विचार आते कहां से हैं? यह प्रश्न बड़ा प्यारा है और प्यारा इसलिए है कि इसे पूछने वाला पहली बार अपने मन की तरफ पीठ करके नहीं मुंह करके खड़ा हुआ है। अब तक तुमने विचारों के भीतर जीवन जिया है। आज पहली बार तुम पूछ रहे हो कि ये आ कहां से रहे हैं? यह प्रश्न ही ध्यान की शुरुआत है। पहले एक छोटी सी कहानी सुनो। एक आदमी था जो रोज सुबह नदी के किनारे बैठता था। एक दिन उसने देखा कि नदी में लकड़ियां बहती चली आ रही है। कभी कोई पत्ता, कभी कोई टहनी, कभी कोई
मरी हुई चिड़िया, कभी फूल। वह बैठा-बैठा सोचने लगा कि यह सब कहां से आ रहा है। फिर उसने तय किया कि वह इस सबको उठाकर देखेगा, पहचानेगा, इकट्ठा करेगा। कुछ ही दिनों में उसका पूरा घर कूड़े से भर गया। नदी वैसी की वैसी बहती रही। जो आया चला गया। जो उसने पकड़ा वह उसका बोझ बन गया। तुम्हारा मन वही नदी है और विचार वही बहती हुई लकड़ियां हैं। तुमने क्या किया? तुमने हर लकड़ी को पकड़ लिया। इसी पकड़ का नाम है मेरा विचार। जब तक तुम कहते हो कि यह मेरा विचार है तब तक तुम
विचार के मालिक नहीं उसके कैदी हो। अब मैं तुमसे एक सीधा सवाल पूछता हूं। क्या तुमने कभी कोई विचार चुना है? सच-सच बताना। क्या कभी तुमने सुबह उठकर कहा कि आज मैं यह सोचूंगा और ठीक वही सोचा? नहीं। विचार तुमसे पूछकर नहीं आते। वे आते हैं जैसे बिन बुलाए मेहमान आते हैं। दरवाजा खटखटाते भी नहीं। सीधे भीतर घुसाते हैं और सोफे पर बैठ जाते हैं। और तुम इतने शिष्ट हो कि उन्हें चाय भी पिलाते हो। कहते हो कि हां बैठिए आप ही तो मैं हूं। तो विचार आते कहां से हैं? इसके कई उत्तर हैं और
हर उत्तर आधा सच है। पहला उत्तर है अतीत से। तुमने जो देखा, सुना, पढ़ा, भोगा वो सब भीतर संग्रहित है। जैसे गोदाम में सामान रखा हो। जब भी कोई छोटी सी परिस्थिति आती है। गोदाम का दरवाजा खुलता है और कोई पुरानी चीज बाहर आ जाती है। तुमने किसी का चेहरा देखा और कोई पुरानी स्मृति जाग गई। किसी ने कुछ कहा और कोई पुराना घाव हरा हो गया। तो एक अर्थ में विचार स्मृति की प्रतिध्वनि है। जैसे तुम पहाड़ पर जाकर चिल्लाओ तो आवाज लौट कर आती है। वैसे ही अनुभव भीतर जाकर लौटता है और उसी
लौटती आवाज को तुम विचार कहते हो। दूसरा उत्तर है समाज से। तुम्हारे अधिकतर विचार तुम्हारे हैं ही नहीं। तुम्हें किसने सिखाया कि क्या अच्छा है और क्या बुरा? मां ने, पिता ने, स्कूल ने, धर्म ने, अखबार ने, पड़ोसी ने। बचपन से ही तुम्हारे भीतर विचारों की खेती की गई है। जैसे किसान खेत में बीज डालता है वैसे समाज ने तुम्हारी चेतना में बीज डाले और अब वे उग रहे हैं और तुम समझते हो कि यह मेरी अपनी फसल है। थोड़ा ईमानदारी से देखो। तुम जिस बात पर गुस्सा होते हो, जिस बात पर शर्माते हो, जिस
बात पर गर्व करते हो, क्या वो तुम्हारा अपना निर्णय है? या किसी ने तुम्हें पढ़ा दिया है? एक तोते को राम राम सिखा दो तो वह राम राम बोलता है। पर क्या तोते को राम का पता है? तुम्हारे बहुत से विचार तोते की रटन है। तीसरा उत्तर है शरीर से। यह बात लोग भूल जाते हैं। तुम्हारे विचारों का बड़ा हिस्सा तुम्हारे पेट से, तुम्हारी नींद से, तुम्हारे हार्मोन से, तुम्हारी सांस से आता है। भूखे आदमी के विचार और तृप्त आदमी के विचार अलग होते हैं। जिस दिन नींद पूरी नहीं हुई, उस दिन दुनिया दुश्मन लगती
है। जिस दिन धूप निकली और शरीर हल्का है, उस दिन वही दुनिया सुंदर लगती है। दुनिया नहीं बदली। तुम्हारी रसायन क्रिया बदली। तो कई बार जिसे तुम गहरा दार्शनिक विचार समझते हो वह केवल अपच है। हंसो मत यह बहुत गंभीर बात है। चौथा उत्तर है भविष्य से यानी इच्छा से। विचार केवल पीछे से नहीं आते। आगे से भी खींचे जाते हैं। तुम्हारी वासना, तुम्हारीकांक्षा, तुम्हारा भय, यह सब आगे की ओर विचार फेंकते हैं। मैं ऐसा बन जाऊंगा, मैं यह पा लूंगा, कहीं यह खो ना जाए, कहीं वो ना हो जाए। तो मन कभी अतीत में
दौड़ता है, कभी भविष्य में और बीच में जो वर्तमान है, वहां कभी नहीं ठहरता। क्योंकि वर्तमान में विचार का कोई काम ही नहीं। वर्तमान में बस होना है और विचार का धंधा तो तभी चलता है जब तुम होने से चूक हो अब तक मैंने तुम्हें चार उत्तर दिए पर मैं तुम्हें एक पांचवी बात बताता हूं जो सबसे गहरी है विचार कहां से आते हैं यह खोजने से पहले यह देखो कि तुम कौन हो जो उन्हें आते हुए देख रहा है क्योंकि यही सारा रहस्य छिपा है एक जैन गुरु के पास एक युवक आया और बोला
कि मेरे भीतर बहुत विचार चलते हैं मैं क्या करूं इन्हें रोकूं कैसे? गुरु ने कहा कि पहले मुझे एक विचार पकड़ कर दिखाओ। युवक आंखें बंद करके बैठ गया। घंटा भर बीत गया। फिर उसने आंखें खोली और बोला कि विचार तो आते हैं पर जैसे ही मैं पकड़ने जाता हूं वे गायब हो जाते हैं। गुरु मुस्कुराया और बोला कि जो पकड़ में ही नहीं आता उसे रोकने की चिंता क्यों? जो है ही नहीं उससे लड़ने में ऊर्जा क्यों खर्च करना? इसे ठीक से समझना। विचार बादल की तरह हैं। आकाश में बादल आते हैं, जाते हैं,
कभी काले, कभी सफेद, कभी गरजते हुए, कभी चुपचाप। पर क्या आकाश कभी बादल से लड़ता है? क्या आकाश कहता है कि यह बादल अच्छा है, इसे रोको। वो बादल बुरा है, उसे भगाओ। आकाश तो बस है। बादल उसमें होते हैं पर आकाश बादल नहीं होता। तुम वो आकाश हो। विचार तुम में आते हैं पर तुम विचार नहीं हो। इसीलिए प्रश्न का सबसे सच्चा उत्तर यह है कि विचार तुम्हारे भीतर के आकाश में उठते हैं और उसी में विलीन हो जाते हैं। जैसे लहर समुद्र से उठती है और समुद्र में ही लौट जाती है। लहर का
कोई अलग घर नहीं। तुमने कभी देखा है कि लहर कहां से आती है। उठती है समुद्र से और बनते ही मिटने लगती है। पर लहर को लगता है कि मैं कुछ हूं। मेरा नाम है, मेरा आकार है। वैसे ही विचार को लगता है कि मैं सत्य हूं। मैं महत्वपूर्ण हूं और तुम भी लहर के साथ एक हो जाते हो। भूल जाते हो कि तुम समुद्र हो। अब एक बात और जो थोड़ी कड़वी है पर जरूरी है। तुम विचारों से इतने परेशान इसलिए हो कि तुमने उनसे संबंध बना लिया है। विचार अपने आप में कोई समस्या
नहीं। समस्या है तादात्म में यानी पहचान। जब कोई विचार आता है कि मैं असफल हूं तो वो विचार केवल एक बादल है। पर तुम कहते हो कि हां मैं [गला साफ़ करने की आवाज़] असफल हूं। बस यहीं तुम फंस गए। विचार ने तुम्हें नहीं पकड़ा। तुमने विचार को पकड़ा। जैसे कोई आदमी जलती हुई मशाल को उठाए और फिर चिल्लाए कि मेरा हाथ जल रहा है। मशाल ने तुम्हें नहीं पकड़ा था। तुमने मशाल को पकड़ा था। छोड़ दो। हाथ ठंडा हो जाएगा। तुम पूछोगे कि छोड़ें कैसे? यही तो असली सवाल है। और इसका उत्तर कोई तकनीक
नहीं। एक समझ है और वह समझ है साक्षी होना। साक्षी का अर्थ है देखने वाला। जब तुम किसी फिल्म को देखते हो तो पर्दे पर हत्या होती है, प्रेम होता है, रोना-धोना होता है। पर तुम कुर्सी पर बैठे रहते हो। तुम जानते हो कि यह पर्दा है, मैं दर्शक हूं। जिस क्षण तुम भूल जाते हो और कहानी में कूद पड़ते हो, उसी क्षण तुम दुखी होने लगते हो। ध्यान का पूरा सार बस इतना है कि मन के पर्दे पर जो चल रहा है, उसके दर्शक बने रहो। कोई विचार आए, तो कहो कि अच्छा, एक विचार
आया। कोई भाव उठे तो कहो कि अच्छा एक भाव उठा ना स्वागत ना विरोध ना आओ ना जाओ बस देखो और एक चमत्कार घटेगा जितना तुम देखोगे उतना विचार कमजोर होगा क्योंकि विचार की ताकत तुम्हारी सहमति से आती है। जब तक तुम उससे जुड़ते हो वो जीवित रहता है। जब तुम केवल देखते हो वो धीरे-धीरे बुझने लगता है। जैसे लकड़ी के बिना आग बुझ जाती है। तुम्हारा ध्यान ही विचारों का ईंधन है और तुम इतने उदार हो कि 24 घंटे ईंधन डालते रहते हो अब जरा इस पर सोचो कि विचार इतने क्यों आते हैं क्योंकि
तुम्हारे भीतर एक अधूरापन है एक खालीपन है और तुम उसे भरना चाहते हो विचार उस खालीपन को भरने की कोशिश है। जैसे अंधेरे कमरे में आदमी गुनगुनाने लगता है ताकि डर ना लगे वैसे ही भीतर के सन्नाटे से डर कर मन बकबक शुरू कर देता है। मन को मौन से डर लगता है क्योंकि मौन में मन की मृत्यु है। मन जानता है कि जिस दिन भीतर पूरा सन्नाटा छाया, उस दिन उसकी दुकान बंद हो जाएगी। इसलिए वह शोर मचाता रहता है। और तुम उस शोर को अपनी जिंदगी समझ बैठे हो। पर एक बात बहुत ध्यान
से सुनना। इस सन्नाटे से डरो मत। यह खालीपन खाली नहीं है। यह भरा हुआ है। पर किसी ऐसी चीज से जिसे तुम्हारा मन पकड़ नहीं सकता। जैसे कमरे की खालीपन में ही कमरे का उपयोग है। दीवारों में नहीं उनके बीच की खाली जगह में। बांसुरी की उपयोगिता उसके खोखलेपन में है। जिस दिन तुम भीतर से खोखले बांस की तरह हो जाओगे, उस दिन परमात्मा तुम में से गीत गुनगुना सकेगा। अब मैं तुम्हें विचारों के बारे में एक और अद्भुत बात बताता हूं। जो विचार आते हैं, वे आते हैं और जाते हैं। पर उनके बीच में
एक अंतराल होता है, एक छोटा सा अंतराल। एक विचार गया, दूसरा अभी आया नहीं। उस बीच में जो क्षण है, वह क्षण ही ध्यान का द्वार है। तुमने उसे अनगिनत बार छुआ है, पर पहचाना नहीं। क्योंकि वह इतना सूक्ष्म है कि तुम्हारी नजर वहां ठहरती ही नहीं। तुम्हारा ध्यान या तो पिछले विचार पर टिका रहता है या अगले की प्रतीक्षा में रहता है। उस बीच के क्षण में तुम चूक जाते हो पर अगर तुम सजग हो जाओ तो वह अंतराल फैलने लगता है। पहले एक पल फिर दो पल फिर कुछ सासे और उस अंतराल में
जो मिलता है उसे कोई नाम देना कठिन है। कोई उसे शांति कहता है। कोई आनंद, कोई ईश्वर पर वो नाम से बड़ा है। एक सूफी फकीर से किसी ने पूछा कि आप इतने शांत कैसे रहते हैं? क्या आपके मन में विचार नहीं आते? फकीर हंसा और बोला कि आते हैं पर मैंने उनसे दोस्ती कर ली है। जैसे सराय में मुसाफिर आते हैं और चले जाते हैं। मैं सराय का मालिक हूं। मैं हर मुसाफिर का स्वागत करता हूं। पर किसी को स्थाई निवासी नहीं बनाता। इसीलिए सराय कभी भरी नहीं रहती और मैं कभी परेशान नहीं होता।
तुम्हारे साथ उल्टा हुआ है। तुमने हर मुसाफिर को स्थाई निवासी बना लिया है। हर विचार से रिश्ता जोड़ लिया है। फिर घर में भीड़ हो गई है और तुम चिल्लाते हो कि मुझे शांति चाहिए। शांति कैसे आएगी? जब घर में भीड़ ही भीड़ है। पहले मेहमानों को विदा करना सीखो। विदा करने का मतलब धक्के मारकर निकालना नहीं। वो भी एक पकड़ है। उल्टी पकड़। मतलब बस इतना कि जो आया उसे आने दो। जो जाए उसे जाने दो और तुम अपनी जगह बैठे रहो। जो ठहरा हुआ है वही स्वयं है। यहां एक और भ्रम तोड़ दूं।
कुछ लोग सोचते हैं कि ध्यान का अर्थ है विचारों को मार देना, मन को खाली कर देना। जबरदस्ती चुप कर देना। यह भूल है और बड़ी भूल है। जिसे तुम दबाते हो वह और जोर से उभरता है। जैसे गेंद को पानी के नीचे दबाओ तो वह उछल कर ऊपर आती है। जितना जोर लगाओगे उतनी ही तेजी से वह निकलेगी। इसलिए विचारों से लड़ाई मत करो। जो लड़ता है, वह पहले से हार चुका है। क्योंकि लड़ने वाला भी तो एक विचार ही है। एक विचार दूसरे विचार से लड़े तो परिणाम केवल और अधिक विचार है। तुमने
कभी आग को आग से बुझाते देखा है? तो रास्ता क्या है? रास्ता है स्वीकार और उसके साथ सजगता। जो है उसे वैसा ही देखो जैसा वह है। ना उसे सुंदर बनाओ, ना कुरूप। ना उसे हटाओ ना बढ़ाओ। जैसे ही तुम किसी चीज को पूरी तरह स्वीकार कर लेते हो, उसकी पकड़ ढीली हो जाती है। यह जीवन का बड़ा विरोधाभास है कि जिससे भागते हो, वो पीछा करता है और जिसे गले लगा लेते हो वो रूपांतरित हो जाता है। क्रोध को गले लगाओ तो वो करुणा बन जाता है। भय को देखो तो वह जागरूकता बन जाता
है। और अंत में मैं तुमसे वह बात कहना चाहता हूं जिसके लिए यह सारी बात की गई है। तुम पूछते हो कि विचार कहां से आते हैं और मैं तुमसे कहता हूं कि यह प्रश्न उतना महत्वपूर्ण नहीं जितना यह कि विचार किसे आते हैं। जब तुम इस प्रश्न पर लौटोगे कि मुझे विचार आते हैं तो यह मुझे कौन है तब तुम्हारी यात्रा सचमुच शुरू होगी। क्योंकि तुम पाओगे कि विचारों के पीछे कोई ठोस मैं नहीं है। मैं भी एक विचार है। सबसे पुराना, सबसे गहरा, सबसे जिद्दी विचार। जैसे प्याज की परतें खोलो तो अंत में
कुछ नहीं मिलता वैसे ही मैं की परतें खोलो तो वहां कोई केंद्र नहीं मिलता और उस ना मिलने में ही सब कुछ मिल जाता है। यह सुनकर डर लग सकता है। लगेगा ही। क्योंकि जिस मैं को तुमने जीवन भर संभाला वो कहे कि मैं नहीं हूं तो कौन नहीं घबराएगा। पर घबराओ मत। जो मिटता है वो केवल कल्पना थी। जो बचता है वो तुम हो। असली तुम जिसमें ना नाम है ना रूप ना इतिहास ना भविष्य बस एक शुद्ध उपस्थिति एक खुला आकाश एक जीवित मौन तो आज से एक प्रयोग करो कुछ भी बड़ा नहीं
कोई कठिन साधना नहीं बस जब भी कोई विचार आए तो एक पल रुक कर देखो कि यह कहां से आया और फिर देखो कि यह कहां जा रहा है बस इतना तुम पाओगे कि वह कहीं से नहीं आता और कहीं नहीं जाता वह बस उठता है और मिट जाता है जैसे पानी पर बनी रेखा और जिस दिन यह तुम्हारे लिए सिद्धांत नहीं अनुभव बन जाएगा उस दिन तुम हंसोगे इतना हंसोगे कि पूछोगे यह सब क्या मैं बेवजह ढो रहा था रात को सोने से पहले बैठ जाना आंखें बंद कर लेना सांस को आते जाते देखना
और जब विचार आए तो उनसे कहना कि स्वागत है पर आज मैं केवल देख रहा हूं कुछ दिन यह करो फिर देखना कि भीतर क्या खिलता है। जैसे रात के बाद सुबह आती है वैसे ही विचारों के बाद मौन आता है और मौन के बाद वह आता है जिसे शब्द कभी नहीं कह पाए। तो सार यह है विचार स्मृति से आते हैं, समाज से आते हैं, शरीर से आते हैं, इच्छा से आते हैं। पर इन सब के पार वे उसी चैतन्य के आकाश में उठते हैं जो तुम हो। उन्हें आने दो, उन्हें जाने दो और
तुम बस रहो। जैसे आकाश रहता है। जैसे नदी के किनारे बैठा वह आदमी अगर लकड़ियां उठाना छोड़ दे तो उसे पहली बार नदी दिखाई देगी और नदी के पार का आकाश भी। बस इतना ही। बाकी सब मौन में समझ आए।