[संगीत] 137 मीटर लंबा, 23 मीटर चौड़ा और तीन मंजिल ऊंचा। यह कोई आम जहाज नहीं था। यह वो माप [संगीत] थे जो खुद ईश्वर ने नूह को बताए थे। आदेश बिल्कुल साफ था। बिना किसी शक के अपने लिए एक [संगीत] जहाज बनाओ। बस यही एक वाक्य था और इसके साथ ही [संगीत] इंसानी इतिहास के सबसे बड़े और सबसे अजीब कामों में से एक की शुरुआत हो गई। बाइबल हमें जहाज का साइज बताती है, लकड़ी का नाम बताती है और यह भी बताती है कि वह क्यों बनाया जा रहा था। लेकिन वह यह नहीं बताती कि
नूह को इसे बनाने में किन-किन मुश्किलों का सामना करना पड़ा। और सच्चाई यह है कि जो भी उस जमाने में लकड़ी का काम जानता होगा वह समझ सकता था। यह काम आसान नहीं था। बहुत मुश्किल था। सबसे पहली बात जगह। 137 मीटर लंबी चीज आप कहीं भी खड़ी नहीं कर सकते। उसके लिए बहुत बड़ी मजबूत और सीधी जमीन चाहिए थी। ऐसी जगह जहां मिट्टी धंसने वाली ना हो। जहां जमीन फिसले नहीं और जहां आसपास सरो यानी साइप्रेस के पेड़ हो क्योंकि जहाज उसी लकड़ी से बनना था। अब जरा नूह को सोचिए। कोई मशीन नहीं, कोई
इंजीनियर नहीं, [संगीत] कोई नक्शा नहीं। बस अनुभव, समझ और परमेश्वर पर भरोसा। नूह जमीन पर चलता है। [संगीत] मिट्टी को पैरों से दबाकर देखता है। हाथ में लेकर जांचता है। देखता है कि जमीन कितनी सख्त है। पेड़ कितनी दूरी पर है। लकड़ी यहां से वहां ले जाना मुमकिन है या नहीं। और आखिरकार बहुत सोच समझकर वह एक जगह चुनता है और यहीं से असली मेहनत शुरू होती है। बड़े-बड़े पत्थर हटाने पड़ते हैं। जमीन के अंदर गहरी जड़े होती हैं। उन्हें उखाड़ना पड़ता है। हर जगह को बराबर करना पड़ता है। यह काम देखने में भव्य नहीं
था। ना कोई तारीफ, ना कोई तालियाम, बस मिट्टी, पसीना और थकान। और फिर एक और समस्या थी जो आज के लोगों को शायद समझ में भी ना आए नमी। उस समय बारिश नहीं होती थी। बाइबल बताती है कि जमीन [संगीत] से भांप उठती थी जो पूरी धरती को गीला रखती थी। मतलब मिट्टी अक्सर नम रहती थी और नम मिट्टी जल्दी कीचड़ [संगीत] बन जाती है। औजार उसमें धंस जाते हैं। लकड़ी गीली हो जाती है। जमीन कमजोर पड़ जाती है। इसलिए बहुत मुमकिन है कि नूह ने जमीन के चारों तरफ छोटे-छोटे नाले बनाए हो ताकि पानी
वहां से बह जाए और काम की जगह खराब ना हो। यह पानी आसमान से नहीं गिर रहा था। यह खुद धरती से निकल रहा था। और जब नूह यह सब कर रहा था, लोग उसे देख रहे थे। कोई हंस [संगीत] रहा था, कोई मजाक उड़ा रहा था, कोई कह रहा था, यह आदमी पागल हो गया है। इतनी बड़ी जमीन क्यों साफ कर रहा है? यहां तो कभी पानी भी [संगीत] नहीं आया। जहाज किस लिए? लेकिन नूह किसी को जवाब नहीं देता। क्योंकि वह लोगों के हिसाब [संगीत] से काम नहीं कर रहा था। वह ईश्वर के
कहे मुताबिक काम कर रहा था। जब जमीन आखिरकार काफी मजबूत और सूखी हो गई, तब अगला बड़ा काम शुरू हुआ लकड़ी जमा करना। परमेश्वर ने साफ कहा था जहाज सरों की लकड़ी से बनाना सरों के पेड़ छोटे नहीं होते वे बहुत बड़े भारी और मजबूत होते हैं। ऐसे पेड़ काटना आज भी आसान नहीं होता और उस जमाने में तो और भी मुश्किल था। एक दो पेड़ नहीं सैकड़ों पेड़ हर दिन वही काम। कुल्हाड़ी उठाओ वार करो फिर वार फिर वार। कई घंटों के बाद जाकर एक पेड़ गिरता। जंगल में उसकी आवाज गूंजती [संगीत] लेकिन पेड़
गिरने से काम खत्म नहीं होता था। अब सवाल था इतने बड़े तनों को वहां तक कैसे पहुंचाया जाए जहां जहाज [संगीत] बन रहा था ना पहिए थे ना ट्रक ना मशीनें। तो उन्होंने वही तरीका अपनाया जो पुराने जमाने के लोग जानते थे। लकड़ी के गोल लट्ठे। बड़े तने के नीचे छोटे लट्ठे रखे जाते। रस्सियों से खींचा जाता। धीरे-धीरे थोड़ा-थोड़ा करके लकड़ी आगे बढ़ती। जैसे ही तना आगे जाता, पीछे के लट्ठे उठाकर आगे रख दिए जाते। यह काम बहुत धीरे होता था, थकाने वाला था और कभी-कभी खतरनाक भी। लेकिन हर लकड़ी जो वहां पहुंचती, नूह के
लिए एक बात की याद दिलाती, मैं जो कर रहा हूं, वह बेकार नहीं है। आसपास के लोग यह सब देखते थे। इतनी बड़ी-बड़ी लकड़ियां एक अजीब सी खाली जमीन की तरफ जा रही थी। लोग और ज्यादा मजाक उड़ाने लगे, लेकिन नूह रुका नहीं। क्योंकि जो आदमी परमेश्वर की बात सुन लेता है, वह दुनिया की हंसी से नहीं डरता। धीरे-धीरे लकड़ी इकट्ठा होने लगी। अब वह समय आ गया था जब सिर्फ काटना [संगीत] और ढोना ही नहीं बल्कि कुछ खड़ा करने का वक्त था। ऐसी चीज जो पहले कभी किसी ने नहीं बनाई थी। ऐसी चीज जो
आने वाले समय में सिर्फ एक जहाज नहीं बल्कि जिंदगी की [संगीत] आखिरी उम्मीद बनने वाली थी। जब काफी सारी लकड़ी जमा हो गई तब नूह के सामने अगला और सबसे जरूरी काम आया जहाज की नींव बनाना। कोई भी बड़ा काम ऊपर से नहीं नीचे से [संगीत] शुरू होता है। और इस जहाज के लिए सबसे अहम चीज थी उसकी रीड। रीढ़ मतलब जहाज का वो हिस्सा जिस [संगीत] पर पूरा वजन टिका रहता है। तीन मंजिलें, जानवर, खाना, पानी सब कुछ उसी पर निर्भर था। अगर यहां जरा सी भी गलती होती तो पूरा जहाज कमजोर पड़ जाता।
लेकिन यहां एक बड़ी दिक्कत थी। इतना लंबा पेड़ होता ही नहीं। 137 मीटर लंबी लकड़ी किसी एक पेड़ से मिल ही नहीं सकती थी। इसका मतलब साफ था कई बड़े-बड़े तनों को आपस में जोड़कर एक सीधी और मजबूत रीड बनानी होगी। यह काम ताकत से ज्यादा समझदारी का था। [संगीत] नूह और उसके बेटों ने लकड़ियों को इस तरह काटा कि वे एक दूसरे में फिट हो जाए। [संगीत] पुराने जमाने के कारीगर यह तरीका जानते थे। लकड़ी में खास कट लगाए जाते थे ताकि दो टुकड़े जुड़कर एक मजबूत हिस्सा बन जाए। फिर उन जोड़ों को और
मजबूत करने के लिए कड़ी लकड़ी के खूंटे ठोके जाते थे। जब सब कुछ ठीक से फिट हो जाता तो वह जोड़ ऐसे हो जाते जैसे एक ही लकड़ी हो। धीरे-धीरे जहाज की रीड जमीन पर आकार लेने लगी। अब पहली बार नूह को साफ दिखने लगा कि वह क्या बना रहा है। इसके बाद आया अगला बड़ा कदम ढांचा खड़ा करना। ढांचे को आप जहाज की हड्डियां समझ सकते हैं। यह वो मुड़ी हुई लकड़ियां थी जो जहाज को उसका आकार देती थी। इन्हीं से तय होता था कि जहाज पानी में कैसे टिकेगा। हर लकड़ी को सही जगह
सही कोण पर लगाना बहुत [संगीत] जरूरी था। अगर एक भी लकड़ी ज्यादा झुक जाती तो पूरा संतुलन बिगड़ सकता था। इसलिए काम बहुत ध्यान से किया गया। रस्सियों को सीधी लाइन की तरह खींचा जाता। पत्थरों को लटका कर देखा जाता कि लकड़ी सीधी है या नहीं। हर बीम को बार-बार झां जाता। कल्पना कीजिए उस मंजर को। भारी-भरकम लकड़ियां, मोटी रस्सियां और कुछ लोग अपनी पूरी [संगीत] ताकत लगाते हुए धीरे-धीरे जमीन पर एक अजीब सा ढांचा खड़ा होने लगा। लोग दूर से देखने आते थे। अब यह सिर्फ लकड़ी नहीं रही थी। यह साफ दिख रहा था
कि कुछ बहुत बड़ा बनने वाला है। लेकिन नूह जानता था [संगीत] ढांचा बन जाना काफी नहीं है। अब सबसे जरूरी काम बचा था पानी [संगीत] से बचाओ। परमेश्वर ने साफ कहा था जहाज को अंदर और बाहर दोनों तरफ राल से ढक देना। राल मिट्टी से निकलने वाला गाढ़ा पदार्थ होता है। उसे गर्म किया जाता। फिर लकड़ी पर लगाया जाता। ठंडा होने पर वह पत्थर जैसी सख्त हो जाती थी और पानी अंदर नहीं जाने देती थी। लेकिन यह काम बहुत मेहनत वाला था। हर जोड़, हर दरार, हर कोना। अगर कहीं से भी पानी घुस गया तो
महीनों की मेहनत बेकार हो सकती थी। इसीलिए नूह और उसके बेटे दिन रात यही काम करते रहे। पहले बाहर राल लगाई जाती फिर [संगीत] अंदर। एक परत सूखती तब दूसरी लगती। कई दिन शायद कई हफ्ते इसी काम में निकल गए। आखिरकार वह दिन आया जब पूरा जहाज अच्छे से सील हो चुका था। अब वह सिर्फ लकड़ी का ढांचा नहीं था। वह एक ऐसा सुरक्षित ठिकाना बन चुका था जो आने वाली सबसे बड़ी आफत को झेल सकता था। अब बाहर का काम लगभग पूरा था। लेकिन अंदर की दुनिया [संगीत] अभी बननी बाकी थी। परमेश्वर ने कहा
था जहाज के अंदर अलग-अलग हिस्से बनाना मतलब यह कोई खुली जगह नहीं होनी थी। अंदर छोटे-छोटे कमरे अलग-अलग हिस्से होने थे। तीन मंजिलें हर मंजिल पर अलग व्यवस्था। यह सिर्फ आराम के लिए नहीं था बल्कि जिंदगी बचाने [संगीत] के लिए था। अगर सब जानवर खुले में होते तो कोई किसी पर हमला कर देता, कोई घायल हो जाता, बीमारी फैल जाती। इसीलिए अंदर भी लकड़ी [संगीत] की दीवारें बनाई गई। मजबूत लेकिन इतनी नहीं कि जहाज पर ज्यादा वजन पड़े। अब जहाज बाहर से भी तैयार था और अंदर से भी धीरे-धीरे आकार ले रहा था। और कहानी
अब उस मोड़ पर पहुंच रही थी जहां सिर्फ लकड़ी और मेहनत नहीं बल्कि ईश्वर की शक्ति साफ दिखाई देने वाली थी। अब जहाज बाहर से मजबूत हो चुका था और अंदर की दीवारें भी बन चुकी थी। लेकिन नूह जानता था कि असली मुश्किल अभी बाकी है क्योंकि जहाज सिर्फ लकड़ी का [संगीत] ढांचा नहीं था। उसे जिंदा प्राणियों का घर बनना था। परमेश्वर ने साफ कहा था जहाज के अंदर अलग-अलग हिस्से बनाओ। मतलब यह कोई खुला हॉल नहीं था। अंदर छोटे-छोटे हिस्से होने थे ताकि हर जानवर अपनी जगह पर रहे। अगर ऐसा नहीं होता तो अंदर
पूरा हंगामा मच जाता। नूह ने बहुत समझदारी से काम किया। सबसे नीचे वाली मंजिल पर भारी जानवरों के लिए जगह [संगीत] बनाई गई। जैसे बड़े जानवर जो ज्यादा वजन वाले थे। इससे जहाज का संतुलन नीचे की तरफ बना रहता। बीच वाली मंजिल पर मध्यम आकार के जानवर रखे गए, जो ना बहुत भारी थे, ना बहुत हल्के, और सबसे ऊपर वाली मंजिल पर छोटे जानवर और पक्षी। वहां हवा भी ज्यादा मिल सकती थी। यह सब किसी किताब में लिखा नहीं है, लेकिन यह एकदम तर्कसंगत है। इतना बड़ा जहाज बिना योजना के नहीं चल सकता था। हर
हिस्से के बीच लकड़ी की दीवारें थी। यह दीवारें इतनी मजबूत थी कि जानवर बाहर ना निकल सके। लेकिन इतनी भारी भी नहीं कि जहाज पर ज्यादा वजन पड़े। फिर आया एक और जरूरी सवाल, हवा का रास्ता। [संगीत] इतने सारे जानवर, बंद जहाज महीनों तक अगर हवा का सही इंतजाम ना होता, तो अंदर रहना नामुमकिन हो जाता। बाइबल बताती है कि ऊपर की तरफ [संगीत] एक लंबी सी खिड़की बनाई गई थी जो छत के नीचे थी। इससे ताजी हवा अंदर आ सकती थी लेकिन बारिश का पानी नहीं। इसके अलावा अंदर भी ऐसे रास्ते बनाए गए होंगे
जहां से हवा घूम सके वरना जानवरों से निकलने वाली गैसें बहुत खतरनाक हो सकती थी। अब बात आती है खाने पीने की। परमेश्वर ने नूह से कहा था अपने लिए और जानवरों के लिए खाने का इंतजाम करो। [संगीत] सोचिए जरा सैकड़ों जानवर महीनों तक कितना सारा खाना चाहिए होगा। सूखी घास, अनाज, फल, जड़े सब कुछ जमा किया गया। पानी भी बड़े-बड़े बर्तनों में रखा गया। जहाज के अंदर कुछ हिस्से सिर्फ खाने के लिए थे। सब कुछ सही जगह रखा गया ताकि नमी से खराब ना हो। नूह का जहाज अब एक जहाज नहीं रहा था। वह
एक चलता फिरता शहर बन चुका था। लेकिन अब सबसे अहम हिस्सा बचा था दरवाजा। [संगीत] इतना बड़ा जहाज और सिर्फ एक ही दरवाजा। वही दरवाजा सबसे कमजोर भी हो सकता था और सबसे अहम भी। बाइबल में साफ लिखा है जहाज के एक तरफ दरवाजा बनाओ। इस दरवाजे को बनाना आसान नहीं था। इतना बड़ा छेद अगर ठीक से मजबूत ना किया जाए तो पूरी दीवार कमजोर हो सकती थी। इसलिए दरवाजे के चारों तरफ मोटी लकड़ियां लगाई गई। अंदर से तिरछी बीमे लगाई गई ताकि दबाव बराबर बढ़ जाए। उस समय लोहे के बड़े किवाड़ नहीं थे। इसलिए
दरवाजा शायद लकड़ी के मजबूत खंभे पर घूमता होगा। उसे खोलना बंद करना आसान नहीं था लेकिन वह टिकाऊ था और इस दरवाजे का एक गहरा मतलब भी था। नूह ने दरवाजा बनाया लेकिन बाइबल कहती है दरवाजा प्रभु ने बंद किया मतलब इंसान मेहनत करता है। लेकिन आखिरी सुरक्षा परमेश्वर [संगीत] के हाथ में होती है। दरवाजा बंद होने से पहले नूह ने पूरा जहाज [संगीत] एक बार फिर देखा। कहीं से पानी रिस तो नहीं रहा। कोई जोर ढीला तो नहीं? खाना ठीक से रखा है या नहीं? इतने [संगीत] बड़े लकड़ी के ढांचे में आवाजें आती हैं।
कहीं चरमराहट, कहीं दबाव। [संगीत] नूह समझ सकता था कि सब ठीक है या नहीं। और फिर कुछ ऐसा हुआ जो किसी इंसान ने कभी नहीं देखा था। जानवर खुद चलकर आने लगे। नूह ने उन्हें पकड़ कर नहीं लाया। उन्हें [संगीत] भगा कर नहीं लाया। वे खुद आए। जंगल से जोड़े में निकलते जानवर। पक्षी उड़कर आकर बैठते। रेंगने वाले जीव सीधी [संगीत] दिशा में चलते। कोई लड़ाई नहीं, कोई डर नहीं, कोई अफरातफरी नहीं। शिकारी और शिकार एक साथ चल [संगीत] रहे थे। जैसे कोई अदृश्य ताकत उन्हें रास्ता दिखा रही हो। यह साफ संकेत [संगीत] था कि
यह सिर्फ इंसानी काम नहीं था। यह परमेश्वर की योजना थी। एक-एक करके [संगीत] सब जानवर अंदर गए अपनी-अपनी जगह पर। जैसे उन्हें पहले से पता हो कि कहां जाना [संगीत] है। आखिर में नूह गया। उसकी पत्नी, उसके तीन बेटे और उनकी पत्नियां। कुल आठ लोग और फिर दरवाजा बंद हो गया। लेकिन उसे बंद इंसान ने नहीं किया। परमेश्वर ने किया। अब बाहर की दुनिया और अंदर की दुनिया अलग हो चुकी थी। अंदर इंतजार। बाहर कुछ ऐसा जो इतिहास में कभी नहीं हुआ था। दरवाजा बंद हो चुका था और यह कोई आम दरवाजा नहीं था। यह
वही दरवाजा था जिसे नूह ने बनाया था। लेकिन बंद खुद परमेश्वर ने किया था। जहाज के अंदर एक अलग ही माहौल था। बाहर की दुनिया अभी भी वैसी ही लग रही थी जैसी हमेशा रहती थी। लोग अपने काम में लगे होंगे। शायद कुछ अब भी हंस रहे होंगे। शायद कुछ सोच रहे होंगे कि [संगीत] नूह सही तो नहीं था लेकिन अंदर सब कुछ तैयार था। जानवर अपनी-अपनी जगह पर थे। खाना जमा था। जहाज मजबूत था और नूह का परिवार चुपचाप इंतजार कर रहा था। फिर अचानक सब कुछ बदल गया। बाइबल बताती है कि नूह [संगीत]
की जिंदगी के 600वें साल में कुछ ऐसा हुआ जो दुनिया ने पहले कभी [संगीत] नहीं देखा था। धरती के अंदर से पानी फूट पड़ा। यह सिर्फ ऊपर से गिरने वाला पानी नहीं था। जमीन के नीचे से जोरदार दबाव के साथ पानी बाहर आने लगा। जमीन हिलने लगी जैसे धरती खुद टूट रही हो। नूह और उसका परिवार जहाज के अंदर यह सब महसूस कर रहे थे। जहाज हिल रहा था। लकड़ी चरमरा रही थी। नीचे से जमीन के हिलने की आवाजें आ रही थी और फिर आसमान खुल गया। यह इतिहास की पहली बारिश थी और यह कोई
हल्की फुहार नहीं थी। भारी-भारी बूंदे लकड़ी पर जोर से गिरने लगी। आवाज इतनी तेज थी कि बात करना मुश्किल हो गया। [संगीत] गरज, बिजली, अंधेरा सब कुछ एक साथ। जो लोग बाहर थे उन्होंने ऐसा कभी नहीं देखा था। पानी ऊपर से गिर [संगीत] रहा था। नीचे से भी उठ रहा था। पानी बढ़ता गया धीरे-धीरे फिर तेजी से। जहाज जो सालों से जमीन पर खड़ा था, अब पहली बार हिलने लगा। फिर एक पल आया जब वह जमीन से उठ गया। जहाज तैरने लगा। नूह और उसके परिवार के लिए यह डरावना भी था और अद्भुत भी। लकड़ी
हिल [संगीत] रही थी। फर्श कांप रहा था। जहाज पानी पर झूल रहा था। वही जहाज जिसे लोग मजाक समझते थे। अब जिंदगी बचाने वाला था। जहाज के अंदर अब एक नई दिनचर्या शुरू हो गई। हर दिन जानवरों को खाना देना, पानी देना, उनके हिस्सों को साफ करना यह आसान काम नहीं था। जानवरों की आवाजें, [संगीत] उनकी गंध, थकान सब कुछ सहना पड़ता था। लेकिन नूह और उसका परिवार जानते थे कि [संगीत] यही उनकी जिम्मेदारी है। बाहर क्या हो रहा था वे देख नहीं सकते थे। लेकिन वे महसूस कर सकते थे। [संगीत] पानी लगातार बढ़ रहा
था। जहाज ऊपर उठता जा रहा था। कभी दाएं झुकता कभी बाएं। बाइबल कहती है कि पानी इतना बढ़ गया कि पहाड़ तक डूब गए। पुरानी दुनिया, शहर, पेड़ मैदान सब खत्म हो गया। अंदर जहाज में एक अजीब सा सन्नाटा था। बाहर पूरी दुनिया मर रही थी। अंदर जिंदगी बची हुई थी। बारिश 40 दिन और 40 रात तक होती रही। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। बारिश रुक गई लेकिन पानी फिर भी कम नहीं हुआ। 150 दिन तक पानी धरती पर छाया रहा। जहाज बहता रहा। कहीं कोई दिशा नहीं, [संगीत] कोई पतवार नहीं, कोई नियंत्रण नहीं।
लेकिन नूह जानता था यह जहाज इंसानों के हाथ में नहीं। परमेश्वर के हाथ में है। हर दिन वही काम, हर दिन वही इंतजार। और फिर बहुत लंबे समय के बाद बाइबल में एक बहुत खूबसूरत लाइन आती है और परमेश्वर ने नूह को याद किया। मतलब परमेश्वर ने नूह को छोड़ा नहीं था। सब कुछ योजना के मुताबिक था। एक हवा चली। पानी धीरे-धीरे कम होने लगा। दिन बीतते गए। महीने बीतते गए और फिर एक दिन जहाज रुका। वह किसी चीज से टकराया नहीं। वह [संगीत] धीरे से टिक गया। बाइबल बताती है कि जहाज अरारात के पहाड़ों
पर आकर ठहर गया। नूह ने ऊपर की खिड़की खोली। कई महीनों बाद ताजी हवा अंदर आई, रोशनी आई। लेकिन बाहर की जमीन कैसी है, यह अभी साफ नहीं था। इसलिए नूह ने एक कुआं छोड़ा। वह उड़ता रहा, लौट कर नहीं आया। फिर नूह ने एक कबूतर छोड़ा। वह लौट आया। उसे बैठने की जगह [संगीत] नहीं मिली थी। कुछ दिन बाद नूह ने फिर कबूतर छोड़ा। इस बार वह एक जैतून की पत्ती लेकर लौटा। यह एक छोटा सा संकेत था। लेकिन बहुत बड़ा मतलब रखता था। जिंदगी वापस [संगीत] आ रही थी। कबूतर के मुंह में जैतून
की पत्ती देखकर नूह समझ गया था। धरती धीरे-धीरे ठीक हो रही है। फिर भी वह जल्दी नहीं करता। क्योंकि नूह जानता था जिस परमेश्वर ने अंदर आने को कहा था, वही बाहर आने का सही समय भी बताएगा। कुछ दिन बाद नूह ने कबूतर को तीसरी बार छोड़ा। इस बार वह वापस नहीं आया। इसका मतलब साफ था अब बाहर रहने की जगह बन चुकी है। लेकिन फिर [संगीत] भी नूह इंतजार करता है। क्यों? क्योंकि दरवाजा उसने नहीं बंद किया था। परमेश्वर ने किया था और अब वही परमेश्वर बोले। बाइबल बताती है कि परमेश्वर ने नूह से
कहा, तू तेरी पत्नी, तेरे बेटे और उनकी पत्नियां। सब जहाज से बाहर आ जाओ। वह पल कैसा रहा होगा सोचिए जरा। लगभग एक साल से ज्यादा समय [संगीत] जहाज के अंदर। अंधेरा बंद जगह जानवरों की आवाजें और अब दरवाजा खुल रहा है। तेज रोशनी अंदर आती है। ताजी हवा का झोंका, नमी भरी मिट्टी की खुशबू। दरवाजा जिसे परमेश्वर ने बंद किया था। अब खुल चुका था। सबसे पहले जानवर बाहर आने लगे। एक-एक करके जोड़े में कोई भागदौड़ नहीं, कोई [संगीत] डर नहीं। वे अपनी फितरत के हिसाब से अलग-अलग दिशाओं में चले गए। जंगल की तरफ,
मैदानों की [संगीत] तरफ, नई दुनिया की तरफ। फिर नूह बाहर आया। उसके पीछे उसका परिवार। पहली बार उन्होंने जमीन को दोबारा छुआ। ठोस जमीन, चारों तरफ सन्नाटा था। कोई शहर नहीं, कोई शोर नहीं, कोई पुरानी [संगीत] दुनिया नहीं, सब कुछ नया था। और इस नई शुरुआत में नूह ने सबसे पहला काम क्या किया? घर नहीं बनाया, खेत नहीं जोता, उसने वेदी ऑल्टर बनाई। नूह ने परमेश्वर के लिए बलि चढ़ाई। यह उसका धन्यवाद था। यह उसका भरोसा था। यह उसकी श्रद्धा थी। [संगीत] बाइबल बताती है कि परमेश्वर इस बलि से प्रसन्न हुए। और फिर परमेश्वर ने
एक बहुत बड़ा वादा किया। मैं फिर कभी पूरी धरती [संगीत] को पानी से नष्ट नहीं करूंगा। यह सिर्फ नूह से नहीं कहा गया था। यह वादा पूरी मानवता के लिए था। और इस वादे की निशानी के रूप [संगीत] में परमेश्वर ने आकाश में एक चिन्ह रखा इंद्रधनुष। जब भी बारिश के बाद इंद्रधनुष दिखाई देता है, वह यही याद दिलाता है कि परमेश्वर न्याय भी करता है, लेकिन वह दया भी करता है। जहाज अब अपना काम पूरा कर चुका था। वह सिर्फ लकड़ी का ढांचा नहीं था। वह विश्वास की मिसाल था। वह आज्ञा मानने की कहानी
था। वह [संगीत] बचाव का साधन था। उस एक जहाज से नई मानवता की शुरुआत हुई। नूह के बेटों से आगे चलकर देश बने, जातियां बनी, [संगीत] दुनिया फिर से भरी। लेकिन जहाज की कहानी वहीं खत्म नहीं होती। वह आज भी हमें यह सिखाती है कि जब परमेश्वर कुछ कहे और दुनिया हंसे तो दुनिया की हंसी से ज्यादा परमेश्वर की बात पर भरोसा जरूरी है। क्योंकि जब समय आता है तो वही भरोसा जिंदगी बचाता है। जहाज सिर्फ पानी में नहीं तैरा था। वह विश्वास पर टिका था और यही वजह है कि हजारों साल बाद भी नूह
और उसका जहाज आज [संगीत] भी याद किया जाता है क्योंकि जिसने परमेश्वर की सुनी वही बचा।