नमस्कार दोस्तों। अगस्त 1947 एक आदमी दिल्ली के बंद कमरे में बैठा था और नक्शे पर लाइनें खींच रहा था। उसके सामने थे कुछ पेपर्स, कुछ पपुलेशन टेबल्स और एक पेंसिल। इस एक पेंसिल से जो वो लाइन खींचने वाला था उसे अंदाजा तक नहीं था इसकी वजह से 2 करोड़ लोग अपना घर छोड़ देंगे। वो नहीं जानता था कि इसकी वजह से लाखों लोग मारे जाएंगे। उसे तो यह तक भी नहीं पता था कि जिन जगहों के बीच वो लाइन खींच रहा है वो जगह है कहां। कुछ दिन पहले तक इस आदमी ने पूरी जिंदगी में
कभी इंडिया नहीं देखा था। इंडिया के बारे में एक शब्द तक नहीं लिखा था। इसे पता तक नहीं था कि पंजाब कहां है, बंगाल कहां है। लेकिन ब्रिटिश सरकार को ऐसे ही एक आदमी की तलाश थी। एक ऐसा आदमी जो इंडिया और पाकिस्तान के बीच बॉर्डर खींच सके जो न्यूट्रल हो बिना किसी बायस के जो ना कांग्रेस की तरफ हो ना मुस्लिम लीग की तरफ और उन्हें यह आदमी मिल गया था सर सिरिल रेडक्लिफ ये एक बड़े जानेमाने इंग्लिश लॉयर थे जो ब्रिटेन के उस वक्त के सबसे रिस्पेक्टेड लीगल माइंड्स में से एक थे। बात
असल में यह थी कि कुछ हफ्ते पहले ही 3 जून 1947 को शाम के 4:00 बजे ऑल इंडिया रेडियो पर एक आवाज गूंजी थी। यह आवाज थी इंडिया के आखिरी वायसराॉय लॉर्ड लुइस माउंटबेटन की। उन्होंने साफ शब्दों में अनाउंस किया था कि ब्रिटिश इंडिया छोड़ रहे हैं और 15 अगस्त 1947 को आजादी मिल जाएगी। लेकिन इसमें बस एक शर्त थी कि इस देश के दो टुकड़े होंगे। देयर कैन बी नो क्वेश्चन ऑफ़ कोर्सिंग एनी लार्ज एरिया इन व्हिच वन कम्युनिटी हैज़ अ मेजोरिटी अगेंस्ट देर गिदर कम्युनिटी हैज़ अ मेजरिटी। द ओनली टूर्स। इस समय तक
ब्रिटिश को महसूस हो गया था कि वह एक बारूद से भरे एक जहाज पर बैठे हुए हैं जिसमें आग लग चुकी है। उनका मानना था जितनी जल्दी हो सके यहां से निकलो। वी आर सैट अ टॉप ऑफ़ वोल्केनो [संगीत] एंड आई कैन हियर द रumbling आवर बेस्ट ऑप्शन इज टू डिवाइड एंड क्विट एट द अर्लियस्ट। और इसी जल्दबाजी में उन्होंने इतिहास का सबसे खतरनाक फैसला लिया। इंडिया को पार्टीशन करने का फैसला। बात यहां सिर्फ इंडिया और पाकिस्तान की नहीं थी बल्कि 565 प्रिंसली स्टेट्स की भी थी। जिनमें से कईयों के राजा सोच रहे थे कि
अब इंडिपेंडेंट देश बनाया जाए और अगर ऐसा हो गया तो इंडिया के नक्शे में 500 से ज्यादा छेद होंगे। आज के वीडियो में जानते हैं दोस्तों इस बॉर्डर के पीछे की कहानी गहराई से कैसे ये लकीर लगाई गई? क्यों लाखों लोगों को यहां पर रेफ्यूजी बनना पड़ा? क्यों भारी स्केल पर हमें वायलेंस देखने को मिला और कैसे इन 565 राजाओं को यहां मनाया गया। Sony Liv पर दोस्तों फ्रीडम एट मिडनाइट का सीजन 2 रिलीज हुआ है। बहुत ही जबरदस्त शो है। अगर आपने नहीं देखा है मैं जरूर रेकमेंड करूंगा। [संगीत] सीजन वन में पूरी इंटरनल
पॉलिटिक्स बताई थी डिटेल में कांग्रेस और मुस्लिम [संगीत] लीग की आजादी से पहले। सीजन 2 में अब आपको पार्टीशन, इंटीग्रेशन ऑफ स्टेट्स और द वॉर फॉर कश्मीर को डिटेल में समझाया है। ना सिर्फ यह बहुत ही एंटरटेनिंग और एंगेजिंग है बल्कि इसकी हिस्टोरिकल एक्यूरेसी भी कमाल की है। इस शो में ज्यादातर सब कुछ वैसा का वैसा ही दिखाया गया है जैसा असली में हुआ था। क्योंकि यह शो एक लेजेंड्री किताब फ्रीडम एट मिडनाइट पर आधारित है। इस किताब को ओरिजिनली सन 1975 में पब्लिश किया गया था एक अमेरिकन और फ्रेंच ऑथर के द्वारा। जरूर जाकर
चेक आउट करना और मुझे लगता है यह सही मौका है इस पूरी कहानी को आज के इस वीडियो में बताने का। पार्टीशन होने से पहले सवाल उठा कि दोनों देशों का नाम क्या होगा? मोहम्मद अली जिन्ना अपने देश का नाम पाकिस्तान चाहते थे जबकि कांग्रेस चाहती थी कि इंडिया का नाम इंडिया ही रहे। अ दो मुल्क बनने वाले हैं। तो जाहिर सी [संगीत] बात है कि दो नाम भी होंगे। आई पर नामकरण तो नए बालक का होता है। अब जिन्ना साहब से कहिए कि अपने बालक का नाम रख लो। क्योंकि हमारा तो सदियों से एक
ही नाम चल रहा है। इंडिया। लेकिन जिन्ना को इंडिया नाम से दिक्कत थी। वो चाहते थे कि नाम यहां पाकिस्तान और हिंदुस्तान हो और इन दोनों को साथ मिलाकर ही [संगीत] इंडिया कहा जाए। इन दो नए मुल्कों का नाम हिंदुस्तान और पाकिस्तान होगा। एंड टुगेदर दे विल कॉन्स्टीट्यूट इंडिया। दूसरी तरफ कांग्रेस के लीडर्स का कहना था कि इंडिया से टूटकर पाकिस्तान बन रहा है। इंडिया अपना नाम क्यों बदले? जवाहरलाल नेहरू ने ये डिमांड जाकर माउंट बैटन के सामने रखी और उन्हें यह डिमांड लॉजिकल लगी तो उन्होंने ये बात मान ली। इससे जिन्ना काफी अपसेट हुए।
लेकिन इससे ज्यादा जरूरी सवाल यह था कि जब दोनों देशों में बंटवारा होगा तो बॉर्डर कहां रहेगा? नेहरू और जिन्ना एक दूसरे पर इतना मिसट्रस्ट करते थे कि वो आपस में किसी भी लाइन पर एग्री नहीं कर पाए। इसी रीजन से ब्रिटिश ने लंदन से एक ऐसे आदमी को चुना [संगीत] जिसका इंडिया से कुछ भी लेना देना नहीं था। और यह आदमी थे सर सिरिल रैडक्लिफ। 8 जुलाई 1947 रैडक्लिफ इंडिया पहुंचते हैं। उन्हें लगा था कि कम से कम इस बंटवारे को करने के लिए उनके पास भरपूर समय होगा। लेकिन माउंट बैटन ने उन्हें कहा
कि सिर्फ 15 अगस्त तक का समय है। इट इज क्वाइट सिंपल। लाइन व्हेन द कट्स थ्रू द पंजाब। और इन कुछ चंद हफ्तों में उनके पास घूमने का समय नहीं होगा। वह उन जगहों को नहीं देख पाएंगे जिन्हें वह [संगीत] बांट रहे हैं। रेडक्लिफ को उनकी मदद के लिए चार लोकल एडवाइज़र्स दिए गए जिनमें से दो कांग्रेस के थे और दो मुस्लिम [संगीत] लीग के। लेकिन ये लोग भी आपस में झगड़ते रहते थे। हालांकि मोटे-मोटे तौर पर बंटवारे का बेसिस क्लियर था। जिन जिलों में मुसलमानों की मेजॉरिटी है वो पाकिस्तान में जाएंगे और जिन जिलों
में हिंदुओं और सिखों की मेजॉरिटी है वो इंडिया में रहेंगे। लेकिन रैडक्लिफ के पास जो नक्शा था वो एग्जैक्ट नहीं था और पपुलेशन के आंकड़े भी उतने रिलायबल नहीं थे। दो शहर सबसे बड़ी मुसीबत बनके रेडक्लिफ के सामने [संगीत] आए हैं। और लाहौर कोलकाता उन्होंने इंडिया को दे दिया क्योंकि वहां हिंदू पापुलेशन ज्यादा थी। लेकिन लाहौर में 5 लाख हिंदू 1 लाख सिख्स और 6 [संगीत] लाख मुस्लिम्स रहते थे। तो किसी की भी साफ मेजॉरिटी नहीं थी यहां पर। लाहौर जेंटलमैन लाहौर द सिरी हैज़ आर्ट कल्चर गुड्स फॉर एक्सपोर्ट माना आबादी मुसलमानों की ज्यादा है
पर ज्यादातर उद्योग धंधे तो हिंदू और सिखों के हैं। रेडक्लिफ ने लाहौर पहले इंडिया को देने की सोची लेकिन फिर उन्हें लगा कि अगर दोनों बड़े [संगीत] शहर इंडिया को दे दिए तो पाकिस्तान के पास कोई मेजर अर्बन सेंटर नहीं रह जाएगा। इसलिए फाइनली उन्होंने लाहौर पाकिस्तान को ही दिया। लेकिन दोस्तों देश का बंटवारा यहां पर सिर्फ जमीन का नहीं था। हर चीज बांटनी थी। हर फाइल, हर फर्नीचर, हर सीलिंग फैन से लेकर हर बोर्ड पिन तक। एक बहुत ही अजीबोगरीब केस देखने को मिला। साल 1946 में बंगाल सरकार ने इंग्लैंड से 60 बत्तखें मंगवाई
थी। जुलाई 1947 में जब ये बत्तखेंक पहुंची तो 250 पाउंड का बिल भी आया। लेकिन अब सवाल यह था कि बत्तखे थी किसकी? वेस्ट बंगाल की या ईस्ट बंगाल की? या फिर इन्हें 30-30 करके बांट दिया जाए? फाइनेंस सेक्रेटरी ने पेमेंट को रोक दिया। बत्तखे वेयर हाउस में नेगलेक्टेड पड़ी रही और बत्तखों से लेकर टाइप राइटर्स तक सोप केसेस से लेकर लाइब्रेरी बुक्स तक हर चीज पर लड़ाई देखने को मिली। रैडक्लिफ ने बॉर्डर बनाने के लिए अपनी 2000 पाउंड की फीस लेने से साफ मना कर दिया। उन्होंने कहा कि वो इसे ब्रिटिश एंपायर के लिए
अपनी ड्यूटी समझते हैं। पाउंड्री योर एक्स आई वास रे टू बिलीव द ड्यूटीवर्स। लेकिन उन्हें कोई अंदाजा नहीं था कि इसमें कितने लोगों की तबाह होने वाली हैं। 13 अगस्त 1947 की सुबह माउंटबेटन को बाउंड्री कमीशन की रिपोर्ट दे दी जाती है। माउंटबन इस रिपोर्ट को ले जाकर एक सेफ में लॉक करके रख देते हैं। बात असल में यह थी कि 15 अगस्त तक यह इस फैसले को सीक्रेट रखना चाहते थे। इनका मानना था कि रैडक्लिफ ने जो भी डिसीजन लिया होगा उससे दोनों देश नाराज होंगे ही होंगे। माउंटबेटन को लगा कि पहले लोगों को
आजादी का जश्न मना लेने दो। उसके बाद यह जो परेशानी आएगी बॉर्डर की उससे बाद में निपट लेंगे। 15 अगस्त 1947 की सुबह दुनिया भर में इंडिया और पाकिस्तान की आजादी सेलिब्रेट की जाती है। लेकिन करोड़ों लोग यह नहीं जानते थे कि वो किस देश के सिटीजन है। डिस्ट्रिक्ट मैजिस्ट्रेट्स को यह तक नहीं पता था कि उन्हें कहां रिपोर्ट करना है दिल्ली में या कराची में। फाइनली माउंटबेटन सील्ड एनवेलप्स में प्रधानमंत्री नेहरू और प्रधानमंत्री लियाकत अली खान को बॉर्डर की रिपोर्ट देते हैं। उन्हें सजेस्ट करते हैं कि दोनों अलग-अलग कमरों में जाकर इस रिपोर्ट को
डिटेल में स्टडी करो। बेस्ट [संगीत] और समझो कि इंडिया और पाकिस्तान का बॉर्डर क्या होगा। 2 घंटे तक अलग-अलग कमरों में दोनों इसे स्टडी करते हैं और बाद में यह जॉइंट मीटिंग के लिए माउंटबैटन के साथ मिलते हैं। जब 2 घंटे बाद यह दोनों लौटे तो दोनों बहुत गुस्से में थे। व्हाई नेम बीन अवार्डेड टू इंडिया इट्स प्रॉपर्टीज कॉमर्स एवरीथिंग प्राइमरली ऑन बाय हिंदू एंड सिख गुस्सा कई चीजों को लेकर था लेकिन सबसे बड़ी कंट्रोवर्सी एक छोटे से शहर को लेकर थी गुरदासपुर रैडक्लिफ ने रावी नदी की नेचुरल बाउंड्री को फॉलो करते हुए इस मुस्लिम
मेजॉरिटी एरिया को इंडिया में डाल दिया क्योंकि बिना गुरदासपुर के इंडिया के पास कश्मीर तक का कोई प्रैक्टिकल लैंड एक्सेस नहीं होता और कश्मीर के पास कोई चॉइस नहीं बचती सिवाय पाकिस्तान में जाने के। पाकिस्तान की साइड इससे बिल्कुल भी खुश नहीं थी। अनइटेंशनली रेडक्लिफ की इस लाइन ने इंडिया को कश्मीर क्लेम करने का रास्ता दे दिया था। 17 अगस्त इन बाउंड्रीज को पब्लिकली बताया जाता है जनता के सामने। पंजाब में इंसानों के इतिहास का सबसे बड़ा माइग्रेशन देखने को मिलता है। रेडक्लिफ की इस लाइन ने 50 लाख सिखों और हिंदुओं को पाकिस्तान के पंजाब
में छोड़ दिया था। और 50 लाख से ज्यादा मुस्लिमों को इंडिया के पंजाब में। अब इन सबको अपना घर छोड़कर उस देश जाना था जो उनका था। एक ऐसा देश जिसे इनमें से ज्यादातर लोगों ने कभी देखा भी नहीं था। पंजाब की सड़कों पर धूल के गुबार में लिपटे हुए 50-50 मील लंबी इंसानों की कतारें चल रही थी। बैलगाड़ियों में बूढ़े लोग थे। मां-बाप के कंधों पर बच्चे थे और सर पर सामान था जो उनकी पूरी गृहस्ती था। यहां आप एक वीडियो देख सकते हो एक्चुअल फुटेज का जो माइग्रेशन के वक्त ली गई। यह सब
लोग एक ऐसे देश की तरफ जा रहे थे जो उन्होंने कभी देखा तक नहीं था। तो जाहिर सी बात है [संगीत] ये लोग बहुत नाराज थे। सरकार ने शांति बनाए रखने के लिए पंजाब बाउंड्री फोर्स बनाई थी। 55,000 से ज्यादा सोल्जर्स की एक आर्मी जो लॉ एंड ऑर्डर मेंटेन करेगी। गवर्नर जनरल ने एक बाउंड्री फोर्स बनाने का प्रपोजल रखा है। बाउंड्री? यस सर। लेकिन 55,000 सोल्जर्स 2 करोड़ लोगों के सामने कुछ भी नहीं थे। जो मैडनेस यहां पर देखी गई, उसका सबसे डरावना एग्जांपल था ट्रेंस, जिन्हें लोगों ने घोस्ट ट्रेंस कहा। 15 अगस्त की शाम
को अमृतसर रेलवे स्टेशन पर लाहौर से आने वाली नंबर 10 डाउन एक्सप्रेस का इंतजार हो रहा था। आमतौर पर ऐसी हर ट्रेन में लोग दरवाजों पर टूट पड़ते थे। एक [संगीत] दूसरे को धक्का देते थे। बहुत अफरातफरी का माहौल होता था। लेकिन यह ट्रेन जब आई ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। इस रेलगाड़ी से कोई उतरा तक नहीं और प्लेटफार्म [संगीत] पर एक भयानक सन्नाटा था। दरवाजा खोला गया तो पता चला कि यह ट्रेन लाशों से भरी थी। इस ट्रेन की दीवार पर चौक से बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा गया था दिस ट्रेन इज आवर इंडिपेंडेंस गिफ्ट
टू नेहरू एंड पटेल। लेकिन ये इकलौती ऐसी ट्रेन नहीं थी। ऐसी ट्रेंस दोनों तरफ से आ रही थी। पाकिस्तान से इंडिया और इंडिया से पाकिस्तान। इतने मुश्किल हालातों के बावजूद भी सरकार का असली नाइट मेयर पंजाब नहीं था बल्कि था। होम मिनिस्टर के पास सूचना है कि कोलकाता के हिंदू द डायरेक्ट एक्शन डे का [संगीत] बदला लेने वाले हैं। पंजाब के लिए तो उन्होंने फिर भी 55,000 सोल्जर्स की एक बाउंड्री फोर्स बनाई थी। लेकिन के लिए उनके पास कुछ नहीं था। असाइन ऑल द यूनिट्स टू पंजाब दे विल बी नंग लेफ्ट टू स्टॉप दिस बाथ
इन बंगाल। माउंटबन जानते थे कि अगरक की स्लम्स और कंजेस्टेड बाजार में एक बार वायलेंस शुरू हो गया तो कोई भी आर्मी उसे कंट्रोल नहीं कर पाएगी। फील्स वायलेंस ब्रेक्स [संगीत] नंबर ट्रू वी हैव नॉट मैटर विल बी एबीक में वायलेंस को कंट्रोल करने के लिए उन्हें एक मिरेकल चाहिए था एक चमत्कार इसलिए जुलाई के आखिर में माउंटबैटन मिलने गए थे महात्मा गांधी से। माउंट बैटन ने एक बड़ी अजीब सी रिक्वेस्ट करी है। उन्होंने कहा शायद आप अपनी पर्सनालिटी और नॉन वायलेंट आइडियल की ताकत से वह कर सकते हैं जो कोई भी आर्मी नहीं कर
सकती। उन्होंने कहा आप कैलकु में हमारी मदद करो। यू विल बी माई वन मैन बाउंड्री फोर्स। 13 अगस्त को गांधी कोलकाता पहुंचे। यहां रहने के लिए उन्होंने बेलिया घाटा का हैदरी हाउस चुना। एक अबंडेंट टूटा-फूटा गंदा सा घर। लेकिन सबसे शॉकिंग बात यह थी कि यहां इन्होंने शाहिद [संगीत] सोहरा वार्दी के साथ रहना शुरू किया। वही सुरा वार्दी जिसे हिंदू बुचर ऑफ कोलकाता कहते थे। यह अगस्त 1946 में बंगाल के प्राइम मिनिस्टर थे और डायरेक्ट एक्शन डे पर हजारों लोगों की मौत के लिए जिम्मेदार भी थे। लेकिन अब सुरा वार्दी कोलकाता के मुस्लिम्स की जान
बचाने के लिए गांधी जी [संगीत] की जरूरत थी। गांधी ने उनके सामने दो शर्तें रखी। पहला यह कि सुरा वार्दी को नोहा कली के मुस्लिम से एक प्लेज लेना होगा कि वो वहां हिंदूस को सेफ रखेंगे। अगर एक भी हिंदू मारा गया तो गांधी उसके खिलाफ आमरण अनशन करेंगे और दूसरी शर्त थी कि सूरा भारती को गांधी के साथ उनके घर में रहना होगा बिना किसी हथियार के बिना किसी सिक्योरिटी के। इस प्लान की शुरुआत अच्छी नहीं रही। गांधी के सपोर्टर्स ही उनसे नाराज हो गए। लेकिन इसी की वजह से 15 अगस्त को एक चमत्कार
हुआ। कोई भी दंगा नहीं देखा गया। जो लोग धर्म के नाम पर एक दूसरे के दुश्मन बने वो सड़कों पर गले मिलने लग गए। 16 दिन तक कोई वायलेंस नहीं हुआ। लेकिन धीरे-धीरे पंजाब से आने वाली हॉरर स्टोरीज कोलकाता पहुंच गई और वहां भी हिंसा भड़कने लगी। हैदरी हाउस से थोड़ी ही दूर दो हैंड ग्रेनेड्स एक ट्रक पर फेंके गए जो मुस्लिम्स को ले जा रहे थे। गांधी तुरंत वहां पहुंच गए। उसी रात गांधी अनाउंसमेंट करते हैं कैलकाता में शांति बनाए रखने के लिए गांधी जी आमरण अनशन करने वाले हैं। कोलकाता ब्यूरो से खबर आई
है कि शहर में बढ़ती हिंसा को रोकने के लिए 78 वर्षीय गांधी जी ने आमरण अनशन का ऐलान किया है। 1 सितंबर 1947 रात में गांधी जी अपना फ़ास्ट शुरू करते हैं और 3 दिन के अंदर-अंदर ही वह बहुत कमजोर हो जाते हैं। इतने कमजोर कि उनकी आवाज भी नहीं निकल रही थी। लोगों में ये खबरें फैलने लगी। बापू बीमार हैं। उनकी तबीयत बिगड़ रही है। का माहौल बदलने लगा। लोग बापू की तस्वीरें लेकर सड़कों पर निकलने लगे। जैसे-जैसे यह खबर फैली कि गांधी जी बहुत बीमार हैं, उनके समर्थक में हिंदूज और मुस्लिम्स साथ में
आए। आम लोग घर से घर जाकर अपील करने लगे। प्लीज वायलेंस रोक दो अब और हिंसा नहीं। और फिर कुछ ऐसा हुआ दोस्तों जो किसी ने सोचा तक नहीं था। 27 गुंडे हैं जिन्होंने दंगों में भाग लिया था। वो हैदरी हाउस के दरवाजे पर आते हैं और अपने क्राइम्स को गांधी जी के सामने कंफेस करते हैं। इसी शाम वो गुंडे भी आए जो मुस्लिम मजदूरों के मर्डर्स के लिए जिम्मेदार थे और फिर उन्होंने अपने चाकू, बंदूके और सभी हथियार गांधी के पैरों में रख दिए। गांधी जी ने कहा कि जिनको तुमने सताया है, अब उनकी
रक्षा करो। जिन मुसलमानों को मारने के लिए हथियार उठाए थे, अब उनके घर के बाहर जाके पहरा दो। 4 सितंबर की शाम को 73 घंटों के बाद गांधी जी अपना फास्ट तोड़ते हैं। इसे मिरेकल ऑफ कोलकाता बोला जाता है। जो काम 55,000 लोगों की पुलिस फोर्स नहीं कर पाई वो एक बूढ़े आदमी ने बिना किसी हथियार को उठाए कर दिखाया। यह चीज इतनी अनबिलीवेबल थी कि आप यकीन नहीं करोगे दोस्तों कि इस पॉइंट से लेकर जब तक गांधी जी जिंदा रहे उनके जीते जी कोलकाता में फिर कभी कोई कम्युनल राइट नहीं देखने को मिला। द
मिरेकल एस मेनी इंडियंस डिस्क्राइब इट वाज़ इवेंचुअली अकम्प्लिश फॉर गांधी हिमसेल्फ द लाइफ लॉन्ग पीचर ऑफ़ नॉन वायलेंस। इट मस्ट इंडीड हैव बीन अ टाइम फॉर थैंक्स गिविंग। लेकिन पार्टीशन पर वापस आए तो बात यहां सिर्फ इंडिया और पाकिस्तान के बीच नहीं हो रही थी। 1947 में 500 से भी ज्यादा प्रिंसली स्टेट्स यानी रजवाड़े थे जो ब्रिटिश इंडिया की ज्योग्राफी में बिखरे हुए [संगीत] थे। कई दशकों पहले ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने इन स्टेट्स पर ट्रीटीज थोपी थी। जिनमें कंपनी को पैरामाउंट पावर माना गया था। मतलब लीगली तो यह राज्य नवाब्स और महाराजा के थे,
लेकिन सारा काम ब्रिटिश डिसाइड करते थे। इन राजा महाराजाओं को राजा बनाए रखने के बदले यह ब्रिटिश को भारी सब्सिडी देते थे। पॉलिटिकल डिपेंडेंस के साथ-साथ इकोनॉमिक डिपेंडेंस भी थी। रॉ मटेरियल्स, इंडस्ट्रियल गुड्स और नौकरियां [संगीत] ये सब कुछ ब्रिटिश इंडिया पर निर्भर था। लेकिन जब 1946 में कैबिनेट मिशन आया तो उसने सिर्फ हिंदू मुस्लिम के सवाल पर फोकस किया। प्रिंसली स्टेट्स का जिक्र तक नहीं किया गया। 3 जून 1947 को जब ब्रिटिश ने अनाउंस किया कि वह जा रहे हैं और यहां पर दो अलग देश, दो डोमिनियंस बनेंगे। इस वक्त भी यह क्लियर नहीं
था कि इन प्रिंसली स्टेट्स का क्या होगा। इसी ए्बिग्विटी के चलते कुछ राजाओं ने इंडिपेंडेंट देश बनाने के अपने सपने देखने [संगीत] शुरू कर दिए थे। इन रजवाड़ों का कहना था कि हमने ब्रिटिश को यह पावर दी थी और अब जब ब्रिटिश जा रहे हैं तो वो हमारी पावर वापस देकर जाए। टोटल में 565 प्रिंसली स्टेट्स थी। हालांकि ज्यादातर इनमें से बहुत छोटे-छोटे रीजंस थे [संगीत] इंडिया के बीच लेकिन हैदराबाद और कश्मीर जैसे जॉइंट स्टेट्स भी इनका हिस्सा थे। हैदराबाद और कश्मीर जैसे जॉइंट स्टेट्स अगर इंडिपेंडेंट बन जाते तो वो यूरोप के कई देशों से
ज्यादा बड़े होते साइज में और ऊपर से अगर कुछ और ये आजाद हो जाते तो इंडिया का नक्शा एक स्विस चीज जैसा दिखता जिसमें 500 से ज्यादा छेद होते। सरदार पटेल जानते थे कि अगर यह 565 राज्य इंडिपेंडेंट हो गए तो इंडिया कभी सर्वाइव नहीं कर पाएगा। इसलिए स्टेट्स को इंडिया से मिलाने की जिम्मेदारी इन्होंने खुद पर ली। 1000 परेशानियां बराबर उसमें से 500 65 कम कर दो। घटा दो और रजवाड़ों को मुझे और मेनन साहिब को हैंडल करने दो। माउंट बैटन सरदार पटेल को एक डील प्रपोज करते हैं। अगर कांग्रेस इन राजा महाराजाओं को
उनके नाम, उनके टाइटल्स, उनके महल, उनके प्रीवी पर्सेस और ये सारे प्रिविलेजेस रखने दें, तो इन राजाओं को 15 अगस्त से पहले इंडिया ज्वाइन करने के लिए माउंटबेटन खुद ही कन्विंस कर लेंगे। इन प्रिंसली स्टेट्स ने इन लोगों को एप्पल्स की एनालॉजी दी। हर प्रिंसली स्टेट के लिए एक एप्पल। सरदार पटेल ने कहा कि अगर माउंट बैटन उनको इन सारे एप्पल्स से भरी बास्केट लाकर देंगे तो वो इसे लेने को तैयार हैं। माउंटबन ने कहा इनमें से छह को छोड़कर बाकी सब मैं ले आऊंगा। दे विल ऑफर द प्रिंसेस सम माउंट बैटन मैच। 565 -
6 मतलब माउंट बैटन को 550 से ज्यादा सेब तोड़ने थे। वो भी 15 अगस्त से पहले। इस सबके बीच जवाहरलाल नेहरू माउंटबेटन को ऑफर करते हैं कि वह आजाद भारत के पहले गवर्नर जनरल बने। सोचिए जिस ब्रिटिश वायसराॉय ने अभी-अभी देश का बंटवारा कराया है उसी को इंडिया का सबसे बड़ा कॉन्स्टिट्यूशनल पोस्ट दे दिया जाए। यह नेहरू की तरफ से कोई फ्लैट्री नहीं थी बल्कि एक सोची समझी गई चाल थी। एक स्ट्रेटजी। दोनों नेहरू और पटेल जानते थे कि माउंटबेटन के पास ब्रिटिश क्राउन का कनेक्शन है और राजाओं पर इन्फ्लुएंस है। प्रिंसली स्टेट्स का मर्जर,
एसेट्स का डिवीजन, कश्मीर जैसे डिस्प्यूट्स इन सब में एक फ्रेंडली माउंटबैटन बहुत काम आ सकता था। माउंटबेटन ब्रिटेन के राजा का कजिन है। हम ठहरे [संगीत] सड़कों वाले हैं वो ठहरे। महलों वाले हैं। तो महलों वालों को महलों वालों की भाषा जल्दी समझ में आवे। ऐसी संभावनाएं [संगीत] ज्यादा है। लेकिन पाकिस्तान ने इसका बिल्कुल उल्टा किया। जिन्ना ने खुद को ही गवर्नर जनरल बना दिया। माउंट बैटन ने उन्हें कहा समझाने की कोशिश की कि ब्रिटिश कॉन्स्टिट्यूशनल सिस्टम में असली पावर प्राइम मिनिस्टर के पास होती है। जिन्ना को प्राइम मिनिस्टर बनना चाहिए था गवर्नर जनरल बनने
की जगह लेकिन जिन्ना नहीं माने। उन्होंने कहा आई विल बी द गवर्नर जनरल एंड द प्राइम मिनिस्टर विल डू एस आई से। तो कुछ इस तरीके से दोस्तों माउंटबेटन इंडिया के गवर्नर जनरल बने और उन्होंने एक-एक करके राजाओं को इंडिया जॉइ करने के लिए कन्विंस करना शुरू कर दिया। इसके अलावा सरदार पटेल ने इस काम को एक ऐसे आदमी को दिया जो ब्रिटिश इंडिया के सबसे पावरफुल इंडियन सिविल सर्वेंट्स में से एक थे। इनका नाम था वीपी मेनन। यह माउंट बैटन के एडवाइजर भी रहे थे जिससे वह माउंटबैटन और पटेल के साथ अच्छे से कोऑर्डिनेट
भी कर सकते थे। पटेल को एक ऐसे आदमी चाहिए थे जो राजाओं से बात कर सके। उन्हें समझा सके और जरूरत पड़ने पर उन्हें डरा भी सके। माउंट बैटन और वीपी मेनन एक-एक करके राजाओं से मिलने लगते हैं। कुछ को समझाया जाता है। कुछ को डराया जाता है और कुछ को डील्स दी जाती हैं। कांग्रेस भी मोटे-मोटे तौर पर माउंटबेटन की बात को मान जाती है। राजाओं को अपना टाइटल अपने महल रखने दिए जाते हैं। अपने प्रीवी पर्सेज रखने दिए जाते हैं। इसी के चलते ज्यादातर राजा महाराजा साइन कर देते हैं। [संगीत] इंडिया का हिस्सा
बनने के लिए राजी हो जाते हैं। लेकिन बहुतों के लिए यह बहुत पेनफुल था। सेंट्रल इंडिया के एक राजा ने साइन करते ही हार्ट अटैक से दम तोड़ दिया। पंजाब के आठ महाराजाओं ने एक साथ साइन किया लेकिन माहौल ऐसा था जैसे कि किसी के क्रेमेशन में गए हो। सबसे ड्रामेटिक सीन दोस्तों जोधपुर के यंग महाराजा के साथ देखा गया। उनको ऐसा लगता था कि कांग्रेस के सोशलिस्ट राज में वो एडजस्ट नहीं कर पाएंगे। तो वो जैसलमेर के महाराजा के साथ सीक्रेटली जिन्ना से मिलने चले गए। जिन्ना ने उन्हें बदले में एक ब्लैंक पेपर दिया।
उन्होंने कहा जो कंडीशंस लिखनी है लिखो मैं साइन कर दूंगा। लेकिन यह बात किसी तरीके से वीपी मेनन को पता चल गई। उन्होंने तुरंत माउंट बैटन को वहां बुलाया। माउंट बैटन ने महाराजाओं को समझाया और फाइनली वह साइन करने को राजी हुए। एक तोहफा हमारी तरफ से भी लेते जाइए। लेकिन साइन करने के एकदम बाद जोधपुर के महाराजा ने एक मिनी पिस्तौल वीपी मेनन के सिर पर तान दी। वहां माउंटबेटन को वापस आकर पिस्तौल छीननी पड़ी। सबसे अजीब कहानी थी दोस्तों जूनागढ़ की। जूनागढ़ में नवाब मुस्लिम थे, लेकिन वहां की 82% पॉपुलेशन हिंदू थी। नक्शे
पर देखिए यह चारों तरफ इंडिया से घिरा हुआ था। जूनागढ़ के नवाब मोहब्बत खान कुत्तों के शौकीन थे और उनके पास 2000 से भी ज्यादा कुत्ते थे। इन्होंने अपने हर एक कुत्ते को अलग कमरा दिया था और अपने अलग नौकर भी थे। इनकी फेवरेट फीमेल डॉग रोशारा की शादी बॉबी नाम के कुत्ते से कराई गई थी और इसमें इन्होंने करोड़ों रुपए खर्च भी किए थे। लेकिन इनके दीवान सर शाहनवाज भुट्टो ने एक ऐसी चीज जाकर जूनागढ़ के नवाब को कह दी जिससे यह बहुत डर गए। इनके मन में यह बात बिठा दी गई कि इंडिपेंडेंट
इंडिया का पहला एक्ट होगा कि हिंदुस्तान की सरकार आपके कुत्तों को जहर खिला के मारना चाहती है। और इन्हें कहा गया कि अगर इंडिया का हिस्सा बन गए तो अपने कुत्तों के साथ नहीं रह पाओगे। इसलिए 14 अगस्त 1947 को जूनागढ़ अनाउंस करता है कि वह पाकिस्तान में शामिल होगा। पाकिस्तान ने कई दिनों तक तो इस पर कुछ नहीं किया लेकिन 13 सितंबर 1947 [संगीत] को उसने जूनागढ़ का सेशन एक्सेप्ट कर लिया। मिस्टर जिन्ना हैज़ फॉर्मली एक्सेप्टेड जूनागढ़ एक्सेशन। जिन्ना असल में जूनागढ़ को कश्मीर के लिए एक बार्गेनिंग चिप की तरह इस्तेमाल करना चाहते थे।
सरदार पटेल ने तुरंत इंडियन आर्मी को आर्डर दिया कि वह जूनागढ़ को चारों तरफ से घेर लें। यह देखकर नवाब डर गए और प्लेन में कराची भाग गए अपने कुत्तों के साथ। 9 नवंबर 1947 जूनागढ़ फाइनली इंडिया में शामिल हो जाता है। यहां पर एक प्लेबीसाइट भी करवाया जाता है जिसमें लोगों से पूछा जाता है जिसमें 91% लोगों का कहना था कि वो इंडिया में शामिल होना चाहते हैं और उन्होंने उसके लिए वोट किया। लेकिन सबसे बड़ा सेब जो टोकरी से बाहर था वो था कश्मीर। कश्मीर का केस जूनागढ़ से बिल्कुल उल्टा था। जूनागढ़ में
नवाब मुस्लिम थे और पॉपुलेशन हिंदू लेकिन कश्मीर में महाराजा हर सिंह हिंदू थे और मेजॉरिटी पॉपुलेशन मुस्लिम की थी। हरी सिंह एक आजाद कश्मीर देश का सपना देख रहे थे। जुलाई 1947 में वह लॉर्ड माउंटबेटन से मिलते हैं। माउंटबेटन उन्हें कहते हैं कि अपनी मुस्लिम पॉपुलेशन को देखते हुए उन्हें पाकिस्तान में शामिल हो जाना चाहिए। लेकिन हर सिंह ने साफ मना कर दिया। फिर माउंटबेटन कहते हैं कि अगर पाकिस्तान में नहीं जाना तो इंडिया का हिस्सा बन जाओ। लेकिन हर सिंह बोले वह भी नहीं। मुझे अपना आजाद देश चाहिए। माउंटबेटन ने उन्हें वार्निंग दी। अगर
आपने जल्दी फैसला नहीं लिया तो यह इंडिया पाकिस्तान के बीच युद्ध का कारण बनेगा। लेकिन हर सिंह डस से मस नहीं हुए। अरे यू ग 24 आवर्स आई एम ओपनिंग द गेट द प्रोटेस्ट एंड आई एम नॉट ब्लफिंग। इसके बाद कुछ ऐसा होता है जिससे पूरी इक्वेशन बदल जाती है। 24 अगस्त को मोहम्मद अली जिन्ना ने अपने ब्रिटिश मिलिट्री सेक्रेटरी कर्नल विलियम बिरनी को एक रिक्वेस्ट भेजी। कश्मीर में दो हफ्ते की छुट्टी अरेंज करने के लिए। लेकिन हरी सिंह ने इससे साफ मना कर दिया। सितंबर 1947 लाहौर में एक सीक्रेट मीटिंग होती है जिसका एजेंडा
था हरी सिंह को कैसे पाकिस्तान जॉइ करने के लिए मजबूर किया जाए। प्लान बनाया जाता है कि नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर के पठान ट्राइब्समैन को भेजकर कश्मीर पर हमला करा दो। यह वो वॉरियर्स थे जिनसे अंग्रेज भी डरते थे। इसके लिए इन ट्राइबल्स को कश्मीर के बाजार लूटने का लालच भी दिया जाता है। लेकिन यही लूट का वादा आगे चलकर पाकिस्तान का सबसे बड़ा दुश्मन बनने वाला था। 24 अक्टूबर 1947 दशहरे के दिन श्रीनगर पैलेस में अचानक से अंधेरा छा गया। पूरे श्रीनगर की बिजली देने वाला माहूरा पावर स्टेशन पठान्स ने डायनामाइट लगाकर उड़ा दिया था।
हरि सिंह की अपनी आर्मी या तो भाग गई थी या इनवेडर से जाकर मिल गई थी। पहले बिजली चली गई। अब ये फोन लाइंस और ये दशहरा के रात को। कोई बताओ यह क्या हो रहा है? कब अली घुसपसटियों ने मोहरा पावर स्टेशन पे हमला कर दिया है। तो हमारी फौज से कहो उन्हें रोके। कौन सी फौज से कहूं महाराज? हमारी कोई फौज बची नहीं अब। यह देखकर महाराजा हर सिंह तुरंत इंडियन सरकार से मदद मांगते हैं और इस मदद का ऑफर देखकर जवाहरलाल नेहरू बड़े खुश होते हैं। महाराजा को इंस्ट्रूमेंट ऑफ असेशन साइन करने
को कहा जाता है कि कश्मीर [संगीत] इंडिया का हिस्सा बन जाए और 26 अक्टूबर 1947 महाराजा हरि सिंह इसे साइन कर भी देते हैं। 27 अक्टूबर की सुबह इंडिया का पहला मेजर मिलिट्री ऑपरेशन [संगीत] शुरू होता है। 329 सिख सोल्जर्स श्रीनगर एयरपोर्ट पर उतरते हैं। ये सिर्फ इसलिए पॉसिबल हुआ क्योंकि पठान्स अपना असली मकसद भूलकर लूटपाट में बिजी हो गए थे। इनका ओरिजिनल प्लान था श्रीनगर एयरपोर्ट पर कब्जा कर लेना ताकि इंडियन एयरफोर्स वहां पर लैंड ही ना कर पाए। श्रीनगर पहुंचकर एयरपोर्ट पर कब्जा करने का प्लान था ताकि हिंदुस्तानी एयरफोर्स वहां लैंड ना कर
पाए। लेकिन बारामुल्ला में फंस गए थे। लेकिन बारामुल्ला में यह इनवेडर्स लूटपाट करने में इतना बिजी हो गए कि श्रीनगर से सिर्फ 30 मील पहले ही इन्होंने वहां का बाजार लूटना शुरू कर दिया। सेंट जोसेफ्स कॉन्वेंट पर हमला किया। नंस के साथ रेप किया गया। यह ब्रूटिटी इन्हें घंटों तक बारामुल्ला में ही रोके रही और इसी देरी की वजह से इंडियन आर्मी श्रीनगर एयरपोर्ट को सिक्योर कर पाती है। और बाद में चलकर इसी वजह से कश्मीर कभी जिन्ना का नहीं हो पाता। गलती मेरी है। मैंने तुम्हें प्राइम मिनिस्टर की कुर्सी दी। तुम्हारी इस बेवकूफी की
कीमत हमें कश्मीर खोकर अदा करनी पड़ेगी। इंडियन आर्मी के कश्मीर पहुंचने पर जिन्ना भड़क गए। उन्होंने अपनी आर्मी को कश्मीर में मार्च करने का आदेश दिया। लेकिन इस वक्त तक दोनों इंडियन और पाकिस्तान आर्मी को ब्रिटिश ऑफिसर्स लीड कर रहे थे। पाकिस्तान आर्मी के ब्रिटिश कमांडर इन चीफ ने जिन्ना का आदेश मानने से ही [संगीत] मना कर दिया। लेकिन जिन्ना अभी भी हार मानने वाले नहीं थे। इन्होंने अपने लोगों को कहा कि ट्राइबल इनवेडर्स के भेष में पाकिस्तान आर्मी को भेजा जाए। हवेलियों के भेष में अपने सिपाहियों को भेज दो। इंडियन आर्मी ने इस वक्त
तक श्रीनगर के चारों तरफ एक प्रोटेक्टिव रिंग बना दिया था। अब वहां 4000 ट्रूप्स थे मशीन गंस के साथ। श्रीनगर सेफ हो चुका था। धीरे-धीरे करके बाकी कुछ दिनों में इंडियन आर्मी ने वैली से बाकी इनवेडर्स को बाहर निकालना शुरू किया। 8 नवंबर को बारामुल्ला वापस ले लिया गया। 4 दिन बाद महूता कैप्चर कर लिया गया और अगले दिन उरी भी आ गया। 1 जनवरी साल 1948 माउंटबेटन की सलाह पर इंडिया कश्मीर का इशू यूनाइटेड नेशंस में ले गया। इंडिया का कहना था कि कश्मीर लीगली हमारा है और यूनाइटेड नेशंस को पाकिस्तान के इललीगल ऑक्यूपेशन
को खत्म करने में मदद करनी चाहिए। इसके ठीक एक साल बाद 1 जनवरी साल 1949 को सीज फायर हो जाता है। जहां जिसकी आर्मी खड़ी थी वहीं लाइन खींच दी जाती है। इस लाइन को सीज फायर लाइन कहा जाता है। बाद में जाकर यही लाइन ऑफ कंट्रोल बन जाती है। कश्मीर जो पूरा इंडिया का था अब उसके एक हिस्से पर पाकिस्तान नाजायज कब्जा कर लेता है। इसी के साथ ही इंडिया का नक्शा आज के भारत जैसा दिखने लगा। कुछ और फ्रेंच और पोर्चुगीज कॉलोनीज भी बची थी जो अगले कुछ सालों में जाकर [संगीत] इंडिया में
शामिल हो गई। उनकी कहानी अपनी अलग है। बड़ी इंटरेस्टिंग है। कभी और डिटेल में किसी और वीडियो में बात करेंगे और उनके बाद सिर्फ एक और हिस्सा था जो साल 1975 में जाकर ही इंडिया में शामिल हुआ। सिक्किम नाम का एक अलग किंगडम। वहां रेफरेंडम कराया जाता है और 97.55% वोट्स के साथ लोग प्रेफर करते हैं भारत [संगीत] में शामिल होना। सिक्किम हैज़ ऑफिशियली बिकम पार्ट ऑफ इंडिया टुडे। एंडिंग सेंचुरीज ऑफ इंडिपेंडेंट रूल आफ्टर द ओवरवेल्मिंग 1975 रेफरेंडम पेव द वे फॉर फुल स्टेटहुड विथ इन द इंडियन फेडरेशन। इंडिया को बनाने की यह कहानी बहुत
लंबी है। अगर सरदार पटेल और वीपी मेनन नहीं होते तो आज इंडिया का नक्शा स्विस चीज जैसा दिखता। एक देश के अंदर कई सारे और देश कोई नेशनल आर्मी नहीं होती, कोई नेशनल करेंसी शायद नहीं होती। पार्टीशन एक ट्रैजेडी थी, लेकिन इंटीग्रेशन एक मिरेकल था और यह दोनों एक साथ हुए। यही है साल 1947 की असली कहानी दोस्तों। अगर आप यह कहानी और डिटेल में जानना चाहते हो, तो Sony Liv पर जाकर फ्रीडम एट मिडनाइट शो जरूर देखना। और आजादी मिलने से एक साल पहले की कहानी अगर आप और डिटेल में जानना चाहते हो कि
1946 से 47 तक क्या चल रहा था। क्या इंटरनल पॉलिटिक्स हो रही थी कांग्रेस पार्टी और मुस्लिम लीग के बीच में तो उसे मैंने बेहद डिटेल में समझाया है इस वाले वीडियो में। [संगीत] यहां क्लिक करके देख सकते हो। बहुत-बहुत धन्यवाद।