दोस्तों, क्या लोन लेना सच में बेवकूफी है? क्या कर्ज सिर्फ गरीबों को और गरीब बनाता है? बचपन से हमें यही सिखाया गया है। बेटा कर्ज मत लेना। क्रेडिट कार्ड से दूर रहना। जितनी चादर हो उतने ही पैर फैलाना। जॉब ही सबसे सुरक्षित रास्ता है। लेकिन जरा सोचिए अगर कर्ज इतना ही बुरा होता तो दुनिया के सबसे अमीर लोग लोन और डेट का इस्तेमाल क्यों करते?
क्यों अरबपति बैंक से पैसा उठाकर और भी अमीर बन जाते हैं? क्या उन्हें पैसे की कमी होती है या उन्हें पैसों का गेम खेलना आता है? आज के इस वीडियो में हम समझेंगे कैसे सही माइंडसेट, सही फाइनेंशियल एजुकेशन [संगीत] और स्मार्ट लेवरेज के जरिए लोन बोझ नहीं बल्कि वेल्थ क्रिएशन का हथियार बन सकता है। पार्ट एक भारत में लोग लोन से डरते क्यों हैं?
भारत में लोन शब्द सुनते ही लोगों के मन में एक अजीब सा डर पैदा हो जाता है। जैसे ही कोई कहता है कि उसने लोन लिया है, तुरंत कई सवाल उठने लगते हैं। क्यों लिया? कितना लिया? कैसे चुकाओगे?
हमारे समाज में कर्ज को अक्सर एक बोझ की तरह देखा जाता है। बचपन से ही हमें यही सिखाया जाता है कि कर्ज से जितना दूर रहो उतना अच्छा है। [संगीत] माता-पिता अपने बच्चों को समझाते हैं कि जिंदगी में चाहे कुछ भी हो जाए लेकिन कर्ज मत लेना। क्रेडिट कार्ड से दूर रहना, [संगीत] जितनी चादर हो उतने ही पैर फैलाना। यह सोच गलत नहीं है, लेकिन यह पूरी सच्चाई भी नहीं है। असल में भारत में लोगों ने लोन का जो चेहरा ज्यादा देखा है, वह ज्यादातर नेगेटिव रहा है। इसलिए लोगों के दिमाग में लोन का मतलब ही परेशानी बन गया है। हम अक्सर देखते हैं कि लोग पर्सनल लोन लेते हैं। फिर उसे चुकाने में सालों लग जाते हैं। क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल करते हैं। लेकिन धीरे-धीरे उस पर इतना इंटरेस्ट लग जाता है कि छोटी सी खरीदारी भी बड़ी समस्या बन जाती है। कई लोग नई कार लेने के लिए ईएमआई शुरू कर देते हैं। लेकिन कुछ महीनों बाद वही ईएमआई उन्हें हर महीने तनाव देने लगती है। शादी के खर्च के लिए लोन लिया जाता है। [संगीत] ट्रैवल के लिए लोन लिया जाता है। महंगे फोन खरीदने के लिए ईएमआई ली जाती है। इन सभी चीजों में एक कॉमन बात होती है। यह सभी खर्च ऐसी चीजों पर होते हैं जो पैसा वापस नहीं लाती बल्कि पैसा लगातार जेब से निकालती रहती हैं। इसलिए मिडिल क्लास परिवारों में कर्ज का मतलब अक्सर यही होता है कि अब कई साल तक ईएमआई की जिम्मेदारी उठानी पड़ेगी। यही वजह है कि जैसे ही लोन शब्द सुनाई देता है लोगों को सबसे पहले तनाव, जिम्मेदारी और डर का एहसास होने लगता है। लेकिन यहां एक बहुत दिलचस्प बात है। जिस चीज से मिडिल क्लास डरता है, उसी चीज का इस्तेमाल अमीर [संगीत] लोग अपने फायदे के लिए करते हैं। मिडिल क्लास के दिमाग में लोन ग्लैम [संगीत] बोझ। लेकिन अमीरों के दिमाग में लोन लेवरेज यही सबसे बड़ा फर्क है। मिडिल क्लास सोचता है कि अगर उसने लोन लिया तो उसे सालों तक काम करके उसे चुकाना [संगीत] पड़ेगा। लेकिन अमीर लोग सोचते हैं कि अगर सही तरीके से लोन लिया जाए तो वही पैसा उनके लिए और ज्यादा पैसा कमा सकता है। यह फर्क सिर्फ पैसे का नहीं है। यह फर्क सोच का है। मिडिल क्लास लोन को समस्या की तरह देखता है। अमीर लोग लोन को एक टूल की तरह देखते हैं। यही कारण है कि कुछ लोग पूरी जिंदगी कर्ज से बचते रहते हैं और फिर भी आर्थिक रूप से बहुत आगे नहीं बढ़ पाते। जबकि कुछ लोग उसी कर्ज [संगीत] का इस्तेमाल करके बड़े बिजनेस खड़े कर देते हैं। मशहूर निवेशक वारेन बफेट अक्सर कहते हैं, रिस्क कम्स फ्रॉम नॉट नोइंग व्हाट यू आर डूइंग। यानी असली जोखिम कर्ज में नहीं होता। असली जोखिम तब होता है जब हमें पता ही नहीं होता कि हम क्या कर रहे हैं। अगर किसी इंसान को फाइनेंस की समझ नहीं है तो उसके लिए क्रेडिट कार्ड भी खतरनाक हो सकता है। लेकिन अगर किसी इंसान को पैसों के खेल की समझ है तो वही व्यक्ति बैंक से लिए हुए लोन का इस्तेमाल करके बड़ी संपत्ति बना सकता है। भारत में ज्यादातर लोग लोन से इसलिए डरते हैं क्योंकि उन्होंने सिर्फ कर्ज का बुरा रूप देखा है। उन्होंने देखा है कि लोग क्रेडिट कार्ड के कर्ज में फंस जाते हैं। उन्होंने देखा है कि कई लोग ईएमआई के बोझ के कारण तनाव में जीते हैं। उन्होंने देखा है कि गलत फैसलों की वजह से लोग आर्थिक संकट में फंस जाते हैं। लेकिन उन्होंने यह कम देखा है कि लोन का इस्तेमाल करके कैसे बिजनेस खड़े किए जाते हैं। [संगीत] कैसे कंपनियां बनाई जाती हैं और कैसे बड़े निवेश किए जाते हैं। यही वजह है कि एक ही चीज दो अलग-अलग लोगों की जिंदगी में बिल्कुल अलग असर डालती है। किसी के लिए लोन एक जाल बन जाता है और किसी के लिए वही लोन एक सीढ़ी बन जाता है। वारेन बफेट की एक और मशहूर लाइन है। [संगीत] द मोर यू लर्न द मोर यू अर्न। यानी जितना ज्यादा आप सीखते हैं, उतना ज्यादा आप कमा सकते हैं। फाइनेंस की दुनिया में भी यही नियम लागू होता है। जिस इंसान के पास फाइनेंशियल एजुकेशन नहीं होती, वह अक्सर पैसे से जुड़े फैसले डर के आधार पर लेता है। लेकिन जिस इंसान के पास सही जानकारी होती है, वह वही फैसले समझदारी और कैलकुलेशन के आधार पर लेता है। इसीलिए अमीर लोग लोन से नहीं डरते। वे जानते हैं कि लोन को सही जगह इस्तेमाल किया जाए तो वह एक शक्तिशाली टूल बन सकता है। असल फर्क यह नहीं है कि लोन लिया जाए या नहीं। असल फर्क यह है कि लोन किस लिए लिया जा रहा है। अगर लोन सिर्फ लाइफस्टाइल बढ़ाने के लिए है तो वह धीरे-धीरे बोझ बन जाएगा। लेकिन अगर लोन का इस्तेमाल किसी ऐसी चीज में किया जाए जो पैसा कमाए तो वही कर्ज आगे चलकर संपत्ति बन सकता है। और यही वह जगह है जहां से अमीर और मिडिल क्लास की सोच अलग हो जाती है। पार्ट [संगीत] दो गुड डेप्ट वर्सेस बैड डेप्ट। फाइनेंस की दुनिया में लोन को समझने का सबसे आसान तरीका यह है कि लोन दो तरह का होता है। गुड डेप्ट और बैड डेप्ट। लेकिन दुख की बात यह है कि ज्यादातर लोग इन दोनों के बीच का फर्क कभी [संगीत] समझ ही नहीं पाते। उनके लिए हर तरह का लोन एक जैसा होता है। कभी-कभी लोग बिना सोचे समझे लोन ले लेते हैं और फिर सालों तक उसकी ईएमआई भरते रहते हैं और धीरे धीरे वही लोन उनकी आर्थिक आजादी को खत्म कर देता है। इसलिए सबसे पहले हमें समझना होगा कि बैड डेप्ट क्या होता है? बैड डेप्ट। बैड डेप्ट वह लोन होता है जो आपकी जेब से पैसा निकालता है। यानी ऐसा लोन जो आपको कोई इनकम नहीं देता बल्कि लगातार आपके खर्च को बढ़ाता रहता है। यह वही लोन होता है जो शुरुआत में बहुत आकर्षक लगता है। लेकिन समय के साथ वह धीरे-धीरे आर्थिक बोझ बन जाता है। आज के समय में बैड डेप्थ के सबसे कॉमन उदाहरण हमारे आसपास हर जगह दिखाई देते हैं। जैसे महंगी कार खरीदने के लिए लिया गया लोन। जब कोई व्यक्ति नई कार खरीदता है तो उसे लगता है कि उसने बहुत बड़ी उपलब्धि हासिल कर ली है। लेकिन सच यह है कि जैसे ही वह कार शोरूम से बाहर निकलती है उसी समय उसकी कीमत 10% से 15% तक कम हो जाती है। और अगले कुछ सालों में वही कार लगातार अपनी वैल्यू खोती जाती है। लेकिन दूसरी तरफ उसकी ईएमआई हर महीने बैंक को देनी पड़ती है। यानी कार की वैल्यू कम होती जाती है और लोन का बोझ बना रहता है। यही बैड डेप्थ की सबसे बड़ी पहचान है। दूसरा उदाहरण है नया iPhone या महंगा गैजेट ईएमआई पर खरीदना। आजकल स्मार्टफोन कंपनियां और ई कॉमर्स प्लेटफार्म ईएमआई को बहुत आसान बना चुके हैं। जीरो डाउन पेमेंट, जीरो कॉस्ट ईएमआई जैसे शब्द सुनकर लोगों को लगता है कि यह बहुत सस्ता सौदा है। लेकिन असल में यह एक मनोवैज्ञानिक ट्रिक होती है। क्योंकि जब कोई व्यक्ति 1 लाख का फोन कैश में खरीदता है, तो वह कई बार सोचता है। लेकिन जब वही फोन 4000 या 5000 की ईएमआई में दिखाई देता है तो वह तुरंत खरीद लेता है। लेकिन सच यह है कि फोन एक डिप्रिशिएटिंग एसेट है। उसकी वैल्यू समय के साथ तेजी से कम होती जाती है। एक साल बाद वही फोन आधी कीमत का रह जाता है। लेकिन ईएमआई उतनी ही रहती है। यानी आपने लोन लेकर ऐसी चीज खरीदी जिसकी कीमत [संगीत] हर दिन घट रही है। इसी तरह क्रेडिट कार्ड से शॉपिंग करना भी बैड डेप्ट का एक बड़ा उदाहरण है। क्रेडिट कार्ड अपने आप में बुरा नहीं है। लेकिन जब उसका इस्तेमाल बिना प्लानिंग के किया जाता है तो वह बहुत खतरनाक हो सकता है। अगर कोई व्यक्ति समय पर पूरा बिल नहीं चुकाता तो क्रेडिट कार्ड पर 30% से [संगीत] 40% तक सालाना इंटरेस्ट लग सकता है। यानी अगर आपने 1 लाख का खर्च किया और समय पर पेमेंट नहीं किया तो कुछ ही महीनों में वह रकम बहुत बड़ी हो सकती है। इसी तरह ट्रैवल के लिए लिया गया लोन भी अक्सर [संगीत] बैड डेप्ट बन जाता है। ट्रैवल करना बुरा नहीं है। घूमना फिरना जीवन का एक हिस्सा है। लेकिन जब कोई व्यक्ति सिर्फ सोशल मीडिया पर दिखाने के लिए या कुछ दिनों की खुशी के लिए लोन लेता है तो वह फैसला लंबे समय में आर्थिक परेशानी बन सकता है। क्योंकि ट्रैवल से यादें जरूर बनती हैं, लेकिन वह पैसा वापस नहीं आता। यानी लोन तो रह जाता है, लेकिन उससे कोई इनकम पैदा नहीं होती। [संगीत] बैड डेप्ट की सबसे बड़ी समस्या यही है कि वह धीरे-धीरे आपकी आर्थिक क्षमता को कमजोर कर देता है। हर महीने ईएमआई देने की आदत इंसान को धीरे-धीरे [संगीत] लोन के चक्कर में फंसा देती है। पहले कार की ईएमआई, फिर फोन की ईएमआई, फिर क्रेडिट कार्ड का बिल, फिर नया पर्सनल लोन। और देखते ही देखते इंसान का ज्यादातर पैसा सिर्फ लोन चुकाने में चला जाता है। यही कारण है कि कई लोग अच्छी सैलरी कमाने के बावजूद भी आर्थिक रूप से आगे नहीं बढ़ पाते। उनकी इनकम बढ़ती रहती है। लेकिन उनके खर्च और लोन उससे भी तेज बढ़ते रहते हैं और धीरे। धीरे वे एक ऐसे चक्र में फंस जाते हैं जहां वे लगातार काम तो करते हैं लेकिन आर्थिक आजादी उनसे दूर होती चली जाती है। यही वजह है कि फाइनेंशियल एक्सपर्ट हमेशा सलाह देते हैं कि किसी भी लोन को लेने से पहले यह जरूर सोचना चाहिए कि वह लोन आपकी जेब में पैसा डालेगा या निकालेगा। अगर कोई लोन ऐसा है जो सिर्फ आपकी लाइफ स्टाइल को बढ़ाता है लेकिन आपकी इनकम नहीं बढ़ाता तो वह लगभग हमेशा बैड डेप्ट बन जाता है और अगर कोई व्यक्ति लंबे समय तक बैड डेप्ट के चक्र में फंसा रहता है तो धीरे-धीरे उसकी आर्थिक प्रगति रुक जाती है। इसलिए फाइनेंशियल समझ का पहला नियम यही है कि हर लोन एक जैसा नहीं होता। कुछ लोन आपको पीछे ले जाते हैं और कुछ लोन आपको आगे बढ़ा सकते हैं। और इन दोनों के बीच का फर्क समझना ही फाइनेंशियल एजुकेशन की सबसे पहली सीढ़ी है। थर्ड थीम अमीर लोग लोन लेकर क्या करते हैं? अब तक हमने समझा कि बैड डेप्ट क्या होता है?
और कैसे कई लोग अनजाने में ऐसे लोन में फंस जाते हैं जो उनकी आर्थिक स्थिति को कमजोर कर देता है। लेकिन अब सबसे बड़ा सवाल आता है। अमीर लोग लोन लेकर क्या करते हैं? क्या वे भी वही करते हैं जो आम लोग करते हैं? क्या वे भी लोन लेकर महंगी कारें खरीदते हैं?
महंगे फोन लेते हैं या लाइफस्टाइल दिखाने के लिए पैसा खर्च करते हैं? सच्चाई यह है कि ज्यादातर अमीर लोग ऐसा बिल्कुल नहीं करते। अमीर लोगों की सोच लोन के मामले में बिल्कुल अलग होती है। जहां एक आम इंसान लोन लेकर अपनी लाइफस्टाइल बढ़ाता है, वहीं अमीर लोग लोन लेकर एसेट बनाते हैं। यानी ऐसी चीजें खरीदते हैं जो समय के साथ उनकी जेब में पैसा डालती हैं। यही असली फर्क है। अमीर लोग लोन लेकर लाइफस्ट नहीं खरीदते। वे एसेट खरीदते हैं। जैसे रियल एस्टेट, [संगीत] बिजनेस, कंपनियों में हिस्सेदारी। इन सभी चीजों की एक खास बात होती है। यह समय के साथ पैसा पैदा करती हैं। उदाहरण के लिए अगर कोई व्यक्ति लोन लेकर ऐसी प्रॉपर्टी खरीदता है जो हर महीने किराया देती है तो धीरे-धीरे वही किराया उस लोन की ईएमआई को भी चुका सकता है और उसके बाद वही प्रॉपर्टी लगातार इनकम देती रहती है। इसी तरह अगर कोई व्यक्ति लोन लेकर एक बिजनेस शुरू करता है और वह बिजनेस सफल हो जाता है तो वह बिजनेस उस लोन से कहीं ज्यादा पैसा कमा सकता है। यही वजह है कि कई बड़े बिजनेसमैन अपने बिजनेस को बढ़ाने के लिए लोन का इस्तेमाल करते हैं। यहां एक बहुत दिलचस्प बात है दुनिया के सबसे सफल निवेशकों में से एक वारेन बफेट अक्सर कहते हैं प्राइस इज व्हाट यू पे। वैल्यू इज व्हाट यू गेट। यानी आप जो कीमत चुकाते हैं, वह [संगीत] एक चीज है। लेकिन उससे आपको जो वैल्यू मिलती है, वही असली चीज होती है। अमीर लोग हमेशा वैल्यू पर ध्यान देते हैं। अगर कोई एसेट भविष्य में लगातार पैसा कमा सकता है, तो उसके लिए लोन लेना उनके लिए एक रणनीति बन सकता है। इसी सोच का एक शानदार उदाहरण [संगीत] भारत के महान उद्योगपति धीरूभाई अंबानी हैं। धीरूभाई अंबानी किसी अमीर परिवार में पैदा नहीं हुए थे। उन्होंने बहुत छोटे स्तर से शुरुआत की थी। उनके पास शुरुआत में बहुत बड़ी पूंजी नहीं थी। लेकिन उनके पास एक चीज थी बड़ा विज़। [संगीत] उन्होंने समझ लिया था कि अगर बिजनेस को बड़ा बनाना है तो सिर्फ अपनी छोटी पूंजी से काम नहीं चलेगा। इसलिए उन्होंने लोगों को अपने विज़न पर भरोसा दिलाया। उन्होंने निवेश जुटाया और फिर उसी पूंजी का इस्तेमाल करके अपने बिजनेस को बढ़ाया। धीरे-धीरे वही छोटा सा बिजनेस एक बड़े औद्योगिक साम्राज्य में बदल गया। आज Reliance जैसे विशाल समूह की शुरुआत उसी सोच से हुई थी। यानी दूसरों की पूंजी को जिम्मेदारी के साथ इस्तेमाल करके वैल्यू क्रिएट करना। इसे ही फाइनेंस की भाषा में लेवरेज कहा जाता है। अमीर लोग लेवरेज को समझते हैं। वे जानते हैं कि अगर सही जगह निवेश किया जाए तो वही पैसा समय के साथ कई गुना बढ़ सकता है। इसीलिए वे लोन को डर की नजर से नहीं देखते। वे लोन को एक टूल की तरह देखते हैं। एक ऐसा टूल जो अगर सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए तो बड़े अवसर पैदा कर सकता है। वारेन बफेट की एक और मशहूर लाइन है। द बेस्ट इन्वेस्टमेंट यू कैन मेक इज इन योरसेल्फ। यानी सबसे अच्छा निवेश वह है जो आप खुद पर करते हैं। जब कोई व्यक्ति फाइनेंस, [संगीत] बिजनेस और निवेश की समझ विकसित करता है तब वह लोन को भी अलग नजर से देखने लगता है। जहां पहले उसे लोन एक बोझ लगता था, वहीं अब वही लोन उसे एक अवसर की तरह दिखाई देने लगता है। लेकिन यहां एक बहुत जरूरी बात समझना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। अमीर लोग लोन को अंधाधुंध नहीं लेते। वे हर फैसले को कैलकुलेशन के साथ लेते हैं। वे यह समझते हैं कि अगर किसी एसेट से आने वाला रिटर्न लोन के इंटरेस्ट से ज्यादा है तो वह लोन उनके लिए फायदेमंद हो सकता है। लेकिन अगर कोई लोन सिर्फ खर्च बढ़ाता है और कोई इनकम नहीं देता तो वही लोन धीरे-धीरे समस्या बन सकता है। यही कारण है कि अमीर लोग हमेशा कैश फ्लो पर ध्यान देते हैं। वे ऐसी चीजों में निवेश करते हैं जो लगातार पैसा पैदा करती रहे और जब पैसा लगातार पैदा होने लगता है तो वही पैसा आगे और निवेश करने में मदद [संगीत] करता है। धीरे-धीरे यही प्रक्रिया संपत्ति को बढ़ाती जाती है। यही वजह है कि कई अमीर लोग समय के साथ और ज्यादा अमीर होते चले जाते हैं क्योंकि वे सिर्फ पैसा कमाने पर ध्यान नहीं देते। वे पैसा बनाने वाली मशीनें बनाते हैं और उन मशीनों को बनाने में कभी-कभी लोन भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। वारेन बफेट का एक और मशहूर विचार है। समवन इज सिंग इन द शेड टुडे बिकॉज़ समवन प्लांटेड अ ट्री अ लॉन्ग टाइम ईगो। [संगीत] यानी आज जो लोग आराम से बैठकर फल खा रहे हैं। किसी ने बहुत पहले पेड़ लगाया था। अमीर लोग भी यही करते हैं। वे आज ऐसे फैसले लेते हैं जो भविष्य में उन्हें लगातार फायदा देते रहे और कई बार उन फैसलों में लोन भी शामिल होता है। लेकिन फर्क सिर्फ इतना होता है कि वह लोन खर्च के लिए नहीं बल्कि एसेट बनाने के लिए होता है। पार्ट चार लेवरेज क्या होता है? अब तक हमने यह समझ लिया कि अमीर लोग लोन का इस्तेमाल लाइफस्टाइल के लिए नहीं बल्कि एसेट बनाने के लिए करते हैं। लेकिन यहां एक और महत्वपूर्ण शब्द आता है जिसे फाइनेंस की दुनिया में बहुत ज्यादा इस्तेमाल किया जाता है लेवरेज। कई लोगों ने यह शब्द सुना जरूर होता है। लेकिन असल में इसका मतलब क्या होता है?
यह बहुत कम लोग सही तरीके से समझ पाते हैं। आसान भाषा में कहें तो लेवरेज का मतलब है कम अपने पैसे से और ज्यादा कुल पूंजी के साथ निवेश करना। यानी आप अपने पैसे के साथ किसी और की पूंजी जोड़कर एक बड़ा अवसर पकड़ने की कोशिश करते हैं। इसे एक बहुत सरल उदाहरण से समझते हैं। मान लीजिए आपके पास 10 लाख हैं। अगर आप इस 10 लाख को किसी अच्छे निवेश में लगाते हैं और वहां आपको 20% का रिटर्न मिलता है तो एक साल में आपका मुनाफा होगा। 10 लाख का 20% यानी 2 लाख। यह एक अच्छा रिटर्न है। आपका पैसा बढ़ा और आपने मुनाफा कमाया। लेकिन अब जरा वही स्थिति थोड़ी अलग तरीके से सोचिए। मान लीजिए आपके पास अभी भी 10 लाख हैं। लेकिन आपको एक ऐसा निवेश अवसर दिखाई देता है जहां आप 20 लाख निवेश कर सकते हैं। आपके पास 10 लाख अपने हैं। बाकी 10 लाख आप बैंक से लोन लेकर निवेश करते हैं। अब आपकी कुल निवेश राशि हो जाती है [संगीत] 20 लाख। अगर उसी निवेश पर आपको 20% का रिटर्न मिलता है तो आपका कुल मुनाफा होगा। 20 लाख का 20% यानी 4 लाख। लेकिन यहां एक चीज और जोड़नी पड़ेगी क्योंकि आपने 10 लाख का लोन लिया है इसलिए आपको बैंक को उसका इंटरेस्ट भी देना होगा। मान लीजिए उस लोन पर 12% सालाना इंटरेस्ट लगता है तो 10 लाख का 12% होगा। 1. 2 लाख। अब अगर हम पूरे कैलकुलेशन को देखें तो कुल रिटर्न 4 लाख। बैंक का इंटरेस्ट 1. 2 लाख। बाकी बचा आपका प्रॉफिट 2.
8 लाख। अगर आप ध्यान से देखें तो यहां एक दिलचस्प बात दिखाई देती है। अगर आपने सिर्फ अपने 10 लाख लगाए होते तो आपका मुनाफा होता 2 लाख। लेकिन जब आपने लेवरेज का इस्तेमाल किया यानी लोन लेकर निवेश बढ़ाया तो आपका मुनाफा बढ़कर 2. 8 लाख हो गया। यानी बिना अपनी पूंजी बढ़ाए आपने अपने रिटर्न को ज्यादा बना लिया। यही है लिवरेज की ताकत। लेवरेज असल में एक ऐसा फाइनेंशियल टूल है जो आपको बड़ी संभावनाओं तक पहुंचने में मदद करता है। जब आपके पास सीमित पूंजी होती है लेकिन आपके सामने एक बड़ा अवसर होता है तो लेवरेज उस अवसर को पकड़ने का एक तरीका बन सकता है। फाइनेंस की दुनिया में बहुत सारे बड़े निवेश इसी सिद्धांत पर काम करते हैं। रियलस्टेट में, बिजनेस में यहां तक कि कई बड़ी कंपनियां भी अपने विस्तार के लिए लेवरेज का इस्तेमाल करती हैं। लेकिन यहां एक बहुत महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है। लेवरेज सिर्फ मुनाफा ही नहीं बढ़ाता। यह नुकसान भी बढ़ा सकता है। यानी यह एक दो तलवार की तरह होता है। अगर निवेश सही दिशा में जाता है तो लेवरेज आपके रिटर्न को बढ़ा देता है। लेकिन अगर निवेश उम्मीद के अनुसार प्रदर्शन नहीं करता तो वही लेवरेज नुकसान को भी बड़ा बना सकता है। उदाहरण के लिए अगर आपने 20 लाख निवेश किए लेकिन उस पर रिटर्न 20% की जगह सिर्फ 10% मिला तो आपका कुल रिटर्न होगा 20 लाख का 10% यानी 2 लाख। लेकिन आपको बैंक को अभी भी 1. 2 लाख इंटरेस्ट देना पड़ेगा तो आपका असली मुनाफा रह जाएगा 80 और अगर रिटर्न इससे भी कम हुआ तो नुकसान भी हो सकता है। इसलिए समझदार निवेशक लिवरेज का इस्तेमाल बहुत सोच समझकर करते हैं। वे सिर्फ इस उम्मीद में लोन नहीं लेते कि शायद फायदा हो जाएगा। वे पहले पूरी कैलकुलेशन करते हैं। वे यह देखते हैं कि निवेश का संभावित रिटर्न कितना हो सकता है। वे यह समझते हैं कि सबसे खराब स्थिति में क्या हो सकता है और उसके बाद ही लेवरेज का फैसला लेते हैं। लेवरेज का असली फायदा तब होता है जब निवेश से मिलने वाला रिटर्न लोन के इंटरेस्ट से ज्यादा हो। अगर ऐसा होता है तो समय के साथ वही लेवरेज आपकी संपत्ति को तेजी से बढ़ाने में मदद कर सकता है। लेकिन अगर ऐसा नहीं होता तो वही लेवरेज धीरे धीरे आर्थिक बोझ बन सकता है। इसलिए फाइनेंस की दुनिया में लेवरेज को हमेशा समझदारी के साथ इस्तेमाल करने की सलाह दी जाती है। क्योंकि लेवरेज अपने आप में ना अच्छा है और ना बुरा। असल फर्क इस बात से पड़ता है कि उसे किस तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। अगर लेवरेज का इस्तेमाल सही अवसर के लिए किया जाए। सही कैलकुलेशन के साथ किया जाए और सही जोखिम प्रबंधन के साथ किया जाए तो वही लेवरेज एक साधारण निवेश को एक मजबूत वेल्थ बिल्डिंग मशीन में बदल सकता है और यही वजह है कि फाइनेंस की दुनिया में लेवरेज को अक्सर वेल्थ क्रिएशन का एक शक्तिशाली टूल माना जाता है। [संगीत] पार्ट पांच रियलस्टेट में लेवरेज। अब तक हमने समझ लिया कि लेवरेज क्या होता है और कैसे सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए तो यह आपके रिटर्न को बढ़ा सकता है। लेकिन अगर फाइनेंस की दुनिया में किसी एक जगह लेवरेज का सबसे ज्यादा इस्तेमाल होता है तो वह है रियलस्टेट। [संगीत] रियलस्टेट निवेश की दुनिया में लेवरेज एक बहुत आम और शक्तिशाली टूल है। दुनिया भर में लाखों निवेशक इसी रणनीति का इस्तेमाल करके अपनी संपत्ति को धीरे-धीरे कई गुना बढ़ाते हैं। रियलस्टेट की खास बात यह होती है कि यहां आपको पूरी प्रॉपर्टी की कीमत एक साथ अपनी जेब से देने की जरूरत नहीं होती। आप एक छोटी सी डाउन पेमेंट के साथ प्रॉपर्टी खरीद सकते हैं और बाकी पैसा बैंक से लोन के रूप में लिया जा सकता है। यही वह जगह है जहां लेवरेज असली ताकत दिखाना शुरू करता है। इसे एक उदाहरण से समझते हैं। मान लीजिए आपको एक कमर्शियल प्रॉपर्टी मिलती है जिसकी कीमत 70 लाख है। अब अगर आपको यह पूरी प्रॉपर्टी खरीदनी [संगीत] है तो आपको पूरे 70 लाख अपनी जेब से लगाने पड़ेंगे। लेकिन ज्यादातर लोग ऐसा नहीं करते। वे लेवरेज का इस्तेमाल करते हैं। मान लीजिए आप इस प्रॉपर्टी को खरीदने के लिए 10 लाख डाउन पेमेंट करते हैं। बाकी 60 लाख का लोन बैंक से लेते हैं। अब आपके पास 70 लाख की प्रॉपर्टी है। लेकिन आपकी जेब से सिर्फ 10 लाख गए हैं। यहीं से लेवरेज का खेल शुरू होता है। अब मान लीजिए कि वह कमर्शियल प्रॉपर्टी हर महीने 60,000 का किराया देती है। दूसरी तरफ बैंक को जो ईएमआई आपको देनी है, वह है 45,000 प्रति महीना। अब अगर हम इस स्थिति को देखें तो एक दिलचस्प चीज सामने आती है। हर महीने किराया आ रहा है 60000 और बैंक को ईएमआई देनी है 45000 यानी ईएमआई देने के बाद भी आपके पास बच जाते हैं 15000। इसे ही कहा जाता है पॉजिटिव कैश फ्लो। यानी आपकी प्रॉपर्टी ना सिर्फ अपना लोन चुका रही है बल्कि आपको हर महीने अतिरिक्त पैसा भी दे रही है। यही होता है गुड डेप्ट। क्योंकि यहां आपने जो लोन लिया है वह आपकी जेब से पैसा निकाल नहीं रहा बल्कि आपकी जेब में पैसा डाल रहा है और यही वह जगह है जहां रियलस्टेट में लेवरेज की असली ताकत दिखाई [संगीत] देती है। समय के साथ दो चीजें होती हैं। पहली हर महीने ईएमआई के जरिए आपका लोन धीरे-धीरे कम होता जाता है। दूसरी [संगीत] प्रॉपर्टी की कीमत समय के साथ बढ़ सकती है। मान लीजिए कुछ साल बाद उसी प्रॉपर्टी की कीमत 70 लाख से बढ़कर 1 करोड़ हो जाती है। अब जरा सोचिए आपने शुरुआत में अपनी जेब से सिर्फ 10 लाख लगाए थे। लेकिन अब आपके पास एक ऐसी प्रॉपर्टी है जिसकी कीमत 1 [संगीत] करोड़ हो चुकी है। और इन सालों में किराए से जो पैसा आया वह अलग। यही वजह है कि दुनिया भर में कई सफल निवेशक रियलस्टेट को एक मजबूत एसेट क्लास मानते हैं। मशहूर निवेशक वारेन बफेट अक्सर कहते हैं प्राइस इज व्हाट यू पे वैल्यू इज व्हाट यू गेट। यानी आप जो कीमत देते हैं, वह एक चीज है, लेकिन उससे आपको जो वैल्यू मिलती है, वही असली चीज होती है। रियलस्टेट में भी यही सिद्धांत लागू होता है। अगर कोई प्रॉपर्टी सिर्फ दिखावे के लिए खरीदी गई है, तो वह खर्च बन सकती है। लेकिन अगर वही प्रॉपर्टी सही लोकेशन पर है, सही कीमत पर खरीदी गई है और उससे नियमित किराया आ रहा है, तो वही प्रॉपर्टी एक मजबूत एसेट बन सकती है। इसीलिए अनुभवी निवेशक प्रॉपर्टी खरीदते समय सिर्फ कीमत नहीं देखते। वे कैश फ्लो, लोकेशन, डिमांड और भविष्य की संभावनाएं देखते हैं। क्योंकि उनका लक्ष्य सिर्फ प्रॉपर्टी खरीदना नहीं होता बल्कि ऐसी संपत्ति बनाना होता है जो समय के साथ पैसा पैदा करती रहे। वारेन बफेट की एक और मशहूर लाइन है। समवन इज सिंग इन द शेड टुडे बिकॉज़ समवन प्लांटेड अ ट्री अ लॉन्ग टाइम ईगो। यानी आज जो लोग आराम से छांव में बैठे हैं, उन्होंने बहुत पहले पेड़ लगाया था। रियल एस्टेट निवेश भी कुछ ऐसा ही होता है। शुरुआत में शायद ज्यादा फायदा नजर नहीं आता। लेकिन समय के साथ वही निवेश एक मजबूत संपत्ति में बदल सकता है। लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना भी जरूरी है। रियल एस्टेट में लेवरेज का इस्तेमाल हमेशा सोच समझ करना चाहिए। अगर किराया ईएमआई से कम है और आपके पास कैश बफर नहीं है तो वही लोन धीरे धीरे तनाव बन सकता है। इसलिए [संगीत] समझदार निवेशक हमेशा यह सुनिश्चित करते हैं कि प्रॉपर्टी का संभावित किराया और उसकी वैल्यू ग्रोथ की संभावना दोनों मिलकर लोन के इंटरेस्ट और ईएमआई से बेहतर हो। अगर ऐसा होता है तो वही लोन समय के साथ एक मजबूत वेल्थ बिल्डिंग मशीन बन सकता है [संगीत] और यही वजह है कि दुनिया भर में कई निवेशक रियलस्टेट को लेवरेज के साथ वेल्थ क्रिएशन का एक शक्तिशाली माध्यम मानते हैं। पार्ट छह टैक्स का खेल अब तक हमने समझा कि अमीर लोग लोन का इस्तेमाल कैसे करते हैं। लेवरेज क्या होता है और कैसे एसेट बनाकर पैसा कमाया जाता है। लेकिन वेल्थ बनाने का एक और बहुत बड़ा हिस्सा है जिसे अक्सर लोग नजरअंदाज कर देते हैं और वह है टैक्स का खेल। सच्चाई यह है कि अमीर लोग सिर्फ पैसा कमाने पर ध्यान नहीं देते। वे इस बात पर भी ध्यान देते हैं कि उस कमाए हुए पैसे में से कितना उनके पास बचता है क्योंकि फाइनेंस की दुनिया में एक बहुत महत्वपूर्ण सिद्धांत है। कमाना महत्वपूर्ण है लेकिन बचाना उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है। अगर कोई व्यक्ति लाखों रुपए कमा रहा है लेकिन हर साल उसका बड़ा हिस्सा टैक्स के रूप में चला [संगीत] जाता है तो उसकी वास्तविक संपत्ति उतनी तेजी से नहीं बढ़ पाएगी। यही वजह है कि अमीर लोग टैक्स को बहुत गहराई से समझते हैं। मशहूर लेखक और निवेशक रॉबर्ट कसाकी अपनी प्रसिद्ध किताब रिच डैड पुअर डैड में एक बहुत दिलचस्प बात बताते हैं। [संगीत] वे कहते हैं दुनिया में सबसे ज्यादा टैक्स मिडिल क्लास देता है। यह बात सुनकर कई लोगों को आश्चर्य होता है। क्योंकि आम धारणा यह होती है कि अमीर लोग ज्यादा कमाते हैं इसलिए वे ज्यादा टैक्स देते होंगे। लेकिन जब हम सिस्टम को ध्यान से समझते हैं तो पता चलता है कि असली फर्क कमाई के तरीके में होता है। एक सैलरीड इंसान और एक बिजनेस ओनर के बीच टैक्स के मामले में बड़ा अंतर होता है। आइए इसे बहुत सरल तरीके से समझते हैं। मान लीजिए कोई व्यक्ति नौकरी करता है। उसे हर महीने सैलरी [संगीत] मिलती है। जब उसकी सैलरी उसके बैंक अकाउंट में आती है तो उससे पहले ही टैक्स कट चुका होता है। [संगीत] यानी सरकार पहले अपना हिस्सा ले लेती है और जो बचता है वही पैसा उसके हाथ में आता है। उस पैसे से उसे अपने सारे खर्च पूरे करने होते हैं। घर का किराया, बच्चों की पढ़ाई, खाना, बिजली, ट्रांसपोर्ट और बाकी सभी जरूरतें। यानी इस सिस्टम में क्रम कुछ ऐसा होता है। पहले कमाई, फिर टैक्स और फिर खर्च। अब जरा इसी स्थिति को एक बिजनेस ओनर के नजरिए से देखें। अगर कोई व्यक्ति बिजनेस करता है तो उसका सिस्टम थोड़ा अलग होता है। [संगीत] बिजनेस ओनर पहले अपने बिजनेस से जुड़े खर्च करता है। जैसे ऑफिस का किराया, स्टाफ की सैलरी, मार्केटिंग, [संगीत] ट्रैवल, गैजेट्स, सॉफ्टवेयर, मीटिंग्स और कई अन्य ऑपरेशनल खर्च। इन सभी खर्चों को बिजनेस [संगीत] एक्सपेंस माना जाता है। इन खर्चों को घटाने के बाद जो पैसा बचता है उसी को प्रॉफिट माना जाता है और फिर उस प्रॉफिट पर टैक्स लगाया जाता है। यानी यहां क्रम बदल जाता है। पहले कमाई फिर खर्च और उसके बाद टैक्स। यही वह जगह है जहां सिस्टम का फर्क दिखाई देता है। एक सैलरीड व्यक्ति के पास टैक्स प्लानिंग के सीमित विकल्प होते हैं। लेकिन एक बिजनेस ओनर के पास कई तरीके होते हैं जिनके जरिए वह अपने खर्चों को व्यवस्थित करके टैक्स को ऑप्टिमाइज कर सकता है। यह टैक्स से बचने का तरीका नहीं होता बल्कि यह कानूनी टैक्स प्लानिंग होती है और यही वह चीज है जिसे फाइनेंशियल एजुकेशन कहा जाता है। अमीर लोग टैक्स को दुश्मन की तरह नहीं देखते। वे टैक्स सिस्टम को समझते हैं और उसके भीतर रहकर अपने फैसले लेते हैं। उन्हें पता होता है कि अगर उनके पास सही स्ट्रक्चर है तो वे अपने खर्चों और निवेश को इस तरह व्यवस्थित कर सकते हैं कि उनकी कुल टैक्स लायबिलिटी कम हो सके। यही वजह है कि कई सफल उद्यमी और निवेशक अपनी कंपनियों के माध्यम से काम करते हैं। [संगीत] क्योंकि एक सही बिजनेस स्ट्रक्चर उन्हें यह अवसर देता है कि वे अपनी इनकम, खर्च और निवेश को बेहतर तरीके से व्यवस्थित कर सकें। जब कोई व्यक्ति इस पूरे सिस्टम को समझ लेता है तो उसे यह भी समझ में आने लगता है कि वेल्थ सिर्फ कमाई से नहीं बनती। वेल्थ बनती है सही इनकम, स्ट्रक्चर से, सही निवेश से और सही टैक्स प्लानिंग से। इसीलिए फाइनेंस की दुनिया में अक्सर कहा जाता है कि असली खेल सिर्फ पैसा कमाने का नहीं है। असली खेल है पैसे को समझदारी से मैनेज करने का। और जब कोई व्यक्ति टैक्स के इस खेल को समझना शुरू कर देता है तब उसे यह एहसास होता है कि वेल्थ बनाने के नियम वही नहीं है जो आमतौर पर स्कूल या कॉलेज में सिखाए जाते हैं। वेल्थ बनाने के नियम अक्सर फाइनेंशियल एजुकेशन से आते हैं और यही वजह है कि जो लोग इन नियमों को समझ लेते हैं वे समय के साथ अपने पैसे को बेहतर तरीके से बढ़ा पाते हैं। [संगीत] पार्ट सैथ अदर पीपल्स मनी। अब तक हमने समझा कि अमीर लोग लोन का इस्तेमाल कैसे करते हैं?
[संगीत] लेवरेज कैसे काम करता है और टैक्स सिस्टम को समझना क्यों जरूरी है। लेकिन वेल्थ क्रिएशन की दुनिया में एक और बहुत शक्तिशाली कांसेप्ट है जिसे समझे बिना पैसे का असली खेल समझना मुश्किल है। यह कांसेप्ट है ओपीएम। ओपीएम का मतलब होता है अदर पीपल्स मनी यानी दूसरों का पैसा। सुनने में यह थोड़ा अजीब लग सकता है, लेकिन सच यह है कि दुनिया के ज्यादातर बड़े बिजनेस और बड़ी कंपनियां इसी सिद्धांत पर बनी है। अगर हम ध्यान से देखें तो हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में भी ओपीएम लगातार काम कर रहा होता है। मान लीजिए आप बैंक में पैसा जमा करते हैं। आप सोचते हैं कि आपका पैसा बैंक में सुरक्षित रखा हुआ है और उस पर आपको थोड़ा सा इंटरेस्ट मिल रहा है। लेकिन असल में बैंक उस पैसे को अपने पास खाली नहीं रखती। बैंक उसी पैसे को आगे किसी और व्यक्ति या बिजनेस को लोन के रूप में देती है। यानी आपका पैसा बैंक के लिए एक कैपिटल बन जाता है और वही पैसा किसी और के लिए ओपीएम बन जाता है। बैंक उस पैसे पर आपसे कम इंटरेस्ट देती है और जिसे लोन देती है उससे ज्यादा इंटरेस्ट लेती है। यही अंतर बैंक का मुनाफा बन जाता है। यानी बैंक असल में अपने पैसे से नहीं बल्कि दूसरों के पैसे से पैसा बना रही होती है। यही ओपीएम का सबसे सरल उदाहरण है। अब जरा इसे बड़े स्तर पर समझते हैं। दुनिया की लगभग हर बड़ी कंपनी किसी ना किसी रूप में ओपीएम का इस्तेमाल करती है। जब कोई कंपनी शेयर मार्केट में लिस्ट होती है और लोग उसके शेयर खरीदते हैं तो वे असल में उस कंपनी को अपना पैसा दे रहे होते हैं। उस पैसे का इस्तेमाल कंपनी अपने बिजनेस को बढ़ाने के लिए करती है। नए प्रोजेक्ट शुरू करती है। नई मशीनें खरीदती है। नई टेक्नोलॉजी विकसित करती है। और अगर कंपनी सफल होती है तो वही पैसा आगे चलकर और ज्यादा वैल्यू पैदा करता है। यानी कंपनी ने दूसरों के पैसे का इस्तेमाल करके अपना बिजनेस बड़ा किया। [संगीत] यही ओपीएम है। मशहूर निवेशक वारेन बफेट भी इस रणनीति का बहुत शानदार तरीके से इस्तेमाल करते हैं। उनकी कंपनी बर्गशायर हैथवे के पास कई बीमा कंपनियां हैं। अब यहां एक बहुत दिलचस्प चीज होती है। जब लोग बीमा पॉलिसी लेते हैं तो वे हर साल प्रीमियम भरते हैं। लेकिन उस पैसे का इस्तेमाल तुरंत क्लेम के रूप में नहीं होता। वह पैसा कुछ समय तक कंपनी के पास रहता है। [संगीत] बीमा की दुनिया में इस पैसे को फ्लोट कहा जाता है। यही फ्लोट असल में अदर पीपल्स मनी होता है। यानी यह पैसा कंपनी का अपना नहीं होता। लेकिन कुछ समय तक कंपनी के पास निवेश करने के लिए उपलब्ध रहता [संगीत] है। वारेन बफेट इस पैसे को बेहद समझदारी से निवेश करते हैं। वे इस फ्लॉट को स्टॉक्स, कंपनियों और दूसरे एसेट्स में निवेश करते हैं और अगर उन निवेशों से अच्छा रिटर्न मिलता है तो वह रिटर्न कंपनी के लिए बहुत बड़ा फायदा बन जाता है। यानी उन्होंने दूसरों के पैसे का इस्तेमाल करके वेल्थ क्रिएट की। इसी वजह से वारेन बफेट को दुनिया के सबसे सफल निवेशकों में गिना जाता है। ओपीएम का असली मतलब सिर्फ दूसरों का पैसा इस्तेमाल करना नहीं है। ओपीएम का असली मतलब है दूसरों के पैसे की जिम्मेदारी को समझते हुए उसे सही जगह निवेश करना। क्योंकि जब आप दूसरों के पैसे का इस्तेमाल करते हैं तो उसके साथ भरोसा भी जुड़ा होता है [संगीत] और भरोसा ही वह चीज है जिस पर पूरी वित्तीय प्रणाली खड़ी होती है। अगर भरोसा खत्म हो जाए तो ओपीएम का पूरा सिस्टम भी टूट सकता है। इसीलिए सफल निवेशक और उद्यमी ओपीएम का इस्तेमाल बहुत सोच समझकर करते हैं। वह पहले वैल्यू क्रिएट करते हैं। फिर लोगों का भरोसा जीतते हैं और उसके बाद ही बड़े स्तर पर दूसरों के पैसे को अपने विज़न के साथ जोड़ते हैं। यही कारण है कि कई स्टार्टअप फाउंडर शुरुआत में छोटा प्रोटोटाइप बनाते हैं, छोटा प्रॉफिट दिखाते हैं और जब लोग देखते हैं कि उनका मॉडल काम कर रहा है, तब निवेशक उन्हें पैसा देने के लिए तैयार हो जाते हैं। यानी पहले भरोसा बनता है, फिर ओपीएम जुड़ता है। फाइनेंस की दुनिया में यह एक बहुत महत्वपूर्ण नियम है कि दूसरों का पैसा तभी मिलता है जब लोग यह मान लें कि आप उसे जिम्मेदारी से संभाल सकते हैं। इसलिए ओपीएम कोई शॉर्टकट नहीं है। यह एक जिम्मेदारी [संगीत] है और जो लोग इस जिम्मेदारी को समझते हैं, वे ओपीएम को एक शक्तिशाली वेल्थ क्रिएशन टूल में बदल [संगीत] सकते हैं। यही कारण है कि दुनिया के कई बड़े बिजनेस, बड़ी कंपनियां और बड़े निवेश इसी सिद्धांत पर खड़े हैं। और यही ओपीएम का असली खेल है। अपने पैसे से नहीं बल्कि समझदारी से इस्तेमाल किए गए दूसरों के पैसे से भी वेल्थ क्रिएट करना। पार्ट आठ स्पीड वर्सेस सेफ्टी। अब तक हमने समझा कि लोन क्या होता है? लेवरेज कैसे काम करता है? अमीर लोग ओपीएम यानी अदर पीपल्स मनी का इस्तेमाल कैसे करते हैं?
और टैक्स सिस्टम को समझना क्यों जरूरी है? लेकिन वेल्थ बनाने की इस पूरी कहानी में एक और बहुत महत्वपूर्ण तत्व है जिसे अक्सर लोग नजरअंदाज कर देते हैं और वह है स्पीड यानी गति। पैसे की दुनिया में सिर्फ यह मायने नहीं रखता कि आप क्या कर रहे हैं। यह भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है कि [संगीत] आप कितनी तेजी से कर रहे हैं। यहीं से आता है एक बहुत दिलचस्प अंतर [संगीत] स्पीड बनाम सेफ्टी। अब जरा सोचिए कि मिडिल क्लास आमतौर पर क्या करता है। मिडिल क्लास का माइंडसेट अक्सर सुरक्षा पर आधारित होता है। उन्हें बचपन से यही सिखाया जाता है कि जीवन में जोखिम से दूर रहना चाहिए। पहले अच्छी नौकरी लो। [संगीत] फिर धीरे-धीरे पैसे बचाओ। फिर जब काफी पैसा इकट्ठा हो जाए तब कुछ बड़ा करने के बारे में सोचो। इस सोच के अनुसार उनका रास्ता कुछ ऐसा होता है। पहले 10 साल सेविंग, फिर बिजनेस, फिर निवेश, [संगीत] सब कुछ सुरक्षित लेकिन बहुत धीमा। कई लोग अपने जीवन के सबसे अच्छे साल सिर्फ पैसा जमा करने में लगा देते हैं। वे सोचते हैं कि पहले पूरी पूंजी इकट्ठा कर लेंगे। फिर किसी बिजनेस या निवेश में कदम रखेंगे। लेकिन इस प्रक्रिया में अक्सर एक चीज नजरअंदाज हो जाती है। समय समय वह चीज है जो कभी वापस नहीं आता [संगीत] और बिजनेस की दुनिया में समय का बहुत बड़ा महत्व होता है क्योंकि मार्केट लगातार बदलता रहता है। टेक्नोलॉजी बदलती रहती है। नए अवसर आते हैं और कुछ समय बाद खत्म भी हो जाते हैं। अगर कोई व्यक्ति सिर्फ इसलिए इंतजार करता रहता है कि पहले वह पूरी तरह सुरक्षित हो जाए, तो कई बार वह उस मौके को खो देता है जो उसके जीवन को बदल सकता था। यही वह जगह है जहां अमीर लोगों की सोच मिडिल क्लास से अलग हो जाती है। अमीर लोग भी जोखिम को समझते हैं लेकिन वे सिर्फ सुरक्षा के बारे में नहीं सोचते। वे स्पीड के बारे में सोचते हैं। वे समझते हैं कि अगर कोई अवसर सही है तो उसे पकड़ने के लिए समय पर कदम उठाना जरूरी है। और कई बार यही वह स्थिति होती है [संगीत] जहां लोन एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। अमीर लोग अक्सर लोन का इस्तेमाल सिर्फ पैसे के लिए नहीं करते। वे लोन का इस्तेमाल समय खरीदने के लिए करते हैं। यानी वे उस अवसर को अभी पकड़ लेते हैं। जिसके लिए बाकी लोग सालों तक इंतजार करते रहते हैं। बिजनेस की दुनिया में यह सिद्धांत बहुत स्पष्ट है। जो व्यक्ति जल्दी कदम उठाता है वह अक्सर मार्केट में पहले पहुंच जाता है और जो पहले पहुंच जाता है, उसे अक्सर सबसे बड़ा फायदा मिलता है। इस बात को समझने के लिए एक बहुत बड़ा उदाहरण है मुकेश अंबानी और उनका प्रोजेक्ट Reliance Jio। जब Reliance Jio ल्च हुआ तो उसने भारत के टेलीकॉम उद्योग को पूरी तरह बदल दिया। लेकिन इस प्रोजेक्ट के पीछे सिर्फ एक नई कंपनी नहीं थी। इसके पीछे एक बहुत बड़ा विज़न और एक बहुत बड़ा जोखिम भी था। Reliance Jio को खड़ा करने के लिए हजारों करोड़ रुपए का निवेश किया गया। और इस निवेश का बड़ा हिस्सा कर्ज यानी लोन के रूप में लिया गया था। अब यहां एक महत्वपूर्ण सवाल उठता है। क्या मुकेश अंबानी के पास पैसे की कमी थी? नहीं। लेकिन वे यह समझते थे कि अगर वे सिर्फ अपनी मौजूदा पूंजी का इंतजार करेंगे और धीरे-धीरे निवेश करेंगे तो मार्केट का अवसर हाथ से निकल सकता है। टेलीकॉम की दुनिया में टेक्नोलॉजी बहुत तेजी से बदल रही थी। डाटा का भविष्य तेजी से बढ़ रहा था। इंटरनेट का इस्तेमाल बढ़ रहा था और यह वह समय था जब भारत में मोबाइल डाटा की क्रांति शुरू हो सकती थी। अगर Reliance Jio उस समय लॉन्च नहीं होता तो शायद कोई दूसरी कंपनी वह अवसर पकड़ लेती। इसलिए उन्होंने इंतजार नहीं किया। उन्होंने स्पीड चुनी। उन्होंने बड़े स्तर पर निवेश किया। इंफ्रास्ट्रक्चर बनाया, नेटवर्क तैयार किया और फिर Jio को पूरे देश में ल्च किया। [संगीत] परिणाम क्या हुआ?
कुछ ही वर्षों में Jio भारत की सबसे बड़ी टेलीकॉम कंपनियों में से एक बन गई। इस उदाहरण से एक बहुत महत्वपूर्ण बात समझ में आती है। कभी-कभी सही समय पर लिया गया। जोखिम और सही तरीके [संगीत] से इस्तेमाल किया गया लेवरेज। एक साधारण अवसर को एक ऐतिहासिक सफलता में बदल सकता है। यही स्पीड और सेफ्टी के बीच का फर्क है। सेफ्टी आपको सुरक्षित रख सकती है। लेकिन स्पीड आपको आगे ले जा सकती है। इसका मतलब यह नहीं है कि बिना सोचे समझे जोखिम लिया जाए। इसका मतलब यह है कि जब कोई अवसर सही हो तो सिर्फ डर की वजह से उसे खो देना भी समझदारी नहीं होती। सफल उद्यमी अक्सर जोखिम को समझते हैं। लेकिन वे अवसर को भी पहचानते हैं। वे यह समझते हैं कि अगर सही योजना, सही रिसर्च [संगीत] और सही स्ट्रेटजी के साथ कदम उठाया जाए तो वही निर्णय उनके जीवन की दिशा बदल सकता है। और यही कारण है कि कई बार अमीर लोग लोन का इस्तेमाल सिर्फ पूंजी के लिए नहीं करते। वे उसका इस्तेमाल समय और गति हासिल करने के लिए करते हैं क्योंकि बिजनेस की दुनिया में कई बार जीत उसी की होती है जो सही समय पर सही कदम उठा लेता है। [संगीत] दोस्तों इस पूरी चर्चा के बाद अब सबसे जरूरी बात समझना बहुत आसान हो जाता है। लोन अपने आप में ना अच्छा होता है और ना बुरा। लोन [संगीत] सिर्फ एक टूल है और किसी भी टूल की तरह उसकी ताकत इस बात पर निर्भर करती है कि [संगीत] उसे इस्तेमाल कैसे किया जा रहा है। एक ही चाकू से कोई इंसान खाना भी काट सकता है और वही चाकू किसी के लिए खतरा भी बन सकता है। ठीक इसी तरह लोन भी एक ऐसा साधन है जो किसी की जिंदगी को आगे बढ़ा सकता है और किसी की जिंदगी को मुश्किल भी बना सकता है। सब कुछ इस बात पर निर्भर करता है। आप उसे कैसे इस्तेमाल करते हैं? अगर कोई व्यक्ति लोन लेकर सिर्फ अपनी लाइफस्टाइल को बड़ा करता है तो धीरे-धीरे वही लोन उसकी आर्थिक आजादी को खत्म कर सकता है। अगर लोन लेकर महंगी कार खरीदी जाती है। अगर क्रेडिट कार्ड से बार-बार ऐसी चीजें खरीदी जाती हैं जो सिर्फ कुछ समय की खुशी देती हैं। अगर ईएमआई के जरिए ऐसे खर्च किए जाते हैं जो भविष्य में कोई इनकम नहीं देते तो वही लोन धीरे-धीरे बोझ बन जाता है। और जब लोन बोझ बन जाता है तो इंसान का ज्यादातर समय सिर्फ ईएमआई चुकाने में ही निकल जाता है। हर महीने सैलरी आती है और उसका बड़ा हिस्सा सीधे बैंक में चला जाता है। धीरे धीरे जिंदगी एक ऐसे चक्र में फंस जाती है जहां इंसान लगातार काम करता रहता है। लेकिन आर्थिक आजादी उससे दूर होती जाती है। यही वह स्थिति है जहां बैड डेप्ट इंसान को आर्थिक रूप से कमजोर बना देता है। लेकिन अगर वही लोन एक अलग सोच के साथ लिया जाए तो वही लोन एक सीढ़ी बन सकता है। अगर लोन का इस्तेमाल ऐसी चीजें बनाने में किया जाए जो भविष्य में पैसा पैदा करें। अगर लोन का इस्तेमाल बिजनेस बनाने में किया जाए। अगर लोन का इस्तेमाल ऐसी प्रॉपर्टी खरीदने में किया जाए जो हर महीने किराया दे। अगर लोन का इस्तेमाल ऐसे एसेट्स में किया जाए जो समय के साथ वैल्यू बढ़ाएं तो वही लोन धीरे-धीरे वेल्थ बनाने का जरिया बन सकता है। यही वह जगह है जहां गुड डेप्ट और बैड डेप्ट का फर्क साफ दिखाई देता है। अगर लोन से लाइफस्टाइल खरीदी जाती है तो वह आपको धीरे-धीरे गरीब बना सकता है। लेकिन अगर लोन से एसेट और कैश फ्लो बनाया जाता है तो वही लोन आपको आर्थिक रूप से मजबूत बना सकता है। और यही असली फर्क है सोच का। मिडिल क्लास अक्सर लोन से डरता है क्योंकि उसने लोन का बुरा चेहरा ज्यादा देखा है। लेकिन अमीर लोग लोन को एक रणनीति की तरह देखते हैं। वे जानते हैं कि अगर सही ज्ञान, सही योजना और सही अनुशासन के साथ लोन का इस्तेमाल किया जाए तो वही लोन एक शक्तिशाली वेल्थ बिल्डिंग टूल बन सकता है। यही कारण है कि दुनिया के कई बड़े बिजनेस, बड़ी कंपनियां [संगीत] और बड़े निवेश किसी ना किसी रूप में लेवरेज और लोन के जरिए ही खड़े हुए हैं। लेकिन यहां एक बात हमेशा याद रखनी चाहिए। लोन का इस्तेमाल करने से पहले फाइनेंसियल एजुकेशन बहुत जरूरी है। अगर किसी व्यक्ति को पैसों के खेल की समझ नहीं है तो वही लोन उसके लिए समस्या बन सकता है। लेकिन अगर किसी व्यक्ति को यह समझ है कि पैसा कैसे काम करता है? कैश फ्लो कैसे बनता है और निवेश कैसे बढ़ता है?
तो वही व्यक्ति लोन को एक अवसर में बदल सकता है। इसलिए असली सवाल यह नहीं है कि लोन लेना चाहिए या नहीं। असली सवाल यह है कि क्या आपको पैसे के इस खेल को खेलने की समझ है? क्योंकि अंत में वही लोग आगे बढ़ते हैं जो सिर्फ पैसे के लिए काम नहीं करते बल्कि पैसे को अपने लिए काम पर लगा देते हैं। याद रखिए अमीर लोग पैसे के लिए काम नहीं करते। वे पैसे को अपने लिए काम पर लगाते हैं और [संगीत] यही सोच आर्थिक आजादी की पहली सीढ़ी बन सकती है। अगर आपको यह वीडियो पसंद आया हो और अगर आपको लगा हो कि इस वीडियो ने पैसों और लोन के बारे में आपकी सोच को थोड़ा भी बदलने में मदद की है तो वीडियो को लाइक जरूर करें क्योंकि आपका एक लाइक हमें यह बताता है कि आप इस तरह के कंटेंट को पसंद करते हैं और इससे हमें और बेहतर वीडियो बनाने की प्रेरणा मिलती है। अगर आप पैसों के असली खेल को समझना चाहते हैं। अगर आप फाइनेंसियल माइंडसेट, इन्वेस्टिंग, वेल्थ बिल्डिंग और फाइनेंसियल फ्रीडम से जुड़ी चीजें सीखना चाहते हैं, तो हमारे चैनल लेजेंड ऑफ फाइनेंस को जरूर सब्सक्राइब [संगीत] करें। यह चैनल उन लोगों के लिए बनाया गया है जो सिर्फ पैसा कमाना ही नहीं बल्कि पैसे को समझना भी [संगीत] चाहते हैं। यहां हम कोशिश करते हैं कि जटिल फाइनेंशियल कांसेप्ट्स को सरल भाषा में समझाया जाए ताकि हर आम इंसान भी उन्हें समझ सके और अपनी जिंदगी में लागू कर सके। अगर आप चाहते हैं कि आप भी पैसे के खेल को समझें। अगर आप चाहते हैं कि भविष्य में आपकी आर्थिक स्थिति मजबूत हो तो लेजेंड ऑफ फाइनेंस के साथ जुड़े रहिए। और हां, कमेंट में जरूर बताइए आपकी सोच क्या है? क्या आप गुड डेप्ट का इस्तेमाल करके एसेट बनाना चाहेंगे?
या आप बैड डेप्ट से पूरी तरह दूर रहना पसंद करेंगे?