यह कथा राजा हर्षवर्धन और उनकी पत्नी रानी विषपाला की है राजा हर्षवर्धन बहुत नेक और धर्म का पालन करने वाले राजा थे वही रानी विषपाला एक अत्यंत रूपवती और पतिव्रता नारी थी उनकी जिंदगी बहुत अच्छे से चल रही थी फिर एक दिन समय ने करवट ली और उन्हें अपनी जिंदगी के बहुत भयानक दौर से गुजरना पड़ा स्वर्ग लोक में एक बार ण देवता और लक्ष्मी जी की कहां सुनी हो गई शनिदेव के अनुसार वे लक्ष्मी जी से बड़े थे और लक्ष्मी जी के अनुसार वह शनिदेव से बड़ी थी इस बात को लेकर उन दोनों में
काफी देर तक बहस होती रही और वे दोनों कोई फैसला नहीं कर पाए आखिर उन्होंने सोचा कि मृत्युलोक में सबसे ईमानदार व्यक्ति से यह फैसला कराया जाए उन दोनों ने सोचा कि मृत्युलोक में प्रयागराज के राजा हर्षवर्धन के पास जाया जाए जब ण देवता और लक्ष्मी जी हर्षवर्धन के पास पहुंचे और अपनी बहस का निर्णय मांगा तो उनको उत्तर देने को कोई उपाय सूझा अंत में उन्होंने दोनों से एक महीने की मोहलत मांगी यह सुनकर शनि देवता व लक्ष्मी जी चले गए और कह गए कि वह अपने झगड़े का फैसला सुनने एक महीने बाद जरूर
आएंगे उनके जाने के बाद हर्षवर्धन का सोना जागना हराम हो गया क्योंकि वह जानते थे कि वह एक को बड़ा बताएंगे तो दूसरा अवश्य ही गुस्सा होगा और उन पर भारी संकट आ जाएगा उसको चिंता में देख उनकी पत्नी विषपाला ने चिंता का कारण पूछा जब हर हर्षवर्धन ने सारा हाल कह सुनाया तो उनकी पत्नी विषपाला बोली कि आप एक चांदी का और दूसरा सोने का आसन बनवाए सोने का आसन आपकी गद्दी के दाहिने ओर तथा चांदी का आसन बाई ओर रहेगा जब लक्ष्मी जी और शनिदेव आएंगे तो लक्ष्मी जी आपके दाहिने तरफ का आसन
ग्रहण करेंगी क्योंकि वे माता स्वरूप हैं और शनिदेव बाई तरफ का आसन ग्रहण करेंगे आप उनके किसी प्रश्न का उत्तर ना दें और जब वह बहुत पूछे कि क्या बात तो आप उनसे कह दें कि आप लोगों ने स्वयं ही अपना फैसला कर लिया है एक महीने बाद जब लक्ष्मी जी और शनिदेव आए तो वैसे ही हुआ जैसे रानी विषपाला ने कहा था लक्ष्मी ने दाई तरफ सोने का आसन ग्रहण किया और बाई तरफ शनिदेव बैठे जब उन्होंने फैसला मांगा और अत्यधिक जोर दिया तो राजा ने वही उत्तर दिया जो रानी ने बताया था यह
सुनकर ण देव गुस्सा होकर चले गए लक्ष्मी जी ने जाते-जाते हर्षवर्धन से कहा कि संकट तो जरूर आएगा परंतु मैं तुम्हारे साथ हूं जल्दी ही ण देवता के प्रकोप से प्रयागराज में बहुत भयंकर अकाल पड़ा लोग भूखे मरने लगे यह दशा हर्षवर्धन से देखी ना गई कोई उपाय ना मिलने पर आखिरकार लगभग एक साल के बाद उन्होंने अपने राज्य को त्यागने का निश्चय कर लिया एक रात को वह अपनी पत्नी के साथ राज्य को छोड़कर निकल पड़े साथ में उन्होंने एक पोटली में हीरे जवाहरात मुसीबत के समय काम आने के लिए ले लिए जैसे ही
हर्षवर्धन विषपाला के साथ निकले बहुत ही भयंकर आंधी तूफान आ गया और चारों ओर अंधेरा छा गया आंधी तूफान में दोनों रास्ता भटक जाने के डर से एक जगह खड़े हो गए तभी लक्ष्मी जी एक छोटी सी लड़की का रूप धारण करके आई और लालटेन की सहायता से उन दोनों को नदी के किनारे तक पहुंचा दिया हर्षवर्धन अपनी पत्नी के साथ नदी के किनारे पहुंच गए परंतु अब नदी पार करने की समस्या उत्पन्न हो गई इतने में एक बूढ़ा नाविक नाव खेता हुआ उस तरफ आया हर्षवर्धन ने निवेदन किया कि वह उनको नदी के किनारे
पहुंचा दे नाविक बोला कि उसकी नाव बहुत हल्की है इसलिए एक-एक करके ही वह उनको पार करा सकता है राजा ने उसकी बात मान ली पहले वह रानी को पार ले गया फिर राजा हर्षवर्धन को और अंत में गहने की उस बड़ी सी पोटली को परंतु उसने गहने की पोटली को नदी पार नहीं पहुंचाया वह उस पोटली को लेकर गायब हो गया हर्षवर्धन थोड़ी देर तो नाविक और पोटली का इंतजार करते रहे परंतु जब उन्होंने देखा कि नाविक नहीं आया तो वे समझ गए कि वह बूढ़ा नाविक कोई और नहीं बल्कि शनिदेव ही थे हर्षवर्धन
और विषपाला नदी के किनारे चलते-चलते एक गांव में पहुंचे वहां के लोग जंगल से लकड़ी काटकर बेचते थे लकड़ी का व्यापार ही उनकी कमाई का साधन था हर्षवर्धन भी अपनी पत्नी के साथ गांव में रहने लगे वे चंदन की लकड़ी काट करर लाते और पास के गांव में बेच देते थोड़े ही समय में चंदन की लकड़ी बेचकर वे काफी पैसे वाले हो गए और आराम से जीवन व्यतीत करने लगे यह सब लक्ष्मी जी की कृपा थी उनको आराम में देखकर ण देव ने फिर से एक चाल चली एक दिन एक सौदागर जो उस गांव से
चंदन की लकड़ी लेकर दूसरे देशों में जाया करता था उसका जहाज यहां फंस गया उसने बहुत प्रयत्न किया परंतु वह जहाज टस से मस ना हुआ उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करें इतने में शि देवता ब्राह्मण का रूप धारण करके उसके पास आए उन्होंने सौदागर से कहा कि मैं तुम्हारे जहाज को हटाने की युक्ति बता सकता हूं सौदागर ने जब उनसे पूछा कि वह युक्ति क्या है तो उन्होंने कहा कि तुम गांव के लोगों को भोजन का निमंत्रण दो और उनमें जो भी सती सावित्री स्त्री होगी यदि वह तुम्हारे जहाज को
छू देगी तो तुम्हारा जहाज चल पड़ेगा सौदागर ने ण देवता के बताए अनुसार गांव के लोगों को निमंत्रण भेज दिया जब वे हर्षवर्धन के घर पहुंचे तो विषपाला ने यह कहकर निमंत्रण अस्वीकार कर दिया कि मेरे पति जंगल में लकड़ी काटने गए हैं सौदागर के आदमी ने वापस जाकर सारी बात बता दी सौदागर समझ गया कि यही औरत पतिव्रता है और यही उसके जहाज को निकाल सकती है वह शाम को फिर उसके घर गया उस समय हर्षवर्धन घर पर ही थे उसने निमंत्रण स्वीकार कर लिया जब सौदागर ने हर्षवर्धन और विषपाला से कहा कि वह
जहाज छू दे जिससे वह निकल सके विषपाला ने अपने पति के कहने पर जहाज छू दिया और जहाज हिलने लगा यह देखकर सौदागर के मन में पाप जागा कि क्यों ना मैं इसको अपने साथ ले चलूं यदि जहाज फिर से फंस गया तो वह छूकर उसे हटा सकती है यह सोचते ही उसने विषपाला को अपने साथ जहाज में खींच लिया और जहाज चल पड़ा हर्षवर्धन चिल्लाया परंतु उस समय तक जहाज काफी दूर चला गया विषपाला अत्यंत रूपवती थी उसको देखकर सौदागर के मन में पाप जागृत हुआ उसने विषपाला के सम्मुख उसे अपनी पत्नी बनाने की
इच्छा जाहिर की पर रानी ने उसे साफ मना कर दिया पर रानी के रूप पर मोहित हुआ सौदागर अब हर समय उसके पीछे पड़ा रहता रानी विषपाला ने सौदागर की छेड़छाड़ से तंग आकर सूर्यदेव से प्रार्थना की कि उसको अपने सतीत्व की रक्षा करने के लिए कोड़ दे दे उसकी प्रार्थना सूर्य भगवान ने सुन ली और उसका शरीर कोड़ से विकृत हो गया इधर राजा हर्षवर्धन भी रोते बिलखते नदी के किनारे से चल पड़े वह इसी आशा में थे कि यदि जहाज उस तरफ से गुजरा तो वह अपनी पत्नी को छुड़ा लेंगे आखिर उसको जहाज
का कहीं पता नहीं चला तो वह नदी के किनारे आश्रम के साधुओं के साथ रहने लगा वह वहां पर साधुओं की सेवा करता गायों को चराता और गायों के गोबर से उपले बनाता वह उपले लक्ष्मी जी की कृपा से सोने के हो जाते इस प्रकार कुछ ही दिनों में उसके पास ढेर सारी सोने की ईटें हो गई एक दिन वही सौदागर जो हर्षवर्धन की पत्नी को ले गया था उसका जहाज वहां पर आया हर्षवर्धन ने सौदागर को पहचान लिया उसने सौदागर को ईंट दिखाकर कहा कि यदि सौदागर उसको साथ ले चलेगा तो वह ईंट उसे
दे देगा सौदागर ने भी हर्षवर्धन को पहचान तो लिया था परंतु सोने की ईंटों के लालच में अपने जहाज में बैठा लिया जब जहाज चल पड़ा तो कुछ ही दूर जाने पर सौदागर ने हर्षवर्धन को नदी में फेंक दिया हर्षवर्धन की चीख पुकार विषपाला को सुनाई दे गई उसने एक काट का टुकड़ा समुंदर में फेंक दिया उस काट के टुकड़े के सहारे हर्षवर्धन एक पुल पर पहुंचा जहां आते-जाते जहाज से चुंगी यानी कर लिया जाता था अनजान व्यक्ति को वहां देख वहां कामगारों ने उससे पूछा कि वह कौन है और कहां से आया है तो
हर्षवर्धन ने कहा कि वह एक अत्यंत दुखी आदमी है वहां के लोग उसको राजा के पास ले गए राजा ने परिचय मांगा तो हर्षवर्धन ने बताया कि वह एक दुखियारा व्यक्ति है जो ऐसे दर दर भटकता है उसने राजा के सामने दया याचिका कर कोई छोटी मोटी नौकरी देने की मांग की राजा भी एक दयालु व्यक्ति था उसने उसे वहां के बगीचे का माली बना दिया उस राज्य के राजा के यहां संतान के रूप में इकलौती पुत्री थी जिसके लिए नित्य फूलों का सुंदर गजरा बनाकर मालिन लेकर जाती थी एक दिन राजकुमारी ने मालिन से
पूछा कि आजकल गजरे कौन बनाता है वे अत्यंत सुंदर होते हैं मालिन ने राजकुमारी को बताया कि एक नया नौकर है जो गजरे बना आता है राजकुमारी ने उसे देखने की इच्छा प्रकट की जब उसने राजा हर्षवर्धन को देखा तो वह उस पर मोहित हो गई और हर्षवर्धन से ब्याह करने की हट पकड़ ली राजा ने बहुत मना किया परंतु जब राजकुमारी नहीं मानी तो उन्होंने लाचार होकर दोनों का ब्याह कर दिया और जंगल में एक मकान रहने को दे दिया कुछ दिन बीत गए तो हर्षवर्धन ने राजकुमारी से कहा कि ऐसे बेकार बैठे रहकर
मेरा मन नहीं लगता तुम अपने पिता से कहो कि मेरे को जहाजों की चुंगी का ठेका दे दें राजकुमारी ने अपने पिता से यह प्रस्ताव रखा तो राजा ने प्रस्ताव स्वीकार कर लिया हर्षवर्धन अब आने वाले जहाजों से चुंगी लेता ऐसे ही सात वर्ष बीत गए शनिदेव का प्रभाव खत्म होने को आया एक दिन सौदागर का जहाज वहीं आया हर्षवर्धन ने उस जहाज को रोक लिया और उसे वहां से जाने नहीं दिया सौदागर क्रोधित हो राजा के पास शिकायत लेकर गया और विनती की महाराज जो भी आपका कर है वो मैं हमेशा अदा करता हूं
फिर भी मेरे जहाज को क्यों रोका गया राजा ने जब हर्षवर्धन से पूछा कि वह सौदागर के जहाज को क्यों नहीं जाने देता तो हर्षवर्धन ने बताया कि महाराज इस सौदागर के पास मेरी सोने की ईंट हैं जो इसने मुझसे चुराई है जब हर्षवर्धन ने सौदागर से अपनी सोने की ईंटों की चोरी की बात राजा के सामने रखी तब राजा ने हर्षवर्धन से पूछा क्या तुम्हारे पास इस चोरी का कोई प्रमाण है हर्षवर्धन ने सिर झुकाकर कहा महाराज मेरे पास कोई प्रमाण नहीं है हर्षवर्धन का झुका सिर देखकर सौदागर अपनी बात को और अधिक पुख्ता
करने के लिए राजा से कहता है महाराज यह झूठ बोल रहा है मैं शपथ लेता हूं कि सोने की ईंट मेरी हैं राजा सोच में पड़ जाता है तभी एक तेज गर्जना के साथ ण देव प्रकट होते हैं और गुस्से में सौदागर की तरफ देखते हैं उन्होंने कहा सत्य और धर्म के साथ खिलवाड़ करने का कर्ज चुकता करने का अब तुम्हारा समय आ गया है शनिदेव सौदागर के पास जाकर उसकी आंखों में देखते हैं अचानक सौदागर जमीन पर गिरकर कांपने लगता है वह पसीने से तरबतर होकर चिल्लाता है मुझे माफ कर दो मैंने झूठ बोला
था यह सोने की ईट मेरी नहीं है इतना कहने के बाद सौदागर के शरीर से एक अजीब सा धुआं उठता है और वह वहीं राख में बदल जाता है राजा और दरबार के लोग स्तब्ध रह जाते हैं किसी को समझ नहीं आता कि क्या हुआ तभी ण देव हर्षवर्धन के पास जाकर उनको प्रणाम करते हुए कहते हैं राजा हर्षवर्धन तुम्हारे सत्य और धैर्य ने मुझे पराजित कर ही दिया तभी एक बार फिर से तेज प्रकाश होता है और तेज प्रकाश के साथ लक्ष्मी जी प्रकट होती है मां लक्ष्मी जी हर्षवर्धन को आशीर्वाद देते हुए कहती
हैं तुम्हारे त्याग धैर्य और धर्म का पालन करने के कारण मैं तुम्हें अखंड समृद्धि का आशीर्वाद देती हूं तुम्हारा राज्य फिर से समृद्ध होगा आशीर्वाद देकर लक्ष्मी जी और श देव दोनों अंतरध्यान हो जाते हैं राजा के आश्चर्य की कोई सीमा नहीं थी वह हर्षवर्धन के पास आकर कहते हैं तुम कोई साधारण पुरुष नहीं हो सकते तब हर्षवर्धन उसे पूरा किस्सा बताते हैं राजा सहित पूरा दरबार हर्षवर्धन की धर्म परायणता का गुणगान कर रहा था राजा ने हर्षवर्धन की पत्नी रानी विषपाला को आदर पूर्वक जहाज से पालकी में बुलाया रानी विषपाला ने पुनः सूर्य भगवान
से प्रार्थना करके अपना पूर्व रूप मांग लिया राजा ने आदर पूर्वक हर्षवर्धन के साथ अपनी बेटी को और रानी विषपाला को भी जिसको उसने अपनी बेटी मान लिया था प्रेम पूर्वक विदा किया निष्कर्ष किसी के जीवन में कठिनाइयां कितनी भी बड़ी क्यों ना हो अगर व्यक्ति सत्य और धर्म के मार्ग को नहीं छोड़ता तो समय के साथ वह ना केवल हर मुश्किल से बाहर आता है बल्कि खुद वह मालिक परमात्मा भगवान भी उसकी मदद करते हैं