है तो आपसे मांगना नहीं पड़ेगा अपने आप सब पूरा होगा और अगर वासनाओं की
पूर्ति चाहिए तो फिर ऐसे पर है तो भगवान ही तो हम आए तो थे दर्शन करने सर्वस्व समर्पण करने कि हे नाथ मैं जैसा हूं आपका हूं अगर है तो दे देते हैं नहीं है तो उनसे आंख मिलाकर कहते हैं कि मजाक मत करो आपने जेब में 500 दिया 5000 कह रहे कहां से दूं भगवान से सीधे बात करें आपने मजाक क्यों करवाए दिया तो 500 है अ कह रहे 5000 दो कहां से दे और अगर 5000 है तो उनमें हमें आना है जाना है खाना है पीना हम 500 दे सकते हैं यह लो ऐसे
खुली बात करना चाहिए डरना नहीं चाहिए और भगवान से बात करनी चाहिए क्योंकि वो बात नहीं करेंगे ना वो अपने पार्षद से करवा रहे हैं तो ऐसे बात करें और बिल्कुल निर्विकार रहे किसी पर दोष दर्शन ना करें क्योंकि इनका भी परिवार है इनका भी जीवन है और सबको भगवान का भरोसा होता नहीं यह भी बात जान लो भगवान के पास रहते हुए भी भगवान का भरोसा नहीं होता अगर भगवान का भरोसा है तो मांगना नहीं पड़ेगा प्यारे अगर भगवान पर विश्वास है तो अनंत ब्रह्मांड चलाते हो तुम वैष्णव को नहीं चलाएंगे अपने दासो को
नहीं चलाएंगे पर होता क्या हमें भगवान पर विश्वास नहीं होता तो फिर वो उसी कोटि का जीवन हो जाता है भगवान पर विश्वास है तो आपसे सच्ची कहते सच्ची कहते हैं ऐसे व्यवस्था करते हैं कि कैसे तुम्हें बताए जिस समय जिस समय जैसी आवश्यकता होगी उस समय वैसी व्यवस्था एक क्षण में कर देते हैं हम देखते हैं तो इस अब जैसे यहां के पंडा पुजारी है आप सच्ची मानिए हम उनके घरों की रोटी मांग के खाए हैं घरों में रोटी मांग घी की चपरी दिया है और कैसे पैसा पैदा करते हैं चलो हम तुम्हें निधिवन
घुमा दे सेवा कुंज घुमा दे फिर घर जाते पूरे परिवार के खानपान कपड़ा लगता सामग्री तो मुझे लगता है अहित नहीं होगा आपका ये ब्रज के परमधाम के पुरोहित जन है इनको अगर भोजन छाजन कपड़ा लत्ता की व्यवस्था हो गई इस तरह से इनकी खेती नहीं है किसी किसी के चाट की दुकान किसी के मुकुट की दुकान बस उसी से काम चलता है वो मांगेंगे नहीं और जो इस कोटि से व्यवहार करते हैं तो हमको थोड़ा उदार वृत्ति रखनी चाहिए और दोष दर्शन ना करते हुए हमारी जो सामर्थ्य स करेंगे अगर हमारे अंदर ठक जी
बैठे हैं कह रहे नहीं तो हम उनकी बात सुनकर भी अन सुनी करके प्रणाम करके चल देंगे म जी कोई अपराध नहीं नहीं कोई अपराध ऐसे नहीं अपराध काफी लोग तो ऐसे भी डर जाते नहीं नहीं नहीं बिल्कुल नहीं डरना चाहिए ऐसा कोई डर की बात नहीं आप एक रुपया मत दीजिए कोई अपराध नहीं नहीं ऐसे मन में आ रहा है तो हम दे देंगे हमारे हृदय में ठाकुर जी दिए हैं विश्वास हमारा श्रद्धा विश्वास के मान लो आप हमसे मांगे कि 500 दीजिए हमें पता लगे तुम शराब पीयोगे तो हम नहीं देंगे हमें क्या
पता कि तुम क्या करोगे जब हमें विश्वास हो गया हो गई हमारे भाव है तो हम दे देंगे नहीं नहीं देंगे इसमें कोई परेशानी नहीं सामने वाले का मांगना है आपको दे हां ना कुछ नहीं बोलना प्रणाम करना चल दे अगर सामने वाला उद्दंडता करे तो फिर कानून है ऐसे थोड़ी कि आप जेब काट लोगे आप जबरदस्ती करोगे फ भारतीय कानून व्यवस्था है क्यों इसमें आपको कोई संशय लगा हां अगर है तो बाट के खा लो नहीं है राधे राधे प्रणाम कर लिया चल दिया बकाया हम आपको कहते हैं मांगेगा जिसे भगवान पर विश्वास नहीं
भगवान बैठे हुए सबका भरण पोषण वही करते हैं लड़ाई झगड़ा करने क्या जबरजस्ती छीनने की क्या जरूरत है अगर वो श्रद्धा है तो आया है दर्शन करने 10 20 50 तो चढ़ाए ग ही जिसकी जितनी श्रद्धा है वैसा नहीं है कि कहना ही पड़े तो भगवान पर भरोसा रखे पर जब भरोसा भगवान पर नहीं रहता तो फ इंसान पर आ जाता है तो चलो आप भगवान के सेवक हो हमारे जो मन आया स भगवान में चला दिया और नहीं मनाया तो प्रणाम किया चले गए व क्या किसी भी तीर्थ पुरोहित की निंदा ना करें क्योंकि
उनका जीवनो पार्जन यही है उनकी कोई और व्यापार आदि नहीं है बहुत से ब्रजवासी जन ऐसे हैं जिनका जीवनो पार्जन है तड़के से खड़े हो जाते हैं पुलिस चौकी के आगे कार निकलेगी तो रुको रुको हम आपको दर्शन कराएंगे अमुक अमुक अमुक जगह आप उनको कार में बैठा रहो 14 जगह घुमा के तो अब अलग-अलग प्रक्रिया है हम तीर्थ आए हैं तो कुछ देने आए हैं हम कुछ दे दे पर किसी से हम दोष दर्शन करके पाप ना ले रया तुम्हारा स्वभाव जैसा एक रुपया भी खर्चा ना करो तो आपको कोई पाप नहीं लगेगा लेकिन
आप निंदा कर दो तो पाप लग जाएगा क्योंकि हम तीर्थ आए हैं ना और वो तीर्थ पुरोहित है उनका स्वभाव अपना है हम देने आए हम लेने नहीं आए हम पाप लेकर नहीं जाएंगे तो कुछ नहीं आपका स्वभाव आप ऐसे बर्ताव करो हमारी जेब में दम है भाव है तो दे देंगे नहीं है तो हम चल देंगे प्रणाम करके उसम कोई पाप नहीं लगता है क्या हमें लगता है कि धामा दि आवे तो जैसे एक पार्टी में आप जाते हो तो 10 20 हजार इधर उधर हो जाए चार दोस्त पिए खाए तो फिर नहीं ध्यान
देते ऐसा आजकल होता है कहीं छोटी से छोटी बात अगर चार लोग बैठ जाओ तो दो चार हजार खर्चा हो जाएंगे तो हमें लगता है अगर धाम तीर्थ आवे दो चार हजार बिहारी जो राधावल्लभ ज ब्रजवासी जनों में खर्चा हो जाए तो उसमें शोक ना करें नहीं गाड़ी में जरा सा ठोकर लाग 60 700 हजार एक लाख लग जाते और लाख रुपया अगर धाम में खर्चा कर दिए तो करोड़ों के बराबर हो गए पर धाम में खर्चा करना बहुत कठिन होता है तो हमें लगता है अगर कभी ऐसा हो तो पिता की तरह उदारता दिखा
कर के जो हो जितना अपने भाव तो 10 10 20 20 50 50 रप दे दिए प्रणाम किए नमस्कार किए उनमें दोष दर्शन ना करें दोष दर्शन करने से अपनी हार है ठीक है ना कोई संशय तो नहीं इसमें आप राजेश जी सूरत गुजरात से राधा महाराज जी आपके चरणों में कोटि कोटि प्रणाम महाराज जी मृत्यु को महोत्सव में कैसे परिवर्तित करें मृत्यु हमारे श्री कृष्ण है विभूतियों में कहा सब कुछ हरण करने वाले में मैं मृत्यु हूं तो जब मेरा प्रीतम नाटक कर रहा है और वह कोई भी रोल कर रहा हो स्वांग कर
रहा हो हम पहचानते हैं कि यह मेरा प्रीतम है तो क्या मुझे भय लगेगा वह एक भवा रूप लेकर के आ रहा है और हमारा परिचय है कि अरे यह तो मेरा प्रीतम है तो क्या भवे रूप में हम उसका आलिंगन नहीं करेंगे दूसरे डरेंगे हम नहीं डरेंगे एक बार एक सरकारी ऑफिसर जो पिस्तौल लगता था घर आया तो उसकी पत्नी ने कहा कि तुम इतना कैसे लेट हो गए सरकारी काम होते उम लेट हो जाते हैं नहीं रोज तो लेट नहीं होते आज कैसे लेट हो गए बदतमीजी की हद हो गई पिस्तौल निकाली गोली
भरी सामने और कनपटी में रख दिया अरे जाओ यार तुम फालतू ये दूसरे को दिखाया करो बोले असली गोली है पिस्तौल है तुझे डर क्यों नहीं लगा बोले आप मेरे हो आप मेरे प्रीतम हो आप मेरे पति हो ऐसा कर ही नहीं सकते बात समझ में आई ना वो चाहे जितना भयावह रूप रख के आवे वो मेरा प्रीतम है सब डर गए क्या नरसिंह भगवान से प्रहलाद जी डरे आप विचार करके देखो सब मोहित हो गए दैत्य क्या मोहिनी भगवान से देवता मोहित हुए क्योंकि पता है भगवान श्री हरि है जब मुझे पता है कि
भगवान श्री हरि के सिवा कोई नहीं तो मरने से सब जग डरा मेरो मन आनंद आओ आओ मेरा आलिंगन करो मृत्यु रूप से मेरा प्रीतम आलिंगन करो कोई डर नहीं और मृत्यु उसे भयावह लगती है जिसने शरीर से प्यार किया और शरीर के संबंधियों से प्यार किया और शरीर संबंधी भोगों से प्यार किया उसको मृत्यु भवा लगती क्योंकि वो सब छूट रहा है और जिसने केवल प्रभु से प्यार किया तो अपनी अटैची तो तैयार है चाहे जब फोन करो हम तैयार हैं बिल्कुल आले के लिए आओ मरने से सब जग डरा मेरो मन आनंद कब
मरि हो कब भेट हो पूरण परमानंद डर की इस बात का अविनाशी का बच्चा हूं मुझे कोई मार सकता है कोई मार सकता है और शरीर विनाशी से कोई बचा सकता है नहीं बचा सकता बस ठीक निर्णय पर रहे तो कोई भय ही नहीं कोई भय नहीं हां एक भय होता है आकस्मिक विचार भय भक्तों में नहीं होता बस अभी कोई चीख दे अभी ऐसे बोले इसका मतलब ब्रह्म प्राप्त नहीं भयभीत हो गया नहीं अकाशमा कोई घटना कोई आवाज कोई वो एकदम ऐसे हो जाएगा विचार भय नहीं रहता तो मृत्यु विचार के द्वारा नष्ट हो
जाती है किसकी मृत्यु किसी की मृत्यु नहीं आप हमें बताओ मृत्यु किसकी होती है किसी की नहीं शरीर पांच भौतिक है पंचभूत अपने में मिल गए अविनाशी चिदानंद भगवान का अंश अपने आसक्ति के कारण सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर के वासना को लेकर अगले जन्म में चला गया मृत्यु किसकी हुई कुछ नहीं माने हुए आकार का परिवर्तन ही मृत्यु माना गया नहीं मृत्यु किसकी हमें बताओ कौन मरा ना जल मरा ना अग्नि ना वायु ना पृथ्वी ना आकाश तत्व कोई मरा तो नहीं ना वो अपने में मिल गया जाके ये रूप बिगड़ गया इस रूप
के बिगड़ने को मृत्यु कह दिया गया और जो अविनाशी हम भगवान के अंश है इसको तो कोई मार ही नहीं सकता पैदा ही नहीं हुआ कोई मारने वाला नागने ना वरुणा स्त्र ना वाय वास्त्र किसी की सामर्थ्य नहीं नैनम छिंदंति शस्त्राणि नैनम ति पाव का न चैन क्लेप नति मारता कैसे मृत्यु का भय कैसे इस शरीर का राग ही मृत्यु का भय दिखाती है भोगों का राग ये जो कमाया सब छूट जाएगा यह सब प्री संबंधी छूट जाएंगे अब डर लगा अगर हमें प्रीतम पहले से ठीक चयन किया है तो आनंद आएगा यार शरीर छूटा
अपने प्रभु से मिलेंगे जाके अपनी श्री जी से मिलेंगे जाके क्या भा आप बताओ तो मृत्यु महोत्सव तब होता है जब हर समय भगवान का चिंतन किया जाए नहीं तो फिर बातों से मृत्यु महोत्सव नहीं होता मृत्यु एक भयावह वो जो अच्छे-अच्छे के हृदय कांप जाते हैं लेकिन देखिए राष्ट्र पर समर्पित क्या मृत्यु से भयभीत हुए वंदे मातरम कहकर ऐसे फंदा डाला फांसी का ले तू क्या डालेगा मैं खुद डाल लेता हूं जैसे ब्याह का बरमाला डाला जाता है राष्ट्र पर अगर समर्पण है तो आज भी बॉर्डर पर खड़े हमारे राष्ट्र सैनिक पता है कहीं
से भी गोली आ सकती है और कितने ऐसे शहीद होते हैं हमारे राष्ट्र प क्या उनको मृत्यु का भय है जानते हैं गोली चलर कहीं से भी आ जाएगी जानते हैं कि कहीं से भी मिसाइल आ जाएगी चिथड़ा उड़ जाएंगे जो अपने लक्ष्य पर दृढ़ है एक वो कोई ब्रह्म ज्ञान थोड़ी है उनको लेकिन वह भी मृत्यु को ललकार हैं अगर व असली ज्ञान प्राप्त हो गया तो फिर मृत्यु का क्या भय रहा इसलिए हमें लगता है मानव जीवन जिस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए मिला उस लक्ष्य को अगर प्राप्त कर लिया जाए तो जीवन
मुक्त हो जाता है जीते जी मुक्त हो जाता है सांप को अपनी कचल छोड़ने में कोई भय लगता है क्या शरीर छोड़ने में कोई भय नहीं लगता जिसको बोध हो जाता है प्रवचन करने से भय नहीं मिटेगा प्रवचन सुनने से भय नहीं मिटेगा बोध होने से प्रेम होने से तब मिटेगा आप समझ पा रहे पंडित आनंद देव जी उपाध्याय जी महाराज जीी राधे राधे श्री हरिवंश महाराज जी सकाम और निष्काम दो स्वरूप है भक्ति के परंतु श्रीमद् भागवत जी में उपदेश करते हुए प्रभु बोले हैं कि तीव्रे भक्ति योगेन यह तीव्र भक्ति महाराज जी क्या
है ग्रस्त में तीव्र भक्ति का क्या स्वरूप होगा देखो भाई सकाम जो है यदि केवल भगवान से की जाए तो सकाम भी तिव भक्ति में स्थित कर देगी क्योंकि भगवान ने आर्थ अर्था अथी जिज्ञासु ज्ञानी चारों को उदार भगत कहा है पर हमें लगता है सर्वज्ञ भगवान से मांगने की कोई आवश्यकता तो है नहीं अगर हम भगवान की भक्ति की रस वृति को थोड़ा भी जान जाए तो कामना रही नहीं जाएगी केवल एक श्लोक समझ ले गीता जी का भगवत प्राप्ति निश्चित हो जाएगी अनन्य चिंत माम भगवान की बस इतनी बात समझ ले फि वो
जना परिपास तेशाम नित्या अभ युक्ता नाम योगक्षेम वाहम हम लौकिक और पारलौकिक कोई भी चाह अधूरी नहीं रह जाएगी भगवान कहते हैं कि जो है उसकी रक्षा करूंगा और जो नहीं है उसको प्राप्त करा दूंगा अप्राप्य की प्राप्ति का नाम योग और जो है उसकी रक्षा का नाम क्षेम यह सारा भार भगवान ले रहे हैं अपने को केवल चिंत करना है अनन्य चिंतन बाहरी क्रियाओं का य कोई चर्चा नहीं कर रहे हैं अनन्य चिंतन की बात कर रहे हैं अगर हम हर समय श्वास प्रश् वास गुरु प्रदत या मनोनीत भगवन नाम निरंतर अभ्यास करें नाम
शवास दो विलक चलत है इनको भेद न मोको भावे शवास नाम नाम ही स्वासा नाम शवास को भेद मिटाए रोम रोम और रग रग बोले तब कुछ स्वाद नाम को पावे जैसे जैसे भगवान की स्मृति में हम डूबते हैं वैसे ही वैसे भगवान के लिए व्याकुलता पैदा होती है व्याकुलता ही तीव्र भक्ति योग है य जितनी भक्ति की बाहरी क्रियाएं हैं इन सबका फल है यह गीता का यह श्लोक अनन्य चेता सततम यो माम स्मृति नित्य सहा श हम सुलभा पार्थ बस इसी में सुलभ कह दिया मैं उसके लिए सुलभ हूं अब जैसे सांप अंदर
बैठा है बांबी के ऊपर से हम लठ चला रहे हैं तो सांप को कोई फर्क नहीं पड़ता ऐसे ही हृदय रूपी छिद्र में अज्ञान रूपी सर्प बैठा हुआ है अब बाहर से हम भगवान की भक्ति के जो लक्षण है वो कर रहे हैं वो अंदर से सकाम होता है अंदर से व्यक्तियों के प्रति राग और द्वेष है भगवत भावना नहीं तो बहुत काल भक्ति करने पर भी उसको भगवता की अनुभूति नहीं होगी भगवता की अनुभूति के बिना मन स्थिर नहीं होता है और जब तक मन चलायमान है तो साधक होते हुए भी वह असाधारण मन
होई कि थीरा जब तक निज सुख आत्म सुख भगवत सुख नहीं मिलता तब तक मन शांत नहीं होता और मन जब तक भगवत सुख में शांत नहीं होगा तो विषय में शांति खोजे जहां बिल्कुल नहीं है जिसके त्याग से शांति बताई गई है उसी के भोग में व शांति खोजे तो तीव्र भक्ति योग अनन्य चिंतन भगवान का अनन्य चिंतन तद स्मरण परम व्याकुल ते तद पिता अखिला चरिता समस्त आचरण हमारे भगवान के अनुकूल हो श्री कृष्ण अनुकूलन प्रतिकूल वर्जन हम त्याग कर द जो भगवान के प्रतिकूल हो तस्मा शास्त्रम प्रमाणम ते कार्या कार्य व्यवस्थित जो
भगवान ने शास्त्र में आज्ञा की जो संत जनों ने विधि की उसके अनुसार हम चले और नाम जप करें सब ठीक हो जाएगा निश्चित भगवत प्राप्ति हो जाएगी अपने कर्तव्य को जो भगवत पूजा समझता है और सदैव भगवत स्मरण परायण रहता है और धर्मा चरण से दूर रहता है उसे भगवत प्राप्ति की याचना भी नहीं करनी पड़ेगी भगवान से कि मुझे दर्शन दीजिए भगवान समा जाएंगे पी मूरति नैनन बसे तेही रस राय समाय व हर समय भगवान में स्थित रहेगा और बाहरी बहुत सी क्रियाएं हो रही हैं अंदर से संबंध शरीर और शरीर संबंधियों की
ममता और अता से युक्त है तो बहुत काल तक बाहरी क्रिया करने पर भी भगवन की प्राप्ति नहीं होगी क्योंकि हृदय गुफा में अंधेरा है गोस्वामी तुलसीदास जी स्पष्ट कह रहे हैं राम नाम मणि दीप धरी जीह देहरी द्वार तुलसी भीतर बाहर जो चाह से उजियार अगर भगवान का नाम जिव्या के अग्र भाग पर विराजमान है तो भीतर भी ज्ञान का प्रकाश हो जाएगा और बाहर भी अता ममता का नाश हो जाएगा पक्का इसलिए भगवन नाम जब हमने जीवन का सार पकड़ा है भगवन नाम जप और अपने कर्तव्य को भगवान की पूजा माम नि स्मर
युद्ध च खास बात मेरा स्मरण अपने कर्तव्य का पालन खूब नाम जप करें भगवत चिंतन परायण रहे चाहे जैसी परिस्थिति हो नाम भगवान का ऐसा प्रताप है कि आप हर समय जप सकते हो अपवित्र पवित्रो सर्वा वस्था तो पवा या स्मत पुंडरीका क्म सवाया अभ्यांतर सूची आप देखो वाया अभ्यांतर सूची यह भगवन नाम का भगवन नाम का केवल भगवत स्मरण मात्र से यस स्मरण मात्रण जन्म संस धना विम नमस तस्म विष्णवे प्रभ विष्णवे सब शास्त्रों का सार सब संतों का एक मत अखंड स्मृति तैल धारा वत भगवत भजन अव्यावहारिक मायाम य संगा जति य महानुभाव
से देवते यो निर्मम भवति जो कुसंग का त्याग कर देता है जाके संग कुमति मति उपज करत भजन में भंग तजो रे मन हरि विमुख को संग जाके प्रियन राम बै देही तजय ताहि कोटि बैरी समम जद परम सनेही कुसंग का त्याग और यो महानुभाव सेवत जो महापुरुषों का संग करता है भजन न होई संग बिनु और भजन बिना नहीं प्रेम और छिन भजन न छाड़ धरिए या ध्रु नेम बिना भगवत प्रेमी भजना आनंदी महा का संग के शुद्ध भजन हो ही नहीं सकता और बिना भजन के प्रेम नहीं होता बिना प्रेम के भगवत साक्षात्कार
नहीं होता इसलिए हम खूब डट के नाम जप करें अधर्मा चरण से बचे शास्त्र सम्मत अपने गृहस्थ कर्तव्य का पालन करें पत्नी में पुत्र में माता-पिता में परिवार में ग्राम में समाज में सब में अपने भगवान की झांकी देखें मेरे भगवान ही सब में विराजमान है इससे बढ़िया और भक्ति का स्वरूप ये बाहरी क्रियाएं जो है ना देखो आरति कर रहे हो प्रभु की और चिंतन हो रहा है जगत का धन का तो अंदर तो सब गड़बड़ी चल रही ना सही आरती कब होगी जब भक्ति कर दीप प्रेम करी बाती साधु संगति करी अनु दिन
राती भक्ति का दीपक हो प्रेम की बात बोले किस कहां मिलेगी बोले साधु संगत में मत कीरति गति भूति भलाई जब ज जतन जहा ज पाई सो जानो सत्संग प्रभाव लोको वेदना अनु पाव अगर हम भगवत प्रेमी महात्माओं का संग करें खूब नाम जप करें अपने कर्तव्य का पालन करें बात समझ गई इसी से सब प्राप्त हो जाएगा अध्यात्म का जो चरम सीमा का आत्म बोध है वो भी इसी से प्राप्त हो जाएगा मम दर्शन फल परम अनुपा जीव पाव निज सहज स् सब कुछ प्राप्त हो जाता है जी एक दास का भाव और है
ठाकुर जी जब तक धरा पर रहे ठाकुर जी जब तक रा रहे कब नहीं है धरा प अभी भी है लेकिन जब लीला में ठाकुर जी थे यहां पर अब नहीं लीला हो रही अभी भी हो रही महाराज बस हमको वही बात कहो जो स्वीकृत है जी उनकी नित्य है सनातन है सच्चिदानंद में लीला है तो त्रिकाल सत्य अब भी हो रही है अब भी ठाकुर जी कहो सुका जहां प्रभु नाई हमारे अंदर ठाकुर जी को प्रकट करने वाला प्रेम नहीं है ते समाज गिरजा में रह अवसर पाए वचन कह हरि व्यापक सर्वत्र समाना प्रेम
प्रकट होए मैं जाना अब भी नित्य लीला चल रही आपके आंखों में प्रेम आना चाहिए अभी दिखाई देगा भगवान सत्य है सनातन है त्रिकाल सत्य है त्रिकाल लीला चल रही हम यह सुनना भी बर्दाश्त नहीं करेंगे भगवान थे भगवान थे यह सुनना भी बर्दाश्त नहीं करेंगे भगवान है भगवान है लीला हो रही थी नहीं लीला हो रही है हां पक्का अब बात करो ठाकुर जी पर भी संदेह दुर्योधन पाल इत्यादि को छोड़ ब्रह्मा जी को भी मोह हो गया था लीला देख कर के तो वो भी ठाकुर जी आप संदेह के मार्ग में जाना चाहते
हो नहीं महाराज जी मैं निवेदन जो कर रहा हूं व ये कर रहा हूं के मुझे ऐसे लगता है कि वर्तमान समय में आप भी ठाकुर जी के नित्य परिक नहीं तो आप कौन हो आप ठाकुर जी के नीति परिकल्प हम महाराज जी हम तो साधारण जी बहुत साधारण जी ना पहले समझो इसमें बिजली है ना इसमें बिजली है ना इसमें बिजली है ना इसमें साधारण बिजली है वही बिजली है छू के देखो करंट मरेगी ए सब में समान भाव से परमात्मा विराजमान है 100 ग्राम 50 ग्राम 1 किलो आधा ऐसा नहीं है समान भगवान
समान भाव से विराजमान है इन शरीरों के इन यंत्रों के कारण बिजली का ग्रहण करना ये बहुत कम बिजली ग्रहण करेंगे वो थोड़ा इससे ज्यादा ग्रहण करेगी लेकिन बिजली बिजली है ऐसे हमारे यह खोपड़ी स्वभाव इसके अनुसार हम परमात्मा भाव को जितना पकड़ पा रहे हैं नहीं परमात्मा सम रूप से सबके हृदय में विराजमान है हां जो जितना अपना अहम प्रभु के चरणों में समर्पित कर देता है उतने उसमें भगवता अंद प्रकाशित होने लगता है भगवत तेज प्रकाशित होने लगता है भगवान उसकी वाणी में बैठ कर के बोलने लगते हैं भगवान उसके हृदय में अंतःकरण
में अपना अधिकार मन कृष्ण बुद्धि कृष्ण चित्त कृष्ण अहम कृष्ण बका है कृष्ण ही कृष्ण मत्ता पर तरम नानत किंच दस्त धनंजय मेरे सिवा कुछ नहीं है प्रभु हम आपको प्रभु मानते हैं आप इधर प्रभु मानिए और चराचर जगत प्रभ यही तो भक्त का स्वरूप है सो अनन्य गति जाके असमत न टरे हनुमंत मैं सेवक सचला चर रूप स्वामी भगवंत रूप स्वामी मैं सेवक सचला चर रूपवा भगवान विराजमान हे भैया हम सब माया कृत शरीर में आसक्त चित्त वाले वो करुणा कर करे तो चि को चुरा लिया बस बात इतनी है तिनका पड़ा रज के
साथ पैरों में रदा जाता था वायु का संसर्ग मिला उड़ कर के राजाओं के मुकुट पर या मंदिर की चोटी पर बैठ गया इसमें तिनके का महत्व नहीं है नहीं इसमें महत्व उस वायु का जो तिनके को उड़ा कर के मंदिर की चोटी पर बैठा दिया मु कम करोति वाचाल पंगम लंगते गिरिम यत कृपा तमाम वंदे परमानंद वही भगवान अपने शरणागत को स्वीकार करते हैं उतनी बात है कुछ नहीं है सब में वही विराजमान है वह जहां अपना अधिकार कर लेता है जहां दैन्य भाव से आहम समर्पित हो जाता है वहां वह स्वयं अपना प्रकाश
करने लगते हैं उन्हीं का सारा खेल है ना अपने कुछ है अपना कोई महत्व है व जहां बैठते हैं वही महत्व प्रकाशित हो जाता है कहीं पर्दा लगा के बैठे हैं और कहीं पर्दा खोल दिए बस अंतर इतना है नहीं सब में वही बरा सबको बराबर र करते मेरे प्रभु का स्वभाव ऐसा है सब पर मोर बराबर दया सब मम प्रिय सब मम उपज पर हम लोग भगवान से विमुख होक के संसार की तरफ आसक्ति में बह गए इसलिए अपने प्रभु की कृपा को नहीं जान पाए अगर आज भी हम मुड़े तो भगवान का स्वभाव
ऐसा है विमुख भए निमस ना अ कृपा जब चित तब वैसे उमा राम स्वभाव ज जाना ताय भजन तज बिल्कुल पक्का आप समझिए यह हमारी त्रुटि है नहीं तो हम सबके हृदय में विराजमान है अनंत ज्ञान अनंत प्रेम लिए हुए सबके हृदय में विराजमान है मनवीर कौर जी छत्तीसगढ़ से राधे राधे महाराज जी महाराज जी गृहस्थ जीवन में निरंतर संभाव कैसे बना रहे प्रतिकूलता आने पर रुकावट सी आ जाती हां यह तो बहुत मतलब साधारण सी बात है गृहस्थ हो अ विरक्त प्रतिकूलता आने पर अगर स्थिति नहीं है अंदर तो फिर बाधा पड़ जाती है
ना मान लो आप हमारे अनुकूल हो तो हम आप सोच सकते हैं मेरे भगवान हो लेकिन आते ढोंगी फिर हम आप में देखि मेरे भगवान आए हैं और वैसे ही शांति बनी रहे जैसे प्रणाम नमस्कार करने पर तो इसका मतलब स्थिति है तो अपने लोग सुन सुनाकर गृहस्थ में स्थिति धारण करना चाहते हैं पर वो स्थिति तभी आएगी जब हमारी भक्ति की भूमिकाएं बढ़ेगी जैसे कक्षा एक का विद्यार्थी जब पढ़ कर के प्रश्न ठीक उत्तर दे देता है तो दो में पहुंच जाता है ऐसे भक्ति की भूमिकाएं हैं हम नाम जप करें मान लो स्त्री
शरीर है तो हमारे बहुत से धर्म है पति तो हमें पाति धर्म सास ससुर तो उनकी सेवा भगवत भाव से परिवार की तो पति के सुख के लिए पूरे परिवार की सेवा अब इस सेवा को सहन करते हुए क्योंकि जब हम किसी की सेवा करते हैं तो एक आकांक्षा होती है कम से कम मधुर बोले तो हमसे लेकिन परिवार में ऐसा नहीं होता जब हम सेवा करते हैं मान लो सास ससुरी से तो कट व्यवहार करेंगे आप उनकी सेवा कर रहे हो वो आपके साथ कट व्यवहार करेंगे आप पति को भगवान मान वो आपके साथ
कट व्यवहार करेगा कड़वा अब अपने में स्थित रहना कितना कठिन है अगर स्थित रह गए तो भूमिका बदल जाएगी फिर आपकी वो ऊंचाई हो जाएगी एक बार रत्नावती जी का विरोध किया माधव सिंह जो राजा थे उनके पति और एक दिन वो आया के घुटने टेककर पैर छुए अपनी पत्नी के माधव सिंह कि देवी मैं तुम्हारी महिमा को नहीं जान पाया भगवान का भक्त जो है वह बाद में प्रकाशित होता है पहले नहीं प्रकाशित होता है वो पर जब प्रकाशित होगा तो बस यह सहनशीलता सहन शक्ति सहते जाओ चुपचाप सहते जाओ तो आप महान होते
चले जाओगे देखो एक शीशा है कंकड़ उठाओ मारो पूरा शीशा टूट जाएगा और एक शीशा है गोली मारो तो नहीं टूटेगा क्यों गर्म ठंडा गर्म ठंडा करके उसको इतना मजबूत कर दिया गया प्रक्रिया के द्वारा वही शीशा है कि गोली मारो तो नहीं टूटा बुलेट प्रूफ कहते हां तो भगवान का भक्त बुलेट प्रूफ हो जाता है बोली मारो तो फर्क नहीं पड़ेगा गोली की बात नहीं कहते गोली तो शरीर को छेदन कर सकती है भक्त को नहीं बोली मारो हां बोली तो उसके अंतर में कोई फर्क ना पड़े तब पता चलता है कि बुलेट प्रूफ
है ले तो स्तुति में सबको अच्छा लगता है निंदा बहुत बुरी लगती नहीं तो यह बात है कि हम गृहस्थ में भी सहना सीखें बोले कितना सहना सीखे जितना भगवान सहाय भगवान अपने सामर्थ्य से ज्यादा नहीं देते कष्ट पक्का जितना हम सह सकते हैं उतना ही भगवान हमें कष्ट देते हैं और वो कष्ट इसलिए मिलता है कि हमारे जन्म जन्मांतर के जो पाप हैं आसक्ति वो कट जाती है एक होता है शरीर भोग के कर और एक होता है जैसे आपने गाली जलन हुई तो पाप नष्ट हो गए अगर हम लौट के गाली दे दी
तो फिर वह हमारा संस्कार बन गया वह हमें भोगना पड़ेगा अगर हम सह गए तो अच्छा है यार थप्पड़ मारने से अच्छा है कोई गाली दे कर के निपटा दे तो बढ़िया है हमें शारीरिक भोग ना मिले वाचिक मिल जाए पर वाचिक शारीरिक दंड सहा जा सकता है पर वाचिक शब्द सहना बहुत कठिन होता है बस इसको संभाल ले घर गृहस्ती में इसको संभाल ले नहीं तो ऐसा भी हो सकता है बहुत बुद्धिमान तो लगेगा सेवा करते हैं फिर भी निंदा करते हैं जब कोई रिश्ते नातेदार आता है तो मेरी निंदा ही होती तो मेरी
सेवा का क्या फल नहीं नहीं उन्हीं की सेवा से भगवत प्राप्ति होगी जो तुम्हारी निंदा करते हैं जो तुम्हारा अपमान करते हैं करत जे अनसन निंदक तीनों पर है उल्टा मार्गे संसार का मार्ग ऐसा नहीं सठ साठयम समाचर संसार इस परे राजी रहता है लेकिन भक्ति नहीं भक्ति य जो हमारा अपमान कर रहे हैं जो हमारी निंदा कर रहे हैं भगवान इनको सद्बुद्धि दे ये स्वस्थ रहे और मुझे सामर्थ्य दे कि मैं ये निंदा सुनकर भी इनसे प्यार कर कर इन अपने कर्तव्य का पालन करो यह थोड़ा सा कठिन मार्ग है अगर इसका निर्वाह कर
ले गया तो भगवान की प्राप्ति है तो हम भगवान से प्रार्थना करें नाम जप करें इससे हमें सामर्थ्य मिलेगी राधा राधा [संगीत] राधा राधा राधा राधा राधा राधा [संगीत] राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा [संगीत] राधा राधा राधा राधा [संगीत] राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा [संगीत] राधा राधा राधा राधा