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प्रतीति और प्राप्ति क्या है ? || संध्या सत्संग 06-09-2024 Evening Sandhya || Ashramsandhya #satsang

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Ashram Sandhya
तो मनुष्य को अपने जीवन काल में ईश्वर का ज्ञान पा लेना चाहिए और संसार की आसक्ति छोड़ लेनी चाहिए आसक्ति छूटने से बंधन कम हो जाते और ज्ञान पाने से भगवत सामर्थ्य आ जाता है यह मंदिरों में जो भगवान है वह तो भगवान की मूर्ति है भावना से दर्शन करते करते प्रार्थना करते करते करते जब आप अनजाने में भगवान के साथ एक हो जाते हो तब प्रार्थना फलती है लेकिन ये शास्त्र प के भगवान के ज्ञान के साथ जानकर जब एक होते हो तो प्रार्थना क्या करना यह दे दो यह दे दो फिर तो सब
जगह भगवान ही भगवान का बोध हो जाएगा संत का वीर के पास एक सज्जन आए बड़े अच्छे आदमी थे सरल थे सुखी घर के भी थे भक्ति भाव करते थे संत कबीर अपनी मस्ती में थे और प्रणाम किया बोले महाराज होई जब संत अनुकूला जब संत अनुकूल हो प्रसन्न हो तो मनोवांछित फल मिलता है महाराज हमको तो भगवत प्राप्ति करा दो कबीर जी खुश हुए मूर्ख लोग संसार से तुच्छ चीजें मांगते संतों से लेकिन कोई कोई विरले होते जो ईमानदारी से झूठ मूठ में तो कोई भी बोल दे भगवत प्राप्ति करा दो नहीं सचमुच में
तड़प थी रामदास को भगवत प्राप्ति बोले भगवत प्राप्ति करने वाले को अपना सब कुछ छोड़ देना पड़ता है यह मेरा यह मेरा यह मेरा यह मेरा यह मन की कल्पना छोड़नी पड़ती तो बोले महाराज मन की कल्पना छोड़ने से भगवान मिलते हैं तो मैं तो छोड़ दिया तो बो अच्छा तो मैं तुम्हारे यहां फलाने दिन तुमको भगवत प्राप्ति कराने को आ जाऊंगा रामदास तो खुश हुआ संत कबीर हमें भगवत प्राप्ति कराएंगे साधु संतों को और दूसरों को ढंडेरा पिटा दि खुशी खुशी में के भगवान के दर्शन होंगे तुम भंडारा होगा मैंने ईश्वर मल से पलानी
दार बची नाख बदा स्मिता ना गरना मधु कर नाख कनेना ब सब जो कुछ है ब बड़ा भंडार आ शक्कर की बोरिया आ गई मैदे की बोरिया आ गई बेसन की बोरिया आ गई बादाम के भी ढेर आ गए पिस्ते भी और दूध वाले से भी दूध कहीं खीर घुट रही है तो कई हलवाई लोग व्यंजन बना रहे हैं तो कई रसोई रसोई बना रहे हैं काशी में तहलका मच गया कि संत कबीर रामदास को प्रभु का दर्शन करा ने वाले साधु संत तो भंडारे वाले भंडारे के लिए महाराज सब व्यंजन तैयार है कीर्तन हो
रहा है संत कबीर की बाट देख रहे हैं कि वे सत्संग सुनाएंगे और फिर भगवान के स्वरूप का वर्णन करते करते भगवान के दर्शन हो जाएंगे सबके अपनी अपनी कल्पना थी तो लोग देखते रहे कि कैसे भगवान के दर्शन होंगे हम भी कर लेंगे रामदास तो बड़ खुशी में और सच्चा भक्त था भगवत दर्शन के लिए बाट देखते देखते कईयों को दो दो पैर हो गई पेट में गुड़गुड़ाहट होने लगी कई तो भोजन के भगत थे बोले इनको भगवान के दर्शन होंगे कि नहीं होंगे हमको तो भूख के दर्शन हो रहे हैं भाई हम रे
लिए तो भंडारा हो जाए तो सभी लोग भगवत दर्शन के लिए साधु नहीं बन जाते और सभी लोग खाने के लिए साधु नहीं बनते जिसको भगवत दर्शन की लालसा होती है तीव्रता से लगता उसको भगवत प्राप्ति होही जाती लेकिन सभी को तीव्र लगन नहीं लगती संसारी विकारों में आदमी आसक्ति में फसता व 12 बज गए साढे हुए कहीं ख बनके तैयार है रसोई के चावल के ढेर पड़े मालपुए के ढेर और व्यंजन तैयार है खुशबू भी आ रही रसोई भी सब बना बुना के कीर्तन मंडली वाले बार देख रहे वहां आ गए इतने में तो
महाराज य हल्ला गुल्ला आया रसोई घर के तरफ सब इधर आ गए एक भैसा घुस गया तो उसने थोड़े माल पुए चबा लिए थोड़ी खीर चाट ली थोड़ी खुजली बुझली हुई तो जो ढेर लगे तो उसमें आटा बैसा सब अे दफे हो गया आख भूस रमण भ्रमण थ भेड़ पड़ी भूस बद आ तो लोग कैसे घुस ग धड़ ध डंडे पर डंडे मारा तो भैसा तो बेचारा बहुत लोग डंडे मारे तो भैसा तो आने लगा उसका तो खाया पिया क्या इतने में कबीर आए लोगों का टोला जमा था लोगों के टोले को देखकर कबीर ने
पूछा क्या है बोले भैसा गुस ग सत्याना कबीर को तो वासुदेव सर्वम में ठीक परमात्मा के तत्व का ज्ञान हो चुका कबीर जी का हदय त हो गया कि प्रभु प्रभु प्रभु लोगों ने बोला लो ऐसा पागल आदमी भगवान का दर्शन करवाएगा और भैसे को प्रभु प्रभु करके हाथ घुमा रहा है प्यार कर रहा है और प्रभु प्रभु करते कबीर जी द्रवित भूत हो गए कंस के साथ युद्ध करने में भी आपको इतना नहीं परिश्रम पड़ा था रावण के साथ प्रभु आप भेड़े थे तभी भी आपको इतना चोटे नहीं लग आज आपको इतनी चोटे लगी
अरे प्रभु नारा क्या रूप पहले तुम मखोल की दृष्टि से देखते थे कबीर जी की वासुदेवा सर्व मिति स महात्मा सु दुर्लभ पहनी दृष्टि और हृदय का भाव ने देखते देख देखते वातावरण को बदल दिया और सारे गंभीर हो गए और प्रभु के स्वरूप की स्तुति करने लगे तुम सत स्वरूप हो चेतन स्वरूप हो ज्ञान स्वरूप हो य आंखें तुम्हारी सत्ता से देखती है आंख तुमको नहीं देख सकती मन तुम्हारी सत्ता से सोचता है मन तुमको नहीं देख सकता है बुद्धि तुम्हारी सत्ता से निर्णय लेती है परमेश्वर बुद्धि तुमको नहीं जान सकती है सारी जानकारियों
को सत्ता देने वाले मेरे सर्वेश्वर वैसे के रूप में यहां घुसे कोई किसी रूप में है आपका अनेक रूपों में अनेक लीलाएं हैं मेरे नाथ ऐसे करते करते कबीर जी ने भगवान के स्वरूप की स्तुति की तो रामदास तो परिपक्व फल था तो रामदास को दूसरे जो भी शांत साधु थे तो भगवान आनंद स्वरूप हो आप चेतन स्वरूप हो आप ज्ञान स्वरूप हो और सदा साथ में रहने वाले नित्य प्रकाश ज्ञान स्वरूप हो जगत का ज्ञान अनित्य है स्वप्ने का ज्ञान प्रतीति मात्र है व्यावहारिक जगत का ज्ञान प्रतिभास है लेकिन आपका चैतन्य स्वरूप ज्ञान स्वरूप
व्यवहार बदल जाता है फिर भी जो नहीं बदलता वह ज्ञान स्वरूप वास्तविक सत्ता स्वरूप हो वही वास्तविक सत्ता सच्चिदानंद रोम रोम में राम रहे हो इसलिए आप राम स्वरूप हो सबको कषित आकर्षित करते हो आप कृष्ण रूप हो सबका मंगल करते हो सभी इंद्रियों का मन वालों का आदि का इसलिए आप शिव स्वरूप और सृष्टि के मूल हो आद्य शक्ति रूप हो इसलिए आप जगदंबा रूप से पूजे जाते हो लोग आपकी जैसे भी उपासना करते आप उसी रूप में उसके हृदय में आप अपनी करुणा कृपा बरसाते हो ओम आनंद देवा ओम सच्चिदानंद [संगीत] ओम आनंद
ओ शांत स्वरूपाय नमः ओम चैतन्य रूपाय नमः ओम कृष्ण रूपाय नमः कृष्ण कन्हैया मंसी बजैया बिंद्रावन की कुंज गलियों में हमारे हृदय गलियों में तू अपनी मधुरता प्रकाशित करने वाले प्रभु मरा लड़ा ओम आनंद देवा ओम ओम आनंद ओम ओम ओम माधुर्य ओम ओम ओम चैतन्य ओम ओम ओम सुख स्वरूपाय ओ ओम ओम माधुर रूपाय [प्रशंसा] ओम ओम सर्वर रूपाय ओ ओम ओम शुद्ध रूपाय [संगीत] ओम साता सारा वातावरण [संगीत] भोजन के भगत भी भगवान के भगत बन गए वातावरण शांत हो गया भगवत भाव से भर गया रामदास अधिकारी था उस पर कबीर की विशेष
दृष्टि पड़े और रामदास को पता चला कि कहीं जाकर भगवत प्राप्ति नहीं होती कोई आकर भगवान दर्शन दे जाए वो तो भगवान की विशेष माया ही होती है वास्तविक में भगवत तत्व का ज्ञान ही होता है ज्ञान ही भगवत स्वरूप है ओम ज्ञान स्वरूपाय नमः ओम साक्षी रूपाय नमः ओम चैतन्य रूपाय नमः ओम ओम आनंद ओम ओम ओम शांति [संगीत] [संगीत] आनंद [संगीत] ओ आनंद ओ ओम माधुर्य ओ ओम प्रभु जी ओ ओ प्यारे जी जरूरी नहीं बाहर बोलना जोर से बोलना कोई जरूरी नहीं उसी भाव में होठों में बोलते बोलते उसी भाव में लीन
होना अंतर्मुखी [संगीत] में 2400 घंटा ऑक्सीजन सूर्य की नाड़ी का प्रभाव गाय का पीठ सहलाने से गाय खुश होती खुश होने से उसके परमाणु और प्रभावशाली साधारण रोग तो क्या बड़े से बड़े असाध्य रोग भी य की पीठ सहलाने वाले के मिट जाते हैं लेकिन एक दो दिन में नहीं छ 12 महीना करता है गाय की पीठ सहलाने से साधारण रोग की तो क्या बात है बड़े-बड़े रोग भी मिट जाए असाध्य रोग खाली है गाय की पीठ सहलाने कैसे कैसे महापुरुषों के अनुभव शास्त्र में अनुभव महापुरुषों के ऐसे नहीं बात लिखी हुई अनुभव क्या हुआ
प्र क्या हुआ साधारण व्यक्ति की बात शास्त्र में नहीं आती साधारण व्यक्ति की बात हम नहीं बोलते नारायण नारायण नारायण खिला पिला के देह बढ़ाई वो भी अग्नि में जलाना है जब शरीर अपना साथ नहीं देता शरीर अग्नि में जल जाएगा तो इन चीजों में ममता रखना उपयोग करना लेकिन ममता तो भगवान में तुलसी ममता राम से समता सब संसार राग न द्वेष न दोष दुख दास गए भ ईश्वर मारो ऐसी बस हमारी छ भले ऊपर हमारी है हे राम जी बाहर से तो अग्नि की ना सूरमा होकर युद्ध करो लेकिन अंदर से समझो सब
स्वपना है तु है परमात्मा अपना है साहिब तेरी साहिबी घट घट रही समाय जैसे मेहंदी बीच में लाली रही छुपाए महंदी हरी होती लेकिन लाली छुपी हैसे ये मरण धर्मा शरीर में अमर आत्मा छुपा है जिसकी कभी मौत नहीं होती उस परमात्मा को जानने के लिए राजे महाराजे राज पाठ छोड़ के चले जाते शरीर क्या है बोलते कच्चा कुंभ है फूटत न लागे बार फटका लागे फूटी पड़े गर्व करे वे कवार ना शरीर का गर्व करना बुद्धिमानी है ना वस्तुओं का गर्व करना बुद्धिमानी ना व्यक्तियों का गर्व करना बुद्धिमान है फिर भी एक गर्व जरूर
करें कि हम चैतन्य आत्मा है शाश्वत है नित्य हैं और शाश्वत परमात्मा के अविभाज्य अंग मारने वाला अभिमान नहीं तारने वाला अभिमान करें मारने वाला अभिमान है मैं सेठ हूं मैं दुखी हूं मैं सुखी हूं मैं गरीब हूं मैं फलाना जाति का हूं और तारने वाला अभिमान है कि मैं चैतन्य हूं आत्मा हूं परमात्मा का हूं और परमात्मा मेरे अरे बोले पिक्चर चलोगे जरा ये वाइन पियोगे बोले नहीं मैं साधक हूं तो यह साधक हूं ये स्वाभिमान है दुष्टता से बचने के लिए मैं साधक हूं यह मैं नहीं कर सकता हूं लेकिन दूसरे असाधारण वाला
आद अभिमान है लेकिन मैं साधक हूं मैं वाइन नहीं पी सकता मैं पिक्चर में नहीं जा सकता मैं यह काम नहीं कर सकता हूं यह स्वाभिमान अभिमान होना चाहिए लेकिन स्वाभिमान जिस अभिमान से रकों से बचे पाप से बचे ताप से बचे चिंताओं से बचे भय से बचे व अभिमान करना चाहिए विदेशों में तो इतना टेंशन मुफत में टेंशन है जरा जरा बात में लोग सोचने लग जाते निर्व हो जाते जगत को सच्चा मानते पहले था नहीं बाद में रहेगा नहीं उसी जगत की बातें खोपड़ी में इतनी हावी हो जाती है कि जो पहले था
अभी है बाद में रहेगा वह ईश्वर छूट जाता है जब ईश्वर छूट गया तो उस प्राणी ने कौन सा अपराध नहीं किया किसी ने मात हत्या की किसी ने पित हत्या की किसी ने बिल्ली की हत्या की किसी ने जीव जंतु की हत्या की लेकिन जो अंतर आत्मा परमात्मा शाश्वत है ब्रह्म उसका पता ही नहीं और जगत को ही सच्चा मानता है तो उसने तो ब्रह्म हत्या कर ली अपने परमात्मा कोही मार के बैठा है तो परमात्मा को मारने का पाप यह है कि वह दुखी रहेगा मर मर के घुट घुट के मरेगा संसार में
घुट घुट के मरेगा अपने आत्मा परमात्मा की अमरता और सच्चाई भूलकर जगत की बातों में उलझा है तो उसने परमात्मा मारने का पाप किया जिसने परमात्मा मारा तो उसने कौन सा पाप नहीं किया बिल्ली मारा चूहा मारा गाय मारी गधा मारा घोड़ा मारा फलाने को मारा यह तो एक एक जीव का पाप लेकिन सब का जो आधार है उस ईश्वर को स्वीकार नहीं करता उसकी सत्यता नहीं मानता है उसको अपना नहीं जानता है उसकी प्रार्थना या उसकी स्मृति नहीं करता और जगत की स्मृति करता है वह ब्रह्म हत्यारा क्या नहीं पाप किया उसने पाप का
है दुख पाप का फल है टेंशन पाप का फल है चिंता तुलसी पूर्व के पाप से हरि चर्चा न सुहाय जैसे ज्वर के झर से भुख विदा हो जाए ये पूर्व के जो संस्कार है ना यह मेरा है यह मेरा है य ऐसा क्यों हुआ ऐसा ही के थयो हे छो य छो ो एक राजकुमारी ने ऐसा पाप किया था वो जमाने में ट्रक आदी नहीं थी लोडिंग के लिए लोडिंग अनलोडिंग ऊंटों के द्वारा होता था तो फसल हुई तो ऊंट रुई के ऊंट भर भर के जाते 00 00 100 100 दो दो स ऊंट
आपके 10 ट्रक तो उधर 100 200 ऊंट हो जाएंगे ऊंट भर के कतार कर रुई से लदे लदे ऊंट जा रहे थे तो राजकुमारी महल में खड़ी खड़ी देख रही थी अरे ऊंट ऊट ऊंट रई रई रुई इतनी रुई बापरे इतनी रुई कौन काटेगा कौन पिं जेगा इतनी रुई कौन पिगा कौन काटेगा कैसा केर पन दो केर कती दो केर पि दो केर कती दो सोचने लग गई सोते सोते दिन में रात में मानसिक असंतुलन हो गया दवा कान थी दी मुझे दर्द जी हकी मन के कड़ी खबर मर सच ऐसा क्यों हुआ इसने ऐसा
क्यों करा सत्य का तो पता नहीं था और असत्य जो संसार था मिथ्या जो संसार है बदलने वाला जो संसार है वो सच्चा लगने लग दवाइयां ये इलाज टना फना अला बाध बला बाध टना टोटका लेकिन मानसिक हो गया तो टूना टोटका क्या कर लेगा आखिर नगर में एक संत आए और ढंडेरा सुना के राजा की राजकुमारी को कोई दवा नहीं लगती कोई टूना टूटका नहीं लगता राजा बड़े दुखी है राजकुमारी को कोई ठीक कर दे तो राजा उनके चरणों में अपना मस्तक रखेंगे ये संत ने कहा मस्तक रखेंगे तो क्या है नहीं रखे तो
क्या है राजकुमारी को ठीक तो कर लेंगे बच्ची है अपनी संत जरा शांत हो तो संत के चित्त में हो आके कुछ भी नहीं है बात में तो राजकुमारी को अंदेशा भिजवाया राजा को कि ले आ तेरी बेटी को हम ठीक कर देते उसके साथ की जो सहेली उसकी सेवा में है पुरानी उसको भी ले आना बोले कब से क्या हुआ तो सहेली ने बात बात में संत ने पूछा तो सहेली ने बताया कि एक बार व बाल्कनी में बैठे बैठे देखा था ऊंटों की कतार बस तब से इनको कुछ हो गया क्या पता कोई
छाया पड़ गया कोई परी की असर पड़ गई है कोई भूत की हवा लग गई है कौन पीजे का कौन काते ऐसा बोलती थी बस उसके बाद तो ऐसी आंखें फटी इसकी वायरी थी वायरी संत ने कहा कि अरे राजकुमारी ऊट ट ट रे रुई रई रई रई ई ऊंटों की कतार कतार तो राजकुमारी ध्यान से सुनने लगे संत ने देखा ठीक निशाना जम रहा है बोले कतार कतार खूब खूब ऊंट खूब खूब रुई रुई रुई ब ब ब ई रई कतार कतार कतार व ग डिग डिग ला ग गगग पहाड़ पहाड़ पहाड़ के मान
बीरी प बी दवारा बीरी बीरी बीरी पी पा बाय लगी बाय लगी बाय लगी महाराज तो तम स राजकुमारी के खोपड़ी से टेंशन उतर गया ठीक हो गई तोय जगत क्या है रूई का ढेर है ना मान कीना अरे पैदा हुए जिए और सिर्फ मरने के जा रहे और क्या हो जाएगा जै जल में बुदबुदा उपजे बिन से नीत जग रचना तैसी रची जान ले रे मित पानी में लहरे अरे इतनी लहरे इतनी लहरे इतने बुलबुले इतनी झा क्या होगा क्या होगा अरे जैसे हुआ ऐसे छू होता है फिर होता है तेरा विषय नहीं है
जागों को लहरों को बुलबुलों को देखना तेरा विष है कि इनकी गहराई में पानी समुद्र के गहराई में ज्यू का त्य ऐसे सृष्टि के गहराई में हमारी गहराई में आत्मा परमात्मा ज्यू का त्यों साक्षी स्वरूप मन तू ज्योति स्वरूप अपना मूल पछा तू आत्म ज्योति है अपने मूल को पछा ईश्वर को पाने के लिए आया झूठ बना बनाकर मर जाने को आया गाड़िया चला चला के मर जाने को आया दुनिया को खोपड़ी में डाल डाल के परेशानी लेने को आया मनुष्य जवम का फल ये है कि अपना उद्धार कर ले मर जाए फिर भेतो के
भटके अथवा किसी के गर्भ में आए गर्भ मिले ना मिले तो उसके पेशाब में बह गए घटर में चले जाए तो ममम दमया की ऐसी तैसी तुम्हारी जिंदगी की ऐसी तैसी पेशाब में ही बहना पड़े ऐसा ही जीवन हुआ तो तुमने क्या जिया बीमार होकर मर गए लाचार होकर मर गए संसार को खोपड़ी में डालते डालते मर गए तो मनुष्य जीवन तुम्हारा व्यर्थ मां का गर्भ धारण करना व्यर्थ पिता का परिश्रम व्यर्थ मित्र और गुरुओ की सेवा सब व्यर्थ कर दी मूर्ख तुमने श्री कृष्ण ऐसे लोगों को पर कृपा करके गाली देते गीता में 108
गालियां दी गीता में 108 गालियां दी जो संसार को सच्चा मानक जरा इतना निपटा लू जरा इतना कर लू फिर करूंगा जरा ये ठीक कर लू वो ठीक कर लू संसार को ठीक करके फिर भजन करेंगे तो करेंगे ऐसे लोगों को भगवान ने 108 गालिया दी कृपा करके निंदक निंदा करता है तो हमारी कमजोरी देखकर निंदा करके वह खुश होता है लेकिन माता-पिता और गुरु अगर थोड़ी निंदा करते हैं डांटते हैं तो हमारी भलाई के लिए तो उनको निंदा का पाप नहीं लगता है उनको तो हित का स्वभाव तो श्री कृष्ण जो निंदा की या
108 गालियां दी तो गीता तो पूजनीय है गीता में 108 गालिया है फिर गीता पूजी जाती कि कृष्ण के हृदय में करुणा है दया है श्री कृष्ण ने गाली दी विमु वीआईपी कोटा के मूर्ख असुरम भाव आशिता असुरों के भाव का आश्रय लिया जगत को सच्चा मान के जगत में से कुछ पाना कुछ ेर करना ये आसुम भाव आश नरा अधमा मनुष्य में वे अधम है भले देखने में उनके पास हिरण पुर है सुवर्ण के है रणा पुर है नराधम सोने की लंका है रावण राक्षस नहीं था लेकिन हिक जगत से मजा लेकर बड़ा बनना
यह राक्षसी प्रवृति इसलिए राक्षस कहला पुस्त कुल के अंदर पैदा हुआ तो पुस्त ऋषि की परंपरा का बेटा कोई राक्षस होता है क्या लेकिन रावण को राक्षस कहते आसुम भाव विमु विमु नानु पश्यंति पश्यंति ज्ञान चक्षु विमु लोक उस मुझ अंतर आत्मा शाश्वत परमेश्वर को नहीं जानते ज्ञान की आंख से जाना जाता तुलसीदास ने ऐसे लोगों को जरा लिया थोड़ा सर धुनि धुनि पछता व काल ही कर्मही मिथ्या दोष लगाए जो लोग दूसरे पर दोषारोपण करता हैना व अभागा है कोई दुख आ जाए या विफलता आ जाए दूसरे को दोष देता है तो समझो वो
स्वयं दो से गिरना चाहता है अपनी कहां गलती है कोई भी दुख मुसीबत अपनी गलती के सिवाय नहीं टिक सकता जो न तरही भव सागर नर समाज अस पाई सो कृत निंदक मंद मती आत्मन अधोगति जाए जो इस भव सागर को नहीं तरते वे कृतन निंदनीय है मंद मती है भले बाहर से कितने भी बड़े कई लोग उनके पास काम करते हैं इतने राज्यों का है बड़ा चक्रवर्ती राजा है लेकिन मंद मती है सो कृत निंदक मंद मति आत्म हन अपने आत्मा परमात्मा की हत्या किया है बाहर से भले कोई कह दे भाई डम डम
वाला है बड़ा है थोड़ी देर के लिए कृपा करके आपको जरा प्रोत्साहित कर दे लेकिन अंदर से क्या कर रहे हैं हम सो कृत निंदक मंद मती वो मंद मति है आत्मन अधोगति जा इससे बड़ी अधोगति कहां देखने जाओगे राजा नृग थे तुम्हारे पास तो 100 हज 5 हज 25 हज आदमी काम करते मान लो लेकिन राजग के आधीन कितने लोग काम करते थे पूरा राज्य उस राज्य में तो कई सेठ होते कई मिल मालिक होते कई हजारों हजारों आदमियों को चलाने वाले सेठ सावकार होते कंपनिया ऐसा राजा नृग क्रिकेट बन गया मरने के बाद
श्री कृष्ण ने उनको निकलवाया वन विहार करने जा रहे थे तो एक सूखे कुए में किरकट पड़ा है बलराम साकेत कत वर्मा ने देखा प्रयत्न करने पर सफल नहीं हुए तो श्री कृष्ण को बुलाया श्री कृष्ण ने निकलवा दिया और अपनी कृपा डाल दी तो उसकी गर्दन लुड़क पड़ी छोटा सा प्रकाश निकला उसके शरीर से देखते देख देखते देवता बन गया सब कुछ जानने वाले कृष्ण अनजान होकर पूछते कि देव पुरुष तुम्हारा नाम क्या है तुम कहां से आए हो इधर दर्शन देने की कृपा क्या वो कहता है कि माधव माधव आप सब कुछ जानते
हो फिर भी इन अपने मित्रों को सेवकों को ज्ञान देने के लिए अनजान होकर पूछते हो तो लाल जी पृथ्वी पर बड़े-बड़े राजाओं की जो यश गाथा है उसमें सबसे ज्यादा यश गाथा अभी भी जिसकी सुनाई पड़ती है मैं वह अभागा हूं भाट चारण जिसके गुणगान करते हैं राजाधिराज माधव आसमान के कोई तारे गिन सकता है लेकिन पृथ्वी पर मैंने कितनी गाय दान की व कोई नहीं गिन सकता ऐ इस प्रकार की मेरी यश चल रही है तो कृष्ण ने कहा अच्छा तो तुम राजा नृग हो बोले हां महाराज वही मैं भागा उस समय तो
डम डम वाले तो उनके चमचे थे राजा नृग के कई चमचे थे डम डम या छम छमिया वाले वो राजा क्रिकट होकर पड़ा है क्रिटी का गर्भ मिला गर्भ नहीं मिलता तो क्रिकेट के शरीर के द्वारा किरकट में घुस के ब बकरे का शरीर मिल गया नहीं तो बकरी के द्वारा पेशाब में बह जाते मनुष्य का शरीर मिल गया नहीं तो मां के पेशाब के द्वारा गटर में तो चले जाते और क्या तुम्हारा भाई गटर में चला गया तुम्हारे सञ भाई कई गटर में चले गए मैं छाती ठोक के कह सकता हूं नास्तिक लोग भी
इसमें नकारा नहीं बोल सकते कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं जिसके भाई कई गटर में ना बह गए हो बहने गटर में ना चली गई हो बोलो क्या ख्याल है चाहे कलकाता का हो चाहे दिल्ली का हो चाहे दिल्ली का वकील हो चाहे कलकाता का डम डम हो तुम्हारे कई भाई पेशाब के द्वारा नाली में गटर में बह गए और तुम्हारे कई बेटे और बेटियां भी बह गए नरा धमा कृष्ण बोलते मनुष्य में वो अधम है जो अपने आत्मा का उद्धार नहीं करते अपने को मरने वाला शरीर मानते और शरीर की सुविधा को अपना भाग्य मानते
असुविधा को अपना अभग मानते नहीं नहीं असुविधा आई तो वैराग्य बढ़ाने के लिए सुविधा आई तो सेवा करने के लिए इन दोनों का उपयोग करके आत्मा परमात्मा को जान लो लाला ये ऐसा है वो ऐसा है वो ऐसा है उसमें खोपड़ी खपा करर एक साधना है 12 से न बजे की शांत वाता लेकिन 12 से न बजे की साधना का बहाना करके आपस में गप सप लगाने वालों को तो प्रेत होना पड़ता है खा वही रोटी और करे गप सबप जो सुबह सूरज उगने के बाद सोते रहते हैं वह साधना नहीं करते वोह आराम जादे
साधना का बहाना साधना से तो सात्विकता आती हो जा है तेज आता है बल आता है अपना मनुष्य जीवन निंदा में इसमें उसमें उसकी बातें उसकी बातें रोटी अपनी खाना और इसकी उसकी बातें खोपड़ी में भर के अपने चित्त को मलिन क्यों करना आरम भाव आसता जैसे दैत्य व्यर्थ की बातें करते राक्षस भूतिया होती डालिया चंडाल का और शिव जी के पास भी रहती थी ऐसी योग वशिष्ठ महारामायण में आता है भगवान चंद्रशेखर समाधि स्म तो शिव जी के हरने वाली डाकिया साकिया बनिया उन्होंने सोचा कि शिव जी समाधि से उठते हैं तो पार्वती जी
उनकी सेवा में होती और पार्वती जी को सार सार बातें सुनाते शिवजी पार्वती की पटती है हमारी तरफ देखते ही नहीं कुछ चमत्कार दिखाए बिना अपनी कीमत नहीं होगी तोन डाकियो ने सानियों ने योगियों ने क्या किया एक बार शिव जी समाधि में थे तो पार्वती को चुरा कर ले गए और पार्वती जी को बिस्मिल्लाह करके उसका मीट बनाकर पुलाव बना लिया तो पार्वती को उठाकर ले गई और पुलाव बना दिया और हिमालय में तो फ्रिज की जरूरत नहीं पड़ती कैलाश में तो चलो शिव जी के लिए बड़ा कटोरा भर के पुलाव का रख दिया
बिरयानी बिरयानी जो बोलते हो मीट वाला पुलाव बिरयानी बोलते लखनऊ में एक उनके यहां भक्त आते हैं तो फिर मच्छी की बिरयानी बनती है मैंने सुना फिर मैंने लखनऊ में बोल दिया कहीं बोल दिया कैसेट के द्वारा बंद हो गया तो चेलो के गुलामी ई के चेलो को पटाने के लिए मा सारी लो के लिए बिरयानी का प्रसाद बनवाए दक्ष ना रखे व चाहे मरे तो मरे मैंने क्रिटिसाइज कर दी थोड़ी तो मेरा तो उनके प्रति नफ नहीं थी बस सुधर गए बस बढ़िया हो गया तो पार्वती की बियानी समझ गए पार्वती का पुलाव अंतर्यामी
शिवजी जब समाधि से उठे इधर उधर देखा तो पार्वती नहीं दिखाई दे रही तो योगिनी आई प्रणाम करके पुलाव रख दिया शिवजी ने नजर डाली तो समझ गए कि अरे आख लाल के तो उनको पसीना छूटा योगियों को फिर क्या करा के ओ पार्वती का नाक निकाला अलम बशा ने किसी ने पार्वती का कान निकाला हो करके अपने अपने अंगों से शरीर से पार्वती के अंग निकाले और योग विद्या जानती थी संजीवनी विद्या तो असुर भी जानते तो पार्वती कोजों का त्यों करके फिर विवाह करा दिया शिव जी के प्रति तो हमारी श्रद्धा थी और
शिव जीी को जल चढ़ाए बिना दूध के नाश्ता नहीं लेते थे तो कभी कभी वो शिवजी के बैल पर और पीछे बराती कोई का पेट य लंबा तो किसी की पीठ ऐसी तो कोई तुरी बजा रहा है तो कोई कुछ ब ऐसा फोटो देख के हमारे को विचार होता कि ऐसा क्यों बोले शिव जी की बारात है शिवजी की बारात में ऐसे क्यों बाद में सत्संग के द्वारा योग वशिष्ठ में यह बात जब आई तब हमारा संशय दूर हुआ कि हां हमारे साहित्य ने शास्त्रों ने सार सार बातों को आम आदमी तक भी पहुंचाने में
अपनी बुद्धि का परिचय दिया है उस समय तो हम बचे थे हमको पता ही नहीं होता कि आत्मा क्या होता है ब्रह्म क्या होता है शिव क्या होता है फोटो में देखते थे कि ये जटा वाला भगवान ये शिव जी है ये बैल उनका वाहन है बैल माना धर्म के चार स्तंभ होते शिव माना कल्याण स्वरूप आत्म दे पार्वती माना ब्रह्मा का वृति शक्ति शिव के साथ शक्ति होती तो शोभा देती और शक्ति अकेली जाती है तो अशोभनीय वातावरण हो जाता है तो शिव जी य योग वशिष्ट पढ़कर सुना दो कौन सी जोगिनी ने ने
यह निकाला शाकिनी ने यह निकाला करके और पार्वती जी बनाकर शिव जी का विवाह कर दिया और भगवान आसु संतुष्ट हो ग प्रसन्न हो ग माफ कर दिने देवियों ने एक समय विचार किया कि सदाशिव हमसे प्रेम से नहीं बोलते बोलते हम तो तु है हमको तुच्छ जानते हैं इससे हम इनको कुछ अपना प्रभा दिखाए क्योंकि प्रभाव दिखाए बिना कोई किसी को नहीं जानता ऐसे विचार कर उ हकी बुद्धि शिव जी को भी प्रभाव दिखाने की कोशिश करो बोलो अब शिव जी के य ऐसी हलकट हो सकती है तो आपके हमारे यहां कोई दो पांच
हलकट आ जाए तो काहे को परेशान होना क्योंकि प्रभाव दिखाए बिना कोई किसी को नहीं जानता ऐसे विचार कर उमा को वश करके वे उड़ा ले गई और उत्साह कर के मध्य मांस आदिक भोजन किया निदान माया के बल से पार्वती को मारकर चावल की नाई पकाया और उनके कुछ पकाए हुए अंग सदाशिव को भोजन के लिए दिए तब सदाशिव जी ने जाना कि मेरी प्यारी पार्वती को इन्होंने मारा है यह निश्चय करके वे कुपित हुए तब उन देवियों ने अपने अपने अंग से उमा के अंग निकाले सौरी ने नेत्र सौरी सौरी जो जोग उसने
पार्वती की आंखें निकाली कमारी कौमारी ने नासा नको का को मार योगी और इसी प्रकार सबने अपने अपने अंग निकालकर वैसे ही पार्वती की मूर्ति ला दी और नए सिरे से विवाह करा दिया तब सदाशिव प्रसन्न हुए सब जगह उत्साह और आनंद हुआ सब देवियां अपने अपने स्थानों को गई आगे पढ़ो चंद्र नाम का काक जो अलं बशा देवी का वाहन था उस नारायण नारायण नारायण नारायण योग वशिष्ठ में भगवान राम तो है शोता और वशिष्ठ जी महाराज है वक्ता वाल्मीकि जी वक्ता है भरद्वाज जी सुनने वाले उस ग्रंथ में बात आई अनाप सनाप बातें
ऐसे महापुरुष नहीं बोलते तो ये संसार ऐसा है विचित्र है इसमें क्या टेंशन करो क्या चिंता करो सच्चा क्यों मानू अभी स्वपना हो गया कि नहीं ये तो खाली अ तुमने आज तक सुना नहीं था लेन जब हुआ होगा तो कैसा हुआ अरे भ पार्वती को ये ले गए वो कर अभी देखो आई बात चली ऐसे सब सपना बचपन स्वपना हो गया अभी स्वपना हो रहा है कल का आज स्वपना हो गया उमा क ह मैं अनुभव अपना उमा क ह मैं अनुभव अपना सत्य हरि भजन जगत सब स्वपना सत्य हरि भजन जगत सपना भजन
क्या है किम लक्षण भजन रसन लक्षण भजन भगवत रस प्रकट करना यह भजन है भगवत आनंद प्रकट करना यह भजन है भगवत ज्ञान प्रकट करना यह भजन वो सार है बाकी कोई सार नहीं कोई भी बात लो दो कुल मिलाकर घुमा फिरा के आत्मा परमात्मा में ले आओ हर भर के बस कटोरे प घुमा फिरा के ईश्वर में बात बोले ये हुआ ये हुआ है जगत को सच्चा मान के खोपड़ी में डालोगे खोपड़ी उल्टी होठ है उल्टी और घुमा फिरा के भगवान भर दोगे वो खोपड़ी सुटी उल्टी खोपड़ी अंदर से बाहर जाती और उल्टी बाहर
से अंतर्यामी में बात को बदल देती ओम नमो भगवते देवाय ओम नमो भगवते वासुदेवाय ओम नमो भगवते [संगीत] वासुदेवाय एक होता है पाना दूसरा होता है जानना पाया उसे जाता है जो पहले नहीं है जाना उसे जाता है जो पहले था ठीक है एक होती प्रतीति दूसरी होती है प्राप्ति तो दुनिया की चीजों की प्रतीति होती है कि हमें यह मिल गया यह मिल गया यह मिल गया जैसे स्वपने में प्रतीत होता है यह मिल गया यह मिल गया यह मिल गया आख खुली तो कुछ भी नहीं ऐसे ही बोलते बेटा मिल गया पत्नी मिल
गई ये मिल गया वो मिल गया आंख बंद हुई तो कुछ भी नहीं दूसरी होती है प्राप्त की प्राप्ति जो पहले प्राप्त है खाली उसको खोजा तो मिल गया तो पहले था जो पहले था खाली भूल के कारण पता नहीं चलता था तो परमात्मा हमारा आत्मा होकर पहले बैठा अभी है बाद में रहेगा बेटा पहले नहीं था शरीर भी पहले नहीं था दुनिया का कोई धन दौलत पहले नहीं था जो पहले नहीं था वह बाद में भी नहीं हो ग अच्छा जो पहले नहीं था वो बाद में भी नहीं रहेगा अनि त्यानी शरीरा ववव शाश्वता
नित्य सतो मृत्यु कर्तव्य धर्म संग्रह रोज मौत के तरफ आगे बढ़ रहे तो अभी जो मिला है उसके बाद भी जो मिलेगा तब कतब तक रहेगा संभाल संभाल के मरना है ना अगर सत्संग है तो जो मिला है ठीक है मिलेगा ठीक है उसका उपयोग सत के लिए हो जाएगा सत सदा रहता है जो पहले था अभी है बाद में रहेगा और प्रतीति पहले नहीं था बाद में नहीं रहेगा अभी प्रतीत हुआ पहले अमेरिका में मेरी दुकान नहीं थी अमेरिका वाले समझ तो बाद में भी नहीं रहेगी पहले मेरा यह नहीं था तो बाद में
भी नहीं रहेगा लेकिन मेरा आत्मा परमात्मा पहले था शरीर के पहले था और अभी भी है वह बाद में रहेगा व सदा प्राप्त है ईश्वर सदा प्राप्त है और संसार प्रतीति मात्र है और प्रतीति ज्यादा हो गई तो अपने को भाग्यशाली मानते नहीं हुई कम हुई तो अपने को अभग मानते तो गरीबी दुर्भाग्य नहीं है अमीरी दुर्भाग्य नहीं है ना समझी दुर्भाग्य कुसंग दुर्भाग्य बाबाई होना धन होना यह सौभाग्य नहीं है सत्संग मिलना ये सौभाग्य भगवान राम के गुरुदेव कहते हैं तो प्रतीति जो है वो दो प्रकार की होती है एक होती है प्रति भाषिक
प्रतीति जैसे स्वपने में यह मिल गया वो मिल गया यह हुआ वो हुआ और उस समय उस होने का सुख दुख भी होता है जेल आ गई तो दुखी हो गए स्वपने में शत्रु का तो पर हम हावी हो गए तो मजा आता है उसको बोलते हैं प्रति भाषिक सत्ता दूसरा जागृत में बेटा हुआ आज्ञाकारी बेटा है मधुर भाषणी और पथता के गुणों से सज्जनता के गुणों से संपन्न स्त्री है शरीर स्वस्थ है ठीक ठाक सब है तो यह है व्यवहारिक जगत में अच्छी प्र बेटा तो है लेकिन आज्ञा नहीं मानता है तो बेटा है
कि नहीं व्यवहार जगत में उसको पुत्र मानना बेवकूफी है शिष्य तो है लेकिन आज्ञा नहीं मानता तो उसको शिष्य भी नहीं माना जाता ऐसे शरीर है लेकिन बीमारी है धन है लेकिन टेंशन है तो यह दुखद प्रति है और अनुकूल है तो सुखद प्रतीति तो एक स्वप्ने की प्रतीति और एक जागृत की प्रतीति तो स्वपने की सत्ता प्रति भाषिक सत्ता और जागृत की जो प्रतिथि है उसको व्यवहारिक सत्ता बोलते हैं तो व्यवहारिक प्रतीति और प्रति भाषिक प्रतीति ये दोनों प्रतियां जिस परमात्मा चैतन्य जहां से मैं उठता है उसकी सत्ता से होती है तो वह चैतन्य
मय म सत्य है लेकिन स्वपना कि सत्ता में स्वपना सुख दुख देता है जागृत की सत्ता में जागृत सुख दुख की प्रतीति कराता है लेकिन य प्रतीति हो हो के चली जाती हो फिर भी जो कभी नहीं जाता उसी को बोलते आत्मा उसी को बोलते सदा प्राप्त उसी को ईश्वर बोलते वे लोग अनजान है जो मानते के साथ में अरस पर ईश्वर बैठा है और हमको बना बुना के भेज दिया और वे लोग भी अनजान है कि बोले वैकुंठ में ईश्वर बैठे हैं वैकुंठ अकं मति मति की संकीर्णता मिट गई तो बैकुंठ भी हो गया
भगवान शिव का चित्र देखोगे विष्णु जी का देखोगे कृष्ण का देखोगे राम जी का देखोगे तो गगन सदृश्य देखेगा नील वर्ण दिखेगा नील वर्ण क्यों दिखता है कि व्यापक चीज नील वर्ण दिखती आकाश नीला नहीं है लेकिन व्यापक इसलिए नील वर्ण तो ये भगवान वैकुंठ में है अथवा अयोध्या में है या अमुक जगह पर है ये आरंभ के लोगों को अपने को एक शरीर में मानते तो भगवान को भी किसी जगह मानकर साधना होती है ठीक है अच्छा है लेकिन अंत में जब साधना ऊंची उठती तो यहां पहुंचना पड़ता है कि यह व्यवहारिक सत्ता है
और वो प्रतिभास सत्ता है ये दोनों सत्ता बन बन के बिगड़ जाती फिर भी जो सदा रहता है वह परमार्थिक सत्ता है व परमार्थिक सत्ता सदा रहती है सदा थी है और रहगी उसको जब तक नहीं जाना तब तक व्यावहारिक सत्ता और प्रति भाषिक सत्ता हम पर हावी रहती स्वपने के समय स्वपने का सुख दुख सताता है और जागृत के समय जागृत का आकर्षण विकर्ष सताता है और उन्हीं में हम भटक जाते हैं कबीर जी ने कहा भटक मुआ भेदु बिना इस भेद को जानने वाले महापुरुष का जन जब तक अच्छी तरह से पचा नहीं
तब तक जीव भटकता है भटक मुआ भेदु बिना पावे कुन उपाय व सच्चा सुख पाना चाहता है सारे दुखों से सदा के लिए छूटना चाहता है और ऐसा पाए कि छूटे नहीं ऐसा व पाना भी चाहता है कोई ऐसा धनी नहीं ऐसा चाहे कि मैं निर्धन हो जाऊ कोई स्वस्थ व्यक्ति य नहीं चाहता कि मैं बीमार हो जाऊ हम जो सुख उसको सदा चाहते हैं और दुखद है उसे पाला ना पड़े यह हमारी चाह तोय चाह क्यों कि ऐसी चीज है जो सदा सुखद है और दुख से पारा ना पड़े वह चीज है इसलिए य
चाह बनी है प्यास क्यों है कि पानी है इसलिए प्यास है भूख क्यों है कि भोजन है इसलिए भूख है तो कभी दुख ना आए दुख से पाला ना पड़े और पूर्ण सुख रूप हो वह है परमार्थिक सत्ता तो व्यवहारिक सत्ता में सुख दुख होता है प्रति भाषिक सत्ता में भी सुख दुख होता है लेकिन परमार्थिक सत्ता जो है उसमें ना सुख की कीमत है ना दुख का प्रभाव है वहां परम आनंद है परम शांति परम ज्ञान है और परम पूर्णता है फिर उस महापुरुष को जो परमार्थिक सत्ता में जूं के त्यों जग हैं उनको
यह नहीं होता कि हमें कृष्ण जी के दर्शन हो जाए राम जी के दर्शन हो जाए हमारा नाम हो जाए हमारा यह बन जाए हमारा यह बिगड़ जाए नहीं होता जो हुआ अच्छा हुआ जो हो रहा है अच्छा है जो होगा व अच्छा ही सब सपना है तोय परमार्थिक सत्य को पाने के लिए मानुषी बुद्धि और परमार्थिक सत्य के तरफ ले जाए उसी को सत्संग बोलते हैं बाकी सब कथा वार्ता य सब मैंने बताया था कि आपको प्रसिद्ध होना है तो एक तरीका है एमएलएमएल की प्रसिद्धि कुछ भी नहीं मिनिस्टर की प्रसिद्धि कुछ नहीं मैं
ऐसा तरीका बताऊं कि लोग आपको भगवान करके पूजे लेकिन वो व्यवहारिक जगत में होगा आत्मा शांति अलग चीज है हां कोई आत्म शांति भी पा ले और यह खेल भी कर ले उसकी मौज की बात है आप ना धो के अपने घर में कहीं भी साधना के कमरे में एक आईना रख दो खड़े खड़े भी उसमें अपने को देखो बैठे भी उसको देखो उसको देखने का ऐसा अभ्यास करो अपना छाया आना में आंख बंद करी तो आप अपने को देखो अभ्यास करना पड़ेगा त्राटक करना पड़ेगा फिर आप आईने में बैठ खड़े हो तो अपने को
देखते हो आईने के तरफ से हटा दिया फिर भी अपने को अपना चित्र दिखे खड़े बैठे चलते एक प्रकार का थोड़े दिन य साधना मानो एक प्रकार का पागलपन आप फिर उस छाया से बातचीत करने लगो आईना है लेकिन आईने में जो देख रहे हैं फिर यूं करो तो वहां भी देखे ऐसी एकाग्रता हो जाए ये समझो आपका मन शरीर नियंत्रण में आ गया आप बोलो जाओ डाकुर के भजिए ले आओ यूं करोगे मन में सोचोगे और यूं करोगे डाकुर के भजिया आ जाएंगे आप बोलो जाओ आगरा का पेठा ले आओ बस मन में बोलते
ही थोड़ी देर में आप यूं करोगे तो आगरे का पेठा जयपुर का जयपुर से करेले का आचार ले आओ जयपुर में मिलता है आ गया जोधपुर से गंदे का आचार ले आओ गुदान आचार मोटा गुदान आ गया समझो आप उस विद्या में सफल हो गए फिर आप अपना गुदामैथुन कंकू की डब्बी रिंग और कोई चीज कोई भी भक्त आया मूत या जो भी कुछ आपकी मज की बात है तो उसको बो क्या चाहिए कंकू चाहिए रिंग चाहिए फिर आप लो जब जयपुर से आ सकता है तो पास में गुदा मेरे रहने के स्थान पर ही
सामान पड़ा है तो भक्तों को राजी करने वाला भी यहां से प्रसाद देता हूं यूं करके प्रसाद दू तो लोग तो समझे अरे बापू जी ने तो बर्फी बना के दे दी लेकिन बर्फी पास में रखी है कैसे आई वो विद्या हम जानते बापू तो जो चाहो मंची प्रसादी दे ये दे दे अरे उसको वो दे दिया कोष शुद्धि य करके दे दिया उनको तो ये दे दिया उनको ये दे दिया अरे भाई तो लोग इससे प्रभावित हो जाएंगे लेकिन प्रभावित होंगे तो व्यावहारिक सत्ता में उलझते रहेंगे ना परमार्थिक सत्य से लोक भी रह जाएंगे
और हम अगर जाएंगे तो जाएंगे नहीं तो कुछ भी नहीं तो जो चमत्कार से प्रसिद्ध प्रभावित हो जाते सत्संग का मूल्य नहीं जानते मैं देखो ऐसे किसी की भी कैटसा में नहीं मानता हूं वो भी अपनी जगह पर अच्छा है ठीक है धन्यवाद थैंक्स लेकिन ईश्वर प्राप्ति का मार्ग कुछ निराला है
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