[संगीत] MP3 [संगीत] झाला का जेवन समारोह में कि अ ओम नारायण नारायण नारायण नारायण नारायण नारायण कि एक बात ध्यान से समझ लेना सब लोग को हुआ था और एक होता है क्रिया जयसुख है कि हमने गए खाया-पीया यह किया वह किया मजा आ गया इसको बोलते हैं की प्रवृत्ति जयसुख यह प्रवृत्ति जयसुख शक्ति का ह्रास करता है और थोड़ी सी झलक देता है और बांध देता है कि वहां से सूख मिला बाहर से शक्ति का आभूषण का मुद्दा का ह्रास करके जरा सा भासमान झलक दे इसको बोलते विषय विकारों का व्रत ट्रक प्रवृत्ति जयसुख
और दूसरा होता है भावना जब यह सूख भगवान मेरे हैं मैं भगवान का हूं भगवान का स्मरण किया पूजा किया मंदिर गए अच्छा काम किया किसी के दुख दूर किए तो सद्भाव से ही किए तो यह भावना जब यह सूख में मेहनत थोड़ी होते और सुख गहरे में होता है वो भोग कि Jio कौन उन्नत करता है क्रियाजन्य सूख जीव को पतन में डालता है और भावना जयसुख जीव को उन्नत करता है तीसरा सूखा होता है ज्ञान धन व सुख त् हुआ है कि शरीर बदलने वाला है है ब्रह्मा जी के एक दिन में 14
इंद्र बदल जाते और इंद्र के एक दिन में मनुष्य की 14 एक सौर वर्ष प्यार उच्च पूरी हो जाती है 14 पीढ़ियां बदल जाती मनुष्य तो इसमें क्या सार है क्या स्थिति क्या सदा रहे हो कि देखत नैन चलो जुलाई का मांगू कछुए थिर न रहै ही देखते देखते दुनिया सब बदल रही है क्या मकान बनाऊं क्या चीज की फरियाद करूं यह सब जिसके पास है वह भी छोड़कर जाएंगे तुम मेरे पास कब तक आएगा और कब तक रहेगा सबूत रहा है राजे-महाराजे होने की इच्छा नहीं होती राधे मां राज्य के द्वारा भी हमें राज्य
कर रहे हैं और अभी हम यहां अपना जीवन जीते हैं राजाओं के रूप में भी मेरा यह आत्मा है और प्रजा के रूप में विराजमान है एक आत्मा ही अनेक रूपों कर देखा देखता है जैसे सपने में एक ही चैतन्य आने का अच्छे बुरे व्यक्ति सुखी दुखी व्यक्तियों के रूप में दिखता है ऐसे ही एक ही चैतन्य परमेश्वर की अनेक रूप हैं तो कुछ पाने की कुछ खोने कि कुछ नहीं ज्ञान धन व सुख में उसकी स्थिति होने लगती कि यह उन दोनों से ऊंचा है कि चौथा होता है ब्राह्मी स्थिति प्राप्त कर कार्य रहे
ना शेष मोह कभी ना ठग सके इच्छा नहीं लवलेश यह जो ज्ञान धन व सुख है वही वास्तविक सुख स्वरूप आत्मा महबूब उसमें जो शांत होना है उससे सामर्थ्य आता है ऐसी कोई प्रवृत्ति नहीं जिससे शक्ति का ह्रास नहीं होता ऐसा कोई सुख भोग नहीं जिसके पीछे भय दुखों रोग नहीं लेकिन ज्ञान धन व सुख में ना आए हैं न दुखे है न रोग है श्रीकृष्ण की मां यशोदा जी ने कृष्ण-गोपिका यह कीचड़ में से हो गया है लगता है कृष्ण तो अगले जन्म में सूअर था सुबह मारो वह भून जैम का दो माफ करना
है तो कृष्ण खिला करा सके मैया पहचान गई कि जयपुर में भी हम है इसको इस बात में अम्मा तुम फिक्र बोलती हो हुआ था है तो यह ब्रह्म परमात्मा सूअर की जितना भी बना बैठा है और मनुष्य के बीच और देवता कि तुम ठीक पहचानते तो यह जो आत्मा परमात्मा का दिव्य ज्ञान है उस ज्ञान की प्राप्ति की इच्छा भगवान कृष्ण ने अर्जुन के अंदर पैदा कर दी है हां हां तोरण का मैदान घोड़े चिंघाड़ रहे हैं हाथी चिघाड़े घोड़े उकार रहे हैं एक दूसरे के खून के प्यासे है प्रतिशोध की भावना से एक-दूसरे
के खून के प्यासे ऐसी जगह पर अर्जुन और कृष्ण का गीता ज्ञान चल पड़ा है कि ऐसी भयंकर वातावरण की स्थिति में भी श्रीकृष्ण ने प्रश्न अर्जुन के हृदय में प्रकट कर दिया जो ब्रह्म कैसा होता है तुमको पता नहीं आदिदेव कार्य क्या बोल किसको बोलते आधारभूत किसको बोलते अध्यात्मक इसको बोलते सूख को जानने वाला पुरुष धन्य है तो वह अध्यात्मक क्या होता है प्रभु आधारभूत क्या होता है कि देव होता तो कभी अपनी बुद्धि शुद्धि यज्ञ प्रश्न उत्पन्न होते कभी कोई गुरु देव की कृपा होती तब दिव्य प्रश्न उत्पन्न होते और उसका उत्तर मिलने
से जीव परमात्मा का साक्षात्कार कर लेता तो अर्जुन के रथ में भगवान ने आदित्य आदित्य आदित्य है के आदि पुरुष क्या है इसको जानना चाहिए अ है तो अर्जुन के मन में यह प्रश्न खड़े कर दिए अर्जुन के मन में जिज्ञासा हुई और श्री कृष्ण ने उत्तर दिया तो अर्जुन के अंतरात्मा में तसल्ली हो गई यह जो दिखता है वह आधारभूत है लेकिन इसके अंदर जो दिखने का साधन है वह आदिदेव है जैसे आंख आदि बहुत थिक है लेकिन इसमें देखने की शक्ति आदि देवी है और यह अच्छा देखते कि नहीं देखती है उसको जानने
वाला चैतन्य आत्मा अध्यात्मा है हुआ है जो सकाम कर्म जो कर्म करते हैं और यहां का ही फल चाहते हैं अथवा स्वर्ग का फल चाहते हैं वह सकाम कर्म है लेकिन कर्म तो करते ईश्वर की प्रसन्नता के लिए कर्म करते बल्कि इच्छा नहीं रखते करने के लिए गरम कर लेते भलाई के तो उनका ह्रदय शुद्ध होता है यह अध्यात्म व कर्म हो जाता है अपने पितरों को देवताओं को खुश किया यह आदि देव कर्म हो जाता है लेकिन यहां के लिए वैवाहिक के लोगों के खुश किया यह आदि बहुत ही कम हो जाते आदि बहुत
इस क्रम में मेहनत ज्यादा होती है फल थोड़ा सा होता है आदि देव कर्मों में मेहनत ठीक थोड़ी सी होती है फल यहां और वहां भी होता है अध्यात्म अकर्म में मेहनत बिल्कुल नहीं वक्त होती है और फल शाश्वत होता है यह ध्यान योग शिविर में आए हैं अरे यह क्या है ध्यान योग शिविर में बैठना आना यह आना आदि बहुत हुआ आदि-आदि बहुत थिक कर्मों इधर पहुंचे बैठे हैं श्रद्धा-भक्ति से जप तप कर रहे हैं यह आदि देव कर्म है लेकिन ध्यान के द्वारा जो सुनने को समझने को मिला अथवा चयन करने को तो
यह मैं शरीर नहीं मैं मन नहीं मैं बुद्धि नहीं मैं चित्त नहीं मैं सुख भी नहीं और दुख भी नहीं हाथ को पता नहीं मैं आप हूं मैं जानता हूं यह हाथ है मन को पता नहीं मन हूं लेकिन मेरे को पता ही मेरा मन है तो हाथ आदि बहुत थिक है मन आदि देवी खैर मैं अध्यात्मा तो मैं अध्यात्म नित्य हूं शरीर पहले नहीं था लेकिन मैं पहले था दुख पहले नहीं था मैं पहले था सुख पहले नहीं था मैं पहले था तो सुख बाद में नहीं रहता दुख बाद में नहीं रह है लेकिन
उसको जानने वाला मैं जां से उठता है मैं मैं हूं मैं हूं यह जो है मैं दुखी हूं तो दुख मिला दिया आपने में मैं सुखी हूं तो सुख मिला दिया आपने में तो सुख और दुख आकार आदिदेव वृत्ति है तो सुख आदि बहुत थिक निमित्त से भी होता है आदिदैविक निमित्त से भी होता है अध्यात्म को नहीं जानते इसलिए सुख-दुख के थपेड़े लाते रहते अध्यात्मको जाने तो सुख-दुख के थपेड़े लगी नहीं सकते हैं कि अध्यात्मक को बहुत जान लें तो आदमी पुष्ट हो जाता है जैसे शिवजी अपने अध्यात्म उस उसको जानते हैं तो उसमें
ही शांत समाधि स्थल भगवान नारायण [संगीत] मैं अपने अध्यात्म उस उसको जानते हैं तो दैत्यों के साथ युद्ध करते हैं देवों का पक्ष लेते हैं फिर भी राधे में देवों के लिए राग नहीं रखते और दैत्यों के लिए द्वेष नहीं रखते और अपने में कभी कर्म का करता पर नहीं मानते तो अध्यात्मक वर्मा आदित्य विक्रम आदि बहुत थिक कारण इन सबको जानकर जो सार तत्व अध्यात्म है उसको उस में स्थित हो जाए तो उसको फिर बड़े-बड़े भारी कर्मों से ले पाए मान्या बंधन नहीं होता श्रीकृष्ण देर से आए बहुत देश से कि तुड़वाल गोपियों ने
पूछा केशव कहां गए थे आज बोले गुरु पूर्णिमा थी मैं अपने गुरुदेव का दर्शन करने यमुनापार में तो पानी आ रहा है हमें भी आज्ञा दीजिए हम डिजाइन दर्शन करने से है वैसा कि पूनम गुरु का दर्शन करने से वर्ष भर के पुण्य कर्म का लाभ हो जाता है तुम्हें शांति पूनम को गुरु के दर्शन करने जा रहे तो यमुना नदी में बाढ़ है तो केशव हम कैसे जाए भूलें यमुना जी को बोलो श्री कृष्ण ने कभी कुछ नहीं किया हो तो यह मिट्टी ले जाओ श्री कृष्ण ने कभी कुछ नहीं किया हो तो यमुना
जी हमें रास्ता देने की कृपा करें ओर इशारा करके मुक्त चरण रज डाले और यमुना जी का पानी कुछ ऐसे ही हो गया कि वह लोग बाहर हो गए थे कि ग्वाल-गोपियां को आश्चर्य हुआ कि कुछ नहीं किया देवांगना बोलती मेरी तो चोटी खींच लेता हूं बोलते मेरा मक्खन खा जाते हैं वह मेरे को धोखा देते हुए मिलते मेरा नहीं यह कर दिया कुछ नहीं करते दिन-रात धमाधम करते रहते हैं और बोलते कुछ नहीं किया फिर इस गए दुर्वासा ऋषि के दर्शन करने तू कुछ प्रसाद ले गए थे तो वह गुरुजी प्रस्ताव लाए आप स्वीकार
करो तू मुंह खोल दिया किसी ने कुछ दाल आप किसी ने कुछ खिलाया वह उनके श्रद्धा-भक्ति से सब खाते कि जब लौटे तो फिर वह पानी क्यों स्थल तो आए थे तो कृष्ण ने चरण रज दी थी तो हम पार हो गए आप तो बाढ़ में पानी यमुना में तो दुर्वासा ने कहा कि यह थोड़ी सी बूंद और समुद्र के दुर्वासा ने भी कुछ ना हो को लेग ये हमला आदिग्राम देख रहा बताऊं ले चिन्ह क्या देख कर देंगे उचट हो गए माल क्वेश्चन टो गए पूरी वसूली मक्खन-मिश्री थे सब कुछ नहीं मन में रखें
कि माता दुर्वासाजी ने कुछ नहीं खाया पिया अंग की वसूली और मेरी मक्खन-मिश्री बिना खाए हो इनके ढूंढ कुछ भी हो तो यह दूर्वा की चरण रज के प्रताप से यमुना जी हमको मार धोएं मार्ग मिल गया बीच में सब्सक्राइब इतने पानी ना कृष्णा कृष्णा ने कुछ नहीं किया दुर्वासा ने कुछ नहीं भावना वह सब सच्चे हम झूठे दया करो दया पर लगे कृष्ण के पास गए केशव जी कि हम तो अभी कुछ नहीं समझ पाते हैं आप इतना कुछ करते हैं तो केशव ने कहा कि हम करते हैं दिखता है लेकिन हम अपनी मैं
को जानते हैं अपनी मैं जो आत्मचेतना है वहां तो विश्राम है वहां तो सत्तामात्र है गैस दीपक जलता है राजा आ गया उसके अनुसार आ गए नर्तकियां आ गई रात सुआ नृत्य हुआ अच्छे तमंचों ने बजाया लेकिन दिया जो करते हुए दीपक सबको वैसे का वैसा प्रकाश दे रहा है तो यह सब कोई कैसा कोई कैसा हुआ लेकिन दिया ज्यों का त्यों प्रकाश राजा नहीं आया था तभी भी दीपक टिमटिमा रहा था आया प्रजा के लोग आए सब कुछ हुआ था तभी विधियां प्रकाशित कर रहा और सब चले गए तब विद्याप्रकाश कर रहा है ऐसे
ही व आत्म दिया मन रूपी राजा इंद्र तु के अनुचर और चीज वस्तुएं यह सब व्यवहार हुआ तब भी साक्षी आत्म प्रकाश कर रहा था यह अच्छा व्यवहार हुआ बीच का हुआ गड़बड़ हुआ था और सब को देखने वाला मेरा अध्यात्मा चैतन्य प्रकाश स्वरूप आत्मा ज्यों का त्यों अलग हमला किया गया हमला बेटा गम्मा लेखिका कमला थी बेटा भ्रमण भ्रमण से आप दाणा सेओ रा दाणा गया शेग मारो आत्मा अध्यात्मतत्त्व के साथ-साथ उत्तर झालावाड़ बहुत ऊंचा इस ज्ञान को अर्जुन ने युद्ध के मैदान में सुना और अपने साथ कर लिया शीघ्र बहुत ऊंचा गाने कि
इस ज्ञान को जो अच्छी तरह से बेचारे और नीच कर्मों का त्याग कर दे और एकांत में रिश्तों में स्थिति का प्रयोग व्यवहार के पहले इसी मिट्टी के व्यवहार के बाद इस मिट्टी के वह पुरुष कर्म करते हुए भी निर्लेप हो जाता है चलती चक्की देखकर दिया कबीरा रोय दो पाटन के बीच में साबित रहा न कोई दिन-रात सुख-दुख मान-अपमान जीवन-मरण इसी में सारे खप खप के स्वाह हो रहे कबीर जी बोलते हैं यह देखो संसार चलती चक्की है इसमें कोई साबित नहीं रहता है अग्रसेन कपिल जाए फिर उस महापुरुष ने शांति में गोता मारा
और सबूत अनुभव की बात कही चक्की चले तो चालन दे दे कि चक्की चले तो चालन दे तू काहे को रोए लगा रहे तू खुद से तो बाल न बांका होय वह चक्की चलती है तो बीच में जो एक्सेल जैसे खूबसूरती वह ज्यों की त्यों रहती है कि एक्सल्स उनकी वृद्धि पहिया घूमता है ऐसे हाथ की चक्की पर जो मुख्य नाभि है वह ज्यों की त्यों रहती और की चकली घूमते तो जो देखने में आते वह मरते हैं अटेंप्ट तटबंध लेकिन जो खूंटे जाता है उसका ऐसे ही सुख में दुख में लाभ में पानी में
जीवन में में शरीर में मन में इंद्रियों में जो मैं करता है वह तो जाता है लेकिन जो अपने साक्षी हो जाता है उसका कुछ नहीं बिगड़ता है वह खत्म हो जाता है परमात्मा ही चित्तौड़ सूखे तथा महान अपमान है वह ठंडी गर्मी सूखे धोकर मान अपमान सबको यह समझता कि माया का खेल मेरा आत्मा अमर चैतन्य स्वास अंदर गया तो सौ बार आया तो हम कि मैं वही चेतन हूं तुम बैठे रहना आप खुल लिखना ना कि आगे इससे पर नजर को श्वास अंदर जा रहा है उसमें मिला दोस्तों बाहर आ रहा है मिला
दो हम 209 मोस्ट हम का हो गया आदि बहुत पिक शरीर है आदिदेव मन इंद्रिय और अध्यात्म अस हम स्वभाव है कि आदि बहुत थिक आंखें दिखना आदिदेव है दिखा न दुखा उसको जानना अध्यात्म अधात सारे कर्मों का अध्यात्मिक कर दो कि थोड़ा कठिन लगेगा पापी आदमी तो कर ही नहीं सकता निर्भर एक तो यह मजाल नहीं लेकिन अच्छे-अच्छे साधक के लिए भी यह बहुत ऊंची साधना शुरु शुरु में जहां कठिन लगती है लेकिन आप इसमें सफल हो जाओ तो बहुत बहुत लाभ होता है संसारी लाभ सच्चा लाभ नहीं है अध्यात्म लाभ ही संचालित जैसे
स्वप्न में किसी को करोड़ रुपये मिल गया तो क्या हुआ आप खुली तो कुछ नहीं सपने में किसी को 12 साल की सजा ए आप खुली तो कुछ नहीं ऐसे संसार स्वप्न है यहां आदि देवी के अध्यात्म व यदि बहुत ही फायदा हुआ तो भी कुछ नहीं हरिदेवी फायदा हुआ तो कुछ नहीं आध्यात्मिक फायदा ही फायदा आत्म शांति और आत्मा परमात्मा की प्राप्ति का लाभ ही लाभ है बाकी सारे लाभ लॉलीपॉप चिप चॉकलेट जैसे बचपन में डू खिलौने मिलते लालीपॉप चॉकलेट मिलते और बच्चे खुश हो जाते हैं लेकिन वह खुशी टिकी नहीं ऐसे ही संसार
है संसार की कोई चीजें कोई बड़ा दर्जा मिल गया कोई बड़ी बात नहीं हालांकि वह बेवकूफ लोग कहते बोलते मेरे मां-बाप को तो कुछ भी नहीं था दो कमरे थे हमने इतना पा लिया भी चार कमरे हैं दो गाड़ियां है मेरे मां-बाप तो बैलगाड़ी में जाते थे तो पहले उनके पास कुछ नहीं था हमने यह पा लिया लेकिन हम वह जो पाया है वह भी तो तुम छोड़ कर जाओगे वह थोड़े में ही संतुष्ट थे तुम ज्यादा में भी असंतुष्टो लेकिन उन्होंने भी अध्यात्म नहीं पाया और तुमने भी अध्यात्म न पाया तो क्या बात दूरी
किया है कि किसी ने ज्यादा कमा लिया किसी ने कम कमाल या किसी ने शरीर को ज्यादा सुविधा में ऐसा आश्रम में रखा किसी ने सादगी से जीत लिया कोई बड़ी बात नहीं है अपितु शादी की में जीने वाला ज्यादा बहुत दूर है जो हाय हाय हाय अखरता है अपना आवश्यकता बढ़ाता है अपने खर्च बढ़ाता है अपने रिश्ते नाते बड़ा कर संसार में ज्यादा चतुर होता है तो वह तो और भी आदि बहुत एक गहरा आदि बहुत ही को जाएगा जो कम पसारा करता है और चिंतन करता है वह अधिदेविक में से धीरे-धीरे अध्यात्म में
मजा आएगा आ हुआ था है इसीलिए जब भी समय मिले समय लेकर निकालना चाहिए स्वामी ने सो ओं के अधीन बहुत थिक मिथिला मे शरीर यह मरने वाला है आदिदैविक अपमान और स्वर्ग यह भी बदलने वाला है अध्यात्म नित्य-नित्य आत्मा परमात्मा उसमें थोड़ा सा हुआ था तो फिर मान इधर हुआ जाए ओम ओम [संगीत] मैं इतना लंबा नहीं करो मुबस बस क्या हुआ लंबा क्यों करते देखो सुनो पहले ओम ओम जय हो ओम [संगीत] जय हो ओम बस करो बस करो कि यह लोग रीत है अभी जो सिखाते अलग नीति है वह वाला पल्लू अलग
है अजय को जय हो ओम मां की है शाबाश से ओम हां भाई बस बस बस बखूबी रखो गाड़ी जय हो ओम ओम ए होम ए होम सुनो होठों में सर्वोत्तम होठों में बोलो बाहर नहीं आवाज निकालना है जय हो ओम जय हो ओम जय हो [संगीत] जय हो 22003 ई जय हो ओम शांति में आ जाओ आओ शांति कि अ श्वास अंदर जाए ओम बार है उसकी गिनती करो एक विश्वास बिना गिनती के नहीं आ है स्वास अंदर गया ओम ओम बाबा अध्यात्मा आत्मा नित्य व कि मैं उसमें शांत हो रहा हूं इस बार
जाए तो गिनती है हाउ टो मेक ओम द्वोज स्वास्थ्य को गिनते जाओ 120 बिना गिनती के ना जाए खबरदारी रखा है हुआ है में बहुत भारी लाभ हो रहा है कि आदि बहुत इकलाब से एक सौ गुना आदि देवी क्लास का प्रभाव और आधिदैविक से हजारों गुना अध्यात्म लाभ का महत्व कि उन्हें चार घंटा रोज जप करें और नीच कर्मों का त्याग करते हैं अध्यक्ष प्रकाश चिंतन होने लगेगा एक साल के अंदर शुक्राचार्य का परमात्मप्राप्ति जाएगी अभी जैसे बैठे हैं ऐसा एक आधा घंटा रोज सत्संग में अपने घर पर अपनी ढंग से बैठे हैं है
और 120 माला जप करें ईश्वर-साक्षात्कार की प्रॉब्लम ओम ओम ओम ओम 21 साल में कोई ग्रेजुएट नहीं होता हो जाए तब भी नौकरी मिलते नौकरी मिली है तो भी संतुष्टि नहीं होती को संतुष्टि हुई तो भी कि अध्यात्मिकता आदि देवी का नया आदि आदि देवी के निधन पूर्ण करें योग करें तो भी अध्यात्मिकता ने लेकिन सत्संग से गुरु कृपा से आधी बहुत दिखता अधिदेविक अध्यात्मिकता अपने आप को कि अ कुछ संख्या जबकि हो जाए तो जैसे पुरुष के पीछे पीछे उसकी छाया जाती है ऐसे उसके लिए रोजी-रोटी सब सहज में होने लगता है असाध्य कार्य
सिद्ध करने का सामर्थ्य उसमें आ जाता है [संगीत] हुआ है कर दो [संगीत]