[संगीत] प्यारी दोस्तों नमस्ते कहानी सुनने जा रही हूं एक गांव में किशोरी लाल नाम का एक आज ही ब्राह्मण अपनी पत्नी कलावती के साथ रहता था किशोरीलाल आलसी तो था ये पर वो भगवान शंकर का परम भक्त भी था वे सुबह-शाम शंकर जी की पूजा करता और भगवान शंकर का नाम जप्त रहता था किशोरी लाल रोज यही दो कम करता था बाकी समय अपनी aalsipan की वजह से वह घर में ही सोया रहता था इसी वजह से किशोरी लाल और उसकी पत्नी के बीच आए दिन अनबन होती रहती थी सुनते हो जी आज जल्दी से
खाना खाकर खेत चले जाओ आज फसल कटनी है और हान खेत से आते हुए सरसों का साग भी लेते हुए आना घर में सब्जी बनाने को कुछ भी नहीं है आते हुए भूल मत जाना नहीं तो आज खाना नहीं बनेगा मैं पहले से ही बोल रही हूं पत्नी ऐसा बोल ही रही थी की किशोरी लाल अपनी पत्नी की बातों को नजर अंदाज़ करके बस तेरे पर सोने चला जाता है कैलाश में बैठी माता पार्वती भवन शंकर से कहती है भगवान यह आपका कैसा वक्त है ऐसा क्या कारण है की आपकी भक्ति तो करता है पर
कोई कम नहीं करता आपको तो इसका मार्गदर्शन करना चाहिए हुए मेट्रो का उच्चारण सुनाई दे जाता था [संगीत] चैनल के रूप में जन्म तो है पर इसका आलसी स्वभाव नहीं किया सही समय आने पर मैं इसे उचित शिक्षा दूंगा जल्दी और खेत में जाओ आज फसल काटने जाना है खेत में फसल बहुत बड़ी हो चुकी है अगर आज फसल को नहीं काटा तो उसे जानवर चढ़ जाएंगे नहीं तो कोई चुरा लेगा मेरी बात सन भी रहे हो ही भोलेनाथ ना जाने इनका अलास्का खत्म होगा मैं तो इन सत्ता ए चुकी हूं कलावती बोलती जा रही
थी पर किशोरी लाल को तो कोई फर्क ही नहीं पद रहा था वो चुपचाप बिस्तर पर लेता हुआ था किशोरी लाल को कुछ बोलता हुआ ना देख कलावती रसोई घर में जाती है और वहां से एक बाल्टी पानी लाकर किशोरी लाल के ऊपर दल देती है और फिर दोनों के बीच बहुत कहा सुनी होती है फिर वह गुस्से में घर से निकलकर भोलेनाथ की मंदिर की ओर चला जाता है [संगीत] मंदिर जाकर वह गुस्से में शंकर जी से कहने लगता है [संगीत] अगर मैंने आपकी भक्ति श्रद्धा पूर्वक की है तो मुझे वरदान दीजिए ऐसा बोलकर
किशोरी लाल सूर-चूर से रोने लगता है उसकी भक्ति भाव को देखकर भोलेनाथ स्वयं की छोरी लाल को दर्शन देते हैं और कहते हैं गूगल तुम मेरे परम भक्त हो तुम्हारी भक्ति से मैं बहुत प्रसन्न हूं बोलो तुम्हें क्या वरदान चाहिए फिर शंकर जी को प्रणाम करके उनके सामने अपनी इच्छा प्रकट करता है ही भगवान मुझे ऐसी चीज दीजिए जो मेरी बात सुने और मेरा सारा कम कर दे ठीक है चलो मेरा एक छोटा सा त्रिशूल इस त्रिशूल को तुम जिस चीज पर भी रखोगे वो अपना कम खुद ही करने लग जाएगा और कम खत्म करने
के बाद ही रुकेगा पर हान अगर तुमने कम करते हुए किसी को माना किया तो त्रिशूल हमेशा हमेशा के लिए गायब होकर मेरे पास ए जाएगा किशोरी लाल बहुत खुश हो जाता है और मैन ही मैन सोचता है की अब से उसे कोई भी कम नहीं करना पड़ेगा फिर वह त्रिशूल लेकर घर जाता है है और अपनी पत्नी को शंकर भगवान के वरदान के बारे में बताता है ऐसे ही कुछ दिन गुजर जाते हैं किशोरी लाल उसे त्रिशूल को पाकर बहुत खुश था उसे उसे दिन से कुछ भी कम नहीं करना पड़ता था वे जिस
पर चीज पर उसे त्रिशूल को रख देता वो चीज अपने आप ही अपना कम करने लग जाता था ऐसे ही एक दिन किशोरीलाल को चाय पीना था उसे चाय की बर्तन में त्रिशूल रखा और बोला मुझे एक चाय बना दो यह बोलते ही चाय के पतीले में अपने आप ही दूध चीनी और चाय की पट्टी दल जाती है और फिर उसको एक साथ उबालकर एक कप चाय बनकर उसके सामने ए जाती है इसी तरह वो हर कम में शक्कर भगवान की दी हुई उसे त्रिशूल को इस्तेमाल करता घास में पानी देना होता तो त्रिशूल से
अपने पानी देने वाली पाइप को छूकर पाइप को कहता पाइप यह एक बाल्टी पानी अपने आप से फूलों पर दल दो पाइप को यह कम बोलकर किशोरी लाल घर के अंदर सोने चला जाता है [संगीत] और उसकी सोते ही लाइट चली जाती है लाइट चली जाने के कारण पंखा बंद हो जाता है पर किशोरीलाल बिना चिंता करते हुए वह अपने हाथ पंखे को कहता है मुझे गर्मी लग रही है जब तक लाइफ ना आए तुम मुझे इस पंखे से हवा करो किशोरी लाल की कहें अनुसार हाथ पंखा बिना देर किए हवा करने लग जाता है
और जैसी लाइट आती है तो हाथ पंखा बंद हो जाता है इस तरह वह अपने हाथ से बिना कुछ कम किए बड़ी आसानी से सारे कम को कर लेता है फिर एक दिन किशोरीलाल को भूख लगी और अच्छे-अच्छे पकवान खाने का मैन किया तो खाना खाने बैठा किशोरीलाल मैन में ही बोलने लगा [संगीत] ऐसा कहते ही प्लेट से तरह-तरह के पकवान निकलकर किशोरीलाल के मुंह में जाने लगे तरह-तरह की मिठाई नए-नए स्वाद पकवान और बिना रुके अपने आप ही उसके मुंह में जाने लगे और वो बड़े मजे से उन्हें खाकर आनंद ले रहा था [संगीत]
[हंसी] [संगीत] पर यह मजाक कुछ देर तक का ही था थोड़ी देर में किशोरी लाल का पेट भर गया और वह खा नहीं का रहा था पर खाना था उसकी रुकने का नाम ही नहीं दे रहा था प्लेट से भिन्न भिन्न प्रकार के व्यंजन निकल कर उसकी मुंह में जा रहे द यह देखकर किशोरी लाल परेशान हो गया वो जैसी खाने को माना करने जा रहा था तो उसे भगवान शंकर की बात याद आई की अगर वो कम करते हुए त्रिशूल को माना करता है तो उसका वरदान हमेशा हमेशा के लिए समाप्त हो जाएगा यह
सब सोचते हुए चिल्लाने लगा उसकी चिल्लाने की आवाज़ सुनकर उसकी पत्नी रसोई घर से बाहर आती है हान और किशोरी लाल को देखकर हैरान हो जाती है फिर किशोरीलाल से उसकी पत्नी खाने को रोकने के लिए बोलती है पर वो शंकर भगवान के दिए हुए वरदान को नष्ट करना नहीं चाहता था पर आखिरकार उसे बोलना पड़ा [संगीत] स्कूल भी गायब हो गई किशोरी लाल त्रिशूल को अपने पास ना देख कर बहुत दुखी हुआ पर अब वो कुछ भी नहीं कर सकता था कर दिया था अब तक किशोरी लाल ने त्रिशूल को जो भी कम दिया
था उन सबको कम खत्म कब करना है यह भी अनजाने में ही सही बोल दिया था [संगीत] पर खाना खाते समय कब रोकना है ये नहीं बोला था जिस कारण खाना बिना रुके उसके मुंह तक आता ही जा रहा था ही महादेव मैं समझ गया की आपने मुझे ऐसा वरदान मुझे सबक सीखने के लिए दिया था मैं कितना बेवकूफ था जो आलस के कारण हर छोटे से छोटे कम को ताल दिया करता था आपने मुझे सिखा दिया है की छोटे-छोटे कम के लिए किसी दूसरे पर निर्भर रहने से कितनी बड़ी मुसीबत ए सकती है उसे
दिन के बाद से उसे आनंद करना छोड़ दिया और वो रोज खींच जाने लगता है और अपना कम खुद करने लगता है इस तरह उसका जीवन खुशहाल हो गया दोस्तों आपको यह कहानी कैसी लगी कमेंट करके जरूर बताएं ऐसी और कहानी सुनने के लिए इसे लाइक और शेयर जरूर करें धन्यवाद