[संगीत] महाकुंभ 12 वर्ष बाद प्रयागराज के संगम तट पर सबसे पवित्र आयोजन महाकुंभ जहां 144 वर्ष बाद बन रहा है अद्भुत संयोग महाकुंभ जहां घोर तप के बाद एक सामान्य सन्यासी नागा साधु बनता है जिन नागा साधुओं की दुनिया में आज हम आपको लिए चल रहे हैं मुमकिन है उनके बारे में आपने बहुत कुछ पढ़ा हो बहुत कुछ सुना हो उसके बावजूद आप उस रहस्य में उलझे हो तो आज हम आपके लिए परत दर परत वो कहानी खोलेंगे बिल्कुल अद्भुत तो है ही बेहद अद्भुत है दिव्य नागा साधु अपने जीवन को अद्भुत तपस्या करके अपने
जीवन को अद्भुत बनाते रहते हैं अद्भुत फीलिंग है जो नहीं कहते हैं उसको किसी को दर्शाया व बताया नहीं जा सकता भभूत में लिपटा पूरा शरीर आंखों में हर वक्त दहकते आध्यात्मिक शक्ति के शोले माथे पर त्रिपुंड रुद्राक्ष से सुशोभित भुजाओं में शिव शक्ति प्रतीक त्रिशूल और पत्थर से चेहरे पर भोले शंकर की जय जयकार का भाव सनातन धर्म के इस प्रचंड प्रज्वलित रूप को ही दुनिया ना सन्यासी कहती [संगीत] है अपने परिवार का अंत अपने एक एक रिश्तेदार का अंत अपना अंत और उसके साथ होती है एक नई शुरुआत जो नागा सन्यासी होते हैं
उनके अध्याय की शुरुआत ही उनके अंत से होती है जिनको नागा के सीट या नागा की उपाधि मिल जाते हमारे समाज की ओर से हमारे संत समाज की ओर से गुरु परंपरा की ओर से और शंकराचार्य जी की ओर से उन्हीं को नागा रहने की अनुमति दी जाती है अर्थवा जो नागा दिगंबर है दिगंबर तक वह जो है कहीं भी हमारे जो धर्म प्रचार हेतु समय आता है तो उस समय नगा होते हैं जो श्री दिगंबर है वह अनथा हर समय ही दिगंबर रहते सवाल ये उठता है कि जब खुद को मृत घोषित करके अपने
हाथों अपना अंतिम संस्कार कर ही दिया जाता है फिर एक नागा साधु के जीवन का उद्देश्य क्या रह जाता है वो किस लिए शस्त्र धारण करते हैं वो किस लिए कठोर तप में जीवन बिताते [संगीत] हैं किताबों में भले ही नागा सन्यास के योद्धा रूप का जिक्र कम मिलता हो लेकिन इतिहास गवाह है कि जब जब धर्म को बचाने की अंतिम कोशिशें भी बेकार होती दिखी है तब तब नागा साधुओं ने धर्म की रक्षा के लिए ना सिर्फ हथियार उठाए है बल्कि जान देकर या जान लेकर धर्म की रक्षा की नागा साधुओं ने अपने समय
में सनातन को बचाने के लिए बड़े-बड़े युद्ध भी किए तोमर जैसों को पीछे हटाया जब सब राजा हार मार जाते तो सनातन धर्म के जितने भी नागा लोग इकट्ठे होके ये उनसे यु करते थे ऐसी बहुत सी स्टोरिया जहां पर उन्होने धर्म को बचाया ग्रंथों को कर दिया पर इनको कंठस्थ याद होने से नागाव को फिर से लिपियां तैयार हो गई धार्मिक इतिहास के ग्रंथों में इस बात का जिक्र मिलता है कि आठवी शताब्दी में जब सनातन धर्म की मान्यताओं और मंदिरों को लगातार खंडित किया जा रहा था तब आदि गुरु शंकराचार्य ने चार मठों
की स्थापना की और वहां से सनातन धर्म की रक्षा का दायित्व संभाला उस समय ही आदि गुरु शंकराचार्य को जरूरत महसूस हुई कि सनातन परंपराओं की रक्षा के लिए सिर्फ शास्त्र ही काफी नहीं है शस्त्र भी जरूरी है और तब उन्होंने अखाड़ा परंपरा शुरू की जिसमें धर्म की रक्षा के लिए मर मिटने वाले सन्यासियों ने प्रशिक्षण लेना शुरू किया नागा सन्यासी उन्ही अखाड़ों के धर्म रक्षक है युद्ध कौशल सनातन के धर्म के प्रचार के लिए उसको वर फेयर की पॉलिसी के आधार पर गठन किया था शंकराचार्य जी का बेहद व्यापक इसके अंदर विचार आदि गुरु
शंकराचार्य के द्वारा जो प्रतिष्ठित किया गया था उसी के मार्ग पर नागा साधु कठिन से कठिन परिस्थितियों में मुकाल बला करके अपने जीवन को बहुत आनंद में आगे बनाते रहते हैं और बड़ी-बड़ी कठिनाइयों से वह संघर्ष करते रहते हैं क्योंकि जब कोई अपने जीवन में संघर्ष नहीं करेगा तो वह धर्म की रक्षा कैसे करेंगे कहा जाता है कि जब 18वीं शताब्दी में अफगान लुटेरा अहमद शाह अब्दाली भारत विजय के लिए निकला तो उसकी बर्बरता से इतना खून बहा कि आज तक इतिहास के पन्नू में अब्दाली का जिक्र दरिंदे की तरह किया जाता है उसने जब
गोकुल और वृंदावन जैसी आध्यात्मिक नगरिया पर कब्जा करके दरिंदगी शुरू की तब राजाओं के पास भी वो शक्ति नहीं थी जो उससे टकरा पाते लेकिन ऐसे में हिमालय की कंदरा से निकली नागा साधुओं की आर्मी और उन्होंने ललकारा अब्दाली की विशाल सेना को उस दौर के गजेटियर में यह भी लिखा है कि 1751 के आसपास अहमद खान बंगस ने कुंभ के दिनों में इलाहाबाद के किले पर चढ़ाई की और उसे घेर लिया हजारों नागा सन्यासी उस समय स्नान कर रहे थे उन्होंने पहले सारे धार्मिक संस्कार पूरे किए फिर अपने शस्त्र धारण करके टूट पड़े बंगस
की सेना पर तीन महीने तक जमकर युद्ध चला अंत में पवित्र नगरी प्रयागराज की रक्षा हुई अहमद खां बंगस की सेना को हार मानकर पीछे लौटना पड़ा हमारे नागा साधु पूरे भारतवर्ष में जहां जो काम ना होता हो वहां पर अड़ कर के उस कार्य को सफल कर देते हैं चाहे रिद्धि के द्वारा अथवा सिद्धि के द्वारा अथवा तन के द्वारा 1666 के आसपास औरंगजेब की सेना ने हरिद्वार कुंभ के दौरान आक्रमण किया था तब नागा सन्यासियों ने उससे लड़ने के लिए मोर्चा संभाला था कभी जोधपुर की ऐसी कहानियां मिलती है जहां हजारों नागा सन्यासियों
ने अपनी जान देकर धर्म की रक्षा की कभी हरिद्वार में तैमूर लंग के समय के टकराव की कहानियां मिलती है नागा साधु धर्म के खातिर अपनी आन बान सम्मान सान के लिए बर हमेश कट कड़ी से कड़ी टक्कर देते रहते हैं और अपना तपस्या जारी रखते हैं पर देश की स्वतंत्रता के बाद कहानी बदल गई देश की रक्षा के लिए हिंद की सेना खड़ी है लेकिन नागा सन्यासी आज भी होते योद्धा ही है धर्म रक्षा के साथ राष्ट्र धर्म भी उनकी प्राथ [संगीत] तंत्रतानिकेतन है ज्ञान है शस्त्र है अस्त्र है नहीं है तंत्र है मंत्र
है नहीं है जी गुरु लोग सब चीज का अभ्यास कराते हैं सनातनी नागा योद्धा बनने के लिए उम्र जाति धर्म या देश की सीमाएं कभी बाधा नहीं बनती विदेशी नागरिकों में भी तेजी से दीक्षा लेने का चलन बढ़ा है इंसानी शरीर हाड़ मास का बना जिसे भीषण गर्मी में भी छटपटाहट होती है और व भीषण ठंड में भी तड़पता है उतना ही फिर आखिर व कौन सा रहस्य है वो कौन सी साधना कि नागाव को इस ठंड का एहसास नहीं होता जहां बाकियों को आप ठंड के पूरे कपड़ों में देखेंगे वहां इनके शरीर पर केवल
भभूत पले तो हमें कपड़े नहीं थे दिगंबर ही तकरीबन रहते थे और इस वक्त समाज परिवर्तन होने की वजह से हमें समाज में रहने योग और मानता के मर्यादा के अनुकूल चलने योग हमें यह भगवा वस्त्र दिया गया है दरअसल नागा दीक्षा के दौरान दो तरह के नागा साधु तैयार होते हैं एक दिगंबर नागा साधु दूसरे श्री दिगंबर नागा साधु दिगंबर नागा साधु एक लंगोट धारण करने के अलावा और कोई कपड़ा नहीं पहनते जबकि श्री दिगंबर की दीक्षा लेने वाले साधु पूरी तरह निर्वस्त्र रहते हैं सबसे मुश्किल श्री दिगंबर नागा साधु बनना ही होता है
क्योंकि तब संयम और ब्रह्मचर्य पर सदैव डटे रहने के लिए उनकी सभी इंद्रिया नष्ट कर दी जाती है निर्वस्त्र रहने वाले साधु पूरे शरीर पर राख को मलक रखते हैं इसकी भी दो वजह होती है एक तो राख नश्वरता की प्रतीक है दूसरे राख एक तरह के आवरण का काम करती है ताकि भक्तों को पास आने में किसी तरह का कोई संकोच ना रहे नागा साधु जिस राख को लपेट हैं वो कई बार चिताओं से ली गई मुर्दों की राख होती है तो कई बार जिस धुनि के सामने वो बैठे रहते हैं उसी की राख
को मल लिया करते हैं ये भस्मी माता पिता है भस्मी तरन तार नहीं है भस्मी लगी तन हुआ खाक ना कोई माई ना कोई बाप लख निरंजन आप भस्मी हम लोगों का एक वस्त्र है भस्मी से रक्त तुचा यह सबको शोधन करती है और भस्मी एक जीवन को अद्भुत बनाने में सक्षम रहती है जब परंपराओं का पूरी तरह पता ना हो तो असमंजस की वजह से तरह तरह की धारणाएं बनती ही है जिसमें प्रमुख है नागा साधुओं का निर्वस्त्र होना और इसी कड़ी में आती हैं वो सन्यासिन जो इसी नागा पंथ से जुड़ी होती है