हर किसी के मन में यह सवाल जरूर आता होगा कि आदि योगी भगवान शिव का जन्म कैसे हुआ और उनके माता-पिता कौन थे साथ ही त्रिदेव में ब्रह्मा सृष्टि के रचयिता विष्णु पालनकर्ता और शिव संहारक माने गए हैं लेकिन इन तीनों में से सबसे शक्तिशाली देवता कौन है भगवान शिव को हमेशा हाथ में त्रिशूल गले में वासु की नाग हाथ में डमरू माथे पर अर्ध चंद्र शरीर पर भस्म और बाघ की खाल धारण किए हुए देखा जाता है लेकिन सवाल यह उठता है कि शिवजी के पास यह सभी वस्तुएं कैसे आई इनके पीछे ऐसी रहस्यमई
पौराणिक गाथाएं छिपी हैं जिन्हें जानकर आप हैरान रह जाएंगे आपने कभी सोचा है कि भगवान शिव को भांग का प्रसाद क्यों चढ़ाया जाता है आखिर इसके पीछे कौन सा रहस्य छिपा है और महाशिवरात्रि का पर्व क्यों मनाया जाता है इस वीडियो में हम आपको इन गूढ़ रहस्यों के बारे में विस्तार से बताएंगे और सबसे चौकाने वाली बात कहा जाता है कि भगवान शिव आज भी कैलाश पर्वत पर अपने परिवार के साथ निवास करते हैं लेकिन आज तक कोई भी व्यक्ति चाहे कितनी भी तकनीक क्यों ना हो कैलाश पर्वत पर नहीं चढ़ पाया ऐसा कौन सा
रहस्य है जो मानव को इस पर्वत की छोटी तक पहुंचने से रोकता है और समय आया सृष्टि के सृजन का लेकिन तब ऐसी कौन सी वजह थी कि भगवान शिव शिव को अर्धनारीश्वर रूप धारण कर ब्रह्मा जी की सहायता करनी पड़ी आखिर क्या था वह दिव्य रहस्य जो महादेव को अपने स्वरूप को दो भागों में विभाजित करने पर मजबूर कर दिया नागेंद्रहाराय त्रिलोचनाय भस्मांग रागा महेश्वराय नित्या शुद्ध दिगंबराय तस्मय नकारा नमः शिवाय अपने गले में नाग धारण करने वाले जिनके तीन नेत्र हैं जो अपने शरीर पर भभूत लगाते हैं और महादेव भगवान शिव जिन्हें राम
भी पूजते हैं और रावण भी जो अंत भी है और अनंत भी जिनकी शक्ति से जुड़ी अनेक कहानियां आज भी रहस्य हैं क्योंकि आज हम बात करने वाले हैं आदि योगी भगवान शिव के उन रहस्यों की जिन्हें बहुत कम लोग जानते [संगीत] हैं ज्योतिर्लिंगों की पूजा एक प्राचीन और शक्तिशाली विधि है और ऐसा माना जाता है कि पांच शक्तिशाली ज्योतिर्लिंगों की एक साथ पूजा करने से हर तरह की मुसीबत से छुटकारा मिलता है और अगर यह पूजा महाशिवरात्रि के समय की जाए तब तो इसका असर कई गुना ज्यादा होता है लेकिन एक ही दिन में
पांच ज्योतिर्लिंगों पहुंच पाना आसान नहीं इसलिए महाशिवरात्रि के दिव्य अवसर पर अब घर बैठे पांच ज्योतिर्लिंगों महाकालेश्वर उज्जैन काशी विश्वनाथ नाशिक त्रियंबक केश्वर नेपाल पशुपतिनाथ खंडवा ओंकारेश्वर का आशीर्वाद पा सकते हैं वामा के जरिए शिवजी के पांच ज्योतिर्लिंग में महा रुद्राभिषेक एवं शिव पूजा करवा के अनुभवी पंडित आपके नाम और गोत्र के साथ पूरे विधि विधान से पूजा करेंगे पूजा का वीडियो मोबाइल पर और प्रसाद सीधे आपके घर पहुंचेगा पहले 100 यूजर्स को मिलेगा 20 प्र का डिस्काउंट तो अभी वामा पर जाएं और पूजा बुक करें लिंक डिस्क्रिप्शन में दिया गया है भगवान शिव जो
संहारक भी हैं और सृष्टि के आधार भी जिन्हें देवाधि देव महादेव कहा जाता है जिनकी आराधना स्वयं विष्णु और ब्रह्मा भी करते हैं वे अनादि हैं अनंत हैं स्वयंभू हैं लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि भगवान शिव का जन्म कैसे हुआ और उनके माता-पिता कौन थे जब वे अनादि और स्वयंभू हैं तो फिर उनकी उत्पत्ति का रहस्य क्या है आज इस वीडियो में हम पुराणों और शास्त्रों के रहस्यमय पन्नों से भगवान शिव के जन्म की गढ़ कथा को जानेंगे जो आपको अचंभित कर देगी तो वीडियो को अंत तक जरूर देखें और कमेंट में हर
हर महादेव लिखकर अपनी भक्ति प्रकट करें शिव पुराण के अनुसार भगवान शिव स्वयंभू हैं जिसका अर्थ है कि उनका जन्म स्वयं ही हुआ था यानी इससे एक बात तो साबित होती है कि भगवान शिव के ना ही कोई पिता हैं और ना ही कोई माता वे सृष्टि से पहले भी थे और सृष्टि के अंत के बाद भी रहेंगे यही कारण है कि वे पंच तत्त्वों से भी परे हैं अमर है और काल के भी स्वामी हैं लेकिन यदि शिव जीी का जन्म नहीं हुआ तो फिर वे प्रकट कैसे हुए इसके उत्तर में विभिन्न पुराणों में
अलग-अलग कथाएं मिलती हैं विष्णु पुराण के अनुसार भगवान विष्णु के मस्तक से उत्पन्न तेज के कारण भगवान शिव प्रकट हुए कहा जाता है कि जब सृष्टि की र चना नहीं हुई थी तब संपूर्ण ब्रह्मांड जलमग्न था उस समय केवल भगवान विष्णु ही शेषनाग पर योग निद्रा में लेटे हुए थे जब उनके माथे से तेज प्रकट हुआ तो उससे भगवान शिव का जन्म हुआ इसी तरह भगवान विष्णु की नाभि से कमल प्रकट हुआ और उस कमल से ब्रह्मा जी का जन्म हुआ लेकिन शिव पुराण में इस कथा का एक दूसरा रूप मिलता है इसमें बताया गया
है कि भगवान शिव अपने घुटने मल रहे थे और उनके घुटनों से उत्पन्न महल से भगवान विष्णु का जन्म हुआ था अगर इन दोनों कथाओं की तुलना की जाए तो विष्णु पुराण और शिव पुराण की कथाएं एक दूसरे से भिन्न प्रतीत होती हैं इस कथा के अलावा भगवान शिव के जन्म से जुड़ी एक और पौराणिक कथा है जो काफी प्रसिद्ध है इसे शायद आपने अपने बड़े बुजुर्गों से सुना होगा लेकिन अगर नहीं सुना तो हम आपको बताते हैं एक बार की बात है जब भगवान विष्णु और ब्रह्मा जी के के बीच यह विवाद उत्पन्न हुआ
कि इस संपूर्ण ब्रह्मांड में सबसे महान और सर्व शक्तिशाली कौन है इस बहस के दौरान अचानक एक विशाल जलता हुआ खंभा प्रकट हुआ जिसे देखकर दोनों देवता हैरान रह गए वे यह समझ नहीं पाए कि यह दिव्य प्रकाश स्तंभ किसका रूप है तभी उस खंभे से एक दिव्य आवाज आई जो भी इस खंभे के ऊपरी सिरे और निचले सिरे का पता लगाएगा वही सबसे महान कहलाएगा यह सुनते ही ब्रह्मा जी ने हंस का रूप धारण किया और खंभे के ऊपरी सिरे की खोज में निकल पड़े जबकि विष्णु जी ने वराह का रूप लिया और खंभे
के निचले सिरे को खोजने चले गए दोनों ने बहुत प्रयास किया लेकिन अंततः उन्हें खंभे का कोई ओर छोर नहीं मिला हार मानकर दोनों वापस लौट आए तभी भगवान शिव अपने असली रूप में प्रकट हुए और तब विष्णु जी और ब्रह्मा जी को यह स्वीकार करना पड़ा कि महादेव ही सबसे महान और सर्वश्रेष्ठ है इस पूरी सृष्टि में उनसे बड़ी कोई शक्ति नहीं है शिव पुराण में इस कथा का उल्लेख किया गया है और यह बताता है कि भगवान शिव का ना तो कोई जन्म हुआ और ना ही कोई अंत होगा यही कारण है कि
उन्हें स्वयंभू कहा जाता है अर्थात वे शाश्वत और अमर हैं अब हम बात करते हैं भगवान शिव से जुड़े एक ऐसे विषय पर जो सबसे अधिक प्रसिद्ध है क्या भगवान ब्रह्मा भगवान शिव के पिता हैं यह कथा लोगों के बीच काफी चर्चित है तो चलिए जानते हैं कि भगवान शिव ने ब्रह्मपुत्र के रूप में जन्म कैसे लिया इस पौराणिक कथा का उल्लेख विष्णु पुराण में मिलता है कथा के अनुसार जब संपूर्ण ब्रह्मांड जल मग्न था धरती आकाश और पाताल सब कुछ जल में समाया हुआ था तब इस संसार में केवल भवान विष्णु ही थे वे
क्षीर सागर में अपने शेषनाग पर योग निद्रा में स्थित थे तभी भगवान विष्णु की नाभि से एक कमल प्रकट हुआ और उस कमल से ब्रह्मा जी का जन्म हुआ ब्रह्मा जी और विष्णु जी इस ब्रह्मांड की सृष्टि को लेकर चर्चा कर ही रहे थे कि अचानक भगवान शिव प्रकट हुए लेकिन जब ब्रह्मा जी ने उन्हें पहचानने से इंकार कर दिया तो भगवान शिव नाराज हो गए और अंतरध्यान हो गए भगवान विष्णु ने अपनी दिव्य दृष्टि से ब्रह्मा जी को उनकी भूल का एहसास कराया जिसके बाद ब्रह्मा जी ने भगवान शिव से क्षमा मांगी और उनसे
प्रार्थना की कि वे उनके पुत्र रूप में जन्म ले भगवान शिव ने ब्रह्मा जी की प्रार्थना स्वीकार कर ली और जब ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना प्रारंभ की तो उन्हें एक संतान की आवश्यकता महसूस हुई उसी समय भगवान शिव का वरदान उन्हें याद आया ब्रह्मा जी ने कठोर तपस्या की जिससे प्रसन्न होकर भगवान शिव एक बालक के रूप में उनकी गोद में प्रकट हुए यह भगवान शिव का एकमात्र बाल्य रूप था जब ब्रह्मा जी ने बालक शिव से उनका नाम पूछा तो शिव रो रहे थे तब ब्रह्मा जी ने उनका नाम रुद्र रखा जिसका
अर्थ होता है रुदन करने वाला लेकिन इसके बावजूद भी बालक शिव शांत नहीं हुए इसीलिए ब्रह्मा जी ने उन्हें दूसरा नाम दिया फिर भी वे चुप नहीं हुए अंततः उन्हें शांत करने के लिए ब्रह्मा जी ने भगवान शिव को 108 नाम प्रदान किए तो यह थी भगवान शिव के जन्म से जुड़ी रहस्यमय कथा जो यह दर्शाती है कि वे स्वयंभू हैं अर्थात उनका कोई जन्म नहीं हुआ वे अनादि और अनंत हैं दोस्तों आपको क्या लगता है भगवान शिव का जन्म हुआ था या वे स्वयंभू हैं इस रहस्य पर आपकी क्या राय है कमेंट में अपना
तर्क लिखे और देखते हैं कि कौन सबसे श्रेष्ठ और तर्क संगत उत्तर देता है सबसे श्रेष्ठ और तार्किक उत्तर को पिन किया जाएगा अब बात करते हैं भगवान शिव के गले में विराजमान नाग के बारे में जो महादेव के पास कैसे आया और इसकी पौराणिक कथा क्या है जिस नाग को आप भगवान शिव के गले में देख सकते हैं उसका नाम वासुकी है वासुकी भगवान शिव के अनन्य भक्त थे और उनकी एकमात्र इच्छा इा थी कि वे सदैव महादेव के समीप रहे इन्हें नागों का राजा भी कहा जाता है वासुकी वही नाग है जिन्होंने समुद्र
मंथन के दौरान रस्सी का कार्य किया था जब देवता और दानव समुद्र मंथन कर रहे थे तब वासुकी को मंदराचल पर्वत के चारों ओर लपेटा गया था और मंथन के लिए रस्सी के रूप में उपयोग किया गया था इस प्रक्रिया में वासुकी का पूरा शरीर लहू लोहान हो गया लेकिन उन्होंने अपनी भक्ति से कभी पीछे हटने का विचार नहीं किया यही नहीं जब समुद्र मंथन के दौरान [संगीत] महाविषगर्भ ने वासुकी को अपने गले में धारण कर लिया और तभी से वासुकी अमर हो गए धार्मिक मान्यताओं के अनुसार समुद्र मंथन के अलावा नागराज वासुकी का वर्णन
एक अन्य महत्त्वपूर्ण घटना में भी मिलता है कि वदंति के अनुसार जब भगवान श्री कृष्ण का जन्म हुआ तो वासुदेव जी उन्हें कंस की जेल से निकालकर गोकुल ले जा रहे थे रात के अंधकार में जब वासुदेव यमुना पार कर रहे थे तब अचानक एक भयानक तूफान आ गया यमुना की लहरें उफान पर थी तेज बारिश हो रही थी और मार्ग कठिन हो चुका था तभी नागराज वासुकी प्रकट हुए और उन्होंने अपने विशाल फन से भगवान श्री कृष्ण और वासुदेव पर छत्र तान दिया उनकी छत्र छाया में वासुदेव सुरक्षित रूप से यमुना पार कर गोकुल
पहुंचे इसके अलावा जब भगवान शिव ने त्रिपुरासुर का वध करने का निर्णय लिया तब वासुकी उनके धनुष की डोर बन गए और महादेव ने त्रिपुरासुर का संहार किया इसी कारण भगवान शिव को त्रिपुरा भी कहा जाता है अगर आप हमारे चैनल पर पहली बार आए हैं तो इसे सब्सक्राइब करना ना भूलें और वीडियो को लाइक जरूर करें क्योंकि यह आपके लिए सिर्फ एक सेकंड का काम है लेकिन इससे हमारी टीम को बहुत बड़ा सपोर्ट मिलता है अब जानते हैं कि भगवान शिव ने अपने मस्तक पर चंद्रमा को क्यों स्थान दिया और इसके पीछे की पौराणिक
कथा क्या है शिव पुराण के अनुसार राजा दक्ष की 27 बेटियां थी जिनका विवाह चंद्रदेव से हुआ था विवाह के समय चंद्रदेव ने राजा दक्ष से वादा किया था कि वे अपनी सभी पत्नियों को समान प्रेम और सम्मान देंगे लेकिन विवाह के बाद चंद्रदेव का झुकाव अपनी एक पत्नी रोहिणी की ओर अधिक हो गया इससे उनकी अन्य पत्नियां उदास रहने लगी और उन्होंने अपने पिता दक्ष से इस की शिकायत की जब दक्ष को यह बात पता चली तो वे अत्यंत क्रोधित हो गए और उन्होंने चंद्रदेव को श्राप दे दिया उन्होंने कहा कि चंद्रदेव एक भयानक
बीमारी के शिकार होंगे और 15 दिनों में धीरे-धीरे क्षीण होकर अंततः लुप्त हो जाएंगे इस श्राप को सुनकर चंद्रदेव भयभीत हो गए और इस कष्ट से मुक्ति पाने के लिए वे ब्रह्मा जी के पास गए ब्रह्मा जी ने उन्हें भगवान शिव की पूजा करने का उपाय बताया तब चंद्रदेव ने मिट्टी का शिवलिंग बनाकर महामृत्युंजय मंत्र का जाप करते हुए कठोर तपस्या की कई वर्षों की तपस्या के बाद भगवान महादेव प्रसन्न हुए और उन्होंने चंद्रदेव को दर्शन दिए भगवान शिव ने उन्हें वरदान दिया कि वे पूरी तरह से कभी भी समाप्त नहीं होंगे 15 दिनों तक
घटने के बाद अगले 15 दिनों में वे फिर से बढ़ते जाएंगे इसी कारण अमावस्या के दिन चंद्रमा पूरी तरह से लुप्त हो जाता है और फिर पूर्णिमा के दिन दोबारा पूर्ण रूप में प्रकट हो जाता है भगवान शिव ने चंद्र देव को अपने मस्तक पर स्थान दिया जिससे यह संकेत मिलता है कि महादेव के आशीर्वाद से ही चंद्रमा का अस्तित्व बना हुआ है इसी कारण भगवान शिव को चंद्रशेखर भी कहा जाता है शिव पुराण के अनुसार भगवान शिव पूरे शरीर पर भस्म धारण करते हैं यह कोई नई बात नहीं है कि महादेव का संबंध भस्म
से गहरा जुड़ा हुआ है दरअसल इसके पीछे एक प्राचीन कथा है जिसे शिव पुराण में विस्तार से बताया गया है बहुत समय पहले एक महान ऋषि थे जिनका नाम प्रणात था वे वर्षों तक जंगल में कठोर साधना कर रहे थे इस दौरान उन्होंने सिर्फ पत्ते और फल करर जीवन व्यतीत किया एक दिन जब वे जंगल से घास काटकर अपने आश्रम की मरम्मत कर रहे थे तभी अचानक उनकी उंगली कट गई लेकिन जब उन्होंने अपनी उंगली को देखा तो आश्चर्य चकित रह गए क्योंकि वहां से खून की जगह पेड़ के पत्तों का रस बह रहा था
ऋषि प्रणात को लगा कि अब वे इतने शुद्ध हो चुके हैं कि उनके शरीर में खून की जगह सिर्फ पवित्र वनस्पतियों का रस बहता है यह सोचकर वे अहंकार से भर गए और पूरे ब्रह्मांड में यह घोषणा करने लगे कि उनसे ज्यादा शुद्ध कोई नहीं भगवान शिव ने उनका घमंड तोड़ने के लिए एक बूढ़े साधु के रूप में अवतार लिया और उनके पास पहुंचे जब उन्होंने ऋषि प्रणात से उनकी प्रसन्नता का कारण पूछा तो ऋषि ने अपनी उंगली से रस निकलने की पूरी कहानी सुनाई बूढ़े साधु ने ऋषि से कहा इसमें बड़ी बात क्या है
पत्ते भी जब जलते हैं तो वे राख में बदल जाते हैं और राख सबसे शुद्ध होती है इसके बाद बूढ़े साधु ने अपनी ही उंगली काटी और उसमें से रक्त की जगह राख निकलने लगी यह देख ऋषि प्रणात समझ गए कि यह साधारण वृद्ध नहीं बल्कि स्वयं भगवान शिव हैं ऋषि प्रणात महादेव के चरणों में गिर पड़े और अपने अहंकार के लिए क्षमा मांगी माना जाता है कि इस घटना के बाद भगवान शिव ने यह सिद्ध कर दिया कि भस्म ही सबसे शुद्ध तत्व है और तब से उन्होंने अपने पूरे शरीर पर भस्म धारण कर
ली इसी कारण भगवान शिव को भस्म धारी और भूतनाथ भी कहा जाता है जो यह दर्शाता है कि हर चीज अंत में भस्म ही बन जाती है और यही सत्य है अब बात करते हैं भगवान शिव के त्रिशूल के रहस्य के बारे में पौराणिक कथाओं के अनुसार त्रिशूल का निर्माण स्वयं भगवान ने किया था लेकिन यह हमेशा से उनके पास नहीं था भगवान विश्वकर्मा ने यह दिव्य अस्त्र भगवान शिव को उपहार में दिया था माना जाता है कि सूर्यदेव ने भगवान विश्वकर्मा की पुत्री संजना से विवाह किया लेकिन विवाह के बाद संजना सूर्यदेव की तीव्र
गर्मी और अत्यधिक तेज को सहन नहीं कर पा रही थी उन्होंने अपने पिता भगवान विश्वकर्मा से इस समस्या का समाधान निकालने की प्रार्थना की भगवान विश्वकर्मा ने सूर्यदेव को अपनी गर्मी कम करने के लिए मनाया सूर्यदेव ने अपनी शक्ति का एक चौथाई भाग अपने पास रखा और बाकी धरती पर छोड़ दिया लेकिन यह ऊर्जा इतनी तीव्र और विनाशकारी थी कि इससे पूरी धरती जल सकती थी और फट भी सकती थी भगवान विश्वकर्मा ने अपनी दिव्य शक्ति से इस विनाशकारी ऊर्जा को नियंत्रित किया और इसे एक दिव्य शस्त्र के रूप में ढाल दिया जिसे हम भगवान
शिव का त्रिशूल कहते हैं भगवान विश्वकर्मा को पता था कि इस त्रिशूल को धारण करने की शक्ति केवल एक ही देवता के पास है भगवान शिव क्योंकि सिर्फ महादेव ही इस ब्रह्मांड की विनाशकारी शक्तियों को नियंत्रित कर सकते थे इसलिए उन्होंने यह त्रिशूल भगवान शिव को समर्पित कर दिया भगवान शिव के त्रिशूल से कई आध्यात्मिक और पौराणिक मान्यताएं जुड़ी हुई है कुछ विद्वान मानते हैं कि त्रिशूल के तीन सिर इस संसार के तीन मूल तत्व सत रज और तम का प्रतिनिधित्व करते हैं अब बात करते हैं भगवान शिव के डमरू के रहस्य के बारे में
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान शिव डमरू के साथ प्रकट हुए थे जब सृष्टि की रचना हुई तब इस संसार में कोई ध्वनि नहीं थी जब माता सरस्वती प्रकट हुई तो सृष्टि में ध्वनि का संचार हुआ लेकिन यह स्वर और ताल के बिना थी जिससे संगीत में कोई लयबद्ध नहीं थी तब भगवान शिव ने नृत्य करते हुए अपने डमरू को 14 बार बजाया डमरू की ध्वनि से व्याकरण संगीत के छंद और ताल उत्पन्न हुए इस ध्वनि से ही संसार में चंचलता और ऊर्जा का संचार हुआ मान्यता है कि जब भगवान शिव अपने डमरू को बजाकर तांडव
नृत्य करते हैं तो प्रकृति में एक नई ऊर्जा का संचार होता है शिव महापुराण के अनुसार चिलाद मुनि एक महान तपस्वी थे लेकिन उन्हें यह चिंता थी कि उनकी वंश परंपरा आगे नहीं बढ़ेगी उन्होंने कठोर तपस्या कर भगवान शिव को प्रसन्न किया और उनसे यह वरदान मांगा कि उन्हें एक ऐसा पुत्र प्राप्त हो जो जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्त हो भगवान शिव उनकी तपस्या से प्रसन्न हुए और उन्हें वरदान दिया कि वे स्वयं उनके पुत्र रूप में जन्म लेंगे कुछ समय बाद शलादर प्राप्त हुआ जिसका नाम उन्होंने नंदी रखा यह बालक जन्म से
ही दिव्य शक्तियों से युक्त था और महान विद्वान बना जब नंदी को ज्ञात हुआ कि संसार में मृत्यु अटल है तो वे अत्यंत दुखी हुए तब [संगीत] शिलादित्य भक्त और अपने गणों का अधिपति बना लिया भगवान शिव ने नंदी को अमृत्व का वरदान दिया और उन्हें अपना वाहन बनाया इसके साथ ही शिवजी ने घोषणा की कि जहां भी नंदी की पूजा होगी वहां उनकी भी आराधना की जाएगी यही कारण है कि हर शिव मंदिर में नंदी की मूर्ति भगवान शिव के समक्ष विराजमान होती है नंदी के विवाह की भी एक कथा है भगवान शिव ने
मरतो की पुत्री सुयशा से नंदी का विवाह करवाया था इससे यह सिद्ध हुआ कि वे केवल एक वाहन ही नहीं बल्कि एक महत्त्वपूर्ण दिव्य शक्ति भी है अब जानते हैं भगवान शिव को भांग का प्रसाद क्यों चढ़ाया जाता है अगर भगवान शिव भांग पी सकते हैं तो हम क्यों नहीं यह सवाल वाराणसी की गलियों और घाटों में अक्सर गूंजता है इसकी वजह एक मान्यता है जिसके अनुसार भगवान शिव भांग का सेवन करते थे पौराणिक कथा के अनुसार जब समुद्र मंथन से हलाहल विष उत्पन्न हुआ तो पूरी सृष्टि को बचाने के लिए भगवान शिव ने उसे
अपने कंठ में धारण कर लिया लेकिन हलाहल इतना प्रचंड था कि इसके प्रभाव से उनके गले में भयंकर जलन होने लगी तब माता पार्वती ने इस जलन को शांत करने के लिए उन्हें भांग अर्पित की अथर्व वेद के अनुसार भांग के पत्तों में ऐसी औषधीय गुण होते हैं जो शरीर में ठंडक उत्पन्न करते हैं यही कारण है कि शिवजी ने पहली बार इसका सेवन किया था शिवजी को तंत्र और ध्यान का देवता भी कहा जाता है और वाराणसी के अघोरी बाबा तथा नागा साधु मानते हैं कि शिवजी भी भांग का सेवन कर गहरी साधना में
लीन होते थे हालांकि यही ग्रंथ यह भी बताता है कि भांग का अधिक सेवन व्यक्ति की मानसिक स्थिति को प्रभावित कर सकता है और इसके दुष्परिणाम गंभीर हो सकते हैं बावजूद इसके आज कई लोग शिवजी का नाम लेकर भांग और गांजा जैसी नशीली चीजों का उपयोग कर रहे हैं जो उनकी आस्था से अधिक नशे की प्रवृत्ति को दर्शाता है शिवजी की उपासना आत्मिक शुद्धि और ध्यान के लिए होती है ना कि नशे के लिए दोस्तों क्या आज की युवा पीढ़ी श्रद्धा के नाम पर भांग और गांजे का सेवन करके अपना जीवन बर्बाद कर रही है
क्या यह आस्था का हिस्सा है या एक गलत आदत कमेंट में अपनी राय जरूर लिखें आपके मन में भी यह प्रश्न जरूर आता होगा कि आखिर महाशिवरात्रि क्यों मनाई जाती है इसका उत्तर हमें प्राचीन पौराणिक कथाओं में मिलता है शास्त्रों के अनुसार देवों के देव महादेव और माता पार्वती का विवाह फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को संपन्न हुआ था इसी वजह से हर साल महाशिवरात्रि का पर्व पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है इस पावन अवसर पर शिव भक्त भगवान भोलेनाथ की बारात निकालते मंदिरों में विशेष पूजा अर्चना करते हैं
और व्रत का पालन करते हैं ऐसा माना जाता है कि महाशिवरात्रि का व्रत करने से वैवाहिक जीवन की सभी समस्याओं से मुक्ति मिलती है और दांपत्य जीवन में सुख समृद्धि का आगमन होता है एक अन्य कथा के अनुसार महाशिवरात्रि वह पावन रात्रि है जिसमें स्वयं भगवान शिव ने शिवलिंग रूप में प्रकट होकर सृष्टि के संतुलन की स्थापना की ईशान संहित के अनुसार फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष चतुर्दशी की रात्रि में भगवान शिव ने करोड़ों सूर्य के समान तेजस्वी ज्योतिर्लिंग रूप धारण किया इस दिव्य शिवलिंग की पहली पूजा स्वयं ब्रह्मा और विष्णु ने महानिशा काल में
की थी तभी से महाशिवरात्रि के दिन रात्रि में शिवलिंग की विशेष पूजा करने का महत्व बताया गया है इस दिन भगवान शिव की उपासना और रात्रि जागरण करने से भक्तों को मोक्ष सुख शांति और धन समृद्धि की प्राप्ति होती है अब बात करते हैं भगवान शिव के निवास स्थान कैलाश पर्वत के बारे में शिव पुराण के कैलाश खंड के अनुसार सृष्टि के प्रारंभ में जब भगवान शिव ने गहन समाधि ली तो उनके तेज से एक दिव्य पर्वत प्रकट हुआ जिसे सुमेरू कहा गया कालांतर में जब दे वा सुर संग्राम में सुमेरू पर्वत क्षतिग्रस्त हुआ तो
भगवान शिव ने अपनी तीसरी आंख से प्रज्वलित अग्नि द्वारा एक नए पर्वत का निर्माण किया और यही कैलाश पर्वत कहलाया स्कंद पुराण में वर्णित कथा के अनुसार माता पार्वती ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कैलाश पर्वत पर कठोर तपस्या की थी उनके इस तप के फल स्वरूप यह स्थान भगवान शिव का स्थाई निवास बन गया यही कारण है कि आज भी कैलाश पर्वत को भगवान शिव का दिव्य धाम माना जाता है कि कैलाश पर्वत और मानसरोवर झील के आसपास एक रहस्यमय ध्वनि सुनाई देती है जब आप इन पवित्र स्थलों के पास पहुंचते हैं
तो ऐसा लगता है जैसे आसमान में कोई विमान उड़ रहा हो लेकिन जब आप ध्यान से सुनते हैं तो यह आवाज बिल्कुल वैसी होती है जैसे किसी ने डमरू बजाया हो या फिर ओम की गूंज हो रही हो वैज्ञानिक इसे प्र कृतिक घटना बताते हैं और कहते हैं कि शायद यह आवाज बर्फ के पिघलने से उत्पन्न होती है लेकिन वहां जाने वाले कई साधक और यात्री मानते हैं कि यह ध्वनि केवल एक संयोग नहीं बल्कि एक दिव्य संकेत है ऐसा कहा जाता है कि कैलाश पर्वत की शक्तिशाली ऊर्जा और वहां की आध्यात्मिक शक्तियां इस ध्वनि
को जन्म देती हैं क्या यह बर्फ के पिघलने की साधारण आवाज है या फिर ओम की दिव्य ध्वनि का चमत्कार यह सवाल आज भी अज्ञात है और शायद यही कैलाश पर्वत के रहस्य को और गहराई से जोड़ता है कैलाश पर्वत के रहस्य केवल ध्वनियों तक सीमित नहीं है कई यात्रियों ने दावा किया है कि उन्होंने रात के समय कैलाश पर्वत पर सात अलग-अलग रंगों की रोशनिक्सएक्सएक्स के रहस्य को पूरी तरह से नहीं समझ पाए हैं नासा के वैज्ञानिकों का मानना है कि यह हो सकता है कि कैलाश पर्वत के आसपास का चुंबकीय बल आसमान के
साथ मिलकर इस अद्भुत प्रकाश का निर्माण करता हो लेकिन क्या यह सिर्फ चुंबकीय शक्ति का खेल है या फिर कैलाश पर्वत की दैवीय शक्तियों का प्रतीक यह सवाल आज भी अनुत्तरित है क्या आपने हिम मानव या यथ की कहानियां सुनी है यह वह विशाल काय प्राणी है जिसे कैलाश पर्वत और हिमालय के दुर्गम क्षेत्रों में देखा गया है वर्षों से हिमालय के आसपास रहने वाले लोग दावा करते हैं कि उन्होंने इस रहस्यमई प्राणी को अपनी आंखों से देखा है लेकिन आज तक इस बात का पुख्ता सबूत नहीं मिला कि यह वास्तव में कौन है एक
विशाल भालू जंगली मानव या फिर एक प्राचीन प्राणी कई तिब्बती और नेपाली लोग मानते हैं कि यह हिम मानव कैलाश पर्वत के आसपास घूमता है इसे यति कहा जाता है और इसके बारे में कई कहानियां प्रचलित है कुछ इसे भूरा भालू कहते हैं तो कुछ इसे जंगली मानव यहां तक कि यह माना जाता है कि यह लोगों पर हमला कर सकता है और उन्हें खा भी सकता है इस रहस्य ने हिमालय की इन पवित्र भूमि को और भी गहराई से जिज्ञासा का केंद्र बना दिया है वैज्ञानिक भी इस बारे में शोध कर रहे हैं कुछ
शोधकर्ताओं का मानना है कि हिम मानव वास्तव में डर थल मानव के अवशेष हो सकते हैं जो अब तक इन बर्फीले क्षेत्रों में जीवित हैं हालांकि यह सिर्फ एक परिकल्पना है क्योंकि अब तक हिम मानव के शरीर या उसके जीवन के ठोस प्रमाण नहीं मिले हैं विश्व भर के करीब 30 वैज्ञानिकों ने इस बात का दावा किया है कि हिमालय के बर्फीले इलाकों में हिम मानव मौजूद हो सकते हैं लेकिन वे इसे साबित नहीं नहीं कर पाए कैलाश पर्वत का एक और अद्भुत रहस्य है उसकी छाया से बनने वाले स्वस्तिक और ओम के चिन्ह जैसे
ही सूरज कैलाश पर्वत के पीछे डूबता है पर्वत की छाया से स्वस्तिक का अद्भुत चिन्ह उभरता है यह वही स्वस्तिक है जिसे हिंदू धर्म में शुभ और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है इस पवित्र प्रतीक को देखकर लगता है मानो भगवान शिव और सूर्यदेव के बीच एक गहरा आध्यात्मिक संबंध प्रकट हो रहा हो लेकिन यह केवल एक ही रहस्य नहीं है जब कैलाश पर्वत पर बर्फ गिरती है तो दक्षिण दिशा से देखने पर बर्फ की संरचना से ओम का चिन्ह बनता है यह वही ओम है जो हिंदू धर्म में परम वास्तविकता और आध्यात्मिक ज्ञान का
प्रतीक माना जाता है ओम पर्वत के रूप में दिखने वाला यह दृश्य दर्शकों को प्रकृति और आध्यात्मिकता के गहरे संबंध की याद दिलाता है और हमें यह समझने का अवसर देता है कि यह पर्वत कितना दिव्य और रहस्यमय है यह प्राकृतिक घटनाएं पीढ़ियों से लोगों को विस्मित करती आ रही हैं और कैलाश पर्वत के आध्यात्मिक महत्व को और भी गहरा बना देती है ग्रंथों में कैलाश पर्वत को स्वर्ग की सीढ़ी कहा गया है यह माना जाता है कि रावण ने इस पर्वत पर स्वर्ग तक पहुंचने के लिए सीढ़ी बनाई थी परंतु यह केवल रावण की
ही कथा नहीं है वेदों के अनुसार कैलाश पर्वत पृथ्वी और स्वर्ग के बीच की एक पवित्र धुरी है जो उन्हें जोड़ती है महाभारत में भी इसका उल्लेख मिलता है जहां पांडव अपनी पत्नी द्रौपदी के साथ मोक्ष की प्राप्ति के लिए कैलाश पर्वत पर चढ़ते हैं यात्रा के दौरान एक-एक करके सभी पांडव गिरते गए परंतु युधिष्ठिर अपने सच्चे धर्म और निष्कलंक जीवन के कारण स्वर्ग में प्रवेश करने में सक्षम रहे कैलाश पर्वत को पूर्णता का प्रतीक माना जाता है इसकी चार ढलान कंपास की चार दिशाओं का प्रतिनिधित्व करती हैं शिष्यों का विश्वास है कि यह पर्वत
वास्तव में स्वर्ग का प्रवेश द्वार है इसकी दिव्यता और पवित्रता से यह स्थान एक अद्वितीय आध्यात्मिक धरोहर बन जाता है जब चीन ने देखा कि कोई इंसान कैलाश पर्वत पर चढ़ नहीं पा रहा है तो उन्होंने एक साहसिक निर्णय लिया कैलाश पर्वत की छोटी हेलीकॉप्टर भेजने का हालांकि कैलाश पर्वत के ऊपर हेलीकॉप्टर और विमान उड़ाने की सख्त मनाही है क्योंकि इस इलाके का मौसम अचानक खराब हो जाता है और कोई भी हवाई जहाज यहां लंबे समय तक टिक नहीं पाता कई दिनों की मौसम रिसर्च के बाद चीन ने एक साफ दिन चुना और अपने हेलीकॉप्टर
को कैलाश पर्वत की ओर रवाना किया शुरुआत में सब कुछ ठीक लग रहा था हेलीकॉप्टर में बैठे लोग कैलाश पर्वत के अ अभु दृश्य का आनंद ले रहे थे उन्हें लग रहा था कि सब कुछ सही चल रहा है और वे छोटी तक पहुंच जाएंगे लेकिन जैसे ही उन्होंने थोड़ी और ऊंचाई हासिल की माहौल में बदलाव आने लगे कैलाश के ऊपर बादल गिरने लगे और हिमस्खलन के दृश्य दिखाई देने लगे लेकिन सबसे डरावनी बात तब हुई जब आसमान में गहरे काले बादल हेलीकॉप्टर को घेरने लगे हिम्मत जुटाकर वे हेलीकॉप्टर को और ऊपर ले गए लेकिन
तभी आसमान में बिजली कड़कने लगी और तेज बर्फ बारी शुरू हो गई ऊंचाई पर हवा का दबाव इतना बढ़ गया कि हेलीकॉप्टर को नियंत्रित करना बेहद मुश्किल हो गया चीन के वैज्ञानिकों ने बताया कि कैलाश पर्वत की अद्वितीय भौगोलिक स्थिति के कारण सभी दिशाएं जाकर एक साथ मिल जाती हैं जिससे वे दिशा भ्रम में फंस गए इस दौरान उनके कंपास ने भी काम करना बंद कर दिया अब उनके पास कोई विकल्प नहीं था और उन्होंने वापस नीचे लौटने का निर्णय लिया धीरे-धीरे वे नीचे आए दिल की धड़कने तेज थी लेकिन सुरक्षित वापस लौटे इस घटना
ने चीन को यह समझा दिया कि इस रहस्यमय पर्वत पर चढ़ना या इसे जीतना उनके बस की बात नहीं है चीन की नाकामयाब कोशिश के बाद कैलाश पर्वत को लेकर अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा की उत्सुकता काफी बढ़ गई 200 15 में नासा ने अपने सैटेलाइट को कैलाश पर्वत पर पॉइंट करके गहन रिसर्च शुरू की इस पर्वत के रहस्यों ने नासा के वैज्ञानिकों को भी चौका दिया निरीक्षण के बाद जो तस्वीरें नासा के वैज्ञानिकों ने साझा की उनमें कैलाश पर्वत की एक रहस्यमई परछाई दिखाई दी इस परछाई को देखकर ऐसा प्रतीत होता है जैसे कोई विशाल
आकृति ध्यान की मुद्रा में बैठी हो इस अत दृश्य ने दुनिया भर के लोगों को चौका दिया क्योंकि इसे ज्यादातर लोग भगवान शिव की छवि से जोड़कर देख रहे थे यह रहस्यमय छवि कैलाश पर्वत की पवित्रता और उसके आध्यात्मिक महत्व को और गहरा करती है जो आज भी मानवता के लिए एक अनसुलझी पहेली बनी हुई है तो दोस्तों यह था कैलाश पर्वत के रहस्य का एक छोटा सा भाग अगर आप कैलाश पर्वत के संपूर्ण रहस्यों के बारे में विस्तार से जानना चाहते हैं तो हमने पहले से ही इस पर एक विशेष डॉक्यूमेंट्री बना रखी है
आप चैनल में जाकर देख सकते हैं तो दोस्तों यह था भगवान शिव से जुड़े कुछ अद्भुत और रहस्यमई तथ्य वैसे तो महादेव से जुड़ी कई रहस्यमई गाथाएं हैं जिन्हें हम एक ही वीडियो में कवर नहीं कर सकते भगवान शिव के बारे में आप क्या जानते हैं हमें कमेंट में जरूर बताएं अगर आप सच्चे महादेव भक्त हैं तो वीडियो को लाइक करें और अपने परिवार और दोस्तों के साथ शेयर जरूर करें जल्द ही मिलते हैं एक नए वीडियो के साथ तब तक के लिए धन्यवाद जय महादेव जय हिंद जय भारत