कल सुबह जब तुम पेट्रोल पंप जाओगे तो एक बार बोर्ड पर कीमत देखना फिर अगले पंप पर जाना फिर उसके अगले पर तुम्हें क्या दिखेगा एक ही कीमत हर जगह चाहे वो एचपी हो इंडियन ऑयल हो भारत पेट्रोलियम हो Reliance हो शायद एक दो पैसों का फर्क कभी सोचा क्यों तुम्हें बताया गया है कि 2010 के बाद से पेट्रोल की कीमतें डीरेगुलेटेड है। यानी कागजों पर यह फ्री मार्केट है। कंपनी अपनी मर्जी से कीमत तय करने के लिए आजाद है। लेकिन अगर सच में ऐसा होता तो कीमतों में फर्क होता ना। कोई सस्ता बेचता ग्राहक
खींचने के लिए, कोई महंगा बेचता क्वालिटी के नाम पर, Reliance अलग रेट रखता इंडियन ऑयल अलग। लेकिन ऐसा नहीं है। सब एक जैसे हैं। क्यों? क्योंकि तुम जिसे कंपटीशन समझ रहे हो वो कंपटीशन नहीं है। वो एक कार्टेल है। एक सिस्टम है। एक ऐसा सिस्टम जो 150 साल पहले एक आदमी ने बनाया था। और वह सिस्टम आज भी वैसे ही काम कर रहा है जैसे पहले दिन करता था। 2016 याद है जब Jio आया था। फ्री कॉल्स, फ्री डाटा, अनलिमिटेड पूरा देश पागल हो गया था। तुमने सोचा वाह अंबानी साहब कितने दयालु हैं। लेकिन अगले
2 साल में क्या हुआ? Airl मर गया। Vodafone और Idea को मर्ज होना पड़ा सिर्फ जिंदा रहने के लिए। डोकोमो गायब, यूनor गायब। 3 साल में पूरा टेलीकॉम इंडस्ट्री सिमट कर तीन कंपनियों में आ गया। और उसमें से एक Jio सबसे ताकतवर। वो फ्री डाटा तुम्हारे लिए नहीं था। वो कंपटीशन को मारने का खर्चा था और तुम, तुम कस्टमर नहीं थे उस गेम में। तुम हथियार थे। यह कोई नई चाल नहीं है। यह चाल 150 साल पुरानी है। [संगीत] और इसे सबसे पहले एक आदमी ने परफेक्ट किया था। उसका नाम था जॉन डी रॉकफेला। रॉकफेला
दुनिया का सबसे अमीर इंसान इतिहास का सबसे अमीर इंसान। उसकी दौलत आज के हिसाब से 400 बिलियन डॉलर से ज्यादा थी। जब वो अपने पीक पर था उस वक्त की दुनिया के किसी भी अमीर आदमी से कई गुना ज्यादा। कहा जाता है कि उस जमाने में अमेरिका की पूरी इकॉनमी का 2% [संगीत] सिर्फ रॉकफेलर के पास था। एक इंसान के पास। सोचो। लेकिन रॉकफेलर की असली लेगसी पैसा नहीं है। उसकी असली लेगसी वो सिस्टम है जो उसने बनाया। वो मेथड है जो उसने इन्वेंट किया। और वो मेथड आज भी हर बड़ी कंपनी यूज कर रही
है। Amazon यूज़ करती है। Google यूज करता है। Reliance यूज करती है। अडानी यूज करते हैं। बैंक्स यूज करते हैं। फार्मा कंपनीज यूज करती हैं। तुम उस सिस्टम के अंदर रहते हो रोज हर पल। और तुम्हें पता भी नहीं। आज मैं तुम्हें वो सिस्टम दिखाऊंगा। कैसे रॉक फिलर ने इसे बनाया। कैसे उसने अपने कंपेटिटर्स को खत्म किया? कैसे उसकी कंपनी टूटने के बाद भी वह और अमीर हो गया और कैसे 114 साल बाद भी तुम उसी सिस्टम में फंसे हो जिसे उसने डिजाइन किया था। क्योंकि सिस्टम को समझना एकेडमिक एक्सरसाइज नहीं है। यह सर्वाइवल है।
चलो शुरू करते हैं। जॉन डेविडसन रॉकफेलर का जन्म 8 जुलाई 1839 को न्यूयॉर्क के एक छोटे से गांव रिच फफोर्ड में हुआ। उसके पिता एक कॉर्न मैन थे। हां, एक ठग। वो नकली कैंसर की दवाइयां बेचते थे। गांव-गांव जाकर लोगों को बेवकूफ बनाते थे। उसकी मां एक कट्टर बैप्टिस्ट क्रिश्चियन थी। धार्मिक, नैतिक, सख्त। यह कॉम्बिनेशन समझो। बाप से मिली चालाकी, बेरहमी और लोगों को मैनपुलेट करने की कला और मां से मिला मोरल कन्विक्शन। यह विश्वास कि जो मैं कर रहा हूं, वह भगवान की मर्जी है। रॉकर फेलर ने अपने कॉम्पिटिटर्स को बर्बाद किया बिना किसी
रहम के। लेकिन वो जेनुइनली बिलीव करता था कि यह सब अच्छे के लिए है। उसे लगता था कि भगवान ने उसे चुना है इंडस्ट्री को ऑर्गेनाइज करने के लिए। उसे लगता था कि वह दुनिया को सुधार रहा है। यह उसका दिखावा नहीं था। उसे दिल से यकीन था और यही बात उसे खतरनाक बनाती थी। क्योंकि जो आदमी खुद को भगवान का दूत मानता है, वह किसी को भी कुचल सकता है। 1859 में पेंसिल्वनिया स्टेट के टाइटस विल जगह में तेल मिला। ऑयल रश शुरू हुआ। हजारों लोग पागलों की तरह भागे वेल्स खोदने यानी कुएं खोदने।
कुछ रातोंरात अमीर हो गए। कुछ बर्बाद हो गए। बूम एंड बस्ट। आज तेल की बाढ़ कल सूखा केओस। रॉकेफेलर 20 साल का था। क्लीवलैंड में एक बुककीपर का काम करता था। उसने भी ऑयल रश देखा। लेकिन उसने वो नहीं देखा जो बाकी सब देख रहे थे। बाकी सब देख रहे थे कि तेल निकालने यानी ड्रिलिंग में पैसा है। लेकिन रॉकफेलर ने कुछ और देखा। उसने देखा कि तेल निकालना बहुत रिस्की है। लक पर डिपेंड है। आज किस्मत अच्छी है तो तेल मिला। कल जमीन सूखी निकली तो सब बर्बाद। यह जुआ है। [संगीत] लेकिन रिफाइनिंग, क्रूड
ऑयल यानी कच्चे तेल को साफ करके केरोसिन बनाना जो लोग अपने घरों में लैंप जलाने के लिए यूज करते थे वो असली बिजनेस है। क्यों? क्योंकि तेल निकालने वाला चाहे कोई भी हो, चाहे वह डूबे या तैरे उसे अपना तेल साफ तो करवाना ही पड़ेगा ना। तो रिफाइनरी वाले का धंधा हमेशा चलेगा। 1863 में रॉकर फेलर ने $4000 लगाकर क्लीवलैंड शहर में अपनी पहली रिफाइनरी खोली। जहां कच्चा तेल साफ होकर केरोसिन बनता था। 2 साल में वो क्लीवलैंड की सबसे बड़ी रिफाइनरी बन गई। लेकिन क्लीवैंड में कुल 30 रिफाइनरीज थी। सब आपस में लड़ रही
थी। कंपटीशन भयंकर था। कीमतें गिर रही थी। मुनाफा बहुत कम था। ज्यादातर रिफाइनरीज बस किसी तरह टिकी हुई थी। यहां रॉकरफेलर की असली चालाकी सामने आई। उसने सोचा कि कीमत घटाकर लड़ने का कोई फायदा नहीं। उसने डिसाइड किया कि कंपटीशन को ही खत्म कर देगा और उसने यह किया एक मेथड से जो आज भी हर बड़ी कंपनी की फाउंडेशन है। वर्टिकल इंटीग्रेशन। इसे आसान भाषा में समझो। इसका मतलब है कि जो भी चीजें तुम्हारा बिजनेस चलाने के लिए चाहिए वो सब खुद बना लो या खरीद लो। किसी और पर निर्भर मत रहो। एक उदाहरण लो।
मान लो तुम चाय बेचते हो। अभी तुम दूध डेयरी से खरीदते हो। चीनी किराने वाले से, चाय पत्ती होलसेलर से और कप प्लास्टिक वाले से। हर कोई अपना प्रॉफिट कमा रहा है तुमसे। अब सोचो अगर तुम खुद डेयरी खोल लो, खुद चीनी का कारखाना लगा लो, खुद चाय पत्ती उगाओ और कब भी खुद बनाओ तो बीच के सारे लोग हट गए। उनका प्रॉफिट अब तुम्हारा हो गया। यही रॉकफेलर ने किया ऑयल का बिजनेस। बाकी रिफाइनरीज सिर्फ एक काम करती थी। कच्चा तेल खरीदो, साफ करो और आगे बेच दो। बस। बट रॉकफेलर ने क्या किया? उसने
तेल रखने के पीपे यानी बैरल्स बनाने वाली फैक्ट्रीज खरीद ली। पहले वह 25 सेंट्स में एक पीपा खरीदता था। अब वह खुद 15 सेंट्स में बना रहा था। उसने तेल ढोने वाले टैंक वैगंस खरीद लिए। उसने अपने गोडाउंस यानी वेयर हाउसेस बना लिए। उसने सीधे दुकानदारों तक पहुंचने का अपना नेटवर्क बना लिया। हर वो काम जो पहले कोई और करता था और उसमें पैसा कमाता था। रॉकर फेलर ने खुद करना शुरू कर दिया। अब बीच का सारा मुनाफा उसका था। इससे उसे बहुत बड़ा फायदा मिला। उसकी लागत सबसे कम थी और उसने एक और चाल
चली। उसने रेल रोड्स यानी रेल कंपनियों के [संगीत] साथ गुप्त सौदे किए। यह सौदे ऐसे थे कि रेल रोड कंपनीज रॉकफेलर का माल ढोने के बाद उसे पैसे वापस कर देती थी। मतलब रॉकफेलर को ढुलाई मुफ्त में पड़ती थी और उसके कंपेटिटर्स को उनसे पूरा किराया वसूला जाता था। कभी-कभी तो ज्यादा भी। यह सिर्फ समझदारी नहीं थी। यह शिकारी का तरीका था। रॉकरफेलर अपना केरोसिन इतना सस्ता बेच सकता था कि कंपेटर्स को हर बिक्री पर नुकसान हो और वो खुद फिर भी फायदे में रहे। यही उसने किया। 1870 में रॉकफेलर ने स्टैंडर्ड ऑयल कंपनी ऑफ
Ohao नाम की एक कंपनी बनाई और उसकी यह रिफाइनरी अब क्लीवलैंड शहर में सबसे बड़ी थी। लेकिन पूरे अमेरिका में अभी भी वो सिर्फ 4% ऑयल बिजनेस कंट्रोल करता था। हर 100 में से सिर्फ चार पीपे उसके थे और यह रॉकफेलर के लिए काफी नहीं था। तो रॉकफेलर ने अपनी स्ट्रेटजी का दूसरा फेज ल्च किया। हॉरिजॉन्टल इंटीग्रेशन। अगर वर्टिकल इंटीग्रेशन है पूरी सप्लाई चेन को कंट्रोल करना तो हॉरिजॉन्टल इंटीग्रेशन है हर कंपेटिटर को खरीदना या खत्म करना। 1872 में रॉकफेलर ने वो किया जिसे हिस्टोरियंस क्लीवलैंड मैसिका कहते हैं। क्लीवलैंड का कत्लेआम। 3 महीने में रॉकरफेलर
क्लीवलैंड की हर रिफाइनरी के मालिक से मिला। उसने ऑफर दिया अपनी रिफाइनरी मुझे बेच दो। अगर वह मान गए तो रॉकरफेलर ने फेयर प्राइस दिया। कई बार उन्हें मैनेजर बनाकर रख भी लिया। लेकिन अगर उन्होंने मना किया तो रॉकरफेलर ने प्राइस वॉर शुरू कर दी। वो केरोसिन की कीमत इतनी गिरा देता कि कॉस्ट से भी नीचे आ जाए। उसके कंपेटिटर्स जो उतने सस्ते में प्रोड्यूस नहीं कर सकते थे हर बिक्री पर पैसा गवाते। उनके पास दो रास्ते थे। रॉकफेलर को बेच दो या दिवालिया हो जाओ। ज्यादातर ने बेच दिया। कुछ ने लड़ने की कोशिश की।
सब हारे। 1872 के अंत तक रॉकफेलर ने क्लीवलैंड की 26 में से 25 रिफाइनरी अपने कंट्रोल में ले ली थी। 3 महीने में वो 4% से 25% पर पहुंच गया। यह था ब्लूप्रिंट। पहले ऑफर करो अगर मना करें तो इकोनॉमिकली डिस्ट्रॉय करो फिर मलबा खरीद लो। यह मेथड अगले 150 सालों में हर इंडस्ट्री में हर मोनोपोली ने यूज किया है और आज भी हो रहा है। लेकिन रॉकफेलर क्लीवलैंड से संतुष्ट नहीं था। उसे पूरा देश चाहिए था। पूरे 1870 में स्टैंडर्ड ऑयल कंपनी पूरे अमेरिका में फैलती गई। न्यूयॉर्क, फिलाडेल्फिया, पिट्सबर्ग, बोल्टमोर। हर शहर में वही
तरीके, वही टैक्टिक्स। रेल रोड्स के साथ गुप्त सौदे, खुद सब कुछ बनाकर सबसे कम लागत और जो अपनी रिफाइनरी बेचने को राजी नहीं, उनके खिलाफ बेरहम कीमतों की जंग। 1879 तक स्टैंडर्ड ऑयल ने अमेरिका की 90% रिफाइनिंग पर कब्जा कर लिया था। मतलब हर 100 में से 90 पीपीए तेल रॉकफेलर की कंपनी से निकलता था। यह बिजनेस नहीं था। यह मोनोपोली थी। मोनोपोली यानी एकाधिकार। जब किसी एक कंपनी या एक इंसान का किसी पूरी इंडस्ट्री पर कब्जा हो जाए। जब ग्राहक के पास कोई दूसरा विकल्प ही ना बचे। जब कंपटीशन खत्म हो जाए तो वह
मोनोपोली है। और मोनोपोली खतरनाक क्यों है? क्योंकि जब कंपटीशन नहीं तो कीमत तय करने वाला एक ही है। वो जो चाहे कीमत रखे ग्राहक क्या करेगा? जाएगा कहां? लेकिन यहीं पर रॉकफेलर की असली जीनियस सामने आई। उसे पता था कि मोनोपोलीस के दो बड़े प्रॉब्लम्स होते हैं। पहला यह गैरकानूनी है। सरकार मोनोपोली को तोड़ सकती है। दूसरा लोग मोनोपोली वाले से नफरत करते हैं और नफरत में ताकत होती है। पब्लिक रॉकफेलर से नफरत करती थी। उसे रॉबर बैरन कहा जाता था। लुटेरा अमेरिका का सबसे नफरत किया जाने वाला आदमी। रॉकफेलर को दोनों प्रॉब्लम्स का स्यूशन
चाहिए था और उसने ढूंढ लिया। लेकिन वो स्यूशन क्या था और कैसे उस सॉल्यूशन ने आज की हर बड़ी कंपनी की स्ट्रक्चर को डिफाइन किया? चलिए जानते हैं। तो अब रॉकफेलर के सामने दो प्रॉब्लम्स थे। पहला मोनोपोली इललीगल है। दूसरा पब्लिक उससे नफरत करती है। उसे दोनों का स्यूशन चाहिए था। और 1882 में उसके लॉयर्स ने कुछ ऐसा क्रिएट किया जिसने कॉर्पोरेट अमेरिका की हिस्ट्री बदल दी। उस सॉल्यूशन का नाम था द स्टैंडर्ड ऑयल ट्रस्ट। अब समझो रॉकफेलर ने क्या जुगाड़ निकाला। उस जमाने में अमेरिका में हर स्टेट यानी हर राज्य के अपने अलग कानून
थे। ओहायो राज्य की स्टैंडर्ड ऑयल कंपनी लीगली न्यूयॉर्क या कैलिफोर्निया में कोई कंपनी नहीं खरीद सकती थी। कानून इजाजत नहीं देता था। तो रॉकफेलर ने एक नया तरीका निकाला। उसने एक ट्रस्ट बनाया। ट्रस्ट क्या है? आसान भाषा में समझो। मान लो 10 लोगों ने अपनी-अपनी दुकानें एक बड़े सेठ को सौंप दी। अब वो सेठ सबकी दुकानें चलाता है। दुकानों के कागजों पर मालिक के नाम अलग-अलग हैं। लेकिन असली मालिक वो सेठ है। दुकानें उसकी मुट्ठी में हैं। रॉकफेलर ने यही किया। उसने अपनी सारी अलग-अलग कंपनियों के शेयर्स एक ट्रस्ट में डाल दिए। ट्रस्ट को कंट्रोल
करने वाले 41 लोग थे और सब रॉकफेलर के अपने आदमी थे। और सबसे बड़ा हिस्सा खुद रॉकफेलर का। कागजों पर 34 अलग-अलग कंपनियां थी। लेकिन असल में मालिक एक ही था। यह अमेरिका की हिस्ट्री का पहला बड़ा कॉर्पोरेट ट्रस्ट था। और इसे देखकर बाकी सब ने भी यही किया। चीनी का ट्रस्ट बना, तंबाकू का ट्रस्ट बना, स्टील का ट्रस्ट बना। और सबसे बड़ी बात इसी ट्रस्ट से आज की होल्डिंग कंपनी का जन्म हुआ। होल्डिंग कंपनी मतलब एक ऐसी कंपनी जो खुद कुछ नहीं बनाती। बस दूसरी कंपनियों की मालिक होती है। आज इसके उदाहरण देखो। अल्फाबेट
नाम की कंपनी है। वो खुद कुछ नहीं बनाती लेकिन Google उसका है, YouTube उसका है और भी कई कंपनियां उसकी हैं। मेटा नाम की कंपनी है। वो खुद कुछ नहीं बनाती लेकिन Facebook उसका है, Instagram उसका है, WhatsApp उसका है। इंडिया में Reliance Industries के नीचे Jio है, Reliance Ritel है, Reliance पेट्रोलियम है, Jio सिनेमा है, N 18 है। Tata S के नीचे TCS है, Tata Motors है, Tata Steel है, Titan है, Taj होटल्स है। अडानी ग्रुप के नीचे पोर्ट्स हैं, एयरपोर्ट्स हैं, बिजली कंपनियां हैं, सीमेंट है, मीडिया है। यह सब रॉकी फेलर के उसी
1882 वाले ट्रस्ट की औलादें हैं। उसी तरीके की नकल। 1882 में जो स्ट्रक्चर बना वो आज भी चल रहा है। 1904 तक स्टैंडर्ड ऑयल ने अमेरिका की 91% ऑयल रिफाइनिंग और 85% बिक्री पर कब्जा कर लिया था। रॉकी फेलर दुनिया का सबसे अमीर आदमी था। उसकी नेटवर्थ थी $900 मिलियन। आज के हिसाब से 400 बिलियन। लेकिन यह सुनकर तुम्हें एक सवाल आना चाहिए। अगर रॉकेफेलर इतना पावरफुल था तो इंडिया में ऐसा कौन था? किसने यही प्लेबुक इंडिया में यूज किया? जवाब है धीरूभाई अंबानी। इंडिया का रॉकेफेलर। 1958 एक 26 साल का लड़का यमेन के अडेेन
शहर में एक गैस स्टेशन पर काम करता है। पेट्रोल भरता है। शाम को हिसाब किताब करता है। महीने के ₹300 कमाता है। उसका नाम है धीरज लाल हीराचंद अंबानी धीरू भाई। 1966 वही लड़का बॉम्बे में एक छोटी सी ट्रेडिंग कंपनी चला रहा है। Reliance कमर्शियल कॉरपोरेशन नाम की। क्या करती थी? मसाले और कपड़े बाहर के देशों से मंगाना और इंडिया में बेचना। बस यही धंधा। 1977 वही आदमी Reliance Industries को स्टॉक मार्केट में लिस्ट करवाता है। 58,000 से ज्यादा शेयर होल्डर्स इंडिया की सबसे बड़ी आईपीओ। 2002 जब धीरूभाई मरते हैं, Reliance इंडिया की सबसे बड़ी
प्राइवेट कंपनी है। और उनके दोनों बेटे मुकेश और अनिल कंबाइंड वर्थ में बिलियंस में हैं। यह फेयरी टेल लगती है। गैस स्टेशन अटेंडेंट से इंडिया के सबसे अमीर आदमी तक। लेकिन मेथड क्या था? रॉक फेलर का मेथड देखो कैसे धीरूभाई ने क्या किया वही रॉक फेलर वाला खेल शुरू वर्टिकल इंटीग्रेशन याद है ना हर स्टेप खुद कंट्रोल करना धीरूभाई ने कपड़ों से शुरुआत की फिर सोचा कपड़े बनाने के लिए धागा चाहिए धागे के लिए पेट्रोकेमिकल्स यानी केमिकल्स चाहिए जो पेट्रोलियम से बनते हैं। तो पेट्रो केमिकल्स का कारखाना लगा लिया। फिर सोचा पेट्रो केमिकल्स के लिए
तेल साफ करने की रिफाइनरी चाहिए। तो रिफाइनरी लगा ली। फिर सोचा रिफाइनरी के लिए क्रूड ऑयल यानी कच्चा तेल चाहिए। तो तेल और गैस खोजने का काम भी शुरू कर दिया। अगर मॉडर्न लैंग्वेज में कहूं टेक्सटाइल्स से शुरू किया। फिर पेट्रोकेमिकल्स में गए जो टेक्सटाइल्स का रॉ मटेरियल है। फिर पेट्रोलियम रिफाइनिंग में गए जो पेट्रोकेमिकल्स का रॉ मटेरियल है। फिर ऑयल और गैस एक्सप्लोरेशन में गए जो रिफाइनिंग का रॉ मटेरियल है। देखा हर कदम पर एक कदम पीछे गए। जहां-जहां पहले किसी और का मुनाफा था, वह सब Reliance ने अपने अंदर ले लिया। आज Reliance
की जामनगर रिफाइनरी दुनिया की सबसे बड़ी रिफाइनरी है। वो कच्चा तेल खरीदते हैं, साफ करते हैं, केमिकल्स बनाते हैं, प्लास्टिक्स बनाते हैं और Reliance रिटेल के दुकानों से सीधे तुम्हें बेचते हैं। बीच में कोई नहीं। सारा मुनाफा उनका। सप्लाई चेन के हर स्टेप पर Reliance है। यह रॉक फेलर का तरीका है 100% और हॉरिजॉन्टल कंसोलिडेशन भी देखो। याद है रॉकफेलर ने कंपिटिटर्स को कैसे खत्म किया था? Reliance ने भी वही किया। कपड़ों में बॉम्बे डाइंग से जो लड़ाई हुई वो आज भी याद की जाती है। टेलीकॉम में Jio ने पूरी इंडस्ट्री को समेट दिया। रिटेल
में फ्यूचर ग्रुप को खरीद लिया। क्लीवैंड मैसिकर याद है? 1872 में रॉकफेलर ने 26 में से 25 रिफाइनरीज अपनी कर ली। 2016 में Jio ने टेलीकॉम में वही किया। फ्री डाटा, फ्री कॉल्स दिए। कंपिटिटर्स या तो आपस में जुड़ गए या मर गए। और एक चीज और धीरूभाई का एक फेमस बोल था अगर सिस्टम में कोई दिक्कत है तो सिस्टम से लड़ो मत। सिस्टम को ही बदल डालो। इसे कहते हैं रेगुलेटरी कैप्चर यानी जो नियम बनाने वाले हैं उन्हीं को अपने पक्ष में कर लो। नियम तोड़ने की जरूरत नहीं। नियम ही अपने हिसाब से बनवा
लो। रॉकफेलर ने भी यही किया था। रेल रोड के नियम उसने अपने फायदे के लिए बनवाए थे। धीरूभाई इंडिया के रॉकफेलर थे। तरीका वही था, पैमाना अलग था। लेकिन खेल, शब्द दर शब्द एक जैसा। और यह कोई बुराई नहीं कर रहा मैं। यह बस ऑब्जरवेशन है। यह रिकॉग्निशन है कि बिजनेस में जो तरीका काम करता है, वह 150 साल पहले भी काम करता था, आज [संगीत] भी करता है। अब वापस चलते हैं अमेरिका 191। रॉकफेलर की दूसरी प्रॉब्लम पर उसकी रेपुटेशन। अब पब्लिक रॉकफेलर से नफरत कर रही थी। अखबार वाले उसकी पोल खोल रहे थे।
आईडा टारबेल नाम की एक महिला पत्रकार ने पूरी किताब लिख डाली स्टैंडर्ड ऑयल की कहानी। उसने रॉकरफेलर की हर गंदी चाल बाहर निकाल दी। रेल रोड्स के साथ छुपे हुए सौदे, कीमतें गिराकर कंपिटिटर्स को मारना सब कुछ। लोगों में गुस्सा भयंकर था। अमेरिका की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि स्टैंडर्ड ऑयल एक गैरकानूनी मोनोपोली है। इसे तोड़ना होगा 34 अलग-अलग कंपनियों में। तुम सोचोगे यह रॉकरफेलर की हार थी। उसका साम्राज्य टूट गया। खेल खत्म। लेकिन यहां सबसे बड़ा ट्विस्ट आता है। जब स्टैंडर्ड ऑयल टूटी तो रॉकफेलर के पास अभी भी सारी 34
कंपनियों में हिस्सेदारी थी। कंपनी टूटी लेकिन मालिक वही रहा। स्टैंडर्ड ऑयल ऑफ न्यू जर्सी नाम बदलकर एग्जॉन बन गई। स्टैंडर्ड ऑयल ऑफ न्यूयॉर्क बनी मोबिल। स्टैंडर्ड ऑयल ऑफ कैलिफोर्निया बनी शेवरॉन। स्टैंडर्ड ऑयल ऑफ इंडियाना बनी एमोको। स्टैंडर्ड ऑयल ऑफ ओहायो को बाद में बीपी ने खरीद लिया। अगर ध्यान दो तो यह सब नाम आज भी तुम पेट्रोल पंप्स पर देखतेगे। अब समझो पैसे का खेल। ब्रेकअप से पहले यानी टूटने से पहले स्टैंडर्ड ऑयल कंपनी का एक शेयर $660 का था। टूटने के बाद रॉकर फेलर के पास अब 34 कंपनियों के शेयर्स थे। और इन सबकी
मिलीजुली कीमत $900 प्रति शेयर से ज्यादा। मतलब रॉकर फेलर की दौलत टूटने से कम नहीं हुई। उल्टा बढ़ गई। वह टूटने के बाद और अमीर हो गया। कैसे? क्योंकि जब एक बड़ी मोनोपोली को 34 टुकड़ों में तोड़ा जाता है, लेकिन हर टुकड़ा अपने इलाके में अभी भी सबसे बड़ा है। तो तुमने मोनोपोली नहीं तोड़ी। तुमने बस उसके 34 टुकड़े कर दिए। हर टुकड़ा अपनी जगह राजा और आज 100 साल बाद। उन 34 कंपनियों में से ज्यादातर वापस आपस में जुड़ चुकी हैं। 1999 में एग्जॉन और मोबिल फिर से एक हो गई। एग्जॉन मोबिल। शेवरॉन ने
कई पुरानी स्टैंडर्ड ऑयल कंपनियां खरीद ली। बीपी ने एमो को खरीद ली। जो मोनोपोली 1911 में तोड़ी गई थी वो 100 साल में चुपचाप वापस जुड़ गई है। आज एग्जॉन मोबिल, शेवरon और बीपी यह तीन कंपनियां मिलकर वही है जो स्टैंडर्ड ऑयल थी। बस नाम बदल गए। सिस्टम ने खुद को तोड़ा कानून से बचने के लिए। फिर धीरे-धीरे बिना शोर मचाए खुद को वापस जोड़ लिया। लेकिन स्टैंडर्ड ऑयल रॉकरफेलर की सबसे बड़ी विरासत नहीं है। असली विरासत है वह तरीका जो उसने बनाया। वह सिस्टम, वो खेल, मेथड्स, स्ट्रक्चर्स, प्लेबुक। और उस प्लेबुक का सबसे क्लेवर
चैप्टर है फिलेंथ्रोफी यानी दान धर्म। 1913 में रॉकफेलर ने एक फाउंडेशन बनाया, रॉकफेलर फाउंडेशन। इसमें [संगीत] उसने 250 मिलियन डॉलर्स दान दिए। आज के हिसाब से $00 करोड़ से ज्यादा। इस फाउंडेशन ने मेडिकल रिसर्च यानी बीमारियों पर शोध के लिए पैसे दिए। स्कूल्स और कॉलेजेस को पैसे दिए। लोगों की सेहत के लिए पैसे दिए। ऊपर से देखो तो लगता है यह दान पुण्य है। रॉकफेलर अपना पैसा समाज को वापस दे रहा है। लेकिन गहराई में देखो। इस फाउंडेशन की वजह से रॉकफेलर को टैक्सेस नहीं देने पड़े। जो पैसा सरकार को जाता वो फाउंडेशन में चला
गया और फाउंडेशन पर कंट्रोल किसका था? रॉकफेलर का। फाउंडेशन से उसने तय किया कि कौन सी यूनिवर्सिटीज को पैसे मिलेंगे। मतलब उसने तय किया कि क्या पढ़ाया जाएगा। किस पर रिसर्च होगी। जिस आदमी ने हजारों लोगों को बर्बाद किया था वो अब दानवीर बन गया। अमेरिका का सबसे नफरत किया जाने वाला आदमी अब समाजसेवी कहलाने लगा। रॉकफेला फाउंडेशन ने अमेरिका की मेडिकल एजुकेशन यानी डॉक्टरों की पढ़ाई को शेप किया। जॉन्स हॉपकिंस, यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो जैसे बड़े-बड़े मेडिकल कॉलेजेस को पैसे दिए। इसने वो सिस्टम बनाया जिसमें दवाइयां बेचने वाली कंपनियों का फायदा हो। यह कोई षड्यंत्र
नहीं है। यह डॉक्यूमेंटेड हिस्ट्री है। और मजेदार बात स्टैंडर्ड ऑयल की केमिकल डिवीजंस यानी केमिकल्स बनाने वाले हिस्सों से ही बाद में कई फार्मास्यूटिकल कंपनीज़ यानी दवाई कंपनियां बनी। तो फाउंडेशन ने वो सिस्टम बनाया जिससे रॉकफेलर की ही कंपनियों को फायदा हुआ। आज हर बड़ा अरबपति हर बिलियनेियर यही प्लेबुक यूज करता है। बिल गेट्स ने बिल एंड मिलिंडा गेट्स फाउंडेशन बनाया 5 लाख करोड़ से ज्यादा का। यह दुनिया भर में हेल्थ के लिए काम करता है। WHO यानी वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन की पॉलिसीज पर असर डालता है। देशों की सरकारों को इन्फ्लुएंस करता है। मार्क ज़करबर्ग
ने चांद ज़करबर्ग इनिशिएटिव बनाई। वारेन बफेट ने अपना ज्यादातर पैसा गेट्स फाउंडेशन को दे दिया। इंडिया में Reliance फाउंडेशन, adानी फाउंडेशन, Tata ट्रस्ट्स जो Tata SS का मेजॉरिटी शेयर होल्डर है। यह सिर्फ दान पुण्य नहीं है। यह टैक्स बचाने का तरीका है। अपना नाम चमकाने का तरीका है। पॉलिसी यानी सरकारी नीतियों पर असर डालने का तरीका है। रॉकरफेलर ने यह मॉडर बनाया। आज के अरबपतियों ने इसे और चमका दिया। रॉकरफेलोर फैमिली आज भी एकिस्ट करती है। आज भी इन्फ्लुएंशियल है। डेविड रॉकरफेलर जॉन डी का पोथा 2017 में 101 साल की उम्र में मरा। वो चेस
मैनहटन बैंक का चेयरमैन था। ट्राईटरल कमीशन का फाउंडर था। 50 साल तक ग्लोबल फाइनेंस में सबसे पावरफुल मैन में से एक था। फैमिली की वेल्थ जो एस्टेटेड 11 बिलियन डॉल है। सैकड़ों ट्रस्ट्स और फाउंडेशंस में स्प्रेड है। रॉकफेला ब्रदर्स फंड, रॉकफेला फैमिली फंड, डेविड रॉकफेला फंड यह आज भी पॉलिसी शेप करते हैं। रिसर्च फंड करते हैं। पॉलिटिक्स इन्फ्लुएंस करते हैं। 150 साल हो गए जॉन डी ने स्टैंडर्ड ऑयल शुरू किया था और उसकी फैमिली आज भी उसी सिस्टम से पावर एक्सरसाइज कर रही है। लेकिन फैमिली की बात छोड़ो। असली बात यह है कि रॉकफेलर का
सिस्टम आज भी हर इंडस्ट्री में हर बड़ी कंपनी में तुम्हारी रोजमर्रा की जिंदगी में काम कर रहा है। Amazon में, Google में, फार्मा में, बैंक्स में, Reliance में, अडानी में। और अगले हिस्से में मैं तुम्हें एग्जैक्टली दिखाऊंगा कि कैसे यह सिस्टम रोज तुमसे वेल्थ एक्सट्रैक्ट कर रहा है। कैसे तुम्हारी हर चॉइस असल में कोई चॉइस नहीं है। और सबसे इंपॉर्टेंट तुम क्या कर सकते हो इस सिस्टम को समझकर? क्योंकि सिस्टम से बाहर निकलना इंपॉसिबल है। लेकिन सिस्टम को समझना वो तुम्हारी सबसे बड़ी पावर है। अब देखते हैं कि रॉकफेलर का सिस्टम आज कैसे काम कर
रहा है। हर बड़ी कंपनी में तुम्हारी रोजमर्रा की जिंदगी में। Amazon को देखो। Amazon शुरू हुई थी एक ऑनलाइन किताबों की दुकान के रूप में। आज वह पूरी सप्लाई चेन यानी सामान बनने से लेकर तुम्हारे घर तक पहुंचने की पूरी प्रक्रिया कंट्रोल करती है। उसके अपने गोडाउंस हैं जहां सामान रखा जाता है। अपने ट्रक्स हैं जो सामान पहुंचाते हैं। अपना डिलीवरी नेटवर्क है। अपना पेमेंट सिस्टम है और सबसे बड़ी बात उसके पास एडब्ल्यूएस है। Amazon वेब सर्विसेस। ये क्या है? यह वो कंप्यूटरटर्स हैं जिन पर दूसरी कंपनियों की वेबसाइट्स चलती हैं। मतलब Amazon के कंपिटिटिटर्स
भी Amazon के ही कंप्यूटरटर्स इस्तेमाल करते हैं। इस AWS से Amazon सालाना 7.5 लाख करोड़ से ज्यादा कमाती है। यह Amazon की दुकानदारी के मुनाफे यानी रिटेल प्रॉफिट से भी ज्यादा है। रॉकफेलर ने रिफाइनरीज, रेल रोड्स और डिस्ट्रीब्यूशन कंट्रोल किया था। Amazon ने रिटेल, डिलीवरी और क्लाउड कंप्यूटिंग यानी इंटरनेट के कंप्यूटरटर्स कंट्रोल कर लिए। तरीका वही जमाना अलग। Amazon हॉरिजॉन्टल कंसोलिडेशन भी करती है। याद है रॉक फेलर कंपटिटर्स को खरीद लेता था। Amazon भी वही करती है। होल फूड्स खरीदा जो ग्रोसरीज बेचती थी। ज़पोस खरीदा जो जूते बेचती थी। ट्वच खरीदा जो गेमिंग वीडियोस दिखाता
है। रिंग खरीदा जो डोरबेल कैमरास बनाती है। एमजीएम स्टूडियोज खरीदा जो फिल्म्स बनाता है और 100 से ज्यादा कंपनियां खरीद चुकी है। और जब कोई कंपैटिट नहीं खरीद सकती तो उसके प्रोडक्ट्स की नकल करती है। Amazon पर जो छोटे दुकानदार सामान बेचते हैं उनका सेल्स डाटा Amazon के पास जाता है। Amazon देखती है कि कौन सा सामान बिक रहा है। फिर वही सामान Amazon बेसिक्स के नाम से खुद बनाती है और सर्च में अपने सामान को सबसे ऊपर दिखाती है। यह रॉक फेलर की प्राइस वॉर का आज का वर्जन है। कानूनी है। कोई रोकने वाला
नहीं और बेहद असरदार। लीगल, बेयरली रेगुलेटेड और डेवस्टेटिंगली इफेक्टिव। Google को देखो। अल्फाबेट कंपनी है। यह खुद कुछ नहीं बनाती। लेकिन इसके अंदर कितनी कंपनी है वो सुनो। Google इसका है, YouTube इसका है, VMO इसकी है, डीप माइंड इसकी है, Verlली इसकी है और दर्जनों छोटी कंपनियां हैं। यह वही स्ट्रक्चर है जो रॉक फेलर के ट्रस्ट का था। एक बड़ी छतरी कंपनी जो बाकी सब कंपनियों को कंट्रोल करती है। इस स्ट्रक्चर का फायदा अगर किसी एक कंपनी पर मुसीबत आए तो बाकी बच जाए। टैक्स बचाने में आसानी और सरकार अगर तोड़ना चाहे तो उलझन हो
जाए कि किसे तोड़े। अब एक बात सोचो। Google का इंटरनेट सर्च में कितना कब्जा है? 92% हर 100 में से 92 लोग Google पर ही सर्च करते हैं। यह तो स्टैंडर्ड ऑइल के 91% से भी ज्यादा है। लेकिन Google को मोनोपोली नहीं माना जाता। क्यों? क्योंकि यह फ्री है। तुम पैसे नहीं देते। लेकिन रुको। तुम पैसे नहीं देते तो क्या देते हो? डाटा देते हो। तुम्हारी जानकारी देते हो। तुम क्या सर्च करते हो? कहां जाते हो? क्या खरीदते हो? किससे बात करते हो? यह सब Google के पास है और यह डाटा बेचकर Google पैसे कमाता
है। मतलब तुम पे तो कर रहे हो बस रुपयों में नहीं अपनी जानकारी में। रॉकफेलर होता तो खुश होता यह देखकर एक मोनोपोली इतनी पूरी, इतनी कंप्लीट कि लोगों को पता ही नहीं चलता कि वो कीमत चुका रहे हैं। फार्मासटिकल कंपनीज़ यानी दवाई बनाने वाली कंपनियों को देखो। वो रॉकोफेलर का वही पुराना तरीका इस्तेमाल करती हैं। रेगुलेटरी कैप्चर। याद है? नियम बनाने वालों को अपने पक्ष में कर लो। रॉकरफेलर सिर्फ बाजार में नहीं लड़ता था। वह नियम ही अपने हिसाब से बनवाता था। उसने रेल रोड्स के नियम अपने फायदे के बनवाए। उसने केरोसिन के ऐसे
स्टैंडर्ड्स बनवाए जो उसकी रिफाइनरी तो पूरे करें लेकिन छोटे कंपिटिटर्स ना कर सकें। आज फार्मासटिकल कंपनीज़ यानी दवाई कंपनियां वही करती हैं। अमेरिका में एफडीए है जो दवाइयों को अप्रूव करती है। यह कंपनियां एफडीए को पैसे देती हैं यूजर फीस के नाम पर। यह पेटेंट यानी एकाधिकार की अवधि बढ़वाने के लिए सरकार पर दबाव डालती हैं। और सबसे बड़ी बात जो नियम इन कंपनियों पर लागू होते हैं वो नियम यह खुद लिखवाती हैं। यानी वह खुद [संगीत] वो रेगुलेशंस लिखती हैं जिनसे सपोजिडली उन्हें रेगुलेट किया जाता है। फाइजर, जॉनसन एंड जॉनसन, मर्क इन सब ने
रॉकफेलर से सीखा है। जो नियम बनाता है उसे काबू करो। फिर बाजार अपने आप तुम्हारा है। बैंक्स को देखो। जेपी मॉ्गन चेस एक होल्डिंग कंपनी है। इसके नीचे चेस बैंक है जो आम लोगों का बैंक है। जेपी मॉ्गन इन्वेस्टमेंट बैंक है जो बड़े-बड़े सौदे करता है और कई छोटी कंपनियां हैं। बैंक ऑफ अमेरिका, सिटी ग्रुप, वेल्स फार्गो सब ऐसी ही होल्डिंग कंपनीज़ हैं। 2008 में जब पूरी दुनिया में बैंक्स की वजह से मंदी आई तो अमेरिका में डॉट फ्रैंक नाम का कानून बना बैंक्स पर लगाम लगाने के लिए। लेकिन होल्डिंग कंपनी स्ट्रक्चर की वजह से
यह ऑलमोस्ट नामुमकिन [संगीत] हो गया। समस्या यह थी किस पर नियम लगाओ? मुख्य कंपनी पर या नीचे की कंपनियों पर? सब अलग-अलग है कागजों पर। लेकिन मालिक एक ही है। रॉक फेलर ने यह प्रॉब्लम 1882 में सॉल्व किया था जब उसने ट्रस्ट बनाया। बैंक्स ने 100 साल बाद वही स्यूशन कॉपी कर लिया। अब इंडिया वापस आते हैं। 2016 सेप्टेंबर की बात है। मुकेश अंबानी स्टेज पर आए। Reliance Industries की एजीएम थी। उन्होंने अनाउंस किया Jio फ्री वॉइस कॉल्स लाइफ टाइम फ्री, डाटा फ्री, 4GB पर डे अनलिमिटेड। पूरा देश पागल हो गया। सिम कार्ड्स के लिए
लाइनें लग गई। लोग रात भर क्यूज में खड़े रहे। सोशल मीडिया पर हर जगह एक ही बात। फ्री डाटा, फ्री कॉल्स, अंबानी जी रक्स। तुमने भी शायद Jio लिया होगा। तुम्हें भी लगा होगा कि यार फाइनली कोई तो आया जो कॉमन मैन के बारे में सोच रहा है। लेकिन रुको। सोचो एक कंपनी अरबों रूपीस का इंफ्रास्ट्रक्चर बनाती है, टावर्स लगाती है, फाइबर बिछाती है, स्पेक्ट्रम खरीदती है और फिर सब कुछ फ्री दे देती है। बिजनेस में कुछ भी फ्री नहीं होता। तो फ्री का बिल किसने पे किया? कॉम्पटीशन ने। Jio लॉन्च के 2 साल बाद
देखो क्या हुआ? Airtel बैंककरप्ट Reliance Comunication बैंककरप्ट Tata Doco Airtel में मर्ज TNor Airtel में मर्ज Vodafone और Idea एक दूसरे में मर्ज होना पड़ा सिर्फ सर्वाइव करने के लिए और वो भी आज हजारों करोड़ के लॉस में है। 2016 में इंडिया में 10 प्लस टेलीकॉम ऑपरेटर्स थे। 2020 तक सिर्फ तीन बचे Jio, Airtel और मरता हुआ Vodafone Idea। और इन तीनों में से सबसे पावरफुल Jio। वो क्लेवलैंड मैसकर याद है? अब यह था 2016 एडिशन इंडियन एडिशन। रॉकफेलर ने 1872 में केरोसिन की प्राइसेस गिराकर कंपिटिटर्स को मारा था। Jio ने 2016 में डाटा और
कॉल्स फ्री करके कंपेटिटर्स को मारा। मेथड सेम, स्केल डिफरेंट, रिजल्ट सेम, मार्केट का कंसोलिडेशन एक डोमिनेंट प्लेयर के हाथ में। लेकिन Jio [संगीत] की स्टोरी यहीं नहीं रुकती। Jio सिर्फ टेलीकॉम नहीं है। Jio वर्टिकल इंटीग्रेशन है Reliance स्टाइल में। Jio तुम्हें सिम देता है। Jio Mart तुम्हें ग्रोसरीज बेचता है। Jio सिनेमा तुम्हें मूवीस दिखाता है। Jio सावन तुम्हें म्यूजिक सुनाता है। Reliance रिटेल तुम्हें कपड़े, इलेक्ट्रॉनिक्स सब बेचता है। Reliance पेट्रोलियम तुम्हारी गाड़ी में पेट्रोल डालता है। नेटवर्क 18 तुम्हें न्यूज़ देता है। तुम सुबह उठते हो, Jio पर न्यूज़ देखते हो। ऑफिस जाते हो Reliance के
पेट्रोल पंप से पेट्रोल भरवाते हो। लंच में Jio से आर्डर करते हो। शाम को Jio सिनेमा पर आईपीएल देखते हो। रात को Jio सावन पर म्यूजिक सुनते हो। तुम्हारा पूरा दिन एक इकोसिस्टम में बीतता है। और उस इकोसिस्टम का मालिक एक फैमिली है। यह रॉक फेलर का सपना था। एक सिस्टम जिसमें कंज्यूमर का हर इंटरेक्शन उसी कंपनी से हो। ऑयल निकालने से लेकर लैंप में जलने तक। और Reliance ने वो सपना इंडिया में पूरा कर दिया है। अब सोचो तुम्हारी जिंदगी में कितना पैसा इस सिस्टम में जाता है। पेट्रोल पर तुम साल में कितना खर्च
करते हो? 500 ₹1 लाख वो Reliance इंडियन ऑयल या बीपी जाता है। सब रॉक फेलर प्लेबुक यूज़ करते हैं। Amazon और Flipkart पर कितना खर्च करते हो? ₹00 ₹00 वर्टिकल इंटीग्रेशन और हॉरिजॉन्टल कंसोलिडेशन। फोन और डाटा पर कितना खर्च करते हो? ₹3000 ₹5000 Jio, Airtel या V कंसोलिडेटेड मार्केट मेडिसिंस पर कितना खर्च करते हो? ₹10,000 ₹00 फार्मासटिकल कंपनीज़ जो रॉक फेलर फाउंडेशन के शेप्ड सिस्टम में ऑपरेट करती हैं। बैंक्स को ईएमआई इंटरेस्ट फीस में कितना देते हो? ₹00 ₹1 लाख। होल्डिंग कंपनी स्ट्रक्चर्स जो रॉक फेलर ने इन्वेंट किए हैं। साल का हिसाब लगाओ। ₹3 लाख
तुम्हारे पास से निकल कर इन कंसोलिडेटेड इंडस्ट्रीज में जा रहा है। 40 साल की वर्किंग लाइफ में 1 करोड़ से ज्यादा। और यह पैसा कहां कंसंट्रेट हो रहा है? टॉप पर। उन फैमिलीज में जो सिस्टम ओन करती हैं। तुम चॉइस सोचते हो। तुम्हारे पास चॉइस है ही नहीं। पेट्रोल नहीं खरीदोगे तो काम पर कैसे जाओगे? Amazon नहीं यूज करोगे तो कन्वीनियंस और प्राइसिंग कहां मिलेगी? Jio नहीं यूज करोगे तो Airtel यूज़ करोगे। सेम कंसोलिडेटेड मार्केट। Google नहीं यूज करोगे 92% मार्केट शेयर है उसका। अल्टरनेटिव क्या है? मेडिसिंस नहीं लोगे, हेल्थ से समझौता करोगे, बैंक्स नहीं
यूज करोगे, कैश में सैलरी लोगे। हर रास्ता वापस सिस्टम में ले जाता है। हर चॉइस एक इल्ल्युजन है। एक भ्रम है। तुम सिस्टम के अंदर हो और सिस्टम तुमसे रोज वेल्थ एक्सट्रैक्ट कर रहा है। तुम्हारी [संगीत] दौलत निकाल रहा है। यह रॉकफेलर की अल्टीमेट अचीवमेंट है। ऐसा सिस्टम जिससे एस्केप इंपॉसिबल है। बचना इंपॉसिबल है। तो अब सवाल यह है तुम क्या करो? तीन रास्ते हैं। पहला रास्ता एक्सेप्ट करो। स्वीकार कर लो। समझ लो कि बड़ी कंपनियों का कब्जा और मोनोपोली यह आज की दुनिया की सच्चाई है। इसे बदला नहीं जा सकता। जो सुविधाएं यह देती
हैं, उनका फायदा उठाओ। Amazon से खरीदो क्योंकि सस्ता और तेज मिलता है। Google यूज़ करो क्योंकि यह आसान है। एक्सेप्ट करो कि पैसा ऊपर जाएगा और अपनी जिंदगी जियो। यह सबसे आसान रास्ता है। लेकिन यह हार मान लेना है। दूसरा रास्ता लड़ो। छोटी दुकानों से खरीदो। चाहे महंगा पड़े। अल्टरनेटिव्स यूज करो चाहे उतने अच्छे ना हो। उन नेताओं को वोट करो जो बड़ी कंपनियों को तोड़ने का वादा करें। सिस्टम को कम एफिशिएंट बनाओ ताकि कब्जा कम हो। यह नोबल रास्ता है लेकिन थका देने वाला है और सच कहूं यह काम नहीं करता। सिस्टम बहुत ताकतवर
है। तीसरा रास्ता समझो और अपनी जगह बनाओ। अगर तुम सिस्टम से बाहर नहीं निकल सकते तो उससे फायदा उठाओ। जो कंपनियां बाजार पर राज करती हैं, मार्केट डोमिनेट करती हैं, उनके शेयर्स खरीदो। Reliance, HDFC Bank, TCS, Infosys, Amazon, Google, Microsoft, Apple अगर सिस्टम सबसे पैसा निकालकर इन कंपनियों में जमा कर रहा है तो इन कंपनियों के तुम भी मालिक बन जाओ। रॉकर फेलर ने यही किया था। वो स्टैंडर्ड ऑयल का मालिक था। जबकि बाकी सब उसके प्रोडक्ट्स खरीदते थे। वो सिस्टम से पैसा निकलवाने की जगह सिस्टम से पैसा कमा रहा था। तुम भी यही कर
सकते हो। उसके लेवल पर नहीं लेकिन अपने हिसाब से एक्सट्रेक्टर्स को ओन करो। एक्सट्रैक्टेड मत बनो। यानी जो निचोड़ने वाले हैं उनके मालिक बनो। निचोड़े जाने वाले मत बनो। यह कोई इन्वेस्टमेंट एडवाइस नहीं है। मैं कोई फाइनेंसियल एडवाइजर नहीं हूं। यह बस पैटर्न देखना है। यह समझना है कि पैसा कैसे बहता है। रॉकफेलर के सिस्टम ने 150 सालों से पैसा इकट्ठा किया है ऊपर और आगे भी करता रहेगा। क्योंकि यह सिस्टम [संगीत] अब कानूनों में घुस चुका है। टैक्स के नियमों में घुस चुका है। सरकारी ढांचे में घुस चुका है। इससे लड़ना अच्छी बात है,
लेकिन थका देने वाला है। इससे भागना नामुमकिन है। इसे समझना और इसमें अपनी जगह बनाना यह समझदारी है। यह होशियारी है। जॉन डी रॉकफेलर 1937 में 97 साल की उम्र में मरा। वो इतना जिया कि उसने [संगीत] स्टैंडर्ड ऑयल को टूटते देखा, फिर से जुड़ते देखा और अपने तरीकों को हर इंडस्ट्री में फैलते देखा। उसने अपने पोतों को अमेरिका के [संगीत] सबसे ताकतवर लोगों में देखा। उसने एक सिस्टम बनाया जो उसके 100 साल बाद भी चल रहा है और हम सबके बाद भी चलता रहेगा। वो सिस्टम है वर्टिकल इंटीग्रेशन, हॉरिजॉन्टल कंसोलिडेशन, कॉर्पोरेट ट्रस्ट्स, रेगुलेटरी कैप्चर
और फिलथ्रोफिक इन्फ्लुएंस। आसान शब्दों में बोलूं तो हर स्टेप खुद कंट्रोल करना, कॉम्पिटिटर्स को खत्म करना, कंपनियों का जाल बनाना, नियम बनाने वालों को काबू करना और दान पुण्य से अपनी इमेज चमकाना। यह स्टैंडर्ड ऑयल से शुरू हुआ। स्टील, रेल रोड्स, शुगर, टोबैको में फैला। फिर ऑटोमोबाइल्स, इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मासटिकल्स, टेक्नोलॉजी में। अब यह इकोनमी के हर सेक्टर को डोमिनेट करता है और तुम इससे एस्केप नहीं कर सकते। तुम इसे सिर्फ समझ सकते हो। रॉक फेलर ने कहा था कंपटीशन पाप है। ज्यादातर लोग सोचते हैं यह लालच की बात है। लेकिन रॉक फेलर का मतलब धार्मिक था।
उसका मानना था कि कंपटीशन यानी आपसी लड़ाई बेकार है। इसमें एक ही काम दो लोग करते हैं। मेहनत बर्बाद होती है, पैसा बर्बाद होता है। उसका मानना था कि कंसोलिडेशन यानी सब कुछ एक हाथ में आना सही है। इससे काम जल्दी होता है, सस्ता होता है, ग्राहक को कम कीमत मिलती है। उसके हिसाब से मोनोपोली चोरी नहीं है। मोनोपोली तो वह मंजिल है जहां हर एफिशिएंट बाजार पहुंचता है। आखिर में सबसे अच्छा जीतता है और बाकी हट जाते हैं। यह नेचुरल है। यह रॉकफिलर की सोच थी और उसने पूरा सिस्टम बनाया इस सोच को लागू
करने के लिए। 150 साल बाद हम उसी सिस्टम में जी रहे हैं। लेकिन अब तुम्हारे पास वो है जो ज्यादातर लोगों के पास नहीं है। जागरूकता समझ। तुम जानते हो कि सिस्टम कैसे काम करता है। तुम देख सकते हो कि पैसा कहां से निकलता है और कहां जमा होता है। तुम समझते हो कि तुम्हारे सामने जो चॉइस दिखती है वो असल में चॉइस नहीं है। यह जानकारी ताकत है। अब तुम वो गलतियां नहीं करोगे जो बाकी करते हैं। तुम सिस्टम के खिलाफ लड़कर नहीं थकोगे। तुम सिस्टम को अनदेखा करके लुटते में ही रहोगे। तुम सिस्टम
को समझोगे और उसके हिसाब से अपनी जगह बनाओगे। यही असली ताकत है खेल को देख पाना। और एक बार जब तुम देख लेते हो तो तुम फिर से अनदेखा नहीं कर सकते। जॉन डी रॉकफेलर ने एक सिस्टम बनाया जिससे तुम एस्केप नहीं कर सकते लेकिन आज से तुम उसे देख सकते हो और देखना देखना सब कुछ बदल देता है। अगर इस वीडियो ने तुम्हें वो दिखाया जो तुमने पहले कभी नहीं देखा था। अगर अब तुम समझते हो कि तुम्हारी जिंदगी को कंट्रोल करने वाले कॉर्पोरेट स्ट्रक्चर्स एक आदमी ने 150 साल पहले बनाए थे तो अब
नीचे कमेंट करो। जो भी विचार, थॉट्स तुम्हारे मन में आए हो, उन्हें नीचे कमेंट्स में जरूर शेयर करो और सब्सक्राइब करो क्योंकि यह सिर्फ शुरुआत है। सिस्टम को समझना पहला स्टेप है। उसमें पोजीशन लेना अगला। चलो शुरू करते हैं।