[संगीत] कर दो कि अगर आप अजमेर से सीधे मेवाड़ की तरफ बढ़ोगे तो आपके रास्ते में पर्वतों से घिरा हुआ एक भयानक जंगल पड़ेगा का यह इलाका है दिवेर छापली प्राचीन काल का रावत राजपूतों का गढ़ छावली कि यह वही इलाका है जहां महाराणा प्रताप की तलवार ने मुगलों को घोड़ों सहित फाड़ डाला था यह वही इलाका है जहां वीर पिता के वीर पुत्र को अमर सिंह पर को बन मुगलों पर टूट पड़े थे यह इलाका गवाह है राणा के विजय युद्ध का यह इलाका गवाह है दिवेर के युद्ध का है जहां महाराणा प्रताप ने
मुगलों से संपूर्ण मेवाड़ को आजाद करवा कर एक बार पुनः मेवाड़ पर सूर्यवंश की हुकूमत का परचम लहरा दिया था तो आइए जानते हैं आखिर हल्दीघाटी के युद्ध के बाद क्या हुआ था कैसे महाराणा प्रताप ने मुगलों पर चढ़ाई कर मेवाड़ को अकबर के चंगुल से आजाद करवा लिया तो आइए शुरू करते हैं इतिहास की किताबो से मिटाए जा चुके महाराणा की विजय के उस युद्ध को उम्मीद हैं आपने इस वीडियो को लाइक जरूर किया होगा चलिए शुरू करते हैं अ कर दो ही हल्दीघाटी के भयानक संग्राम के बाद महाराणा प्रताप अपनी समस्त सेनाओं के
साथ कुंभलगढ़ आ गए मुगल सेनापति मानसिंह की लाख कोशिशों के बावजूद महाराणा प्रताप को कैद करने में वह नाकामयाब रहा इस समय तक गोगुंदा चित्तौड़ देर और उदयपुर सहित लगभग आधा मेवाड़ मुगलों के अधीन आ चुका था इन जगहों पर मुगलों के थाने में तैनात हो चुके थे जहां पर हर समय भारी मुगलिया खोजे तैनात रहती थी बेशक इस वक्त आधा मेवाड़ अकबर के कब्जे में था परंतु यहां के राजा महाराणा प्रताप अकबर के अधीन नहीं थे कि वे तो संपूर्ण मेवाड़ की आजादी के लिए पुणे एक युद्ध की तैयारी कर रहे थे परंतु वह
राणा जिसने अकबर के विशाल लश्कर को तहस-नहस कर दिया हो जो हर वक्त अकबर की सत्ता और उसकी सियासत को धिक्कारता हो वह राणा युवा जागो में यह अकबर को कहा मंजूर था इन्हीं वजहों से हल्दीघाटी युद्ध के मात्र एक साल बाद अकबर ने एक बार फिर सेहवाज खान के नेतृत्व में एक भारी सेना महाराणा प्रताप को काबू में करने के लिए भेजी कि शहबाज खान ने गौर रात्रि में कुंभलगढ़ के किले को चारों तरफ से घेर लिया ही हल्दीघाटी जैसे भयानक संग्राम के तुरंत बाद ही महाराणा प्रताप इस वक्त कोई नया युद्ध नहीं चाहते
थे इस कारण उन्होंने किले को त्याग दिया इस तरह कुंभलगढ़ पर भी अकबर का अधिकार हो गया इधर महाराणा प्रताप अपने सैनिकों के साथ मन की आवाज नामक गांव की पहाड़ी पर पहुंचे अगले कुछ महीनों तक यह जंगल पर्वत और उपाय ही महाराणा प्रताप का घर थी मीणा और समय-समय पर महाराणा प्रताप अपने ठिकानों को बदलते रहते इस समय के दौरान भी अकबर ने महाराणा प्रताप को अपने खेत में लाने का हर हथकंडा अपनाया कि उसने तीन बार एक-एक लाख सवारों की विशाल खोजे महाराणा प्रताप के पीछे भेजी परंतु वे सभी महाराणा को कैद करने
में नाकामयाब रहे वक्त कठिन था परंतु दिल में मेवाड़ पर स्वराज की पताका फहराने की सौंध उनको चैन से बैठने भी नहीं देती परंतु ना बड़ी सेना है और ना ही धन मेवाड़ पर स्वराज का केसरिया लहरा एक ऐसे इन्हीं चिंताओं में मग्न महाराणा प्रताप के समक्ष उस वक्त के मेवाड़ के नगर सेठ भामाशाह महाराणा की सेवा में उपस्थित हुए कि उन्होंने राणा से खम्मा घणी हुकुम करते हुए कहा थे मेवाड़ धनी अपने घोड़ों की कमान मेवाड की तरफ मोड लीजिए एग्जाम दाता हुकुम धन की कमी से अपने विचार को मत बदल लेना मेरे पुरखों
का कमाया हुआ समस्त धन आपके चरणों में रखता हूं मेवाड़ी धारा मुगलों की गुलामी से आतंकी थे इसका उद्धार कीजिए में भामाशाह द्वारा दिए गए इतने बड़े खजाने को देख महाराणा के रक्त में एक बार फिर उबाल आ गया इस वक्त हुकुम के पास बहुत बड़ा दिन था जिसे स्वराज की विशाल सेना का निर्माण हो सकता था से 12 जून सन 1582 को महाराणा प्रताप ने अपनी सेनाओं के साथ कालागुमान के पर्वतों से होते हुए दिवेर की तरफ बढ़ना शुरू किया दिवेर छावनी के पर्वतों की गोरमघाट चोटी पर महाराणा प्रताप ने अपनी सेनाओं के साथ
डेरा जमाया और स्वयं महाराणा प्रताप शिवभक्ति में लीन हो गई इन पर्वतों पर महाराणा के शिव मंत्रों से प्रसन्न होकर यह तपस्या कर रहे मुनि रूपनाथ जी महाराणा के पास आए और उनसे पूछा आपकी तपस्या के पीछे आपको क्या फल मिलना चाहिए तब महाराणा ने मुनि से कहा मेवाड़ की आजादी मुनि ने आश्चर्य से कहा यह पूरा इलाका रावत राजपूतों का निवास है मेवाड़ पर आप की विजय पताका इन्हीं लोगों के सहयोग से लहराएगी को सिद्ध योगी रूपनाथ जी महाराणा प्रताप को गोपालगढ़ की गुफाओं में ले गई जहां मुनि ने महाराणा प्रताप को रावत सरदार
श्री बालाजी से मिलवाया श्री बालाजी रावत ने महाराणा हुकुम से कहा कि इस गांव के सभी ठिकानों के रावत हुकुम की सेवा में है जब आदेश तक प्रहार हुकुम का इशारा मिलते ही नरमुंडों का ढेर लगा देंगे और इस तरह महाराणा को सेना और धन दोनों प्राप्त हो गए धन का बंदोवस्त भामाशाह के महादान से हो गया और सेना का श्री बाबा जी रावत की सेनाओं के संयोग से 16 सितंबर सन 1582 इतिहास के पन्नों में वह तारीख दर्ज हुई जब राणा प्रताप की सेना यह मुगलिया स्थानों पर आंधी के समान टूट पड़ी विजयदशमी का
दिन गवाह बना महाराणा के कोप कहर का मेवाड़ के स्वराज्य का कि युद्ध के एक दिन पहले महाराणा प्रताप ने अपनी सेनाओं को दो भागों में बांट दिया एक बार का नेतृत्व अपने पुत्र को अमर सिंह को दिया जबकि दूसरे भाग का नेतृत्व समय वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप कर रहे थे कि पंदरासितंबर की घोर रात्रि में दिवेर की डरावनी वादियों में महाराणा प्रताप ने अपनी सेनाओं को मुगलों पर रहम न करते हुए पर को बन जाने को कहा हुकुम की सेनाओं में स्वराज की जो आग महाराणा ने जगाई थी मीणा वह आज अलावा बन चुकी
थी कि समस्त सेनाओं ने प्रतिघात के स्वरों में अपनी तलवारें लहराते हुए महादेव का जयघोष किया अगली सुबह महाराणा ने दिवेर के मुगल थाने की तरफ पूछ कर दिया हुकुम की सेना यह मुगल थाने के आसपास के पेड़ों पर्वतों और घाटियों में फैल गई थे महाराणा हुकुम का आदेश मिलते ही सबसे पहला हमला को अमर सिंह के नेतृत्व में किया गया को अमर सिंह ने दिवेर के मुगल थाने की घेराबंदी करते हुए दुश्मनों पर घमासान प्रहार किया मेवाड़ी बरछी तीर तलवारों में इतना कहर बरपाया कि मुगलों में हाहाकार मच गया कि वे थाने पर मुगलों
के दो सेनापति 50,000 कि मुगल सेना के साथ हर समय तैनात रहते थे और इस वक्त अकबर का चाचा सुल्तान खान दिवेर के थाने का सेनापति था सुल्तान खान ने अपनी सेनाओं के साथ अमर सिंह पर धावा बोला अमर सिंह सुल्तान खान की सेनाओं को चीरते हुए सुल्तान खान के करीब जा पहुंचे के रक्त में नहाए गुस्से से तरबतर अमर सिंह ने अपने वाले को इतने प्रहार से सुल्तान खान पर फेंका कि उनका वाला सुल्तान खान के घोड़े सहित आर पार निकल गया एक वीर पिता के वीर पुत्र अमर सिंह ने एक ही वार में
मुगल थाने के सेनापति का बुत बना दिया सेनापति घोड़े सहित जमीन में मूर्ति की तरह बिगड़ गया अमर सिंह के इस घनघोर वार से सुल्तान खान जमीन पर पड़ा फड़फड़ा रहा था परंतु अमर सिंह के डर से कोई मुग़ल सैनिक उसकी सहायता के लिए आगे आने की हिम्मत नहीं कर पा रहे थे थे कि तभी अकबर का सबसे खास सेनापति हाथी सरीखे बहलोल खान ने अमर सिंह की तरफ बढ़ना शुरू किया उसकी सेनाओं ने अमर सिंह को घेरना शुरू कर दिया बहलोल खान हाथी पर सवार होकर अमर सिंह की तरफ बढ़ रहा था कि तभी
रावत सरदारों ने अपनी तलवार से बहलोल खान के हाथी की टांग काट दी बहलोल खान हाथी सहित जमीन पर आ गिरा और तुरंत एक घोड़े पर सवार हो गया और अपनी तलवार निकाल अमर सिंह की तरफ तेजी से बढ़ना शुरू किया यह दृश्य देख महाराणा प्रताप भी रण के मैदान में उतर आए हैं [संगीत] कि आगे बढ़ रहे बहल खान को महाराणा प्रताप ने रोका कुछ समय तक दोनों का युद्ध चलता रहा कुछ देर तो महाराणा यूं ही मजाक सा खेल खेलते रहे मुगलिया बिलों के साथ परंतु फिर भी वह नहीं माना उसने हुकुम के
सामने ही अमर सिंह पर भाला फैंक दिया इस करतूत के बाद गुस्से में आए महाराणा हमने दो कदम पीछे जाकर बहलोल खान पर ऐसा करारा वार किया कि हाथी शरीर के बहलोल खान को उसके घोड़े सहित सीधी लकीर में चीर कर दो कर दिया है और ऐसा चिराग की बहलोल खान का आधा शरीर इस तरह और आधा शरीर उस तरफ गिरह कौन था बहलोल खान बहलोल खान अकबर का खास मंत्री था अकबर को उसकी ताकत पर बहुत नाज थी हाथी जैसा बदन था उसका कभी किसी युद्ध में नहीं आ रहा 50 आदमी मिलकर भी उसे
काबू नहीं कर पाते थे कि ऐसे दानव को महाराणा ने एक ही झटके में दो हिस्सों में फाड़ दिया था दिवेर के थाने के दोनों सेनापतियों के मरते ही 36,000 मुगलों ने अपनी तलवार झुकाते हुए महाराणा प्रताप के सामने आत्मसमर्पण कर दिया भारत के इतिहास में इतना बड़ा आत्मसमर्पण किसी भी राजा के सामने कभी नहीं हुआ था महाराणा ने दिवेर को अपने अधिकार में लेते ही अपने सरदारों को कुंभलगढ़ की तरफ बढ़ने के आदेश दिए हों कि प्रचंड सेनाओं ने कुंभलगढ़ की तरफ बढ़ना शुरू किया कि इस समय कुंभलगढ़ पर अकबर के सेनापति गाजी खान
का अधिकार था गाजी खान महाराणा के आने की खबर सुन बिना लड़े ही अपनी सेना सहित अजमेर भाग गया बिना किसी युद्ध के ही महाराणा का कुंभलगढ़ पर भी अधिकार हो गया यहां से उन्होंने गोगुंदा चावंड जावर सहित 32 संभावित ठिकानों और किलों पर अपना अधिकार कर लिया इन किलों को गंगा जल से पवित्र करवाकर यह स्वराज का केसरिया लहराया गया महाराणा की सेनाओं ने अजमेर घाटी तक अपना दबदबा जमा लिया का जो इलाका मेवाड़ को दिल्ली से जोड़ता था उस पर भी महाराणा ने अपने हुकूमत का परचम लहरा दिया था अपने विजय अभियानों में
महाराणा प्रताप ने लगभग संपूर्ण मेवाड़ को आजाद करवा लिया सेवा चित्तौड़ और मंडलगढ़ को छोड़कर यह दूर भी महाराणा के छत्र के नीचे होते हैं यदि उन्हें भगवान का बुलावा इतनी जल्दी ना आता है थे महाराणा ने मुगल सत्ता पर स्वराज का वह अ थोड़ा मारा कि अकबर ने मेवाड़ को विजय करने का सपना ही त्याग दिया उसकी सेनाओं ने कभी मेवाड़ की तरफ रुख नहीं किया इस आजादी के पीछे महाराणा ने अपना सुख-चैन सब त्याग दिया था सोने के थाल में भोजन करने वाले राजा ने जंगलों में निवास बनाया मखमल पर चलने वाले राणा
ने कांटों भरी राह पर चलकर स्वराज का जो बिगुल बजाया उसे बाजीराव पेशवा से लेकर नेताजी सुभाष चंद्र बोस शहीद तक कई युद्धों ने अपनाया मेवाड़ में आज भी बड़े गर्व से कहा जाता है कि जब मेवाड़ के राणा रण में उतरते हैं तो घोड़ों सहित योद्धाओं को काट डालते हैं ऐसे वीर सपूत के विजय युद्ध दिवेर के युद्ध को भारत के इतिहास की किताबों से मिटा दिया गया ताकि हम और आप कभी अपने पूर्वजों पर गर्व कर सकते हैं यह हमारा कर्तव्य बनता है कि हम इस वीडियो को अधिक से अधिक लोगो तक पहुचाए
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