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Suvichar।Emotional story।Moral stories in hindi।Heart Touching Story। Kahaniyan।@StoryCorner-200

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मेरी शादी को 3 साल बीत चुके थे। समय बड़ा अजीब होता है। कुछ पल ऐसे होते हैं जो बरसों पर भारी पड़ते हैं और कुछ साल ऐसे गुजर जाते हैं जैसे कुछ क्षण हो। इन तीन सालों में मैंने बहुत कुछ सीखा। सहा और ऐसे चेहरे देखे जिनके बारे में कभी सोचा भी नहीं था। जब भी मैं मायके जाती, मेरी भाभी मेरा स्वागत ऐसे करती जैसे मैं कोई मेहमान नहीं बल्कि उनकी सगी बहन हूं। हाथ में चाय का कप, साथ में मेरी पसंद की कुछ चीजें बनाकर रखती। मेरी चीजों और मेरे आराम का पूरा ध्यान रखती।
अगर मैं रात को देर से सोती तो मेरे लिए घर में शांत माहौल बना देती। मुझे हमेशा यही लगता रहा कि भाभी ना सिर्फ मेरा सम्मान करती हैं बल्कि मां का भी बहुत ध्यान रखती हैं। मेरी मां उस महिला ने हमें अकेले जिंदगी के तूफानों से बचाकर पाला। पिताजी के देहांत के बाद वह टूट तो गई लेकिन हमारे सामने कभी कमजोर नहीं पड़ी। सिलाई मशीन उनके कमरे का स्थाई हिस्सा थी। सुबह-सुबह उठना, नाश्ता बनाना, हमें तैयार करना, स्कूल भेजना और फिर पूरा दिन सिलाई में लग जाना यही उनका रोज का क्रम था। उनके हाथों में
हमेशा सुई धागा ही दिखाई देता। मैंने कई बार सोचा मां भी तो एक महिला है। वह भी थकती होंगी लेकिन उनके चेहरे पर थकान के बजाय हौसला नजर आता था। मैं और मेरा भाई हम दोनों ही उनकी दुनिया थे। मां हमेशा कहा करती थी बेटा हो या बेटी दोनों बराबर होते हैं। मेरे लिए तुम दोनों एक जैसे हो। और सच में मां ने कभी कोई फर्क नहीं किया। भाई को पढ़ाई करवाई और मुझे भी वह सब कुछ सिखाया जो एक लड़की को आत्मनिर्भर बनाने के लिए जरूरी होता है। सिलाई, कढ़ाई, बातचीत। यहां तक कि मां
ने मुझे आत्मनिर्भरता सिखाई। मेरी शादी हुई तो मां की आंखों में आंसू भी थे और मुस्कान भी। मेरे विदा होने के बाद जब भी मैं मिलने जाती, वे मुझे गले लगाकर कहती, बेटी घर में खुश रहना। ससुराल में बेटियां फूलों की तरह होती हैं। खुशबू बनकर रहो कांटा मत बनो। मैं हर बार उनके चरणों में बैठकर उनका हाथ थामती और कहती मां जो कुछ भी हूं वह आपकी परवरिश और संस्कारों की वजह से हूं। भाई ने शादी के तुरंत बाद अपने लिए अलग कमरा बनवाया और भाभी के साथ रहने लगा। भाभी शुरू के दिनों में
मां के साथ बहुत अच्छा व्यवहार करती थी। उन्हें समय पर दवा देना, भोजन का ध्यान रखना, उनकी पसंद की चाय बनाना यह सब भाभी खुशी से करती थी। मुझे लगता रहा कि मां का बुढ़ापा सुकून से बीतेगा। जब भी मैं आती भाभी कहती, आप चिंता ना करें मां की। हम पूरी देखभाल करते हैं। आप बस ससुराल में खुश रहें। और मैं उनकी बातों पर भरोसा करती रही। मेरा भरोसा इसलिए भी मजबूर था क्योंकि उनकी मां भी मेरे सामने हमेशा कहती थी। बेटा तुम्हारी भाभी बहुत सेवा भाव वाली है। जो काम मैं नहीं कहती वह भी
कर देती है। भगवान उसे खुश रखे। समय इसी तरह बीत रहा था। एक दिन मां ने कहा तुम्हारी भाभी बहुत सलीकेदार है। मुझे तो अब चैन मिल गया है। मैंने भाभी को प्रार्थनाएं दी। मां की जुबान से तारीफ सुनकर दिल में कहीं एक टीस सी उठी। मेरे पति की बेरोजगारी की वजह से मेरी जिंदगी की कठिनाइयां शुरू हो चुकी थी। लेकिन मां के घर आकर जैसे मुझे राहत मिलती थी। मां की गोद में सिर रखकर उनकी बातें सुनकर मैं दुनिया की हर कड़वाहट भूल जाती। एक दिन मैंने देखा कि मां के हाथ पर मरहम लगा
है। मैंने पूछा क्या हुआ? मां बोली, सिलाई करते समय सुई चुभ गई थी। कुछ नहीं। मैंने ज्यादा नहीं सोचा। मां हमेशा छोटे-मोटे घावों को मामूली बात समझती थी। मुझे क्या पता था कि कुछ घाव ऐसे भी होते हैं जो दिखाई नहीं देते और वह बहुत गहरे होते हैं। आत्मा पर लगते हैं। पर सच हमेशा वैसा नहीं होता जैसा दिखाई देता है। जिंदगी के पर्दे के पीछे जो दृश्य छिपे होते हैं वे तभी सामने आते हैं जब वक उनका पर्दा उठाता है और वह वक़्त आने वाला था। मां के घर में भले सुकून था लेकिन मेरी
अपनी जिंदगी एक कठिन परीक्षा बन चुकी थी। मेरे पति बहुत पढ़े लिखे थे। एमबीए किया था। शुरुआत में बहुत जोश था कि किसी बड़ी कंपनी में नौकरी मिलेगी। अच्छी पोस्ट मिलेगी और सब कुछ बेहतर हो जाएगा। लेकिन समय ने हमें जिस रास्ते पर ला खड़ा किया वो सपने कम और हकीकत ज्यादा थी। शादी के तुरंत बाद वो अलग-अलग जगहों पर नौकरी के लिए गए। कई इंटरव्यू दिए। कुछ जगहों पर दो-तीन हफ्ते काम भी किया। लेकिन या तो कंपनी बंद हो गई या वेतन समय पर नहीं मिला। अक्सर शाम को थक कर लौटते और कहते प्रमिला
लगता है जैसे किस्मत हमसे नाराज हो गई है। मैं उन्हें हौसला देती। आप मेहनत करते रहें। भगवान जरूर भला करेंगे। लेकिन मेरे उन शब्दों से रसोई का चूल्हा नहीं जलता था, जब पति के पास काम नहीं होता। मैं सिलाई करके थोड़े पैसे जमा करती। मां कभी-कभी कुछ दे देती थी, लेकिन मैं बार-बार उनके दरवाजे पर नहीं जा सकती थी। स्वाभिमान भी तो कोई चीज होती है। सास शुरू में चुप रही। उन्हें भी लगा कि कुछ ही दिनों की बात है। लेकिन जैसे-जैसे महीने बीतते गए, उनके बोलने का तरीका बदलने लगा। एक दिन शाम को चाय
पीते हुए सास ने कहा, "प्रमि, इस लड़के ने तो बस किताबें पढ़ी हैं। समझदारी नहीं सीखी। हम कब तक इनका बोझ उठाएंगे? मैंने बात को टालने की कोशिश की लेकिन पति ने भी सुन लिया था। वो चुप रह गए। मगर मैं जानती थी कि अंदर से टूट चुके हैं। अगले दिन सास ने साफ शब्दों में कहा प्रमिला बेटी हम अब तुम दोनों का खर्च नहीं उठा सकते। हमारा खुद का गुजारा मुश्किल हो रहा है। अब तुम लोग कोई अलग इंतजाम करो। यह सुनकर जैसे किसी ने मेरी रीड की हड्डी पर चोट मारी हो। एक पल
को समझ नहीं आया कि क्या कहूं। पति ने नजरें झुका ली और मैं कमरे में आकर चुपचाप बैठ गई। दो दिन बाद हमने सामान बांधा। कुछ कपड़े, थोड़े बर्तन और एक पुरानी रजाई। पति ने जान पहचान के जरिए किराए पर एक छोटा कमरा तलाशा। तीसरी मंजिल पर एक पुराना सा फ्लैट। अंदर गए तो देखा एक बल्ब तक नहीं था। दीवारों पर नमी थी। फर्श पर सीलन के निशान थे। मैंने अपने पति से कहा कोई बात नहीं हम यहां से भी शुरुआत कर सकते हैं। बस आप दिल छोटा मत कीजिए। हमने पुरानी चादर फर्श पर बिछाई
और दोनों वहीं बैठ गए। अगले दिन से मैंने गली के एक समझदार महिला से सिलाई का काम लेना शुरू किया। दिन भर सिलाई मशीन चलाती और शाम को थक कर चूर हो जाती। मेरे पति अधिकतर घर से बाहर होते। कभी किसी इंटरव्यू के लिए तो कभी किसी संस्था एजेंसी के चक्कर में एक दिन वे थके थके कदमों से लौटे हाथ में अखबार था बैठते ही बोले आज फिर इंटरव्यू दिया 15 उम्मीदवार और भी थे एक से बढ़कर एक अनुभवी मैंने कहा शायद आज तुम्हारा नंबर हो लेकिन देखते हैं और उनका हौसला बढ़ाया एक दिन जरूर
आएगा ईश्वर किसी की परीक्षा बेवजह नहीं लेता मैंने कभी शिकायत नहीं की ना अपनी मां से ना अपने पति से। लेकिन एक दिन ऐसा भी आया जब हमारे पास आटा खरीदने के भी पैसे नहीं थे। मैंने पुराना पर्स टटोला और बाजार जाकर केवल आटा और चीनी खरीदी। उस दिन दाल भी नहीं थी। पति ने बिना कुछ कहे सूखी रोटी खाई और फिर कहा प्रमिला अगर एक हफ्ते में कुछ ना कर सका तो मैं रिक्शा चलाना शुरू कर दूंगा। मैंने कहा ईमानदारी की कमाई है। इसमें कोई शर्म की बात नहीं। उन दिनों मैंने कई बार लोगों
का व्यवहार बदला हुआ देखा। जो लोग पहले हमें अपने साथ बैठाते थे, अब मिलते वक्त नजरें चुरा लेते थे। एक पुराना दोस्त पति से मिला और बोला, "अभी तक खाली हो?" और हंसते हुए आगे बढ़ गया। उस रात मेरे पति ने मुझसे कोई बात नहीं की। लेकिन उन सब लम्हों में एक चीज जो हमें जोड़े रखे थी, वो था। एक दूसरे पर विश्वास। मैं जानती थी कि वह जितना भी टूटा हुआ है मेरे लिए संघर्ष कर रहा है और वह भी जानता था कि मैं उसके साथ हूं। चाहे कुछ भी हो। एक दिन शाम को
जब समीर घर में दाखिल हुआ तो उसके चेहरे पर पहली बार वो चमक थी जो मैंने बहुत समय बाद देखी। उसके हाथ में एक सफेद लिफाफा था और दरवाजा खोलते ही बोला प्रमिला काम मिल गया है। मैंने जल्दी से पानी का गिलास हाथ में पकड़ा और उसके पास गई। सच कहां? उसने सोफे पर बैठते हुए लंबी सांस ली और बोला, क्लिफ्टन में एक निजी कंपनी है। मार्केटिंग सहायक की पद है। इंटरव्यू तो एक हफ्ते पहले दिया था लेकिन जवाब की आशा नहीं थी। आज फोन आया कहां है? परसों से कार्यभार ग्रहण करना है। वेतन भी
उचित है। और सबसे अच्छी बात यह कि आने जाने का भत्ता ट्रांसपोर्ट अलाउंस भी मिलेगा। मैंने मुस्कुराते हुए उसका हाथ थामा और कहा। मैंने कहा था ना ईश्वर हमारी मेहनत को व्यर्थ नहीं जाने देगा। उस शाम हमने दो कप चाय और कुछ बिस्कुटों से एक छोटा सा उत्सव मनाया। मैंने समीर से कहा अब हमें समय पर किराया देना होगा। बिजली का बिल भी चुकाना है। और हां, मेरी सिलाई मशीन की भी मरम्मत करवानी है। समीर ने सहमति में सिर हिलाया। और तुम्हारे लिए मैं एक नया जोड़ा जरूर लाऊंगा। इस बार वेतन में अगली सुबह मैं
जल्दी उठ गई। रसोई साफ की, चाय बनाई और जब समीर को तैयार होते देखा तो दिल को शांति मिली। मैंने उसकी कमीज ठीक की और जूते पॉलिश किए। जब वह दफ्तर के लिए निकल रहा था तो दरवाजे पर रुक कर बोला प्रमिला अब सब बदल जाएगा। दरवाजा बंद होते ही मैंने एक पुरानी चादर ओढ़ ली और कुछ पैसे जो मुश्किल समय के लिए रखे थे। उनमें से एक मिठाई का डिब्बा लिया। मेरे मन में बस एक ही बात थी। यह खबर सबसे पहले मां को देनी है। वही थी जिन्होंने हर बार मेरा हौसला बढ़ाया था।
जब जेब खाली होती थी, मां का दिया हुआ ₹100 का नोट किसी खजाने की तरह निकलता था। फिर मैं रिक्शे में बैठ गई। मां के मोहल्ले की गलियों में प्रवेश करते हुए एक जानी पहचानी खुशबू महसूस हुई। वही गली, वही दरवाजा, वही खिड़की जहां से कभी मैं और भाई झांकते थे। दिल में एक अजीब सी खुशी थी कि इस बार मैं कोई शुभ समाचार सुनाने आई हूं। दरवाजा खटखटाया। भाभी ने दरवाजा खोला। मुझे देखते ही थोड़ी चौकी। फिर हल्के स्वर में बोली, आइए। मैंने मिठाई का डिब्बा हाथ में उठाया और कहा, बस शुभ समाचार देने
आई हूं। समीर को अच्छी नौकरी मिल गई है। सोचा मां को बताऊं। उन्होंने बहुत प्रार्थना की थी। भाभी ने दरवाजा थोड़ा और खोला और कहा अंदर आ जाइए। मां अपने कमरे में है। मैं अंदर गई तो माहौल कुछ बदला-बदला सा लगा। मां का कमरा साधारण था जैसा हमेशा होता था। लेकिन दीवारों और दरवाजों पर एक अजीब सी खामोशी छाई हुई थी। मां खाट पर बैठी थी। मेरे कदमों की आहट सुनकर उन्होंने नजरें उठाई। फिर चेहरे पर वही मुस्कान थी जो हमेशा मुझे हिम्मत देती थी। प्रमिला मेरी बच्ची आ गई। मां ने मेरे हाथ थाम लिए।
मैंने डिब्बा उनके हाथ में थमाते हुए कहा, मां समीर को नौकरी मिल गई है। एक बड़ी कंपनी में तनख्वाह भी अच्छी है। सोचा सबसे पहले आपको बताऊं। मां ने आंखों में नमीली सिर हिलाया। ईश्वर का धन्यवाद है। मेरी प्रार्थनाएं रंग लाई। मैं उनके पास बैठ गई और हम दोनों ने मिठाई खाई। मां ने कहा, अब सब अच्छा होगा। तुम भी सुकून से जी सकोगी। हम थोड़ी देर तक बीते दिनों की बातें करते रहे। मां ने मेरी सिलाई, समीर की मेहनत और हमारे कठिन दिनों की चर्चा की। भाभी चुपचाप कमरे में आती जाती रही। लेकिन उनकी
मौजूदगी में कुछ तनाव सा महसूस हो रहा था। मां ने मेरे सिर पर हाथ रखा और कहा। बेटा यह जो दिन बीत गए हैं उनका दुख मत रखना। दिल में विश्वास रखना। सब अच्छा होगा और तुम दोनों सुखी रहोगे। मैंने जवाब दिया मां बस आपके आशीर्वाद का असर है और अब जब कुछ हाथ में आया है तो मैं चाहती हूं कि आपकी दवाइयां उस समय पर आई आपकी छोटी-मोटी जरूरतें पूरी हो। मां कुछ कहना चाहती थी। लेकिन शायद भाभी की मौजूदगी ने उन्हें रोक दिया। मैंने खुद भी महसूस किया कि भाभी की नजरें बार-बार कुछ
और कह रही हैं। मैंने मां के हाथ चूमे और कहा अब इजाजत दें। शाम को समीर आ जाएगा। उसे सब बताना है। दरवाजे पर आकर मैंने पीछे मुड़कर मां को देखा। वह अभी तक वहीं चारपाई पर बैठी थी और दरवाजे की ओर देख रही थी। उनकी आंखों में एक चमक थी शायद खुशी की। शायद वह रोशनी जो एक मां अपने बच्चे की अच्छी स्थिति में महसूस करती है। मैं दरवाजे से बाहर निकली। लेकिन दिल में एक अजीब सी बेचैनी थी। भाभी की खामोशी, उनकी नजरें और मां का ठहराव कुछ था जो शब्दों से बाहर था।
मैं मां से मिलकर आई थी और दिल में एक अजीब सा सुकून लेकर लौटी थी। समीर को सब विस्तार से बताया। उसने मुस्कुरा कर कहा। चलो अच्छा किया। मां का आशीर्वाद लेने गई थी। यही आशीर्वाद काम आते हैं जिंदगी में। अगले दिन शाम को मां का ख्याल फिर दिल में आया। मैंने सोचा कुछ दिनों बाद फिर मिठाई लेकर जाऊंगी। फिर एक दिन ऐसा हुआ। मैं बाजार से गुजर रही थी कि एक छोटे से उपहार पैक पर नजर पड़ी। मैंने सोचा ले लेती हूं यूं ही। उसमें इत्र की एक छोटी सी शीशी थी। मां को खुशबुओं
का बहुत शौक था। उसी दिन सोचा कि रिक्शा लेकर मां से मिलने जाऊं। मौसम भी सुहाना था और मेरा दिल अजीब सी बेचैनी से भरा हुआ था। शायद दिल कभी-कभी आने वाले तूफान का संकेत दे देता है। बस हम समझ नहीं पाते। जब गली में दाखिल हुई तो अजीब सी खामोशी थी। दरवाजा आधा खुला हुआ था। मैंने धीरे से धक्का देकर दरवाजा खोला और जैसे ही अंदर कदम रखा एक आवाज सुनाई दी। छोड़ दो मां को छोड़ दो। यह मेरी अपनी आवाज थी जो मुझे खुद को भी असहाय सी लगी। सामने का दृश्य ऐसा था
जैसे किसी फिल्म का सबसे बुरा दृश्य हो। मेरी भाभी मां के बालों को दोनों हाथों से पकड़ कर झिंझोड़ रही थी। और मां जमीन पर अर्ध बैठी अवस्था में दर्द से करा रही थी। तुम्हें शर्म नहीं आती? एक बुजुर्ग महिला से ऐसा व्यवहार करती हो। मैंने चिल्लाकर कहा और दौड़कर भाभी को जोर से धक्का दिया। वह एक ओर गिर गई और मैं मां के पास घुटनों के बल बैठ गई। मां यह क्या हो रहा है? मैंने उनके चेहरे पर हाथ फेरा। उनके उलझे बाल सुलझाए। मां ने नजरें झुका ली जैसे शर्मिंदा हो कि बेटी ने
उन्हें इस हालत में देख लिया। लेकिन अब मुझसे सब्र नहीं हो रहा था। मैंने गुस्से से पलट कर भाभी की तरफ देखा। यह सब क्या है? यह तुम कर रही हो। वही मां जिसने तुम्हें अपनी बेटी की तरह रखा। जिनके हाथों का खाना खाया। जिनकी सेवा की बातें करती थी। आज उनके बाल खींच रही हो। भाभी जो अब तक उठ चुकी थी। तल्खी से बोली। हां, मारा है मैंने। क्योंकि अब तंग आ चुकी हूं इस बुढ़िया से। कब तक सहती रहूं? हर बार मां तुम्हें पैसे दे देती है। जैसे हम कोई होटल चला रहे हो।
और मां वहां से पैसे लाकर तुम्हें देती है। मैंने मां की ओर देखा। उन्होंने नजरें चुरा ली। यही बात है। मैंने ठंडे स्वर में कहा। तो तुम्हें इस बात पर आपत्ति है कि मां अपनी बेटी को कुछ दे देती है। तुम्हें यह बुरा लगता है कि वह मुझसे स्नेह करती है। भाभी ने तिरस्कार से हंसते हुए कहा। यह स्नेह नहीं है। यह तो मूर्खता है। तुम्हें पालने के चक्कर में यह बुजुर्ग औरत हमारे घर में बोझ बनकर बैठी है। सच कहूं तो मन करता है कि इसे कहीं बाहर भिजवा दूं। मेरा हृदय जैसे सीने से
बाहर आने को था। मैंने मां के कंधों को थामा। मां चलिए यहां से। अब आप यहां एक दिन भी नहीं रहेंगी। जैसे ही दरवाजा खुला, भाई ने भीतर कदम रखा। उसके चेहरे पर साफ घबराहट झलक रही थी। वह सीधे मेरे सामने आकर खड़ा हुआ और मां की ओर देखा जो दीवार के पास सहमी हुई खड़ी थी। मैंने आगे बढ़कर कहा, भाई कम से कम सच जानने की कोशिश तो करें। एक बार मेरी बात तो सुनिए। उसने हाथ के इशारे से मुझे चुप करा दिया। ना मुझे तुम्हारी बात सुननी है और ना किसी सफाई की जरूरत
है। बहुत हो गया यह तमाशा। हर दूसरे दिन कोई नया मुद्दा। भाभी पीछे खड़ी थी। चुप। लेकिन ऐसा लग रहा था जैसे उनकी योजना सफल हो चुकी हो। मैंने फिर कहा सिर्फ इतना सुन लीजिए। मां पर हाथ उठाया गया है। मैं आपसे कुछ नहीं कह रही। बस न्याय की बात कर रही हूं। भाई ने खड़े स्वर में कहा, न्याय तुम्हें यहां कोई अधिकार नहीं है कि आकर हमारे घर का चयन बिगाड़ो। अगर मां को तुम्हारे साथ रहने का इतना ही शौक है तो उन्हें ले जाओ। हमें किसी के सहारे की जरूरत नहीं है। मैंने मां
की ओर देखा। उनकी आंखें आंसुओं से भरी थी। वह कुछ कहना चाहती थी, लेकिन शायद उनमें बोलने की हिम्मत नहीं बची थी। मैंने भाई के कदमों की ओर देखा। शायद उसमें कुछ दया जाग जाए। लेकिन वह और भी कठोर स्वर में बोला, "यह दरवाजा है बाहर निकल जाओ।" आज के बाद तुम दोनों के लिए इस घर में कोई जगह नहीं है। मैंने मां का हाथ पकड़ा और उनके पास जाकर कोमलता से कहा, "चलिए मां, हमें किसी के द्वार पर नहीं रहना है।" भाई दरवाजे से हट गया और मैंने मां को धीरे-धीरे बाहर ले जाना शुरू
किया। हम दोनों ने फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। दरवाजा जोर से बंद हुआ और जो आवाज भीतर से आई वह थी। पूरी तरह से संबंध विच्छेद की। गली में निकलते ही मां ने कहा काश आज तेरा पिता जीवित होता तो यह दिन ना देखना पड़ता। मैंने उनका हाथ दबाया। अगर पिताजी जिंदा होते तो आपकी कद्र जरूर होती। लेकिन मां आपकी बेटी अभी जिंदा है। रिक्शा लेकर हम सीधे अपने किराए के मकान पहुंचे। मैंने दरवाजा खोला। मां को सहारा दिया और भीतर ले गई। वह चुपचाप चारपाई पर बैठ गई। मैंने उन्हें पानी दिया। उनके जूते उतारे
और पंखा चालू कर दिया। कमरे में सन्नाटा था। मां की नजरें छत की ओर थी और मेरा दिल लगातार सोच रहा था कि इस उम्र में उन्होंने यह सब कुछ कैसे सह लिया। मैंने उनका बैग खोला जो वे साथ लाई थी। अंदर एक पुराना बटुआ, दो जोड़ी कपड़े और एक सूती दुपट्टा था। मां, आप पूरी जिंदगी का सामान एक छोटे से बैग में समेट लाई। मैं रसोई में गई। चूल्हा जलाया और चाय चढ़ाई। साथ ही सोचती रही कि मां को यह सब भूलने में कितना समय लगेगा और मुझे यह सब सहन करने में कितना शाम
को समीर आया तो दरवाजा खोलते ही चौंक गया। लेहा मां मैंने संक्षेप में कहा हमेशा के लिए आ गई हैं। भाई ने हमें घर से निकाल दिया है। समीर अंदर आया और मां को देखकर चुपचाप बैठ गया। मां ने नजरें नीची कर ली जैसे शर्मिंदा हो। समीर ने मुझसे पूछा यह फैसला कब लिया गया? मैंने सीधे शब्दों में कहा, फैसला उन्होंने किया। हमने तो बस सहा। समीर ने कुछ नहीं कहा। चुपचाप कमरे में चला गया। थोड़ी देर बाद मां बोली, तुम्हारे पति को मेरी वजह से कोई परेशानी ना हो। मैंने उनके पैर दबाने शुरू किए
और कहा, परेशानी तो तब होती मां जब कोई बोझ बन जाए। आप तो मेरा सहारा हैं। उस रात हमने सादा सा खाना खाया। मां ने बहुत थोड़ा खाया। शायद तबीयत के साथ-साथ दिल भी भरा हुआ था। मैंने बिस्तर लगाया, मां को कंबल ओढ़ाया और खुद उनके पास बैठ गई। रात देर तक मां सो नहीं सकी। मैंने कहा, सो जाओ मां, सब ठीक हो जाएगा। उन्होंने धीमी आवाज में कहा, बेटी, मैंने बहुत कुछ सह लिया है। अब बस चाहती हूं कि जो समय बचा है, वह सुकून से बीते। मैंने उनका माथा सहलाया और कहा, "यह घर
आपका है। यहां आपको कोई कुछ नहीं कहेगा।" कमरे में खामोशी थी। बाहर सड़क पर कुछ आवारा कुत्तों के भौंकने की आवाजें आ रही थी। लेकिन अंदर हम दोनों मां-ब एक दूसरे का सहारा बनकर सुकून तलाशने की कोशिश कर रहे थे। मैं जानती थी कि अगला दिन सब कुछ बदल देगा। मां की दवाइयां, उनका आराम और समीर के स्वभाव को लेकर एक नई लड़ाई शुरू होगी। लेकिन मैं तैयार थी क्योंकि अब मेरे साथ मां थी और यही साथ मेरे लिए सब कुछ था। सुबह मामूली सी मुस्कान के साथ मैंने नाश्ता तैयार किया। मां अब तक सो
रही थी। समीर रात को देर से आया था इसलिए उसे जगाने का मन नहीं हुआ। लेकिन मेरे मन में हल्की चिंता थी। कल जो हुआ उसका असर आज जरूर दिखेगा। समीर की चुप्पी भी कुछ संकेत दे रही थी। रसोई में बर्तन समेटते हुए मैंने सुना। कमरे का दरवाजा खुला। समीर की चप्पलों की आवाज धीरे-धीरे मेरी ओर बढ़ रही थी। वो रसोई के दरवाजे पर आकर रुका। मैंने सिर उठाकर हल्की सी मुस्कान दी। चाय दूं? समीर ने सीधा सवाल किया। यह कब तय हुआ कि तुम्हारी मां हमारे घर में आकर रहेंगी? मैंने चाय का कप ट्रे
में रखा और कहा। यह तय नहीं था। मजबूरी थी। तुम्हें सब बताने ही वाली थी, लेकिन रात बहुत हो गई। भाई ने घर से निकाल दिया। वह भी मां को गाली देकर। मैं उन्हें कैसे छोड़ देती। समीर ने गहरी सांस ली। देखो मैं तुम्हारा दुख समझता हूं। लेकिन मेरी भी सुनो। अभी मेरी नौकरी नहीं है। साधन सीमित हैं। और ऊपर से यह अचानक आई जिम्मेदारी। मैंने चाहकर यह जिम्मेदारी अपने हाथ में नहीं ली। यह मेरी मां है। जिंदगी के कठिन समय में उन्होंने मेरा साथ दिया। अब मैं कैसे उन्हें अकेला छोड़ दूं? समीर कुर्सी पर
बैठते हुए बोला, "प्रमि, तुम जानती हो मैं तुम्हें कभी मना नहीं करता। लेकिन तुमने मुझसे सलाह तक नहीं की। मैं उसके सामने बैठ गई। कुछ फैसले बिना सलाह के लेने पड़ते हैं। जब कोई रास्ता ना हो तो दिल की सुननी पड़ती है। और मेरा दिल यह कभी स्वीकार नहीं करता कि मेरी मां दर-दर की ठोकरें खाएं। समीर ने एक घूंट लिया। फिर बोला मेरी मां क्या सोचेंगी? वह पहले ही समझती हैं कि तुम मुझ पर हावी हो। अब जब वह सुनेंगी कि मैं तुम्हारी मां को अपने घर में रख रहा हूं तो उनका प्रतिक्रिया। मैंने
गंभीरता से कहा। तुम्हारी मां को हम समझा सकते हैं। लेकिन क्या यह बात महत्वपूर्ण है कि लोग क्या कहेंगे या यह कि हम एक बुजुर्ग महिला को छत दें? समीर चुप हो गया। फिर बोला तुम एक बात समझ लो। मैं अभी इस लायक नहीं हूं कि दो घरों की जिम्मेदारी उठा सकूं। और अगर तुम अपनी मां को रखना चाहती हो तो पहले सोच लो कि इसका नतीजा क्या निकलेगा। मैंने हैरानी से उसकी ओर देखा। तुम कहना क्या चाहते हो? क्या मैं मां को वापस उसी घर छोड़ आऊं जिसने दरवाजा बंद करके हमें निकाल दिया। समीर
ने नजरें चुराते हुए कहा, कम से कम वह उनकी जिम्मेदारी है। वह पुरुष है, बेटा है। उसे निभाना चाहिए। यह हमारा फर्ज नहीं बनता। मेरे दिल में चोट सी उठी। लेकिन मैंने नरमी से कहा। अगर बेटा होने से जिम्मेदारी पूरी हो जाती तो आज मां यहां ना होती। अगर तुम मेरी जगह होते तो क्या यही करते? अपनी मां को ऐसे ही बेसहारा छोड़ देते। वह थोड़ी झुझुलाहट से बोला, तुम हर बात को भावनात्मक रंग दे देती हो। मैं हकीकत की बात कर रहा हूं। मैंने संयम से कहा, हकीकत यह है कि मां बूढ़ी हो चुकी
हैं और अब वह हमारे रहमोकरम पर है। हम उन्हें रखें या छोड़ दें। फर्क सिर्फ जमीर का है। समीर ने चाय खत्म की और कुर्सी से उठते हुए कहा, "मेरा जमीर तब भी जागता है जब हम बिजली का बिल समय पर नहीं दे पाते। जब तुम कपड़ों की सिलाई समय पर पूरी नहीं कर पाती। और अब इस सब में एक और व्यक्ति शामिल हो गया है। मैंने खड़े होकर सीधा उससे पूछा। तो बताओ समीर क्या तुम चाहते हो कि मैं मां को निकाल दूं? यह कहकर कि हम उनका बोझ नहीं उठा सकते? समीर ने थोड़ी
देर की चुप्पी के बाद कहा। हां चाहता हूं। तुमने पूछा। मैंने सच कह दिया। मैं नहीं चाहता कि वह इस घर में रहे। मेरे पांव जैसे जमीन से चिपक गए। मैंने धीरे से कहा। तो फिर समीर यह जान लो कि अगर मां इस घर से जाएंगी तो मैं भी उनके साथ जाऊंगी। समीर ने एक पल मेरी आंखों में देखा। फिर दरवाजा खोला और बाहर चला गया। समीर के जाने के बाद कमरे में ऐसी खामोशी थी जैसे कोई जनाजा उठा हो। मैं वहीं खड़ी रही। अभी भी वही शब्द मेरे कानों में गूंज रहे थे। मैं नहीं
चाहती कि वह इस घर में रहे। मेरी पीठ की तरफ हल्की सी सरसराहट हुई। मैंने पलट कर देखा। मां दरवाजे के पास खड़ी थी। उनका चेहरा भावहीन था। लेकिन आंखें साफ बता रही थी कि वह सब कुछ सुन चुकी हैं। मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई। मां की आंखों में मैंने शब्द तलाशने की कोशिश की। लेकिन वह बस एक धीमी सी मुस्कान के साथ बोली। सब सुन लिया बेटा। दरवाजा थोड़ा खुला रह गया था। आवाज बाहर आ रही थी। मैंने आगे बढ़कर उनका हाथ थामा। मां आपने जो सुना वह बस एक पल का गुस्सा था।
समीर नाराज था। वह दिल से नहीं कहना चाहता था। वह चारपाई पर बैठ गई। उनके हाथ मेरे हाथ में थे। लेकिन अब उसमें वह गर्माहट नहीं थी जो पहले हुआ करती थी। वह कुछ देर चुप रही। फिर बोली बेटी एक बात कहूं बुरा मत मानना। मुझे वृद्धाश्रम मत भेजना। यह वाक्य सीधा था और ऐसा लगा जैसे किसी ने चुभती हुई बात कह दी हो। मेरे हंठ सिले रह गए। मां यह कैसा ख्याल आ गया आपको? उन्होंने मेरी ओर देखा। कभी-कभी इंसान खुद को बोझ महसूस करने लगता है। और जब दूसरों से भी वही अनुभव हो
तो वृद्धाश्रम की दीवारें भी अपने से लगने लगती हैं। मैं उनके पास घुटनों के बल बैठ गई और कहा आप बोझ नहीं है मां। यह घर आपका है। आपकी बेटी का है और आपको यहां से कोई नहीं निकाल सकता। मां ने हल्के से सिर हिलाया। जैसे बात सुन तो ली हो। लेकिन मानने को तैयार ना हो। समीर ने जो कहा वह भी सही है बेटा। उसका दबाव, नौकरी, छोटा घर, खर्चे सब समझती हूं और मैं तुम पर बोझ नहीं बनना चाहती। मैंने संयम रखते हुए कहा, "अगर रिश्ते दबाव में तोले जाने लगे तो मां जैसा
रिश्ता सबसे कीमती हो जाता है।" कमरे में फिर सन्नाटा छा गया। मां की आंखों में कई सवाल थे और मेरे दिल में ढेरों जवाब। जिनका शायद कोई असर नहीं हो रहा था। उसी शाम समीर घर लौटा। चेहरा थका हुआ था। शायद उसने भी दिन भर यही सोचा हो। दरवाजा खोलते ही उसने मेरी तरफ देखा। फिर मां पर नजर पड़ी। उसका लहजा नहीं बदला लेकिन बर्ताव थोड़ा नरम लगा। खाना है? वह बोला। मैंने संक्षेप में उत्तर दिया। हां, तैयार है। हम तीनों ने एक साथ खाना खाया। लेकिन वह एक मेज पर बैठे तीन अलग-अलग कहानियों वाले
लोग थे। समीर खाने के बाद कमरे में चला गया। मैं मां के बर्तन उठाने लगी तो मां ने मेरा हाथ पकड़ लिया। बेटा अब हर कदम सोच समझ कर रखना है। मैंने नरमी से कहा मां अगर कदम रुकने लगे तो जिंदगी बिखर जाती है। हम साथ रहेंगे कुछ ना कुछ कर लेंगे। अगली सुबह मां पूजा पाठ करके बाहर आ गई। मैंने उनके लिए चाय बनाई और साथ दो बिस्किट रखे। वह खामोशी से चाय पीती रही। फिर अचानक बोली। प्रमिला एक रिश्ता सिर्फ बोलने से नहीं बनता। बर्ताव से भी बनता है और जब बर्ताव बदल जाए
तो रिश्ता जीते जी मर जाता है। मैंने बात काटते हुए कहा मां समीर को वक्त दो। उसका दिल बदला है लेकिन शायद हालात ने ऐसा करवाया है। मां ने प्याला नीचे रख दिया। मुझे वक्त की नहीं ठिकाने की चिंता है। और मैं चाहती हूं कि तुम भी सच्चाई का सामना करो। अगर समीर ने दोबारा सख्ती की तो मैं खुद ही कहीं चली जाऊंगी। मैं तेज स्वर में बोली आप कहीं नहीं जाएंगी यही अंतिम बात है। समीर से अब मैं खुलकर बात करूंगी। यह मामला अब अधूरा नहीं छोड़ा जाएगा। उस दिन मैंने पहली बार यह निर्णय
लिया कि चाहे मुझे समीर से टकराकर ही क्यों ना बात करनी पड़े मैं करूंगी। क्योंकि मैं मजीद अपनी मां के चेहरे पर यह बेबसी अब और नहीं देख सकती थी। रात को जब समीर कमरे में आया तो मैंने दरवाजा बंद कर लिया और सीधे कहा समीर अगर तुम्हें मेरी मां से कोई समस्या है तो स्पष्ट बताओ। लेकिन याद रखना अगर मां जाएंगी तो मैं भी उनके साथ चली जाऊंगी। समीर कुछ देर तक चुप रहा। फिर बोला प्रमिला तुम जानती हो मैं तुमसे प्रेम करता हूं। लेकिन कुछ बातें सच्चाई पर आधारित होती हैं। मैंने खड़े स्वर
में कहा। प्रेम केवल शब्दों से नहीं होता। स्वीकार करने से होता है। अगर तुमने मेरी मां को स्वीकार नहीं किया तो तुम्हारा प्रेम मेरे लिए अर्थहीन है। समीर ने सिर झुका लिया और कहा मुझे थोड़ा समय दो। मैं दरवाजा खोलकर बाहर आ गई। मां अब भी आंगन में बैठी थी। उनके चेहरे पर थकावट थी। लेकिन जब मैं उनके पास जाकर बैठ गई तो वह बोली तो बात हो गई। मैंने कहा अब बात नहीं निर्णय होगा। वह मुस्कुराई। लेकिन उनकी आंखें अब भी नम थी। उस रात मां मेरे पास ही सोई और मेरे दिल में एक
संकल्प हमेशा के लिए जाग उठा। मां को अब कोई दूसरा घर नहीं मिलेगा। मां के साथ वह आखिरी रात हमने खामोशी में गुजारी। वह मेरे साथ ही चारपाई पर लेटी रही। लेकिन उन्हें नींद नहीं आ रही थी। मैंने आंखें बंद कर रखी थी। मगर मैं जानती थी कि वह बार-बार करवटें बदल रही थी। कभी उनका हाथ मेरे कंधे पर आ जाता। कभी वह धीरे से उठकर पानी पीती। फिर वापस आकर बैठ जाती। सुबह जब मैंने आंखें खोली तो वह उठ चुकी थी। पूजा पाठ के बाद वह चुपचाप चाय पीने बैठ गई। मैंने उनके पास बैठकर
पूछा। कुछ सोच रही है मां? उन्होंने सीधी नजर से देखा और कहा मैंने सोच लिया है प्रमिला। तुम्हारे लिए सरलता लानी होगी। मैं तुम्हारे और समीर के बीच दीवार नहीं बनना चाहती। मैंने तुरंत कहा मां ऐसी बातें मत कीजिए। मैं हर कठिनाई सह लूंगी। लेकिन आपको कहीं जाने नहीं दूंगी। उन्होंने मेरी ओर देखा, "मेरी बेटी, तुमने बहुत साथ निभाया है। अब मेरी बारी है। मुझे अनुमति दो कि मैं कहीं जा सकूं जहां मैं तुम्हारी जिंदगी का बोझ ना बनूं। मैं जानती थी यह जिद नहीं। आत्मसम्मान की अभिव्यक्ति थी। लेकिन मैं भी कुछ नहीं कह सकी।
उनकी नजरें अब किसी निर्णय की प्रतीक्षा नहीं कर रही थी। बस यह सूचना दे रही थी कि निर्णय हो चुका है। दोपहर को मैंने मां की दवाइयां और कपड़े एक छोटे बैग में रखे। उन्होंने कुछ नहीं कहा। बस बिस्तर समेटती रही। मैंने रिक्शा बुलवाया और उन्हें लेकर निकल पड़ी। रास्ते में हम दोनों चुप थे। रिक्शे के शोर में भी मां की चुप्पी साफ सुनाई दे रही थी। वृद्धाश्रम पहुंचकर दरवाजा खटखटाया। एक औरत ने दरवाजा खोला। उम्र लगभग 40 वर्ष रही होगी। माथे पर दुपट्टा और चेहरे पर गंभीरता। उसने पूछा कैसे आना हुआ? मैंने हिचकिचाते हुए
कहा मेरी मां के लिए ठिकाने की तलाश है। कुछ समय के लिए उन्होंने दरवाजा खोल दिया। उन्होंने कहा आइए अंदर आ जाइए। मैं और मां अंदर दाखिल हुए। सामने एक छोटा सा बरामदा था। बाई तरफ दो कमरे थे और दाई ओर एक बड़ा हाल जहां चारपाइयां क्रम से लगी हुई थी। उन पर अलग-अलग उम्र की महिलाएं बैठी थी। कुछ बातें कर रही थी, कुछ चुप थी और कुछ बस खाली निगाहों से सामने देख रही थी। एक चारपाई खाली थी। वहां मां को बैठा दिया गया। मां ने आसपास देखा। फिर मेरी तरफ देखा। मैंने उनका हाथ
थामा। यहां सभी माताएं हैं। कोई अपने बेटे के बिना है। किसी को उसके बेटे ने छोड़ दिया है। लेकिन मैं रोज आऊंगी। आपके साथ समय बिताऊंगी। मां ने सिर हिलाया और कहा। यही काफी है बेटा। इस वृद्धाश्रम की चालक जिनका नाम शांतिलाल था उन्होंने दाखिले की प्रक्रिया पूरी की। उन्होंने कहा यहां सभी को समान समझा जाता है। समय पर भोजन, दवा और अगर किसी की तबीयत बिगड़ जाए तो अस्पताल की व्यवस्था भी है। मैंने मां के लिए लाया हुआ दुपट्टा निकालकर उनके कंधों पर रखा। उनके बाल संवारे और धीरे से कहा। अब आप चैन से
रहेंगी। पहले दिन मैं देर तक वहां बैठी रही। मां से बातें होती रही। बगल की चारपाई पर एक वृद्ध महिला थी। वह थोड़ी देर बाद मुझसे पूछती, बेटी, तुम कहां से आई हो? अपनी मां को छोड़ने आई हो या लेने? मैं नरमी से जवाब देती, मैं मां के साथ आई हूं और वे यहां अतिथि हैं। वह हंसती और कहती, यह अतिथियों की मेहमानियां लंबी हो जाती हैं। दूसरे दिन मैं फिर वहां पहुंची। मां मुझे देखकर मुस्कुराई। वे पहले से बेहतर लग रही थी। मैंने उनके बालों में कंघी की, हाथों में तेल लगाया और उनके साथ
बैठी रही। एक दिन वृद्धाश्रम की चालक ने मुझे एक तरफ ले जाकर कहा, "मैडम, आप रोज आती हैं।" बाकी बच्चे तो एक बार छोड़कर चले जाते हैं और फिर सालों नहीं आते। आपने तो हमें चौंका दिया है। मैंने कहा, "यह मेरी मां है। मैंने इनकी उंगली पकड़ कर चलना सीखा है। अब इनका सहारा बनना मेरा कर्तव्य है। कुछ दिनों में बाकी माताएं भी मुझसे घुल मिल गई। कोई अपनी दवाइयां मुझे सौंप देती, कोई कहती, बेटी आज मेरे सिर में दर्द है। थोड़ा तेल लगा दो और मैं सबका ध्यान रखती। मां के साथ भी समय बिताती,
बातें करती। मां का व्यवहार बदलने लगा था। वे वहां की औरतों से बातें करती, प्रार्थनाएं देती और अक्सर मुझसे स्नेह में कहती। यह सब मेरी जैसी माताएं हैं। इनका भी ध्यान रखना। मैंने एक सिलाई मशीन मंगवा ली और वृद्धाश्रम की छत वाले कमरे में रख दी। वहां बैठकर सिलाई करती। कुछ महिलाओं को भी सिखाने लगी। मैंने उनके लिए कपड़े सिलना शुरू कर दिए जो बाहर बेचने से थोड़ी आमदनी हो जाती। समीर ने इस बारे में कभी कुछ नहीं पूछा। हमारे घर में आपसी रिश्ता एक खामोश समझौता था जिसमें भावनाएं नहीं थी। बस समय गुजर रहा
था। अब वह वृद्धाश्रम मेरे दिन का वह हिस्सा बन गया था। जहां मैं खुलकर सांस ले पाती थी। जहां मेरे आसपास ऐसी महिलाएं थी जिन्होंने सब कुछ खोकर भी हार नहीं मानी थी। एक दिन मां ने मुझसे कहा बेटी यहां तो मेरी जैसी कई माएं हैं लेकिन इन सबको कोई प्रमिला नहीं मिली। भगवान तुम्हें सुरक्षित रखे। तुमने सिर्फ एक मां नहीं बल्कि कई माओं का सहारा बनकर दिखाया है। मैंने उनकी पेशानी को चूमा और मन ही मन ईश्वर का धन्यवाद किया कि जीवन ने मुझे यह अवसर दिया कि मैं किसी पर बोझ ना बनूं बल्कि
किसी का सहारा बन सकूं। जब से मां वृद्धाश्रम में आई थी, कुछ महीने बीत चुके थे। मैं रोज जाती, कभी दोपहर में, कभी शाम को। शुरू में मां की तबीयत काफी बेहतर लग रही थी। लेकिन पिछले कुछ दिनों से उनके चेहरे की चमक फीकी पड़ने लगी थी। उन्होंने खाना कम कर दिया था और बातों में भी कमी आ गई थी। एक दिन जब मैं पहुंची तो मां खाट पर लेटी थी और कंबल उनके सीने तक था जबकि मौसम गर्म था। मैंने उनके माथे पर हाथ रखा। वह गर्म था। मैंने पूछा मां तबीयत ठीक है? उन्होंने
धीरे से आंखें खोली और कहा बस हल्का सा बुखार है। कल से थोड़ी थकावट महसूस हो रही है। मैंने तुरंत सुलेखा बहन को बुलाया। वे आई मां की जांच की और कहा हम इन्हें कल अस्पताल ले चलते हैं। जांच करवा लेते हैं। उम्र का असर है। सतर्क रहना जरूरी है। अगले दिन मैं खुद मां को अस्पताल लेकर गई। खून की जांच, शुगर, बीपी सब चेक हुआ। डॉक्टर ने बताया कि कमजोरी बढ़ गई है। पोषण और आराम की सख्त जरूरत है। दवाइयां दी गई और कुछ सुझाव भी। घर आकर मैंने समीर से कहा, "मां की तबीयत
ठीक नहीं है। मैं कुछ दिन वृद्धाश्रम में ज्यादा समय बिताऊंगी। समीर ने संक्षेप में जवाब दिया, तुम्हारी मर्जी। अगले दिन जब मैं दोपहर में पहुंची, तो मां खाट पर लेटी थी और हाथ में कोई तस्वीर थी। आंखें बंद थी लेकिन होंठ हिल रहे थे। मैंने धीरे से पुकारा। मां उन्होंने आंखें खोली और धीमी आवाज में कहा। आ गई मेरी बच्ची। मैंने उनके हाथ दबाए और पूछा कैसी तबीयत है? उन्होंने कहा आज कुछ अच्छा नहीं लग रहा। शायद अब चलने का समय आ गया है। मैंने तुरंत उनकी बात काट दी। ऐसी बातें मत कीजिए। आप ठीक
हो जाएंगी। मैं आपकी दवा लेकर आती हूं। उन्होंने मेरा हाथ पकड़ लिया और कहा। बेटा जो समय भगवान ने तय किया होता है उसे कोई नहीं बदल सकता। लेकिन मैं संतुष्ट हूं कि मेरी बेटी ने वह सब कर दिखाया जो शायद बेटे भी ना कर पाते। मैं उनके सिरहाने बैठ गई और उनके सिर पर हाथ फेरते हुए बोली मां कुछ ही दिन की बात है। आप फिर से ठीक हो जाएंगी। हम दोनों बाजार चलेंगे। आपको नया दुपट्टा दिलवाऊंगी। मां हल्के से मुस्कुराई लेकिन वो मुस्कान कमजोर थी। उनकी आंखों में नमी उभर आई। उन्होंने कहा दुपट्टा
बाद में ले लेना। अभी तो सिर्फ तुम्हें आशीर्वाद दे रही हूं कि तुम हमेशा सुरक्षित रहो। उसी रात जब मैं घर गई तो दिल में एक अजीब सी बेचैनी थी। समीर से संक्षिप्त बातचीत हुई। फिर मैं सीधे बिस्तर पर चली गई लेकिन नींद नहीं आ रही थी। सुबह के समय फोन बजा। मिस्टर डीके की कॉल थी। मैंने तुरंत फोन उठाया। प्रमिला जी उनकी आवाज में शांति थी। फिर उन्होंने धीमी आवाज में कहा। प्रमिला बेटी मां अब इस दुनिया में नहीं रही। रात में उनकी तबीयत बिगड़ गई और वे हमें छोड़ गई। मेरे हाथ से फोन
गिरतेगिरते बचा। मैं कुछ देर स्तब्ध बैठी रही। फिर जल्दी से कपड़े बदले और रिक्शा लेकर वृद्धाश्रम पहुंच गई। मां की चारपाई पर अब सफेद चादर पड़ी थी। उनके चेहरे पर शांति थी। जैसे कोई बहुत थक कर गहरी नींद में सो गया हो। मैं उनके पास गई और उनका हाथ पकड़ा जो अब ठंडा हो चुका था। मेरी आंखों से आंसू बह रहे थे लेकिन मेरी आवाज बंद हो चुकी थी। मिस्टर डीके ने आकर मेरे कंधे पर हाथ रखा और कहा प्रमिला मां बहुत शांति से गई। उन्होंने आखिरी समय तक तुम्हारा नाम लिया। उनकी आखिरी प्रार्थना तुम्हारे
लिए थी। वृद्धाश्रम की दूसरी महिलाएं भी आ गई। कोई मेरा हाथ थामती। कोई प्रार्थना देती, कोई कहती हमने कभी किसी को मां की सेवा यूं करते नहीं देखा। मैं बस चुप रही। उस समय शब्द अर्थहीन हो गए थे। मां चली गई थी लेकिन उनकी छुवन मेरे हाथों में रह गई थी। अंतिम संस्कार का प्रबंध वृद्धाश्रम ने किया। मैंने कब्र के पास बैठकर उनकी मिट्टी को छुआ और दिल से प्रार्थना की। हे भगवान मेरी मां की कब्र को स्वर्ग का हिस्सा बनाना। वापसी पर जब मैं फिर वृद्धाश्रम पहुंची। वहां की महिलाएं मुझे गले लगाकर रोने लगी।
एक बुजुर्ग महिला ने कहा, प्रमिला हम सब भी तेरी मां हैं। तू सिर्फ अपनी मां की सेवा नहीं करती थी। तूने हम सबको बेटी जैसा प्रेम दिया है। मैंने उन सभी को देखा और कहा जब तक सांस है मैं हर मां की बेटी रहूंगी। जीवन में कई रिश्ते रास्ते में छूट जाते हैं। लेकिन जब मां का साया उठ जाता है तो इंसान अधूरा हो जाता है। मां के जाने के बाद कई दिनों तक मैंने खुद को वृद्धाश्रम के कार्यों में व्यस्त रखा। हर सुबह वहां जाकर किसी की दवा का पर्चा संभालना, किसी के कपड़े सिलवाना
और शाम को वहीं कुछ समय बिताकर मां की खाली चारपाई को देखती रहती। एक दिन जब मैं वृद्धाश्रम पहुंची तो दरवाजे पर एक अपरिचित महिला मेरा इंतजार कर रही थी। उनकी उम्र मध्यम थी। वस्त्र सादे थे। हाथ में पुरानी फाइल और आंखों में पहचान की चमक थी। उन्होंने मुझे देखकर कहा, "तुम प्रमिला हो?" सरोज की बेटी? मैंने सिर हिलाकर हां कहा। उन्होंने मुस्कुराते हुए फाइल आगे बढ़ाई और कहा, "मैं तुम्हारी मां की पुरानी दोस्त हूं।" मां तुम्हारी बहुत बातें करती थी। उनके जाने के बाद यह जिम्मेदारी मुझे सौंपी गई थी। जिसे उन्होंने विशेष रूप से
तुम्हें देने को कहा था। मैंने वह फाइल थामी और पूछा क्या अमानत है? उन्होंने कहा तुम घर जाकर देख लेना सब कुछ लिखा है। बस इतना जान लो तुम्हारी मां बहुत सोच समझ कर गई हैं। यह कहकर वे चली गई और मैं वहीं खड़ी रह गई। फाइल हाथ में और मन में सवालों का गुब्बार। घर आकर मैंने कमरा बंद किया और फाइल खोली। अंदर एक रजिस्ट्री के प्रति कुछ पत्र और एक वसीयतनामा था। पहले मैंने रजिस्ट्री देखी। वह नाना के गांव की लगभग 12 एकड़ कृषि भूमि थी जो मां के नाम थी। फिर मैंने वसीयतनामा
पढ़ा। उसमें लिखा था मैं सरोज अपनी जीवन के अंतिम सालों में अपनी जमीन और उससे जुड़ी समस्त संपत्ति अपनी बेटी प्रमिला के नाम करती हूं। मेरी मृत्यु के बाद यह सारी संपत्ति केवल उसी की होगी। आगे लिखा था मेरे बेटे समीर को इस संपत्ति से वंचित किया जाता है क्योंकि उसने मेरे साथ दुर्व्यवहार किया और मुझे अपने घर से निकाल दिया। मैं चाहती हूं कि जिसने मेरे दुख में साथ दिया वही मेरा उत्तराधिकारी बने। मैंने शब्द बैठी रही। आंखों के सामने मां का चेहरा आ गया। उनकी खामोशी, उनका सब्र, उनका दर्द। उन्होंने कभी इस बात
का जिक्र नहीं किया था। ना अपनी संपत्ति का, ना वसीयत का। उन्होंने अपनी जिंदगी में सिर झुकाया और अपनी मृत्यु के बाद भी एक तोहफा दे गई। समीर शाम को आया तो मैंने उसे सब बताया। वह सुनकर कुछ देर खामोश रहा। फिर बोला तो अब तुम जमीन की मालकिन हो। मैंने हां में सिर हिलाया लेकिन यह जमीन मां की है। उन्होंने मुझे दी है इसलिए मैं चाहती हूं। इसका उपयोग भी वैसा हो जैसा वह चाहती थी। समीर ने पूछा। क्या सोचा है तुमने? मैंने जवाब दिया। पहले तो रजिस्ट्री करवाऊंगी। फिर उस जमीन का कुछ हिस्सा
बेचकर वृद्धाश्रम में सुधार का काम करवाऊंगी। मां के नाम से और कुछ पैसों से अपनी इस लाइफ फैक्ट्री को आगे बढ़ाऊंगी। मां ने जो बीज बोया था, मैं उसे एक वृक्ष बनाना चाहती हूं। अगले दिन मैं वकील के पास गई। रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया की जानकारी ली और सब कुछ पूरा किया। गांव के मुखिया से भी संपर्क किया। कुछ हफ्तों में जमीन पूरी तरह से मेरे नाम पर हो चुकी थी। एक दिन संयोग से मैं बाजार में भाई समीर से टकरा गई। वो कुछ खरीदने आया था और मेरी नजर उस पर पड़ी तो एक पल में
सारे रिश्ते मन में उभर आए। उसने मुझे देखा और एक पल के लिए नजरें झुका ली। मैं आगे बढ़ी और कहा नमस्ते भाई। उसने झिंझकते हुए जवाब दिया। नमस्ते। आप यहां मैंने कहा हां कुछ जरूरी काम था। और आप सब कुशल उसने सिर हिलाया। हां, बस गुजर-बसरर हो रही है। फिर उसने एक सवाल कर ही लिया। सुना है मां ने सारी संपत्ति तुम्हारे नाम कर दी। मैंने शांतिपूक उत्तर दिया। हां, उन्होंने अपनी वसीयत में सब कुछ मेरे नाम कर दिया था। वह चुप हो गया। फिर बोला, "हमसे गलती हुई। मैंने हालात समझे। लेकिन कहा, शायद
अब देर हो चुकी है। कुछ चीजों की कीमत समय पर चुकानी पड़ती है। वरना वो हाथ से निकल जाती है। वह कुछ कहना चाहता था। लेकिन मैंने विदा ली। अलविदा भाई जब मैं घर लौटी तो दिल में एक अजीब सा एहसास था। ना खुशी थी ना गम। बस एक खालीपन था जो मां की वसीयत ने और गहरा कर दिया था। जमीन मेरे नाम हो चुकी थी और मैंने पहला कदम वहीं उठाया जो मां शायद अपनी जिंदगी में उठाना चाहती थी। लेकिन समय, परिस्थितियों और लोगों ने उन्हें मौका नहीं दिया। वृद्धाश्रम में एक नया खंड बनवाने
की योजना तुरंत शुरू कर दी। यह खंड विशेष रूप से उन बुजुर्ग महिलाओं के लिए था जिन्हें उनके घर वालों ने छोड़ दिया था। मैंने उसका नाम रखा सरोज कक्ष मेरी मां के नाम पर। वृद्धाश्रम का वह हिस्सा बदल रहा था। नई चारपाइयां, रोशन कमरे, साफ सुथरे स्नान घर और हर कमरे के बाहर एक नीम का पेड़ ताकि छांव भी हो और ताजी हवा भी। जहां तक फैक्ट्री की बात है, वह एक छोटे से कमरे में मां की सिलाई मशीन से शुरू हुई थी। जब मुझे जमीन मिली तो मैंने उस फैक्ट्री को एक व्यवस्थित संस्थान
में बदला। नाम रखा सरोज क्रिएशंस। वहां मैंने सिलाई, कढ़ाई, बुनाई और छोटी दस्तकारी के काम शुरू कराए। अधिकतर महिलाएं वही थी जिन्हें उनके घरों से निकाल दिया गया था। यह वे थी जिनके पास हुनर तो था लेकिन अवसर नहीं। रोज सुबह मैं फैक्ट्री जाती, काम देखती, आर्डर चेक करती, मजदूरों की बातें सुनती और शाम को वृद्धाश्रम आ जाती। मेरी जिंदगी अब दो हिस्सों में बंटी थी। लेकिन सुकून दोनों जगहों से आता था। हर दिन एक नई सफलता, हर चेहरे पर नई उम्मीद। घर के हालात मां की बदौलत अब बहुत बेहतर हो चुके थे। हम एक
अच्छे किराए के घर में रहने लगे थे। पति समीर भी अपने बर्ताव पर बेहद शर्मिंदा था। पर मुझे उससे कोई शिकायत नहीं थी। जब सगा बेटा बदल सकता है तो दामाद का क्या कसूर? कुछ दिन बाद मैं एक धार्मिक संस्था में शामिल थी जहां मेरी फैक्ट्री का स्टॉल भी लगा था। वहीं एक चेहरा अचानक सामने आ गया जिसे देखे बहुत समय हो गया था। भाई समीर सादा वस्त्रों में चेहरे पर पछतावा और आंखों में शर्मिंदगीगी मेरी ओर बढ़ते हुए बोला प्रमिला मैंने ठंडे स्वर में जवाब दिया। जी भाई उसने झिंझकते हुए कहा बस यूं ही
आया था दर्शन और टहलने के लिए। तुम्हारा नाम देखा तो दिल कुछ महसूस करने लगा। मैंने कहा आपकी जिंदगी में सच्चाई का समय तो बहुत पहले ही गुजर चुका। अब जो बचा है वो केवल जवाब है। वो चुप हो गया। कुछ पल बाद बोला प्रमिला मां के जाने के बाद मैं बहुत उदास रहता हूं। लगता है जैसे सब कुछ खो गया हो। मैंने गहरी नजर से उसे देखा और कहा जब मां को घर से निकाला था तब सोचा था कि सिर्फ एक बुरी औरत जा रही है। असल में तुम अपनी जड़ काट रहे थे। जिन
माता-पिता को छोड़ दिया जाए वही तुम्हें छोड़ देते हैं और उनके साथ तुम्हारा नसीब भी चला जाता है। उसने धीरे से कहा मुझे अपनी गलती का एहसास है और शायद यही मेरी सजा है। मैंने उत्तर दिया। सज्जा समय देता है और समय ही क्षमा करता है। मेरी तरफ से क्षमा है लेकिन तुम मां के चरणों की धूल अब दोबारा नहीं पा सकोगे। मैं मुड़कर अपने स्टॉल की ओर चली गई। पीछे से कोई आवाज नहीं आई। मैं जानती थी समय ने उसे सब कुछ सीखा दिया था। वृद्धाश्रम में सरोज आश्रय पूरी तरह बन चुका था। उसकी
एक समापन समारोह रखी गई। जिसमें शहर के प्रमुख लोग आए। मैंने मां की एक बड़ी तस्वीर बीच की दीवार पर लगवाई और नीचे लिखवाया। जिसने दिया कभी वापस नहीं मांगा। जिसने सहा कभी शिकायत नहीं की। यह उन सबके नाम जिन्होंने अपनी बेटी को दुनिया की सबसे अनमोल विरासत दी। साहस मैंने चुपचाप उस तस्वीर को देखा। आंखें नम थी, लेकिन दिल मजबूत था। जिंदगी ने मुझे बहुत कुछ दिखाया। लेकिन मेरी मां ने सिखाया कि दुख से डरना नहीं चाहिए। उसे एक अवसर समझो और मैंने उस शिक्षा को अपनी पूरी जिंदगी में अपनाया। आज मैं अकेली नहीं
थी। मेरा पति था, मेरी फैक्ट्री थी। मेरी मां की यादें थी। वो मां जिन्होंने मुझे बेटी कहा और वह खुशबू जो सिर्फ एक सच्चे रिश्ते से आती है। मां की सेवा कभी व्यर्थ नहीं जाती। वह प्रार्थनाओं में छिपी हुई स्वर्ग होती है। जो माता-पिता को छोड़ते हैं। भाग्य उनसे स्वयं दूर चला जाता है। इस कहानी का मूल संदेश मोरल यह है कि मांबाप का सम्मान और सेवा जीवन की सबसे बड़ी दौलत है। जो लोग अपने माता-पिता को त्याग देते हैं, वे अपने भाग्य और सुख से भी हाथ धो बैठते हैं। लेकिन जो संतान उनके संस्कारों
और सपनों को आगे बढ़ाती है, वह न सिर्फ समाज में सम्मान पाती है बल्कि आत्मिक शांति और सच्ची सफलता भी अर्जित करती है। तो दोस्तों, यह थी आज की कहानी। इस कहानी के बारे में आपकी क्या राय थी? यह कमेंट बॉक्स में जरूर बताइए। अगर आपको कहानी पसंद आई हो तो वीडियो को लाइक करें और स्टोरी कॉर्नर चैनल को सब्सक्राइब करें और बेल आइकन पर क्लिक करके इसे ऑल पर सेट करें ताकि आपको नए वीडियो की सूचना तुरंत मिल जाएगी। धन्यवाद।
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