अमीर तैमूर ना तो किसी बादशाह का बेटा था और ना ही किसी जंगजू का वह तुर्क नयादी डेक्सस था वो एक हाथ में तलवार और दूसरे हाथ में कुल्हाड़ी वक्त लड़ने का भी माहिर था इर्दगिर्द के तमाम इलाके उसके नाम से लरज रहने लगे और हर हुक्मरान बेचैन होकर यही सोचता रहता उसकी बारी कब आने वाली है वो मुसलमान होने के बावजूद खरेजी और सफ फाकी में चंगेज खान और हलाकू खान से कम नहीं था व इंतकाम की शिद्दत में शहर के शहर तबाह बर्बाद कर देता [संगीत] था वीएलसी पॉडकास्ट डॉक्टर नासिर बेग के साथ
आपकी खिदमत में हाजिर हैं दुनिया की तारीख ऐसे कई सफा हुक्मरानों से भरी पड़ी है जिन्होंने अपनी ताकत और इक्त के बलबूते पर लाखों इंसानों का खून बहाया बस्तियां ताराज की और अपने इक्तादार की तवाल और दबाम के लिए वह कुछ कर गुजरे जो इंसानियत तो क्या हैवानियत के लिए भी बाय से शर्म होगा किसी ने अपनी जात किसी ने मजहब के नाम पर और किसी ने कौम के नाम पर इंसानी खून से होलियां खेली शहनशाह और बादशाहों ने अपना सिक्का मनवाने के लिए मजबूर और मकू रिया का खून भी बहाया और उनकी इंसानियत सोज
तजल भी की आज भी इंसानियत इनके नाम से लरज है वह अटला द हन हो चंगेज खान हो सिकंदर आजम हो हलाकू खान हो रोमन अंपायर हो या ईरानी बादशाह उस्मानी एंपायर हो या यूरोपियन किंग्स मुतलुलुक समरान हो या मशा वती काबीना हों के हामिद सभी एक ही कबी से ताल्लुक रखते थे इन्हीं में से एक तैमूर भी था अमीर तैमूर जिसे लोग तैमूर लंग के नाम से भी जानते हैं लंग इसलिए क्योंकि यह कदर लंगड़ा के चलता था और जंगो के दौरान जख्मी होने पर इसके एक बाजू में भी कमजोरी थी तैमूर लंग की
फतुहा और उसके इक्दर्म ना ही किसी जंगजू का वह तुर्क नयादिगंता वह समरकंद में कीश के करीब एक गांव दरिया जीहू के शुमाली किनारे पर वाके एक छोटे से शहर में पैदा हुआ उसका बाप एक आम शख्स था और उसके वालदैन मामूली दर्जे के जमीदार थे और उसकी पैदाइश सन 136 30 ईसवी में हुई तैमूर की परवरिश भी आम माहौल में हुई लेकिन जब उसे मदरसे में डाला गया तो उसकी जहान फुर्ती हाजिर दिमागी और हाजिर जवाबी और गुस्सा देखते हुए उसके उस्ताद अली बेग ने उसके बाप पर वाज किया कि तुम्हारा यह बच्चा कोई
मामूली या आम बच्चा नहीं है यह गैर मामूली सलाहियत का हामिद जानो यह ना सिर्फ जहीन और दूसरे बच्चों से बहुत आगे है बल्कि इस पर ना काबिले यकीन सलाहियत हैं तैमूर ने सिर्फ 10 साल की उम्र में कुरान हिफ कर लिया था तैमूर एक तुर्क मंगोल कबीले बरलास से ताल्लुक रखता था चंगेज खान और तैमूर लंग दोनों का जद्दे अमजद तोमना खान था तैमूर लंग का ताल्लुक समरकंद से था तैमूर बड़ा हुआ तो उसने महसूस करना शुरू कर दिया कि यह माहौल यह शहर यह जिंदगी उसके लिए नहीं बल्कि वह दुनिया पर हुक्मरान करने
के लिए पैदा हुआ है उसने अपने शहर के इर्दगिर्द नजर दौड़ाई दोस्तिगिरी शुरू कर दी इसे हर चढ़ाई पर कामयाबी मिली जिससे उसका हौसला और बुलंद हुआ वह जहां भी हमला करता तो पहले बुलंद आवाज में नारा लगाता कि मैं हूं तैमूर वैसे उसका यह इलाका उस वक्त चुकता सल्तनत में शामिल तो था जो जवाल पजीर थी चुकता हुक्मरान बेबस हो चुके थे और हर जगह मंगोल और तुर्क सरदार इदार हासिल करने के लिए एक दूसरे से लड़ रहे थे तैमूर को इस सूरते हाल का इदराक हो चुका था उसने बाकायदा फौजी ट्रेनिंग हासिल कर
रखी थी तैमूर की एक खास बात यह थी कि वह एक वक्त में अपने दोनों हाथों से काम ले सकता था यानी कि एमबी डेक्ट से था वो एक हाथ में तलवार और दूसरे हाथ में कुल्हाड़ी एक वक्त लड़ने का भी माहिर था और ऐसा बेरहम कि उसके सामने जो कोई भी आ गया उसने या तलवार के वार से या कुल्हाड़ी उसकी ताकत बढ़ती रही और वह तुर्किस्तान और मौजूदा अफगानिस्तान के बड़े हिस्से पर काबिज होने लगा इसके बाद सन 1366 में बल्क में अपनी हुकूमत कायम करके तख्त नशीन हो गया तख्त नशीन होने के
बाद उसने साहिबे कुरान का लकब इख्तियार किया इल्म नजूम की रूह से साहिबे कुरान वो शख्स कहलाता है जिसकी पैदाइश के वक्त जोहरा और मुश्तरी या जोहल और मुश्तरी एक ही बुर्ज में हो ऐसा शख्स इकबाल मंद बहादुर और जरी समझा जाता है जिसकी पैदाइश पर नजूमी यह खुशखबरी देते हैं कि यह बच्चा बड़ा होकर अपने दौर का अजीम तरीन हुक्मरान बनेगा बल्क में तखत नशीन होने के बाद तैमूर ने उन तमाम इलाकों और मुल्कों पर कब्जा करना अपना हक और मकसद करार दे दिया जिन पर किसी जमाने में चंगेज खान या अब उसकी औलाद
हुकूमत करती थी वह एक अजीम जंगजू हुक्मरान साबित हुआ तख्त नशीन के बाद इस गर्ज से उसने अपनी फतुहा और लश्कर कशी के ऐसे सिलसिले का आगाज किया जो उसकी मौत तक जारी रहा तैमूर की तख्त नशीन के बाद इब्तिदा चंद साल चुख पाई सल्तनत के बा मानदा हिस्सों पर कब्जा करने में सर्फ हो गए अपनी तैमूरी सल्तनत मजीद वसी करने के गर्ज से उसने काशगर और ख्वार जम पर कब्जा कर लिया इसके बाद उसने खुरासान का रुख किया हिरात के खानदान कर्त को अपनी अतात पर मजबूर किया अगले साल निशापुर और उसके गिर्द नवा
और फिर कंधार और सी स्तान पर कब्जा कर लिया हवस इक्तादार बढ़ती रही अमीर तैमूर चाहता था कि पूरे सेंट्रल एशिया पर उसकी हुकूमत बन जाए और इसकी तैमूरी सल्तनत की जोग्राफिया हद चीन बगदाद शाम तुर्की और यूरोप तक फैल जाए मगर बाज इलाकों के हुक्मरानों के साथ ताल्लुकात की बिना पर वह रुका रहा वह एक चालाक और बा महारत सिपाही और बेमिस सिपाह सालार था उसकी सल्तनत पर सराय के खान तोक मश ने बारहा हमले भी किए मगर उसे हर बार नाकामी हुई माजी में सराय के खान तोक कमश को साइबेरिया के हुक्मरान अरस
खान ने तख्त से बेदखल कर दिया था तैमूर ने तोक दश की मदद की और उसको दोबारा तख्त दिलाया लेकिन तोक मश ख्वार जम को अपनी सल्तनत का एक हिस्सा समझता था इसलिए उसने तैमूर का एहसान मानने की बजाय तैमूर से ख्वार जम की वापसी का मुतालबा कर दिया खार जम दोनों हुक्मरान के दरमियान एक मुस्तकिल तनाजा बन गया और उसको हासिल करने के लिए तोक कश बार-बार तैमूरी मुमल कत पर हमलावर भी होता रहा कभी सीर दरिया और खार जम के रास्ते और कभी कफकाज और अजरबैजान के रास्ते तैमूर ने तोक मश की सरको
बी के लिए दो मर्तबा रूस पर लश्कर कशी भी की इनमें पहली लश्कर कशी 1391 में सीर दरिया यानी दरिया ए सिहू के रास्ते की गई त अपने अजीम लश्कर को काज किस्तान के रास्ते जनूबी अरत और यूराल तक बे आबो गया मैदानों और बर्फ जारों से कामयाबी से गुजार कर ले गया और दरिया कुंजा के किनारे मौजूदा समारा के करीब 18 अप्रैल 1391 को तोक तमस को एक खू रेज जंग में शिकस्त दे दी और रूस का एक बड़ा हिस्सा फतह कर लिया रूस की मुहिम से वापसी पर अब उसकी नजरें ईरान पर थी
कुछ तवक और फिर भरपूर तैयारी के बाद उसने ईरान की की मुहिम का आगाज कर दिया जो योर सेे पंच साला कहलाती है इस मुहिम के दौरान उसे गैर मुत वक्के कामयाबी मिली और वह माजन दन और अजरबैजान तक पूरे शुमाली ईरान पर काबिज हो गया इसी मुहिम के दौरान उसने गर्ज स्तान पर भी कब्जा कर लिया इस मुहिम के दौरान उसने हमदान इस्फहन और शीराज भी फतह किए आले मुजफ्फर की हुकूमत का खात्मा किया और बगदाद और इराक से अहमद जलाइफ किया इस तरह वह पूरे ईरान और इराक पर काबिज हो गया इन मुहिम
मात के दौरान उसने लाखों इंसानों को मौत के घाट उतारा और खौफ की अलामत बन गया इर्दगिर्द के तमाम इलाके उसके नाम से लरज रहने लगे और हर हुक्मरान बेचैन होकर यही सोचता रहता कि उसकी बारी कब आने वाली है ईरान की मुहिम से फारिग होकर तबरेज वापस पहुंचने पर उसे इत्तला मिली कि त खान ने एक बार फिर हमला कर दिया है और यह हमला उसने दरबंद के रास्ते पर किया है तैमूर ने दरिया ए तबक के किनारे 18 अप्रैल 1395 को तोक तमस को एक और शिकस्त दी जो उसकी शिकस्त फास्ट साबित हुई
इसके बाद तैमूर ने पेश कदमी करके सीर और दह के दारुल हुकूमत सराय को तबाह बर्बाद कर दिया और उसकी ईंट से ईंट बजा दी लाखों अफराद को मौत के घाट उतार दिया इस मुहिम के दौरान तैमूर अस्तरा खान मॉस्को कीफ और क्रीमिया के शहरों को फतह करता और तबाही फैलाता बराता कफकाज गर्ज स्तान और तबरेज समरकंद वापस आ गया इसके बाद तैमूर हिंदुस्तान को फतह करने के इरादे से रवाना हो गया मुल्तान और दीपालपुर से होता हुआ दिसंबर 1398 में दिली पहुंचा दिल्ली को फतह करने और वहां कत्लेआम करने के बाद वह मीर ठ
गया और वहां दरिया ए जमुना की बालाईजीरिया में लोगों को यह समझकर कत्लेआम किया कि काफिरों को मारकर सवाब कमाया जा रहा है इस जगह तैमूर को अपनी सल्तनत की मगरिब सरहदों से तश्वी श नाक खबरें मिली अहमद जलाइन मिस्र की मदद से फिर बगदाद वापस आ गया था और उसके और कुर्र यूसुफ तुर्कमान के बरगलाने से उस्मानी सुल्तान बायजीद यल दरम उन सबके साथ मिलकर तैमूर के खिलाफ महाज बना रहा था चुनांचे तैमूर फौरन समरकंद वापस आ गया 1399 में तैमूर समरकंद से अपनी आखिरी और तवील तरीन मुहिम पर रवाना हुआ तबरेज पहुंचकर उसने
सुल्तान मिस्र के पास सफीर भेजा जिसको कत्ल कर दिया गया खबर सुनते ही तैमूर सुल्तान मिस्र की सरको बी के लिए रवाना हुआ जो अहमद और हौसला अफजाई करता था हलब हमामा हमस और बाल बक को फतह करता हुआ दमिश्क पहुंचा और हसबे दस्तूर लोगों का कत्ल आम किया और शहर में आग लगा दी इसके बाद वो बगदाद आया लेकिन अहमद जलायज्ञम तैमूरी इलाकों पर हमला कर दिया तैमूर ने पहले पहल तो इख्तिलाफ को खत किताबत के जरिए हल करना चाहा लेकिन जब उसमें कामयाबी ना हुई तो उसने सल्तनत उस्मानिया पर लश्कर कशी कर दी
सिरस का दिफाई को जिंदा दफन कर दिया गया बायजीद उस वक्त कुस्त दुनिया इस्तांबुल के मुहास में मसरूफ था और बाज रिवायत यह कहती हैं कि वह बाल्कन की तरफ पेश कदमी कर रहा था तैमूर के हमले की इत्तला मिली तो मुहास उठाकर फौरन अना तोलिया की तरफ भागा अनक के करीब 21 जुलाई 1402 को दोनों के दरमियान फैसला कुन जंग हुई जो जंगे अनक के नाम से भी मशहूर है बायजीद को शिकस्त फाश हुई और वह गिरफ्तार कर लिया गया अब यहां पर दो मुख्तलिफ रिवायत हैं एक रिवायत ये कहती है कि तैमूर ने
उसके साथ इज्जत एहतराम का सुलूक किया दूसरी रिवायत बहुत भयानक है उसके मुताबिक तैमूर ने एक बहुत बड़ा पिंजरा तामीर करवाया और बायजीद यल दरम को उस पिंजरे में कैद कर लिया उसके बाद तैमूर जब भी दरबार लगाता बायजीद यल दरम को उस पिंजरे में कैद अपने दरबार में हाजिर रखता और जो भी हाजरी उसके दरबार में मौजूद होते वह बायजीद यल दरम को एक जानवर की तरह एक पिंजरे में कैद देखते तो उन पर हैबत तारी हो जाती तैमूर ने इमीर तक सारा एशियाई कचक उजाड़ डाला मिस्र के ममलुक सुल्तान को जब इत्तला मिली
कि तैमूर ने बायजीद जैसे ताकतवर हुक्मरान को शिकस्त देकर गिरफ्तार कर लिया है तो सफीर भेजकर तैमूर की अतात कबूल कर ली मिस्र में तैमूर के नाम का सिक्का ढाला और मक्का और मदीना में उसके नाम का खुतबा पढ़ने का हुक्म दे दिया समरकंद वापस आने के बाद तैमूर ने अब अपनी देरी ख्वाहिश की तकल के लिए चीन पर हमले की तैयारियां शुरू कर दी चूंकि चीन भी एक जमाने में चंगेज खान की औलाद के कब्जे में रह चुका था इसलिए तैमूर उस पर भी अपना हक समझता था इसके अलावा तैमूर कुफा ने चीन के
खिलाफ जिहाद करके इस खूंरेजा फी करना चाहता था जिसका शिकार अब सिर्फ मुसलमान हुए थे सर्दियां शबाब पर थी और तैमूर बूढ़ा हो चुका था मुंब सीर दरिया को पार करके जब वह अतरा पहुंचा तो उसकी तबीयत अचानक बिगड़ गई और इसी जगह 18 फरवरी 1405 ईसवी को उसका इंतकाल हो गया उसकी लाश समरकंद लाकर दफना गई यूरोपियन लोग अमीर तैमूर से इतने वाकिफ इसलिए नहीं है कि वह यूरोपियन नहीं था वह उसकी निस्बत तारीखी तबार से रिचर्ड दी ग्रेट अलेक्जेंडर द ग्रेट इन सबको ज्यादा अहमियत देते हैं और उनसे ज्यादा वाकफ रखते हैं ताहम
हाद की वसत के लिहाज से तैमूर का शुमार सिकंदर आजम और चंगेज खान के साथ दुनिया के तीन सबसे बड़े पाते सिपे सालार में होता है फतुहा की कसरत में वो शायद चंगेज से भी बाजी ले गया चंगेज के मफत इलाकों का तूल मशरिक से मगरिब तक बहुत ज्यादा था लेकिन शुमाल जनूब अर्ज तैमूर के मुकाबले में कम था फिर चंगेज की सल्तनत का एक बड़ा हिस्सा उसके सिपे सालार के जरिए फतह हुआ जबकि तैमूर दिल्ली से अजमीर तक और मॉस्को से दमिश्क और शिराज तक हर जगह खुद गया और हर जंग में खुद शिरकत
की चंगेज जंग की मंसूबा बंदी अच्छी कर सकता था जबकि तैमूर मैदाने जंग में फौजों को लड़ाने में उस्ताद था 1393 में कलात और तकरी के नाकाबंदी जाती है ब हैसियत एक सिपा सालार तैमूर की हैरत अंगेज सलाहियत से इंकार नहीं किया जा सकता लेकिन उसने अपनी इस खुदादाद सलाहियत से जो काम लिया वह इस्लामी रूह के मनाफी थी उसकी सारी फतुहा का मकसद जाती शोहरत और नामरी के अलावा और कुछ नहीं था इस लिहाज से वो खालिद बिन वलीद महमूद गजनवी तुगर और सलाहुद्दीन अयूबी के मुकाबले में पेश नहीं किया जा सकता वोह इंतकाम
के मामले में बहुत सख्त था मुखालफत बर्दाश्त नहीं कर सकता था वो मुसलमान होने के बावजूद खू रेजी और सफा की में चंगेज खान और हलाकू खान से कम नहीं था देहली इस्फहन बगदाद और दमिश्क में उसने जो कत्लेआम किए उनमें हजारों बेगुनाह मौत के घाट उतार दिए गए वह इंतकाम की शिद्दत में शहर के शहर तबाह और बर्बाद कर देता था खार जम बगदाद और सराय के साथ उसने यही किया सिर्फ मस्जिद मदरसे और खानकाह गारत गरी से महफूज रहती थी हकीकत यह है कि इस मामले में मंगोलों की तरह वो भी अल्लाह का
अजाब ही था बाज मुखन के मुताबिक तैमूर ने अपनी फतुहा से कोई फायदा नहीं उठाया और कोई तामीरी काम नहीं किया मफत मुमा का बड़ा हिस्सा ऐसा था जिसे उसने अपनी सल्तनत का इंतजा हिस्सा बनाया ही नहीं इन मुल्कों को वह मकामी हुक्मरानों के सुपुर्द कर देता था और उनसे सिर्फ अतात का वादा लेकर मुतमइन हो जाता था इसका नतीजा यह हुआ कि एशियाई कचक शाम रूस और हिंदुस्तान के वसी मफत इलाके जो बड़ी खूंरेजा हासिल हुए थे तैमूरी सल्तनत का हिस्सा ना बन सके अगर वो इन मुल्कों को अपनी सल्तनत का इंतजाम हिस्सा बना
लेता तो दुनिया की एक अजमु शन सल्तनत वजूद में आ सकती थी इस मामले में चंगेज और मंगोल तैमूर से बहुत बेहतर थे कि वो जिस इलाके को फतह करते थे उसे बराह रास्त अपने जेर इंतजाम भी ले आते थे उसने कफकाज के इलाके में लोगों को जबरदस्ती मुसलमान बनाने की कोशिश भी की जो इस्लाम की रूह और तालीम के मुनाफ था तैमूर ने तोक तश्य जीद यल दरम और सुल्तान मिस्र को शिकस्त देकर आलम इस्लाम की दो बड़ी ताकतों को खत्म तो कर दिया लेकिन उनकी वजह से जो खला पैदा हुआ उसे पुर ना
कर सका अगर बायजीद की ताकत खत्म ना होती तो वो बालकान का इलाका 150 साल पहले ही मुसलमानों के कब्जे में कर चुका होता सराय की ममल कत की तबाही भी इस्लामी दुनिया के लिए अच्छी साबित ना हुई सराय की ताकतवर ममल कत के खत्म होने से मॉस्को की नई ताकत उभरने के लिए रास्ता साफ हो चुका था तैमूर ने रूस में तोक तमस के खिलाफ और एशियाई कचक और मिस्र में सल्तनत उस्मानिया और ममल कों के खिलाफ जो लश्कर कशी की अगरचे हम उसका इल्जाम तैमूर को देते हैं लेकिन बहरहाल उसने अपनी तरफ से
एक कोशिश सुलह की जरूर की अब मालूम नहीं कि यह तारीख कहां तक दुरुस्त है और कहां तक नहीं लेकिन इन लश्कर कशि हों के नतीजे में दुनियाए इस्लाम को जो नुकसान पहुंचा उससे इंकार नहीं किया जा सकता अपने सफाकदल तारीख में एक बदमा धब्बे के तौर पर ही जाना जाता है लेकिन अमीर तैमूर ने समरकंद में बहुत काम किया पूरी दुनिया जहान से आलिम को सनाओ को अ बड़े-बड़े फनकार को इस तरह के लोग जो कि इल्म ऑफ फन और उस वक्त के बड़े-बड़े लोग समझे जाते थे उनको समरकंद में बुलाया गया समरकंद की
जो आर्किटेक्चर था जो वहां पर स्ट्रक्चर्स थे उन पर काम किया गया कले तामीर किए गए फसील बनाई गई और खूबसूरत तरीन शहरों में से एक बना दिया गया और सिर्फ अमीर तैमूर ने ही नहीं उसके वारिसों में से मोहम्मद सुल्तान मिर्जा अलक बेग मिर्जा और दूसरों ने भी समर कंद में कई इमारतें बनवाई और उसके तजन और अराइश में बहुत इजाफा किया बहरहाल तारीख तैमूर को तैमूर लंग और एक सफक और जालिम जंगजू हुक्मरान के तौर पर ही याद करती है उम्मीद है आपको आज का पॉडकास्ट पसंद आया होगा अपना बहुत ख्याल रखिएगा शुक्रिया