कभी-कभी रात के सन्नाटे में जब पूरी दुनिया सो रही होती है और आपके हाथ में कोई काम नहीं होता तब अचानक एक सवाल दिल में उठता है। क्या मैं सच में जी रहा हूं या सिर्फ दिन काट रहा हूं? सुबह उठना, काम पर जाना, मोबाइल चलाना, खाना खाना, फिर सो जाना और अगले दिन वही सब दोबारा। धीरे-धीरे साल गुजर जाते हैं, लेकिन अंदर कहीं एक खालीपन बना रहता है। एक ऐसी बेचैनी जिसे हम शब्दों में भी नहीं समझा पाते। सब कुछ होते हुए भी कुछ कमी महसूस होती है। लोगों के बीच रहकर भी अकेलापन महसूस
होता है। हंसते हुए भी दिल थका हुआ लगता है और शायद हमारी असली समस्या यह नहीं है कि हमारे पास कम है। असली समस्या यह है कि हमने खुद से जुड़ना छोड़ दिया है। हमने दुनिया को जानने में पूरी जिंदगी लगा दी। लेकिन खुद को जानने की कभी कोशिश ही नहीं की। हम दूसरों की राय सुनते रहे लेकिन अपने दिल की आवाज सुनना भूल गए। दोस्तों स्वागत है आपका हमारे चैनल लाइफ चेंजिंग बुक्स में और आज हम बात करने वाले हैं बुक द कोरियन आर्ट ऑफ लिविंग वेल जिसे लिखा है डॉक्टर जेनेल किम ने। यह
सिर्फ एक सेल्फ हेल्प बुक नहीं है। यह किताब हमें सिखाती है कि शांति बाहर नहीं मिलती, खुशी बाहर नहीं मिलती, संतुलन बाहर नहीं मिलता। वह सब हमारे अंदर ही मौजूद है। लेकिन हम उसे भूल चुके हैं। लेखिका कहती हैं, हर इंसान के अंदर एक ऐसी जगह होती है, जहां शांति है, जहां संतुलन है, जहां डर नहीं है, जहां तुलना नहीं है। लेकिन आधुनिक जिंदगी के शोर में हम उस जगह से दूर होते चले गए। हम हर समय कुछ बनने की कोशिश करते हैं। कुछ पाने की कोशिश करते हैं। कुछ साबित करने की कोशिश करते हैं।
और इसी भागदौड़ में हम जीना भूल जाते हैं। एक बार एक व्यक्ति एक पहाड़ पर रहने वाले साधु से मिलने गया। उसने पूछा मैं खुश कैसे रहूं? साधु मुस्कुराया और बोला। जिस चीज को तुम बाहर ढूंढ रहे हो, वह तुम्हारे अंदर तुम्हारा इंतजार कर रही है। दोस्तों, यही इस किताब का मूल संदेश है। बुक कहती है, खुशी कोई मंजिल नहीं है। शांति कोई उपलब्धि नहीं है। बल्कि यह वह अवस्था है जिसमें हम पहले से मौजूद हैं। हमें बस उसे फिर से पहचानना है। लेकिन समस्या यह है कि हमारा मन हमेशा अतीत या भविष्य में भटकता
रहता है। या तो हम पुराने दुखों को पकड़े रहते हैं या आने वाले कल की चिंता करते रहते हैं और इसी कारण हम वर्तमान पल को खो देते हैं। जबकि जीवन केवल इसी पल में हो रहा है। ना कल में ना आने वाले कल में सिर्फ अभी। लेखिका कहती हैं अगर आप सच में जीवन को बदलना चाहते हैं तो पहले अपने मन को शांत करना सीखिए। क्योंकि जब मन शांत होता है तभी जीवन स्पष्ट दिखाई देता है। तभी हमें समझ आता है कि हमें वास्तव में क्या चाहिए और क्या नहीं। तभी हम दूसरों की अपेक्षाओं
से निकलकर अपने सच्चे स्वरूप को पहचान पाते हैं। दोस्तों शायद इस दुनिया में सबसे बड़ी सफलता बहुत अमीर बन जाना नहीं है। बहुत प्रसिद्ध हो जाना नहीं है। सबसे बड़ी सफलता है अपने अंदर शांति पा लेना। क्योंकि जिस इंसान को खुद के भीतर शांति मिल गई, दुनिया की कोई भी परिस्थिति उसे पूरी तरह नहीं तोड़ सकती और शायद यही वह यात्रा है जिस पर यह किताब हमें लेकर चलने वाली है। जब आप खुद को जान लेते हैं तब जीवन बोझ नहीं एक सुंदर अनुभव बन जाता है और शायद यहीं पर लेखिका हमें एक ऐसी सच्चाई
से परिचित कराती हैं जिसे हम जानते तो हैं लेकिन स्वीकार नहीं करना चाहते। लेखिका कहती हैं हमारी अधिकांश परेशानियां दुनिया की वजह से नहीं होती। वे हमारी सोच की वजह से होती हैं। एक ही घटना दो लोगों के साथ होती है। एक व्यक्ति टूट जाता है। दूसरा व्यक्ति उससे सीखकर और मजबूत बन जाता है। घटना एक जैसी थी लेकिन उसका अर्थ अलग था और यही फर्क पूरी जिंदगी बदल देता है। दोस्तों कभी ध्यान दिया है? जब कोई आपकी आलोचना करता है तो वह बात कई दिनों तक दिमाग में घूमती रहती है। लेकिन जब कोई आपकी
तारीफ करता है तो हम उसे कुछ ही मिनटों में भूल जाते हैं। ऐसा क्यों? क्योंकि हमारा मन स्वाभाविक रूप से नकारात्मक बातों को पकड़ कर बैठ जाता है और धीरे-धीरे हम वही बन जाते हैं जिस पर हमारा ध्यान सबसे ज्यादा रहता है। बुक कहती है मन एक बगीचे की तरह है। अगर आप उसमें रोज चिंता के बीज बोएंगे तो डर उगेगा। अगर आप तुलना के बीज बोएंगे तो दुख उगेगा। अगर आप क्रोध के बीज बोएंगे तो अशांति उगेगी। लेकिन अगर आप कृतज्ञता के बीज बोएंगे तो शांति उगेगी। अगर आप प्रेम के बीज बोएंगे तो खुशी
उगेगी। अगर आप जागरूकता के बीज बोएंगे तो संतुलन उगेगा। लेखिका कहती हैं, हम अक्सर सोचते हैं कि हमें अपनी जिंदगी बदलनी है। लेकिन सच यह है हमें सबसे पहले अपने विचार बदलने हैं। क्योंकि विचार ही भावनाएं बनते हैं। भावनाएं ही आदतें बनती हैं और आदतें ही हमारा भविष्य बनाती हैं। एक बार एक वृद्ध गुरु से पूछा गया आप हमेशा इतने शांत कैसे रहते हैं? उन्होंने मुस्कुराकर जवाब दिया। मैं हर उस विचार पर विश्वास नहीं करता जो मेरे मन में आता है। दोस्तों, यह सुनने में साधारण लगता है लेकिन यही गहरी बुद्धिमत्ता है। क्योंकि हर विचार
सच नहीं होता। हर डर वास्तविक नहीं होता। हर चिंता जरूरी नहीं होती। फिर भी हम अपने मन की हर आवाज को सच मान लेते हैं और उसी के अनुसार दुखी होते रहते हैं। लेखिका कहती हैं जब भी कोई नकारात्मक विचार आए उसे पकड़ने की कोशिश मत करो। उसे रोकने की कोशिश मत करो। बस उसे आते हुए देखो और जाते हुए देखो। ठीक वैसे जैसे आसमान बादलों को गुजरते हुए देखता है। आसमान बादलों से लड़ता नहीं। उन्हें रोकता नहीं बस देखता है और कुछ देर बाद बादल अपने आप चले जाते हैं। दोस्तों हमारे विचार भी ऐसे
ही हैं। वे आते हैं और चले जाते हैं। लेकिन हम उन्हें पकड़ लेते हैं और फिर उन्हीं के कैदी बन जाते हैं। बुक कहती है शांति पाने का मतलब यह नहीं है कि आपके जीवन में समस्याएं खत्म हो जाए। शांति का मतलब है समस्याओं के बीच भी आपका मन स्थिर रहे। और शायद यही वह कला है जो आधुनिक दुनिया हमें भूलने पर मजबूर कर रही है। बाहर का शोर बढ़ता जा रहा है लेकिन अंदर की आवाज कमजोर होती जा रही है। इसलिए लेखिका हमें याद दिलाती हैं अपने मन को बदलो और तुम्हारा अनुभव बदल जाएगा।
क्योंकि दुनिया वैसी नहीं होती जैसी वह है। दुनिया अक्सर वैसी दिखाई देती है जैसी हमारी सोच होती है। और शायद यहीं पर लेखिका हमें जीवन का सबसे सुंदर रहस्य बताती हैं। लेखिका कहती हैं दुनिया में ज्यादातर लोग खुश होने का इंतजार कर रहे हैं। वे सोचते हैं जब मुझे अच्छी नौकरी मिलेगी तब मैं खुश रहूंगा। जब मेरे पास ज्यादा पैसा होगा तब मैं खुश रहूंगा। जब मेरी सारी समस्याएं खत्म हो जाएंगी तब मैं शांति महसूस करूंगा। लेकिन सालों बीत जाते हैं और वह तब कभी नहीं आता। क्योंकि जैसे ही एक इच्छा पूरी होती है एक
नई इच्छा पैदा हो जाती है। फिर इंसान सोचता है बस यह मिल जाए फिर सब ठीक हो जाएगा। लेकिन फिर भी अंदर का खालीपन वैसा ही रहता है। बुक कहती है खुशी किसी मंजिल पर नहीं बैठी है जिसे आपको जाकर हासिल करना है। खुशी तो उस रास्ते में छिपी है जिस पर आप अभी चल रहे हैं। दोस्तों सोचिए कितनी बार आपने किसी चीज का सपना देखा होगा। फिर जब वह चीज मिल गई तो कुछ समय बाद वह सामान्य लगने लगी। नई बाइक, नया फोन, नई नौकरी, नया घर। शुरुआत में बहुत खुशी मिली। लेकिन धीरे-धीरे मन
फिर किसी नई चीज के पीछे भागने लगा। क्योंकि मन की आदत ही है हमेशा अगले लक्ष्य की तरफ भागते रहना। लेखिका कहती हैं अगर आप हमेशा अगले पल में जिएंगे तो वर्तमान पल को कभी महसूस नहीं कर पाएंगे। और जो इंसान वर्तमान को महसूस नहीं कर पाता वह जीवन को भी महसूस नहीं कर पाता। एक बार एक वृद्ध महिला अपने छोटे से घर में अकेली रहती थी। ना कोई बड़ी संपत्ति, ना कोई बड़ी पहचान, ना कोई खास सुविधा। फिर भी उसे देखने वाला हर व्यक्ति यही कहता था आप हमेशा इतनी खुश कैसे रहती हैं? वह
मुस्कुरा कर कहती मैं जो है उसकी कदर करती हूं। जो नहीं है उसकी शिकायत नहीं। दोस्तों, यही कृतज्ञता है और यही शांति का सबसे बड़ा द्वार है। हम अक्सर उन चीजों पर ध्यान देते हैं जो हमारे पास नहीं है। लेकिन बहुत कम बार उन चीजों को देखते हैं जो पहले कभी हमारी दुआ थी और आज हमारी जिंदगी का हिस्सा है। आज आपके पास जो कुछ है कभी वही किसी सपने की तरह था। लेकिन मन उसे भूल चुका है और इसी कारण संतोष खो गया है। बुक कहती है हर दिन कुछ मिनट निकालिए और उन चीजों
के बारे में सोचिए जिनके लिए आप आभारी हैं। धीरे-धीरे आपका ध्यान कमी से हटकर समृद्धि पर जाने लगेगा और जहां ध्यान जाता है वहीं ऊर्जा बहती है। जहां ऊर्जा बहती है, वहीं जीवन खिलने लगता है। लेखिका कहती हैं, खुश लोग इसलिए खुश नहीं होते क्योंकि उनकी जिंदगी परफेक्ट होती है। वे इसलिए खुश होते हैं क्योंकि उन्होंने अपूर्ण जीवन में भी सुंदरता देखना सीख लिया है। दोस्तों शायद जीवन का रहस्य ज्यादा पाने में नहीं है। शायद जीवन का रहस्य जो पहले से है उसे महसूस करने में है। जब हम कृतज्ञ होना सीख जाते हैं तब साधारण
पल भी असाधारण लगने लगते हैं। और शायद यही वह पल है जहां दौड़ती हुई जिंदगी पहली बार रुकती है और आत्मा मुस्कुराना शुरू करती है। और शायद यहीं पर लेखिका हमें एक ऐसी कहानी सुनाती हैं जो बाहर से बहुत साधारण लगती है। लेकिन उसके अंदर पूरी जिंदगी छिपी हुई है। लेखिका कहती हैं एक बार एक युवक बहुत परेशान होकर एक वृद्ध गुरु के पास पहुंचा। उसने कहा मेरे जीवन में शांति नहीं है। मैं हमेशा तनाव में रहता हूं। मुझे लगता है कि मेरी जिंदगी में कुछ कमी है। गुरु मुस्कुराए और उसे अपने साथ जंगल की
ओर ले गए। वहां एक शांत झील थी। पानी बिल्कुल साफ था। आसमान का प्रतिबिंब उसमें दिखाई दे रहा था। गुरु ने कहा, इस झील को देखो। युवक कुछ देर तक झील को देखता रहा। सब कुछ बहुत सुंदर लग रहा था। फिर गुरु ने एक पत्थर उठाया और झील में फेंक दिया। पानी में लहरें उठने लगी। प्रतिबिंब टूट गया। आसमान धुंधला दिखाई देने लगा। गुरु ने पूछा, अब क्या दिख रहा है? युवक बोला कुछ भी साफ नहीं दिख रहा। पानी हिल रहा है। गुरु ने कहा बस यही तुम्हारे मन की कहानी है। जब मन शांत होता
है तो जीवन स्पष्ट दिखाई देता है। लेकिन जब मन चिंता डर और क्रोध से भर जाता है तो सच्चाई धुंधली हो जाती है। दोस्तों कहानी तो छोटी थी लेकिन संदेश बहुत गहरा था। क्योंकि हम में से ज्यादातर लोग अपने जीवन की समस्याओं को नहीं देख रहे होते। हम अपने अशांत मन को देख रहे होते हैं। बुक कहती है जब मन बेचैन हो तो तुरंत निर्णय मत लो। जब मन क्रोधित हो तो तुरंत प्रतिक्रिया मत दो। जब मन दुखी हो तो अपने बारे में कोई अंतिम फैसला मत करो। क्योंकि उस समय आप जीवन को नहीं देख
रहे होते। आप सिर्फ अपनी भावनाओं का धुंधला प्रतिबिंब देख रहे होते हैं और यही वजह है कि लोग गुस्से में रिश्ते तोड़ देते हैं। डर में सपने छोड़ देते हैं और दुख में खुद को कमजोर मान लेते हैं। लेखिका कहती हैं जीवन को बदलने की शुरुआत बाहर से नहीं होती। वह भीतर से होती है। पहले मन को शांत करना पड़ता है। फिर दुनिया अपने आप अलग दिखाई देने लगती है। एक और बात जिसे हम अक्सर भूल जाते हैं। हम सोचते हैं कि शांति का मतलब है समस्याओं का ना होना। लेकिन लेखिका कहती हैं, शांति का
मतलब समस्याओं का खत्म होना नहीं है। शांति का मतलब है समस्याओं के बीच स्थिर रहना। समुद्र को देखिए। उसकी सतह पर हमेशा लहरें होती हैं। लेकिन उसकी गहराई में हमेशा शांति होती है। वैसे ही जीवन की सतह पर समस्याएं रहेंगी। कभी दुख होगा कभी असफलता होगी। कभी कोई अपना साथ छोड़ देगा। लेकिन अगर भीतर शांति है तो इंसान टूटता नहीं है। वह झुक सकता है लेकिन बिखरता नहीं। वह रो सकता है लेकिन हार नहीं मानता। और शायद यही जीवन जीने की सबसे बड़ी कला है। बाहरी परिस्थितियों को नियंत्रित करना नहीं बल्कि अपने भीतर स्थिर रहना।
जिसने अपने मन को जीत लिया उसने आधी दुनिया जीत ली। और शायद यही कारण है कि सच्ची ताकत शरीर में नहीं मन की शांति में होती है। और शायद यहीं पर लेखिका हमें जीवन के सबसे कठिन प्रश्न के सामने खड़ा कर देती हैं। वह प्रश्न है क्या आप खुद को वैसे ही स्वीकार कर सकते हैं जैसे आप हैं। सुनने में यह बहुत आसान लगता है। लेकिन सच तो यह है कि दुनिया में सबसे कठिन कामों में से एक है खुद से प्रेम करना। क्योंकि बचपन से हमें सिखाया जाता है और बेहतर बनो और आगे बढ़ो
और ज्यादा हासिल करो और ज्यादा कमाओ और ज्यादा सफल बनो। लेकिन किसी ने यह नहीं सिखाया कि खुद को स्वीकार कैसे किया जाता है। खुद को माफ कैसे किया जाता है। अपने दिल के साथ शांति से कैसे जिया जाता है। लेखिका कहती हैं हम अक्सर अपने सबसे बड़े आलोचक खुद होते हैं। अगर कोई दूसरा व्यक्ति हमसे वैसे बात करें जैसे हम अपने आप से करते हैं तो शायद हम उसे अपनी जिंदगी से निकाल दें। लेकिन हम रोज खुद से कहते हैं मैं अच्छा नहीं हूं। मैं पर्याप्त नहीं हूं। मैं और बेहतर हो सकता था। मैं
असफल हूं और धीरे-धीरे हमारा अपना मन ही हमारा दुश्मन बन जाता है। लेकिन दोस्तों एक कहानी सुनिए। एक लड़की थी जो हमेशा खुद को दूसरों से तुलना करती थी। सोशल मीडिया पर किसी की सफलता देखती तो दुखी हो जाती। किसी की सुंदरता देखती तो खुद को कम समझने लगती। किसी की उपलब्धि देखती तो उसे लगता कि वह पीछे रह गई है। धीरे-धीरे उसने खुद की खुशियों को दूसरों की उपलब्धियों से जोड़ दिया और एक दिन वो पूरी तरह थक गई। फिर उसकी मुलाकात एक वृद्ध महिला से हुई। महिला ने उससे पूछा अगर एक फूल गुलाब
नहीं है तो क्या वह सुंदर नहीं है? लड़की चुप हो गई। महिला ने फिर कहा कमल को गुलाब बनने की जरूरत नहीं होती। सूरजमुखी को चमेली बनने की जरूरत नहीं होती। हर फूल अपनी तरह सुंदर होता है। तो फिर तुम खुद को किसी और जैसा बनाने की कोशिश क्यों कर रही हो? दोस्तों, यही वह बात थी जिसने उस लड़की की जिंदगी बदल दी और शायद हमें भी यही समझने की जरूरत है। बुक कहती है तुलना हमेशा दुख पैदा करती है क्योंकि तुलना में आप अपनी पूरी जिंदगी की तुलना किसी दूसरे की सिर्फ अच्छी झलक से
कर रहे होते हैं। आप उनकी मुस्कान देखते हैं लेकिन उनके संघर्ष नहीं। आप उनकी सफलता देखते हैं। लेकिन उनकी असफलताएं नहीं। इसलिए लेखिका कहती हैं दूसरों की राह मत देखो। अपनी राह पर चलो। क्योंकि जीवन कोई दौड़ नहीं है। यह कोई प्रतियोगिता नहीं है। यह एक यात्रा है और हर इंसान की यात्रा अलग है। हर इंसान का समय अलग है। हर इंसान का उद्देश्य अलग है। जिस दिन आप खुद को स्वीकार कर लेते हैं, उसी दिन भीतर की सबसे बड़ी लड़ाई खत्म होने लगती है। और तब पहली बार आप दूसरों को प्रभावित करने के लिए
नहीं, खुद के साथ शांति से जीने के लिए जीते हैं। आपको किसी और बनने की जरूरत नहीं है। आपको सिर्फ अपना सच्चा स्वरूप याद करने की जरूरत है और शायद यही जीवन जीने की सबसे सुंदर कला है और शायद यहीं पर लेखिका हमें उस दर्द के बारे में बताती हैं जिससे दुनिया का लगभग हर इंसान गुजरता है लेकिन बहुत कम लोग उसे समझ पाते हैं। वो दर्द है खो देने का डर। किसी अपने को खो देने का डर, असफल हो जाने का डर, उम्र बढ़ने का डर, अकेले रह जाने का डर और कभी-कभी खुद को
खो देने का डर। दोस्तों, अगर ध्यान से देखें तो हमारी बहुत सारी चिंताओं की जड़ यही है। हम उन चीजों को पकड़ कर रखना चाहते हैं जो हमेशा हमारे पास रह ही नहीं सकती। समय, रिश्ते, यादें, लोग सब बदलते रहते हैं और यही जीवन का नियम है। लेकिन हमारा मन चाहता है कि सब कुछ हमेशा वैसा ही बना रहे और जब ऐसा नहीं होता तो दुख पैदा होता है। लेखिका कहती हैं, जीवन में शांति पाने के लिए हमें एक बहुत कठिन बात स्वीकार करनी होगी। कुछ भी हमेशा नहीं रहता। सुनने में यह दुखद लगता है।
लेकिन वास्तव में यही जीवन की सबसे सुंदर सच्चाई है। एक दिन एक महिला अपने पुराने घर के सामने खड़ी थी। वो घर जहां उसका बचपन बीता था। जहां उसकी मां की हंसी गूंजती थी। जहां उसके पिता शाम को उसे कहानियां सुनाते थे। लेकिन अब वो घर बदल चुका था। लोग बदल चुके थे। समय बदल चुका था। उसकी आंखों में आंसू आ गए। उसे लगा सब कुछ खत्म हो गया। तभी उसके पास खड़े एक बुजुर्ग ने कहा जो खत्म हुआ है वही तो कभी खूबसूरत था। महिला ने उनकी ओर देखा। बुजुर्ग मुस्कुराए और बोले अगर फूल
हमेशा खिला रहता तो शायद वह इतना सुंदर नहीं लगता। अगर बचपन हमेशा रहता तो शायद उसकी यादें इतनी कीमती नहीं होती। दोस्तों यही जीवन का विरोधाभास है। जो चीजें हमेशा नहीं रहती अक्सर वही सबसे ज्यादा मूल्यवान होती हैं। एक सूर्योदय कुछ मिनटों का एक इंद्रधनुष कुछ क्षणों का एक मुस्कान कुछ सेकंड की। लेकिन उनकी याद कई सालों तक रहती है। बुक कहती है दुख से भागो मत। उसे समझो। क्योंकि दुख अक्सर हमें यह याद दिलाने आता है कि हमने किसी चीज को सच्चे दिल से प्रेम किया था। अगर किसी के जाने से दर्द होता है
तो इसका मतलब है वह व्यक्ति आपके लिए महत्वपूर्ण था। अगर किसी याद को याद करके आंखें नम हो जाती हैं तो इसका मतलब है वह पल अनमोल था। और शायद यही कारण है कि जीवन में हर भावना की अपनी जगह है। सिर्फ खुशी नहीं सिर्फ सफलता नहीं बल्कि दर्द, विच्छोह और आंसू भी। क्योंकि यही सब मिलकर हमें इंसान बनाते हैं। लेखिका कहती हैं जीवन का उद्देश्य दुख से बचना नहीं है बल्कि हर अनुभव को पूरी तरह महसूस करना है। और शायद जब हम यह सीख जाते हैं तब पहली बार जीवन से लड़ना बंद कर देते
हैं और जीवन के साथ बहना सीख जाते हैं। ठीक वैसे जैसे नदी बहती है। हर मोड़ को स्वीकार करते हुए हर पत्थर को पार करते हुए हर बदलाव को अपनाते हुए जो बदलने से नहीं डरता वही जीवन को सबसे गहराई से जी पाता है और शायद यहीं से सच्ची शांति की शुरुआत होती है और शायद यहीं पर यह पूरी किताब हमें उस जगह ले आती है जहां हर इंसान अपनी जिंदगी में कभी ना कभी पहुंचता है। एक ऐसी जगह जहां बाहर सब कुछ शांत दिखाई देता है। लेकिन अंदर बहुत सारे सवाल चल रहे होते हैं।
दोस्तों, पूरी जिंदगी हम कुछ ना कुछ बनते रहते हैं। किसी के बेटे, किसी के पिता, किसी के पति, किसी के दोस्त, किसी के कर्मचारी, किसी के बॉस हम हर भूमिका निभाते रहते हैं। लेकिन इस सबके बीच एक सवाल कहीं खो जाता है। मैं कौन हूं? जब दुनिया की सारी आवाजें बंद हो जाती हैं। जब मोबाइल दूर रख दिया जाता है, जब कोई काम नहीं बचता, जब कोई हमें पुकार नहीं रहा होता, तब जो इंसान हमारे साथ बचता है, वह हम खुद होते हैं। और सच कहूं बहुत से लोग पूरी दुनिया के साथ रह सकते हैं।
लेकिन खुद के साथ कुछ मिनट भी नहीं रह पाते क्योंकि उन्होंने खुद को जानना ही छोड़ दिया है। लेखिका कहती हैं, शांति पाने का मतलब यह नहीं है कि आपके जीवन में कोई समस्या नहीं होगी। शांति का मतलब यह है कि समस्याओं के बावजूद आप खुद से दूर नहीं होंगे। दोस्तों, एक दिन यह जीवन समाप्त हो जाएगा। एक दिन यह भागदौड़ रुक जाएगी। एक दिन यह नाम, यह पहचान, यह सफलता सब पीछे छूट जाएगी। और उस दिन शायद भगवान हमसे यह नहीं पूछेंगे कि तुम्हारे बैंक अकाउंट में कितना पैसा था या कितने लोग तुम्हें जानते
थे या तुम कितने प्रसिद्ध थे? शायद उस दिन सिर्फ एक सवाल होगा। क्या तुमने अपना जीवन सच में जिया? क्या तुमने सूरज उगते हुए देखा था? क्या तुमने अपने प्रिय लोगों के साथ समय बिताया था? क्या तुमने अपने दिल की आवाज सुनी थी? क्या तुमने खुद को प्रेम किया था? या फिर तुम पूरी जिंदगी किसी और बनने की कोशिश करते रहे। दोस्तों, सबसे बड़ा दुख असफल होना नहीं है। सबसे बड़ा दुख यह है कि एक दिन इंसान महसूस करें कि उसने जीने की तैयारी में ही पूरी जिंदगी गुजार दी। और शायद यही कारण है कि
यह किताब हमें बार-बार एक ही बात याद दिलाती है। धीरे चलो, गहरी सांस लो। इस पल को महसूस करो। अपने लोगों को समय दो और सबसे जरूरी खुद से जुड़ो क्योंकि आखिर में जीवन का अर्थ ज्यादा पाना नहीं है। जीवन का अर्थ है जो मिला है उसे पूरी तरह महसूस करना और शायद जब हम ऐसा करना सीख जाते हैं तब पहली बार हमें समझ आता है कि शांति कहीं बाहर नहीं थी। वह हमेशा से हमारे अंदर थी। दोस्तों अगर आज की इस किताब ने आपके दिल को छुआ हो। अगर इसने आपको कुछ पल रुक कर
अपने जीवन के बारे में सोचने पर मजबूर किया हो तो वीडियो को लाइक जरूर कीजिए और लाइफ चेंजिंग बुक्स को सब्सक्राइब करना मत भूलिए और जाते-जाते कमेंट में सिर्फ एक शब्द लिखिए शांति क्योंकि जिस दिन इंसान अपने भीतर शांति पा लेता है उसी दिन उसे दुनिया जीतने की जरूरत नहीं रह जाती। धन्यवाद दोस्तों। फिर मिलेंगे एक और ऐसी किताब के साथ जो सिर्फ आपकी सोच नहीं आपके दिल को भी बदल