भारत के अंदर एक बहुत बड़ा डीप स्टेट है। लेकिन सरप्राइजिंग बात यह है कि डीप स्टेट में और फाइव फ्रंट में दोनों में बहुत अंतर है। जब तक इन दोनों की क्लेरिटी नहीं होती आपको पता नहीं चलेगा कि आपका कौन सा एडवर्सरी आपको कमजोर कर रहा है। डीप स्टेट को बनाने की आवश्यकता इसलिए पड़ी क्योंकि पहली बात डीप स्टेट जो है वह भारत को इंटरनली दीमक की तरह खाएगा। और डीप स्टेट बनाया इस प्रकार से जाता है कि जो डीप स्टेट के एलिमेंट्स होते हैं उनको यह बात खुद ही नहीं कभी पता होती कि वह
उसके हिस्सेदार हैं। लेकिन वह अपना कार्य जीवन में नॉर्मल तरीके से करते हैं ताकि उनको सिर्फ यह लगे कि हम अपनी ड्यूटी कर रहे हैं। अपना कर्तव्य कर रहे हैं। लेकिन इवेंचुअली वो एक डीप स्टेट का हिस्सा हैं। फाइव फ्रंट में सबसे बड़ा फर्क यह है कि जो पॉइंट फाइव फ्रंट के भारत के अंदर के एलिमेंट्स हैं, वो यह जानते हैं कि वह भारत के अंदर बैठे हुए सांप हैं और वह सांप की तरह सिर्फ देश को डस रहे हैं। उनको मालूम है कि वह सांप की तरह बैठकर जे देश के अंदर जहर फैला रहे
हैं। लेकिन उसके बावजूद भी वह यह काम करते हैं क्योंकि उस काम के लिए उनको पैसा मिलता है, फेम मिलती है, पॉपुलैरिटी मिलती है। बाकी चीजें मिलती हैं। लेकिन भारत के अंदर के डीप स्टेट को अमेरिका ने बहुत साइलेंटली कंस्ट्रक्ट किया है। अमेरिका ने इसलिए उसको साइलेंटली कंस्ट्रक्ट किया है। बाकी दूसरे देशों ने कंट्रीब्यूट किया है। क्योंकि इन सभी को पहली बात तो यह पता थी कि भारत एक सिविलाइजेशनल स्टेट है। 3000 साल से अधिक यह देश एकिस्ट करता था करता है। करता रहेगा। अमेरिका यूरोप के देश जिनके खुद के कोई इतिहास नहीं है। दो
300 400 साल पहले बने हुए खास करके अमेरिका जैसा देश जो कि एक ब्रिटेन के क्रिमिनल एलिमेंट्स को जब बाहर फेंका गया एक अननोन लैंड में वहां पर जाकर जब उन्होंने वो एक क्रिमिनलिटी के तहत एक देश का गठन किया। जहां माफ कीजिएगा कि हमारे देश के लोग जाकर बड़ा फेमसली नौकर बनके उन कंपनियों के वहां पर काम करने में बड़ी दिलचस्पी पाते हैं। लेकिन हम ये चीज नहीं समझते कि यह वही अमेरिका है जो आपको साइलेंटली रोज डसता है। उसका सबसे बड़ा उदाहरण इस चीज से समझिए कि यहां पर अमेरिका ने डीप स्टेट भारत
में क्यों बनाया। उसका सबसे बड़ा कारण यह है कि अमेरिका को एक बात पता थी कि आज नहीं तो कल भारत के अंदर नेशनलिज्म की चर्चा होगी। जब-जब नेशनलिज्म की आईडियोलॉजी प्रोमिनेंट होती है तब-तब एक यूनिफाइंग फोर्स हमेशा देश में आगे बढ़ता है। जब-जब एक यूनिफाइंग फ़ आगे बढ़ता है तब-तब सिविलाइजेशनल रिवाइवल की चर्चा होती है। और डीप स्टेट का काम सिर्फ एक है। वो सिर्फ सिविलाइजेशनल रिवाइवल को मेजॉरिटेरियनिज्म और अथॉरिटेरियनिज्म ब्रांड करके उसको डिस्मेंटल करें। इसीलिए डीप स्टेट के एजेंट्स को कभी यह बात पता नहीं होती कि वो डीप स्टेट का हिस्सा हैं। वो
सिर्फ सिविलाइजेशनल रिवाइवल को मेजॉरिटेरियनिज्म और अथॉरिटेरियनिज्म के तहत देखते हैं। यह गेम कैसे होता है? इसको समझिए। आमतौर से जब आप इतिहास पढ़ते हैं तो इतिहास में सिखाया जाता है कि कुछ ऐसे राजा महाराजा थे। उन्होंने कुछ लड़ाईयां लड़ी। उन लड़ाईयों के तहत उन्होंने लैंड ऑक्यूुपाई करी। कुछ राजा महाराजा लैंड हारे। लड़ाइयों के तहत इतिहास गवाह है इस बात का कि जीवन आगे चलता रहा। समाज आगे बढ़ता रहा। साम्राज्य आगे बढ़ते रहे। इकोनॉमिक्स अर्थव्यवस्था हमें सिखाती है लॉ ऑफ डिमांड एंड सप्लाई कि मार्केट में कुछ चीज की डिमांड होगी। उसकी सप्लाई क्रिएट करनी होगी। वहां
पर स्टेट एक एंटिटी हो सकता है जो डिमांड को सप्लाई को मैनेज करें। या कई बार हम कहते हैं एक लिबरल स्टेट में कि स्टेट को होना ही नहीं चाहिए। इस नजरिए से आप चाहे इकोनॉमिक्स को देखें, आप चाहे सोशल साइंसेज में फॉर दैट मैटर लॉ को देखें, हिस्ट्री को देखें, किसी चीज को भी देखें तो वो एज अ डिसिप्लिन ग्रो करती है। लेकिन डीप स्टेट का सबसे इंपॉर्टेंट आइडियोलॉजिकल कोर अगर कुछ है तो वो है क्रिटिकल रेस थ्योरी। क्रिटिकल रेस थ्योरी का गठन 20th सेंचुरी में अमेरिका में हुआ। इसका गठन कुछ ऐसे लोगों ने
किया जिनको एक चीज यह समझ आ गई कि हम सोसाइटी को सिर्फ और सिर्फ बाइनरी नजरिए से देखना चाहते हैं। बाइनरी यानी कि दो लेंसेस लगा के। एक लेंस होगा जिस लेंस से मैं देखूंगा कि पावर स्ट्रक्चर में कौन है और दूसरा लेंस होगा जिससे सिर्फ मैं यह देखूंगा कि यह जो पावर स्ट्रक्चर में बैठा है यह किसको बेसिकली ऑप्रेस कर रहा है, दबा रहा है, मार्जिनलाइज़ कर रहा है। क्रिटिकल रेस थ्योरी। अभी खैर मैं यहां पर आपको सोशल साइंस की ये थ्योरी नहीं पढ़ाने जा रहा। ये मैं अपने यूपीएससी के विद्यार्थियों को पढ़ाता हूं।
लेकिन आप इस चीज को समझिए कि क्रिटिकल रेस थ्योरी एक साधारण लैंग्वेज में आपको सिर्फ यह सिखाती है कि पूरा विश्व बटा हुआ है दो प्रकार के एलिमेंट्स में। और विश्व में जब मैं यह वर्ड यूज करता हूं तो विश्व का मतलब है कि सारी संस्थाएं, सारा समाज, संस्था के अंदर रहने वाले लोग, समाज के अंदर रहने वाले लोग, संस्थाओं की विचारधारा सब कुछ सिर्फ दो बाइनरीज में बंटा हुआ है। एक ऑपरेस्ट कैटेगरी, एक ऑपरे कैटेगरी। यह जो कैटेगराइजेशन है यह बड़ा महत्वपूर्ण है। क्योंकि अगर आपने पूरे वर्ल्ड व्यू को इस बाइनरी कैटेगराइजेशन से देखना
शुरू कर दिया तो आप या तो अपने आप को सिर्फ ऑपरेस्ट मानेंगे और या फिर आप कहेंगे कि मेरे को ऑपरे से लड़ाई करनी है। लेकिन यह होता कैसे है? यह काम डीप स्टेट करता है। डीप स्टेट ये काम कैसे करता है? अमेरिका ने बड़े लंबे अरसे से भारत के साथ एकेडमिक नॉलेज बेस्ड इंगेजमेंट्स बना के रखे हैं। वह क्या करता है कि अमेरिका की जितनी प्रसिद्ध यूनिवर्सिटीज हैं वहां पर अगर आज की डेट में आप पब्लिक पॉलिसी इंटरनेशनल रिलेशंस फॉर दैट मैटर डेवलपमेंट स्टडीज पब्लिक रिलेशंस इन प्रकार के कोर्सेज करने के लिए अगर आप
किसी अमेरिका की यूनिवर्सिटी में अप्लाई करते हो तो अमेरिका की वो यूनिवर्सिटी इन कोर्सेज में आपके एप्लीकेशन को बड़ा केयरफुली एनालाइज करती है। पहली बात अमेरिका के अंदर एक कल्चर है कि वो एस्स लिखवाते हैं। उनकी यूनिवर्सिटीज एस्स लिखवाती हैं। एस्स इसलिए महत्वपूर्ण नहीं है कि वह आपकी अंग्रेजी की पकड़ देखना चाहते हैं। एस्स महत्वपूर्ण इसलिए हैं कि वह वहां पर यह चीज को स्टडी करते हैं कि क्या आपके अंदर वह विचारधारा है कि जिस विचारधारा के तहत यदि आपको यूनिवर्सिटी में ट्रेन किया गया तो ट्रेन करने के बाद क्या आप उस डीप स्टेट का
हिस्सा बन पाओगे या नहीं। अमेरिका एक बहुत सोची समझी रणनीति के तहत अपने इन इंस्टीटशंस को चलाता है। इसी रीजन से आप देखिए कि मेजॉरिटी अमेरिका के हावर्ड, येल, बॉस्टन इन सारी यूनिवर्सिटीज को सो कॉल्ड बड़े सारे फिलेंथ्रोपिस्ट्स जो अमेरिका में हैं वो आज की डेट में फंड करते हैं। और ये सारे फिलेंथ्रोपिस्ट्स जो हैं यह फंड करते हैं ओपन सोसाइटीज के अंदर ओपननेस को प्रमोट करना। जिसमें ओपननेस का शब्द जो है अमेरिका डिफाइन करती है डेमोक्रेसी को। और डेमोक्रेसी ये एक ऐसा वर्ड है जिसका अमेरिका प्रयोग करती है जब उसको अपने कन्वीनियंस को देखना
हो। तो भारत में सिविलाइजेशनल रिवाइवल हुआ तो वो डेमोक्रेसी के लिए थ्रेट है तो उसको मेजॉरिटेरियनिज्म अथॉरिटेरियनिज्म का टैग दे दो। लेकिन वापस आते हैं। अमेरिका गेम क्या खेल रहा है? अमेरिका करता है एक सिंपल पॉइंट। आपने यूनिवर्सिटी में एप्लीकेशन डाला। आपका एक एस्स होगा। उन एस्स को पढ़ा जाएगा। फिर आपके इंटरव्यूज होंगे। उन इंटरव्यूज के तहत जो जनरली ऑनलाइन पहले स्काइप पे होते थे। अब तो खैर बहुत सारे टूल्स हो गए जिसके थ्रू होता है। ये सारे इंटरव्यूज एंड एस्स के तहत एक चीज यह देखी जाती है सबसे पहले कि क्या आपके अंदर इंटरेस्ट
है सोशल जस्टिस में? क्या आपके अंदर इंटरेस्ट है मीडिया नैरेटिव में? क्या आपके अंदर इंटरेस्ट है सिविल सोसाइटी एक्टिविज्म में? ये एस्स को इतने केयरफुली एनालाइज करते हैं कि डेलीबेटली पब्लिक पॉलिसी हो गया, पब्लिक रिलेशंस हो गया, डेवलपमेंट स्टडीज हो गया, इंटरनेशनल रिलेशंस हो गया, एरिया स्टडीज हो गए। इन प्रकार के सारे कोर्सेज में यह पर्टिकुलर ट्रेट को देखकर सबसे पहले तो बच्चे को डेलीबेटली सिलेलेक्ट किया जाता है। इसको कहते हैं डीप स्टेट के अंदर फेज वन जिसको हम कहते हैं प्रीडिस्पोज़िशन फज़। प्रीडिस्पोजिशन क्योंकि यहां पर आपकी खुद की प्रीडिस्पोजिशन आपकी खुद का थॉट प्रोसेस
क्या वो अलाइन करता है कि आप इसका हिस्सा बन पाएंगे यानी नंबर वन जब आपको इसका हिस्सा बनने की एक मुहिम दिखती है उनको एक आपके अंदर वो आग दिखती है तो आपको सेलेक्ट करते हैं। दूसरा आपको जब सिलेलेक्ट करके यह अमेरिका में ले जाते हैं अमेरिकन यूनिवर्सिटीज के बारे में मैं एक पॉइंट बताना चाहता हूं और वह बड़ा महत्वपूर्ण है वो यह है कि वहां पर एकेडमिक सोशलाइजेशन होती है प्रीडिस्पोजिशन के बाद एकेडमिक सोशलाइजेशन का यहां पर मतलब सिंपल है कि आप जब किसी अमेरिकन यूनिवर्सिटी में जाते हैं खास करके इन स्पेसिफिक प्रोग्राम्स में
इन स्पेसिफिक ट्रेड्स को लेकर तो वहां पर यह चीज जज की जाती है कि क्या आप आज की डेट में नंबर वन टेक सेवी हैं या नहीं? क्या आप सोशल मीडिया पर नरेटिव फ्लिपिंग का काम कर सकते हैं या नहीं? अब आप समझ रहे हैं आज की डेट में जिस प्रकार से नरेटिव फ्लिपिंग टेक सेवी लोगों ने एक शब्द को पकड़ कर उसके तहत एक मुहिम चला दी और कुछ बिलियंस ऑफ फॉलोवर्स इकट्ठे कर लिए। तो यह एक स्किल है जो बहुत लंबे समय से अमेरिका ढूंढती है टेक्स हैवीनेस। दूसरा स्किल वो ये देखते हैं
एकेडमिक सोशलाइजेशन में कि आप कितना समय जो है यूनिवर्सिटी के अंदर क्लासरूम और लाइब्रेरी में बिता रहे हो। कितनी आयरोनिकल बात है कि अमेरिका के अंदर यूनिवर्सिटी के अंदर यदि आप इन प्रकार के स्पेसिफिक कोर्सेज को अगर करने गए हो तो यह कोर्सेज में आपको अगर लाइब्रेरी में या क्लासरूम में ज्यादा देखा गया तो आपकी परफॉर्मेंस अच्छी नहीं मानी जाएगी। आपकी रिपोर्ट कार्ड अच्छी नहीं बनेगी। क्योंकि इन कोर्सेज में यह देखा जाता है कि व्यक्ति पहली बात कितना ज्यादा एक एंटी कॉलेज व्यू रखता है। क्या वो एंटी प्रोफेसर व्यू रखता है? कितना ऑोजिशन करता है?
कितना वो वहां पर जो है वॉकआउट्स करता है। कितने ज्यादा प्रोटेस्ट्स करता है। कितने ज्यादा सिटिं्स करता है। सिट इन यानी कि बैठक वहां बैठ गए जमावड़ा लगा के। धरना देना जिसको हम साधारण भाषा में कहते हैं। तो आप सोच के देखिए कि आपका प्रीडिस्पोजिशन इन्होंने पहले ही जज किया कि वो एंटी एस्टैब्लिशमेंट है। फिर प्रीडिस्पोजिशन के बाद आपकी एकेडमिक सोशलाइजेशन में प्रायोरिटी और प्रेफरेंस दी गई एक ब्राइट स्टूडेंट का स्टार लगा के उस व्यक्ति को जिसने इस प्रकार के प्रोटेस्ट और धरने और यह प्रकार की चीजें वहां पर शो करी। इसके बाद होती है
कैंपस ट्रेनिंग। कैंपस ट्रेनिंग में क्या होता है कि जो पूरा एकेडमिक करिकुलम है वो पूरा एकेडमिक करिकुलम इन सारे कोर्सेज में डिज़ होता है इस तरीके से जो क्रिटिकल रेस थ्योरी के नजरिए से ही आपको चीजों को एनालाइज करने की क्षमता सिखाता है। तो वहां पर क्या हो रहा है? आपको क्रिटिकल रेस थ्योरी में ट्रेनिंग दी जा रही है। ट्रेनिंग क्या दी जा रही है? बार-बार यही ट्रेनिंग दी जा रही है एक तरीके से सिंपल लैंग्वेज में कि आपको एंटीस्टैब्लिशमेंट होना है। इस्टैब्लिशमेंट एक ऑपरे उस ऑपरे को अपोज कीजिए। ऑप्रेस्ड कौन है? आम जनता। ऑपरेस्ट
कौन है? नॉर्मल लोग। ऑपरेस्ट कौन है? कोई स्पेसिफिक ग्रुप। आप एक चीज को ऑब्जर्व कीजिएगा। जितने भी भारत में कभी भी कोई प्रोटेस्ट होता है, मैं सिर्फ अभी के प्रोटेस्ट की बात नहीं कर रहा। मैं आपको कह रहा हूं कि आप भारत की प्रोटेस्ट हिस्ट्री को खोल के देखो। आप 1950 से लेकर आज तक के प्रोटेस्ट देखो। आप एक पिकुलियर पॉइंट देखोगे कि सारे प्रोटेस्ट क्रिटिकल रेस थ्योरी के इस लेंस ऑप्रेस वर्सेस ऑप्रेसर इसी एंगल से शो किए गए हैं। और यह इनको शो करने का एक रीजन है कि जा जब आप इस रीजन से
काम करते हो तो होता क्या है कि आपकी थिंकिंग पूरी बाइनरी है। आपकी एकेडमिक ट्रेनिंग यही थिंकिंग ऑफ बाइनरी थिंकिंग के तहत ही मोल्डेड थी। इस कॉन्टेक्स्ट में यह कहना कतई गलत नहीं होगा कि यह जो बाइनरी थिंकिंग थी इस थिंकिंग से जो एकेडमिक ट्रेनिंग हुई इसके बाद जब आपको वापस भेजा जाता है तो फिर आप एक ऐसे व्यक्ति होते हो जो इन प्रकार के डिग्रेडेशन ऑपरेशंस के लिए बिल्कुल ट्रेंड होते हो। कितनी सरप्राइजिंग बात है कि अभी कल अमेरिका की एक सिंगर जो है जिसका नाम है मैरी मिलबेंड उसने एक बड़ी इंपॉर्टेंट स्टेटमेंट दी।
उसने कहा कि कॉकरोच जनता पार्टी जो भारत में गतिविधियां कर रही है उनके अगर कुछ लोगों का इतिहास देखो तो वो अमेरिकन यूनिवर्सिटीज में यहां पर आकर रेडिकलाइज हुए थे और वो वापस जाकर ये गतिविधियां कर रहे हैं और अंत में उसने यह बात भी बोली कि जब इनकी प्रोटेस्ट की स्टीम खत्म हो जाती है यानी कि प्रोटेस्ट फिसड्डी बन जाते हैं जैसे हमारे नेता विपक्ष अक्सर करते हैं और फिसड्डी टाइप के प्रोटेस्ट निकलते हैं उस प्रकार के वो कहती हैं कि जब उसके प्रोटेस्ट खत्म हो जाते हैं स्टीम निकल जाती है तो तो ये
यूनिवर्सिटीज और इनके जितने फंडर्स और फंड रेर्स हैं वो इनको लात मार देते हैं। सरप्राइजिंग बात थी कि मिलबिंड ने जब ये स्टेटमेंट दिया उस स्टेटमेंट के तुरंत बाद अभिजीत दीप के क्लेरिफिकेशन दे रहा है। उसने तो कुछ ऐसा बोला ही नहीं। उस व्यक्ति को इतनी चूल क्यों मच गई कि उसको क्लेरिफिकेशन इशू करना पड़ा। तो आप समझिए यह चीज आज की नहीं है। यह चीज भारत की जिस प्रकार से डीप स्टेट बना हुआ है। यह डीप स्टेट आज की डेट में भारत के एकेडमिक रेल्म में भी है। भारत के यूनिवर्सिटीज कॉलेजेस में भी है।
भारत के यूनिवर्सिटीज कॉलेजेस को छोड़कर भारत की मिलिट्री में भी है। भारत के इंटेलिजेंस में भी है। भारत की पुलिस में भी है। भारत के प्रशासन में भी है। हर जगह पर इस विचारधारा के एलिमेंट्स आपको मिलेंगे। भारत के इतिहासकार हैं जिनके ऊपर तो खैर अब कई किताबें लिखी जा चुकी हैं। तो आप चीज को समझिए कि ये डीप स्टेट जो है एक स्पेसिफिक एलिमेंट है। इस डीप स्टेट को कभी यह नहीं पता होता कि हम डीप स्टेट का हिस्सा हैं। लेकिन यह जो अपना कर्तव्य सो कॉल्ड कर रहे होते हैं। इनको लगता है कि
हम अपने कर्तव्य को कर रहे हैं क्योंकि वो हमारा धर्म है। आपका जो कर्तव्य और धर्म है। लेकिन आप यह नहीं समझ रहे कि उस कर्तव्य और धर्म के पीछे आपकी एक प्रीडिस्पोजिशन थी। जिसके बाद आपकी एकेडमिक सोशलाइजेशन हुई और उसके बाद जो कैंपस ट्रेनिंग हुई और जब आपको वापस भेजा गया यह एक पूरा प्रोसीजर था जिस चारों स्टेप्स के तहत आपको यहां पर कंस्ट्रक्ट करके भेजा गया है। लेकिन जाहिर सी बात है कि हम लोगों के पास अनफॉर्चूनेटली आज तक इसका कोई काउंटर नहीं है। हमारे पास आज तक इसका कोई सॉल्यूशन नहीं है। अभी
भी हमें सिर्फ इन्हीं कॉलेजेस यूनिवर्सिटीज में जाकर पढ़ाई करनी है। लेकिन बिना सोचे समझे कि क्या प्रीडिस्पोजिशन से हम वहां पर जा रहे हैं। क्या एकेडमिक सोशलाइजेशन हो रही है और इसके बाद क्या हमारी आज की डेट में कैंपस ट्रेनिंग हो रही है और इसका कॉन्सिक्वेंस सोसाइटी को और सोशल लेवल पर क्या झेलना पड़ रहा है?