एक सवाल सिर्फ एक सवाल से शुरू करते हैं आज। अगर कोई तुमसे पूछे [संगीत] कितने दोस्त हैं तुम्हारे और तुम्हारा जवाब हो कोई नहीं तो दुनिया क्या सोचेगी कि कुछ गलत है तुम्हारे साथ कि तुम अजीब हो कि तुम लोनली हो कि तुम फेल हो गए हो। लेकिन क्या होगा अगर मैं तुमसे कहूं कि जिन लोगों के जीरो फ्रेंड्स होते हैं और जो इसकी परवाह भी नहीं करते [संगीत] वह एक्चुअली दुनिया के सबसे रेयर किस्म के लोग होते हैं। रुको पूरी बात सुनो क्योंकि आज जो मैं बताने वाला हूं वो तुमने पहले कहीं नहीं सुना
होगा। हम बचपन से एक बात सीखते आए हैं। दोस्त बनाओ। जितने ज्यादा दोस्त उतने ज्यादा खुश। जो अकेला है वह दुखी है। [संगीत] जो अकेला है वह कमजोर है। यही सिखाया गया हमें स्कूल में, घर में, समाज में। [संगीत] लेकिन एक सवाल उठता है अगर अकेलापन इतना बुरा है तो फिर इतिहास के सबसे महान [संगीत] लोग न्यूटन, निकोला, टेस्ला, फ्रांस कैफका, एमली डिकिंसन [संगीत] यह सब अकेले क्यों थे? इनके दोस्त क्यों नहीं थे? और इन्होंने इसकी परवाह क्यों नहीं की? [संगीत] क्या यह सब फेल थे? या क्या इन्हें कुछ ऐसा पता था जो बाकी दुनिया
को नहीं पता? आज हम उसी राज को खोलेंगे। पहले एक जरूरी बात समझते हैं। अकेलापन [संगीत] दो तरह का होता है। दो बिल्कुल अलग-अलग चीजें। पहला है लवलीनेस यानी वह अकेलापन जो दर्द देता है जो अंदर से खाली करता है। जिसमें तुम दूसरों को चाहते हो लेकिन कोई नहीं आता। यह वीकनेस नहीं है। यह एक वंड है और इसे हील करने की जरूरत है। लेकिन दूसरा है सॉलिट्यूड। यह बिल्कुल अलग है। यह वह स्टेट है जहां तुम अकेले हो। लेकिन तुम खुद से भरे हुए हो। जहां शांति है, जहां क्लेरिटी है, जहां कोई शोर नहीं
है, और जिन लोगों के जीरो फ्रेंड्स [संगीत] होते हैं और जो परवाह नहीं करते, वह लोनलीनेस में नहीं जीते, वो सॉलीट्यूड में जीते हैं। [संगीत] यह फर्क समझ लो क्योंकि यही सब कुछ बदल देता है। अब तीन तरह के लोग होते हैं इस दुनिया में। पहला टाइप वो जिन्हें हर वक्त भीड़ चाहिए जो अकेले एक घंटा नहीं बैठ सकते। जिनके बिना ग्रुप के, [संगीत] बिना नोटिफिकेशन के, बिना किसी की अप्रूवल के एंग्जायटी शुरू हो जाती है। यह लोग इमोशनली डिपेंडेंट होते हैं। बुरे नहीं लेकिन अभी मैच्योर नहीं हुए हैं। दूसरा टाइप वो जिन्हें कनेक्शंस तो
पसंद है, लेकिन केयरफुली [संगीत] जो कुछ लोगों को डीप में जानते हैं। क्वालिटी को क्वांटिटी से ज्यादा वैल्यू देते हैं। यह बैलेंस्ड होते हैं। और तीसरा टाइप यही वो रेयर लोग हैं जिनके प्रैक्टिकली जीरो फ्रेंड्स होते हैं। और जो इस बात से कंप्लीटली एट पीस होते हैं यह लोग स्ट्रेंज नहीं होते। यह लोग इवॉल्व्ड होते हैं। कालजुंग ने एक बात कही थी [संगीत] इंट्रोवरर्शन के बारे में। उन्होंने कहा था कुछ लोगों की एनर्जी अंदर की [संगीत] तरफ बहती है। बाहर की तरफ नहीं। और जब यह लोग अकेले होते हैं तो यह [संगीत] रिचार्ज होते हैं।
जब यह लोग भीड़ में होते हैं तो यह ड्रेन होते हैं। लेकिन यह सिर्फ इंट्रोवरर्शन की बात नहीं है। यह उससे भी डीपर [संगीत] है। साइकोलॉजी में एक कांसेप्ट है ऑटोटेलिक पर्सनालिटी यानी वो लोग जो खुद में ही अपनी दुनिया कैरी करते हैं। जिन्हें वैलिडेशन की जरूरत नहीं होती। जिनकी खुशी किसी और पर डिपेंड नहीं करती। यह लोग किसी के साथ हो या ना हो, इनकी इनर वर्ल्ड रिच होती है। इनके अंदर एक पूरी दुनिया बसी होती है थॉट्स की, आइडियाज की, ऑब्जरवेशंस की और यही उनकी सबसे बड़ी ताकत है। एक रिसर्च हुई थी यूनिवर्सिटी
ऑफ ब्रिटिश कोलंबिया में। उन्होंने पाया कि जो लोग सॉलिट्यूड में कंफर्टेबल होते हैं, उनकी क्रिएटिविटी बाकी लोगों से सिग्निफिकेंटली ज्यादा होती है। उनकी प्रॉब्लम सॉल्विंग ज्यादा शार्प होती है। उनकी इमोशनल रेगुलेशन ज्यादा स्ट्रांग होती है। क्यों? क्योंकि जब तुम अकेले होते हो और उससे डरते नहीं। तो तुम्हारा ब्रेन किसी और की बातों को प्रोसेस करने में नहीं जाता। वह तुम्हारी अपनी डेप्थ में जाता है और वहां से जो निकलता है वह एक्स्ट्राऑर्डिनरी होता है। अब [संगीत] मैं तुमसे एक बात ऑनेस्टली पूछना चाहता हूं। क्या तुम उन लोगों में से हो जिन्हें भीड़ में भी अकेलापन
लगता है जो पार्टीज में जाते हैं लेकिन किसी से एक्चुअली कनेक्ट [संगीत] नहीं हो पाते जो स्मॉल टॉक से बोर हो जाते हैं जो किसी ऐसे इंसान की तलाश में रहते [संगीत] हैं जो डीप बात कर सके। अगर हां तो तुम रेयर हो। तुम उन लोगों में हो जिन्हें दुनिया नहीं [संगीत] समझती और इसीलिए दुनिया तुम पर लेबल लगाती है। लर्नर, एंटीसशियल, एोगेंट। [संगीत] लेकिन सच यह है तुम सिंपली एक हायर फ्रीक्वेंसी पर ऑपरेट कर रहे हो। फिलॉसोफर्स ने इसे अलग-अलग नामों से जाना है। नीच ने इसे कहा था द सॉलिटरी मैन। वो इंसान जो
खुद के साथ इतना कंप्लीट है कि उसे बाहर की कन्फर्मेशंस [संगीत] की जरूरत नहीं। ब्लज़ पास्काल ने कहा था सारी इंसानी प्रॉब्लम्स की जड़ एक ही है [संगीत] कि इंसान अकेले एक कमरे में शांति से नहीं बैठ सकता। सोचो इस बात को जो लोग अकेले बैठ सकते [संगीत] हैं जो अपने अकेलेपन से नहीं भागते। जो उसमें रहते हैं उसे एक्सप्लोर करते हैं। [संगीत] वह इंसानी इवोल्यूशन के एक अलग ही लेवल पर होते हैं। और एक और बात जिन लोगों के जीरो फ्रेंड्स होते हैं वो ऑफन सबसे लॉयल होते हैं। जब वह किसी [संगीत] को चूज़
करते हैं तो फुली चूज़ करते हैं। जब वह ट्रस्ट करते हैं तो कंप्लीटली ट्रस्ट [संगीत] करते हैं। क्योंकि उन्होंने एनर्जी बचाई होती है। उन्होंने इन्वेस्ट किया होता है खुद में। और जब वह किसी को देते हैं तो वह सब कुछ देते हैं। यह कमजोरी नहीं। तो आज की बात को एक जगह लाते हैं। अगर तुम्हारे जीरो फ्रेंड्स हैं और तुम्हें इसकी परवाह नहीं तो दुनिया को तुम्हें जज करने का कोई हक नहीं। क्योंकि तुमने एक ऐसी चॉइस की है जो बहुत कम लोग कर पाते हैं। तुमने नॉइज़ से ज्यादा साइलेंस को चूज़ किया। तुमने शैलो
से ज्यादा डेप्थ को चूज़ किया। तुमने फिटिंग इन से ज्यादा बीइंग रियल को चूज़ किया। [संगीत] एंड यह बहुत बड़ी बात है। लेकिन एक वार्निंग भी है। अगर तुम अकेले हो क्योंकि तुम डरते हो। अगर तुम अकेले हो [संगीत] क्योंकि तुम्हें हर्ट किया गया है। अगर तुम अकेले हो क्योंकि तुम्हें लगता [संगीत] है कि तुम वर्दी नहीं हो तो यह सॉलिट्यूड नहीं यह एक वूंड है और इस वंड को हील करना जरूरी है। सॉलीट्यूड और आइसोलेशन में फर्क होता है। सॉलिट्यूड स्ट्रेंथ से आती है। आइसोलेशन फियर से आती है। खुद से पूछो मेरा अकेलापन शांत
है या दर्दनाक? अगर शांत है तो तुम एग्जजेक्टली वहां हो जहां तुम्हें होना चाहिए। अगर दर्दनाक है तो उस दर्द को फेस करो क्योंकि तुम उससे बड़े हो। एक आखिरी बात इतिहास के सबसे महान लोग जो अकेले थे जिन्होंने सॉलिट्यूड को चूज किया उन्होंने दुनिया को कुछ ऐसा दिया जो भीड़ में रहने वाले कभी नहीं दे सकते थे। क्योंकि जब तुम अकेले होते हो तो तुम सुनते हो खुद को अपनी आत्मा को। [संगीत] उस आवाज को जो हमेशा से कुछ कहना चाहती थी लेकिन शोर में दब जाती