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क्या उचित है क्या अनुचित है ? | तात्त्विक सत्संग | Pushkar Ekantvas Satsang |Part-11| Asharamji Bapu

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Sant Shri Asharamji Bapu
अब एक ऊंची बात पर आ जाते हैं और भी ऊंची बात ध्यान से सुनना सभी लोग प्रयत्न कर रहे हैं अपनी अपनी इच्छा के अनुसार सुखी होने के लिए कोई बेटे से कोई धन से कोई तप से कोई प्रसिद्धि से कोई उपदेश लेने से कोई उपदेश देने से लेकिन सब सुख के लिए बिचारे धमाधम कर रहे भगवानों की रीत रिवाजों की भी कमी नहीं है और समझाने वालों की भी कमी नहीं है लेकिन सभी अतृप्त है कोई पूर्णता वाला नहीं दिखता क्या कारण है पूर्ण तृप्ति पूर्ण ज्ञान पूर्ण संतोष नहीं दिखता बेवकूफी से थोड़ा मान
ले के आज नौकरी बढ़िया है 50 हज मैंने का काम संतोष है लेकिन आत्म संतोष नहीं मिलेगा कितनी भी कुछ चीजें आ जाए फिर भी अंदर कोई मांग और कोई खटक बनी रहती है सभी का यल कुछ ना कुछ और पाने की जानने की कहीं पहुंचने की खटक भटक बनी रहती ज नहीं पाया जो नहीं पहुंचे वहां पहुंचने के बाद भी फिर खटक बनी रहती जहां नहीं गए वहां जाने के बाद भी कुछ ना कुछ और पाने की पाने की पाने की जानने की करने की पहुंचने की कुछ ना कुछ मांग बनी रहती पूर्ण तृप्ति
पूर्ण संतोष नहीं रहता क्योंकि जीवात्मा पूर्ण का अंश है और जब तक उसे पूर्ण सुख नहीं मिला तब तक उसको पूर्ण संतोष नहीं होगा तोब क्या करें कोई उपाय है कोई जगह है कोई रास्ता है कि है उपाय है जगह है रास्ता है व उपाय क्या है जगह कहां है रास्ता क्या है सद ग्रंथ पढ़ के सुना मैंने यह जो सुनाया इसी ग्रंथ का सुनकर आपको सुनाया है सुबह मैंने सुना था ये मुझे बहुत अच्छा लगा तो मुझे जो याद रहा थोड़ा सा आपको सुनाया जीवन मिला है परंतु इसे कैसे बिताएं यह जीवन है क्या
और किस लिए मिला है पहले इसे जानना आवश्यक है कैसे जाने अपने हित का पता कैसे लगाएं इतनी विविधता वासनाओं का भयंकर जाल अनेक प्रकार की जानकारियां प्रलोभन तथा भयो का नाच विविध विविध विरोधी तर्क विचार और मान्यताएं उपस्थित रहने पर क्या करें क्या ना करें क्या उचित है क्या अनुचित तर्क मान्यताएं वासना है कल्पनाएं संकेत क्या करें क्या ना करें और इतना करते कराते भी पूर्ण संतोष तो नहीं क्या सत्य है क्या व्यर्थ है यह सब मानव जीवन की बड़ी समस्याएं हैं मार्गदर्शक कोई दिखता नहीं महाभारत में भी यह अनुभव किया गया है कि
परिछन सदैव विवादास्पद होता है परिछन सदैव विवादास्पद होता है जो सीमा में है माप में है वह विवादास्पद होता है से कट जाएगा समय से हट जाएगा क्या करता है गुरु जी ऐसी डाट लगाई कि अभी तक याद है वर्क वैल्यू वर्क ध्यान से सुनना है भाव समाधि में नहीं बैठना कुछ मूर्ख लोग ध्यान के समय सत्संग के समय माला लेकर ढोंग करते रहते य गलत बात है हमारे सत्संग में ऐसा लो नहीं होता सत्संग के समय सत्संग ही सुने माला के समय माला कर आंखें बंद करके ध्यान से सत्संग सुनता है तो बलिहारी पर
ममते आंखे खोली साभ बाजी ज नहीं तो प्रॉब्लम शांति न जीरो महानता ब्रह्म अद्वैता में निष्ठावान व्यक्ति जिस प्रकार से पहुंचा है वही उपयुक्त मार्ग है मार्ग है अद्वैत ब्रह्म में परमात्मा में निष्ठावान व्यक्ति महापुरुष जैसे जहां से पहुंचे हैं जैसे पहुंचे जहां पहुंचे वही मार्ग है जो परिछन में जी रहा है संसार जिसको सच्चा लगता है और भोग से जिसको सुख मिलता है उसका मार्गदर्शन भी ऐसे ही होगा ना भोगी ना त्यागी त्याग एक छोर है भोग दूसरा छोर है उत्तम व्यक्ति तो त्याग और भोग दोनों से उपरा होते अपने परमात्मा स्वरूप में योग
में भोग जोग जा के नहीं सो विद्वान निरोग ना त्याग का आग्रह ना भोग की वासना है वह निरोग पद में पहुंचे हुए महापुरुषों का अनुसरण एक बार अर्जुन को श्री कृष्ण ने पूछा तुम समझे तो अर्जुन जरा मीठी ठंडी हवा में झोके में आ गए तो रथ पर हनुमान जी बैठे थे उन्होंने कहा प्रभु मैं समझा तो अरे उपदेश देने वाले से ऊपर बैठकर उपदेश सुना ये तो प्रेतों का काम है तो हनुमान जी को दंड मिला एक बार प्रेत योनि में जाओ तो प्रेत योनि का भी हनुमान जी इतना चतुर रहे कि सीख
सखा के जान जना के आए तो हनुमान जब नाम सुनावे भूत प्रेत कोई निकट ना आवे तो जो लोग सत्संग के प्रेमी है तो उनको सत्संग सुनने के नियम के अनुसार सत्संग सुनना चाहिए ऊपर छाती पर चढ़कर सो हम सोहम करते हुए सत्संग नहीं फलता तर को तिष्ठ श्रुति विभिन्ना नको मुरस मतम प्रमाणम धर्मस्य तत्वम हितम गुहा धर्मस्य तत्वम निहित गुहायलट से कोई स्थिर निर्णय हो नहीं पाता शास्त्रों के विरोधा भासों की संगति लगाना कठिन हो रहा है स्वयं की विभिन्न स्वीकृति होने से स्वयं की भी विभिन्न विभिन्न स्वीकृति है सबकी अपनी अपनी मान्यता है
ऐसा करें तो ठीक रहेगा ऐसा रहे तो ठीक रहेगा ऐसा तो ठीक वास्तव में ठीक क्या है जिन्होंने वास्तविक ठीक यात्रा कर ली है उनके ही संकेत में वास्तविकता है अर्जुन अपने ढंग से यह ठीक है यह बे ठीक है मान रहे थे लेकिन श्री कृष्ण जानते हैं क्या ठीक है क्या बे ठीक राम जी वशिष्ठ जी ने बताया क्या ठीक है क्या गलत है क्या सही है हे राम जी सूरमा हो के युद्ध करो लेकिन हृदय से शीला की नहीं आप कर्तृत्व पद में रहो अर्जुन को भी वही उपदेश जो रामावतार में शिष्य होकर
श्री राम जी ने सुना वही कृष्णावतार में जगतगुरु होकर अर्जुन को उपदेश दिया तुम साक्षी हो तुम ब्रह्मा हो दृष्टा हो ये रामावतार में सुना और कृष्ण अवतार में अर्जुन को वो उपदेश दिया सभी समझदार की जीवन शैली में बड़ा अंतर देखा जाता समझदार की जीवन शैली में अंतर है तो आखिर सत्य क्या है सभी समझदार के जीवन मुंडे मुंडे मति भिन्ना श्रुति भिन्ना सुमत मप भिन्ना नाना मुनि रस्य वचन भिन्न धर्मस्य तत्वम हितम गुहा या धर्म का जो सार तत्व है सत्य तत्व बड़ा गोपनीय जैसे एक पिता बई खाता में लिख गया कि बहादुर
आसु शुद्ध छट के दिन मंदिर के कलश में एक लाख सोना मोहर रखे हैं वक्त पर बेटा जरूरत पड़े तो काम लीज जल्दबाजी मत करियो समय पाकर बेटे को तंगी हुई भाई खाता खोला तो लाख सोना मोहर कलश में है आदमी चढ़ा है तो सोना मोर दिखा नहीं देखा कि आसपास चुनाई में चुने होंगे मंदिर का घुमट तुड़वा दिया जरा जरा ईट कर दी एक भी सोना मोर नहीं मिला तो और फजीति हो गई तो गया किसी बुजुर्ग के पास कि मेरे पिताजी इस झूठ तो लिखेंगे नहीं लेकिन सोना मोर तो हमारे घर के प्रांगण
के मंदिर का नाम है उसी मंदिर और लिखा है आसो सुत छट लेकिन है नहीं वो बुजर्ग समझ गया बोले जैसा मंदिर था बिल्कुल आप बेह बना लो आसो छठ कितने बजे लिखा है बोले 10 बजे सोना मोर डाले ले ठीक है आ सुत सुध छठ 9:30 बजे आ जाना मेरे को बुलाने को तो मैं तेरे को बताऊंगा कि कहां सोना वहां सध सुध छट को बुड्ढे को बुलाया पौने बजे बोले बता दो बोले ठहरो बराबर आसु सुद छट का कलश का परछा कहां गिरता है उस परछाई की जगह पर निशाना मार के बुढे ने
कहा यहां खो दो सोना मर मिल गए तो यय बात लिखी थी ना ऐसे ही परमात्मा प्राप्ति की परमात्मा अनुभव की भी कोई गुह बात है और वो गुह बात गुय तर गुय तम है ये तो वो वो तो बाहर दृश्य मान चीज से और परमात्मा तत्व दृश्य मान नहीं है यह तो अनुभव का विषय है तो इस संकल्प किसी म जगे हुए पुरुषों के विचार विमर्श में सत्संग में आते आते परस्पर संकल्प का बल मिलता है तभी काम बनता है ये तो हमने बहुत पापड़ वेले थे इसलिए कहते हैं गुरु कृपा ही केवलम शिष्य
स्य परम मंगलम सुन सुनंद दे पावई रा बिन सत्संग विवेक न होई सत्संग के बिना हम कौन है और का हमारी साधना है विवेक भी नहीं होता आजकल तो कथा वार्ताओं को कहानियों को भी सत्संग बोल देते हैं सत्य स्वरूप परमेश्वर का संग कराने वाली उपनिषद पर जो चर्चा व सत्संग सभी व्यक्ति अपनी बुद्धि को शे श मानते हैं रहस्य ही बना हुआ है सब कुछ कौन महान है यह निर्णय हो कैसे निर्णायक शक्ति भी काम नहीं कर पाती सारा जीवन बह रहा है प्रवाह में असंतोष भी पीछा नहीं छोड़ रहा है असंतोष भी पीछा
नहीं छोड़ रहा और ये कृपा है उसकी कि थोड़ा असंतोष है तभी कुछ यात्रा कर रहे हैं भाग रहे हैं असंतोष पीछा नहीं छोड़ रहा सभी को चाहे पढ़ने वाले हो चाहे भजन करने वाले हो चाहे डॉलर वाले हो कक ने क जी बाकी रही कक ना कक पाम मानू कुछ ना कुछ खुट है हम असंतोष भी पीछा नहीं छोड़ रहा है अभी सार बात आएगी बहुत ऊंची बात आ जीवन एक प्रश्न बना है सुख की प्यास बुझती नहीं और सुख मिलता नहीं सुख की प्यास बुझती नहीं सुख मिलता नहीं जो मिलता है सुख आभास
मिलता है थोड़ा सा सुख फिर वैसे के वैसे उल्टे नित्य नई प्रतिकूलता एं इंतजार करती रहती हैं क्या है क्या हो क्या करें कहां जाएं क्या है क्या हो क्या करें कहां जाए यह प्रश्न बनाया आखिर क्या करें इतना करने के बाद भी आत्मा लाभ तो नहीं हुआ सब दुख तो नहीं मिटे तो क्या हो क्या करें कहां जाए क्या सोचे ना जिया जाता है ना मरा जाता है एक असहाय दशा मजबूरी और मुख वेदना में समय बीता जा रहा है स्वयं इस दशा को प्राप्त समाज भी जब देखो तब उपदेश आक्षेप निंदा स्तुति आलोचना
आदि के द्वारा अपन लोग क्या गलती करते हैं द्वेष करते हैं आलोचना करते हैं निंदा करते हैं स्तुति करते हैं ये ऐसा है वो ऐसा है वो ऐसा है यह ठीक नहीं है यह गलत है यह सही है लेकिन अपने गलत सही करने वाले अपन भी तो तृप्त नहीं है दूसरों को बोलते हैं भई ये तुमने ठीक नहीं किया तो अपने में भी तो बेठ किया छुपी हुई है य गलत है यह सही है यह क्रोधी है यह लोभी है यह लालची है लेकिन हम अपना भी तो करें कि उसमें परब्रह्म हमको नहीं दिख रहा
है भाई परिछन को तो विवादास्पद ही मानो जो सीमा में उसमें तो कुछ ना कुछ गुण दोष तो होगा ही किसकिस से वेर बांधो किसकिस के गुण और दोष गिनो गुण और दोष में तो सारी सृष्टि है जब से दुनिया चली तब से ही चल पड़ा है देवासुर भला बुरा अपने शरीर में भी है हितकारी और हानिकारक बैक्टीरिया अपने मन में भी हितकारी और अवानी काक विचार हमारे बुद्धि में भी हित कर और अहित कर दोनों धाराएं चलती रहती अब क्या करें सुमति कुमति सभ के उर रही अब क्या करें देखो क्या करें बहुत ऊंची
बात आती है भ्रांतियां बनती रहती है चाहे कितनी कोशिश करें वे हटती नहीं भ्रांति बनती रहती है कितनी भी कोशिश करें कहीं ना कहीं तिकड़म बाजी होती रहती है हां जी समाज वासनाओं के घेरे में डूबा है और वह अपनी वासना की पूर्ति के लिए दूसरों के प्रति वासनाओं के जाल फैला रहा है स्वयं बेटा ऐसा कर ले मां के लिए बेटा पिता के लिए ऐसा कर ले बहु ऐसा कर ले ऐसा करले अपनी वासना तृप्ति के लिए दूसरों को बबलू बनाया जा रहा है हा स्वयं दुखी स्वयं समस्या वान स्वयं भ्रांत और स्वयं अतृप्त
रहकर दूसरों की समस्या हल करने के अहंकार से भी समाज ग्रस्त है आय हाय कितनी ऊंची बात है ये आपकी हमारी सबकी कहानी है हम विश्व की धन संपत्ति ऐश्वर्य भ्रम अरबों मनुष्यों की बुद्धि आविष्कार चमत्कार भावनाएं तथा सिद्धांत मिलकर भी एक व्यक्ति को शांत संतुष्ट नहीं कर पा रहे हैं अरबों अरबों मनुष्यों के बुद्धि और खरबों खरबों की संपत्ति और विचार और सिद्धांत और कानून य सब मिलकर भी एक आदमी को भी शांत और तृप्त नहीं कर पा रहे जो कह दे कि हां मेरे जीवन में पूरा संतोष मुझे मृत्यु का भय नहीं मुझे
कोई वासना नहीं है कोई खपे नहीं कोई चाहे कुछ भी हो जाए चाहे सूर्य बर्फ का गेंद होकर घूमने लग जाए और पृथ्वी आकाश में उड़ने लग जाए फिर भी तत्ता को आश्चर्य नहीं होता उद्वेग नहीं होता ऐसा कोई तत्ता नहीं बन पाया नहीं मिल पाता इतना सब होने पर भी क्योंकि यह सारी बुद्धि मिलकर बहुमति से सत्य का परख नहीं होती सतम से सत्य का साक्ष बहुमति नहीं सतम ऐसी स्थिति में क्या कोई मार्ग है क्या कोई आशा हो सकती है क्या कोई हित है अरे हित और साथ में ही है ते है साथ
में ही है और उसको भूलते रहो फिर भी प्रेरणा देता रहता है तेसी और बड़ा जानकार है तेसी और कभी थकता नहीं है तेसी और कहीं फसने देता नहीं है फसते रहते फिर भी वन निकालने की चेष्टा करता रहता है ऐसा परम हितेश अपना आत्म देव परमेश्वर अपने साथ बैठा है न जाने किस किस संत को प्रेरणा देकर हम तक पहुंचा देते ना जाने हमको कैसी कैसी प्रेरणा देकर संत तक पहुंचा देता वही देसी है वही परमात्मा है वही आत्म देव है वह सबको प्राप्त है वह मार्गदर्शक सबको प्राप्त है जब से जीवन का प्रारंभ
हुआ तब से प्राप्त है अभी प्राप्त है जीवन के अवसान तक प्राप्त रहेगा अनायास प्राप्त है सर्वकाल में सर्व देश में प्राप्त है सत्व रज तम सभी परिस्थितियों में प्राप्त ध्यान से सुनना सत्व गुण आए रजोगुण आए तमोगुण आए समाधि आए निद्रा आए स्वप्ना आए और जाए फिर भी वह जाता आता नहीं ऐसा परमात्मा देव है कैसा प्राप्त है मित्र आए शत्रु आए गरीबी आए अमीर आए जाए लेकिन वह हमारा साथ नहीं छोड़ता कहीं भी कुछ भी मिल जाए फिर भी व हमें व उल्लू होने नहीं देता अतृप्त की ज ना जगाता रहता है और
कुछ करो कुछ पाओ कुछ करो कुछ करो और और और चरे विधि चरे चरे आगे बढ़ो आगे बढ़ो आगे बढ़ो आगे बढ़ा बढा के अपने से मिलाना चाहता है वह ऐसा दयालु ऐसा तेसी सुदम सर्व भूता नाम प्राणी मात्र के परम स सत्व रज तम तीनों के प्रभावों से सर्वथा असंग है असंग है सत्व से रज से तम से तीनों के प्रभावों से असंग है हम कभी सात्विक बनते राजस बनते तामस बनते उसका प्रभाव मन बुद्धि पर हम पर पड़ता है उस दृष्टा परमेश्वर स्वभाव पर नहीं पड़ता निरंतर हिता हित का प्रकाश कर रहा है
सामान्य रूप से भी निरंतर हिता हित का हम अगर वासना के वेग से कुछ कर भी लेते स्वार्थ पूर्ण तो फिर अंदर असंतोष जगा देता है नालतली तरफ चलते हैं तो उत्साह भर देता है प्रेय की तरफ चलते हैं तो फ गलानी भर देता है कहीं कुछ गलत कर बैठते हैं कोई देखता नहीं फिर भी गलत करते हैं कुछ छुपा के तभी भी अंदर से तो टोकता है और कोई देखे ना देखे धन्यवाद दे ना दे और बढ़िया करते तो अंदर से प्रोत्साहित करता है क्यों कोई नहीं है हमारा है सु है मार्गदर्शक हम अनाथ
नहीं है हम अनाथ नहीं है अरे बोले महाराज आप इधर अकेले पड़े हो आप अकेले आपका कोई नहीं है कोई नहीं है कोई नहीं है जहां से कहा जाता है वही हमारा है बेटा कोई नहीं है आबू की गुफा में सांप आ जाते थे एक बार तो सांप के ऊपर पैर पड़ा इतना दयालु सांप क्या बिचारे ने काटा भी नहीं बड़ा वैसे काले सांप आबू की नल गुफ में साप आए गुजर गए य हो ग व सांप का प्रेरक भी तो वही है कि कहां काटना कहां से चले जाना जब वो प्रारब्ध होता है सांप
के द्वारा मरने की तभी काटेगा कैसा निता है कैसा प्रेरक है चिंता जीरो निरंतर हित अहित का प्रकाश कर रहा है सामान्य रूप से भी और विशेष रूप से हा सामान्य रूप से भी और विशेष रूप से भी नित्य हित अहित का प्रकाश कर रहा है प्रेरणा भी दे रहा है यह गलत है यह सही है तामा सा है यह राजास है दोबारा गलती नहीं करूंगा फिर भी करते फिर भी टोकता है बाप रे बाप ईश्वर जैसा कोई सष्ण ब्रह्मांड में नहीं होगा हम कितनी भी बेवकूफी करते लेकिन वह कभी थकता नहीं रोकने ठोकने से
आय हम कितनी भी मां तो कभी थकती उती तमाचा ठोक देती भाई मित्र बंधु अ जा अलग हो जा लेकिन वो अलग भी नहीं होता अलग भी नहीं करता स शरीर चाहे अलग हो जाए तुम्हारा लेकिन मैं तुमसे अलग नहीं होता हूं हे प्रभु मित्र संत है नारायण बापु उनका नाम है बैठे थे उठने की इच्छा नहीं होती और लगा के शिवरात्रि है शिव मंदिर में भी जाना है जरा शिव जी को आलिंगन करना उठने की रुचि नहीं होती पुजारी ने तो मंदिर मंदिर ताले लगा दिए बाबा जी अपनी गुफा में दूसरे दिन आकर पुजारी
ने देखा तो अरे ये तो महाराज अंदर शिवलिंग को आलिंगन करके बैठे गुरु जी हम तो आपको अंदर पूर के तो नहीं गए थे तो जहां मन तीव्र गति से चिंतन करता शरीर वहां हो जाता हा वह हितेश ही नहीं परम हितेश है व हितेश नहीं परम हितेश है मित्र नहीं परम मित्र है परम सुर है लोक से लेकर परमार्थ तक पशु पक्षी से लेकर मनुष्य देव असुर महान तक अब से लेकर तब तक यहां से लेकर वहां तक अखंड रूप से मार्गदर्शन कर रहा है कहां जाए कोई है कि नहीं है हे पूरा प्रभु
आराध पूरा जा का ना नानक पूरा पाइए पूरे के गुण गा है मार्गदर्शन कर रहा है करता रहा है करता रहेगा य बात है पूर्णता पर्यंत कर रहा है कर रहा था कर रहा है करता रहेगा पूर्णता पर्यंत अरे अब क्या करेंगे क्या होगा मेरा है है प्रभु तुम्हारी जय हो क्या उसके लिए प्यार नहीं पैदा होता हम लोगों के दिल में धन्यवाद नहीं पैदा होता कैसा दयालु कैसा प्रेरक कैसा हि देशी और कितना निकट और कैसा छुपा हुआ है हकीकत में छुपा हुआ नहीं है हमारी ही इंद्रियों को और जगत को सत्य मानते इसलिए
छुपा लगता है वास्तव में वही है व कौन सी चीज से उसको छुपाए गे ऐसी कोई चीज नहीं जिससे उनको ढक सके फिर भी एक चीज है अज्ञान न आवत ज्ञानम अज्ञान से ज्ञान आवृत हो गया तेन मोहंती जं तवा मोह निशा सब न हारा देखत सपन अनेक प्रकारा मोह निशा में सो रहे अनेक प्रकार के स्वपने देख रहे मैं फ्रूट वाला हूं मैं पत्नी वाला हूं मैं पति वाला हूं मैं मकान वाला हूं अरे भैया तू भगवान वाला है लाला मैं ब्यावर वाला हूं मैं किशनगढ़ वाला हूं मैं अजमेर वाला हूं मैं राजस्थान वाला
हूं अरे तू ईश्वर वाला है लाला हाय हायना हालन जो वतन विसार उनके य बाहर के हाल को वर्णन को है फलत जिन्होंने अपना असली वतन विसार दिया वास्तव में हम प्रभु के हैं प्रभु हमारे हैं और परम हितेश है सुहृद है मार्गदर्शन कर रहे थे कर रहे करते ही रहेंगे पूर्णता पर्यंत [संगीत] रोज कौन जगाता है नींद से आलाराम जगाता है या पति-पत्नी जगाती या तुम जगते हो अरे जगाने वाला ना हो तो तुम हम क्या जगे वा कैसी लीला है रक्त वाहिनी में रक्त संचारित हो रहा है अन्न बन अन्न में से रक्त
बन रहा है आंखों का तेज बन रहा है शत्र इंद्र बन रही है सब यात्रा करते अनुभव करती शरीर छोड़ो फिर दूसरा शरीर तीसरा जैसे शिव मंदिर में जाते समय सीढ़ियों के को पैरों तले लाते लाते ऊपर पहुंचते ऐसे जन्म जन्मों के अनुभव को लागते लागते ऊपर एक को ब्रह्म दुत नास्ति तक पहुंचना हम न तुम दफ्तर गुम अपनी मैं मिटी तो भगवान भगवान पना भी छोड़ देते लहर लहर पना छोड़ दे तो सागर सागर पना भी छोड़ देता है दोनों पानी है ऐसे ही दोनों एक चैतन्य दत ओ शांतो शांति अशांति सुख दुख में
सब में तही त हीत जैसे स्वपने में अनेक रूप अनेक रंग अनेक व्यवहार दिल्ली से बैठे मधम धमाम मधम धमा आ की रबड़ी बड़ी ले रबड़ी रबड़ी बड़ी और फिर मारवा खाले खाले खाले रे ऐसे करते अजमेर आए अजमेर जो खीर मिठो अजमेर में फिर दूध मिठा चलता है अजमेर जो खीर मिठो व आनंद गए आनंदना गोटा ले ले मुंबई न हेलो इस सपने में सब देखा लेकिन वही चैतन्य हलवा बेचने वाला वही पैसेंजर वही रेल और वही खाने वाला और वही देखने वाला और आंख खुली तो सब तुम्हारे उस दिल भर के खेल थे
जैसे सपने में ये अच्छा यह बुरा सब दिख रहे थे अच्छे से बुरे से क्या लड़ो झगड़ो खाली जग जा बस ऐसे ही यहां भी ऐसे ही है ऐसा है इसने ऐसा इसको मारा उसने ऐसा किया किया तो सब सपना है मराज होता रहता हम आश्चर्य नहीं करते कोई कैसे भी समाचार सुनाता हमारे चित्त में गुरु कृपा से कोई उसका सत्य रेखा नहीं खींचती किसी ने सुनाया सुन लिया जैसे बहते पानी में लकीर हो गया ठीक है गुण दोष में संसार है क्या है होता रहता है सब उमा कहा में अनुभव अपना सत्य हरि भजन
जगत सब स्वपना स्वपने जगत है जैसा स्वपना रन का तैसा ये संसार कहां जाए कोई मार्गदर्शक है कोई हितेश है कोई प्रेरक है क्या होगा अरे सदियां बीत गई जो हितेश है रक्षक है प्रेरक है वो यहां तक तो सूझबूझ तक तो ले आया है आगे भी वही रहेगा ओ
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