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Mystery of Konark Sun Temple | Konark Temple Story | Documentary

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1.05M3,844 Palabras19m readGrade 18
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साल था 1903 जब बंगाल के लेफ्टनंट गवर्नर जे ए बर्डल ने अपनी टीम के साथ कोनार्क सूर्य मंदिर का दौरा किया यह द्वारा साधारण नहीं था क्योंकि उस समय उन्होंने मंदिर में कुछ ऐसा देखा जिसने उन्हें 800 साल पुराने इस भव्य मंदिर के सभी दरवाजे बंद करने और इसे रेत और बालू से भरने का आदेश देने पर मजबूर कर दिया आज 123 साल बाद भी यह मंदिर अपने गर्भगृह में छिपे रहस्यों के साथ बंद है लेकिन सवाल उठता है आखिर ऐसा क्यों किया गया सोचने वाली बात यह है कि 800 साल पहले ना तो सीमेंट
की शोध हुई थी और ना ही आधुनिक तकनीक की तो उस दौर में कोनार्क सूर्य मंदिर का निर्माण कैसे हुआ इस अद्भुत मंदिर में अत्याधुनिक आयर लॉक सिस्टम का इस्तेमाल किया गया था जो इसकी संरचना को स्थिर बनाए रखता था सबसे चौकाने वाली बात यह है कि इस मंदिर के पहिए जो जो सूर्य और चंद्रमा की गति से संचालित होते थे एक प्राचीन समय यंत्र की तरह काम करते हैं और आज भी सटीक समय दिखाते हैं लेकिन सबसे हैरान करने वाली बात यह थी कि भगवान सूर्य की मूर्ति हवा में बिना किसी आधार के लटकी
रहती थी यह चमत्कारिक तकनीक आज भी मॉडर्न इंजीनियरिंग और विज्ञान के लिए एक पहेली बनी हुई है साथ ही मंदिर के शिखर पर लगा 52 टन का विशाल चुंबक जो इस चमत्कार को संभव बनाता था आखिर कहां से लाया गया था और अब वह कहां पर है साल 2022 में भारत सरकार ने इस मंदिर से रेत हटाने और इसके गर्भ ग्रह को खोलने की योजना बनाई लेकिन आज तक यह काम पूरा नहीं हो सका सवाल यह है क्या गर्भ ग्रह के अंदर कोई ऐसा रहस्य छिपा है जिसे दुनिया से छुपाकर रखा गया है क्या हम
कभी जान पाएंगे कि इस भव्य संरचना के अंदर क्या है इन सभी रहस्यों प्राचीन तकनीकों अद्भुत इतिहास और विज्ञान से जुड़े तथ्यों को जानने के लिए इस डॉक्यूमेंट्री में हमारे साथ जुड़े रहिए क्योंकि यह सिर्फ एक मंदिर की कहानी नहीं बल्कि प्राचीन भारत के विज्ञान और कला का ऐसा अद्भुत प्रमाण है जो आपको चौका [संगीत] देगा उड़ीसा के पुरी जिले से लगभग 35 किलोमीटर दूर चंद्रभागा नदी के तट पर स्थित है कोनार्क सूर्य मंदिर यह केवल एक मंदिर नहीं है बल्कि प्राचीन भारतीय ज्ञान विज्ञान और कला का ऐसा नमूना है जो आज भी दुनिया को
चकित कर देता है सूर्य के रथ के आकार में बना यह मंदिर जिसमें सात घोड़े और 24 पहिए हैं केवल एक वास्तुकला चमत्कार नहीं है बल्कि यह खगोलीय गनाओ और समय को मापने की प्राचीन तकनीक का प्रमाण है इसकी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व को देखते हुए यूनेस्को ने इसे 1984 में विश्व धरोहर स्थल के रूप में घोषित किया यह मंदिर भारत की समृद्ध धरोहर और प्राचीन तकनीक का अनूठा प्रतीक है तो अब हम सबके मन में यह सवाल जरूर आता होगा कि इतना अद्भुत और एडवांस मंदिर का निर्माण आखिर किसने किया इसका उत्तर जानने के
लिए हमें जाना होगा द्वापर युग में जहां भगवान श्री कृष्ण के पुत्र सां को एक श्राप मिला था और यहीं से पहले सूर्य मंदिर के निर्माण की कहानी शुरू होती है सांब भगवान श्री कृष्ण और जांव के पुत्र थे वह अपनी अद्भुत सुंदरता और आकर्षक व्यक्तित्व के लिए प्रसिद्ध थे लेकिन यही उनकी सबसे बड़ी कमजोरी भी बन गई सांब का अहंकार बढ़ने लगा और उन्होंने स्वयं को सबसे श्रेष्ठ मानना शुरू कर दिया नारद मुनि जो अक्सर देवताओं और मनुष्यों के बीच संदेश वाहक बनते थे उन्होंने सांप को उकसाया नारद ने सांप से कहा तुम्हारी सुंदरता
तो अद्वितीय है क्या तुम अपना अद्भुत सौंदर्य गोपियों के बीच जाकर नहीं दिखाना चाहते सांप अहंकार में आकर गोपियों के बीच चले गए जो उनके पिता भगवान श्री कृष्ण को अत्यंत अनुचित लगा भगवान श्री कृष्ण ने सांप की इस मर्यादा को तोड़ने वाली हरकत पर उन्हें कठोर श्राप दिया तुम्हारा सुंदर शरीर अब कुष्ठ रोग से ग्रसित हो जाएगा श्राप का असर तुरंत हुआ और सांप का शरीर विकृत हो गया उनके शरीर पर भयंकर फोड़े फसिया उभर आई सांप अपने कष्ट से छुटकारा पाने के लिए विभिन्न ऋषियों के पास गए अंततः उनकी भेंट महर्षि कटक से
हुई महर्षि ने सांप से कहा तुम्हें सूर्यदेव की कठोर तपस्या करनी होगी केवल सूर्यदेव ही तुम्ह इस रोग से मुक्त कर सकते हैं महर्षि कटक ने उन्हें मित्र वन में चंद्रभागा नदी के तट पर जाकर 12 वर्षों तक तपस्या करने की सलाह दी सामने चंद्रभागा नदी के किनारे जाकर तपस्या शुरू की 12 वर्षों तक उन्होंने अन्न जल का त्याग कर कठिन तपस्या की दिन रात केवल सूर्य देव का ध्यान करते हुए उन्होंने अपनी आत्मा को तपस्या में लीन कर दिया सांप की कठोर तपस्या से सूर्यदेव प्रसन्न हुए सूर्यदेव ने उन्हें दर्शन दिए और कहा हे
सांप तुम्हारी तपस्या सफल हुई मैं तुम्हें रोग मुक्त होने का आशीर्वाद देता हूं तुम्हारा कुष्ठ रोग समाप्त हो जाएगा तुम्हारी सुंदरता और स्वास्थ्य पुनः लौट आएगा सूर्यदेव के आशीर्वाद से सांप का कुष्ठ रोग समाप्त हो गया उनका शरीर पुनः पहले जैसा सुंदर और स्वस्थ हो गया सूर्यदेव के आशीर्वाद से मुक्ति पाने के बाद सांब ने उनका आभार व्यक्त करने के लिए एक भव्य मंदिर बनवाने का संकल्प लिया उन्होंने उसी स्थान पर जहां उन्होंने तपस्या की थी सूर्यदेव के लिए एक मंदिर का निर्माण करवाया इस पौराणिक कथा के कारण इस स्थान को कोणार्क नाम मिला जहां
कोण का अर्थ है दिशा और अर्क का अर्थ है सूर्य यह मंदिर इस तरह बना गया कि सूर्य की पहली किरण सीधे मंदिर के गर्भगृह पर पड़े अगर आप हमारे चैनल पर पहली बार आए हैं तो इसे सब्सक्राइब करना ना भूले और वीडियो को लाइक जरूर करें तो क्या आज जो मंदिर हम देख रहे हैं वह भगवान श्री कृष्ण के पुत्र सांप द्वारा बनवाया गया सूर्य मंदिर है नहीं दोस्तों इतिहासकारों के अनुसार यह जो मंदिर हम आज देखते हैं वह चौथी बार निर्मित हुआ है आज का कोनार्क सूर्य मंदिर 13वीं शताब्दी में गंग वंश के
प्रतापी राजा नरसिंह देव प्रथम के शासनकाल में बनाया गया था यह मंदिर भारतीय वास्तुकला और धार्मिक धरोहर का अद्भुत उदाहरण है जिसे सूर्यदेव के सम्मान में निर्मित किया गया था कोनार्क सूर्य मंदिर के निर्माण के पीछे एक महत्त्वपूर्ण प्रेरणा की कहानी जुड़ी हुई है यह प्रेरणा थी राजमाता कस्तूरी देवी की कस्तूरी देवी ने अपने पुत्र गंग वंश के महान राजा नरसिंह देव प्रथम को एक विशेष संदेश दिया उन्होंने नरसिंह देव को याद दिलाया कि उनके पिता ने भगवान जगन्नाथ का भव्य मंदिर बनवाया था जो आज भी भक्ति और श्रद्धा का केंद्र है उन्होंने कहा सूर्यदेव
के बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती एक ऐसा भव्य मंदिर बनाओ जो सूर्य की महिमा को युगों युगों तक जीवित रखे और गंग वंश के वैभव और शक्ति का प्रतीक बने यह आग्रह केवल धार्मिक आस्था का परिचायक नहीं था बल्कि यह गंग वंश की शक्ति वैभव और उनके गौरव को पूरी दुनिया के सामने प्रदर्शित करने का संकल्प भी था राजमाता की इसी प्रेरणा से नरसिंह देव प्रथम ने कोनार्क में सूर्यदेव के सात घोड़ों वाले रथ के प्रतीकात्मक स्वरूप में अद्वितीय और कालजई मंदिर के निर्माण का संकल्प लिया राजा ने अपने मंत्री को
आदेश दिया कि इस भव्य सूर्य मंदिर के निर्माण के लिए सबसे श्रेष्ठ वास्तुकार की खोज की जाए मंत्री ने उस समय के महान और कुशल शिल्पकार बिशु महाराणा को इस कार्य के लिए चुना राजा के आदेश पर चंद्रभागा नदी के किनारे कोनार्क सूर्य मंदिर के निर्माण की शुरुआत हुई इस मंदिर का निर्माण 1238 ईसवी से 12 64 ईसवी के बीच हुआ मंदिर को तैयार करने में 12 वर्ष लगे और इस दौरान लगभग 1200 कुशल कारीगरों ने दिन रात अपनी मेहनत और लगन से इस अद्भुत संरचना को आकार दिया बिशु महाराणा की कुशलता और निपुणता उस
युग की प्राचीन इंजीनियरिंग का जीवंत प्रमाण है उन्होंने अपनी टीम के साथ मिलकर मंदिर को बलुआ पत्थरों से तैयार किया विशेष बात यह है कि इन पत्थरों को जोड़ने के लिए लॉ प्लेट्स यानी आयरन क्लैम्स का इस्तेमाल किया गया जिसे आज हम आधुनिक आयरन लॉक सिस्टम कह सकते हैं यह तकनीक उस समय के उन्नत इंजीनियरिंग ज्ञान को दर्शाती है और यह साबित करती है कि हमारे पूर्वज तकनीकी रूप से कितने सक्षम और उन्नत थे मंदिर निर्माण के अंतिम चरण में जब शिखर पर कलश स्थापित करने की बारी आई तो कारीगरों के कई प्रयास असफल रहे
यह देख राजा नरसिंह देव क्रोधित हो गए और उन्होंने आदेश दिया यदि सूर्योदय से पहले शिखर पर कलश स्थापित नहीं हुआ तो सभी कारीगरों को मृत्यु दंड दिया जाएगा यह सुनते ही निर्माण स्थल पर भय और निराशा का माहौल छा गया मुख्य शिल्पकार बिशु महाराणा के कंधों पर भारी संकट था उसी समय उनका 12 वर्षीय पुत्र धर्म पद वहां पहुंच गया धर्म पद जिसने जन्म के बाद से अपने पिता को कभी नहीं देखा था मां की अनुमति लेकर यहां आया था जब उसने देखा कि सभी कारीगर संकट में है और उसके पिता चिंता में डूबे
हैं तो उसने पूछा पिताजी मैं इस समस्या का हल कर सकता हूं क्या आप मुझे अनुमति देंगे धर्मपेट बालक धीरे-धीरे मंदिर के शिखर पर चढ़ा अपनी कुशलता और गणना से उसने कलश को पूरी निपुणता के साथ स्थापित कर दिया वह कार्य जिसे अनुभवी शिल्पकार 12 वर्षों में नहीं कर पाए धर्म पद ने कुछ घंटों में कर दिखाया लेकिन यह सफलता धर्म पद के लिए चिंता का विषय बन गई उसे लगा कि जब राजा को यह पता चलेगा कि यह काम एक 12 वर्षीय बालक ने किया है तो बाकी कारीगरों को अयोग्य समझकर उन्हें दंडित किया
जाएगा अपने पिता और कारीगरों की जान बचाने के लिए धर्म पद ने मंदिर के शिखर से चंद्रभागा नदी में छलांग लगा दी और अपने प्राणों की आहुति दे दी सुबह जब राजा ने मंदिर के शिखर पर कलश को स्थापित देखा और हवा में झूलती सूर्यदेव की मूर्ति को देखा तो वह अत्यंत प्रसन्न हुए उन्होंने मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा के लिए माघ शुक्ल सप्तमी का दिन तय किया लेकिन जैसे ही मंदिर का प्राण प्रतिष्ठा संपन्न हुआ कुछ रहस्यमई घटनाएं होने लगी सबसे पहले मंदिर के शिखर की एक विशाल मूर्ति नीचे गिर गई फिर मंदिर के पत्थर
खुद बखुदा नरसिंह देव को जब यह ज्ञात हुआ कि इस मंदिर के निर्माण का पहला दिन एक 12 वर्षीय बालक के बलिदान से शुरू हुआ था तो उन्होंने इसे अशुभ मानते हुए मंदिर में पूजा अर्चना को रोक दिया वर्षों तक यह भव्य मंदिर वीरान पड़ा रहा और धीरे-धीरे इसके आसपास घने जंगल उग आए कोनार्क सूर्य मंदिर के दरवाजे पिछले 123 साल से बंद हैं पर सवाल उठता है कि आखिर इन दरवाजों को बंद किसने किया और क्यों किया साल था 1903 जब भारत पर अंग्रेजों का शासन था उस समय बंगाल के लेफ्टनंट गवर्नर जे ए
बोडिल्य उन्होंने मंदिर की स्थिति को देखकर महसूस किया कि यह भव्य संरचना जल्द ही पूरी तरह ढह सकती है इसे बचाने के लिए उन्होंने एक अनोखा कदम उठाया मंदिर के गर्भगृह को रेत से भरवा दिया और इसके सभी दरवाजों को बंद करवा दिया गवर्नर का तर्क था कि रेत मंदिर के अंदरूनी हिस्से का भार संभाल लेगी जिससे यह संरचना सुरक्षित रहेगी उस समय यह कदम सही समझा गया क्योंकि तकनीकी साधन बहुत सीमित थे हालांकि यह फैसला कितना सही था यह आज भी एक बहस का विषय है लेकिन इतिहास में तो अंग्रेजों के लिए तारीफ ही
लिखी गई है अब सवाल यह उठता है कि देश की आजादी के बाद भी क्या किसी ने इस मंदिर के दरवाजों को खोलने की कोशिश नहीं की इतने सालों में आधुनिक तकनीक के होते हुए भी क्यों कोई इस गर्भगृह में प्रवेश नहीं कर सका लेकिन साल 2000 22 में आखिरकार आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया द्वारा एक योजना बनाई गई इस प्राचीन मंदिर के नवीनीकरण और इसके अंदर से रेत हटाने का काम शुरू किया गया उम्मीद है कि जल्द ही भारत सरकार इस रेत को पूरी तरह निकालने और मंदिर के दरवाजों को हमेशा के लिए खोलने का
काम पूरा करेगी लेकिन फिलहाल जब आप इस मंदिर के दर्शन करने जाते हैं तो आप केवल इसके बाहरी भाग की अद्भुत वास् कला और खूबसूरती को देख सकते हैं गर्भगृह अभी भी आम जनता के लिए बंद है अब हम बात करते हैं कोनार्क सूर्य मंदिर की अद्भुत वास्तुकला की यह मंदिर अपनी भव्यता के साथ-साथ अपनी उन्नत तकनीकों के लिए प्रसिद्ध है मंदिर का 52 टन का विशाल चुंबक जो पूरी संरचना को संतुलन देता था और गर्भ ग्रह में भगवान सूर्यदेव की अष्ट धातु की मूर्ति जो हवा में तैरती थी आज भी एक रहस्य है इसके
अलावा मंदिर के विशाल पहिए जो सूर्यदेव के रथ का प्रतीक है प्राकृतिक सूर्य घड़ी के रूप में काम करते हैं और आज भी सटीक समय बताते हैं यह प्राचीन भारतीय इंजीनियरिंग और खगोल विज्ञान का अद्भुत उदाहरण है आइए जानते हैं इन रहस्यों की गहराई को कोनार्क सूर्य मंदिर का निर्माण इस तरह से किया गया था कि सूर्योदय की पहली किरण सीधे म मंदिर के गर्भगृह में स्थित सूर्य देव की प्रतिमा पर पड़ती थी यह अद्भुत रचना सूर्य की गति और पृथ्वी की परिक्रमा को ध्यान में रखकर की गई थी मंदिर मुख्य रूप से बलुआ पत्थर
और ग्रेनाइट से बना है जो इसे प्राकृतिक आपदाओं के खिलाफ मजबूत बनाता था दोस्तों आपसे एक सवाल है कोनार्क सूर्य मंदिर के अलावा क्या आप भारत के किसी और प्राचीन सूर्य मंदिर के बारे में जानते हैं अगर जानते हैं तो उसका नाम और उसकी विशेषता कमेंट में जरूर लिखें ताकि दूसरे लोग भी इस मंदिर के बारे में जान सके आपका योगदान सबके लिए ज्ञानवर्धक होगा चलिए अब आगे बढ़ते हैं कोनार्क सूर्य मंदिर को भगवान सूर्य के रथ के रूप में बनाया गया है जो सूर्य देवता की गति और समय के चक्र का प्रतीक है हिंदू
वैदिक परंपरा में सूर्य को पूर्व में उगते हुए और सात घोड़ों द् द्वारा खींचे गए रथ में आकाश में तेजी से यात्रा करते हुए दर्शाया गया है यह रथ सात घोड़ों द्वारा खींचा जा रहा है यह घोड़े इंद्रधनुष के सात रंगों का प्रतिनिधित्व करते हैं हालांकि समय और आक्रमणों के कारण आज केवल एक घोड़े की मूर्ति शेष है सात घोड़े सप्ताह के सात दिनों को दर्शाते हैं यह बात खगोल विद अस्वीकार करते हैं क्योंकि सप्ताह के सात दिनों का सूर्य से कोई संबंध नहीं है तो फिर सवाल उठता है कि सूर्य देवता का यह रथ
सात घोड़ों द्वारा ही क्यों खींचा जाता है अगर आप कोनार्क के स्थानीय बुजुर्गों से बात करें तो वे एक दिलचस्प जानकारी साझा करते हैं उनका कहना है कि हर एक घोड़े को इंद्रधनुष के अलग-अलग रंगों की तरह रंगा गया था जैसा कि हम जानते हैं महान वैज्ञानिक आइजक न्यूटन ने 1666 में खोज की थी कि सूर्य की रोशनी सफेद नहीं होती बल्कि यह सात रंगों से बनी होती है लेकिन यह मंदिर तो न्यूटन के सिद्धांत से 400 साल पहले ही बनाया गया था तो प्राचीन निर्माण कर्ताओं को यह कैसे पता चला कि सूर्य की किरणें
वास्तव में सात रंगों से बनी होती हैं और सबसे महत्त्वपूर्ण बात इतिहासकारों ने इस अद्भुत जानकारी को अपनी किताबों में क्यों नहीं लिखा एक बात तो तय है कि जितनी भी वैज्ञानिक खोजें हुई हैं उनमें से अधिकांश का मूल प्राचीन भारत में कहीं ना कहीं छुपा है मंदिर में 12 जोड़ी पहिए हैं जो साल के 12 महीनों को दर्शाते हैं हर पहिए में आठ तीलियां होती हैं और हर दो तीलियों के बीच का समय अंतराल तीन घंटे का होता है जब इन अंतराल को जोड़ते हैं तो पूरे 24 घंटे का समय मिलता है यह सूर्य
घड़ी एंटी क्लॉक वाइज दिशा में पड़ी जाती है जैसे 12 बजे से 1:30 मिट तक फिर 3 बजे से 4:30 मिनट तक हर 90 मिनट के अंतराल में 30 खांचे होते हैं और हर एक खांचा 3 मिनट के बराबर होता है अगर आपको सटीक समय जानना हो तो आपको पहिए के केंद्र पर अपनी उंगली रखनी होगी आपकी उंगली की छाया जहां गिरेगी वह समय दिखाएगी और खांचे मिनटों का संकेत यह प्राचीन सूर्य घड़ी खगोलीय गणना और विज्ञान का अद्भुत उदाहरण है इस मंदिर की संरचना का एक अनोखा पहलू था चुंबक और आयरन का संयोजन मंदिर
के शिखर पर एक 52 टन का विशाल चुंबकीय पत्थर लगाया गया था और पत्थरों को जोड़ने के लिए लोहे की प्लेट्स का उपयोग किया गया था जिसे हम आज के आयरन लॉक सिस्टम के रूप में जानते हैं इस चुंबकीय पत्थर ने मंदिर की दीवारों में लगी लोहे की प्लेट्स के साथ मिलकर पूरे मंदिर को स्थिर और संतुलित रखा गर्भगृह में स्थित सूर्य देव की अष्ट धातु से बनी मूर्ति चुंबकीय बल के कारण हवा में तैरती प्रतीत होती थी यह तकनीक उस समय के विज्ञान और इंजीनियरिंग कौशल का प्रमाण है लोहे की प्लेट्स और चुंबकीय पत्थर
ने एक डाई मैग्नेटिक फील्ड बनाया जिससे प्रतिमा स्थिरता प्राप्त करती थी जब विदेशी व्यापारी मंदिर का दौरा करते थे और हवा में तैरती हुई इस मूर्ति को देखते थे तो वे इसे देखकर हैरान रह जाते थे यह उस समय के भारतीयों की अद्वितीय इंजीनियरिंग और खगोलीय गणना के कौशल का प्रमाण है और यह चुंबक इतना शक्तिशाली था कि मंदिर के पास से गुजरने वाले समुद्री जहाजों के कंपास काम करना बंद कर देते थे जहाज रास्ता भटक जाते थे और कई बार दुर्घटनाग्रस्त होकर डूब भी जाते थे इसी घटना ने विदेशी व्यापारी और आक्रमण कार्यं का
ध्यान इस मंदिर की ओर आकर्षित किया इसलिए पुर्तगाली नाविकों ने कोनार्क मंदिर को ब्लैक पैगड़ा या काला पगोड़ा नाम दिया था ऐसा माना जाता है कि पुर्तगाली नाविकों ने अपने नेविगेशन सिस्टम को बचाने के लिए मंदिर के शीर्ष पर लगे इस शक्तिशाली चुंबक को निकाल लिया उन्होंने इसे अपने जहाज में लादकर अपने देश ले जाने का दावा किया लेकिन इस चुंबक को हटाने के बाद मंदिर की संरचना असंतुलित हो गई और समय के साथ यह क्षतिग्रस्त होने लगा यह घटना आज भी इतिहास और रहस्य का एक बड़ा हिस्सा है और मंदिर को नष्ट करने की
एक कहानी यह भी बताई जाती है कि साल 1568 के आसपास बंगाल सल्तनत के एक मुस्लिम जनरल काला पहाड़ ने ओड़ीशा के कई मंदिरों पर हमला कर दिया इन मंदिरों में कोनार्क सूर्य मंदिर कामाख्या देवी मंदिर और जगन्नाथ पुरी का मंदिर भी शामिल था काला पहाड़ जिसका मूल नाम कालाचंद राय था एक पवित्र वैष्णव ब्राह्मण थे लेकिन सुल्तान की बेटी गुलनाज से प्रेम के कारण उन्होंने इस्लाम धर्म अपना लिया अगर आप कामाख्या देवी मंदिर और जगन्नाथ पुरी मंदिर के रहस्यों के बारे में जानना चाहते हैं तो उनकी डॉक्यूमेंट्री की लिंक आपको डिस्क्रिप्शन में मिल जाएगी
जरूर देखें और हमारी संस्कृति के इन अद्भुत प्राचीन मंदिर को जाने मदाला पंजी ग्रंथ के अनुसार काला पहाड़ जब कोणार्क मंदिर के अंदर गया तो उसने भगवान सूर्यदेव की विशाल मूर्ति को हवा में तैरते हुए देखा और दंग रह गया इसके बाद उसने अपनी सेना के साथ मंदिर की की दीवारों और मुख्य संरचना पर हमला किया काला पहाड़ मंदिर के शीर्ष पर लगे 52 टन भारी चुंबक को हटाने में सफल हुआ चुंबक हटाते ही 227 फीट ऊंचा यह भव्य मंदिर पत्थरों के ढेर में बदल गया और 1568 में ओड़ीशा पूरी तरह मुस्लिम शासन के अधीन
आ गया और हिंदू मंदिरों को लगातार तोड़ने के प्रयास किए गए इसी समय कोणार्क के सूर्य मंदिर के पुजारियों ने सूर्य देवता की मूर्ति को हटाकर रेत में छिपा दिया बाद में यह मूर्ति पूरी भेजी गई और वहां जगन्नाथ मंदिर के प्रांगण में स्थित इंद्र मंदिर में स्थापित की गई हालांकि कुछ का मानना है कि नई दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय में जो सूर्यदेव की मूर्ति रखी है वही कोनार्क सूर्य मंदिर की मुख्य मूर्ति है इस रहस्य पर आज भी चर्चा जारी है चीनी विद्वान त सांग के अनुसार सातवीं सदी ईसवी में कोणार्क में कई ऊंची
और भव्य इमारतें थी यह स्थान विभिन्न धर्मों और संप्रदायों के लोगों का संगम था जहां हिंदू बौद्ध और अन्य धर्मों के अमीर और समझदार लोग मिलजुलकर रहते थे वहीं दूसरी सदी ईसवी में ग्रीक भूगोल वेत्ता क्लॉडियस टोले ने कोनार्क का उल्लेख कन्नाग के नाम से किया है जो उस समय एक प्रसिद्ध समुद्री बंदरगाह था भारतीय ग्रंथों में इसे कायना पारा के नाम से भी जाना जाता है जो प्राचीन काल से व्यापार का एक महत्त्वपूर्ण केंद्र रहा है शुरुआत में कुछ इतिहासकारों का मानना था कि कोणार्क सूर्य मंदिर कभी पूरा नहीं हुआ और निर्माण के दौरान
ही ढह गया लेकिन 1384 ईसवी के नरसिंह चतुर्थ के शासनकाल से जुड़े केंड ताम्रपत्र शिलालेख इस धारणा को खारिज करते हैं यह शिलालेख स्पष्ट रूप से संकेत देता है कि मंदिर ना केवल पूरा हुआ था बल्कि यह पूजा का एक सक्रिय स्थल था अबुल फजल जो सम्राट अकबर के दरबार के एक प्रमुख इतिहासकार थे उन्होंने 1580 ईसवी में ओड़ीशा का दौरा किया और अपनी पुस्तक आईने ए अकबरी में लिखा कि कोनार्क का मंदिर नरसिंह देव द्वारा बनाया गया था खास बात यह है अबुल फजल ने अपनी रचना में कोनार्क मंदिर की ख हर स्थिति का
कोई उल्लेख नहीं किया इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि 1580 ईसवी में मंदिर अच्छी स्थिति में था थॉमस डोनाल्डसन के शोध के अनुसार 17वीं शताब्दी के प्रारंभिक ग्रंथों में मिले विभिन्न सर्वेक्षणों और मरम्मत के अभिलेख यह संकेत देते हैं कि कोनार्क सूर्य मंदिर को मुख्य क्षति 16वीं शताब्दी के अंत और 17वीं शताब्दी की शुरुआत के बीच हुई थी इन अभिलेखों से यह भी स्पष्ट होता है कि 17वीं शताब्दी के आरंभ में मंदिर अब भी पूजा का एक सक्रिय स्थल बना हुआ था 18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में कोनार्क सूर्य मंदिर से अरुणा स्तंभ को
हटाया गया मराठा ब्रह्मचारी गोस्वामी ने इस स्तंभ को पुरी के जगन्नाथ मंदिर के सिंहद्वार पर स्थापित किया यह स्तंभ आज भी वहां मौजूद है और कोणार्क से पूरी के इस ऐतिहासिक जुड़ाव का प्रतीक है अगर हम आज के मंदिरों को देखें तो पता चलता है कि वे केवल आस्था और व्यापार का जरिया बन गए हैं सभी देवताओं की मूर्तियां दर्शनार्थियों की सुविधा के हिसाब से लगाई जाती हैं और प्रत्येक मूर्ति के पास एक दान पात्र रखा जाता है ताकि श्रद्धालु कुछ पैसे डाल सके लेकिन अगर आप 500 से 600 साल पुराने मंदिरों को देखेंगे तो
इन दोनों के बीच एक बड़ा अंतर नजर आएगा कोनार्क जैसे मंदिर किसी आस्था के लिए नहीं बनाए गए थे यह तो एक इनसाइक्लोपीडिया म्यूजियम या विश्वविद्यालय के समान थे जिन्हें लोगों को शिक्षित करने के उद्देश्य से बनाया गया था इसलिए कोनार्क मंदिर को केवल हिंदू मंदिर कहना उचित नहीं होगा क्योंकि यहां हर धर्म के लोग आकर कुछ ना कुछ सीख सकते थे तो दोस्तों यह थी कोनार्क सूर्य मंदिर की कहानी इसके इतिहास रहस्य और प्राचीन भारत की उन्नत तकनीक पर आधारित डॉक्यूमेंट्री अगर आप वीडियो को लाइक कमेंट और सब्सक्राइब नहीं करते तो भी चलेगा लेकिन
इसे अपने दोस्तों और रिश्तेदारों के साथ जरूर शेयर करें ताकि वे भी हमारी प्राचीन भारत की तकनीक और विज्ञान के बारे में जान सकें जल्द ही मिलते हैं एक और नई डॉक्यूमेंट्री के साथ तब तक के लिए धन्यवाद जय हिंद जय भारत
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राम मंदिर का सम्पूर्ण इतिहास (त्रेता युग से 2024 तक) || Ram Mandir Ka Itihas (Tretayug to 2024)
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धर्म संसार || Dharm Sansar
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Ajanta and Ellora Caves – A marvel of Indian Architecture – [Hindi] – Infinity Stream
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Infinity Stream
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5 अस्त्र जिन्हे कलियुग में देवताओं ने धरती पर छुपा दिया था ! 5 Hidden Weapons of Gods || Kaliyug
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Mysterious Hindu
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Isang lugar sa Zambales, may lason na putik? (Full Episode) | Reporter's Notebook
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GMA Public Affairs
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जगन्नाथ मंदिर के रहस्य जानकर NASA वालों के भी होश उड़े । secret and mystery of Jagannath temple 2024
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Rahasya Duniya Hindi
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समुद्र में डूबेगा जगन्नाथ पुरी धाम , जल्द होगा जगन्नाथ पुरी मंदिर का अंत - ख़त्म हुआ कलयुग ...
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The Universal Hindu
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