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#590 एकांतिक वार्तालाप / 23-06-2024/ Ekantik Vartalaap / Shri Hit Premanand Govind Sharan Ji Maharaj

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[संगीत] डॉक्टर गायत्री जी हरियाणा जय जय श्री श्री हरिवंश महाराज जी महाराज जी जिंदगी में हमेशा जिस वस्तु की चा की या कोई कामना की हमेशा उसे निराशा ही मिली फिर भी किशोरी जी की कृपा से मन नहीं हटा मन में एक ही निराशा रही ऐसे में निराशा रहना चाहिए या भगवान उसे हम आपको सही बताए ये एक बाजार है हम खुल के आपको बात कह रहे हैं संसार एक बाजार है यहां तुम्हें जो कुछ चाहिए तुम्हारे पास माल होना चाहिए खुली बात है तुम्हारे केवल चाहिने से नहीं मिल जाएगा तुमको चाहिए अमुक सुख तो
उतनी तपस्या उतना भजन उतना साधन होना चाहिए इसमें श्रद्धा और विश्वास मत खो देना भक्ति का कि हम तो भगवान के मंदिर गए मनाया हमारा काम नहीं बना नहीं बना ने का यह बाजार है मेरे मालिक की दुकान में है सबका जीवन खाता जैसा जैसा कर्म करोगे वैसा वैसा फल आपके सामने आएगा अब आप मांग रहे हो हीरा जवाहरात का हार व आपके जेब में नहीं ₹ तो मजाक के पात्र तो बनोगे ही हमारी बात समझना अगर हमको जो वस्तु चाहिए उसके लिए हमारे अंदर भजन व्रत तपस्या यह हमारे पास धन होना चाहिए हमें लगता
है कि भगवान की शरण में में हो जाए और भगवान से प्रार्थना कर दे कि मुझे मांगना ना आए ऐसी कृपा कर दो कि मांगना मिट जाए अब वो चाहे देक मिटा दो या ज्ञान देक मिटा दो छोटी छोटी बातें मत मांगो हम बड़े बादशाह के सामने अगर जाएं तो हम मांगने की जब बात सोचेंगे तो हम अपनी औकात से मांगेंगे जैसे गांव का गरीब आदमी बादशाह के पास गया तो बादशाह ने कहा क्या चाहते हो जो मांगोगे दे देंगे बोले हुजूर एक साल का हमें अन्न दे दो एक साल के भुस की व्यवस्था कर
दो हमारे जानवरों को हो जाए तो एक मकान की व्यवस्था कर दो तो उन्होंने कहा ठीक है ऐसा कर दो अगर वह पलट के बोल देता कि हुजूर हम क्या मांगे आप ही दे दो तो वह अपनी स्थिति से देता वह इतना देता कि जीवन भर वह निहाल लेता क्योंकि वह एक साल का भूस औरन नहीं देता क्योंकि बादशाह है वह अपने हिसाब से देता तो हम तो घटे में हो जाएंगे जो भगवान से मांग लेंगे क्योंकि हम भगवान से क्या मांगेंगे आप खुद देख लो जो मांगने वाले हो क्या मांग सकते हो आप हमें
सुंदर पति दे दो और यह चंद दिनों की है शरीर छूटा सब छूट जाएगा यह किसी काम के नहीं और भगवान से यह मांग लो कि मेरा मांग नहीं मिटा दो चाहे देक मिटा दो चाहे ज्ञान देक मिटा दो बढ़िया बात है नैराश्य परमम सुखम आसा ही परमम दुखम राश्य परमम सुखम जो भोगों से आशा की जाती है यही दुख प्रदान करता है निराश हो जाओ भोगों से और आशा भगवान की प्राप्ति की करो अभी सुखी हो जाओगे बड़ी कृपा है जो हमारी आशा भगवान ना पूरी करें क्योंकि हमारी आशा पूरी होती जाएंगी हम फसते
चले जाएंगे जय हो मंगल भवन प्रभु आप हमारी आशा पूरी मत करना आप हमको वही देना जिससे आपका भजन ना छूटे आपका भरोसा ना टूटे तो हमें लगता है भगवान से यही मांगा जाए कि मेरा मांगना मिटा दो ये मंगता पन हटा दो हमारे अंदर से जो मांग मांगकर हम जीने का अभ्यास बना लिए जिससे देखो उससे मांगना तो हम भगवान मंग भलो न बाप से जो प्रभु राखे टेक क्या मांगे तुम जगत के पिता हो जगत के मालिक हो आप जानते हो हमें क्या चाहिए जो चाहिए वो पूरा करो नहीं इच्छा है तो ना
पूरा करो हम आपका भजन करते हैं आपसे प्यार करने के लिए आपको पाने के लिए आपके विधान में राजी होने के लिए मेरे अनुकूल भोग मिल जाए तो तुम्हारी जय और मेरे अनुकूल भोग ना मिले तो बोले श्रद्धा नहीं रही ये भक्ति नहीं होती भक्ति का अगर स्वरूप देखना है तो महापुरुषों में देखो कैसी भक्ति पूरे शरीर को भीषण यातना दी जा रही है फिर भी कह रहे तेरा किया मीठा लागे ये है भक्ति का स्वरूप य है भजन का स्वरूप य है भाई हमारी कामना पूर्ति हो गई तो बोले भगवान बहुत बढ़िया कृपालु है
जय हो हमारी बड़ी श्रद्धा है और जब कामना नहीं पूरी हुई और इन महापुरुषों को देखो कि भारी कष्ट दिया जा रहा है यहां तक कि जीवन प्राण समर्पित कर दिए लेकिन आह नहीं निकली और कहा वाहेगुरु का किया मीठा लगता है वाहेगुरु वाहेगुरु जो विधान वाहेगुरु ने रचा वो बहुत मीठा है हमारे इष्ट ने हमारे प्रभु ने हमारे परमेश्वर ने जो हमारे लिए विधान किया हमारे यहां वाणी जी में सबसे पहली पंक्ति है गु जो चतुरा जी है जोई जोई प्यारो करे सोई मोही भावे मेरे प्यारे जो करते हो मुझे बहुत अच्छा लगता है
फिर हम प्रभु के प्रति श्रद्धा करके नाशवान विषय मांगे तो बहुत घाटे का विषय है प्रभु के ऊपर छोड़ दे आप और वो कह रहे हैं अनन्य चिंत तो माम ये जना परिपास तेशाम नित्या युक्ता नाम योगक्षेमं भाम केवल तुम मेरा अनन्य चिंतन करो मैं तुम्हारे योगक्षेम का वाहन करता हूं तो विश्वास करो ना परमात्मा पर विश्वास करो ना योग कहते हैं अप्राप्य की प्राप्ति कराना और क्षेम कहते हैं प्राप्ति की रक्षा करना वो जिम्मेवारी लेते हैं चार दिन का जीवन है जैसे गुजारे से गुजर जाए पर भगवान का सुमिर करते हुए तो भगवत प्राप्ति
हो जाएगी जन्म-जन्म की बिगरी बन जाएगी नहीं ये भटकना नहीं बंद होगा ये भिखमंगा पन कभी नहीं बंद होगा आज यह भोग कल वो भोग मांगते मांगते मर गए अनंत जन्म फिर भी हमारी मांग नहीं पूरी हुई तो हमें लगता है मालिक के भरोसे हो जाना चाहिए कि तुम्हारी जो इच्छा हो उस करो हम तुम्हारा डट के भजन करेंगे और तुम छुड़वाना भी चाहो तो मैं तुम्हें नहीं छोडूंगा तुम हमसे प्यार करो ना करो हम तुमसे प्यार करते हैं तुम हमारी तरफ देखो ना देखो हम सिर्फ तुम्हारी तरफ देखेंगे यह प्यार का विषय यह भक्ति
का विषय है कि आप हमारा तिरस्कार करो आप हमें मत देखो आप हमें ना प्यार करो तो भी मैं आपकी तरफ देखूंगा आपसे प्यार करूंगा आपको नहीं छोड़ सकता ऐसा भक्त माया पर विजय प्राप्त कर लेता है नहीं तो कभी-कभी ऐसी जीवन में परिस्थितियां आती कि भजन करने वाले को इतना पीड़ा इतना कष्ट ऐसी परिस्थिति आपको देखने को मिलेगी पाप करने वाला बड़ा कार में चल रहा है उन्नति में है और एक सही ढंग से चल रहा है तो उसके ऊपर इतनी विपत्तियां है तो आपको फिर परिणाम में संशय हो जाएगा क्या भक्त को ऐसा
कष्ट मिलता है पापियों को तो देखो जुकाम भी नहीं हो रहा और भक्तों को ऐसा कष्ट तो यह ब्रह्म मत पढ़ना भक्तों का आखिरी हिसाब किताब हो रहा है अब वो अपने मालिक के पास जाके रहेंगे यह बार-बार जन्में मरेंगे ये बार-बार दुख भोग उनका आखिरी हिसाब है इसलिए हमें लगता है चाहत करो तो भगवान की प्राप्ति की चाह करो अगर चाही करनी तो भगवान से कह दो मेरी चाह मिटा दो चाह मिट जाए इससे बड़ा कोई महापुरुष नहीं कोई चाह नहीं कोई चिंता नहीं चाह मिटी चिंता मिटी मनुवा बेपरवाह जिनको कछु न चाहिए वह
सहन के साह जाही न चाही कब कछु तुम सन सहज सने बसो निरंतर तासर सो राउर निज ग परमात्मा उसी के हृदय में प्रकाशित हो जाता है जहां कोई लौकिक चाह नहीं रह जाती अजु जी हरिवंश श्री हरिवंश महाराज जी महाराज जी जैसे आप श्री बताते हैं कि प्रणव का उच्चारण अपने मुख से नहीं करना चाहिए जब तक गुरु से ना मिला हो महाराज जी मैं जिन लोगों से को जपने या बोलते देखती हूं तो उन्हें मैं मना करती हूं कि गुरुदेव से मिला होना चाहिए इसके बदले आप श्याम सदाशिव जप कर सकते हैं तुम्हार
जी मैं इस सलाह देने से कोई अपराध तो नहीं कर नहीं बहुत अच्छा है उचित सलाह है ऐसा देना चाहिए क्योंकि जो मंत्र है वो गुरु प्रदत ही होने चाहिए तभी लाभ मिलता है गुरुमुख की महिमा है गुरुमुख की महिमा अगर गुरु से मिला हुआ मंत्र आदि नहीं है तो वह प्रकाशित नहीं होगा प्रकाश उसका फल यही होगा कि गुरुदेव मिलेंगे पर जो वैदिक मंत्र हैं वह गुरुदेव से मिलने पर ही जपना चाहिए नाम सबको ही जप सकता है और नाम का फल होगा गुरुदेव का मिलना और हो सकता है वही नाम गुरुदेव जब दे
दे तो उसका चमत्कार प्रकट हो जाएगा गुरु मुख से लिया हुआ नाम बहुत जल्दी सिद्धावत प्रदान करता है इसलिए गुरु की बहुत महिमा मंत्र मूलम गुरु वाक्यम गुरुदेव के श्री मुख से निकला हुआ शब्द साक्षात ब्रह्म रूप है विपिन अग्रवाल जी सदगुरु भगवान आपके चरणों में कोटि नमन गुरुदेव गीता प्रेस से प्रकाशित एक पुस्तिका में पढ़ा था कि प्रभु मिलन की विरह की पीड़ा के सारे अशुभ और मिलन के सुख में सारे शुभ संस्कार नष्ट हो जाते हैं सारे शुभ और अशुभ संस्कार नष्ट होने पर ही कर्मज शून्य होकर प्रभु की प्राप्ति संभव है महाराज
जी इस पर आपका अनुभव जानना चाह रहे थे देखो एक सिद्धांत होता है शास्त्री एक होता कृपा समझ रहे हम सब कृपा मार्ग के पथिक हैं यहां का जो क्रम है कृपा का क्रम तो एक अध्याय सेवक वाणी में अकृत प्रकरण एक अ कृपा के सूत्रों का वर्णन है और एक कृपा के सूत्रों का वर्णन है कृपा के सूत्रों के वर्णन में प्रारंभ होता है मुख बर्नत हरिवंश चित्त नाम हरिवंश रति मन सुमिरन हरिवंश यह जो कृपा हरिवंश की सब जीवन सो प्रीति रीति निवाह आपनी श्रवण कथन प्रतीति य जो कृपा हरिवंश की शत्रु मित्र
सम जानि मानि मान अपमान सम दुख सुख लाभ न यह जो कृपा हरिवंश की नित एक धर्मन संग रंग बढ़त नित नित सरस नित नित प्रेम अभंग यह जो कृपा हरिवंश की निरख नित्य बिहार पुलकित तन रो मावली आनंद नैन सुधार ये जो कृपा हरिवंश देखो इसमें कहीं है ये हरिवंश कृपा से मुख में नाम चित में रति श्रवण कथन में प्रतीत सब जीवों में भगवत भाव रसियो का संग अभंग प्रेम शत्रु मित्र समसम मान अपमान समसम लाभ हान में सम दुख सुख में शम अब क्या हुआ बोले हरिवंश कृपा से निरख नित्य बिहार कृपा
से सब परिवर्तित होता चला जा रहा है बहुत ध्यान से अपनी वाणि हों को पढ़ोगे तो आपको समझ में आएगा कटे कर्म बंधन संसारी सुख सागर पूरित अति भारी यहां कहीं भी साधक नहीं विधि निषेध श्रंखला छुड़ाए निज आल बन आन बसावे आल बन ब सत्संग पारस के आयस कनक समान भयम मांगो मन मन स दास अपनी करी पूर काम सदा हृदयम देखो पारस मणि का चमत्कार है ये लोहा सोना बन गया आलय बन ब सत संग पारस के आयस समान भयम रसिक गुरुदेव की कृपा वृंदावन की कृपा आचार्य की कृपा हुई य सब नष्ट
हो गया शुभ शुभ शरण निरापद पद रमित सकल अशुभ शुभ नंस और देत सहज निश्चल भगति सु जय जय श्री हरिवंश शरणागत प्रतिपाल आचार्य देव सब शुभ अशुभ दुर्ग विध्वंस बल तब जयति जयति यहां साधक नहीं य आचार्य कृपा से यहां कृपा से हो रहा है सब क्षण में हो जाता है हमें इसीलिए कहा ये लिफ्ट का मार्ग है प्रथम में ऑन हुई बैठ गए अब कितने क्रॉस कर गए पता ही नहीं चला जब खुली तो बोले 32 वा सवा 18वां 20वां फ्लोर जिस फ्लोर में तो यहां बैठ गए शरणागत होकर और जब लिफ्ट खुली
तो बोले कहां बोले निरख नित्य विहार पुलकित कितने फ्लोर साधना के पार हो गए पता ही नहीं चला ये कृपा का मार्ग है गोद में बैठा हुआ साधक पहुंचता है क क्योंकि बच्चा है ना वो सीढ़ी नहीं चढ़ सकता तो कहीं-कहीं शास्त्री सिद्धांत वर्णन है जो सीढ़ी है तो वहीं साइड से सीढ़ी जहां होती है वहीं साइड में लिफ्ट होती खोज लो तो लिफ्ट में अगर चलने वाला है तो ना तो सीढ़ी की थकान होगी और ना हर फ्लोर का परिचय होगा हर फ्लोर का परिचय किसको होता है सीढ़ी से चढ़ने वाले कौन सा बो
अभी तो प्रथम अब द्वितीय अब तृतीय लेकिन लिफ्ट वाले को अगर नंबर देखे तो परिचय मिलेगा नहीं तो वो सा चल रही है पता भी नहीं चलता हल्का सा झटका लगता है जहां खुलना होता है तब पता अच्छा आ गए क्या उस फ्लोर पे ये लिफ्ट है इसमें साधक को आहम भी नहीं होता कि मैं इतनी ऊंचाई पर चढ़ गया हूं प्रेम मार्ग में अहम भी नहीं होता और उसमें पता चलता है कि मैं चढ़ कर के इतने फ्लोर आया हूं तो जब तक वह पता रहेगा तब तक वो रस में नहीं डूब पाएगा उसका
वो भी स्मृति गायब होनी चाहिए कि मैं इतना च चढ के आ इसलिए आखिरी में तो कृपा में ही उसे आना पड़ेगा या गुण साधन ते नहीं हुई तुम्हारी कृपा पाव को तो आचार्य शरण में रहो वाणी का गायन करो नाम जप करते रहो इसी में सब हो जाता है इतनी करुणा उनकी उत्पन्न होती है आचार्य चरण की जब सेवक शरण सदा रहे अनत नहीं विश्राम क बानी हरिवंश की और कई हरिवंश है नाम हमें दो से मतलब है लीला गायन कर रहे हैं या नाम जब सेवा कर रहे हैं आगे का काम यहां सब
आचार्य संभालते हैं क्या मिटाना है क्या सजाना है क्या संवारना है कहां पहुंचाना है हमको चिंता लेकर ली समझ पाए हां और स्पष्ट वर्णन है कि शरण निरापद पद रमित सकल अशुभ शुभ नंस कौन आचार्य हमारे नष्ट कर रहे हैं आचार्य नष्ट कर रहे हैं हमारे शुभ शुभ का देत सहज निश्चल भगति सहज शब्द है देत सहज निश्चल भगत सु जय जय श्री हरिवंश हरिवंश चंद्र ज की जय जयकार हो जो शुभ अशुभ का नाश करके हमें परम प्रेममय प्रियालाल की प्रेममय भक्ति प्रदान कर दे जी अनुराग जी देहरादून श हरिवंश महाराज जी महाराज श्री
ध्रुव दस जी वाण जी में कहते हैं कि वृंदावन सत लीला में पहले दवदास जी कहते हैं कि वृंदावन में जो कबहु भजन कछु नहीं होए रसतो उड़ लागे तन पीवे यमुना तो पह पहले इसमें पहले देखो पहली निष्ठा को मानो जब हम पहले क्लास में जाने की कोशिश करते हैं तो जो हमारा टीचर होता है वह हमें दुलार करता है और जब हम एक ऐसे जीरो लगा के ऐसे लाइन भी खींच दे वाह वाह बढ़िया लिख लेता है लेकिन कुछ समय बाद अगर उतना ही करते रहो तो फि थप्पड़ आएगा भी फिर आगे आपको
बढ़ाने के लिए तो पहला है कि तुम आओ वृंदावन वृंदावन में जो कव कछु भजन नहीं होए रज तो उड़ लागे तने पीवे यमुना तो तुम आओ तो इसी तुम्हारा कल्याण हो जाएगा अब जब आए कुछ दिन रुके तो बोले वृंदावन बस के इतनो बड़ो सयान और जुगल चरण के भजन बिन निमिस अब ये क्लास लग गई जब से आए हो तो वही गोली डंडा खींच रहे हो नंबर आगे बढ़ाओ जुगल चरण के भजन बिल निमिस न दी जय जान वृंदावन बस के इतनो बड़ो सयान वृंदावन वास करने वाले की यही चतुर है कि पलक
झपक के भी समय को श्यामा श्याम को मत भूलो तो आरंभ और विश्राम यह दोनों समझने होंगे समझ रहे ना बच्चा कोई प्रश्न इस परे जी अजय शर्मा जी बटाला आदरणीय गुरुदेव भगवान आपके चरणों में कोटि कोटि प्रणाम गुरुदेव भगवान मेरा प्रश्न है कि भगवान ने जब मैया यशोदा को अपने मुख से में ब्रह्मांड के दर्शन करवाए तब उन्होंने उन्हें विशेष नेत्र दिए जिससे मैया यशोदा ने प्रभु के मुख मंडल का पूरे ब्रह्मांड का दर्शन कर पाए जब अर्जुन जी ने अपने सगे संबंधियों को नहीं मारने के लिए अपने शस्त्र फेंक दिए त भगवान ने
उन्हें अपना विराट स्वरूप दिखाया और नेत्र दिए महाराज जी इन नेत्रों से जब आपका तेज नहीं झेल पाते तो राधा नाम जपने से जब 100 सूर्य के भी तेज प्रताप वाली हमारी राधा रानी हमारे समक्ष आ जाए तो क्या उनको हम दर्शन कर पाएंगे नाम उतनी सामर्थ्य प्रदान कर देता है यह नाम उतनी सामर्थ्य प्रदान जैसे हम हर बार जप रहे हैं ना राधा राधा राधा तो हमारे अंदर सामर्थ्य बढ़ती चली जा रही जब हम श्री जी के दर्शन करने की सामर्थ्य प्राप्त करते तब श्री जी देते य नाम गुरुदेव आचार्य इष्ट यह सामर्थ्य प्रदान
करते हैं उनकी कृपा से क्या नहीं हो सकता नरसिंह भगवान को देखकर सब डर रहे थे ना पर प्रहलाद जी दौड़ के गए ना प्रहलाद जी को डर नहीं लगा क्यों क्योंकि प्रल्हाद जी जानते हैं मेरे प्रीतम ही नरसिंह के रूप में आए हैं बिल्कुल नहीं डरे तो ऐसे ही श्री जी का जो अनंत महिमा में रूप है तो महिमा में अनंत नाम भी तो है ना सुमर पवन सुत पा नाम अपने बस करि राखे रामू ऐसे परम स्वतंत्र भगवान को अपने अधीन कर लिया नाम जप करके हनुमान जी ने तो हम राधा नाम जप
करके राधा किशोरी के दर्शन की सामर्थ्य प्राप्त करेंगे हम राधा नाम जप करके राधा किशोरी के श्री अंग की सेवा का अधिकार प्राप्त कर सकते हैं हम राधा नाम जप करके किशोरी जी को अपने अधीन कर सकते हैं ना भाई नाम बड़ा है नामी से जैसे स्वामी और सेवक इतना अंतर है नाम और नामी में यद भेद है फिर भी अंतर है कैसे जहां नाम होगा वहीं नामी पधारे और जो नाम जप नहीं कर रहे तो नामी समीप होने पर भी नहीं दिखाई दे रहा यही है हृदय में बैठा हुआ है तो नाम हमको सामर्थ्य
प्रदान करता है नाम भगवान की अमोक सामर्थ्य है पक्का समझो जैसे जैसे नाम जप करोगे आप में दिव्य दृष्टि आ जाएगी आप में सब सामर्थ्य आ जाएगी कभी मांगना नहीं पड़ा है अच्छा यह ऐसा नहीं होता कि लो मैं तुम्हें दिव्य दृष्टि देता हूं नहीं व अपने आप जागृत हो जाती है वैसी सामर्थ्य जागृत हो जाती है वह अपने आप हो जाती है व नाम जप करते रहो आप जब उनको तो हमारी सामर्थ्य इतना भी प्रेम झेलने की नहीं है और वो प्रेम समुद्र है आपको सच्ची कहते हैं कभी कभी जब उनकी कृपा होती तो
लगता अगर आचार्य और गुरु जी की कृपा ना हो तो हृदय फट जाए महाराज जी यही तो मैं मेरा प्रश्न यही था कि आपका तेज जेलना हमारे लिए संभव संभव नहीं है तो फिर सूर्य के समान उनका तेज कैसे जैसे आप हमारे सामने बैठे हो लेकिन आप कह रहे हो लेकिन आप देख तो रहे हो ना ऐसे ही देखा जाता है ऐसे दे यद्यपि असंभव है पर नाम जापक के लिए असंभव नहीं हमारी स्री जीी है ना हमारी श्रीज है बात हमारी समझना ये यह हमको दर्शन कराता है हमारी हमारे माई श्यामा जू को राज
यह हमारी सामर्थ्य होती है तो अपनापन से जैसे भड़े पिता जो है राष्ट्र पति है लेकिन मेरा पिता है तो अब दूसरों को डर लगेगा लेकिन अपने तो जाकर उनकी गोद में बैठ सकते हैं ना मेरा पिता है ना है नहीं तो ऐसे ही मेरी श्री जी है ना आप जिनकी बात कर रहे हो मेरी श्री जी है अब बस खत्म ख मेरी श्री जीला तो फिर मेरे को सामर्थ्य भी उतनी मिलेगी उतनी सामर्थ्य मिलेगी तो हम हमें वही पावर देती है वही हमें दृष्टि देती है हम उनको देख पाते हैं हम उनको सय पाते
हैं नहीं तो स मानिए प्रभु का प्रेम उदय होते ही हृदय ऐसे जैसे जीरो वाट में 11000 वाट की बिजली छोड़ दे ना चिथड़ा उड़ जाए ऐसे हृदय फट जाए सांसारिक प्रेम को तो झेल नहीं पाता सांसारिक दुख सुख को तो झेल नहीं पाता अब सोचो इतना आनंद समुद्र जिस आनंद समुद्र के एक बिंदु के एक अंश से सीकर जो आनंद सिंधु सुख राशि और सीकर त त्रिलोक सुपा सीकर कहते जैसे एक बिंदु ऐसे बूंद लिया और उसको चट में मारा तो उसमें जो कण निकले उसे सीकर कहते हैं एक सीकर से अनंत ब्रह्मांड को
सुख प्राप्त हो रहा है एक बूंद के एक शीखर से अनंत ब्रह्मांड को सुख प्राप्त हो रहा है वो सुख समुद्र भगवान जब हमें मिलेगा तो हालत क्या होगी यही भजन यही गुरु कृपा से सामर्थ्य आती है जब वो आनंद समुद्र गले लगाएगा तो हालत क्या होगी एक शीखर सुख में तो देख लो पूरा ब्रह्मांड फंसा हुआ है और वो आनंद समुद्र जब सामने हो फिर हालत क्या हो यह गुरु कृपा यह गुरु मंत्र यह नाम जप यह बल प्रदान करता है तो अब उस आनंद में देखते हुए भी ना मूर्छित होता है ना प्राण
निकलते हैं तभी तो सेवा में जाता है श्री चरणों की सेवा कर रहा है दास तभी तो व सामर्थ्य आती है उसके अंदर क् आंखों में आंख मिलाकर अंजन लगा रहा है नहीं जब श्रृंगार करते अपने इष्ट का तो सब श्रृंगार करने का सौभाग्य मिलता है दर्शन की तो बात जा दे दो सब सेवा का सौभाग्य प्राप्त होता है रसिंक यह नाम मंत्र में बहुत दम है बहुत सामर्थ्य है नाम मंत्र कभी निष्फल नहीं होता अपार सामर्थ्य और देखो हम कहीं ना कहीं भूले हैं जब हम देह भाव में है तो हम मनुष्य हैं लेकिन
स्वरूप भाव में देखो तो हम परमात्मा के अंश हैं नहीं या फिर मानते नहीं हम हां इसीलिए इसीलिए भ्रमित हो चुके हैं और अब अध्यात्म सुन सुन कर के तो पता चल ही जाएगा फिर धीरे-धीरे धीरे-धीरे मानने लगेंगे देखो सुना जाता है सुनते सुनते जब बहुत बार सुना जाता है तब मन में आ जाता है नहीं बहुत मान रहे हैं हजारों लोग गलत आचरण छोड़ रहे हैं गलत नशा छोड़ रहे हैं धीरे-धीरे उनको समझ तो आ ही रही है कि यार यह गलत है यह सही है तो धीरे-धीरे यह भी समझ जाएंगे कि शरीर छूटेगा
यार शरीर तो मैं नहीं हूं मैं तो अविनाशी हूं जो मैं जागृत में वही मैं स्वप्न में वही मैं सुसुप्त में तो यह अवस्थाएं तो शरीर के लेकिन मैं दृष्ट हू अगर इतना ज्ञान धीरे-धीरे बढ़ जाए तो जीवन मुक्तता की तरफ हम चल दे तो आप आनंदित रहिए नाम में बड़ी सामर्थ्य है वो सब सामर्थ्य दे देंगे काजल जी राधे राधे महाराज जी महाराज जी आपके चरणों में कोटि कोटी प्रणाम महाराज जी मेरी जिंदगी में एक ही परेशानी है शरीर के संबंधी की बातें सुनकर मेरे मन में जलन पैदा होती है जिस कारण मैं राधा
नाम की जगह उस इंसान के बारे में सोचकर अपना समय व्यर्थ कर देते हूं कृपया महाराज जी मेरा मार्गदर्शन करें कि मैं उस समय देखो हृदय को आनंदित रखने के लिए राग और द्वेष अगर अध्यात्म की जगह में आकर यहां प्रश्न किया तो आध्यात्मिक उत्तर मिलता है राग और द्वेष यह दो ही बहुत बड़े बंधन है व्यक्ति वस्तु स्थान की अनुकूलता में राग और प्रतिकूलता में द्वेष होता है चाहे वस्तु हो चाहे व्यक्ति हो चाहे स्थान हो पदार्थ हो जो हमारे अनुकूल होता है उसमें राग हो जाता है और जो प्रतिकूल होता है द्वेष होता
है और राग द्वेष में फंसने वाला आवागमन चक्र में ही फंसा रहता है हमें चाहिए कि जिनके प्रति हमारा द्वेष होता है उनमें हम भगवत बुद्धि करें भगवत बुद्धि के बिना इस द्वेष को मिटाया नहीं जा सकता जो हमारे प्रति प्रतिकूल व्यवहार करे उसके प्रति भी हम यदि अनुकूल व्यवहार करते हुए भगवत भाव रखें तो हमारा हृदय भगवान की प्राप्ति के योग्य हो जाता है आनंद की प्राप्ति के योग्य हो जाता है नहीं तो फिर चिंतन तो उसी का होता है राग और द्वेष का ऐसा नहीं कि केवल प्रतिकूल ही चिंतन होता है अनुकूलता का
चिंतन होता है राग का चिंतन होता है प्रतिकूलता का चिंतन होता है द्वेष का चिंतन होता है लाभ का हानि का मान का अपमान का दुख का सुख का यही तो द्वंद है और जो द्वंद में फंसा हुआ है वह अगला द्वंद है जन्म और मरण बार-बार जन्म बार-बार मरण अगर जन्म मरण रूपी द्वंद से मुक्त होना चाहते हो तो राग और द्वेष का त्याग करो किसी में भी राग नहीं भगवान के स्वरूप किसी में भी द्वेष नहीं आजाद शत्रु वही कहलाता है जो भगवान का भक्त होता है जो भगवान का भक्त होता है अजात
शत्रु अजात शत्र जिसका दुश्मन कोई पैदा ही नहीं हुआ सब में अपने प्रभु को देखना उमा संत क ही बड़ाई मंद करत जो करे भलाई संत हृदय वही है जो बुरा करने वाले पर भी मंगल भावना करे ऐसे हम जलते रहेंगे चिंतन करके द्वेषा क्मक तो भजन की तो बात जाने दो और नकारात्मक सोचे आना और ऐसे नकारात्मक सोच आएंगी कि भगवान से भी श्रद्धा होने लगेगी इसलिए सावधान हो जाए जो हमारा बुरा सोचता है तो उसका बुरा अपने आप हो जाता है उमा क्षमा श्राप ते भारी अपने कर्म जाय अपकारी हमको उसका मंगल मनाना
है जिससे हमारा मंगल हो जाएगा हमको उसमें भगवत भाव करना है जिससे हमारा हृदय शीतल हो जाएगा प्रसन्न हो जाएगा और सच्ची मानिए सब में भगवान है इसमें कोई अंतर नहीं तो हम भगवत भाव करें अगर भगवत भाव से चिंतन करने लगे ये आदमी ऐसा अरे इसमें भी प्रभु है ये ऐसा तो इसमें भी प्रभु है क्योंकि ज्यादातर संबंधी ही होते हैं आसपास और उन्हीं के प्रतिकूल आचरण होते हैं उनमें अगर हम भगवत भाव कर ले तो जगत में तो भगवत भाव कर ही लेंगे अगर अपने संबंधियों में भगवत भाव नहीं कर पाए तो हमें
लगता है चाहे मंदिर जाओ और चाहे वृंदावन आओ वो लाभ तो नहीं मिलेगा जो आपको सब में भगवान देखने पर लाभ मिलेगा क्योंकि राग द्वेष ना रहा तो यहां भी आपको दोष दर्शन होगा वृंदावन में भी सब जगह निर्दोष स्थिति थोड़ी तुम देख पाओगे कहीं ना कहीं दोष दर्शन करोगे फिर और अपराध बन जाएगा और शांत हो जाओगे तो नाम जप करो सम में भगवत भावना करो जब चिंतन हमारा द्वेष आत्मक होने लगे तो सोचो हे भगवान करुणा करो मुझे सामर्थ्य दो आप इस शरीर धारी के अंदर हो बस मुझे यही दिखा दो यही भावना
पुष्ट कर दो ये बाहरी क्रियाएं देखना अज्ञान है का तत्व को देखना ही ज्ञान कारण सबके श्री प्रभु हैं श्री गोविंद है श्री हरि हैं उसी हरि को देखो तोय गलत चिंतन जो होकर के द्वेष भाव बनता है इसका नाश हो जाएगा अन्यथा यह हमें परेशान कर देगा पूरा जीवन अशांत हो ग पक्का समझिए जो दूसरों की गलतियों को ध्यान में लाकर के जलता रहता है तो पूरा संसार ऐसा है कि हमें प्रतिकूलता ही मिलती चली जाएगी हम कब तक जलेंगे थोड़ा हमें विवेक धारण करना है अपने को जलन से बचाना है है क्योंकि हमारा
जीवन आनंद के लिए मिला है और यह आनंद है क्या हम देख देख के जल रहे हैं सोच सोच के जल अरे तेरे भावे जो करे भलो भुरो संसार नारायण तू बैठ के अपनो भवन बुहार अपने हृदय को आनंदित करने के लिए सब में भगवत भाव करो अध्यात्म से तो यही उत्तर है और व्यवहार में है कि भाई जिनसे नहीं पटती अलग हो जाओ चिंतन करके जलने की जरूरत क्या है पर अध्यात्म अलग होने की बात नहीं अध्यात्म कहता है कि विचार से अलग हो जाओ जो आपके अंदर वो अशुद्ध द्वेषा क्मक विचार उसको त्याग
दो आनंदित हो जाओगे कोई परेशानी कबीर दास जी तो कहते हैं निंदक नियरे राखिए आंगन कुटी छवाय बिना साबुन बिना पानी निर्मल करे स्व भाए जो हमको निंदा करते हैं जो हमसे द्वेष करते हैं व हमको और उन्नति में पहुंचाते हैं पर ये समझ में नहीं आता है अज्ञान होने का इसलिए हम खुद द्वेश करने लगते हैं और उनकी निंदा करने लगते हैं तो ऊंचाई की जगह हम निनी चाई में पहुंच जाते हमारा हृदय जलने लगता है साधु निंदक मित्र हमारा जो हमारी निंदा करता है हमारे सारे पापों को नष्ट कर देता है तो हमारी
बुराई करने वाला हमसे द्वेष करने वाला हमारी निंदा करने वाला हमारा बड़ा हितकारी है और हितकारी के प्रति जलन क्य होती है अज्ञान के कारण वास्तविक सिद्धांत को समझो आध्यात्म के तो कहीं दुख स्पर्श नहीं कर सकता जी दीपक जी हरियाणा से श्री श्री हरिवंश महाराज जी आपके चरणों में कोटि कोटि नन जी मेरा प्रश्न है कि आपके सत्संग और कृपा से ये ज्ञान और अनुभूति हुई कि जीवन की सार्थकता भगवत प्राप्ति में ही है क्या परिवार के सदस्यों को परमार्थ मार्ग में लगाने प्रेरित करने के लिए क्या उनको अपने अनुभव सांझा करना चाहिए हां
यदि वो सात्विक और आस्तिक है तो अपनी बात करनी ही अगर वो नकारात्मक सोच वाले हैं हमारी बात का उपहास कर देंगे ठुकरा देंगे तो अभी इतने परिपक्व नहीं हो कि तुम्हारी भक्ति को ठुकरा दिया जाए तुम्हारी भक्ति बढ़े फ तुम्हारी भक्ति भी संशय में हो जाएगी तुम्हारी भक्ति भी संकट में पड़ जाएगी इसलिए आरत अधिकारी जब पावे तो गुढ तत्व साधु दुरावे बड़े-बड़े सिद्ध भी जब आर्त और अधिकार देखते हैं तब गुढ़ बात बताते नहीं तो मतलब की बात बता दी जितनी योग्य है उतनी बात बता दी तो ऐसे ही देखना चाहिए कि यह
भगवान से कितनी प्रियता रखते हैं हमारा लौकिक संबंध माता-पिता भाई बंधु परिवार लेकिन हमारा जो आंतरिक प्यार है हम उसका साझा तभी करेंगे जब उसका अधिकार आपके अंदर होगा अगर नहीं है तो फिर जाके प्रियन राम बैदेही गोस्वामी तुलसीदास जी कह रहे तजय ताहि कोटि बैरी समम जद परम सनेह तज पिता प्रहलाद विभीषण बंधु भरत मतारी गुरु बलि तज कंत ब्रज बनि तन भे मुद मंगलकारी अगर कहीं पूरा परिवार भक्त है तब तो खूब बैठकर भगवान की चर्चा करें भगवान का नाम गुणगान करें और अगर ऐसा लगता है कि हमारे भाव से विरुद्ध है तो
अपने भाव को गुप्त रखकर उनके कर्तव्य का पालन करें माता-पिता परिवार उनका सेवा करें और अपने भाव को गुप्त रखे अपनी भक्ति को प्रकाशित ना करें नहीं तो बाधा खड़ी हो जाएगी वो उपहास करेंगे वह बार-बार विरोध करेंगे तो अपने मन में जो भक्ति का उल्लास व क्षीण हो सकता है क्योंकि इतनी परिपक्व भक्ति विरले किसी में होती है कि विपरीत और विपत्ति और दुख में भक्ति का नया रंग चढ़े उत्साह चढ़े ये तो किसी बरले अनुकूलता सुख सम्मान में तो चढ़ सकता है लेकिन प्रतिकूलता दुख अपमान में भक्ति का रंग क्षीण होने लगता है
कमजोर भक्त में अगर परिपक्व भक्त है तो जैसे जैसे जैसे वीर योद्धा को जहां भी विपरीत मिलती शत्रु पक्ष जोर का होता है तो उसको और बलवर्धक उसके अंदर तेज आता भाव आता है और रोश आता है और कायर पुरुष उसी समय डरपोक हो जाता है डर जाता है तो जिसकी भक्ति लघु है वो फिर भाग पड़ेगा और जिसकी भक्ति जोरदार जैसे प्रहलाद जी पाच वर्ष के इतनी जोर की भक्ति कि हिरण कश्यप सब कुछ करके हार गया और फिर भी उनकी भक्ति में कोई फर्क नहीं उनका बाल बांका भी नहीं तो पहले अपने को
मजबूत कर लेना चाहिए तब उपदेश में चलना चाहिए भगवान के मार्ग का उपदेश देने का वही अधिकारी है जो स्वयं में उस रस का स्वाद लिए है आजकल सबसे बड़ी बात कमी यही हो रही है ना शास्त्रों का ज्ञान है ना सम्यक ज्ञान है जो मनया सो बोले जो मनया सो उपदेश कर रहे हैं स्वयं में व स्थिति नहीं स्वयं में उसका स्वाद लिया नहीं कभी गुरु चरणों में बैठकर सुना नहीं यह जैसे सद ग्रंथ है ना ये पहले सुने जाते हैं गुरु महान महान पुरुषों में जो शब्द ब्रह्म के ज्ञानी और परब्रह्म के अनुभूत
दोनों अत उनके पास फिर उसके मुख से कभी अशुद्ध शब्द नहीं निकल सकता यह परिणाम जो आता है विपरीत उपदेश का रंग ना चढ़ना उपदेश में प्रतिशोध की भावनाए पैदा हो जाना प्रतिकार उसका हो ने लगना उसका कारण है वह गुरु चरणों में बैठ कर के सुना नहीं उसने आराधना नहीं की उसने केवल व्यापार बना लिया सत शास्त्रों का तो हमें चाहिए कि हमें पहले खुद मजबूत होना है खुद जो हमने शास्त्रों में सुना जो हमें ज्ञान है उसका हम प्रयोग करें हम काम क्रोध लोभ मोह मत पर विजय प्राप्त करें हमारे अंदर रुपए का
लोभ है हमारे अंदर संसार के प्रियता का लोभ है तो यह अगर भावनाएं हैं तो आप अभी भगवान से कहां जुड़े हो अरे सब पूरा संसार विरुद्ध में हो जाए यदि धर्म और सत्य से है कोई किसी का भय नहीं किसी की अब तुम कभी मत आओ तुम्हें निमंत्रण दिया है क्या तुम्हें फोन किया कभी मत आओ मेरा भरण पोषण विश्व अंबर भगवान से होता है धर्म से चलेंगे धर्म से बोलेंगे अगर एक सुनने वाला है तो एक काफी है एक करोड़ की जरूरत नहीं अगर एक धर्म से चल जाए और एक सुनने के लिए
बैठ जाए और वो धर्म का पालन करने वाला हो एक ही काफी है वो एक ही पूरे भारत को हिला देगा अगर अपने धर्म से चला जाए तो तो क्या होता है हम लोगों में स्वयं तो ज्ञान आता नहीं स्वयं भक्ति आती नहीं स्वयं आचरण शुद्ध नहीं और हम चल देते हैं दूसरों को उपदेश देने तो हमारी भक्ति में ही धोखा हो जाता है हम खुद विक्षिप्त हो जाते हैं भगवान का यश गाने वाला भगवान का भरोसा नहीं रख रहा दूसरों को भरोसा दिलाने वाला खुद उसको भगवान का भरोसा नहीं है वैराग्य का उपदेश करने
वाला खुद वैरागी नहीं है रुपए का रागी है भोगों का त्याग सिखाने वाला खुद भोगी है है यह क्या चरित्र है ये क्या है उपहास का क्षेत्र है कि नहीं तो हमें लगता है पहले जो हमने संतों से सुना है शास्त्रों में पढ़ा है पहले अपने पर उसको अनुभव मिलाए और फिर यदि हम समाज में उतरे तो मंगल हो जाएगा चाहे घर हो चाहे पड़ोस हो चाहे देश हो चाहे विदेश हो पहले अपने को मजबूत करना चाहिए यहां होता क्या चार बातें सुन ले दूसर को साझा करने लगे सुनाने लगे अब उसकी अनुभव तो है
नहीं अनुभूति है नहीं तो जैसे हमने कुछ खाया अगर पचाया नहीं तो हमारा बल नहीं बढ़े और उल्टी कर दिया तो और बेकार हो गया तो ऐसे ही हमने संतों से सुना या शास्त्रों से पढ़ा उल्टी कर दिया ना पचाया और ना अनुभव किया तो दूसरे पर रंग नहीं लाएगा आप हमारी बात समझ पा रहे हो इसलिए पहले सबको चाहिए जो सुनो उसे अपने आचरण में उतारो तब फिर मुंह खोलो तो दूसरे के हृदय की ग्रंथि का तुम भेदन कर दोगे और अगर स्वयं में नहीं मुक्त हुए स्वयं में भजन नहीं स्वयं में कुछ अनुभव
नहीं तो इधर उधर की बस बातें होती हैं और उन में कोई लाभ नहीं होता कोई लाभ नहीं होता है किसी को भी लाभ नहीं होता है आध्यात्मिक लाभ तो हो ही नहीं सकता है जो स्वयं में अध्यात्मिक लाभ नहीं लिए हैं वो दूसरों का अध्यात्म लाभ दे ही नहीं सकता है आप ऐसे समझो हम कई बार बताया जैसे भोजन बनाने की प्रक्रिया आप ढ़ लो लेकिन आप कभी बनाए ना हो आप उसी को उपदेश कर दो तो आपका चेहरा बताएगा कि तो आपने स्वाद नहीं लिया है अगर आपने बना के पाया फिर आप उपदेश
करोगे तो आपका चेहरा बताएगा कि ये स्वाद युक्त बोल रहा है ऐसे ही भगवता अंद पढ़ लिया ग्रंथों से और दूसरों को छाप मार के उपदेश दे दिया तो चेहरा बताता है उसके शब्द बताते हैं किय ऊपर ऊपर निकल रहे हैं ये डूबे हुए नहीं है ये अनुभूत शब्द नहीं है तो उपासक को चाहिए कि पहले जो सुना उसका साक्षात्कार करो फिर दूसरे को उपदेश दो तो अपने में देखें क्या भक्ति ऐसे रंग में आ गई कि मेरा पूरा विश्व अगर विरोध करे तो भी मेरी भक्ति पर फर्क ना पड़े मैं आपको उपदेश करूं आपका
मंगल चाहूं आप अपमान करें फिर भी मैं आपका मंगल चाहूं ऐसी क्या भक्ति में रंग आ गया है अगर आ गया है तो उपदेश देने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी आपके दर्शन से आपके स्पर्श से आपके संकल्प से परिवर्तन होना शुरू हो जाएगा क्योंकि आप उसी परिवार में रह रहे हैं उसी घर में रहे पहले अपने को भजना आनंदी बनाओ अपने को निर्विकार बनाओ अपने को भगवान के प्रेम रंग में रंगो यह आध्यात्म उन महापुरुषों का है जिन्होंने नरसीह मेहता जी काच वाच मन निश्चल राखे धन धन जननी तेरी दे जो वाणी का पक्का वही
मन में चल रहा जो वाणी में है और वही आचरण में जो सदई भाषा में कहते हैं लंगोटी का पक्का मन का पक्का वाणी का पक्का वही अध्यात्म को जानता है जो कंचन कामिनी कीर्ति इन पर विजय प्राप्त करता व अध्यात्म को जानता है और जो जानता है वही जना पाता है बिना अनुभव के इसीलिए तो कहते वाणी निकलते ही पता चल जाता है कि ये केवल केवल ये बौद्धिक स्तर और बौद्धिक स्तर भी इतना प्रविण नहीं है कि कम से कम क्या बोल रहे लाखों लोग सुन रहे हैं और सब तालिया बजा रहे हैं
आजकल पता नहीं कौन सा ये रिवाज चल गया है कि जहां सत्संग हुआ मतलब तुम्हारे सत्संग का मजाक उड़ाया जा रहा है नहीं उड़ाया जा रहा है अगर सत्संग है तो गंभीर हो जाया जाता है सत्संग सुनने के बाद एकाग्रता उदासीनता बढ़ती है ये ताली बजाने की क्या जरूरत है सत्संग में भगवत महापुरुषों के बीच में जब चर्चा ये ताली कैसे बजा कोई नेता का भाषण हो रहा है नेताक भाषण में बजाओ अब वो साधु बोल रहा है अपना अनुभव आप तालिया बजा रहे हो मतलब क्या मतलब तालिया नहीं बजाओ उदास हो जाओ कि ये
जो कह रहे हो मेरे जीवन में नहीं कब आएगा मैं अपनी कामनाओं को कब समेट पाऊंगा मैं अपनी गलतियों को कब उसमें ताली बजाने का विषय आता है तो इसलिए उपदेश देना दूसरों को भक्त बनाने की चेष्टा करना तब करें जब पहले स्वयं पहले स्वयं खा ले तब दूसरों को चखा की कोशिश करें ये ऐसा मार्ग है सांसारिक भोजन दूसरों को पवा के पावे लेकिन अध्यात्म में पहले खुद अनुभव कर ले तब दूसरों को पवाले की चेष्टा करें शुभम शर्मा जी लुध्याना से राधा वल्लभ श्री महाराज जी श्री हरिवंश महाराज जी आपके चरणों में कोटि
कोटि प्रणाम महाराज जी आपने कहा था कि जब दिल और दिमाग सही निर्णय ना ले पाए उस समय आध्यात्मिक गुरु की शरण लेनी चाहिए महाराज जी मुझे खुद कोई समस्या नहीं है आप क्योंकि आपसे जाना कि हमारा पूर्व कर्म होता है जिसके कारण हम बार-बार असफलता मिलती है उसको मिटाने के लिए केवल हरि भजन ही आसरा है परंतु महाराज जी मेरी असफलता से मेरे पारिवारिक जन दुखी हैं मुझसे अब ठीक से बात भी नहीं करते क्योंकि मैं बार-बार असफल होता हूं मुझे समझ नहीं आ रहा कि एक तरफ भगवान इतनी कृपा कर रहे हैं संत
समागम दिए हर एक महीने धाम आ रहा हूं और एक तरफ बार-बार सफलता ये कैसा विधान है कैसी लीला इनको मैं खुशी रहूं कि हर महीने धाम आ रहा हूं या दुखी हो कि बार-बार असफल हो रहा हूं असफलता और सफलता दोनों में सम लाना आध्यात्म के साधक का लक्षण है सुख दुख के समय कृत्वा लाभा लाभो जया जयो अगर अध्यात्म का बल लेना है तो यह बात समझनी पड़ेगी कोई न कोई कर्म हमारे हमको असफलता प्रदान कर रहे हैं और परिवार के जन हमारे पर स्वार्थ प्रेम करते हैं उनका आध्यात्मिक प्रेम नहीं है पढ़
लिख कर के लड़का उन्नति शल हो तो हमारी सुविधाएं जो चाहिए वो मिलेंगे और पढ़े लिखकर फेल हो रहा है तो पैसा हमारा ऊपर से खर्चा हो रहा है और सुविधा का तो कोई जुगाड़ है नहीं इसीलिए सब विपरीत हो जाते हैं मतलब संसार में बच्चा असलियत में कोई प्यार नहीं करता अपने स्वार्थ के लिए ही प्यार करता है अगर हमारा स्वार्थ पूर्ण ना हो तो फिर वह प्यार नहीं करेगा जैसे कोई कितना भी पति से प्यार करते हो और पति असमर्थ हो जाए फिर उसका प्यार बना रहे तब तो पतिव्रता तब तो प्यार उसका
बंदनी लेकिन ऐसा नहीं देखा जाता पत्नी कितनी भी सुंदर सुशील हो अपने अनुकूल अपने सुख की बात अगर वह बीमार हो गई असमर्थ हो गई लकवा मार गया फिर पति प्यार करे वैसे नहीं करेगा ऐसे कितने उदाहरण है हर संबंध में जब तक हमारा स्वार्थ किसी से पूर्ण होता है तब तक व हमारा प्यारा और जब वो स्वार्थ लायक नहीं रहता तो फिर कोई प्यार नहीं करता इसीलिए हमें लगता है माता-पिता में भगवत बुद्धि करके उनकी सेवा करो परिवार तुमसे नफरत करे तो कोई बात नहीं और प्रयास रत रहो 100 बार हारने पर भी एक
बार ऐसा चांस आएगा कि आप जीत जाओगे ऐसा नहीं कि प्रारब्ध हर बार असफल करता रहेगा महाराज जी पिताजी ने गुरु करे उदेश दिया उन्होने तो वो जो है जब उपदेश लिया था तो उन्होंने शराब पी थी मैं मैंने आपको सुना था जब पहले मैं उनको शराब दिलवा था चलो पी लो आप मैंने आपको सुना कि गलत है तो मैंने बंद कर छोटा भाई शराब पिलाता हूं बोतल आके देता है करवाता है मैं वो करता नहीं हूं और आज जितने मेरे भाई बहन सब सेटल हो गए मैं आज भी ही पे खड़ा हूं मैं बढ़
ही नहीं पा रहा हूं मैं ऐसा कोई कार्य करता भी नहीं हूं कुछ भी मैंने आज तक कभी को नशा नहीं करा कुछ भी नहीं करा एक ब शुरुआत की थी पिताजी को देखकर क्योंकि उन्होंने गुरु वर्ण करा हुआ है तो उनका हम पे इंपैक्ट पड़ेगा आपको सुन के मैंने शराब छोड़ दिया मैंने कुछ भी नहीं मैंने शुरू भी नहीं की थी शुरुआत होते ही मैंने अंत कर दिया आपको सुनके वो अभी भी पीते हैं माता जी को मैं यहां पे लेके आया था स सुनाया का कोई सुन भी नहीं पा रहा आपको प्रॉप और
मैं उ बताता देखो महाराज जी क्या कह रहे हैं वो नहीं सुन पा रहे तो महाराज जी मैं क्या करूं मैं कोशिश कर रहा हूं वो दुखी हो रहे हैं मुझसे देख धर्म मत छोड़ना बच्चा ये असफलता और सफलता चार दिन की है निरंतर असफलता रहे ऐसा असंभव ऐसा नहीं हो सकता बच्चा अगर रात्रि होती तो दिन होता है इंतजार करो दिन है तो तुरंत रात्रि नहीं हो जाएगी इंतजार करो 24 घंटे के अंतराय में ये रात दिन दोनों आते हैं ऐसे जीवन के अंतराय में कभी दुख आता है असफलता आती है तो एक दिन
सफलता भी आती है आप इंतजार करो उबो मत आप धर्म विहीन आचरण मत करो धर्म विहीन आचरण करने वालों की निंदा मत करो यह भी बात ध्यान रखो अपने में श्रेष्ठता का भाव आता है तब दूसरों में निंदा का भाव आता है हमें निंदा नहीं करनी हां हमें उनका सहयोग भी नहीं करना गलत वो कहे कि मांस खवा हो मदिरा पिलाओ नहीं करना है हां करने दो कोई बात नहीं उनको अगर जरूरत पड़े तो शुद्ध भोजन वस्त्र आदि उनकी चरण सेवा उनके वस्त्र प्रक्षालन करना यह कभी बंद मत करना अगर अवसर मिले तो ये करते
रहना पर अब जैसे अशुद्ध य तो अधर्मा आचरण में सहयोग ना करें पापा आचरण में सहयोग ना करें और धर्म से चलो बच्चा धर्म से चलने वाला थोड़े दिन दुख भोगता है इसके बाद महान सुख को प्राप्त होता है इसलिए धैर्यवान रहना देखो स्वयं धर्मराज युधिष्ठिर महाराज को 12 वर्ष का वनवास और एक वर्ष का अज्ञात लेकिन अंतिम में सिंहासन पर महाराज युधिष्ठिर ही बैठे धर्म थोड़ा कष्टप्रद लगता है लेकिन विजय धर्म होता है अधर्म थोड़ा सुखद लगता है यद तज विषम परिणाम अमृतो पम जो धर्म है वह प्रारंभ में विष जैसा लगता है परिणाम
में अमृत जैसा और जो अधर्म है त अमृत पम परिणाम विषम शराब पीना विचार करनाय अमृत जैसा लगता है लेकिन इनका परिणाम बड़ा भयंकर होता है धर्म में प्रारंभ जैसा लगता है बड़ा कठिन है लेकिन उसका परिणाम बड़ा अमृतम होता है तो तुम जो बता रहे हो कि जैसे मार्ग में चल रहे हो तो ये अमृत का मार्ग है बच्चा ना मृत्यु मा अमृतम गमे डरो मत झुको मत टूटो मत कल आएगा ऐसा हमारे वचन याद कर लो कल ऐसा आएगा कि आप खुद अपने अनुभव उपदेश में दोगे आप दुखी मत हो ऐसे सबके जीवन
में होता है नहीं अब हम अपने जीवन की गाथा बताने लगे तो आपको आपका जीवन क्या है अरे आपको तो कोई बोलने वाला है ना हमारे पास तो कोई पानी देने वाला नहीं था बोलने वाला नहीं था एक रुपया नहीं था मांगे तो भोजन मिले वह भी मिल जाए तो मिल जाए नहीं तो ना मिल जाओ किडनी फेल सोचो उसा और पूरा जीवन बचपन से भगवान के मार्ग में यह तो भगवान कृपा की बताया नहीं हर समय सब दिन होतना एक समान तो दिन पलटा तब देखो यह स्वरूप आ गया जब हम खाने लायक थे
तो भोजन नहीं था और जब भोजन की व्यवस्था तो खाने लायक नहीं पूरा जीवन दुख में गया है पूरा जीवन दुख में अभी क्या तुम सुख समझते हो क्या नहीं बच्चा सुख चैन से तो भर पेट पानी नहीं पी सकते पानी किडनी पेशेंट है पानी भी नहीं पी सकते और हर कष्ट हर कष्ट बड़े शरीर के हर कष्ट रहते हैं अब इसको रोना थोड़ी है इसको सहना है सहन करके आ गया अगर हम ऐसे टूट जाए तो हमारी 12 एक बजे रात्रि से दिनचर्या चलती है और ये 9:30 प बजे तक चलेगी अब आप सोचो
रबड़ी रस गुल्ला खाक थोड़ी हम बोल रहे हैं नहीं बच्चा पानी भी है इतना मिलता है पानी तो धर्म में चला जाए कष्ट सा जाए मानव जीवन संघर्ष के लिए मिला है टूटने के लिए नहीं मिला कि यार धर्म में तो कुछ नहीं तुम फिर उसे मान लो उसी गलत मार्ग में चले जाओ तो ऐसा नहीं डटे रहो आगे एक दिन आएगा ऐसा आएगा इंतजार करो सबका दिन आता है सबका समय आता है अपने कर्मों का ऐसा चक्र आता है कि एक दिन बड़ा आदमी बना और अपराध पाप किए तो फिर फुटपाथ में आ गया
जब फिर धर्म से चला तो फिर ऐसे चलता रहता है एक क्रम अगर क्रम तोड़ना है तो भगवान का भजन करके भगवत प्राप्ति करना तो य आवागमन का विक्रम टूट जाएगा दुख सुख का तो सच्चाई की बात बच्चा य है और टहला फुसला में तो संसार बहुत प्रवीण है अब भरत कह रहे हैं वशिष्ठ जी से कि ऐसा कैसे हो गया तो वशिष्ठ जी कह सुनो भरत भावी प्रबल बलख कयो मुनि नाथ हानि लाभ जीवन मरण जस अपने कर्मों का फल भोगना पड़ता है इसलिए तैयार रहो मजबूत रहो ये हमारी की हुई खेती है इसे
हम ही को काटना पड़ेगा राधा राधा राधा करके नई फसल अच्छी तैयार कर लो और निकल जाओ संसार समुद्र से बलवान बनो धैर्यवान बनो टूटो मत जिसने गरीबी का कष्ट सहा संकट सहे वही आगे जाकर के उन्नति को प्राप्त होता है आप देख लो मतलब चरित्रों को देखो आप न नीचे से उठा और चमकने लगा जाकर के तो जो अहंकार में उठा वह नष्ट हो गया यह सब क्रम सृष्टि का चलता र तुम धैर्य से चलना और आगे फिर देखना आपको वचन देता हूं आपके समक्ष ग हा बहुत अच्छे तो फिर आप हमारे भी वचन
याद कर लो इ परलोक सकल सुख पावत इसी लोक में नहीं इ परलोक सकल सुख पा मेरी सु भैया कृष्ण गुण संत हमारी शपथ है यदि कृष्ण का गुणगान करोगे तो इस लोक और परलोक में सदैव सुखी रहोगे पक्की बात बच्चा हर कष्ट सह करके धर्म में चला जाता है ऐसे धर्मात्मा बनकर चलो यह मत सोचो कि हम थोड़ा भजन कर रहे तो भगवान हमारे कष्टों को क्यों नहीं हरण कर रहे जड़ से कष्टों का नाश हो जाएगा जड़ से हां आज जो हमारी अंदर की तुम्हें भावना बता रहे हैं बचपन से भगवान के मार्ग
में रहे तो आज ने का भय खत्म हो गया है आज हमें कोई दुख नहीं लग रहा है भारी दुख होने पर भी दुख नहीं लग रहा आनंद ही आनंद हर समय बना रहता है और जब मरने की बात आती है ना तो और आनंद होता है किय दलित दूर शरीर छूटेगा और श्री जी से मिल जाएंगे जाके भजन कभी निष्फल नहीं होता भजन एक बार राधा कहा यह तुम्हारे उस समय काम आएगा जहां कोई काम नहीं आएगा विश्वास कर लो हमारी बात को कभी निष्फल मत हो सदैव दूसरों का हित करो दूसरों का मंगल
करो भगवान का नाम जप करो और स्वयं कष्ट सह जाओ तो महान बन जाओगे महान बन जाओगे हमारी बात को समझ लीजिए विक्की जी राधे राधे राधे राधे महाराज जी आपके चरणों में कोटि कोटि प्रणाम महाराज जी इस शरीर की पत्नी का ट्यूमर के कारण तीन बार ऑपरेशन हो चुका है इसलिए मन में बार-बार एक प्रश्न आता है कि अगर सब कुछ प्रारब्ध के हिसाब से होना है तो डॉक्टर के पास ही क्यों जाए क्योंकि उससे हमें और दुख होगा ना हमारा पैसा खर्चा होगा दवाइयां लेंगे बार-बार परेशानियां भोग तो उसमें भी प्रारब्ध तो छय
हो रहा है तुम नहीं जाने की बात सोचोगे तुम्हें जबरदस्ती जाना पड़ेगा जाना ही पड़ेगा क्योंकि तुम्हारा पैसा खर्चा होने का भी तो दुख होना है तुम्हारी दवाइयां लगने का भी तो दुख होना है बार-बार यह करवाओ एमआरआई करवाओ अल्ट्रासाउंड करवाओ सीटी स्कैन करवाओ इतना रुपया इतना डॉक्टर की फीस यह दुख कहां से भोग होगे तो भोगना तो दुख है ना और अगर कहीं उसका सौभाग्य आता है कि इतने प्रारब्ध से सब मिट गया और ठीक होने का आता है तो सुख का आगे के आ जाएगा और नहीं आता है तो बार-बार उसको भोगना पड़ेगा
अवश्य में भोग तव्य कृतम कर्म सुवासम भोगना पड़ेगा अगर आप कह दो कि मैं नहीं जाऊंगा तो जबरदस्ती प्रारब्ध तुम्हें ले जाएगा क्योंकि पैसा भी तो खर्चा होना है तुम्हें बार-बार भटकना भी तो है डॉक्टरों के पास तुम्हें इंतजार भी तो करना है तुम्हें दवाइयों को खवाना है इसके बाद लाभ नहीं मिलना है फिर दुख भोगना है क्योंकि हमारा प्रारब्ध इसीलिए हम कहते हैं होश में कर्म करो अब लोग तो समझते नहीं है बकरा भून के खा रहे हो मछरी खा रहे हो नाना प्रकार के जीवों को कष्ट दे रहे हो अब मनुष्य शरीर मिला
है तो हिसाब किताब तो तुम्हारा होगा अब पूर्व जन्म का हिसाब भोगना ही पड़ेगा 101 साल मुकदमा चल जाते केवल 10 10 साल और इसके बाद सजा होती है सजा से ज्यादा मुकदमा में वो भोग चुका है जेल बंद हो कर के आप यहीं के कानून को देखो तो बड़ा कानून है हमारे भगवान का बड़ा हिसाब किताब है कोई भी बिना प्रारब्ध के दंड नहीं भोग सकता है अब जैसे हम जा रहे हैं अब सामने वाला जरा सा धक्का लग गया हमें गाली देने लगा मारने लगा तो हमें लगता है कि व हम हमारे साथ
अन्या सच्ची समझो यह घटना हमारे प्रारब्ध ने घटाई और भोगना पड़ेगा अब जो हम इच्छा करके नए पाप करते हैं वो बंद कर दे और प्रारब्ध को हम नाम जप करते हुए सह ले तो आगे की फसल बहुत बढ़िया होगी मान लो तो कल्याण हो जाएगा क्यों भाई आप इसमें समझो पैसा खर्चा होता है ना आपका टकना होता है ना बार-बार जाना इसमें दुख नहीं होता तो वो प्रारब्ध छय हो रहा है कि नहीं प्रारब्ध ही तो है उसका हां प्रारब्ध का भीष्म जी छ महीना बानो की सया प रला भोगना पड़ेगा इसलिए धैर्य रखो
धैर्यवान बनो भगवान पर श्रद्धा रखो हम से बहुत बड़े-बड़े पाप हो चुके हैं गलतियां हो चुकी उनके सुधार करने के लिए मानव जन्म मिला है अगर आप कह दो कि अरे तो सब तो फिर भोगो फिर भोगो खेती तुम्हें दे दी गई है बोना तुम्हें क्या बोते हो तुम्हारे ऊपर छूट है यह कर्मभूमि में तुम्हें मानव जन्म दे दिया गया तो अगर श्रद्धा करोगे तो यह जन्म तुम्हारा जैसा दुख सुख का गया लेकिन आगे बढ़िया बन जाएगा आगे बना लो बहुत बहुत मतलब आप इसमें संभलने की जरूरत है इसमें समझने की जरूरत है हम आप
आज स्त्री पुरुष बने हैं लेकिन कल हम लोगों ने बहुत पाप किए हैं तो उनका दंड बचपन से लेकर अभी तक देखो हमको भोगना पड़ रहा है इसलिए बहुत सावधान होकर के कर्म करना चाहिए इसलिए हमें लगता है कि भोग जो हमारे प्रारब्ध के हैं वह आएंगे वह दौड़ आएंगे वह परेशान करेंगे बहुत परेशानी होती है बहुत परेशान यहां नहीं ठीक हो गए वहां जाओ उस अस्पताल जाओ व अब वहां गए तो जितने कागजात है वो सब रिजेक्ट अब उनके अलग है अब वहां जांच करवाओ कितने पैसा जांच में लगते हैं आदमी बर्बाद हो रहा
है दवाई से ज्यादा आदमी बर्बाद हो रहा जांच में नहीं जा अब पहले था नाड़ी पकड़ी या ऐसे दवाई अब तो जरा भी कहीं कुछ है तो जाओ एमआरआई करवाओ सिटी स्कैन करवाओ अल्ट्रासाउंड करवाओ और इतने प्रकार की खून की जांच करवाओ कि गरीब आदमी तो जांचे भर में परेशान हो जाए दवा तक तो पहुंचे नहीं डॉक्टर की फीस और जांच अब ये सब प्रारब्ध भोग है और आज कोई शरीर विरला स्वस्थ हो नहीं हाई ब्लड प्रेशर लो ब्लड प्रेशर शुगर ये वो परेशानियां देखो शरीर क्योंकि आज का अन्न शुद्ध प्रकृति अशुद्ध होती चली जा
रही है वृक्षों का नाश हो रहा है प्रकृति अशुद्ध होती चली जा रही है इतना खाद डाली जाती है इतने केमिकल डाले जाते हैं कीड़ा रक्षा के लिए कि वह सब उसी पौधे पर जाते हैं पौधे प जो फल लगते हैं जो अन्न लगता है वो जो हम पाते हैं वो हमारे शरीर का कहीं ना कहीं रास कहीं ना कहीं पतन करने वाला स्वास्थ्य का नाश करने वाला होता है और आजकल तो अब तो विश्वास नहीं कि दूध है कि नहीं केमिकल का बना है कि जानवर से पता नहीं विश्वास ले ये घी है कि
नहीं विश्वास ले है बड़ा मतलब आज देखो ऐसा समय आ रहा है कि विश्वास खत्म होता जा रहा है जब दाल को पानी में धो तो हरापन छूटता है बताओ उसको भी सुरक्षित नहीं छोड़ रहे हैं कि दाल आदि अन्न आदि उनको भी केमिकल मिला रहे हैं उनमें अब वो केमिकल जो खरीदेगा तो बहुत बहुत पानी से धो लेगा तो उसमें जो प्रभाव पड़ा वो शरीर के लिए आता है हाई ब्लड प्रेशर लो ब्लड प्रेशर दिल की बीमारी कई तरह की परेशानियां बड़ा ये कल काल बड़ा भयावह है नाम जप करके भगवान की प्राप्ति कर
लो और जो दुख सुख आए उसे सहलो हमारी तो यही प्रार्थना है और अगर भगवान पर श्रद्धा करोगे तो तुम्हारी हानि हो जाएगी उस महान में तो कोई फर्क पड़ने वाला है नहीं उसको कोई फर्क नहीं पड़ व तुम्हारे हृदय में भी बैठा हुआ निरपेक्ष बैठा हुआ है वह देख रहा है
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Shri Hit Radha Kripa
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निराशा , उदासी और विपत्ति क्यों और उससे कैसे बचे ? // 27/04/23
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Shri Hit Radha Kripa
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#802 Ekantik Vartalaap & Darshan/ 27-01-2025/ Shri Hit Premanand Govind Sharan Ji Maharaj
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Bhajan Marg
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Sunny Mornings: Beautiful Relaxing Music with Piano, Guitar & Bird Sounds by Peder B. Helland
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Soothing Relaxation
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लोगों के बारे में सोचना बंद करो || 28 फरवरी 2025 सत्संग || प्रेमानंद जी महाराज || एक बार ज़रूर सुने
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Bhakti Marg
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धन सम्पत्ति कर्म से मिलता है या भाग्य से || shree premanand ji maharaj
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SHREE RAAMA
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जानिये नाम जप से क्या-क्या सामर्थ्य आती है ? // Shri Premanand Govind Sharan Ji Maharaj // 05/02/24
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Shri Hit Radha Kripa
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#103 / एकांतिक वार्तालाप। 25 नवंबर 2024। नाम जप से क्या होता है? जवाब सुनो। Shri Hit Radha Kripa
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Brajwasi Satsang Marg
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जो होना था हो गया, आज से नाम जप शुरू करो ! जीत जाओगे ? Shri Hit Premanand Govind Sharan Ji Maharaj
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Sadhan Path
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Music therapy 🌿Soothes the nervous system and refreshes the soul, relaxing #2
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Beautiful Destinations
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रामदास चर्मकार जी की रोमांचक यात्रा, मत चूकिए!
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Hit Divine
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