इस कहानी के लेखक हैं विजेंद्र कुमार कर। वो गांव नहीं वो जीता जागता एक श्मशान था। वहां के लोग जीवित तो थे लेकिन हर दिन मर रहे थे। गांव वाले चाहते थे कि उस गांव को छोड़कर वे कहीं और चले जाएं। लेकिन वह शैतानी ताकत किसी को भी उस गांव से निकलने नहीं दे रही थी। शाम होते ही उस गांव को सन्नाटा घेर लेता था। कोई भी अपने घर से नहीं निकलता था। किसी को निकलने की इजाजत भी नहीं थी अपने घरों से। क्योंकि शाम को उसका कहर उस राह पर टूट पड़ता था। बहुत ही
खूंखार और भयानक आत्मा थी वो। वो इंसानों को जान से नहीं मारते थे। वो उसकी आंखें निकाल लेती थी दोनों की और उन्हें बना देती थी अंधा बहू बहू सुनील आया कि नहीं अभी तक? नहीं मां जी वो अभी तक नहीं आए हैं। मुझे भी उनकी फिक्र हो रही है। हे भगवान सूरज ढलने को है। पूरे गांव को पता है कि शाम होने के पहले घर लौट जाना चाहिए। फिर भी पता नहीं यह आज कहां रह गया। आशा देवी यह बोल ही रही थी कि उनका पति सुरेश दूसरे कमरे से निकल कर वहां लाठी टिकाते
हुए पहुंचा। वो देख नहीं सकता था। उसे आज भी वो दिन याद है जब वो शाम को खेत से लौट रहा था और अचानक से बारिश शुरू हो गई थी। अरे ये बारिश कहां से शुरू हो गई? आ अब कहीं ठुकना पड़ेगा और नहीं तो भीग जाऊंगा। सुरेश कुछ ही दूरी पर लगे एक बरगद के पेड़ के नीचे खड़े हो गए। वो लगातार बारिश को देखे जा रहे थे और कोई और लगातार उन्हें घूर रहा था। उसी पे भीड़ पर बैठे-बैठे सुरेश बारिश के रुकने का इंतजार कर रहे थे लेकिन तभी धड़ा की आवाज से
वो चौंक गए। पहले तो उन्हें लगा कि शायद पेड़ की कोई डाली टूटी है। क्योंकि वो पेड़ बहुत ही पुराना था। लेकिन जब उनकी नजर सामने गई तो मुंह से चीख निकल गई। सुरेश वहां से भागने लगे लेकिन अचानक से उनके पैर वहीं के वहीं थम गए। वो चाहकर भी अपने पैर आगे नहीं बढ़ा पा रहे थे। उन्होंने बहुत कोशिश की लेकिन उनके पैर ऐसे जमीन से चिपके जैसे किसी ने गूंद लगा दिया हो। डर के मारे उनके सीने की धड़कन बढ़ती ही चली जा रही थी। वो अपने सामने मौत को देख रहे थे। वो
मौत जिसका रूप बहुत ही भयानक था। एक औरत जिसके दोनों हाथ नहीं थे। उसका चेहरा पूरी तरह जला हुआ था। वो सुरेश को खा जाने वाली निगाहों से देख रही थी। मुझे जाने दो। मुझे जाने दो। सुरेश उस औरत से बार-बार अपनी जान बखशने की गुहार कर रहे थे। लेकिन वो औरत थी कि धीरे-धीरे कर उनकी ओर बढ़ रही थी। और जब वो उनके बिल्कुल सामने आ गए तो सुरेश ने अपनी आंखें बंद कर ली क्योंकि उन्हें पता लग गया था कि अब उनकी मौत करीब है। वो मन ही मन ईश्वर को याद कर रहे
थे। लेकिन तभी एक चाक की आवाज आई और उसके साथ ही सुरेश के चीखने की भी आवाज गूंज गई। सुरेश कुछ समझ पाते उसके पहले ही उन्हें एहसास हो गया कि उनकी एक आंख में किसी ने कैंची घुसा दी है। सुरेश जोर-जोर से चीखने लगे। बचाओ बचाओ। सुरेश चीख रहे थे और सामने वो देख रहे थे जिसे कोई भी देख ले तो हार्ट अटैक से मर जाए। कुछ देर पहले जिस औरत के दोनों हाथ कटे हुए दिख रहे थे। पता नहीं उसके शरीर में कहां से दोनों हाथ अचानक आ गए थे और उन हाथों में
थी कैंची। नुकीली कैंची जिसमें खून लगा था। कुछ देर बाद फिर से एक आवाज आई खचाक। इस बार सुरेश के दूसरे आंखों के अंदर वो नुकीली कैंची धंसी हुई थी और सुरेश दर्द से करारा रहा था। सुरेश की आंखों की दोनों पुतलियां अब उस भयानक सी औरत के हाथ में थी जिसे वो घूरघूर कर देख रही थी। सुरेश लगातार चीख रहे थे। इधर वो औरत आंखों की उन पुतलियों को लेकर बरगद के पेड़ के नीचे गई और उसने वहां रखे फावड़े से पेड़ के नीचे खुदाई शुरू कर दी और आंखों की दोनों पुतलियों को मिट्टी
में दबा दिया। उसके बाद वो जोरजोर से हंसने लगी और कहने लगी किसी को नहीं छोडूंगी मैं किसी को नहीं। सुरेश अपनी बातों को याद करके डर के मारे कांप रहे थे। साथ ही उन्हें यह भी चिंता सता रही थी कि उनका बेटा भी कहीं उनकी तरह ही अंधा ना हो जाए। घड़ी की सुई धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी। और जैसे-जैसे सुई आगे बढ़ रही थी, सुरेश के घर के सभी सदस्यों के चेहरे का रंग उड़ा जा रहा था। जैसे चिंता सुरेश अपने बेटे सुनील के लिए कर रहा था। वैसे ही चिंता सुनील को भी
हो रही थी। वह जल्दी से घर पहुंच जाना चाहता था। आज उसे खेत में बहुत देर हो गई। वो निकल तो जल्दी रहा था लेकिन अचानक कई सारे आवारा पशु उसके खेत में घुस गए। खेत की फसल तैयार खड़ी थी। अगर वो उन जानवरों को नहीं भगाता, तो सारी फसल चौपट हो जाती। और सिर्फ फसल ही चौपट नहीं होती। उसकी सारी मेहनत बर्बाद हो जाती। एक किसान के लिए उसकी जमीन और उसकी फसल उसके जीवन से भी ज्यादा प्यारी होती है। पूरी कोशिश के बाद उसने जानवरों को भगा तो दिया लेकिन बहुत देर हो गई।
वो पूरी तेजी से अपने घर की ओर बढ़ा जा रहा था। हे भगवान आज तो बहुत देर हो गई है। कहीं कहीं वो हादसा मेरे साथ भी ना हो जाए। अगर वो हो जाएगा तो बहुत ही मुसीबत हो जाएगी। पिताजी की दोनों आंखें पहले ही चली गई है और मैं भी अंधा हो गया तो चिंता की लकीरें उसके माथे पर झलक रही थी। लेकिन उसे क्या पता था कि आगे चलकर उसके साथ क्या होने वाला है। तेज कदमों से चलता हुआ जब वो उसी बरगद के पेड़ के नीचे पहुंचा तो उसके कानों में एक अजीब
सी आवाज आई। ऐसा लगा कोई सांप फकार रहा है। लेकिन वो आवाज बहुत ही भयंकर थी। ऐसा लग रहा था कि बहुत सारे सांप एक साथ फकार रहे हो। डर के कारण सुनील के दिल की धड़कन बढ़ गई थी। उसे यह अंदेशा हो गया कि कुछ गड़बड़ होने वाला है। इसीलिए वो भागने लगा। लेकिन अचानक से उसके कदम रुक गए। उसने देखा कि उसके सामने एक बहुत ही विशालकाय नागिन खड़ी है। उसने अपने पूरे जीवन में इतनी बड़ी नागिन नहीं देखी थी। उस नागिन को देखकर वो थर-थर कांपने लगा। कुछ देर बाद वो नागिन फुपकारती
हुई सुनील के गले से लिपट गई। और उसके गले को जोर से दबाने लगी। सुनील का दम घुट रहा था। उसकी आंखें बाहर आने को हो रही थी और वह जोर से चिल्ला रहा था। बचाओ बचाओ। नागिन का शिकंजा उसकी गर्दन पर और भी जकड़ता जा रहा था। और सुनील की आंखें लाल हो रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे कि उसकी आंखें बाहर आ जाएंगी और वही हुआ। कुछ देर बाद उसकी दोनों आंखों की पुतलियां बाहर आ गई। आंखों की पुतलियां बाहर आते ही वो नागिन धीरे-धीरे कर एक औरत में बदलने लगा। एक भयानक
औरत में। गांव में बच्चों को छोड़कर हर कोई उस भयानक औरत का शिकार बन रहा था। लोग भागना चाहते थे। हमेशा के लिए इस गांव से निकलना चाहते थे। लेकिन जब भी कोई गांव छोड़ना चाहता वह अपने घर से निकल ही नहीं पाता था क्योंकि एक अदृश्य सी दीवार उसके घर के आगे बन जाती। वो इंसान या उसका परिवार निकलने की कोशिश करता तो उस दीवार से टकरा जाता जबकि वो दीवार किसी को भी नहीं देखती थी। किसी को भी समझ में नहीं आ रहा था कि ऐसा कौन सा श्राप उस गांव को लगा है
जिससे वह गांव धीरे-धीरे अंधों के गांव में बदल रहा था। उसी गांव में सावित्री रहती थी। सावित्री के पति की मृत्यु कई सालों पहले हो गई थी। पति की मौत के बाद 7 साल की उसकी बेटी सोनम की जिम्मेदारी उस पर आ गई थी। सावित्री उस जिम्मेदारी को बखूबी निभा रही थी। जिस तरह उसका पति खेतों में मेहनत करता वह उसी तरह खेत में लगी रहती। समय के साथ सोनम बड़ी होती जा रही थी। सावित्री चाहती थी सोनम आगे की पढ़ाई के लिए शहर चली जाए क्योंकि गांव में पढ़ाई की कोई खास व्यवस्था नहीं थी।
सावित्री ने सोनम को शहर भेज दिया। पिछले एक साल से वह वहीं रह रही थी और पिछले एक साल से ही गांव इस भयानक श्राप से गुजर रहा था। सोनम के कॉलेज में छुट्टियां हो गई थी। इन छुट्टियों में वो अपनी मां के पास आना चाह रही थी लेकिन वह भी उसे बिना बताए क्योंकि वो अपनी मां को सरप्राइज देना चाहती थी। सोनम को जरा सा भी पता नहीं था कि गांव में पिछले एक साल से क्या हो रहा है। पता होता भी कैसे? उसकी मां ने कभी इस बारे में उसे बताया ही नहीं था।
सोनम 5:30 बजे शाम के करीब। अपने गांव के स्टेशन के बाहर उतरी। लेकिन स्टेशन के बाहर उसे बिल्कुल सन्नाटा सा लगा। अगर रात होती और ऐसा सन्नाटा दिखता तो कोई आश्चर्य की बात नहीं होती। लेकिन शाम के समय इतना सन्नाटा स्टेशन से उसका घर 2 2ाई किमी दूर था। अब स्टेशन पर ना तो कोई गाड़ी थी ना ही कोई और जरिया जिससे वो घर जा सके। उसने सोचा कि घर पर फोन कर ले। उसने अपना मोबाइल भी निकाला। फिर उसने सोचा कि अगर फोन कर दूंगी तो सरप्राइज सरप्राइज नहीं रहेगा। इसीलिए वह पैदल ही घर
की ओर निकल पड़ी। अभी वह कुछ ही दूर पहुंची थी कि उसे लगा कि कोई उसके पीछे आ रहा है। सोनम तुरंत पीछे पड़ी। लेकिन वहां कोई नहीं था। वह एक बार फिर अपने घर की ओर चल पड़ी। लेकिन जैसे ही वह कुछ कदम बढ़ाती उसे ऐसा लगता कि कोई उसके पीछे आ रहा है। और जैसे ही वह पीछे मुड़ती वहां कोई नहीं होता। सोनम को अब डर लगने लगा था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि ऐसा उसके साथ आखिर क्यों हो रहा है। उसके ज़हन में बहुत सारे सवाल थे। लेकिन एक का भी
जवाब उसके पास नहीं था। सोनम फिर से अपने घर की ओर बढ़ने लगी। लेकिन कुछ दूरी पर जाने के बाद ही वो हुआ जिसे देखकर उसके पसीने छूट गए। उसने देखा कि उसकी आंखों के सामने ही एक जोरदार धमाका हुआ। ऐसा लगा कि किसी ने बम विस्फोट कर दिया हो और उस धमाके से सड़क पर इतना बड़ा गड्ढा हो गया कि वो उस पार लाख कोशिश के बावजूद भी नहीं जा सकती थी। हे भगवान ये क्या है? ये अचानक से इतना बड़ा विस्फोट कैसे हो गया? और ये ये गड्ढा कैसे बन गया? मैं मैं अब
उस पार कैसे जाऊंगी? सोनम यह सोच ही रही थी कि तेज हवाएं वहां चलने लगी और उन तेज हवाओं की आवाज के साथ उसे सुनाई पड़ी हंसी। एक भयानक हंसी। सोनम ने इधर-उधर देखा लेकिन उसे कोई नहीं दिखा। कौन? कौन है? कौन है? सामने क्यों नहीं आता? सोनम के दिल की धड़कन कई गुना बढ़ गई थी। लेकिन फिर भी उसने हिम्मत का हाथ थामे रखा। थोड़ी देर बाद वो हंसी की आवाज आनी बंद हो गई। सोनम ने राहत की सांस ली। लेकिन कुछ ही देर बाद फिर से वह भयानक हंसी की आवाज आने लगी। अब
सोनम की हिम्मत जवाब दे रही थी। इसलिए उसने अपना मोबाइल फोन निकाला और अपनी मां का नंबर वह डायल करने ही वाली थी। कि उसके फोन की घंटी बजी। सोनम का फोन उसके हाथ से छूट कर नीचे गिर पड़ा। उसने देखा कि उसके फोन पर मां कॉलिंग लिखा आ रहा था। वो फोन को उठाने के लिए जैसे ही झुकी उसे लगा कि किसी ने उसे जोर का धक्का मारा है। सोनम दूर जा गिरी। उसके फोन की घंटी लगातार बज रही थी। सोनम फिर से हिम्मत करके उठी और अपने फोन की ओर भागी। इस बार उसके
हाथ में एक लॉकेट था। वो लॉकेट जिसे उसने गले में पहन रखा था। उस लॉकेट में मां दुर्गा का चित्र बना हुआ था। यह लॉकेट उसकी मां ने उसके गले में तब पहनाया था जब वो शहर पढ़ने के लिए जा रही थी। जैसे ही उसने वो लॉकेट अपने हाथ में लिया। सब कुछ सामान्य हो गया था। बोसी की आवाज बंद हो गई थी। वो रास्ता जिसमें कुछ देर पहले एक बड़ा सा गड्ढा बन गया था वो भी अब पहले की तरह हो गया था। सोनम को कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर यह
सब क्या हो गया। वो यह सोच ही रही थी कि एक बार फिर से उसके फोन की घंटी बजी। उसने फोन उठाया। सोनम क्या बात है बेटा? तुम फोन क्यों नहीं उठा रही? मां मां वो क्या हुआ बेटा? मां मां मैं गांव आई हूं। मैं रास्ते में हूं। क्या कहां गांव? जैसे ही सोनम ने अपनी मां को कहा कि वो गांव आई है। सावित्री का पूरा शरीर थर-थर कांपने लगा। उसके चेहरे का रंग उड़ गया। तुम तुम गांव कब आ गई? तुमने मुझे बताया क्यों नहीं सोनम? बहुत बड़ा अनर्थ कर दिया तुमने। मुझे बिना बताए
गांव आकर तुम्हें पता नहीं गांव में क्या हो रहा है। हमारा पूरा गांव एक श्राप की चपेट में है बेटी। एक भयानक श्राप की चपेट में कोई बुरी आत्मा लोगों को अंधा बना रही है। गांव के ज्यादातर लोग अंधे हो रहे हैं। औरत, आदमी, बूढ़े, जवान बच्चों को छोड़कर सभी सावित्री सोनम से अभी यह कह ही रही थी कि तभी एक बार फिर से जोर-जोर से हंसने की आवाज आई। अचानक आई इस आवाज से एक बार फिर से सोनम का फोन उसके हाथ से छूट कर नीचे गिर पड़ा। सोनम फोन उठाने के लिए जैसे ही
झुकी एक तेज हवा का झोंका आया और उसके फोन को उड़ा ले गया। सोनम ने जब यह देखा तो उसे बहुत ही गुस्सा आया। उसने अपना वो लॉकेट फिर से उस भयानक औरत को दिखाया और चिल्लाते हुए कहा कौन हो तुम? इस गांव को कौन सा श्राप लगा है? तुम ही हो ना इन सबके पीछे। क्यों कर रही हो तुम यह सब? आखिर क्यों? सोनम की इस बात पर वो भयानक औरत जोर-जोर से हंसने लगी और हंसते हुए उसने कहा, गांव के लोगों को मैं अंधा नहीं बना रही। वो तो पहले से ही अंधे हैं।
सब के सब अंधे हैं। तुम भी तो अंधी ही हो। तुमने मुझे पहचाना नहीं। नहीं पहचाना। कौन हो तुम? मैं निर्मला हूं। तुम्हारी निर्मला दीदी। निर्मला दीदी आप? उसके बाद निर्मला ने अपनी कहानी सुनानी शुरू की। 1 साल पहले की बात है। निर्मला अपने खेत में काम कर रही थी। तभी गांव के दबंग मुखिया का बेटा रंजय वहां आ गया और उसे छेड़ने लगा। अरे मेरी जान तुम्हें कितनी बार कहा है कि इस तरह धूप में अपने चेहरे को खराब मत करो। अरे तुम्हारी कीमत रानी बनने की है और तुम हो कि यहां पापड़ की
तरह खुद को सेक रही हो। यह कहकर रंजय ने निर्मला का हाथ पकड़ लिया। निर्मला ने जरा भी देर नहीं की और एक थप्पड़ खींच कर उसे दे मारा और उसे कहा सेक तो मैं भी दूं तुम्हें आग में लेकिन इस बार के लिए यही काफी है। अगर आज के बाद तुमने मेरा रास्ता रोकने की कोशिश की या मेरे रास्ते के आगे आए तो वो भी कर दूंगी। निर्मला के इस तरह के रिएक्शन का रणज को जरा सा भी इल्म नहीं था। उसने अपने गाल को सहलाते हुए कहा तुम्हें पता नहीं है निर्मला तुमने क्या
किया है रंजय पर हाथ उठाया है तुमने इस गांव के मालिक पर अरे तुम लोग नौकर हो नौकर नौकर को जरा सा भाव क्या दे दिया सर पर चढ़कर बैठ गए बस आज से तुम्हारी उल्टी गिनती शुरू तुमने यहां अकेले में मुझे थप्पड़ मारा है ना मैं भरे बाजार तुम्हारे साथ हुआ करूंगा कि तुम्हारी रूह कांप जाएगी। हां, रंजय का खौफ पूरे गांव में था। उसके पिता धनंजय भी एक नंबर के बदमाश थे। लोगों की जमीन हथियाना, दूसरों की बहू बेटियों का अपमान करना, उनके साथ खिलवाड़ करना यह उसका शौक था। रंजय की रगों में
भी उसी का खून दौड़ रहा था। इसलिए वह भी वही करता जो उसका बाप करता था। इस घटना के 24 घंटे के बाद की बात है। निर्मला खेत में काम कर कर जब वापस लौट रही थी तो रंजय ने अपने गुंडों के साथ उसे बीच बाजार घेर लिया। उस दिन बाजार में काफी भीड़ थी। क्योंकि उस दिन शुक्रवार था। हर शुक्रवार वहां बहुत बड़ी मंडी लगती थी। रंजय ने जानबूझकर उस दिन को चुना था क्योंकि उसे निर्मला को भीड़ के बीच ना सिर्फ जलील करना था बल्कि ऐसी सजा देनी थी जिससे उसका ख्वाब गांव वालों
पर बना रहे। निर्मला पता है लड़कियों को सबसे प्यारी क्या होती है? इज्जत। और आज तुम्हारी वो इज्जत सड़े बाजार में मैं नीलाम कर दूंगा। तुमने मुझे थप्पड़ मार तो दिया लेकिन उसकी चोट जितनी मुझे लगी उससे कई गुना ज्यादा अब तुम्हें महसूस होगी। रंजय बीच बाजार उसके साथ बदतमीजी करने लगा। निर्मला चीखती रही, चिल्लाती रही लेकिन किसी ने उसकी मदद नहीं की। इस गांव में सारे लोग अंधे हैं क्या? अरे आपके सामने यह राक्षस मेरे साथ बदतमीजी कर रहा है। एक स्त्री की इज्जत को तार-तार कर रहा है। लेकिन आप लोगों ने आंख पर
पट्टी बांध रखी है। अरे जवाब दीजिए। अरे जवाब दीजिए इसे। अगर नहीं देंगे तो आज मैं हूं। कल आपकी बेटी होगी। आपकी बहन होगी। निर्मला लोगों से मदद की गुहार करती रही। लेकिन रणज और उसके बाप के डर से किसी ने उसकी मदद नहीं की। आखिरकार रंजय ने वो किया जो वह चाहता था और उसके बाद भी वह शांत नहीं बैठा। उसने निर्मला के शरीर में आग लगा दी। वो बेचारी दर्द से कराती रही और आखिरकार उसने दम तोड़ दिया। उन्होंने मुझे मार दिया। पूरा गांव अंधा बना रहा। सदियों पहले भी तो यही हुआ था।
द्रोपदी का चीर हरण हो रहा था और बड़े-बड़े महारथी अंधे बने हुए थे। सदियों बाद भी कुछ नहीं बदला। मेरे शरीर को तो उन लोगों ने मार दिया लेकिन मेरी आत्मा को इंसाफ चाहिए था। मैंने अपनी मौत के तीन दिन बाद ही रंजय और उसके बाप को मार दिया। मेरा बदला अभी भी खत्म नहीं हुआ था क्योंकि गांव वाले चाहते तो मुझे बचा सकते थे। लेकिन उन लोगों ने आंखों पर पट्टी बांध रखी थी। अंधे बने हुए थे। इसीलिए मैंने कसम खा ली कि अब पूरे गांव को मैं अंधा बना दूंगी और वही मैं कर
रही हूं। निर्मला दीदी मैं मानती हूं कि आपके साथ बहुत गलत हुआ। बहुत ही गलत। गांव वालों से आपकी शिकायत भी जायज है। लेकिन क्या इस तरह सभी को अंधा कर देने से आपकी आत्मा मुक्त हो पाएगी? नहीं, कभी नहीं। वो भटकती रहेगी। आपने अपने गुनहगारों को सजा दे दी है। मैं मानती हूं कि गांव वाले भी आपके गुनहगार हैं। लेकिन इस तरह से इंसाफ नहीं होता। आपको तो गांव वालों को जगाना था। उन्हें लड़ने के लिए तैयार करना था। ताकि कल को और कोई रंजे जैसा पैदा ना हो। लेकिन आपने तो सभी को अंधा
बनाने की ठान ली। उससे क्या होगा दीदी? अंधा बनने से क्या होगा? अंधा नहीं बनाना है। हमें इस समाज को जगाना है। इनमें हिम्मत भरनी है। तभी किसी निर्मला के आगे रंजे जैसे लोगों की हिम्मत नहीं होगी खड़े होने की। निर्मला थक गई थी। उसने अपने असली गुनहगार को मार तो दिया था। लेकिन गांव वालों की चुप्पी उसे खटक रही थी। उनका सब कुछ देखने के बाद भी अनदेखा करना निर्मला को सता रहा था और यही कारण था कि वह अब भी भटक रही थी। सोनम की बातों से निर्मला को नई सोच मिली। उसने सोनम
से एक वादा लिया कि मैं तो मर गई लेकिन मेरी मौत जाया ना जाए। वो लोगों को जागरूक करें। लड़कियों के ऊपर अगर कोई अत्याचार करता है तो चाहे वह कितना भी शक्तिशाली क्यों ना हो लोग उसका मुकाबला करें। सोनम ने यह वादा निर्मला से किया। उसके बाद निर्मला वहां से गायब हो गई। उस दिन के बाद गांव में कोई भी ऐसी अनहोनी नहीं हुई। सोनम ने लोगों को लड़कियों के लिए लड़ने के लिए प्रेरित किया।