एविडेंसेस हैं रामायण के। रामायण में वर्णन की हुई जनजातियों का हमने डीएनए एनालिसिस किया। 5 6000 इयर्स पहले वो ट्राइब्स उसी नाम से जानी जाती थी जो आज भी जानी जाती हैं। हमने देखा नॉर्थ इंडियन माइग्रेशन नॉर्थ इंडियन इलीट ग्रुप जाता है साउथ श्रीलंका में और अपनी लैंग्वेज को देता है वो। वो इतना इललीट है वो ग्रुप कि जो लोकल जो लोग हैं वहां के उस लैंग्वेज को अडॉप्ट कर लेते हैं। सेलिस्ट को आप अगर प्लेस करेंगे तो इंडोरियन लैंग्वेज में उसको आप रखोगे। हम काम कर रहे हैं सनौली पे। वहां पे रथ मिला। एक
वार चैरियट है। वह ऐसा रथ है जिसमें कि सोने [संगीत] की भी नेल्स लगे हुए हैं। कॉपर का नेल्स लगे हुए हैं। रथ को देख के लगता है कि कोई एक राजा उसका जो है स्वामी रहा होगा। उसी टाइम पे हमें बहुत सारे वेपन्स मिलते हैं उस एरिया में। लाखों वेपंस मिलते हैं। डेडली वेपन्स हैं वो। एक हारपुन का जो वजन है 4 टू 5 kg। अगर किसी के ऊपर अटैक हुआ कोई बचने के चांसेस इंपॉसिबल है। ये भारत की ये सिविलाइजेशनल हिस्ट्री कितनी पीछे तक जाती है। अबाउट 1 लाख इयर्स एगो। धरती के कुछ
ही भागों पे ह्यूमंस थे। जैसे कि वेस्टर्न पार्ट ऑफ अफ्रीका एंड कुछ पार्ट था सदर्न अफ्रीका के। वहां पे ह्यूमंस थे। हिंदुस्तान में अगर देखा जाए इंडिया में तो 70,000 इयर्स पहले यहां पे पहला जो है इंसान का कदम पड़ा। जैसे होमोसेपियंस माइग्रेट करके भारत की तरफ बढ़े होंगे। तो यहां जब आए होंगे तो उनको होमोसेपियंस तो मिले नहीं होंगे। यहां पे होमड्स थे। हमें टूल्स मिलते हैं यहां पे हाथों द्वारा बनाया हुआ टूल्स जिसका एज जो है 15 लाख साल पहले तक पत्थर के टूल्स मिलते हैं। जो होमोसेपियंस था वो बहुत सारे अदर होमोनिड्स
से इंटर मिक्सिंग में ही हुआ है। एक और ब्रांच है होमोनिड्स का इसको बोलते हैं डेनिस ओवंस। तो उससे भी ह्यूमन जो है मिक्स किया। तो तिब्बत के जो लोग हैं उनके अंदर जो अडॉप्टेशन वाला जो जीन है वो आई डेनिस वोन से आई है। तो आपको लगता है क्या मैटर जैसे अपने आप को आगे बढ़ा रहा है तो मैटर से जुड़ी हुई कॉन्शियसनेस भी अपने को इवॉल्व कर रही है। एक मेडिटेशन से एक घंटे के मेडिटेशन से आपकी पूरे के पूरे बॉडी में बहुत सारे चेंजेस होंगे। एटॉमिक लेवल पे चेंजेस होंगे। डीएनए का जो
एक्सप्रेशन है आप उसको मेंटली आप उसको चाहो तो सब कंट्रोल कर सकते हैं। तो एएसआई एनआई में भी बहुत डिफरेंस तो होगा नहीं। कोई डिफरेंस नहीं है। जैसे कि तमिल ब्राह्म्स हुए उसमें ज्यादा नॉर्थ इंडियन हिस्ट्री है। तो ओवरऑल अगर देखा जाए नॉर्थ टू साउथ सबकी जेनेटिक एनसीस्टिटी ऑलमोस्ट सेम है। एक ही कम्युनिटी के लोग हैं बट उनके बीच में शादियां नहीं हुई है। सेम गोत्र में शादी उसको पाप माना जाता रहा होगा। गोत्र सिस्टम कितना पावरफुल एक सोशल टूल था जिसकी वजह से हमें बहुत सारी बीमारियों से बचने का मौका मिला। बट उसके बाद
जो रूढ़िवादी लोगों ने कास्ट बनाया है जो कि एक तरह से काफी हेल्थ के पॉइंट ऑफ व्यू से काफी बुरा भी है। मैं अयोध्या जैसी बेल्ट में पैदा हुआ हूं कि मैं कितना अरेबिक, कितना मंगोलियन या कितना प्योर इंडियन मैं ब्राह्मण हूं गंगा प्लेन का यूपी का। हमने काम किया है दलितों पे भी काम किया है। तो हमें तो जेनेटिक डिफरेंस नहीं देखने को मिला। ज्यादा डिफरेंसेस नहीं है। दलितों एंड ब्राह्मण में। ये तो मैं फर्स्ट टाइम बोल रहा हूं यहां जेनेटिकली। मेरे पास डाटा भी है। नीरज जी नमस्ते नमस्ते हम बहुत दिन से आपसे
मिलना चाह रहे हैं बात करना चाह रहे हैं और फाइनली आज हम मिल पा रहे हाइपरक्वेस्ट पर पिछले दो साल से हम लोग भारत की सिविलाइजेशन पर मंथन कर रहे हैं। इस सीरीज में हम लोग स्क्रिप्चरल एविडेंसेस लेते हैं। इसके साथ-साथ हम आर्कियो एस्ट्रोनॉमी पर बात करते हैं। आर्कियोलॉजिकल भी जो एविडेंसेस हैं उस पर हम बात करके एक बार देखने का प्रयास करते हैं कि भारत का जो इतिहास है कितना प्रचुर है। तो जहां यह हमें देखने को मिलता है कि भारत एक ऐसी सभ्यता है जिसका इतिहास इतना बड़ा है। वहीं दुर्भाग्यपूर्ण यह भी लगता
है कि उस इतिहास को हम बहुत अच्छे से डॉक्यूमेंट नहीं कर पाए हैं। अगर डॉक्यूमेंट किए भी हैं तो हर एक चीज पर कुछ ना कुछ हमें विरोधाभास मिलेगा। कुछ डिफरेंट थ्यरीज मिलती हैं। पर आपके साथ बैठने में मुझे यह था कि आप आर्कियोजेनेटिक्स में काम कर रहे हैं। मॉलिक्यूलर बायोलॉजी में काम कर रहे हैं। एक साइंटिफिक व्यू पॉइंट से हम भारत की हिस्ट्री को समझ पाएंगे। तो मेरे लिए एक बहुत इंपॉर्टेंट पडकास्ट था ये कि आपके साथ बैठूं और समझने का प्रयास करूं कि भारत का इतिहास कैसा है और पहला प्रश्न तो मेरा यही
रहेगा कि इसी से प्रारंभ करते हैं। आप जितना पीछे मुझे ले जा सकते हैं, दर्शकों को ले जा सकते हैं, उतने पीछे ले जाइए कि भारत के लोग कहां से कैसे सेटल हुए? यहीं पर उनका ओरिजिन है या बाहर से आकर सेटल हुए। इस पर आइडियोलॉजिकल वॉर्स भी है। बट हम प्योर साइंटिफिक व्यू पॉइंट से जानना चाहते हैं कि भारत की ये सिविलाइजेशनल हिस्ट्री कितनी पीछे तक जाती है। देखिए मेरी जो लिमिटेशन ये है कि जो भी मैं आपके सामने फैक्ट पेश करूंगा वो सारे फैक्ट्स होंगे साइंटिफिक। जैसे हिस्टोरियंस बात करते हैं डाटा इकट्ठा करके
और जो भी उनके नरेटिव्स होते हैं उनको सेट करते हैं। तो जैसा कि आपने पूछा कि जो भारत का जो इतिहास है जो होमोसेपियंस है हिंदुस्तान में कब से है? तो मैं आपको बताना चाहूंगा कि अबाउट 1 लाख इयर्स एगो 1 लाख साल पहले धरती के कुछ सी कुछ ही भागों पे ह्यूमंस थे। जैसे कि वेस्टर्न पार्ट ऑफ अफ्रीका एंड कुछ पार्ट था सदर्न अफ्रीका के वहां पर ह्यूमंस थे। तो जो हमारा इतिहास है काफी जो टाइम स्केल में काफी संकुचित है। तो 1 लाख इयर्स आप जाओगे पहले तो आपको कहीं पे भी नहीं मिलेगा
होमोसेपियंस के ट्रेसेस। बट और भी होमोनीड्स थे। जैसे कि हम बात करते हैं पैकिंग मैन, जावा मैन और होमोइक्टस वो लाइकली हो सकता है कि साउथ एशिया में रहे हो बट होमोसेपियंस कहीं नहीं थे। और 70 हजार साल से लेकर के 1 लाख साल पहले जो फर्स्ट वेव ऑफ़ माइग्रेशन स्टार्ट हुआ अफ्रीका से। ठीक है? वहां पे एक बहुत ही त्रासदी आई। सूखा पड़ा जो सबसे जो है बेस्ट फिटेड मॉडल है। सूखा पड़ा और वहां से माइग्रेशन स्टार्ट हुआ। और डिफरेंट वेव्स ऑफ़ माइग्रेशन हुए। और जो जो सबसे अर्लियस्ट वेव है वो है साउथ एशिया
एंड साउथ ईस्ट एशिया एंड ऑस्ट्रेलिया की तरफ जो है माइग्रेशन हुआ। उसके बाद जो है सेकंड वेव ऑफ़ माइग्रेशन हुआ टुवर्ड्स यूरोप वेस्ट यूरोशिया। तो हिंदुस्तान में अगर देखा जाए इंडिया में तो 70000 इयर्स पहले यहां पे पहला जो है इंसान का कदम पड़ा होमोसेपियंस। होमोसेपियंस का बट उसके पहले भी यहां पे होम नीलीड्स थे। ह्यूमन लाइक जो था एक मनुष्य हो सकते हैं कि यहां पर रहे हो। उसके एविडेंसेस मिलते हैं। हमें टूल्स मिलते हैं यहां पे हाथों द्वारा बनाया हुआ टूल्स जिसका एज है 15 लाख साल पहले तक पत्थर के टूल्स मिलते हैं।
ठीक है? वो होमोसेपियंस नहीं थे। वो होमोसेपियंस नहीं थे। वो हमारी एक सिस्टर स्पीशीज रही होगी बट उसके हमारे पास कोई फॉसिल एविडेंस नहीं मिलता है। ठीक है? तो हमारा इतिहास 70,000 साल पहले स्टार्ट हुआ भारत का इन डीप पास्ट ऑफ टाइम। उसके बाद से डिफरेंट माइग्रेशंस एक्सटिंशन के प्रोसेस हुए और सर्वाइवल के लिए जो है लड़ाईयां हुई अडॉप्टेशन हुआ डिफरेंट एनवायरमेंटल प्रेशर हुआ उसके बाद से एलजीएम आया लास्ट ग्लेसियल मैक्सिमा उसमें जो है कुछ पार्ट ऑफ इंडिया के भी जो है अफेक्टेड हुआ तो माइग्रेशंस होते गए होते गए मिक्सिंग्स हुई डिफरेंट वेव ऑफ माइग्रेशंस
हुए और उससे जो है बाद में जो है हमारा एक साउथ एशियन स्पेसिफिक जो है एनसेेस्ट्री डेवलप हुई तो 70,000 साल से लेकर के अभी तक माइग्रेशंस के बहुत सारे इवेंट्स हुए, मिक्सिंग के इवेंट्स हुए, एक्सटिंशन के इवेंट्स हुए और उसमें जाकर के हम जो है बचे। तो जो अभी जो ह्यूमन है हिंदुस्तान में उसमें आपको तरह-तरह के एनसेेस्टि मिलेगी। नॉर्थ इंडिया में जाएंगे तो उसके एनसेेस्ट्री का जो पैटर्न अलग होगा। साउथ ईस्ट साउथ इंडिया में उसके एनसेेस्ट्री के पैटर्न्स अलग होंगे। ऑस्ट्रोसियाटिक जो ट्राइब्स हैं जैसे कि उड़ीसा, झारखंड, छत्तीसगढ़ में उनका जो एनसेेस्ट का
कंपोनेंट्स अलग होगा। बट अगर हम सबको मिला मिला लें तो 95% जो एनसीटी है ऑलमोस्ट सेम है। जो डिफरेंसेस है सिर्फ 5% में ही है। 5 टू 6% में उसी डिफरेंसेस को लेकर के हम बात करते हैं कि कौन किसके क्लोज है कौन कितना डिफरेंस है। फिर उसको हम फिर लैंग्वेज से जोड़ते हैं कि अगर कोई एक एक ग्रुप है जो एक दूसरी लैंग्वेज में बात कर रही है। दूसरा ग्रुप दूसरी लैंग्वेज में बात कर रही है। बट उनकी जेने एनस्टिटी सेम है। तो जो लैंग्वेज है वो तो बहुत तेजी से चेंज हो जाती है।
बट जो हमारी इंसेस्टिटी है वो हमारे शरीर के अंदर रहती है और वो जो है उसको हम ट्रेस बैक कर सकते हैं अप टू 10,000, 15,000 इयर्स पहले तक हम जा सकते हैं और देख सकते हैं कि उसका जो है इवोल्यूशन कैसे रहा होगा। उसकी जो माइग्रेशन हिस्ट्री कैसे रही होगी? उसके एनसेेस्टर कैसे रहे होंगे? वो सारी इंफॉर्मेशन को इकठ्ठा करने के लिए हम लोग काम कर रहे हैं। इससे पहले आगे बढ़े अह दो क्विक क्वेश्चंस हैं मेरे। एक तो मुझे यह समझ में आया कि होमोसेपियंस के पहले जो दूसरी स्पीशीज थी वो थी अक्रॉस
ग्लोब थी होमोसेपियंस अफ्रीका में इवोल्यूशन उनका हुआ तो आपको क्या लगता है वहां ऐसी क्या नेचुरल सिलेक्शन हुआ होगा कि होमोसेपियंस एक्सप्रेस हो पाए कुछ स्पेशल देखिए जो रीजन है वो हमें पता नहीं है। ठीक है? लेकिन हमारा जो क्लोजेस्ट रिलेटिव है वो है चिंपैंजी। हम तो जब टी डीएनए देखा गया चिंपैंजी का और होमोसेपियंस का तो उसमें काफी समानता मिली। 99% के आसपास जो है हमारा डीएनए एक है। और अफ्रीका में हम इसलिए बोलते हैं कि ह्यूमन इवॉल्व हुआ क्योंकि जो जितने भी ह्यूमन के फॉसिल मिलते हैं एंड टूल्स मिलते हैं। वो अफ्रीका में
ही मिलते हैं। होमोसेपियंस द्वारा बनाया गया हुआ टूल। अगर हमें इंडिया में मिलता है होमोसेपियंस द्वारा बनाया हुआ टूल 1 लाख साल पहले तो हम क्लेम कर सकते हैं कि जो ह्यूमन हो है वो इंडिया में इवॉल्व हुआ लेकिन हमें कोई टूल नहीं मिलता है। वैसे यूरोप में कोई टूल नहीं मिलते हैं जो कि 1 लाख साल पहले जिसका डेट जो जाए ऐसे ऑस्ट्रेलिया में नहीं मिलता है अमेरिका में नहीं मिलता है। तो जो 2 लाख, 3 लाख, 4 लाख, 5 साल के पहले के जो टूल्स मिलते हैं होमोसेपियंस के वो अफ्रीका में ही मिलते
हैं। तो इससे ये एक हाइपोथेसिस निकल के आती है कि मॉडर्न ह्यूमन अफ्रीका में ही इवॉल्व हुआ होगा। तो इसमें कोई स्टडी ऐसी हुई है क्या कि अफ्रीका की क्या वो एनवायरमेंट या नेचुरल टेंडेंसीज थी कि जो अलग-अलग जगह पे होमोसेपियंस नहीं इवॉल्व हुए। अफ्रीका में ही स्पेशल ऐसा क्या देखिए पूरे ऑल ओवर वर्ल्ड में होमोनिड्स थे। हां। ह्यूमन लाइक स्पीशीज बट ऐसे 10 स्पीशीज हैं ह्यूमन लाइक स्पीशीज। तो उसमें से कोई एक ही जो है डवर्सिफाइड होगा। उसके डीएनए में कुछ चेंजेस होंगे जो कि एक अलग ब्रांच बनाएगा। ठीक है? और ये सब जो
प्रोसेस होता है ना रैंडम होता है रेंडम होता है कि हमारे अंदर कुछ ऐसे म्यूटेशंस हुए जैसे कि हमारे एक अलग ब्रांच आउट हुआ। ठीक है? और वो एक मॉडर्न स्पीशीज को जन्म दिया। ऐसे बहुत सारे स्पीशीज बनते रहते हैं। एक्सटिंक्ट होते रहते हैं। लाखों स्पीशीज धरती पे हैं। उसी में से एक ह्यूमन भी है। ठीक है? तो एक ब्रांचिंग आउट हुआ जो कि एक रैंडम प्रोसेस होता है। इसीलिए जो है वो अफ्रीका में अफ्रीका में म्यूटेशन हो गया और दूसरी जगह नहीं हुआ। तो वो फिर म्यूटेशन हुआ। फिर डवर्सिफाइड हुआ। काफी म्यूटेशंस और उसी
लाइन में बढ़ते गए। ठीक है? तो वो एक ब्रांच जो है निकला और होमोसेपियंस को का जो है वहां से बर्थ हुआ। ये प्रोसेस जरूर एक स्लो प्रोसेस रहा होगा। मैं आपको सुनता हूं और वैसे भी हम सोचेंगे तो हजारों वर्षों का इसमें समय लगता है। एक चीज इसमें और प्रश्न आता है जैसे होमोसेपियंस माइग्रेट करके भारत की तरफ बढ़े होंगे। तो यहां जब आए होंगे तो उनको होमोसेपियंस तो मिले नहीं होंगे। बिल्कुल। तो जो आप मिक्सिंग की बात कर रहे हैं वो जो यहां के होमिनिट्स थे उनसे भी मिक्सिंग हुई है। क्या ऐसा? हां
बहुत अच्छा क्वेश्चन आपका हो सकता है कि मिक्सिंग हुई हो लेकिन जो होम मिनिट्स थे यहां पे उसके बारे में हमें कोई इनेशन नहीं है। तो वो जो है एक एक वो एक ब्लैंक स्पॉट है जिसके बारे में हमें जानकारी नहीं है। लेकिन जो हमारा डीएनए सीक्वेंस है वो ऑल ओवर दुनिया में जितने भी स्पीशीज मतलब अह ह्यूमन के जो अह जो पापुलेशंस हैं उसे पूरी तरह से मैच करती है। तो जिसकी संभावना कम है कि मिक्सिंग हुई होगी। ये भी होता है कि हो सकता है मिक्सिंग हुई हो और जो बहुत सारे ऐसे ब्रांचेस
होमोसेपियंस के इंडिया में जो एक्सटिंक्ट हो गई हो। ठीक है? ऐसा नहीं है कि अगर होमोसेपियंस इंडिया में आए और 70,000 इयर्स पहले तो बहुत सारे ऐसे ह्यूमंस के ब्रांच बने होंगे वो सारे सर्वाइव किए हो। उसमें से कुछ ही सर्वाइव किए हैं। बाकी सब एक्सटिंक्ट हो गए। तो जो इसीलिए बोलते हैं जो होमोसेपियंस है थ्रू आउट द वर्ल्ड उसमें जो समानता काफी ज्यादा है। अगर आप सिर्फ चिंपैंजी देखें अफ्रीका का तो उसकी जो डायवर्सिटी होगी वो पूरे जो ह्यूमंस हैं उनके डायवर्सिटी से पांच गुना ज्यादा है। अच्छा सिर्फ अफ्रीका में मतलब इतने तरह के
चिंपैंजी हैं। एक्सक्टली। तो इसीलिए बोलते हैं कि जो डीएनए वाइज जो हमारा डीएनए सीक्वेंसिंग जो डाटा है वो ये बोलता है कि जो ह्यूमन डायवर्सिटी है काफी कम है। अगर आप ग्लोबल डायवर्सिटी देखें तो एक दूसरे से डायवर्सिटी तो है बट जो ग्लोबल डायवर्सिटी है काफी कम है। तो वो एक स्पीशीज के लिए अच्छा नहीं होता है क्योंकि हमको बहुत ज्यादा डवर्सिफाइड होना चाहिए। मतलब हमारी बहुत ढेर सारी जो ऐसी स्पीशीज हुई जो म्यूटेशन से आई वो जी नहीं पाई। एक्सैक्ट्ली वो एक्सटिंक्ट हो गई होंगी। और पास्ट में क्या हुआ कि जो होमोसेपियंस था वो
बहुत सारे अदर होमोड से इंटर मिक्सिंग भी हुआ। जैसे कि आप यूरोप में देखेंगे नेदथल्स। अच्छा नेदथल से होमोसेपियंस मिक्स किया और उसके कुछ डीएनए के जो चंग्स हमारे डीएनए में इंटीग्रेट हुए और जिसको कि हम आज भी कैरी करते हैं। यूरोपियंस में दो से 3% जो यूरोपियंस हैं उसमें डीएनएथ का डीएनए है। ठीक है? तो वो तो हमें इसलिए चला पता क्योंकि नएथल का हमें डीएनए मिला। हम उसको सीक्वेंस कर पाए। तब चला पता कि हम मिक्सिंग उससे हुई है। वैसे एक और ब्रांच है होमोनिड्स का जिसको बोलते हैं डेनिसोवंस। अच्छा तो उससे भी
ह्यूमन जो है मिक्स किया और डेनिसोवंस के भी जो है हमारे अंदर डीएनए आया। उससे हमें बहुत सारे ऐसे मिले एडवांटेज ट्रेट्स मिले। जैसे कि जो है कोल्ड अप्टेशन तिब्बत के जो लोग हैं उनके अंदर जो एडप्टेशन वाला जो जीन है वो आई डेनिस वन से आई। तो यह भी काफी एक सरप्राइजिंग फाइंडिंग थी जो कि आज के चार पांच साल पहले डिस्कवर हुई। तो ऐसे हो सकता है कि बहुत सारे ऐसे मिक्सिंग इवेंट्स हुए होमोसेपियंस में बट हमें पता नहीं उसके बारे में। हो सकता है कि अफ्रीका में ही एक दूसरे स्पीशीज से हम
मिक्स हुए हो। बट हमें जो है उसके बारे में पता नहीं है। इनफेशन नहीं है। मतलब अफ्रीका से जो होमोसेपियंस जिनको हम समझ रहे हैं हो सकता है कि हम जो होमोसेपियंस हैं वो एग्जैक्ट सेम स्पीशीज ना हो। एक्सैक्ट्ली अभी जो आप मिक्सिंग की बात कर रहे थे कि 5% ही डिफरेंस है। बाकी सबकी एनसेेस्ट्री लगभग सेम है। यह डिफरेंस 5% का क्यों अगर हम वही हैं हम तो जो ह्यूमिनिट से मिक्सिंग हुई है उसकी वजह से 5% डिफरेंस है। नहीं नहीं जो डिफरेंसेस इसलिए होता है क्योंकि जैसे कि एक जनरेशन से दो जनरेशन में
जब इंसान जाता है या तीसरे जनरेशन में तो हमारे डीएनए के अंदर कुछ होते हैं म्यूटेशंस। तो उस म्यूटेशन को रोकने के लिए हमारे एक मैकेनिज्म भी होती है। बट वो मैकेनिज्म भी कभी काम मतलब हो सकता है कि उतना फुल प्रूफ काम ना कर पाए। तो वो म्यूटेशन इकट्ठा होते जाते हैं। तो जैसे मेरे एनसेेस्टर्स रहे आज के 20 जनरेशन पहले। ठीक है? और 20 जनरेशन के बाद हम बहुत सारे वो लोग हो गए। तो हम में बहुत सारे डिफरेंसेस आ जाएगा। ठीक है? जो कॉमन एनसेेस्टर होगा वो वही होंगे 20 जनरेशन पहले वाले।
बट म्यूटेशंस की वजह से हम जो है हम हम सबके अंदर एक अलग तरह का एक म्यूटेशन का सेट प्रोड्यूस हुआ और हम अलग होते गए। वो डिफरेंस इतना लंबा होता जाएगा 100 जनरेशन पहले 200 जनरेशन पहले अगर वो मिक्सिंग नहीं हो रही है फ्री मिक्सिंग तो अगर डिफरेंट-डिफरेंट ब्रांचेस बनते जा रहे हैं तो सबके अंदर एक अलग तरह का म्यूटेशन क्रिएट होगा। ठीक है? और उससे हम देखते हैं डिफरेंसेस कितना हुआ। ठीक है? जैसे मान लीजिए साउथ इंडियन कोई एक पापुलेशन है। मैं नॉर्थ इंडिया का हूं। तो अगर हम देखा जाए तो हम 200
जनरेशन पहले एक साथ रहे होंगे। एक एनसेेस्टर के रहे होंगे। हमारे एनसेेस्टर्स एक रहे होंगे। बट 200 जनरेशन तक हम मिक्स नहीं हुए एक दूसरे से। तो हम एक दो पॉकेट्स बना लिए। दो एक ग्रुप बन गया और उन दो ग्रुप के बीच में काफी डिफरेंसेस पैदा हो गया जो कि रैंडम म्यूटेशन है। तो उस म्यूटेशन के रेट से हम पता करते हैं कि ये जो दो ग्रुप है इनके बीच में डिफरेंस कितना है। अगर एक जनरेशन को हम माने 25 साल तो 25 * 200 ठीक है? जितना म्यूटेशन लोड होगा उसको मल्टीप्लाई करेंगे 25
इयर्स। एक जनरेशन जो टाइम होता है या 20 साल और हम बता सकते हैं कि 3 से 4000 साल पहले यह जो दो ब्रांचेज़ सेपरेट हुई होंगी जिसका कॉमन एनस्टर एक रहा होगा एक रहा होगा और दो हमें 200 जनरेशन में वो म्यूटेशन बहुत बड़ा फर्क दिख रहा है लेकिन इमीडिएट जनरेशन में म्यूटेशंस इतने बड़े नहीं होते एक्सक्ट्ली इमीडिएट में नहीं चलता है पता उतना उतना नहीं पता चलता है लेकिन 200 जनरेशन 400 जनरेशन में डिफरेंसेस बहुत बड़े हो जाते तो जैसे कि हम देखते हैं गोत्र जो गोत्र सिस्टम बना है नॉर्थ इंडिया में साउथ
में भी जो गोत्र है इवन नॉर्थ वेस्ट इंडिया में भी है जी तो उन जो दो गोत्र के बीच में जो जो लोग होते हैं पापुलेशन होती हैं उनके बीच में एक डिफरेंसेस देखने को मिलता है तो ये चलता है पता है कि 20 जनरेशन पहले या 25 जनरेशन पहले ये पापुलेशन एक रही होगी बट 25 जनरेशन में एक दूसरे से लोग शादियां नहीं किए हैं। कुछ-कुछ गोत्रा में हमें देखने को मिलता है कि 50 जनरेशन पहले का डिफरेंस आता है। इट मींस कि स्ट्रिक्ट मैरिज रिचुअल्स रहे होंगे जिसमें कि हम सेम गोत्र में शादी
करना एक जो है एक उसको पाप माना जाता रहा होगा जिससे कि हमें डिफरेंसेस ज्यादा देखने को मिलता है। किसीकिसी गोत्र में हमें देखने को मिलता है कि 100 जनरेशन पहले ठीक है? ऐसे एक दूसरे एक ही कम्युनिटी के लोग हैं बट उनके बीच में शादियां नहीं हुई है। तो यह दर्शाता है कि जो है ये गोत्र सिस्टम कितना पावरफुल एक सोशल टूल था जिसकी वजह से हमें बहुत सारे बीमारियों से बचने का मौका मिला। तो आपको लगता है गोत्र सिस्टम के पीछे कि कैसे वो पहुंचे होंगे कि हमें गोत्र सिस्टम बनाना चाहिए। इसके पीछे
कुछ स्टडी हुई है? देखिए इंडिया एक ऐसी जगह है कि जहां पे जब खेतीबाड़ी स्टार्ट हुआ आज के 6 7000 इयर्स पहले खेतीबाड़ी और ये गाय रखना और जो है उसका गाय को पालना ठीक है डोमेस्टिक एनिमल्स को पालना उस समय क्या हुआ कि पॉपुलेशन एक्सप्लोजन हुआ बहुत सारे लोग पैदा हुए इनका सर्वाइवल रेट काफी ज्यादा था और वो एक फाउंडेशन रहा होगा गोत्र सिस्टम बनाने तो लोगों ने देखा होगा ऑब्जर्व किया होगा कि जो है आपस में शादियां करने से बहुत सारे बच्चे जो है के अंदर बीमारियां आ रही है। बीमारियां आ रही है।
ठीक है? वो एक ऑब्जरवेशनल पॉइंट डेफिनेटली रहा होगा। बिना ऑब्जरवेशन भी तो काफी लंबा समय लिया होगा। काफी लंबा समय लिया होगा। यस काफी लंबा अगर हम गोत्र को माने कि गोत्र का टाइम जो है 1000 से 2000 साल पहले गोत्र बना होगा तो जो ऑब्जरवेशनल टाइम रहा होगा वो भी रहा होगा एटलीस्ट 2000 साल का। तो आप ये मान सकते हैं कि 5ाउज इयर्स एगो जो है यह कांसेप्ट मे बी डेवलप हुआ होगा गोत्र सिस्टम बनने का और जब पापुलेशन बढ़ी तो डेफिनेटली जब बहुत सारे बच्चे पैदा होंगे तो उसमें आप देख सकते हैं
कि बहुत ज्यादा अगर इंटर मिक्सिंग हो रही है इनब्रीडिंग हो रही है तो वो ट्रेट्स दिखते हैं सामने दिखेंगे आपके ठीक है हो सकता है कुछ बच्चे विकलांग पैदा हो कुछ बच्चों में मेंटल रिटार्डनेस हो तो इन सब चीजों को ऑब्जर्व करते हुए हमारे जो एनसेेस्टर्स ने जो है गोत्र सिस्टम का फाउंडेशन रखा होगा बहुत ढेर सारी चीजें हैं। बहुत ढेर सारी चीजों में हम डायवर्ज इस समय कर सकते हैं। गोत्र पर हम गए हैं। एक चीज मैं ऐड करना चाहता हूं। अभी हम 7000 तक पहुंचे हैं हम भारत में कि होमोसेपियंस आ गए हैं।
उसके बाद का अभी मैं अभी भी बढ़ सकते हैं। लेकिन एक पॉइंट मुझे ये आ रहा है। मैं अभी व्हाट इज लाइफ पढ़ रहा था शडिंगर की। वो फिजिसिस्ट थे। लेकिन वो हर व्यक्ति का मन होता है एकिस्टेंस क्या है? लाइफ क्या है? कॉन्शियसनेस क्या है? उस पर भी वो विचार रखते हैं। तो उन्होंने उस बुक को लिखते समय यह बोला है कि मुझे बहुत साइंटिफिकली जज ना किया जाए क्योंकि मैं अब इंसान मरने से पहले कुछ अपने भी थॉट्स रखता है। तो उसमें उन्होंनेकि वो बायोलॉजिस्ट तो थे नहीं क्वांटम फिसिस्ट थे। तो डरते डरते
ही उन्होंने ये बातें कुछ रखी हैं। मुझे बहुत क्योंकि ये सब पढ़ना बहुत अच्छा लगता है। तो वो ये कह रहे थे कि ठीक है डीएनए को हम एक टूल मान सकते हैं या हमारी जीन को कि जो हमारी बॉडी की ब्लूप्रिंट को रेसिपी को कैरी ऑन करके ला रहा है। लेकिन इसके साथ-साथ जो एक मैनकाइंड की कॉन्शियसनेस है कि वो किन-किन चीजों से गुजरी है चाहे वह ड्रॉट हो, चाहे वह वॉर्स हो। एक ये जो प्रिमिटिव इंस्टिंक्ट्स हैं हमारे अंदर वो भी आती जा रही हैं। तो वो एक कॉन्शियसनेस लेवल पर बात करते थे।
तो जैसे हम बात करते हैं ना माइंड एंड मैटर तो दर्शनों में या फिलॉसोफी में कभी-कभी ऐसा होता है माइंड और मैटर को अलग भी देखते हैं रेने डिकार्ट ने देखा या भारत में भी हम माइंड को तो जड़ मानते हैं मैटर के साथ। लेकिन यहां पर एक कॉन्शियसनेस आ जाती है अलग। तो वो उस स्तर की बात कर रहे थे कि मैटर तो हमें प्रिजर्व करते हुए आगे बढ़ा ही रहा है और म्यूटेशन के थ्रू हम म्यूटेशन होता है। उसके बाद नेचुरल सिलेक्शन के थ्रू हमारी स्पीशीज ग्रो कर रही है। बट हम कॉन्शियसली भी
ग्रो कर रहे हैं थ्रू दीज़ एक्सपीरियंसेस। उनके पीछे का यह था कि अगर कॉन्शियसली डिसीजन भी लिया गया है तो नेचर तो सेलेक्ट कर रही है बट अगर आपके पास एक कॉन्शियस पावर भी है तो आप उसको यूज़ करके नेचर को के हिसाब से रिएक्शन बना सकते हैं और जो कॉन्शियसली ज्यादा इंप्रूव्ड लोग थे वो आगे गए तो कॉन्शियसनेस भी एक रोल प्ले कर रही है। अब कुछ लोग कॉन्शसनेस को वो डीएनए का या फिर मैटर का ही इमर्जेंट प्रॉपर्टी मान लें। तो वो इस तरह से कि इंसान जो जो करता आया या इंसान के
पीछे जो स्पीशीज करती आई है वो उसके अंदर इनको इनकोडेड है जो आज एंगर के रूप में या सेक्सुअल डिजायर के रूप में हमारे अंदर है और इंसान अब तभी आगे ग्रो कर पाएगा जब वो इनको ओवरकम करे। इसलिए हमें अपनी फिलॉसफी में यह दिखता है कि हम संयम की बात करते हैं। हम यह बात करते हैं कि हमें जानवरों की तरह इतने ढेर सारी वाइफ्स या फिर हस्बैंड्स नहीं रखने हैं। तो हम जो अपने को जीतना चाह रहे हैं वो नेक्स्ट स्पीशीज के हम के लिए अपने कॉन्शियसनेस को तैयार कर रहे हैं। वो इस
तरह की बातें करते हैं। तो आपको लगता है क्या मैटर जैसे अपने आप को आगे बढ़ा रहा है तो मैटर से जुड़ी हुई कॉन्शियसनेस भी अपने को इवॉल्व कर रही है। देखिए आपने बहुत सारे क्वेश्चन पूछ दिया जिसमें कि जो है बहुत सारे रिसर्च भी हो रहे हैं। हां। अ कॉन्शियसनेस एंड मैटर जिसको कि मैं आपको बता सकता हूं कि डीएनए के थ्रू भी अभी जो रिसर्च हो रही है उसमें जो है डीएनए ही नई रिस्पांसिबल होता है इंसान के फिनोटाइप को एक्सप्लेन करने के लिए। एपीजेनेटिक मॉडिफिकेशंस फिनोटाइप मींस हमारी पूरी स्पीशीज पूरी आपकी जो
है पूरी का पूरा आपका आपका कररेक्टर अच्छा पर्सन एक बॉडी का हां एक बॉडी का कररेक्टर आपका फिनोटाइप आप क्या सोचते हैं? आपके अंदर कितना सेक्सुअल डिजायर है उसको आप कैसे कंट्रोल करें ताकि आप और आगे बढ़ सकें। इस सबका कंट्रोल है एपिजेनेटिक एंड मॉलिक्यूलर क्रॉस टॉकिंग। हम अगर आप कुछ सोच रहे हैं तो आपका जो बॉडी है का जो मैकेनिज्म है उसी हिसाब से आप बॉडी भी एक्ट करेगा। आप बहुत ही एक पॉजिटिव एनवायरमेंट में हैं। आप एक बहुत आप स्ट्रेस लेवल नहीं है। आप खुश हैं। आप कर रहे हो मेडिटेशन कर रहे हैं।
एक मेडिटेशन से एक घंटे के मेडिटेशन से आपके पूरे के पूरे बॉडी में बहुत सारे चेंजेस होंगे। वो मॉलिक्यूलर लेवल पे होगा। वो एटॉमिक लेवल पे चेंजेस होंगे। यह चेंजेस आज के इस रिसर्च के दुनिया में उस चेंजेस को लोग जो है देख रहे हैं फंक्शनल जेनेटिक्स कि अगर हम जो है एक दिन हम बड़े अच्छे खुशमजा खुशमजाज में रहे तो जो हमारा का पूरा का पूरा जो एक्सप्रेशन प्रोफाइल है जो डीएनए एक्सप्रेस करता है प्रोटीन बनाता है उसमें आपको डिफरेंसेस मिलेंगे जो हमारा हार्मोनल एक्सप्रेशन है वो चेंज हो जाएगा जो हमारे पेट के अंदर
बैक्टीरिया है उसके जो प्रोफाइलिंग है उसके के उसमें आपको देखने को मिलेगा चेंजज़। तो, अह यह एक बहुत ही इमर्जिंग फील्ड है और इसको साइंटिफिकली आप जो है लोग इसको प्रूव भी कर रहे हैं। काम कर रहे हैं। यस। और जैसा कि आपने बोला कि अ लोग अपने ऊपर कंट्रोल करते हैं। किसी चीज को जैसे कि इंस्टिट होते हैं। नेचुरल इंस्टिंक्ट होते हैं हमारे बॉडी के अंदर। तो नेचुरल इंस्टिंक्ट्स भी जो है आप देख सकते हो जेनेटिकली एंड एपीजेनेटिकली। ठीक है? कुछ लोगों का जो जेनेटिक मेकअप होता है वो ये बोलेगा कि यह हार्मोंस बनाने
हैं। यह आपको एंजाइम्स बनाने हैं। हमारा डीएनए का मेकअप वैसा है। बट अगर आप सबकॉन्शियसली आप उसको उसके एक्सप्रेशन को रोक भी सकते हैं। डीएनए का जो एक्सप्रेशन है, आप उसको मेंटली आप उसको चाहो तो सब कंट्रोल कर सकते हैं कुछ हद तक। तो यह काफी एक बड़ा एक डिबेट का एक और इस काम हो रहा है। काम हो रहा है। वो रिजल्ट्स हैं, पब्लिकेशंस हैं। आपको हो सकता है कि आने वाले कुछ सालों में इस पे नोबेल प्राइज कोई जीतता हुआ दिख सकता है। नहीं ये बहुत ही इंटरेस्टिंग फील्ड है और जैसे-जैसे क्वांटम फिजिक्स
के बाद न्यूरो साइंस में और जैसे-जैसे हम आगे बढ़ रहे हैं। तो कहीं ना कहीं ये जो आप इसको साइंटिफिक गैप्स कहें या फिर कहें जहां पर कॉन्शियसनेस की बात आ रही है या फिर अभी जिस तरह से ये जो थॉट प्रोसेस है शडिंगर ने दिया या उसके बाद अभी भारतीय वेदांत में हमें दिखता है तो इस पर कार्य हो रहा है ये बहुत अच्छी बात है। हम 70 तक पहुंच गए। अभी आपने एलजीएम की बात की। ये क्या फिनोमिना है? बहुत सारे ऐसे क्लाइमेटिक चेंजेस हुए धरती में लास्ट 2000 इयर्स में देखा जाए तो
उसको बोलते हैं एलजीएम 1 2 3 4 लाइक लास्ट तो एलजीएम जो फोर है लास्ट ग्लेसियल मैक्सिमा सो अबाउट 30000 इयर्स पहले पूरा जो नॉर्थ जो ग्लोब था वो आई से ढक गया था तो वो भी एक ड्राइविंग फोर्स था ह्यूमन माइग्रेशन का तो बहुत सारे माइग्रेशंस टुवर्ड्स साउथ वे और बहुत सारे मैगशंस जो है टुवर्ड्स उसी टाइम पे जो है टुवर्ड्स साउथ अमेरिका में हुआ। अच्छा ठीक है। तो उसका उसका जो असर है इंडिया में भी पड़ा। नॉर्थ इंडिया भी पूरा आइस से ढका हुआ था। अच्छा। तो बहुत सारे पापुलेशन साउथ में माइग्रेट की
होंगी। कुछ ऐसे पापुलेशन रहे होंगे जो अडॉप्ट किए होंगे। जैसे कि तिब्बतंस हैं। तिब्बतंस ने काफी अडॉप्ट किया अपने आप को। तो उसको बोलते हैं सिलेक्शन। उनके अंदर डीएनए के अंदर जो चेंजेस किसी में रहे होंगे वो ज्यादा प्रोपगेट किए होंगे। उनके जो है ज्यादा बचे हुए होंगे। वो ज्यादा सर्वाइव किए होंगे। तो ये क्या यह भी एक रीज़न है कि अफ्रीका की ये जो पपुलेशन इधर आई वो फिर साउथ इंडिया गई कि पहले से भी वो जाहि नहीं नहीं अफ्रीका उतना अफेक्टेड नहीं था उस एल्जीएम के फिनोमिन से क्योंकि अफ्रीका तो आपका टुवर्ड्स मोस्टली
जो कुछ पार्ट्स हैं जो कि अफेक्टेड रही होंगी। पर मोस्टली जो अफ्रीका का 70% पार्ट है वो ज्यादा अफेक्टेड नहीं हुई। तो जैसे अफ्रीकंस इधर आए हम और सब अफ्रीकंस ना मत बोलिए उसको। उसको बोलिए होमोसेपियंस होमोसेपियंस होमोसेपियंस इधर आए 70 हजार के साल पहले अराउंड वो भारत पहुंच गए उसके बाद उनका माइग्रेशन चलता ही रहा चलता ही रहा तो बहुत सारे वेव ऑफ़ माइग्रेशन हुए तो 70000 में होमोसेपियंस साउथ एशिया में है नॉट ओनली इंडिया मतलब कि श्रीलंका भी है बांग्लादेश को भी आप मानिए उसमें म्यांमार भी मानिए उसमें ईस्ट एशिया में भी है
चाइना के साइड में है साउथ एशिया पॉपुलेशन रहेगी कोई आईडिया स्टडी है क्या पपुलेशन जो एस्टमेट है वो जो है अगर देखा जाए तो ज्यादा नहीं रही होगी। जैसे ऐसा नहीं है कि एक ग्रुप में आ रहे हैं। अच्छा वो तो माइग्रेशन ऐसे होता है कि अगर कोई एक जैसे 10 कि.मी. माइग्रेट किया। वहां पे सेटलमेंट हुआ। वहां पे रहे फाइव जनरेशन, सिक्स जनरेशन। फिर वहां से कुछ लोग माइग्रेट किए होंगे बिकॉज़ ऑफ़ डिफरेंट क्लाइमेटिक फैक्टर्स। जो होता है ना लोकल सब्सिस्टेंस वो उतना अच्छा नहीं मिला होगा। वहां पे शिकार के लिए अपॉर्चुनिटी नहीं रही
होगी। तो फिर माइग्रेट किए। फिर वहां पे नेक्स्ट जगह पे 10,000 इयर्स तक होस्ट तक रहे हो। फिर वहां पर क्लाइमेट चेंज हुआ हो। फिर माइग्रेट हुए। तो माइग्रेशन इस तरह से होता है। तो ऐसा नहीं है कि जो रह गया है वो वो खत्म हो गए। वो भी सर्वाइव किए बट वो एक स्लो इवेंट था और टुवर्ड्स वो आगे बढ़ते गए, बढ़ते गए। अभी जो हमें मैं अफ्रीकन बोल रहा हूं जो भी अफ्रीका के होमोसेपियंस जैसे दिखते हैं उसी तरह के होमोसेपियंस आए होंगे या या वो जो होमोसेपियंस आए हैं वो उनकी जो शारीरिक
बनावट है और आज जो हमें अफ्रीकंस दिखते हैं उनकी शारीरिक बनावट में डिफरेंस है। अ शारीरिक बनावट डिपेंड करती है कि आपके पास कितना अडॉप्टेशन के लिए रिसोर्सेज कितना है। हम जैसे कि आप देखिए यूरोपियंस वो काफी लंबे चौड़े हट्टे-कट्टे होते हैं। तो उनका यह है कि वो एक हंटिंग गैदरिंग सोसाइटी थी और उनको जो है फूड ज्यादा मिला। ठीक है? वो दे आर मोस्टली मीट ईटर्स। तो अंटिल लाइक लास्ट टू 3000 इयर्स तक जो है वो उनका जो स्टेपल डाइट था वो मीट था। हम साउथ एशिया में क्या हुआ कि यहां पे एग्रीकल्चर जो
मेन फूड का एक वो बना सोर्स बना। और एग्रीकल्चर प्रोडक्ट्स को उतना अच्छा नहीं मानते हैं। जैसे कि वीट, राइस, पल्ससेस में उतना न्यूट्रिशन आपको नहीं मिलेगा जितना कि आपको मीट में मिलेगा। और साथ में हमने जो है खेतीबाड़ी के साथ-सा जो है गाय भैंस को रखना भी स्टार्ट किया। तो मिल्क कंजमशन भी उतना अच्छा नहीं मानते हैं। ठीक है? इसलिए आप देखेंगे इंडिया में हर तरह के लोग आपको मिल सर्वाइव करते हुए दिखेंगे। लंबे चौड़े भी होंगे, दुबले पतले भी होंगे। तरह-तरह के आपको डायवर्सिटी मिल जाएगी। क्योंकि यहां पे कोई भी जो लीनिएज है
वो नहीं हुई। सबको सर्वाइवल होने का चांस मिला। कुछ ना कुछ मिल गया। बट कि यूरोप में क्या आपको एक तरह के लोग मिलेंगे। वहां पे क्या हुआ कि वहां पे बहुत सारे लड़ाईयां हंटिंग गदंग सोसाइटी थी। तो वहां पे अगर जो आप अगर मस्कुलर नहीं है, आप हट्टे-खट्टे नहीं है, आप बहुत स्ट्रांग नहीं है तो आप सर्वाइव नहीं करेंगे। आपको दूसरे कबीले वाले आपको आके मार देंगे। तो इसीलिए आपको वहां पे एक सिलेक्शन मिला। सिलेक्शन प्रेशर काफी हाई था। इंडिया में सिलेक्शन प्रेशर उतना हाई नहीं था। यहां पे सबको सर्वाइवल होने का चांस मिला,
मौका मिला। ठीक है? यहां पे जो सबसे जो बड़ा जो फोर्स था जो कि पापुलेशन को खत्म किया वो था बीमारियां। जब पापुलेशन बढ़ेगी तो बहुत सारे ऐसे एपिडेमिक बीमारियां होंगी। जैसे कि आपका ट्यूबरक्लोसिस हुआ। कोलरा मोस्टली कोलरा गंगा प्लेन में यहां पे हैजा से काफी लोग मरे। बहुत लोग मरे हैं। फिर उसके बाद प्लेग आया। प्लेग से भी काफी लोग अपनी जान गवाए। जबकि यूरोप में ऐसा नहीं था। यूरोप में क्या था कि वहां पर पापुलेशन हमेशा से ही कम रही क्योंकि वह उनका जो मोस्टली था सब्सिस्टेंस पैटर्न था वो था हंटिंग गैदरिंग जबकि
इंडिया में था मोस्टली था एग्रीकल्चर एंड पेस्टोलिज्म तो उसकी वजह से यहां की पापुलेशन हमेशा से ही ज्यादा रही इंडिया में इसीलिए आपको यहां पे ज्यादा देखने को मिलेगा डायवर्सिटी क्योंकि यहां पे कोई भी जो ह्यूमन होमोसेपियंस की ब्रांच बहुत ही कम एक्सटिंक्ट हुई यहां पे सब हर कोई सर्वाइव किया लास्ट 7 थाउजेंड इयर्स से यहां पे हर एक ब्रांचेस सर्वाइव किए। जबकि यूरोप में ऐसा नहीं है। वहां पे बहुत सारे ब्रांचेस लाइक मोर देन 80 90% जो ब्रांचेस थे वो एक्सटिंक्ट हो गए। इसीलिए हमें जो मिलता है जो हमारे अंदर जो वो है न्यूथल
की जो होती है वो काफी डवर्स है क्योंकि यहां पे बहुत कम एक्सटिंशन हुआ है। मतलब जहां पर वॉर सिचुएशन रही या फिर सर्वाइवल के लिए एक दूसरे को मारना था वहां हट्टे कट्टे लोग हैं। इसी कारण से हमें सिंधरी पंजाब में हट्टे-खट्टे लोग दिखते हैं। हां, इसका रीज़ दो रीज़ है। एक तो जो है लैक्टोज़ टॉलरेंस इनको मिल्क डाइजेशन वाला जो जीन इनमें ज्यादा था। ठीक है? हरियाणा पंजाब में और पहला मेजर रीजन ठीक है। दूसरा है कि यह जो है जो इनका जो ज्योग्राफिकल लोकेशन है यहां पे भी वॉरफेयर हुए हैं कंपेयर टू
अदर पार्ट ऑफ इंडिया यहां ज्यादा हुए हैं। सबसे ज्यादा हुए हैं। ज्यादा हुए हैं ना? तो इसीलिए वहां पे आपको मॉर्फोलॉजिकली ज्यादा फिट ज्यादा स्ट्रांग लोग मिलेंगे क्योंकि हो सकता है कि जो दूसरे लोग हो वो ज्यादा सर्वाइव करने ना कर पाए हो। इसीलिए पहले जो राजे महाराजे थे जैसे पृथ्वीराज चौहान जी की बात होती है तो वो नीड ऑफ द आर थी कि आप हट्टेगट्टे नहीं होंगे तो तो नेचर ने वैसे ही सेलेक्ट किया अभी आपने जैसे दूध की बात की और वही जो रीजन है सिंध का रीजन इंडस वैली रीजन या फिर अगर
हम वैदिक रीजन भी माने क्योंकि सरस्वती नदी की बात होती है तो वेदों में भी गाय का वर्णन तो सैकड़ों बार है तो क्या ऐसा हम मान सकते हैं क्योंकि वो गाय को बहुत पवित्र मानते थे इसलिए उन्होंने मिल्क कंजमशन किया और इसी वजह से उनकी कि जो ये डाइजेशन है मिल्क को ये ये जो मिल्क डाइजेशन वाला जो जीन है वो बिकॉज़ आप गाय को आप रख रहे हो उनका मिल्क कंज्यूम कर रहे हैं तो उसकी वजह से जो है वो ज्यादा हो गया वहां पे और गाय तो डेफिनेटली एक होली एनिमल था और
ऐसा गाय के मीट को कंज्यूम ही किया लोगों ने किया है हां जो इंडस वैली में जितने भी जो मिलते हैं साइट्स मिलते हैं हड़प्पन सिटीज मिलते हैं उसमें गाय के बहुत सारे वो मिलते हैं स्केलेटन्स अच्छा तो गाय को काफी ज्यादा अमाउंट में कंज्यूम किया लोगों ने। तो ये कैसे पता चला कंज्यूम किया है? क्योंकि उसमें स्लॉटर हाउसेस होते हैं, कट मार्क्स होते हैं। अच्छा। गाय के जो हड्डियां होती है उसमें कट मार्क्स होते हैं। तो उसको कंज्यूम किया है। तो अभी हम मैंने एक जंप मार दी थी। 70000 तक होमोसेपियंस आ गए थे।
फिर एलजीएम की बात की वो 20,000 इयर्स पहले हुआ है। ये मान सकते हैं 7,000 से 20,000 के बीच में माइग्रेशंस हो ही रहे। तो यहां पे डिफरेंट पापुलेशन ग्रुप्स इवॉल्व हो रहे थे। अच्छा। ठीक है। जैसे ऐसा नहीं है कि सारे के सारे होमोसेपियंस इंडिया में आ गए और एक साथ रह रहे हैं। डिफरेंट पॉकेट्स में जो है डिफरेंट-डिफरेंट पापुलेशन इवॉल्व हो रही थी अपनी स्पीड से। सपोज़ दैट कि 100 लोग हैं और 100 से ₹1000 ₹2000 ₹5000 ₹100 ओवर द पीरियड ऑफ़ टाइम। हो सकता है कि उन 10,000 एक पॉकेट में हुए हो।
दूसरे जो पॉकेट है वहां पे जो है वो 2000 ही 2000 ही बन पाए हो या मे बी कुछ बीमारी हो गई हो वो एक्सटिंक्ट हो गए हो। तो डिफरेंट प्रोपोर्शन में डिफरेंट रेट से जो है पापुलेशन अपने तरीके से इवॉल्व हो रहे थे। डिफरेंट पार्ट ऑफ इंडिया जैसे आप देखें अंडमान निकोबार के जो ट्राइब्स हैं जारवा आंगे वो बिल्कुल ही उन्हें मिक्सिंग नहीं हुई है बाहर से क्योंकि वो जो आइलैंड है वो है आइसोलेटेड प्लेस है। वहां बहुत सारे पापुलेशन मूव नहीं कर पाए। तो जो आउट ऑफ अफ्रीका से जो पापुलेशन गई तो उसमें
से अंडमान निकोबार के भी आइलैंड के ट्राइब्स भी हैं। ठीक है? उन्होंने वहां पर अपने आप को एस्टैब्लिश किया। वहां पर वह रहे और उनमें मिक्सिंग बहुत कम हुई क्योंकि वहां तक पहुंच पाना स्नेरी इंपॉसिबल। तो अंडमान कैसे पहुंचे? शिप बिना शिप एक तो एल्जीएम में क्या है कि आपका सी लेवल काफी कम था। तो मे बी म्यांमार होते हुए वो अंडमान पहुंचे हो। अच्छा क्योंकि वही मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि उस समय तो शिप्स रहे नहीं होंगे। नहीं शिप्स भी थे उस समय। शिप्स हां 70 नहीं 70 नहीं आप अगर 20 22ज़
साल पहले जाए तो उस समय वो राफ्टिंग करते थे बट एल्जीएम के टाइम पे जो है सी लेवल काफी नीचे था तो म्यांमार के रास्ते से वो अंडमान निकोबार पहुंचे होंगे तो वही एक ऐसी जो है होमोसेपियंस की स्पीशीज का एक ब्रांच है जो कि आप उसको बोल सकते हैं कि फर्स्ट आउट ऑफ अफ्रीका से जो क्लोजेस्ट रिलेटिव है वो अंडमान के जो ट्राइब्स हैं वो अभी तक में क्योंकि वो ज्यादा चेंज नहीं हुए हैं। तो आप अभी आपने पूछा कि जो अफ्रीकन जो लोग रहे हैं वो कैसे दिखते रहे होंगे तो आप अंडमान निको
अंडमान के ट्राइस को देखिए वैसे दिखते रहे होंगे लेकिन फिर म्यूटेशंस म्यूटेशन था हां म्यूटेशन हुए म्यूटेशंस तो होते रहते हैं बट बाद में मिक्सिंग भी होती है जैसे मान लीजिए कि अगर नॉर्थ इंडिया में एक पापुलेशन है 10,000 इयर्स पहले जो रही होगी वेस्ट से एक पापुलेशन आई मिक्स हो गई तो आपके जो मॉर्फोलॉजिकल फीचर्स है वो भी चेंज हो जाएंगे मिक्सिंग से ज्यादा चेंज आता है म्यूटेशन से इतना नहीं आता है यस मिक्सिंग से भी आता है म्यूटेशन से भी आता है तो मोर मोर और लेस लाइक जो अंडमान के जो ट्राइब्स हैं
वो अफ्रीकन जैसे दिखते रहे होंगे मोर और लेस ऐसा नहीं कि एक्सक्टली वैसे दिखते रहे होंगे बट वहां पे क्या है कि पापुलेशन एक्सप्लूड नहीं कर पाई अंडमान निकोबार में क्योंकि आपका खाने के लिए जो पर्याप्त जो रिसोर्सेज हैं वो मिल नहीं पाए तो आप देखेंगे कि ज्वारवांगे की जो पापुलेशन है जस्ट 100 50 200 के आसपास है तो वो हमेशा से पापुलेशन उतनी ही रही होगी क्योंकि उस उस आइलैंड की जो कैरिंग कैपेसिटी है वह उतनी ही है उससे ज्यादा लोगों को वो आइलैंड नहीं लग पाएगा। तो इसीलिए उसमें जो म्यूटेशन के रेट कम
होंगे जो पापुलेशन जब बढ़ती ज्यादा बढ़ेगी तो म्यूटेशन के रेट ज्यादा होंगे ना। क्योंकि अगर 10 बच्चे हैं 10 में म्यूटेशन हुए फिर 10 से 100 हुए 100 से 1000 हुए तो जो हर एक म्यूटेशन है वो प्रोपगेट हो रहे हैं पापुलेशन में तो वो आपका म्यूटेशन रेट बढ़ जाएगा। बट पापुलेशन अगर मेंटेन है पिछले 500 सालों से तो वो उसमें वो म्यूटेशन रेट कम होगा। म्यूटेशन उतना आज नहीं जा पाएगा। अब चीन और जापान में भी इधर से ही गई है। यस अफ्रीका से गए हैं। अफ्रीका से ही गए हैं। अच्छा अफ्रीका से गए
हैं। बट वहां का जो एनवायरमेंटल कंडीशन है वो उस तरह का है कि वो वैसे ही लोग अडॉप्ट हो पाए। तो हर एक हर एक जो कंट्री का जो ज्योग्राफिकल लोकेशन है वहां का जो एनवायरमेंट है उसी के हिसाब से जो है हम अडॉप्ट होते हैं जो और वहां पर भी जो लोकल कुछ होमोसेपियंस के पहले की स्पीशीज होती है उससे भी उससे भी हो सकता है कि इंटरेक्शन हुआ हो बट जो वहां के जो होमोनिड्स हैं उनका जो टाइम है वो काफी डीप टाइम है मतलब 5 लाख 10 लाख 2 लाख साल पहले थे
वहां पे 1 लाख या जब होमोसेपियंस आया तो उस समय होमो वहां पे ह्यूमिनिट्स शायद नहीं रहे हो। ह्यूमिनिट्स के एक्सटेंशन का क्या कारण हो सकता है? क्लाइमेटिक कंडीशन क्योंकि मतलब हर एक स्पीशीज जब इवॉल्व होती है तो 70% स्पीशीज तो एक्सटिंक्ट हो गई है। 30% है इस 30 से फिर से बनेंगे और बनेंगे फिर एक्सटिंक्ट होते जाएंगे। और उसके बाद ये तो फर्स्ट वेव ऑफ़ माइग्रेशन आप बता रहे हैं। उसके बाद फिर वापस भारत में हां। हां तो फिर भारत में क्या हुआ कि जो कि एंशिएंट माइग्रेशन है तो यहां पे पापुलेशन सर्वाइव की
क्योंकि यहां क्लाइमेटिक कंडीशन अच्छा रहा होगा। फिर उसके बाद से डिफरेंट वेव ऑफ़ माइग्रेशन हुए। टुवर्ड्स वेस्ट एशिया से भी आए। ईरान से भी लोग आए यहां पे। डिफरेंट पॉकेट्स में रहे वहां पे। डिफरेंट मिक्सिंग पैटर्न होता है। जैसे कि कोई लोग आया कोई आया। और लैंग्वेज डिफरेंसेस हैं। फिर उसके बाद से जो है आपका रिचुअल डिफरेंसेस होंगे। आपके कल्चरल डिफरेंसेस होंगे। फिर कभी-कभी क्या होता है? पापुलेशन हो जाती है एसिमिलेट आप में घुल मिल गई वो ठीक है जैसे पारसी आए पारसी गुजरातियों के साथ घुलमिल गए जस आए इंडिया में वो भी लोकल केरला
के लोगों के साथ घुल मिल गए उनकी लैंग्वेज बोलने लगे उनके कल्चर को अडॉप कर लिया तो अपना कल्चर नहीं डेवलप कर पाए बट यहां के लोगों से मिल गए तो यहां की लैंग्वेज बोल रहे हैं यहां के लोगों से मिक्स हुए जेनेटिकली तो बिल्कुल आपके जैसे होंगे बट वह कभी ना कभी आए होंगे और वो उनके जेनेटिक स्टडी में वो हमें देखने को मिलता है जेनेटिकली कि वो जो है कब आए इंडिया में कब आए कैसे जो है कितने लोग आए होंगे मेल कितने होंगे फीमेल कितने रहे होंगे बट वो कैसे मिले घुले मिले
इंडिया में वो आप नहीं बता सकते हो जेनेटिकली तो तो आप मेरा जीन देख के बता सकते हैं कि मेरे पूर्वज कहां से आए होंगे आपका हम जीन देख के बता सकते हैं कि आपके जो क्लोजेस्ट रिलेटिव्स हैं वो इंडिया में कहां-कहां है आपके अंदर जो इंडिया में बहुत सारे एनसेेस्ट्रीज हैं नर्थ नॉर्थ इंडियन एनसीटी होती है। साउथ इंडियन एंड है। हालांकि दोनों सेम ही है बट कुछ डिफरेंसेस हैं। उस डिफरेंसेस को हम बोलते हैं नॉर्थ इंडियन एंड साउथ इंडियन यूनिवर्सिटी ऑस्ट्रो एसियाटिक जो कि ट्राइब्स में होती है झारखंड और छत्तीसगढ़ में वहां पे। तो
हम आपका डीएनए से देख के बता सकते हैं कि आपके अंदर कितना परसेंटेज है उस एसेस्ट्री के। तो उसे हम बता सकते हैं प्रेडिक्शन कि आपके मदर साइड से हो सकता है कि आपकी जो मदर है झारखंड उड़ीसा के रही हो और हर एक इंसान की अपनी एक अलग कहानी होती है। हर इंसान बोलता है कि मेरे जो ग्रेट ग्रेट ग्रेट ग्रैंड पेरेंट्स थे वो यहां से माइग्रेट किए थे। हम तो यहां से आए हैं। तो मोस्टली हमने देखा है जेनेटिकली देखा है कि वो कहानियां झूठी होती हैं। से मेरे जो ग्रैंड प्लेेंट थे वो
बोलते थे कि हम तो आए हैं। गुजरात से आए यहां पे। ठीक है? यहां सेटल्ड हुए और हम पहले ब्राह्मण थे। फिर हम जो है हम हम ये हम हो गए। ये मेरे यहां भी बोला जाता है। है तो कि हम ब्राह्मण थे और हमने फिर अपना जेने उतार दिया। हम नहीं है ब्राह्मण। तो ये मोस्टली हमने देखा है कि जो क्लेम्स होते हैं ना लाइक पपुलेशन नहीं सोशल कल्चरल प्रेशर में वो मोस्टली वो क्लेम्स गलत होते हैं। गलत होते हैं। तो अभी एक मैंने देखा था एक वीडियो देखी थी उसमें या तो ये फैशन
होगा यूरोप में कि बहुत से लोग अपना जेनेटिक टेस्ट कराते हैं और देखते हैं कितने परसेंट वो रोमन है। कितने परसेंट वो मंगोलियन है। तो आप अगर ऐसे रफ एक क्योंकि आप स्टडी करते आए हैं भारतीय लोगों की तो मैं अयोध्या जैसी एक बेल्ट में पैदा हुआ हूं। डेफिनेटली मेरे पेरेंट्स और उनके वो हो सकता है बहुत डवर्स रहा हो। फिर भी आप एक गेस वर्क कर सकते हैं कि मैं कितना अरेबिक, कितना मंगोलियन या कितना प्योर इंडियन जो फर्स्ट वेव आई थी उसको तो जो फर्स्ट वेव है उसको हम लोग मॉडल करते हैं उसको
बोलते हैं एंशिएंट एएसआई। ठीक है? तो अगर आप जाते हैं 30000 इयर्स पहले तो यहां की जो एनसेेस्ट थी उसको आप बोल सकते हैं एएसआई एनस्टल एंशिएंट साउथ इंडियन पापुलेशन अच्छा वो प्योर जो हां वो आंगे या अंडमान के जो ट्राइब्स हैं उनसे थोड़ा बहुत या हो सकता है ज्यादा उन्हीं के जैसे रहे हो ठीक है पूरे भारत में थे पूरे भारत में थे ठीक है एएसआई हां एएसआई ठीक है फिर उसमें जो है हमें एक वेव ऑफ माइग्रेशन हुआ ईरान से ईरान के जो हंटर गैदर है या जो एग्रीकल्चर के एग्रीकल्चरिस्ट जो है 10,000
इयर्स के आसपास 10000 इयर्स ठीक है वो अपने एक कंपोनेंट को लेके आए ईरानियन वाला ठीक है और फिर यहां के लोगों से वो मिक्स हो गए ठीक है मिक्सिंग पूरे भारत में ही हुई है हां वो मिक्स हुए फिर एक उसकी जो एनसीस्ट्री बनी उसको बोलते हैं इंडस पेरीफरी अच्छा ठीक है मोस्टली जो है इंडस वाले रीजन में ज्यादा था वो हम ठीक है फिर उसके बाद और माइग्रेशंस भी हुए वेस्ट से ठीक है उसका टाइम एक्सजेक्टली अभी डिबेटेबल है जिसको कि हम बोलते हैं आर्यन इन्वरी बोलते हैं जो सेकंड वेव ऑफ़ माइग्रेशन हुआ
हम वो 2000 साल के आसपास मान लीजिए कोई एक और कंपोनेंट आया नॉर्थ से ठीक है 2000 साल पहले हां 2000 हां तो वो तो ये जो कंपोनेंट मिलकर के जो नॉर्थ में बने उसको बोलते हैं एएनआई अच्छा एनसेेस्टल नॉर्थ इंडियन एनसेेस्ट्री ठीक है ठीक है साउथ में इसका प्रभाव कम पड़ा हम जो सेकंड वेव ऑफ़ माइग्रेशन हुआ ना फर्स्ट वेव का ही अभी साउथ में प्रभाव है। हां फर्स्ट का है। पर जो सेकंड हुआ उसका प्रभाव कम है। यहां पे कम था पहले आज के 2000 साल पहले लेकिन अब तो मिक्सिंग हो ही गई।
फिर फिर आपके नॉर्थ वाले और साउथ वाले फिर आपस में मिक्स हुए और मिक्स होने के बाद एक पूरी की पूरी जो है ये साउथ एशियन एनेंसी बनी। तो साउथ एशियन एनसेस्टिटी में बहुत सारे आते हैं कंपोनेंट्स। ठीक है? एएसआई भी आता है जो ओंगे वाला है। ठीक है? ठीक है? एंशिएंट एनसेेस्टर साउथ इंडियन एनस्टी वो भी कंपोनेंट होगा। इंडस पेरीफरी वाला भी कंपोनेंट होगा। इंडस पेरीफरी मतलब कि ईरानियन प्लस जो यहां पे एएसआई थे वो इसको इंडस पेरीफरी बोलते हैं। वो भी कंपोनेंट मिलेगा। तो अगर मैं अपना डीएनए जब टेस्ट किया तो उसमें हमें
देखने को मिला इंडस पेरीफरी मतलब हड़प्पन एनस्टिटी भी है। हमारे अंदर जो है जो ऑस्ट्रो एसियाटिक एनसीटी वो भी है। कुछ हद तक जो है हमारे अंदर स्टेप एनस्टिटी जो सेकंड माइग्रेशन हुआ जो बाहर के लोग आए बाहर के आए। ठीक है जिसको हम बोलते हैं आर्यन जो उसको मिसलेबल करते हैं हम आर्यन माइग्रेशन बोल देते हैं अब ठीक है वो भी एनसीटी हमारे अंदर है हम तो हमारे अंदर भी तीन तरह की इंसिस्टिटी हमें प्रोमान देखने को मिलेगी तो एएसआई एनआई में भी बहुत डिफरेंस तो होगा नहीं कोई डिफरेंस नहीं है नॉट मच डिफरेंसेस
एक इंडियन क्लाइंट है जब उसकी करते हैं एनालिसिस एक क्लाइंट है तो उसमें ऊपर पे आते हैं मोस्टली नॉर्थ इंडियन नीचे पे आएंगे साउथ इंडियन बट कुछ-कुछ ऐसे पापुलेशन में भी साउथ इंडियन उसमें ज्यादा एएनआई है ठीक है जैसा कि तमिल ब्राह्मणस हुए उसमें ज्यादा नॉर्थ इंडियन सिस्टिटी है। तो ओवरऑल अगर देखा जाए नॉर्थ टू साउथ सबकी जेनेटिक इंसिस्टिटी ऑलमोस्ट सेम है। ऐसे एक फैक्ट चलता था बीच में कि भारत में या फिर साउथ ईस्ट एशिया में हर 10 में से एक बच्चा मंगोलियन ही है क्योंकि उस समय वो चंगेज़ खान का तो अभी कितना
अभी मैं अगर जैसे मैं अपना ही पूछ रहा था अगर आप मुझे ऐसे ही गेस वर्क करेंगे तो मेरे अंदर एसआई एनआई यह इधर ही मिलेगा या बाहर का भी कुछ मिल सकता है? नहीं नहीं आपको एनआई भी इंडियन ही है। एएसआई भी इंडियन ही है। दोनों आपको आप में मिलेगा। चंगेज़ खान का ऐसा बोलते हैं कुछ ऐसे जो है मेल मीडिएटेड जो है इंसेस्टिटी है जो आती है वाई क्रोमोजोम से वो काफी इंडिया में जो है प्रोपगेट हुई है ड्यूरिंग द चंगेज़ खान टाइम पे। तो वो साइंटिफिकली जो है प्रूवन फैक्ट है। तो हम
ऐसा मान सकते हैं कि अबाउट 10 मिलियन 5 टू 10 मिलियन जो व क्रोमोजोम का जो सिग्नेचर्स हैं मे बी चंगेज खान के थ्रू आया हो। नीरज जी अभी मतलब हम ये कह सकते हैं कि भारत में आपको सबसे ज्यादा वैरायटी मिल जाती है पूरे वर्ल्ड की। यस कुछ ऐसे हैं तो जो इंडियन जो डायवर्सिटी है वो अफ्रीका के बाद सेकंड नंबर पे है। अफ्रीका में क्यों ज्यादा है? क्योंकि जो अफ्रीका से जो माइग्रेशन हुआ है इंडिया में साउथ एशिया में तो ऐसा नहीं कि सारे लोग आ गए ना अफ्रीका से अफ्रीका में ही लोग
बच गए काफी बच गए हम तो जो सिविलाइजेशन जितनी पुरानी होती है उसमें ज्यादा होती है डायवर्सिटी ज्यादा होती है तो अफ्रीका के लोगों में इसीलिए हमसे ज्यादा डायवर्सिटी है बट सेकंड नंबर पे इंडिया है इंडिया है तो इंडिया में जो एक गांव है मेरा गांव है उसकी जो डायवर्सिटी है डिफरेंट-डिफरेंट जो कास्ट ग्रुप है उनकी डायवर्सिटी यूरोप की डायवर्सिटी के बराबर होगी या उससे ज्यादा होगी एक गांव की यह इसलिए हुआ क्योंकि हम जो है स्ट्रिक्टली एंडोगमिक प्रैक्टिससेस या जो शादियां जो है डिफरेंट-डिफरेंट ग्रुप्स में करना हम बंद कर दिए। जो कास्ट सिस्टम जब
बना अबाउट 2000 इयर्स एगो अच्छा 2000 से लेकर के 1000 साल पहले जो जो फाउंडेशन है जो कास्ट सिस्टम का वो इंडिया में स्टार्ट हुआ। अच्छा जो कि एक तरह से काफी हेल्थ के पॉइंट ऑफ व्यू से काफी बुरा भी है। बुरा है। ठीक है। तो हमने गोत्र तो बना दिया। गोत्र तो ऐसे लोगों ने बनाया जो काफी वाइज थे। काफी जो है इंटेलेक्चुअल थे कि हम जो है बहुत सारे बीमारियों से बच जाए। बच जाए। बट उसके बाद जो रूढ़िवादी लोगों ने कास्ट बनाया है। जैसे कि हम जो है आज इंडिया की जो प्रॉब्लम
है हेल्थ जो बर्डन है जेनेटिक बेस्ड हेल्थ बर्डन वो कास्ट की वजह से ही ज्यादा आपको देखने को मिलता है। तो अभी आपका कंक्लूजन ये है कि साउथ और नॉर्थ का जो इस बेसिस पर डिवाइड कि ये पहले के हैं और वो बाद में आए हैं। ये सही नहीं है क्योंकि एक ही होमोसेपियंस की वेव फर्स्ट माइग्रेशन ऑलरेडी हो गया था। मिक्सिंग हो गई थी। उसके बाद हां अलग-अलग जगह पर लोग इवॉल्व हुए और फिर यात्रा करने लगे, आने लगे और फिर उसके बाद फिर एक हमारा पूरा वो सूप बन गया। सब लोग फिर तो
हर एक ग्रुप बनने का एक ना सोशल प्रोसेस होता है। उस सोशल प्रोसेस में लैंग्वेज एक काम करता है एज अ बैरियर। उसमें जो है आपका जो जेनेटिक म्यूटेशंस हैं वो भी काम करता है। उसमें जो है आपका बहुत सारी बीमारियां की वजह से लोग पापुलेशन मूव करती है। एक जगह से दूसरी जगह पे क्लाइमेटिक कंडीशंस हैं। तो बहुत सारे फैक्टर्स मिलकर के ना एक एक ग्रुप को बनाती हैं। फिर वो ग्रुप बनने के बाद दूसरे ग्रुप से होती हैं एसिमिलेट। ठीक है? ऐसा कुछ नहीं होता है ना कि हम बैक्टीरिया है या हम लैट
हैं कि हमारा एक सेट पैटर्न है ब्लीडिंग का। जैसे कि आप देखें एनिमल्स में लायन का जो होता है प्राइड उसमें एक सेट पैटर्न होता है ब्रीडिंग का। एक मेल होगा अल्फा मेल होगा वो ब्रीड करेगा। तो ऐसा ह्यूमन में तो होगा नहीं। तो हमारा डिफरेंशियल पैटर्न होता है मैटिंग का। हम हम अपने पार्टनर्स को चूज़ करते हैं। फिर उसके बाद से एक सपोज़ दैट कि तीन कपल हैं। एक कपल के 10 बच्चे हो गए। सेकंड कपल के एक बच्चा हुआ। तीसरे कपल के दो बच्चे हुए। तो जिसके 10 बच्चे हुए हैं वो ज्यादा प्रोपगेट
करेगा अपने। उसकी जो है ज्यादा मूव करेगी बहुत तेजी से। फिर अगर सेकंड वाले थर्ड वाले जो है कि फोर्थ फिफ्थ के बच्चे ही नहीं हुए। हालांकि उसके पास बहुत सारे ऐसे जो जेनेटिक एनस्टिटी है जो इनिश्ड है या अलग है बट वो अपने पास नहीं कर पाया या उसके बच्चे पास नहीं कर पाए उस तरह के इंसेस्टिटी को तो वो बिल्कुल खत्म हो जाएगी। तो इतना आसान नहीं होता है कि हम पूरे के पूरे एक पापुलेशन को हम बता सकते हैं कि इसका माइग्रेशन पैटर्न क्या रहा होगा। बहुत सारे उसमें बहुत सारे उसमें हर्डल्स
होते हैं। आप जैसे आर्कियोजेनेटिक्स में काम करते हैं और उसके थ्रू पास्ट डिकोड कर रहे हैं। पास्ट पे काम करते हैं। आपसे यह बहुत ढेर सारी रिक्वेस्ट आती होगी कि थोड़ा रामायण पे देखो, थोड़ा महाभारत पे देखो क्योंकि लोग जुड़े हुए हैं। कनेक्टेड हैं रूट से। तो ऐसी रिक्वेस्ट पर आपका क्या रिएक्शन रहता है? देखिए बहुत सारे ऐसे जो है स्टडीज हमने हम देखते हैं जो कि डायरेक्टली और इनडायरेक्टली हम रिलेट कर सकते हैं महाभारत से रामायण से। बट जो हमारी सोसाइटी है इंडियन सोसाइटी एक डवोर्स है और हम उसको उनको भी उनका भी दोष
नहीं देंगे क्योंकि यहां पे क्या है कि यहां हर एक इंसान का नैरेटिव एक सेट है एक माइंडसेट है हम इंडियंस जो है इवॉल्व होना नहीं चाह रहे हैं। हम चीजों को नई चीजों को हम एक्सेप्ट नहीं कर सकते हैं। बहुत जल्दी। यही प्रॉब्लम है। जैसे कि हमने एक स्टडी किया श्रीलंकन पापुलेशन पे सिनलीज पे एंड वहां के जो लोकल इंडजीनस ट्राइब्स हैं विद द जी। हमने देखा नॉर्थ इंडियन माइग्रेशन एक इलीट क्लास का नॉर्थ इंडियन इलीट ग्रुप जाता है साउथ श्रीलंका में और अपनी लैंग्वेज को देता है वो वो इतना एलिट है वो ग्रुप
कि जो लोकल जो लोग हैं वहां के उस लैंग्वेज को अडॉप कर लेते हैं। उसको आज हम बोलते हैं सिलीज। अच्छा सिलीज को आप अगर प्लेस करेंगे तो इंडोपियन लैंग्वेज में उसको आप रखोगे। द्रविड़ ललैंड में जहां पर लोग द्रविड़ियन लैंग्वेज बोल रहे हैं। आज के फोर 5000 इयर्स पहले एक नॉर्थ इंडियन भाषा जाती है। वहां के लोग उसको अडॉप्ट बोलते हैं। 70% श्रीलंकनंस सिनलीज बोलते हैं। और जेनेटिकली भी हम देख रहे हैं कि नॉर्थ इंडियन माइग्रेशन हो रहा है। बट हम ये नहीं बोल सकते हैं कि हम उसको इस फैक्ट को उस फैक्ट को
रामायण से नहीं कर सकते हैं कोरिलेट। और यह जो हमारी फाइंडिंग है वन ऑफ द बेस्ट रिसर्च जनरल में पब्लिश हुई है। ये ये इसका क्या टाइम फ्रेम होगा? इसका टाइम फ्रेम बहुत ही देखिए जेनेटिक में भी जो टाइम फ्रेम होता है ना बहुत ही एक्यूरेट नहीं होता है बट हम इसको प्लेस कर सकते हैं। इसको हम प्लेस करते हैं 3000 से 4000 साल के बीच में प्लेस कर सकते हैं। बट अगर हम इसको इस टाइम फ्रेम को हम बात करें रामायण से तो हमारे ऊपर लोग अटैक करना शुरू कर देंगे कि नहीं रामायण तो
काफी पुराना है। बट जो हमारा जो टाइम गैप है 3 टू 4000 इयर्स पहले यह माइग्रेशन हुआ होगा। एक सम इललीट ग्रुप गए होंगे। ऐसे ही आपको और भी क्या आपके काम में कुछ अद्भुत पता चल जैसा कि हम काम कर रहे हैं सनौली पे। सनौली एक जगह है नॉर्थ वेस्ट ऑफ इंडिया में मेरठ में बागपत डिस्ट्रिक्ट में। वहां पे एक वो मिला रथ मिला। जी। रथ काफी एक वार चैरियट है। वो ऐसा रथ है जिसमें कि सोने की भी नेल्स लगे हुए हैं। कॉपर का नेल्स लगे हुए हैं। एंड रथ को देख के लगता
है कि कोई एक राजा या राजकुमार उस उसका जो है स्वामी रहा होगा। उस चैरिट को राइड किया होगा। और फिर जिसने और जो जो राजा है उसकी भी ताबूत मिली उसके बगल में रॉयल बरियल इसमें अच्छा वो बरियल साइट थी हां तो रथ मिला उस राजा का हमें रिलैक्स मिला उसका हमने किया डीएनए एनालिसिस डीएनए से ये चला पता कि अबाउट 1800 इयर्स के आसपास जो है उसकी डेथ हुई होगी उस राजा की और जो डीएनए एनसी हिस्ट्री है वो आज के डेट में जो हड़प्पन हड़प्पन जो लोग हैं उनसे मैच कर रही है
तो हड़प्पन सिविलाइजेशन खत्म हो गया बट जो जो लोग माइग्रेट किए वो टुवर्ड्स गंगा प्लेन में माइग्रेट किए। ठीक है? और वो एक फेज रहा होगा 3800 साल के आसपास जब कुछ एक वारफेयर हुआ होगा क्योंकि उसी टाइम पर हमें बहुत सारे वो मिलते हैं वेपंस मिलते हैं उस एरिया में लाखों वेपन्स मिलते हैं सोफिस्टिकेटेड वेपंस उसको बोलते हैं हारपोंस एंटीना स्वर्ड वो कहो डेडली वेपन्स हैं वो एक एक हारपोन का जो वजन है फोर टू फाइव केजी डेडली वेपन अगर किसी के ऊपर अटैक हुआ कोई बचने के चांसेस इंपॉसिबल है तो रथ मिल रहा
है एक वॉरियर का जो है ताबूत मिल मिल रहा है। साथ में हमें बहुत सारे वो मिल रहे हैं। वॉरफेयर के जो है सामान मिल रहे हैं। तो डेफिनेटली वो एक वॉार टाइम वार फेज रहा होगा। 1800 साल पहले 1800 बीसी अच्छा 1800 बीसी हां यस 3800 साल पहले वेल डेटेड 1850 बीसी और वो भी सोने जड़े हुए रथ यस इतना सोना रथ में ही लगा दे रहे हैं हां और वो जो ताबूत है उस ताबूत में भी सोने लगे हुए हैं तो डेफिनेटली वो कोई एक एक राजा या राजकुमार रहा होगा तो हमें लड़ाई
के एविडेंसेस मिलते हैं बट हम कैसे करें कोरिलेट महाभारत को जबरदस्ती तो कहीं भी हम नहीं कर सकते हैं और हमें लगता है इस पे बात भी नहीं करना चाहिए अच्छा है कि हम इस तरह से पहुंचे बट एट द सेम टाइम ये भी काफी इंपॉर्टेंट है। हमें जानने की आवश्यकता है कि महाभारत कब हुआ। कब हुआ? क्योंकि लोगों में उत्सुकता है और ये हमें इस पे काम करना चाहिए, रिसर्च करना चाहिए। तो जेनेटिकली तो मैं बता सकता हूं कि हां वो एक टाइम था जिसमें कि सोफिस्टिकेटेड रथ यूज किए गए हैं। वो ऐसे रथ
है जो लड़ने के लिए उपयोग किए गए होंगे। और साथ में हमें बहुत सारे तलवार मिल रहे हैं। बहुत सारे ऐसे वारफेयर के सामग्रियां मिल रही हैं। तो लड़ाई तो हुई होगी डेफिनेटली। इसमें इंटरेस्टिंग ये है कि महाभारत में किरात एक हमें पता चलती है जाति जनजाति बोल सकते हैं और वो आज भी मिलती है कि तो अगर रामायण में कुछ ऐसे जनजातियों का वर्णन हुआ है जैसे कोल हुआ ठीक है फिर एक ट्राइब है राजस्थान में भील तो इनका वर्णन है रामायण में और ये ट्राइब का जब हमने वो किया जेनेटिक एनालिसिस तो चला
पता है कि ये ट्राइब्स तो बहुत ही इंडीजनस है डीपली रूटेड ट्राइब्स और यह ट्राइब तब से एक्सिस्ट कर रही हैं। उसी नाम से उनका नाम में भी चेंज नहीं हुआ है। और 5 6000 इयर्स पहले वो ट्राइब्स उसी नाम से जानी जाती थी जो आज भी जानी जाती है। जा रही है। तो एविडेंसेस है रामायण के। हम रामायण में वर्णन की हुई जनजातियों का हमने डीएनए एनालिसिस किया। उससे जो है ये चला पता है कि ये डीपली रूटेड ट्राइब्स हैं। इनका जो ट्रेडिशन है वो अभी भी वही है। जो ये अपने का जो ऑक्यूपेशन
है अभी भी वही है। तो एविडेंसेस मिलते हैं। बट आपको एक्सजेक्टली एक्यूरेट एविडेंस नहीं मिलेगा कि हां ये प्रूफ होता है। पर सपोर्टिंग एविडेंसेस मिलेंगे। सपोर्टिंग मिलेंगे। अभी आपकी एक रिसर्च पब्लिश हुई है। शायद कश्मीर के लोगों की आपने एनसेेस्ट्री पर वर्क किया है। कुछ इंटरेस्टिंग उसमें मिला है। तो कश्मीर के लोगों में ये है कि जो कश्मीरीज हैं कश्मीर एक तो है कश्मीरी हिंदू और कश्मीरी ब्राह्मणस ये दोनों एक ही हैं। अच्छा इनके डीएनए में कोई डिफरेंसेस नहीं है। हम और जो इस्लामीकरण हुआ है वहां पे वो मुगल के टाइम हुआ है। 16 17
सेंचुरी में हमें कुछ-कछ अरब इनफ्लो देखने को मिल रहा है जेनेटिकली। बट जो वहां के जो इंडजीनस ट्राइब्स थी या इंडजनस जो लोग हैं जिनके डिसेंडेंट दोनों हैं कश्मीरी ब्राह्मणस भी हैं कश्मीरी मुस्लिम भी हैं। वो जो है अबाउट फोर टू 5 थाउज इयर्स पहले ये भी इंडस वैली से माइग्रेट किए। अच्छा और वहां पे जाकर के वहां बसे। तो इंडस वैली की जो इंसेस्ट्री है वह ऑलमोस्ट सेम है जो उस टाइम के जो लोग रहे होंगे वहां के ट्राइब्स कश्मीर के और कश्मीर के जो ट्राइब्स हैं आज के 6000 इयर्स से लेकर के अभी
तक उसमें जेनेटिक कंटिन्यूटी है बाद में हमें जो 17 सेंचुरी के आसपास थोड़ा सा इनफ्लक्स देखने को मिल रहा है अरब का एंड ईरान का बहुत कम 2 से 3% के आसपास ठीक है तो कश्मीर एक बहुत स्टेबल प्लेस था और वो कंटीन्यूअस सिविलाइजेशन के स्टेज में था सिंस लास्ट 10,000 इयर्स से। इसमें एक रोचक बात मुझे लगती है कि हमें वेद या हमारे जो दर्शन आदि ग्रंथ वेद मिलते हैं वो इंडस वैली एरिया में मिलते हैं क्योंकि उस जगह की बात होती है। कश्मीर भी बहुत ज्यादा एक वैदिक अगर आप देख तो कश्मीर शैविज्म
है। तंत्र की एक जगह रही है और सब इंडस वैली जा लेकिन इंडस वैली में कोई ऐसा प्रमाण नहीं हमें मिलता है कि वहां संस्कृत का या इस तरह की संस्कृत का यह तो वो दुर्भाग्य है क्योंकि हमें जो है हम अभी भी लैंग्वेज को डिसफर नहीं कर पाए हैं। स्क्रिप्ट को डिसफर नहीं कर पाए हैं। तो ये कुछ लिमिटेशंस हैं और आर्कलॉजिकल रिसर्च पे अभी ज्यादा फंडिंग देने की रिक्वायरमेंट है। क्योंकि इंडस वैली के वजह से अबाउट 1% साइट 1% से भी कम साइट्स को डिस्कवर कर पाए हम। हमें लोकेशनेशंस पता है कि ये
जो माउंट है डेफिनेटली ये इंडस वैली टाइम के माउंट्स हैं। बट प्रॉपर एस्केवेशन और प्रॉपर एक्सप्लोरेशन होना चाहिए ताकि हम जो है और पास्ट को थोड़ा सा समझ सकें। इंडस वैली स्क्रिप्ट पर अगर कोई अच्छे से रिसर्च कर रहा है। आपको पता है तो जरूर बताइएगा। हम उनके साथ भी बैठना चाहेंगे एक पॉडकास्ट में। स्क्रिप्ट पे अभी कोई अपडेट नहीं है। अच्छा। स्क्रिप्ट के को डिकोड करने के डायरेक्शन में अभी 1% भी कंक्लूसिव वर्क नहीं हुआ है। तो अभी आपको लंबा इंतजार करना पड़ेगा। हम इस पर थोड़ा आते हैं कि एक क्वेश्चन उठता है कि
आपने जैसे कुछ आर्कियो जेनेटिक्स में या फिर अपनी जीनोम स्टडी में पाया और वो बिल्कुल ही अलग है। आर्कियोलॉजिकल या फिर जो स्क्रिप्चरल एविडेंस है। जैसे हम इसका ही केस उठा लेते हैं। अभी हम एंडोगैमी पर बात करने जा रहे थे। तो अभी मनुस्मृति को एक वैदिक ग्रंथ माना जाता है। तो वो तो बीसीई के ऊपर चला गया। ठीक है? और जातियों की आप बात कर रहे हैं इधर कि जब वेद के बाद क्योंकि वेद में हमें गोत्र सिस्टम दिखता है ऋषियों के गोत्र हैं लेकिन बाद में पौराणिक काल आता है या और थोड़ा रूढ़िवादी
काल आता है तो जातियां दिखती हैं। तो अब आप कहेंगे कि अगर जातियां है तो लोग बोलेंगे मनुस्मृति में ही जातियां हैं। या तो फिर हम मनुस्मृति को इधर लाएं मनुस्मृति इधर का ग्रंथ है। तो ऐसे कंट्राडिक्शंस आते हैं। तो आपको ऐसे कंट्राडिक्शंस जातियों पर ही हम बात कर लेते हैं। तो ये जो जातियां बनी और हम इस पर अब क्या ही कॉन्ट्रक्शन की बात बाद में कर रहा हूं जो ब्राह्मणस मैं ब्राह्मण हूं गंगा प्लेन का यूपी का जी हमने काम किया है दलितों पे भी काम किया है चमार पे काम किया है तो
हमें तो जेनेटिक डिफरेंस नहीं देखने को मिला ज्यादा डिफरेंसेस नहीं है चमार एंड ब्राह्मण में हम तो ये तो मैं फर्स्ट टाइम बोल रहा हूं यहां जेनेटिकली मेरे पास डाटा भी है तो मेरा जो ये मानना नहीं है जो हमारे पास जो डाटा है वो यह शो करता है कि जेनेटिक बेस्ड डिफरेंसेस बिलकुल कास्ट बेस्ड जेनेटिक डिफरेंसेस नहीं है और मतलब शादियां हुई है पहले बिल्कुल हुई हैं और आप मैक्सिमम मैं इसको ले जाऊंगा 1000 साल पहले तो जो मे बी जो सोसाइटी बने होंगे उनका अलग एक फाउंडेशन रहा होगा उनका जो डिफरेंसेस या जब
उनका वर्णन किया गया होगा उसके उसके रीज़ कुछ और रहे होंगे पर जेनेटिकली हमें कोई डिफरेंसेस देखने को नहीं मिलता है नहीं मिलता साउथ इंडियंस जो ट्राइब्स हैं उसके अंदर हमें दिखता इंडोरोपियन R1 मार्कर्स मिलते हैं। ग्रुप्स मिलते हैं। बट हम अभी बात करें एएसआई एनस्ट एंशिएंट साउथ इंडियन लाइक ओंगे लाइक ऑफ एनस्ट्री बट उनके अंदर R1 A1 हैप्लोग ग्रुप्स हैं। R2 हैप्लोग ग्रुप्स हैं हमारे बहुत सारे जो है ट्राइब्स में जो कि काफी इंडजीनस ट्राइब्स हैं। तो मिक्सिंग काफी हद तक फ्री मिक्सिंग हुई है और कोई ऐसा पैटर्न नहीं था अंटिल 1000 इयर्स एगो।
उसके बाद जब ये जातियां बनी और उसके बाद उसके बाद मुझे लगता है कि ज्यादा मुगल टाइम में ज्यादा स्ट्रिक्ट हुई हैं हम और ब्रिटिश टाइम पे और ज्यादा स्ट्रिक्ट हुई उससे क्या घाटा हुआ भारत का वो एक सोशल जो घाटा हुआ है वो तो हमें दिख घाटा ये है कि 10 मतलब 1000 इयर्स में हम जो है से हम शादियां नहीं कर रहे हैं दो कास्ट में ठीक है तो उसका जो टाइम हुआ अबाउट 50 जनरेशन पहले बहुत सारे ऐसे जो म्यूटेशंस हैं जो कि जिसको बोलते हैं हार्मफुल म्यूटेशन वो बहुत सारे पापुलेशन ग्रुप
में आ चुकी हैं। जिसको बोलते हैं रिसेसिव जींस। वो आज के जमाने में आज के टाइम पे 55% ऐसे पापुलेशंस हैं इंडिया में जिनके अंदर वो प्रो प्रो प्रो प्रो प्रो प्रो प्रो प्रो प्रो प्रोपगेट कर चुकी हैं अच्छे से। अब उनको रिमूव करना उन हार्मफुल म्यूटेशंस को ये हमारे लिए बहुत बड़ा चैलेंजेस है। ठीक है? इसके लिए हमें वापस अलग शादियां करना शुरू करना होगा। एक्सैक्टली। तो जो म्यूटेशंस आ चुके हैं हार्मफुल म्यूटेशंस उसको तो हम निकाल नहीं पाएंगे। बट क्या होता है कि एक एक म्यूटेशन हुआ उसके एक्सजेक्टली सेम कॉपी भी अगर आपके
डीएनए में आ गया बॉडी में तब तो वो बहुत ही हार्मफुल हो जाएगा। बट अगर हेटेरोजाइगस कंडीशन में है एक ही कॉपी है तब वो उतना हार्मफुल नहीं होगा। तो हमें कोशिश अगर हम जो है शादियां कर रहे हैं डिफरेंट कास्ट में तो इसकी प्रोबेबिलिटी बहुत ज्यादा बढ़ जाएगी कि उसकी एक ही कॉपी रहे आपके शरीर में दो कॉपियां ना हो पाए। एक ही कास्ट में करेंगे हो सकता है कि आपके पार्टनर में भी एक्सक्टली। तो अगर मान लीजिए कि आपके अंदर जो है दो कॉपी आ गया तब तो फिर वह तो बहुत ही खतरनाक
हो जाएगा। वो एक्सप्रेस कर देगा। एक्सक्ट्ली तो ये भारत में आप बता रहे हैं कि एक अलार्मिंग सिचुएशन है नेक्स्ट 50 इयर्स में। बहुत ही ज्यादा आप देखिए पारसी पारसी जो है उनकी पॉपुलेशन थी 188000 आज के 20 साल पहले 25 साल पहले अभी वो 500 हो गए हैं। 50000 पे आ चुके हैं। तो इससे पूरी इंडिया की डेमोग्राफी चेंज हो जाएगी। डेमोग्राफी से बढ़कर के पापुलेशन नहीं कम होगा। पापुलेशन तो बहुत ही स्लोली डाउन होगा बट हेल्थ बर्डन बढ़ जाएगा। गवर्नमेंट को का जो है काफी जो बजट है ना वो हेल्थ पे लगना पड़ेगा
और हर इंसान की जो इकोनमिक क्राइसिस ज्यादा बढ़ जाएगी। तो इसमें मुस्लिम्स को तो और ज्यादा खतरा है। वो एक फैमिली में करते हैं। तो मुस्लिम तो सबसे ज्यादा वनेरेबल है। मुस्लिम्स हैं साउथ इंडियन पॉपुलेशन रेड्डी हुए एंड कापू हुए। ये आपस में शादियां करते हैं। मतलब इवन क्लोज रिलेशन में करते हैं शादियां। तो ये बहुत ज्यादा तो वनरेबल है। ये तो आने वाले टाइम में इनको तो बहुत ही खतरनाक कॉन्सिक्वेंसेस झेलना पड़ेगा। तो ऐसे कॉन्सिक्वेंसेस कोई कंट्रीज झेल रहे हैं। अभी हां एक कंट्री है फिनलैंड। वहां पे फिन जो फिनिश लोग होते हैं उनके
अंदर भी काफी ज्यादा एंडोगमिक प्रैक्टिससेस हुई हैं। अच्छा। एक जूस की एक पापुलेशन है इसको बोलते हैं एस्कनाजी जूस। वो भी काफी एंडोगमस है। तो वहां तो बैन है इन दो कम्युनिटीज में बिना विदाउट जेनेटिक टेस्टिंग आप शादी नहीं कर सकते हैं। अगर शादी कर भी रहे हैं तो आपको कुछ कुछ प्रिकॉशंस को आपको लेना पड़ेगा। बट इंडिया में तो हमारे पास इस तरह का कुछ टेस्ट है नहीं। जेनेटिक बेस्ड टेस्ट और ऐसी भी और हम जो मेडिकल एजुकेशन में जो हम किताबें पढ़ते हैं मेडिकल एमबीबीएस के स्टूडेंट्स एमडी ये किताबें जो लिखी हुई है
फॉरेन ऑथर्स द्वारा उसमें इस तरह के बीमारियों के बारे में कोई वर्णन नहीं है। उनको पता भी नहीं होगा कि प्रैक्टिससेस उतनी तो नहीं एक तो हमारा एनवायरमेंट वो अच्छा नहीं रहा। हमारा जो खान खानपान है वो बेकार हो गया। हमारा प्रोटीन इंटेक कम हो गया। हम मोस्टली जो है एग्रीकल्चर प्रोडक्ट्स पे डिपेंडेंट हो गए। वीट पे, राइस पे जो है एंड तीसरा जो जेनेटिक क्राइसिस तो जब तीन चीज़ मिल जाती हैं तो आप फिर तो हेल्थ का जो आप सोचिए कि क्या हालत होने वाला है इंडिया में? नीरज जी अगर मान लीजिए आपको कल
पूरे इंडिया का एक जेनेटिक मैपिंग मिल जाए। हर एक व्यक्ति की आपको जीन की आप उसको क्या बोलते हैं? जीन जीन जेनेटिक मैपिंग बोल दीजिए। हां जेनेटिक मैपिंग जेनेटिक सीक्वेंसेस हां पूरा डाटा आपके पास है। आप मान लीजिए एआई का भी यूज़ कर सकते हैं। तो क्या हमें सशंस मिल सकते हैं या फिर क्या ब्रेक थ्रूज़ हम कर सकते हैं इनोवेशन पहला ब्रेक थ्रू ये है कि हम जो है राइट हम अगर पार्टनर को आइडेंटिफाई कर लिए हैं और हमने हमने देखा कि इसमें ये रिस्क फैक्टर्स हैं तो मैं रेकमेंड करेगा करूंगा आप जाइए आईवीएफ
की तरफ अच्छा आईवीएफ में आपके पास ऑप्शंस होंगे कि अगर आपके सेवन एम्ब्रियोस बने हैं उन सेवन एम्ब्रियोस को हम चेक करेंगे जेनेटिकली जो बेस्ट एम्ब्रियो होगा उसको जस्ट ट्रांसप्लांट के तरह यूज़ कर सकते उसको डेवलप होने यस पहला ऑप्शन है। दूसरा क्या है कि अभी भी लोग जिनके बच्चे नहीं होते हैं। दूसरा दूसरा ऑप्शन ये है कि आप कम एज पे आप अगर आपके अंदर वो जेनेटिक म्यूटिशंस हैं तो आप कम एज पे आप प्लान करिए जो है बच्चे पैदा करने का या अगर आप नहीं कर पा रहे हो तो अपने जो एग है
उसको आप फ्रीज करा लीजिए। तीसरा जो है कि बहुत सारे लोग आईवीएफ का सहारा ले रहे हैं आजकल। आजकल तो इनफर्टिलिटी काफी तेजी से बढ़ रही है। बिकॉज़ ऑफ़ दिस एंडोगमिक प्रैक्टिससेस। इनफर्टिलिटी के केसेस में क्या होता है कि लोग यूज़ करते हैं डोनर आइदर एग और स्पर्म। स्पर्म। बट हम उन डोनर का जेनेटिक प्रोफाइल नहीं करते हैं। अगर हमारे पास डेटाबेस हो 100 लोगों का हमारे पास डोनर्स का डेटाबेस हो तो हम उन 100 बेस्ट डेटाबेस में से बेस्ट जो डोनर है उसको हम सेलेक्ट करेंगे। ठीक है? हमने सपोज दैट हमने एक को फ्रिज
रखा हुआ है। 100 हमारे पास एक हैं 100 लोगों के। हमें जो है कोई आया है डोनर। हमें किसी को रिक्वायरमेंट है एक की। तो हमारे पास सबका डेटाबेस है 100 लोगों का जेनेटिक डेट डेटाबेस। उसमें से हम बताएंगे कि ये नंबर 70 वाला जो है बेस्ट फिटेड एक हो सकता है इस स्पर्म के लिए। तो इस तरह की काउंसलिंग की ज्यादा रिक्वायरमेंट है। तो इससे हम जो है बहुत सारे ऐसे मटेशंस है ना उसको हम सोसाइटी से निकाल सकते हैं, एलिमिनेट कर सकते हैं। ये ऑप्शंस हमारे पास है। जेनेटिक एक व्यक्ति को जेनेटिक प्रोफाइलिंग
अपनी करानी है तो कितना खर्चा आता होगा? अभी तो काफी सीक्वेंसिंग कॉस्ट काफी रिड्यूस हो गई है। तो मे बी आप 2025,000 में जेनेटिक प्रोफाइलिंग हो जाती है। मैक्सिमम यानी अगर एक कपल को कराना है तो 500 हां 30 से 400 में हो जाएगा। अच्छा और उसको पता चल जाएगा कंपैटिबिलिटी और ये बहुत करना ही चाहिए। यह करना ही चाहिए। लोग सोचते हैं कि हम हम हो सकता है कि हम लकी हो, हम बच जाए। बट जब लोगों के ऊपर आता है इस तरह के प्रॉब्लम्स तब रियलाइज होता है कि हमें इस तरह का जो
है टेस्ट को ऑप्ट करना चाहिए था। नीरज जी और भी मैं जानना चाहूंगा कि और किस तरह के काम आपके होते हैं। जैसे एक तो मुझे पता है कि ग माइक्रोब्स पर आप काम करते हैं। उसके साथ-साथ यह जो हम एज अ इसकी बात कर रहे हैं कि आर्कियोजेनेटिक्स की उसमें क्या फ्यूचर है? क्योंकि अभी जब से एआई आया है तो लगभग सभी फील्ड अपने आप को अपग्रेड कर चुकी हैं। तो और क्या पॉसिबिलिटीज हैं इस फील्ड में और किस तरह की इंफॉर्मेशनेशंस हमारे पास आ सकती हैं या ऐसी कोई डिसीज है जिसका हमें स्यूशन
मिल सकता है जो अभी बहुत दिन से लालाज है। जैसे एक तो जो हम मैं काम करता हूं उसका स्कोप है डी एक्सटिंशन। जैसे कि बहुत सारे प्रजातियां हैं जो एक्सटिंक्ट हो चुकी हैं। जैसे डॉग की कुछ ऐसी वैरायटीज हैं ब्रीड्स हैं। हमें डॉग काफी सारा वह मिला। सीक्वेंसेस मिले हैं जो कि अलीस्ट डॉग थे इंडिया में 6000 इयर्स पहले चीता रिसेंटली चीता एक्सटिंक्ट हो गया इंडिया से तो वो जो इंडियन चीता था वो बिल्कुल हो सकता है कि अलग हो अफ्रीकन चीता से से क्लोज ना हो क्योंकि हमारा इंडियन चीता यहां पे हजारों सालों
से सर्वाइव किया बाद में खत्म हो गया तो हमने उसका जो डीएनए सीक्वेंस किया ठीक है एक्सटिंक्ट चीता का क्योंकि म्यूजियम म्यूजियम में बहुत सारे उसके स्किन सैंपल रखे हुए थे अच्छा तो हमने उनका डीएनए सीक्वेंस और सीक्वेंसिंग से हमें चला पता है कि अफ्रीकन चीता से हमारा इंडियन चीता काफी डवर्सिफाइड है। बहुत सारे डिफरेंसेस हैं जीन में। तो आज के आज के टाइम पे एक टेक्नोलॉजी है क्रिसपर कैस। क्रिसपर से हम क्या कर सकते हैं कि डीएनए को एडिट कर सकते हैं। जैसे अफ्रीकन हमने अफ्रीकन चीता का एक सेल लिया और हमने देखा कि
इंडियन चीता से इतना अलग है। तो उस अफ्रीकन चीता के सेल के जो डीएनए है ना उसको उस पॉइंट्स पे हमने चेंजेस कर दिए और फिर रिवाइव कर लेंगे। ठीक है? तो अब तो वो जो सेल है वो हो गया एज अ इंडियन चीता। फिर उस सेल्स को हमने बना दिया एम्ब्रियो। एम्ब्रियो बना करके हमने जो अफ्रीकन चीता के वॉम में डाल दिया। तो अफ्रीकन चीता जो है इंडियन बच्चों को इंडियन चीता के बच्चों को जन्म देगी। तो इस तरह का काम हम प्लान कर सकते हैं। तो हमारे पास अभी तो सीक्वेंसेस आ गए हैं
इंडियन एक्सटिंक्ट चीता के। हम अभी प्लान कर रहे हैं। हमारा जो पार्टनर इंस्टट्यूट है उनके साथ हम डिस्कस कर रहे हैं। बट अभी इसके बारे में हम और जानकारी नहीं दे पाएंगे। वैसे बीमारियों का है बहुत सारे ऐसे जेनेटिक बीमारियां जैसे मैंने बताया कि आप उससे बच सकते हैं। अगर आप बच नहीं पाए तो भी आपके पास एक ऑप्शन है। क्रिसपर कैश से हम जो है उन जैसे सिकल सेल एनीमिया हुआ या थैलेसीमिया हुआ। अगर वो डीएनए में आ चुका है सारे सेल्स में आपके तो उस क्रिस पर कैश एक एंजाइम होता है। उस एंजाइम
से हम उन पॉइंट से जाकर के उस डीएनए म्यूटेशन को चेंज कर सकते हैं। बट इसका जो कॉस्ट पता है कितना आएगा अभी? इसका कॉस्ट पर सैंपल आएगा कम से कम 10 से 15 करोड़ के बीच में। तो ये जो अभी हमने न्यूज़ देखी कि गवर्नमेंट एक प्लान लारी क्रिसपर का ही सील सेल डिसीज के लिए। तो ये गवर्नमेंट इसलिए कर रही है क्योंकि लोग अफोर्ड नहीं कर पाएंगे। हां तो यह गवर्नमेंट हां गवर्नमेंट का प्लान है बट गवर्नमेंट यह सोच रही है कि यह जो टेक्नोलॉजी है हो सकता है फ्यूचर में कोई भी टेक्नोलॉजी
फ्यूचर में सस्ती होती है बट अभी का जो प्राइस मैं बता रहा हूं यह एक सिल सेल पेशेंट को सही करने में अभी यूके में किया है एक पेशेंट को उसकी जो लागत थी ₹100 करोड़ के आसपास थी तो अभी मैं बता रहा हूं 10 से ₹15 करोड़ हो सकता है फ्यूचर में वो कुछ लाख में आ जाए बट अभी का जो कंडीशन है यह काफी एक्सपेंसिव ये टेक्निक है तो दो चीज़ हैं इसमें एक तो मुझे यह जानना है कि यह जो डीएनए मैटर आप लेते हैं ये ये कब कब एक्सपायर होता है? मतलब
आप जैसे बोले कि उसका म्यूजियम में स्किन सेल हमें मिल गई। वो कब तक पड़ा रहता कि आप नहीं उसको मैं तो निकालता हूं डीएनए 5000 6000 10000 ईयर ओल्ड बोन से तो ये तो रिसेंट सैंपल हैं। 200 साल पुराने सैंपल्स हैं। 300 साल पुराने सैंपल्स तो ऐसा भी होता है कि कोई ऐसी चीज है जिसका फिर उससे डीएनए सैंपल नहीं निकल सकता। हां अगर वो काफी सैंपल फॉसिलाइज्ड हो गया। अच्छा मतलब ऑर्गेनिक चेंज हो गया इनऑर्गेनिक में तब मुश्किल होगा। तब मुश्किल होगा। या अगर जो ठंड के एनवायरमेंट होते हैं जैसे रशिया हुआ या
साइबेरिया हुआ वहां पे तो 1 मिलियन 2 मिलियन 3 मिलियन कितना भी पुराना सैंपल हो हम डीएनए एक्सट्रैक्ट कर सकते हैं और इसमें भी जो हम रिवाइव कर रहे हैं वो हम स्पीशीज ही कर सकते हैं पर्टिकुलर किसी व्यक्ति को नहीं कर सकते हैं नहीं व्यक्ति को नहीं कर सकते डीएनए रेसिपी ही है एक्सक्ट्ली क्योंकि पर्टिकुलर व्यक्ति में तो हजारों मटेशंस होंगे स्पीशीज में क्या हां कर सकते हैं कुछ हद तक कर सकते हैं क्रिसपर जैसी टेक्नोलॉजी कर सकते हैं पर उसका क्या यूज़ है सपोज दैट कि कोई इंसान मर गया उसका हमें डीएनए सीक्वेंसेस
मिल तो अगर हम बना भी सकते हैं बट उसका फायदा क्या होगा? कोई चाहे लेकिन वही है फिर वहां पर वो आ जाएगा वह वही व्यक्ति आने वाले टाइम में होगा आने वाले 200 सालों में यह भी टेक्नोलॉजी होगी रोबोट चैलेंजेस क्या आने वाले हैं अगले 50 चैलेंजेस में ये है कि जो क्रिस पर कैश टेक्नोलॉजी से आपने रिवाइव कर दिया ठीक है अगर कुछ उसमें एरर हो गया तो फिर अगर आप एरर हो गया बच्चा तैयार हो गया बच्चा बड़ा हो गया अब उसको भी आपको पता है कि इसके अंदर एरर हो गया है
बट फिर भी उसको रिप्रोड्यूस करने का चांस तो मिलेगा ना तो यह एथिकल कंस्ट्रेंस होता है या तो उसको खत्म करने का एक एथिकल वो आएगा। नहीं तो वो तो फिर कहां से कौन देगा इस तरह के परमिशंस? आपको कहां-कहां लगता है कि गवर्नमेंट को इन चीजों में नहीं खर्च करना चाहिए या ऐसे प्रोजेक्ट्स को और इन प्रोजेक्ट्स को बढ़ाना चाहिए। देखिए मैं वो बोलना चाहूंगा कि जो भी हेल्थ केयर रिलेटेड फील्ड है रिसर्च इंडिया में वो उसमें काफी फंडिंग रिक्वायरमेंट होती है। फंडिंग एंड मैनेजमेंट। तो गवर्नमेंट जो इंस्टट्यूट हैं उन पे उनको कोलबोरेशन करना
चाहिए। प्राइवेट कंपनीज़ से एंड क्योंकि एक आप कोलबोरेशन का एनवायरमेंट होना चाहिए। यहां पर इंडिया में क्या है कि जो 90% लैब्स हैं वह इंडिपेंडेंट काम करती हैं। एक लैब, एक प्रोजेक्ट 10 लोग काम कर रहे हैं। इससे हमारा जो फंडिंग रिसोर्सेज भी होता है वेस्ट होता है एंड हमारा कुछ एक प्रोडक्ट निकल के नहीं आ पाता है। तो एक पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप एंड फोकस रिसर्च फंडिंग का प्रॉपर यूटिलाइजेशन से हम बहुत कुछ कर सकते हैं। जैसे मैं इसलिए पूछा था कि क्लोनिंग जैसी चीजें अब यह कुछ गवर्नमेंट बैन कर देती हैं कि अनएथिकल ही
है। तो अब इसमें इमेंस पॉसिबिलिटीज है। कल को ऐसा होगा कि लोग अपने बच्चे चूज़ कर रहे हैं। कस्टमाइज कर रहे हैं कि हमको भाई ऐसे ही शाहरुख खान जैसा चाहिए या ऐसा वो तो आप अभी अभी भी कर सकते हैं कस्टमाइज। ये इस पर कोई एथिकल नहीं क्लोनिंग करने की क्या जरूरत है? आप आईवीएफ करिए। आईवीएफ में आप देख लीजिए नौ एम्ब्रियो बने हैं। 10 एम्ब्रियोस आप देख लीजिए उसमें किसके कर्ली इयर्स हैं। इसमें कितना खर्चा है? यह तो इसमें तो 1 लाख के नीचे का खर्चा है। अच्छा बट इसमें भी हम नहीं दे
सकते हैं ट्रेड्स क्या है। बट कुछ हद तक जो हार्मफुल ट्रेड्स हैं वो हम बता सकते हैं। वो ये देख सकते हैं कि हेल्दी सबसे हेल्दी कौन सा हां बट आप कर्ली टेल्स का भी देख सकते हैं। आपका आई कलर का भी बता सकते हैं कि ब्राउन आइज, ब्लू आइस हर एक एम्ब्रियो का आप लिस्ट आउट कर सकते हैं कि इसमें ये ट्रेड्स हैं, ये ट्रेड्स हैं, ये ट्रेड्स हैं। और एथिकली करेक्ट भी है। बट हम ये नहीं बता सकते हैं कि किस कास्ट ग्रुप का ये एम्ब्रियो है। किसका मतलब डोनर कौन है वो अनएथिकल
होता है। बट आप लिस्टिंग आउट कर सकते हैं कि 10 एम्ब्रियो के ये 10-10 पैराटर्स हैं। आप चूज़ कर लो इसमें से आप क्या चाहते हो? नीरज जी आप बहुत ही इंटरेस्टिंग फील्ड में हैं। जहां से एक एक हमारे पास ये टूल है कि हम अपने फुटप्रिंट्स छोड़ते ही जा रहे हैं। डीएनए वो हमारे अंदर सब कुछ रखा ही हुआ है। जब से फर्स्ट सेल से मुझे लग रहा है रखा होगा। मैंने सुना था आपने एक जगह कहीं बोला कि 98% हमने डिकोड नहीं किया है अपने डीएनए को मतलब ये एक्सप्रेस नहीं हुआ तो 98%
वही इंफॉर्मेशन है जो पुरानी वो है आपने बोला ना कॉन्शियस माइंड और जो जो सबकॉन्शियस जो होता है ना एक्सप्रेशन का जो तरीका होता है तो जो 98% जो डीएनए हमारा है जो कि कोई प्रोटीन नहीं बनाता है कुछ एक्सप्रेशन नहीं है वो बैठा हुआ है हर सेल में उसका भी कुछ रोल होगा धीरे-धीरे एक्सप्रेस होगा धीमे-धीमे हमें चलेगा पता है फ्यूचर में आपको आपको क्या लगता है हम किस चीज में इवॉल्व होंगे होमोसेपियंस हम इवॉल्व नहीं होंगे हम तो खत्म हो जाएंगे एक्सटिंक्ट हो जाएंगे हम तो हमारी कोई ब्रांच आगे जाएगी नहीं हमारा तो
इतना इतना लेस डवर्स्ड हमारा स्पीशीज है तो हम काफी वनरेबल हैं काफी ज्यादा वनरेबल तो हमारी जैसी इंटेलिजेंट स्पीशीज आगे आएंगी हमारा तो क्लोज तो हमें तो कोई दिखता नहीं है इस अर्थ पे मे बी डॉग आ सके डॉग डॉग भी काफी तेजी से इवॉल्व हो रहा है जिसके नंबर बढ़ेंगे वो उनके अंदर ज्यादा चांसेस होंगे इवॉल्व होने का क्योंकि अभी इसमें कुछ लोग यह कयास लगा रहे हैं और मैं भी कभी-कभी चैट जेबीटी से पूछने लगता हूं कि अभी वो खाली है मैं भी खाली हूं तो और क्या बात करें तो चैट जीपीटी से
पूछता हूं तो इस तरह के इंफॉर्मेशन कि साइबॉक्स आ सकते हैं। हाफ ह्यूमन हाफ मशीन काइंड ऑफ हम अलग-अलग स्पीशीज बन सकती है। अभी हम प्योर ऑर्गेनिक स्पीशीज की तरफ ह्यूमन तो नहीं सर्वाइव कर पाएगा। तो हो सकता है किसी मशीन बेस्ड स्पीशीज क्योंकि नॉलेज इस तरह से बढ़ रही है। देखिए वो तो कभी नहीं हो सकता है। आप मैं दे देता हूं एग्जांपल देता हूं कि जैसे कि हमारा एक सेल बनाने का जैसे एक एक मान लीजिए एक स्पर्म सेल्स बन रहे हैं हमारे बॉडी के अंदर हर घंटे बन रहे हैं करोड़ों बन रहे
हैं। उसको अगर लैबोरेटरी बनाओगे तो आप पूरे जो यूएस की इकॉनमी है ना 30 ट्रिलियन की 25 ट्रिलियन की वो लग जाएगा एक स्पर्म सेल बनाने में लैब में यस लैब में तो जो इवॉल्यूशन हुआ है जिस डायरेक्शन में हम इवॉल्व हुए हैं अब ठीक है अब मशीन तो आ जाएगी मशीन रिप्रोड्यूस कैसे करेगी तो वो प्रॉब्लम है रिप्रोडक्शन पूरा का पूरा खेल रिप्रोडक्शन का है इस इस धरती पे कोई भी स्पीशीज आया उसका एक ही मकसद है रिप्रोडक्शन हमारा जो जो इवोल्यूशन डेवलपमेंट हुआ है ना हमारा बॉडी हम जो खाना खा रहे हैं जो
हमारे ट्रेड्स हैं बाल आंख सब कुछ के पीछे एक ही लॉजिक है रिप्रोडक्शन नीरज जी बहुत-बहुत धन्यवाद आपने समय दिया इतनी अगर मैंने ट्राई किया है कि अच्छे प्रश्न मैंने रखे हैं और दर्शकों को ना केवल इतिहास बल्कि मॉडर्न में क्या चल रहा है इस फील्ड की क्या पोटेंशियल है फ्यूचर में क्या कर सकते हैं अलार्मिंग सिचुएशन क्या है तो इंटरकास्ट मैरिजेस हमें स्टार्ट करनी चाहिए कोशिश करना चाहिए हम सिटीज नहीं तो स्टेट ट्रू ट्रू ट्रू बदलना आप टेस्टिंग कर लीजिए जेनेटिक टेस्टिंग देख लीजिए उसमें कितना डिस्टेंस है हां अगर अरेंज मैरिज हो रही है
तो हम एटलीस्ट जेनेटिक ऐसा भी नहीं है कि आप सेम कास्ट में करिए बट जेनेटिक डिस्टेंस अगर ज्यादा अच्छा है तो तो आप बगल मोहल्ले में भी कर सकते प्लान कर सकते हैं अगर नहीं अच्छा है तो आप उसके अलग-अलग तरीके होते हैं हम तो मतलब जो हमारा गोत्र सिस्टम था वो सही था लेकिन ये जातियां जो गोत्र सिस्टम एकदम बिल्कुल सही था बट गोत्र सिस्टम भी अब काम नहीं करेगा अगर पापुलेशन ज़्यादा बढ़ गया तो गोत्र सिस्टम ये कहां काम करेगा वो तो बनाया गया था 2 लाख लोगों के लिए गोत्र सिस्टम बट अभी
जो है 150 करोड़ हो गए हां अभी गंगा प्लेन में हो गए 60 करोड़ लोग हम तो इसी के साथ इस पडकास्ट को य पर समाप्त करेंगे आपका बहुत-बहुत धन्यवाद आप जुड़े नीरज जी थैंक यू सो मच थैंक्स बुलाने के लिए