अगर मैं आपसे कहूं कि आप आलसी नहीं हैं बल्कि आपका अपना दिमाग आपको हर दिन धोखा दे रहा है तो क्या आप यकीन करेंगे? सोचिए कितनी बार आपने खुद से कहा कल से शुरू करूंगा लेकिन वह कल कभी आया ही नहीं। क्या यह सिर्फ विल पावर की कमी है या इसके पीछे आपके ब्रेन की कोई ऐसी प्रोग्रामिंग छिपी है जिसके बारे में आपको कभी बताया ही नहीं गया। अगले कुछ मिनटों में आप जानेंगे कि आपका दिमाग आसान रास्ता क्यों चुनता है। मोटिवेशन बार-बार क्यों गायब हो जाता है। प्रोक्रेस्टिनेशन आपकी जिंदगी पर कैसे राज करता है
और सबसे जरूरी बिना मोटिवेशन के भी एक्शन लेने वाले लोग ऐसा क्या जानते हैं जो बाकी दुनिया नहीं जानती। इस वीडियो के अंत तक शायद आप अपनी सबसे बड़ी कमजोरी नहीं बल्कि अपनी सबसे बड़ी ताकत पहचान चुके होंगे। चैप्टर वन आर यू रियली लेजी? रात के 11:48 थे। पूरे शहर में सन्नाटा था। बाहर हल्की बारिश हो रही थी। कमरे की खिड़की पर गिरती बूंदों की आवाज के अलावा वहां कुछ भी नहीं था। लेकिन उस छोटे से कमरे में बैठा विवान पूरी तरह जाग रहा था। उसके सामने खुला हुआ लैपटॉप, बिखरी हुई किताबें, आधा भरा कॉफी
मग और दीवार पर चिपका एक कागज जिस पर बड़े अक्षरों में लिखा था टुमारो चेंजेस एवरीथिंग। कल उसकी जिंदगी का सबसे बड़ा दिन था। 2 साल पहले उसने अपनी आरामदायक नौकरी छोड़ दी थी। लोगों ने उसे पागल कहा। रिश्तेदारों ने मजाक उड़ाया। दोस्तों ने कहा सपने देखकर कोई अमीर नहीं बनता लेकिन उसने हार नहीं मानी। 2 साल तक उसने दिन रात मेहनत की। अपनी बचत लगा दी। नींद छोड़ दी। छुट्टियां छोड़ दी। सिर्फ इसलिए क्योंकि उसे यकीन था कि एक दिन सब बदल जाएगा और वह दिन कल था। सुबह उसे देश की सबसे बड़ी कंपनी
के सामने अपना बिजनेस आईडिया प्रेजेंट करना था। अगर प्रेजेंटेशन सफल हो जाती तो उसकी पूरी जिंदगी बदल सकती थी। उसने लैपटॉप खोला। प्रेजेंटेशन की आखिरी बार प्रैक्टिस करनी थी। लेकिन तभी मोबाइल स्क्रीन चमकी। एक नोटिफिकेशन। [संगीत] उसने सोचा बस एक मिनट देख लेता हूं। एक वीडियो [संगीत] फिर दूसरा फिर तीसरा कुछ फनी क्लिप्स, कुछ मोटिवेशनल रील्स, [संगीत] फिर न्यूज़, फिर कमेंट्स। उसे समय का एहसास ही नहीं हुआ। जब उसने घड़ी देखी रात के 2:37 बज चुके थे। उसने घबराकर लैपटॉप बंद किया और खुद से कहा कोई बात नहीं सुबह जल्दी उठकर प्रैक्टिस कर लूंगा। उसने
अलार्म लगाया और सो गया। सुबह अलार्म बजा। [संगीत] उसने आंखें खोली। शरीर भारी लग रहा था। दिमाग ने धीरे से कहा। बस 5 मिनट और। उसने अलार्म बंद कर दिया और फिर नींद खुली। सुबह 9:41 पर। प्रेजेंटेशन शुरू हुए 40 मिनट हो चुके थे। उसने घबराकर लैपटॉप खोला। फोन पर लगातार मिस्ड कॉल्स थी। एक मेल आया था। वी वेटेड फॉर यू। अनफॉर्चूनेटली वी हैड टू मूव फॉरवर्ड विदाउट योर प्रेजेंटेशन। बस इतना ही। कोई गुस्सा [संगीत] नहीं, कोई बहाना नहीं, कोई दूसरा मौका नहीं। सिर्फ एक मेल जिसने 2 साल की मेहनत को 1 मिनट में खत्म
कर दिया। उस शाम विवान अपने खाली कमरे में बैठा था। बाहर बारिश अब भी हो रही थी। लेकिन इस बार उसके अंदर कुछ टूट चुका था। उसने धीरे से आईने में देखा और पहली बार अपने बारे में एक फैसला सुनाया। मैं आलसी हूं। मैं कभी सक्सेसफुल नहीं बन सकता। शायद मैं ऐसे ही जीने के लिए बना हूं। अगर आपने भी कभी खुद से ऐसा कहा है तो एक पल के लिए रुक जाइए। क्योंकि हो सकता है आपने भी अपने बारे में वही सबसे बड़ा झूठ मान लिया हो जो दुनिया के करोड़ों लोग हर दिन मान
लेते हैं। अब जरा सोचिए अगर विवान सच में आलसी था तो उसने 2 साल तक लगातार मेहनत कैसे की? अगर उसके अंदर मेहनत करने की क्षमता नहीं थी तो उसने इतने बड़े सपने देखने की हिम्मत कहां से लाई? अगर वह निकम्मा [संगीत] था तो उसने अपनी सुरक्षित नौकरी छोड़ने का जोखिम क्यों उठाया? सवाल यह नहीं है कि वह आलसी था। सवाल यह है कि सबसे जरूरी पल पर उसका अपना दिमाग उसके खिलाफ क्यों खड़ा हो गया? यहीं से सब कुछ बदलना शुरू होता है। हम बचपन से एक बात सुनते आए हैं। जो काम नहीं करता
वह आलसी है। लेकिन यह अधूरा सच है। असलियत इससे कहीं ज्यादा गहरी है। मानव मस्तिष्क का पहला उद्देश्य आपको सफल बनाना नहीं है। उसका पहला उद्देश्य है आपकी ऊर्जा बचाना। हजारों साल पहले जब इंसान जंगलों में रहता था तब हर कदम की कीमत होती थी। भोजन आसानी से नहीं मिलता था। हर दिन जीवित रहना एक चुनौती था। इसलिए हमारे दिमाग ने एक नियम बना लिया। जहां कम मेहनत लगे वही रास्ता चुनो। उस समय यही नियम जीवन बचाता था। लेकिन आज दुनिया बदल चुकी है। अब जंगल नहीं है, शेर नहीं है। लेकिन हमारा ब्रेन अब भी
उसी पुराने सॉफ्टवेयर पर चल रहा है। जब भी आप किसी कठिन काम की शुरुआत करना चाहते हैं, जैसे एक्सरसाइज करना, नई स्किल सीखना, बिजनेस शुरू करना या किसी बड़े गोल पर काम करना। आपका ब्रेन तुरंत खतरे का संकेत भेजता है। वह कहता है अभी नहीं। कल कर लेंगे। पहले थोड़ा आराम और उसी समय Instagram खोलना आसान लगता है। YouTube देखना आसान लगता है। बिस्तर पर लेटना आसान लगता है। ऐसा नहीं है कि आपके अंदर इच्छाशक्ति नहीं है। असल में आपका ब्रेन सिर्फ वही कर रहा है [संगीत] जिसके लिए उसे लाखों साल पहले तैयार किया गया
था। यही कारण है कि आलस्य कोई कैरेक्टर की कमजोरी नहीं है। ज्यादातर मामलों में यह एक मानसिक पैटर्न है। एक ऐसी प्रोग्रामिंग जो आपको कंफर्ट की तरफ धकेलती रहती है। भले ही उसकी कीमत आपके सपने क्यों ना हो, लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। सबसे खतरनाक चीज आलस्य नहीं है। सबसे खतरनाक चीज वह पहचान है जो आप खुद को दे देते हैं। जिस दिन आप कहते हैं मैं आलसी हूं। उसी दिन आपका ब्रेन उस बात को सच मानना शुरू कर देता है। फिर आपका हर फैसला उसी पहचान के हिसाब से होने लगता है। आप कोशिश
करना छोड़ देते हैं क्योंकि आपको लगता है वैसे भी मैं बदल नहीं सकता और यही विश्वास धीरे-धीरे आपकी सबसे बड़ी जेल बन जाता है। याद रखिए कोई भी बच्चा जन्म से आलसी नहीं होता। आलस्य सीखा जाता है, आदतें सीखी [संगीत] जाती हैं। डर सीखा जाता है और जो सीखा जा सकता है, उसे बदला भी जा सकता है। लेकिन उसके लिए सबसे पहले आपको अपने दुश्मन का असली चेहरा पहचानना होगा। क्योंकि हो [संगीत] सकता है जिसे आप आज तक आलस्य समझते रहे वह सिर्फ आपके दिमाग का एक पुराना सर्वाइवल प्रोग्राम हो और जिस दिन आपने उस
प्रोग्राम को समझ लिया उसी दिन आपकी जिंदगी की सबसे बड़ी लड़ाई जीतना शुरू हो जाएगी क्योंकि समस्या यह नहीं कि आप एक्शन नहीं लेते समस्या यह है कि आपका अपना दिमाग आपको एक्शन लेने ही नहीं देता और अब समय आ गया है उस दिमाग को समझने का जिसने अब तक आपकी जिंदगी के हर बड़े बड़े फैसले को चुपचाप नियंत्रित किया है। चैप्टर टू व्हाई योर ब्रेन ऑलवेज चूसेस द इजी वे। सुबह के 5:00 बजे अलार्म बजा। इस बार विवान ने तुरंत आंखें खोल दी। उसने खुद से वादा किया था कि आज से सब बदल जाएगा।
उसने मोबाइल को हाथ भी नहीं लगाया। चेहरे पर पानी डाला। रनिंग शूज पहने और दरवाजा खोलकर बाहर निकलने ही वाला था। लेकिन तभी उसके दिमाग ने बहुत धीमी आवाज में कहा, "आज मत [संगीत] जाओ। शरीर अभी पूरी तरह रिकवर नहीं हुआ है। कल से पक्का शुरू करेंगे। यह आवाज इतनी शांत थी कि उसे बहाना भी नहीं कहा जा सकता था। यह बिल्कुल तर्क जैसी लग रही थी। विवान कुछ सेकंड तक दरवाजे पर खड़ा रहा। फिर उसने शूज उतारे। सोफा पर बैठ गया और सोचा हां शायद आज आराम करना ही बेहतर होगा। उसने टीवी चालू किया।
फिर मोबाइल उठाया और देखते ही [संगीत] देखते पूरा दिन निकल गया। रात को जब वह बिस्तर पर लेटा तो उसे सबसे ज्यादा दर्द इस बात [संगीत] का नहीं था कि उसने एक्सरसाइज नहीं की। दर्द इस बात का था कि सुबह उसका इरादा बिल्कुल साफ था। फिर भी वह खुद से हार गया। क्या आपके साथ भी ऐसा हुआ है? आप पूरे कॉन्फिडेंस के साथ कहते हैं, कल से जिम शुरू करूंगा। लेकिन अगली सुबह आपका ही दिमाग आपको समझाने लगता है कि आज मौसम ठीक नहीं है। नींद पूरी नहीं हुई, मूड सही नहीं है। अभी सही टाइम
नहीं है। धीरे-धीरे आपको लगने लगता है कि आपकी विल पावर बहुत कमजोर है। लेकिन सच इससे बिल्कुल अलग है। आपका ब्रेन आपके खिलाफ नहीं है। वह सिर्फ वही कर रहा है जिसके लिए उसे बनाया गया था। कल्पना कीजिए कि आपके अंदर एक ऐसा सिक्योरिटी गार्ड बैठा है जिसका सिर्फ एक ही काम है आपकी एनर्जी बचाना। उसे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप करोड़पति बनना चाहते हैं, फिट होना चाहते हैं या अपनी ड्रीम लाइफ बनाना चाहते हैं। उसे सिर्फ इतना पता है कि जितनी कम एनर्जी खर्च होगी, उतना सुरक्षित महसूस होगा। यही कारण
है कि जब आप किसी कठिन काम की शुरुआत करने वाले होते हैं। [संगीत] आपका ब्रेन तुरंत आपको आसान विकल्प दिखाता है। पढ़ाई करनी है। पहले थोड़ा मोबाइल देख लो। बिजनेस प्लान बनाना है। पहले रूम साफ कर लेते हैं। वर्कआउट करना है। आज रेस्ट डे रख लेते हैं। ध्यान दीजिए। ब्रेन आपको कभी सीधे-सीधे मत करो नहीं कहता। वह सिर्फ इतना कहता है अभी नहीं। और यही दो शब्द लाखों सपनों को अधूरा छोड़ देते हैं। सबसे दिलचस्प बात यह है कि वही ब्रेन [संगीत] जो 5 मिनट पढ़ाई करने में थक जाता है। 3 घंटे तक वेब सीरीज
देखने में बिल्कुल नहीं थकता। ऐसा क्यों? क्योंकि आपका ब्रेन मेहनत और आनंद को अलग-अलग तरह से महसूस करता है। जब आप सोशल मीडिया स्क्रोल करते हैं, गेम खेलते हैं या लगातार छोटे-छोटे वीडियोस देखते हैं, [संगीत] तब आपके ब्रेन को तुरंत एक छोटा रिवॉर्ड मिलता है। इसे महसूस करते ही दिमाग कहता है, वाह, यही करते रहो। लेकिन जब आप कोई कठिन स्किल सीखते हैं, नई लैंग्वेज पढ़ते हैं या अपने गोल पर काम करते हैं, तब रिवॉर्ड तुरंत नहीं मिलता। पहले मेहनत करनी पड़ती है, फिर इंतजार करना पड़ता है और आपका ब्रेन इंतजार करना पसंद नहीं करता।
यही वजह है कि आसान रास्ता हमेशा ज्यादा आकर्षक लगता है। लेकिन यहीं पर एक ऐसा रहस्य छिपा है जो बहुत कम लोग समझ पाते हैं। हर बार जब आप आसान रास्ता चुनते हैं, आपका ब्रेन उस आदत को और मजबूत बना देता है और हर बार जब आप मुश्किल होने के बावजूद सही काम कर देते हैं, आपका ब्रेन एक नई प्रोग्रामिंग बनाना शुरू कर देता है। शुरुआत में यह बहुत असहज लगता है। ऐसा महसूस होता है जैसे आप अपने ही दिमाग के खिलाफ लड़ रहे हैं। और सच भी यही है। यह लड़ाई दुनिया से नहीं [संगीत]
आपके अंदर चल रही दो आवाजों के बीच है। एक आवाज कहती है, आराम करो। दूसरी आवाज कहती है, तुम इससे कहीं ज्यादा कर सकते हो। जिंदगी का हर बड़ा फैसला इन्हीं दो आवाजों के बीच होता है। याद रखिए, आपका भविष्य किसी एक बड़े अवसर से नहीं बदलता। वह उन छोटे-छोटे पलों में बदलता है जब कोई नहीं देख रहा होता और आपका ब्रेन आपको आसान रास्ता चुनने के लिए मना रहा होता है। अगर उन पलों में आपने खुद को जीत लिया तो दुनिया की कोई ताकत आपको लंबे समय तक रोक नहीं सकती। लेकिन अभी एक और
सवाल बाकी है। अगर हमारा ब्रेन हमेशा आसान रास्ता चुनता है तो कुछ लोग वही ब्रेन होने के बावजूद असाधारण डिसिप्लिन कैसे बना लेते हैं? आखिर उनके अंदर ऐसा क्या बदल जाता है? जो उन्हें हर दिन एक्शन लेने के लिए मजबूर करता है। यही रहस्य आगे खुलने वाला है। [संगीत] चैप्टर 3 द ट्रैप ऑफ आई विल स्टार्ट टुमारो। रात के 10:42 थे। विवान अपनी स्टडी टेबल पर बैठा था। सामने एक नई डायरी खुली हुई थी। [संगीत] पहले पन्ने पर उसने बड़े उत्साह से लिखा था। टुमारो माय न्यू लाइफ [संगीत] बिगिंस। उसने पूरे जोश के साथ अगले
दिन का स्ेड्यूल बनाया। सुबह 5:00 बजे [संगीत] उठना, एक्सरसाइज करना, 2 घंटे डीप वर्क, नई स्किल सीखना, मोबाइल सिर्फ 30 मिनट इस्तेमाल करना। सब कुछ बिल्कुल परफेक्ट लग रहा था। डायरी बंद करते समय उसके चेहरे पर मुस्कान थी। उसे लग रहा था कि बस अब जिंदगी बदलने ही वाली है। लेकिन अगला दिन आया। सुबह अलार्म बजा। उसने अलार्म बंद किया। फिर वहीं 5 मिनट, फिर वहीं 10 मिनट। और फिर पूरा [संगीत] स्केेड्यूल धीरे-धीरे बिखर गया। शाम को उसने डायरी दोबारा खोली। उसने पहले पन्ने को कुछ देर तक देखा। फिर बिना कुछ लिखे उसे बंद कर
दिया। उसकी सबसे बड़ी हार यह नहीं थी कि वह जल्दी नहीं उठा। सबसे बड़ी हार यह थी कि उसने एक बार फिर खुद पर भरोसा खो दिया। क्या आपने कभी ऐसा महसूस किया है? आप पूरे कॉन्फिडेंस के साथ कहते हैं कल से सब बदल जाएगा। लेकिन जब वह कल आता है तो आपका दिमाग कहता है आज नहीं अभी सही टाइम नहीं है। सोमवार से शुरू करेंगे। अगले महीने से करेंगे। जब मूड अच्छा होगा तब करेंगे। धीरे-धीरे कल आपकी जिंदगी का सबसे बड़ा धोखा बन जाता है। ध्यान से सोचिए। क्या आपने कभी आज की वजह से
अपना सपना छोड़ा है? नहीं। ज्यादातर लोगों के सपने कल की वजह से खत्म होते हैं क्योंकि कल कभी आता ही नहीं। वह हर सुबह उठते ही फिर से कल बन जाता है। यहीं पर प्रोक्रेस्टिनेशन जन्म लेता है। लोग समझते हैं कि प्रोक्रेस्टिनेशन का मतलब आलस्य है। लेकिन असली कहानी कहीं ज्यादा गहरी है। अक्सर हम काम इसलिए नहीं टालते क्योंकि हम काम नहीं करना चाहते। हम काम इसलिए टालते हैं क्योंकि हम उस काम से जुड़ी भावना से बचना चाहते हैं। [संगीत] अगर कोई प्रेजेंटेशन देनी है तो असल डर प्रेजेंटेशन का नहीं होता। डर होता है कि
कहीं लोग हंस ना दें। अगर बिजनेस शुरू करना है तो डर बिजनेस का नहीं होता। डर होता है कि कहीं असफल होकर सबके सामने शर्मिंदा ना होना पड़े। [संगीत] अगर जिम जाना है तो मुश्किल एक्सरसाइज नहीं लगती। मुश्किल लगता है खुद को आईने में देखना और अपनी सच्चाई स्वीकार करना। यानी हम काम से नहीं भागते। हम उस इमोशन से भागते हैं जो वह काम हमारे अंदर पैदा करता है। यही कारण है कि आपका ब्रेन आपको बार-बार आसान रास्ते की [संगीत] तरफ धकेलता है। वह आपको बचाने की कोशिश करता है। लेकिन उसे यह नहीं पता कि
जिस दर्द से वह आपको बचा रहा है, वही दर्द आपको बेहतर इंसान भी बना सकता है। एक और दिलचस्प बात है। कई लोग सोचते हैं कि वे इसलिए शुरुआत नहीं करते क्योंकि उन्हें मोटिवेशन नहीं मिल रहा। लेकिन सच्चाई यह है मोटिवेशन अक्सर शुरुआत के बाद आता है। पहले नहीं जब आप पहला [संगीत] कदम उठाते हैं, तभी आपका ब्रेन धीरे-धीरे रेजिस्टेंस छोड़ना शुरू करता है। लेकिन पहला कदम यही सबसे कठिन होता है। क्योंकि आपका ब्रेन चाहता है कि आप वहीं रुक जाएं जहां सब कुछ कंफर्टेबल है। याद रखिए हर बार जब आप कहते हैं मैं कल
से शुरू करूंगा। आपका ब्रेन सीखता है कि वादे निभाना जरूरी नहीं है। और जब यह आदत बन जाती है तो सबसे पहले आपका आत्मविश्वास मरता है। दुनिया का कोई भी इंसान आपको उतना नुकसान नहीं पहुंचा सकता जितना बार-बार खुद से किया गया टूटा हुआ वादा पहुंचा देता है। क्योंकि एक समय के बाद आप अपने ही शब्दों पर विश्वास करना बंद कर देते [संगीत] हैं और जिस इंसान को खुद पर भरोसा नहीं रहता उसके लिए कोई भी गोल बहुत बड़ा लगने लगता है। इसलिए अगली बार जब आपका दिमाग कहे कल से शुरू करेंगे तो एक पल
रुक कर खुद से सिर्फ एक सवाल पूछिए। अगर मैं अभी 5 मिनट कर सकता हूं तो मैं इसे कल पर क्यों छोड़ रहा हूं? हो सकता है आपका ब्रेन आपको 100 बहाने दे। लेकिन याद [संगीत] रखिए जिंदगी बदलने के लिए हमेशा बड़े फैसलों की जरूरत नहीं होती। कई बार सिर्फ 5 मिनट का एक्शन 5 साल की दिशा बदल देता है और शायद आपकी नई जिंदगी उस दिन शुरू नहीं होगी जब आपके अंदर मोटिवेशन आएगा। वह उस पल शुरू होगी जब आप पहली बार अपने दिमाग के कल को आज में बदल देंगे। [संगीत] चैप्टर फोर मोटिवेशन
इज अ लसिप्लिन इज फ्रीडम। शाम के 6:30 थे। शहर के एक पुराने पार्क में एक बुजुर्ग आदमी रोज की तरह धीरे-धीरे दौड़ रहा था। उसके बाल सफेद थे। चेहरे पर उम्र की लकीरें साफ दिखाई दे रही थी। लेकिन उसके कदमों में अजीब सा आत्मविश्वास था। उसी पार्क की एक बेंच पर बैठा विवान उसे कई दिनों से देख रहा था। एक दिन उसने हिम्मत करके पूछा। आप हर दिन आते हैं। कभी मन नहीं करता कि आज छोड़ दूं। बुजुर्ग मुस्कुराए। उन्होंने दौड़ना रोका। पानी की बोतल [संगीत] से एक घूंट लिया और बोले, बेटा मन तो आज
भी नहीं था। विवान चौंक गया। फिर भी आप [संगीत] आ गए। उन्होंने हल्की सी हंसी के साथ कहा अगर मैं अपने मन की सुनता तो शायद आज भी बिस्तर में पड़ा होता। कुछ पल की खामोशी के बाद उन्होंने एक ऐसी बात कही जिसने विवान की सोच हमेशा के लिए बदल दी। जिंदगी उन लोगों की नहीं बदलती जिनके पास मोटिवेशन होता है। जिंदगी उनकी बदलती है जो बिना मोटिवेशन के भी उठकर चल पड़ते हैं। विवान चुप हो गया। उसे अचानक एहसास हुआ कि वह अपनी पूरी जिंदगी एक ऐसी चीज का इंतजार करता रहा जो कभी [संगीत]
स्थाई थी ही नहीं। शायद आप भी ऐसा करते होंगे। कभी कोई मोटिवेशनल वीडियो देखकर लगता है कि अब सब बदल जाएगा। उस समय एनर्जी अलग ही होती है। आप गोल्स लिखते हैं, प्लांस बनाते हैं, कैलेंडर भर देते हैं। ऐसा लगता है कि इस बार कोई आपको रोक नहीं सकता। लेकिन अगले ही दिन वही वीडियो का असर खत्म हो जाता है। फिर वही पुरानी आदतें, वही मोबाइल, वही बहाने और फिर आप सोचते हैं मेरे अंदर मोटिवेशन टिकता ही नहीं। लेकिन जरा [संगीत] सोचिए अगर मोटिवेशन ही सफलता की चाबी होती तो दुनिया का हर इंसान जिसने कभी
कोई प्रेरणादायक वीडियो देखा है आज सफल होता। सच यह है कि मोटिवेशन एक भावना है और भावनाएं मौसम की तरह बदलती रहती हैं। कभी बहुत उत्साह होता है। कभी बिल्कुल नहीं। अगर आपका भविष्य आपके मूड पर निर्भर करेगा तो आपका भविष्य भी हर दिन बदलता रहेगा। यहीं पर डिसिप्लिन की असली ताकत शुरू होती है। डिसिप्लिन का मतलब यह नहीं कि आपको हमेशा अच्छा महसूस होगा। डिसिप्लिन का मतलब है जब मन ना करे तब भी सही काम करना। जब शरीर आराम मांगे तब भी एक कदम आगे बढ़ना। जब कोई आपको देख नहीं रहा हो तब भी
अपने वादे निभाना। यही वह जगह है जहां ज्यादातर लोग हार जाते हैं। वे सोचते हैं कि पहले मोटिवेशन आएगा फिर एक्शन होगा। लेकिन सच्चाई बिल्कुल उलटी है। पहले एक्शन होता है। फिर मोटिवेशन पैदा होता है। पहले कदम उठाइए। फिर रास्ता आपको खुद बुलाने लगता है। आपने शायद महसूस किया होगा किसी भी काम की शुरुआत सबसे कठिन लगती है। लेकिन जैसे ही आप 5 या 10 मिनट तक उस काम में लगे रहते हैं, अचानक दिमाग शांत होने लगता है। ऐसा इसलिए क्योंकि आपका ब्रेन रेजिस्टेंस सिर्फ शुरुआत में पैदा करता है। उसे बदलाव पसंद नहीं। लेकिन एक
बार जब उसे समझ आ जाता है कि आप रुकने वाले नहीं हैं तो वही ब्रेन आपकी मदद भी करने लगता है। यही वजह है कि डिसिप्लिन कोई जन्मजात गुण नहीं है। यह एक फैसला है जो आपको हर दिन लेना पड़ता है। हर सुबह, हर शाम, हर उस पल [संगीत] जब आपका दिमाग कहता है, आज रहने दो। याद रखिए सफल लोग आपसे ज्यादा मोटिवेटेड नहीं होते। वे सिर्फ अपने मूड को अपने फैसलों का मालिक नहीं बनने देते। उनका शरीर भी थकता है। उन्हें भी डर लगता है। उनका भी मन कई बार हार मानने का करता है।
लेकिन एक चीज उन्हें अलग बनाती है। वे अपने वादों का सम्मान करते हैं। वे खुद से किया हुआ वादा नहीं तोड़ते। क्योंकि उन्हें पता है जब आप दुनिया से किया हुआ वादा तोड़ते हैं तो शायद सिर्फ एक रिश्ता टूटता है। लेकिन जब आप खुद से किया हुआ वादा तोड़ते हैं तो आपका आत्मविश्वास टूट जाता है और आत्मविश्वास एक बार टूट जाए तो सबसे आसान काम भी पहाड़ जैसा लगने लगता है। इसलिए अगली बार जब आपका मन कहे आज छोड़ देते हैं। तो अपने आप से सिर्फ इतना कहिए। मुझे मोटिवेशन की जरूरत नहीं। मुझे सिर्फ अगला
कदम उठाना है क्योंकि एक कदम फिर दूसरा फिर तीसरा। यही छोटे-छोटे कदम एक दिन आपकी पूरी पहचान बदल देते हैं और उस दिन आपको एहसास होगा कि आजादी आराम करने में नहीं थी। आजादी तो हमेशा डिसिप्लिन के दूसरी तरफ आपका इंतजार कर रही थी। चैप्टर फाइव। रिवायर योर माइंड डिफीट लेजीनेस। रात के 1:12 [संगीत] थे। विवान अपने कमरे में बैठा था। उसके सामने दो तस्वीरें थी। पहली तस्वीर 3 साल पुरानी थी। चेहरे पर चमक [संगीत] थी। आंखों में बड़े सपने थे और दिल में यह विश्वास कि एक दिन वह अपनी जिंदगी बदल देगा। दूसरी तस्वीर
कुछ दिन पहले की थी। वही चेहरा लेकिन आंखों की चमक [संगीत] कहीं खो चुकी थी। सपने अब भी थे, लेकिन उन पर धूल जम चुकी थी। उसने दोनों तस्वीरों को कई मिनट तक देखा। फिर उसने खुद से एक सवाल पूछा। आखिर मेरे अंदर बदला [संगीत] क्या है? उसी समय उसकी नजर कमरे पर पड़ी। बिस्तर के पास मोबाइल पड़ा था। टेबल पर आधी पड़ी हुई किताबें धूल खा रही थी। [संगीत] लैपटॉप खुला था। लेकिन उस पर कोई काम नहीं। सिर्फ वीडियोस की लिस्ट थी। कमरे में कोई शोर नहीं था। लेकिन अचानक उसे महसूस हुआ कि उसकी
सबसे बड़ी लड़ाई उसके अंदर नहीं। उसके आसपास चल रही थी। और शायद पहली बार उसे समझ आया कि इंसान सिर्फ अपनी सोच से नहीं बदलता। वह अपने माहौल से भी बदलता है। यही एक ऐसी सच्चाई छिपी है जिसे ज्यादातर लोग पूरी जिंदगी नजरअंदाज कर देते हैं। हम अक्सर सोचते हैं कि हमारी विल पावर कमजोर है। लेकिन सच्चाई यह है कि कई बार हमारी विल पावर नहीं। हमारा एनवायरमेंट हमारे खिलाफ काम कर रहा होता है। जरा सोचिए। अगर आपकी स्टडी टेबल पर किताब की जगह मोबाइल रखा हो तो आपका हाथ सबसे पहले किस तरफ जाएगा? अगर
हर 5 मिनट में नोटिफिकेशन बजे तो क्या फोकस बच पाएगा? अगर आपके आसपास हर चीज आपको आराम करने के लिए बुला रही हो तो सिर्फ मोटिवेशन के भरोसे कितने दिन लड़ पाएंगे? याद रखिए इंसान अपने इरादों से कम और अपने एनवायरमेंट से ज्यादा प्रभावित होता है। इसीलिए कुछ जगहों पर पहुंचते ही आपका मन काम करने लगता है और कुछ जगहों पर पहुंचते ही सिर्फ लेटने का यह जादू नहीं है। यह आपके ब्रेन की प्रोग्रामिंग है। आपका दिमाग हमेशा संकेतों को पढ़ता रहता है। अगर कमरे में टीवी सामने है तो ब्रेन कहेगा थोड़ा देख लेते हैं।
अगर बेड काम करने की जगह के बिल्कुल पास है तो ब्रेन कहेगा पहले 5 मिनट आराम कर लो। अगर मोबाइल हर समय आपकी जेब में है तो ब्रेन हर कुछ मिनट बाद उसे चेक करने का कारण ढूंढ लेगा। यानी कई बार आलस्य आपकी आदत नहीं होता। वह आपके आसपास मौजूद संकेतों का परिणाम होता है। लेकिन अच्छी खबर यह है जिस एनवायरमेंट ने आपको कमजोर बनाया है, उसी सिद्धांत का इस्तेमाल करके आप खुद को मजबूत भी बना सकते हैं। कल्पना कीजिए सुबह उठते ही मोबाइल आपकी पहुंच से बाहर हो। स्टडी टेबल पर सिर्फ वही किताब रखी
हो [संगीत] जिसे आपको पढ़ना है। एक्सरसाइज वाले शूज रात में ही दरवाजे के पास रख दिए जाए। काम शुरू करने से पहले सोशल मीडिया लॉग आउट कर दिया जाए। यह छोटे-छोटे बदलाव दिखने में मामूली लगते हैं। लेकिन आपका ब्रेन इन्हीं छोटी चीजों से अपनी दिशा तय करता है। याद रखिए सफल लोग हमेशा ज्यादा इच्छाशक्ति वाले नहीं होते। वे सिर्फ अपने आसपास ऐसा माहौल बना लेते हैं जहां सही काम करना आसान हो जाए और गलत काम करना मुश्किल। अब एक और बात समझिए। हर बार जब आप सही एनवायरमेंट में सही एक्शन लेते हैं। आप सिर्फ एक
काम पूरा नहीं कर रहे होते। आप अपने ब्रेन में एक नया रास्ता बना रहे होते हैं। शुरुआत में वह रास्ता बहुत कमजोर होता है। इसलिए पुरानी आदतें बार-बार आपको वापस बुलाती हैं। लेकिन अगर आप लगातार चलते रहे तो वही नया रास्ता एक दिन आपकी नई पहचान बन जाता है। यही वजह है कि बदलाव कभी एक दिन में दिखाई नहीं देता। वह चुपचाप होता है। बिल्कुल वैसे ही जैसे एक बीज मिट्टी के नीचे धीरे-धीरे जड़े बनाता है। ऊपर से देखने पर कुछ नहीं बदलता। लेकिन अंदर सब कुछ बदल रहा होता है। इसलिए अगर आज आपको लगता
है कि आपकी मेहनत का कोई परिणाम नहीं मिल रहा तो हार मत मानिए। हो सकता है आपके अंदर नई जड़े बन रही हो और जब सही समय आएगा तो वही जड़े एक ऐसी जिंदगी को जन्म देंगी [संगीत] जिसकी आपने कभी कल्पना की थी। याद रखिए आलस्य से लड़ाई सिर्फ इच्छाशक्ति से नहीं जीती जाती। यह लड़ाई सही आदतों, सही माहौल और हर दिन गए छोटे-छोटे फैसलों से जीती जाती है। क्योंकि जिस दिन आपने अपने एनवायरमेंट को अपने सपनों का साथी बना लिया, उस दिन आपके लिए एक्शन लेना संघर्ष नहीं रहेगा। वह आपकी नई पहचान बन जाएगा।
और शायद उसी दिन आपको महसूस होगा कि असली बदलाव बाहर की दुनिया में नहीं। हमेशा अंदर की प्रोग्रामिंग बदलने से शुरू होता है। चैप्टर सिक्स बिकम द पर्सन हु टेक्स एक्शन। सर्दियों की एक सुबह थी। घड़ी में 4:58 थे। पूरा शहर गहरी नींद में था। सड़कें खाली थी। हवा में ठंड इतनी थी कि सांस लेते समय भी उसका एहसास हो रहा था। उसी समय विवान अपने कमरे की खिड़की के सामने खड़ा था। उसने बाहर देखा। फिर अपनी ही परछाई को शीशे में देखा। कुछ महीनों पहले तक यही समय उसके लिए सोने का होता था। अलार्म
बंद करना उसकी आदत थी। कल से शुरू करूंगा। उसका सबसे पसंदीदा वाक्य था। लेकिन आज कुछ अलग था। आज उसने अलार्म बंद नहीं किया। आज उसने बहाना नहीं बनाया। आज उसने खुद से बहस भी नहीं की। वह चुपचाप उठा। अपने शूज पहने और दरवाजा खोलकर बाहर निकल गया। दौड़ते समय उसके कदम पहले जितने तेज नहीं थे। सांस भी जल्दी फूल रही थी। लेकिन उसके चेहरे पर एक अजीब सी शांति थी। क्यों? क्योंकि पहली बार वह किसी गोल के पीछे नहीं भाग रहा था। वह अपनी नई पहचान बना रहा था। यही जिंदगी का सबसे बड़ा रहस्य
छिपा है। ज्यादातर [संगीत] लोग अपनी पहचान बदलने से पहले अपने परिणाम बदलना चाहते हैं। वे कहते हैं जब मैं फिट हो जाऊंगा तब मैं डिसिप्लिन वाला इंसान बनूंगा। जब मैं सफल हो जाऊंगा [संगीत] तब मुझे खुद पर विश्वास होगा। जब पैसा आ जाएगा तब मैं बदल जाऊंगा। लेकिन सच ठीक इसका उल्टा है। पहले पहचान बदलती है, फिर आदतें बदलती हैं और उसके बाद परिणाम बदलते हैं। हर बार जब आप खुद से कहते हैं, मैं बहुत आलसी हूं। आपका ब्रेन उस बात को सच मानने लगता है। फिर वह उसी पहचान के हिसाब से फैसले लेने लगता
है। अगर आप खुद को आलसी मानते हैं, तो एक्शन लेना आपको अपने स्वभाव के खिलाफ लगेगा। लेकिन अगर एक दिन आप खुद से कहना शुरू कर दें मैं वह इंसान हूं जो अपने वादे निभाता है। तो धीरे-धीरे आपका ब्रेन उसी पहचान के अनुसार खुद को ढालना शुरू कर देगा। याद रखिए इंसान हमेशा अपनी पहचान के अनुसार जीने की कोशिश करता है। यही कारण है कि छोटी सी जीत भी इतनी महत्वपूर्ण होती है। अगर आपने सिर्फ 5 मिनट पढ़ाई की तो आपने सिर्फ 5 मिनट नहीं [संगीत] पढ़े। आपने अपने ब्रेन को एक नया सबूत दिया कि
मैं सीखने वाला इंसान हूं। अगर आपने सिर्फ 10 पुश अप्स किए तो आपने सिर्फ एक्सरसाइज नहीं की। आपने अपने ब्रेन से कहा मैं हार नहीं मानता। और ऐसे ही हर छोटा एक्शन आपकी नई पहचान की ईंट बनता जाता है। लोग अक्सर सोचते हैं कि एक दिन कोई बड़ा मोमेंट आएगा और उनकी जिंदगी पूरी तरह बदल जाएगी। लेकिन वास्तविकता कहीं ज्यादा शांत होती है। जिंदगी किसी एक बड़े फैसले से नहीं बदलती। वह उन सैकड़ों छोटे फैसलों से बदलती है जो कोई नहीं देखता। सुबह अलार्म बजने के बाद उठना, थकने के बाद भी 5 मिनट और काम
करना। मोबाइल उठाने की इच्छा होने पर उसे वापस रख देना। यही वे पल हैं जहां आपका भविष्य लिखा जाता है। और सबसे खूबसूरत बात यह है। इन छोटे पलों में किसी और से लड़ाई नहीं होती। यह लड़ाई [संगीत] सिर्फ आपके और आपके पुराने वर्जन के बीच होती है। विवान ने भी यही समझ लिया था। उसने परफेक्ट बनने की कोशिश छोड़ दी। उसने सिर्फ इतना तय किया कि हर दिन अपने पुराने वर्जन से थोड़ा बेहतर बनना है। कुछ दिनों में वह हार गया। कुछ दिनों में उसने फिर बहाने बनाए। कुछ दिनों में वह अपने ही नियम
तोड़ बैठा। लेकिन इस बार एक चीज अलग थी। उसने खुद को नाकाम नहीं कहा। उसने अगले दिन फिर शुरुआत की क्योंकि अब उसका लक्ष्य सिर्फ जीतना नहीं था। उसका लक्ष्य कभी हार मानकर बैठना नहीं था। यही वह अंतर है जो साधारण लोगों और असाधारण लोगों के बीच दिखाई देता है। असाधारण लोग कभी नहीं गिरते। ऐसा नहीं है। [संगीत] वे भी गिरते हैं। लेकिन वे जमीन पर पड़े रहने का फैसला नहीं करते। वे उठते हैं, अपने कपड़ों की धूल झाड़ते हैं और फिर से चल पड़ते हैं। याद रखिए आलस्य का सबसे बड़ा इलाज मोटिवेशन नहीं है।
सबसे बड़ा इलाज है हर दिन खुद को यह साबित करना कि [संगीत] आप वही इंसान हैं जो एक्शन लेता है। क्योंकि जिस दिन आपकी पहचान बदल जाती है, उस दिन डिसिप्लिन बोझ नहीं लगता। वह आपका स्वभाव बन जाता है। और जब एक्शन आपका स्वभाव बन जाता है, तब सफलता किसी चमत्कार की तरह नहीं आती। वह धीरे-धीरे चुपचाप हर दिन आपके जीवन का हिस्सा बनने लगती है। इस सफर में शायद आपने एक बात महसूस की होगी। आलस्य कभी आपका असली दुश्मन था ही नहीं। असली दुश्मन वह कहानी थी जो आप सालों से खुद को सुनाते आ
रहे थे। आज उस कहानी का अंत हो चुका है। अब जब भी आईने में खुद को देखिए तो उस इंसान को मत देखिए [संगीत] जो कल तक बहाने बनाता था। उस इंसान को देखिए जो आज पहला कदम उठाने की हिम्मत रखता है। क्योंकि जिंदगी हमेशा उसी पल बदलनी शुरू होती है। जब इंसान यह कहना बंद कर देता है कि मैं एक दिन बदललूंगा और पहली बार पूरे विश्वास के साथ कहता है मैं आज से बदल चुका हूं। फाइनल चैप्टर द डे यू स्टॉप बीइंग लेजी। शाम ढल चुकी थी। सूरज की आखिरी किरणें धीरे-धीरे शहर की
ऊंची इमारतों के पीछे गायब हो रही थी। वही पुराना कमरा वही खिड़की, वही मेज। लेकिन इस बार कुछ बदल चुका था। विवान खामोशी से अपनी कुर्सी पर बैठा था। उसके सामने वही पुरानी डायरी रखी थी। जिसके पहले पन्ने पर कभी बड़े उत्साह से लिखा था। टुमारो माय न्यू लाइफ बिगिंस। उसने डायरी खोली। उस पन्ने को कुछ देर [संगीत] तक देखा। उसकी आंखों के सामने पिछले कई महीनों की तस्वीरें घूमने लगी। वे सुबह जब उसने अलार्म बंद करके फिर से सोना चुना था। वे रातें जब उसने खुद से वादे किए और अगले ही दिन उन्हें तोड़
दिया। वे पल जब उसने अपनी हार का दोष किस्मत, समय और परिस्थितियों पर डाल दिया। लेकिन आज उसने पहली बार महसूस किया कि उसकी सबसे बड़ी हार कभी बाहर नहीं थी। वह हमेशा उसके अपने दिमाग के अंदर थी। धीरे से उसने अपनी जेब से एक पेन [संगीत] निकाला। कुछ सेकंड तक वह खाली पन्ने को देखता रहा। फिर उसने टुमारो शब्द पर एक सीधी लाइन खींच दी और उसके नीचे सिर्फ दो शब्द लिखे। स्टार्ट्स टुडे। उस पल कमरे में कोई शोर नहीं था। [संगीत] कोई तालियां नहीं थी। कोई मोटिवेशनल म्यूजिक नहीं बज रहा था। लेकिन फिर
भी शायद उसकी जिंदगी का सबसे बड़ा फैसला उसी खामोशी में लिया जा चुका था। याद रखिए जिंदगी हमेशा शोर मचाकर नहीं बदलती। अक्सर सबसे बड़े बदलाव उस समय होते हैं जब पूरी दुनिया चुप होती है और सिर्फ आप अपने आप से एक सच्चा फैसला लेते हैं। शायद इस सफर की शुरुआत आपने यह सोच कर की थी कि आपकी सबसे बड़ी समस्या आलस्य है। लेकिन अब आप जानते हैं आलस्य सिर्फ एक चेहरा था। उसके पीछे छिपे हुए थे डर, कंफर्ट जोन, बार-बार टूटे हुए वादे, गलत पहचान और वह पुरानी प्रोग्रामिंग जो हर बार आपको आसान रास्ते
की तरफ धकेल देती थी। लेकिन अब आपके पास एक नई समझ है। [संगीत] जब आपका ब्रेन कहे कल कर लेंगे तो अब आप उसकी चाल पहचान लेंगे। [संगीत] जब मोबाइल आपकी मेहनत से ज्यादा आकर्षक लगे तो अब आप समझ जाएंगे कि यह आपकी कमजोरी नहीं। यह आपके ब्रेन की पुरानी [संगीत] आदत है और जब कभी आप फिर से गिर जाए तो खुद को नाकाम कहना बंद कर देंगे क्योंकि अब आपको पता है गिरना हार नहीं है वहीं पड़े रहना हार है। एक बात हमेशा याद रखिए दुनिया के सबसे सफल लोगों [संगीत] और बाकी लोगों के
बीच सबसे बड़ा अंतर टैलेंट का नहीं होता। अंतर सिर्फ इतना होता है कि एक इंसान बहाने सुनता है और दूसरा इंसान एक्शन लेता है। हर सुबह जब आप उठेंगे आपके सामने फिर वही दो रास्ते होंगे। पहला आराम का दूसरा विकास का। पहला रास्ता आसान होगा। वह आपको तुरंत सुकून देगा। लेकिन धीरे-धीरे आपका आत्मविश्वास छीन लेगा। दूसरा रास्ता मुश्किल होगा। शुरुआत में दर्द देगा। लेकिन वही रास्ता आपको वह इंसान बनाएगा जिसकी आपने हमेशा कल्पना की थी। जिंदगी में एक पल ऐसा जरूर आता है जब इंसान को यह तय करना पड़ता है कि वह अपने बहानों पर
विश्वास करेगा या अपने सपनों पर और सच कहूं यह फैसला कोई और नहीं ले सकता ना आपके माता-पिता ना आपके दोस्त ना आपकी परिस्थितियां सिर्फ आप आज अगर आप इस कहानी के अंत तक पहुंच चुके हैं तो शायद यह कोई संयोग नहीं है। शायद आपके अंदर कहीं ना कहीं वह इंसान अब भी जिंदा है जो बड़े सपने देखता है जो अपनी जिंदगी बदलना चाहता है जो सिर्फ जीना नहीं कुछ बनकर जीना चाहता है अगर ऐसा है तो मैं आपसे सिर्फ एक वादा चाहता हूं अपने आप से एक छोटा सा वादा कल का इंतजार मत कीजिए
परफेक्ट टाइम का इंतजार मत कीजिए सही मूड का इंतजार मत कीजिए बस आज एक छोटा एक्शन लीजिए सिर्फ एक क्योंकि इतिहास हमेशा हमेशा उन लोगों ने लिखा है जिन्होंने शुरुआत करने के लिए सही समय का इंतजार नहीं किया। उन्होंने समय को सही बना दिया। जब आप आज रात सोने जाए तो खुद से एक सवाल जरूर पूछिए। अगर मैं इसी तरह अगले 5 साल तक जीता रहा तो मेरी जिंदगी कैसी होगी? और फिर एक दूसरा सवाल पूछिए। अगर मैं आज से हर दिन सिर्फ एक छोटा सा ही कदम उठाऊं तो 5 साल बाद मैं कौन बन
सकता हूं? इन दोनों सवालों के जवाब के बीच आपका पूरा भविष्य छिपा हुआ है। याद रखिए आपका दुश्मन आलस्य नहीं था। आपका दुश्मन वह झूठ था जिस पर आपने सालों तक विश्वास किया और आज उस झूठ की ताकत खत्म हो चुकी है। अब कहानी आपके हाथ में है। हर नया सवेरा आपको फिर से एक मौका देगा। हर नया दिन आपसे सिर्फ एक सवाल पूछेगा। क्या तुम आज भी वही इंसान रहोगे या आज वह पहला कदम उठाओगे जो तुम्हारी पूरी जिंदगी बदल सकता है? उस सवाल का जवाब शब्दों से मत दीजिए। अपनी जिंदगी से दीजिए क्योंकि
अंत में लोग आपकी बातें याद नहीं रखते। वे आपके फैसले याद रखते हैं। और शायद आज लिया गया आपका एक छोटा फैसला। [संगीत] कल किसी ऐसी जिंदगी की शुरुआत बन जाए जिसका सपना देखने की हिम्मत भी आपने कभी नहीं की