वी आर गोइंग टू डू समथिंग ऑन ग्रीनलैंड वेदर दे लाइक इट नॉट ग्रीनलैंड फाइनशियल सिक्योरिटी ग्रीनलैंड ग्रीनलैंड ग्रीनलैंड ग्रीनलैंड ग्रीनलैंड आखिर बर्फ की तह से ढका हुआ यह आइलैंड अचानक दुनिया की अटेंशन का मरकज कैसे बन गया? क्या वजह है कि अमेरिका इतनी शिद्दत से ग्रीनलैंड के पीछे हाथ धोकर पड़ चुका है? इसकी जो असल वजह है वो मिनरल्स, ऑयल या अमेरिकन सिक्योरिटी से कहीं ज्यादा अहम है। इतनी अहम कि वो पूरे दुनिया का निजाम भी बदल सकती है। ZM टीवी की वीडियोस में एक बार फिर से खुशामदीद। नाजरीन ग्रीनलैंड नॉर्थ पोल के करीब दुनिया का सबसे बड़ा आइलैंड है जिसका 80% हिस्सा बर्फ की मोटी लेयर से ढका हुआ है। वैसे तो एरिया के हिसाब से यह सऊदी अरब, मेक्सिको और इंडोनेशिया से भी बड़ा है। लेकिन यहां रहने के काबिल इलाका इतना कम है कि पूरे ग्रीनलैंड में महज 57,000 लोग ही रहते हैं। वह भी साहिली पट्टी पर जहां बर्फ काफी कम है। टेंपरेचर की बात की जाए तो -30° सेल्सियस [संगीत] यहां के लिए एक नॉर्मल बात है और नॉर्दर्न हिस्सों में तो -50 भी रोज का मामूल है। गर्मियां यहां सिर्फ इतनी देर के लिए ही आती हैं जितनी देर के लिए मिडिल ईस्ट में सर्दियां आती हैं। खींच-खींच के 10° वो भी दिन की कड़कती धूप में। जिस ग्रीनलैंड में खून जमाने वाली ठंड हो, वह बर्फ का ढेर आज [संगीत] दुनिया की सुपर पावर्स के दरमियान एक कोल्ड वॉर का मरकज कैसे बन गया है। अमेरिकन प्रेसिडेंट डोनल्ड ट्रंप तो यहां तक कह चुके हैं कि हमें किसी भी सूरत ग्रीनलैंड को अमेरिका का हिस्सा बनाना है। फिर चाहे इसमें मिलिट्री ऑपरेशन का सहारा ही क्यों ना लेना पड़े। सिर्फ एक मर्तबा नहीं ट्रंप ने बार-बार ग्रीनलैंड को पाने [संगीत] की ख्वाहिश की है और ट्रंप की इसी जिद ने जिओपॉलिटिक्स एक्सपर्ट्स को फिकरमंद कर रखा है। ग्रीनलैंड नॉर्थ अमेरिकन कॉन्टिनेंट का एक हिस्सा जरूर है लेकिन पॉलिटिकली यह किंगडम ऑफ डेनमार्क के कंट्रोल में आने वाला एक ऑटोनॉमस रीजन है। डॉनल्ड ट्रंप की ख्वाहिश है कि यह यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ अमेरिका का हिस्सा बन जाए। लेकिन आपको यह बात भी बताता चलूं कि ट्रंप वह पहले शख्स नहीं है जिन्होंने ऐसी ख्वाहिश जाहिर की हो। अमेरिका ने ग्रीनलैंड को हमेशा अपनी नेशनल सिक्योरिटी का एक लाजमी हिस्सा समझा है। 1867 तक अलास्का भी रशिया का हिस्सा होता था और फिर अमेरिका ने उसको महज 2 सेंट्स पर एकड़ के हिसाब से खरीद लिया। क्योंकि अमेरिका शुरू से ही आर्कटिक रीजन में अपनी हुक्मरानी कायम रखना चाहता है। उस वक्त पहली बार ग्रीनलैंड और आइसलैंड को भी खरीदने की कोशिश की गई थी। लेकिन अमेरिकन कांग्रेस ने इस प्लान को मजाक में उड़ा दिया। इसके बाद साल 1910 में यूएस प्रेसिडेंट विलियम होवर्ड थॉफ ने ग्रीनलैंड को हासिल करने की कोशिश की। लेकिन इस बार भी नाकामी मिली। इसके बाद असल मोड़ तब आया जब वर्ल्ड वॉर 2 में जर्मंस ने डेनमार्क पर कब्जा कर लिया। इस मौके पर अमेरिका ने ग्रीनलैंड की सिक्योरिटी अपने हाथ में ले ली ताकि नजी फोर्सेस वहां अपनी बेससेस ना बना सकें। जंग खत्म होने के बाद 1946 में अमेरिकन प्रेसिडेंट हैरी ट्रूमैन ने डेनमार्क को $ मिलियन का गोल्ड ऑफर किया और इसके बदले ग्रीन लैंड मांग लिया। डेनमार्क ने उस वक्त भी जमीन बेचने से इंकार किया। पर अमेरिका को इतनी इजाजत दे दी कि वह वहां अपनी मिलिट्री बेसिस बना लें। यूं एक बात तो क्लियर है कि डोन्ड ट्रंप का तरीका जरूर गलत है लेकिन वह पहले यूएस प्रेसिडेंट नहीं जो ग्रीनलैंड को [संगीत] पाने की कोशिश कर रहे हैं। देखा जाए तो ट्रंप के इस सख्त लहजे के पीछे कई वजूहात मालूम होती हैं। वेनेजुएला के प्रेसिडेंट निकोलस मेडुरो की गिरफ्तारी और वहां कब्जा करने के बाद उन्होंने ग्रीनलैंड पर अपना दबाव मजीद बढ़ा दिया है। इसकी एक वजह तो है नेशनल सिक्योरिटी। देखा जाए तो ग्रीनलैंड की आर्कटिक में लोकेशन कुछ ऐसी है कि वह रशिया और अमेरिका के बिल्कुल सेंटर में मौजूद है। मिलिट्री के नजरिए से देखा जाए तो जो कोई ग्रीनलैंड पर होल्ड करेगा ऑटोमेटिकली उसका कंट्रोल पूरे आर्कटिक रीजन में बेहतर हो जाएगा। पर ग्रीनलैंड [संगीत] में ऑलरेडी अमेरिकन फोर्सेस मौजूद हैं। वहां की बडोफीक स्पेस बेस में आज भी 10,000 के करीब [संगीत] अमेरिकन सोल्जर्स मौजूद हैं। तो फिर उनको खतरा किस चीज का है?
असल में ग्रीनलैंड है तो डेनमार्क के होल्ड में लेकिन वहां के रहने वाले लोग काफी अरसे से अपना अलग मुल्क चाहते [संगीत] हैं यानी के आजादी और डेनमार्क भी कोई पावरफुल किंगडम नहीं है। वह अपने बजट का आधा हिस्सा ग्रीनलैंड को फंड्स की सूरत में देते हैं। लेकिन उसके बावजूद भी वहां कोई आर्मी नहीं है। ट्रंप को खतरा है कि अगर कल को ग्रीनलैंड आजाद हो गया तो हो सकता है वह वहां अमेरिकन बेसिस हटाने की डिमांड कर दें या फिर किराया बहुत ज्यादा बढ़ा दें। तभी अमेरिका चाहता है कि ग्रीनलैंड का पूरा कंट्रोल उनके हाथ में आ जाए। दूसरी बात यह है कि ग्रीनलैंड की अपनी कोई आर्मी नहीं है। वहां डेनिश डिफेंस फोर्सेस हैं जो ट्रंप के ख्याल में काफी कमजोर हैं। ट्रंप ने तंजिया अंदाज में कहा है कि वह ग्रीनलैंड को दो कुत्तों वाली स्लेड से क्या ही प्रोटेक्ट करेंगे। बेशक ट्रंप की बात किसी हद तक सही हो लेकिन पूरी दुनिया को उनकी नियत पर शक है। क्योंकि अमेरिका का पास्ट इंप्रेशन ही कुछ ऐसा रहा है। इन्होंने इराक पर हमला किया। वेपंस ऑफ मास डिस्ट्रक्शन का बहाना बनाकर। पर असल में वहां कुछ नहीं मिला। 1964 में अमेरिका ने वियतनाम पर हमला किया। यह बहाना बनाकर कि वियतनामीज़ जहाजों ने गल्फ ऑफ टोंकि में अमेरिकन जहाज यूएसएस मेडॉक्स पर हमला किया है। लेकिन 2005 में भांडा फूटा और पता चला कि ऐसा कोई हमला नहीं हुआ था। 2011 में अमेरिका ने लीबिया को निशाना बनाया। कहा गया कि कर्नल कदाफी वहां नसल कुशी कर रहे हैं। जबकि बहुत से एक्सपर्ट्स मानते हैं कि असल में कर्नल कदाफी गोल्ड दीार करेंसी बनाकर डॉलर की मोनोपोली खत्म करना चाहते थे। यह सब इस नई करेंसी को रोकने के लिए किया गया। तो तारीख को देखते हुए इस बार भी ऐसा समझा जा रहा है कि ग्रीनलैंड को रशिया से खतरे का बहाना बनाकर अमेरिका वहां कब्जा करके सिर्फ सिक्योरिटी ही नहीं बल्कि बाकी रिसोर्सेज पर भी कब्जा करना चाहता है। सिक्योरिटी से हटकर बात की जाए तो ग्रीनलैंड दुनिया के उन चंद इलाकों में से एक है जहां रेयर अर्थ एलिमेंट्स के बहुत बड़े जखाय मौजूद हैं। यह मिनरल्स इतने अहम हैं कि आने [संगीत] वाली टेक्नोलॉजी के लिए इन्हें ऑक्सीजन कहा गया है। ग्रीनलैंड में एवरेज बर्फ की लेयर 2 कि. मी. डीप है और क्योंकि यह बर्फ करोड़ों साल पुरानी है तो यकीनन यहां अनएक्सप्लर्ड [संगीत] रिसोर्सेज भी होंगे। जियोलॉजिकल सर्वेज के मुताबिक ग्रीनलैंड रेयर अर्थ एलिमेंट्स का आठवां बड़ा जखीरा है जिसमें नियोमियम है जिससे इलेक्ट्रिक गाड़ियों और टरबाइन के मैग्नेट्स बनते हैं। गैलियम है जो एआई चिप्स और रेडार सिस्टम्स में काम आता है। यूरेनियम है जो न्यूक्लियर एनर्जी में इस्तेमाल होता है और सिलिकॉन जो सेमीकंडक्टर्स और सोलर पैनल्स बनाने में फायदेमंद है। यह सारे एलिमेंट्स हमारी फ्यूचर टेक्नोलॉजी के लिए काफी फायदेमंद हैं। आपको यह बात जानकर हैरत होगी कि इस वक्त दुनिया में इन मिनरल्स की सप्लाई के 90% हिस्से पर चाइना का कंट्रोल है और रिसेंटली चाइना ने इन मिनरल्स की एक्सपोर्ट पर लिमिट्स भी लगाई हैं। ताकि वेस्टर्न कंट्रीज को प्रेशर में लाया जा सके। यह भी सच है कि आने वाले वक्त में वही सबसे ताकतवर तसवुर किया जाएगा जिसके पास इन मिनरल्स के ऊपर कंट्रोल होगा। यह भी एक वजह है कि ट्रंप ग्रीनलैंड के इन मिनरल्स को हासिल करके चाइना की मोनोपोली तोड़ना चाहते हैं। [संगीत] बताने की जरूरत तो नहीं है लेकिन सर्वे के मुताबिक सिर्फ नॉर्थ ईस्ट ग्रीनलैंड के नीचे ही 31 अरब बैरल्स ऑयल का जखीरा है और बाकी पूरे ग्रीनलैंड में कितना ऑयल है इसका अंदाजा आप खुद लगा लें। सिक्योरिटी, रेयर अर्थ एलिमेंट्स और ऑयल से हटकर इंटरनेट केबल्स की सिक्योरिटी भी एक बड़ी वजह है। जैसा कि आप जानते हैं कि दुनिया का इंटरनेट और कम्युनिकेशंस का निजाम समंदर के नीचे बिछी हुई केबल्स के जरिए चलता है। [संगीत] ग्रीनलैंड का मकाम ऐसा है कि यहां से गुजरने वाली केबल्स अमेरिका और यूरोप को आपस में जोड़ती हैं। रशिया की घोस्ट वेसल्स अक्सर इन केबल्स के आसपास देखी गई हैं। और अमेरिका को डर है कि जंग की सूरत में रशिया इन केबल्स को काटकर कम्युनिकेशन का निजाम धरम भरम कर सकता है। उनका मानना है कि अगर ग्रीनलैंड अमेरिका के पास होगा तो यूरोप और अमेरिका के बीच आर्कटिक [संगीत] समंदर में यह केबल्स भी महफूज़ रहेंगी। इसके अलावा अगर आप ग्लोब को देखें तो ग्रीनलैंड हमारी दुनिया के टॉप पर मौजूद है। यहां बी टू फीक स्पेस बेस है। जहां मौजूद है यूईडब्ल्यूआर यानी अपग्रेडेड अर्ली वार्निंग रडार। यह रशिया से निकलने वाले किसी भी इंटरकॉन्टिनेंटल बैलेस्टिक मिसाइल को लॉन्च के फौरन बाद डिटेक्ट कर सकता है। अगर इस मिसाइल को अमेरिका की तरफ फायर किया गया तो वह पेसिफिक या अटलांटिक ओशन के ऊपर से नहीं बल्कि ग्रीनलैंड के ऊपर से गुजरेगा। इसका मतलब है कि अगर अमेरिका की ग्रीनलैंड पर पकड़ नहीं होगी तो यह सीधा-साधा यूएस मेनलैंड को खतरा है। और सबसे अहम वजह जिसके बारे में कोई बात नहीं कर रहा वो है नया ट्रेड रूट। सदियों से इंसान एक ऐसे रास्ते की तलाश में है जो यूरोप और एशिया को जल्द अस जल्द मिला सके। पुराने जमाने में बहरी जहाजों को पूरे अफ्रीका या साउथ अमेरिका का चक्कर काट कर जाना पड़ता था। फिर स्विस और पेनामा कैनाल बनाए गए जिससे महीनों का सफर हफ्तों में बदल गया। लेकिन आर्कटिक ओशन का रास्ता हमेशा बर्फ से बंद रहा और यह रास्ता कार्गो शिप्स के लिए क्रॉस करना नामुमकिन समझा जाता था। अब ग्लोबल वार्मिंग की वजह से आर्कटिक [संगीत] की वह सदियों पुरानी सख्त बर्फ आहिस्ता-आहिस्ता पिघल रही है। इससे एक नया समंदरी रास्ता निकलता हुआ दिख रहा है जिसे नॉर्थ वेस्ट पैसेज कहते हैं। मिसाल के तौर पर अगर एक बहरी जहाज चाइना से लंदन जाना चाहता है तो स्विस कैनाल के बजाय इस नए आर्कटिक रास्ते से उसे तकरीबन 9000 कि.
मी. कम सफर करना पड़ेगा। इसका मतलब है कि ना सिर्फ करोड़ों डॉलर्स का फ्यूल बचेगा बल्कि सफर के 10-15 दिन भी बच जाएंगे। तो असल में यह मामला सिर्फ ग्रीनलैंड का नहीं बल्कि इस नए रास्ते को कंट्रोल करने का भी है। जो मुल्क इस रास्ते को कंट्रोल करेगा वह दुनिया की ग्लोबल ट्रेड का गेट कीपर कहलाएगा। रशिया के पास ऑलरेडी दुनिया का सबसे बड़ा आर्कटिक ओशन का साहिल है और वह अपने रास्ते पर टैक्स लगाना चाहता है। चाइना की बात की जाए तो वह यहां पोलर सिल्क रोड बनाना चाहता है। अब अमेरिका को डर है कि अगर वह पीछे रह गया तो दुनिया की ग्लोबल ट्रेड की चाबी रशिया और चाइना के हाथ में चली जाएगी जो कि अमेरिका का एक डरावना ख्वाब है। देखा जाए तो ग्रीनलैंड इस पूरे नए रास्ते की [संगीत] एंट्रेंस पर बैठा है। अगर अमेरिका ग्रीनलैंड का मालिक बन जाता है, तो वह इस नए समंदरी हाईवे के लिए एक टोल प्लाज़ा का काम करेगा और यह वक्त ज्यादा दूर भी नहीं है। एस्टीमेट्स के मुताबिक आने वाले 10 20 सालों में बर्फ मजीद पिघल जाएगी और शिपिंग इंडस्ट्री नॉर्थ वेस्ट पैसेज का रुख करने लगेगी। पर अगर अमेरिका ने ग्रीनलैंड हासिल कर लिया तो एक्सपर्ट्स का मानना है कि यह मामला ग्लोबल पॉलिटिक्स में एक नई जंग खड़ी कर सकता है। कैसे? डेनमार्क नेटो का मेंबर है। डेनमार्क के प्राइम मिनिस्टर ने साफ-साफ कहा है कि अगर अमेरिका ने जबरदस्ती ग्रीनलैंड पर कब्जा करने की कोशिश की तो यह नाटो का खात्मा होगा। नाटो का बुनियादी असूल है कि एक अलाई पर हमला सब पर हमला तसवुर होगा। अगर अमेरिका अपने ही अलय डेनमार्क के इलाके पर कब्जा करता है तो नेटो अलायस आपस में ही लड़ सकते हैं। अगर ट्रंप अपनी जिद में [संगीत] कामयाब हो जाते हैं और ग्रीनलैंड किसी ना किसी तरह अमेरिका के कंट्रोल में आ जाता है तो दुनिया पर इसके असरात इंतहाई संगीन होंगे। पहला अमेरिका दुनिया का वाहिद आर्कटिक सुप्रीम लीडर बन जाएगा। दूसरा यूरोप और अमेरिका के दरमियान मौजूद सदियों पुराना भरोसा खत्म हो जाएगा। तीसरा अमेरिका मिनरल्स का बेताज बादशाह बन सकता है जिससे चाइना को शदीद झचका पहुंचेगा। चौथा ग्रीनलैंड में माइनिंग वहां के इकोसिस्टम को बदल सकती है। जिसके असरात पूरी दुनिया को भुगतना पड़ सकते हैं। और पांचवा यह कि वहां के मकामी लोग अपनी सदियों पुरानी तहजीब और आजादी खो देंगे। आर्कटिक की पिघलती हुई बर्फ जहां नए रास्ते खोल रही है, वहां दुनिया के लिए नए खतरात भी पैदा कर रही है। और अगर ऐसा हो गया, तो वर्ल्ड वॉर वन और टू के जैसे दुनिया में एक नया माइंडसेट खड़ा हो जाएगा कि जो भी ताकतवर है, वह कमजोर पर हमला करके उस पर कब्जा कर ले। यह कहना भी गलत नहीं कि ग्रीनलैंड का जो भी फैसला होगा, वह पूरी दुनिया में आने वाले 100 सालों का फैसला होगा। अब यह अमन का फैसला होगा या फिर वर्ल्ड वॉर 3 का यह तो वक्त ही बताएगा। उम्मीद है ZM टीवी की यह वीडियो भी आप लोग भरपूर लाइक और शेयर करेंगे। आप लोगों के प्यार भरे कमेंट्स का बेहद शुक्रिया। मिलते हैं अगली शानदार वीडियो में। वी आर गोइंग टू डू समथिंग ऑन ग्रीनलैंड वेदर दे लाइक इट नॉट ग्रीनलैंड फाइनशियल सिक्योरिटी ग्रीनलैंड ग्रीनलैंड ग्रीनलैंड ग्रीनलैंड ग्रीनलैंड आखिर बर्फ की तह से ढका हुआ यह आइलैंड अचानक दुनिया की अटेंशन का मरकज कैसे बन गया?
क्या वजह है कि अमेरिका इतनी शिद्दत से ग्रीनलैंड के पीछे हाथ धोकर पड़ चुका है? इसकी जो असल वजह है वो मिनरल्स, ऑयल या अमेरिकन सिक्योरिटी से कहीं ज्यादा अहम है। इतनी अहम कि वो पूरे दुनिया का निजाम भी बदल सकती है। ZM टीवी की वीडियोस में एक बार फिर से खुशामदीद। नाजरीन ग्रीनलैंड नॉर्थ पोल के करीब दुनिया का सबसे बड़ा आइलैंड है जिसका 80% हिस्सा बर्फ की मोटी लेयर से ढका हुआ है। वैसे तो एरिया के हिसाब से यह सऊदी अरब, मेक्सिको और इंडोनेशिया से भी बड़ा है। लेकिन यहां रहने के काबिल इलाका इतना कम है कि पूरे ग्रीनलैंड में महज 57,000 लोग ही रहते हैं। वह भी साहिली पट्टी पर जहां बर्फ काफी कम है। टेंपरेचर की बात की जाए तो -30° सेल्सियस [संगीत] यहां के लिए एक नॉर्मल बात है और नॉर्दर्न हिस्सों में तो -50 भी रोज का मामूल है। गर्मियां यहां सिर्फ इतनी देर के लिए ही आती हैं जितनी देर के लिए मिडिल ईस्ट में सर्दियां आती हैं। खींच-खींच के 10° वो भी दिन की कड़कती धूप में। जिस ग्रीनलैंड में खून जमाने वाली ठंड हो, वह बर्फ का ढेर आज [संगीत] दुनिया की सुपर पावर्स के दरमियान एक कोल्ड वॉर का मरकज कैसे बन गया है। अमेरिकन प्रेसिडेंट डोनल्ड ट्रंप तो यहां तक कह चुके हैं कि हमें किसी भी सूरत ग्रीनलैंड को अमेरिका का हिस्सा बनाना है। फिर चाहे इसमें मिलिट्री ऑपरेशन का सहारा ही क्यों ना लेना पड़े। सिर्फ एक मर्तबा नहीं ट्रंप ने बार-बार ग्रीनलैंड को पाने [संगीत] की ख्वाहिश की है और ट्रंप की इसी जिद ने जिओपॉलिटिक्स एक्सपर्ट्स को फिकरमंद कर रखा है। ग्रीनलैंड नॉर्थ अमेरिकन कॉन्टिनेंट का एक हिस्सा जरूर है लेकिन पॉलिटिकली यह किंगडम ऑफ डेनमार्क के कंट्रोल में आने वाला एक ऑटोनॉमस रीजन है। डॉनल्ड ट्रंप की ख्वाहिश है कि यह यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ अमेरिका का हिस्सा बन जाए। लेकिन आपको यह बात भी बताता चलूं कि ट्रंप वह पहले शख्स नहीं है जिन्होंने ऐसी ख्वाहिश जाहिर की हो। अमेरिका ने ग्रीनलैंड को हमेशा अपनी नेशनल सिक्योरिटी का एक लाजमी हिस्सा समझा है। 1867 तक अलास्का भी रशिया का हिस्सा होता था और फिर अमेरिका ने उसको महज 2 सेंट्स पर एकड़ के हिसाब से खरीद लिया। क्योंकि अमेरिका शुरू से ही आर्कटिक रीजन में अपनी हुक्मरानी कायम रखना चाहता है। उस वक्त पहली बार ग्रीनलैंड और आइसलैंड को भी खरीदने की कोशिश की गई थी। लेकिन अमेरिकन कांग्रेस ने इस प्लान को मजाक में उड़ा दिया। इसके बाद साल 1910 में यूएस प्रेसिडेंट विलियम होवर्ड थॉफ ने ग्रीनलैंड को हासिल करने की कोशिश की। लेकिन इस बार भी नाकामी मिली। इसके बाद असल मोड़ तब आया जब वर्ल्ड वॉर 2 में जर्मंस ने डेनमार्क पर कब्जा कर लिया। इस मौके पर अमेरिका ने ग्रीनलैंड की सिक्योरिटी अपने हाथ में ले ली ताकि नजी फोर्सेस वहां अपनी बेससेस ना बना सकें। जंग खत्म होने के बाद 1946 में अमेरिकन प्रेसिडेंट हैरी ट्रूमैन ने डेनमार्क को $ मिलियन का गोल्ड ऑफर किया और इसके बदले ग्रीन लैंड मांग लिया। डेनमार्क ने उस वक्त भी जमीन बेचने से इंकार किया। पर अमेरिका को इतनी इजाजत दे दी कि वह वहां अपनी मिलिट्री बेसिस बना लें। यूं एक बात तो क्लियर है कि डोन्ड ट्रंप का तरीका जरूर गलत है लेकिन वह पहले यूएस प्रेसिडेंट नहीं जो ग्रीनलैंड को [संगीत] पाने की कोशिश कर रहे हैं। देखा जाए तो ट्रंप के इस सख्त लहजे के पीछे कई वजूहात मालूम होती हैं। वेनेजुएला के प्रेसिडेंट निकोलस मेडुरो की गिरफ्तारी और वहां कब्जा करने के बाद उन्होंने ग्रीनलैंड पर अपना दबाव मजीद बढ़ा दिया है। इसकी एक वजह तो है नेशनल सिक्योरिटी। देखा जाए तो ग्रीनलैंड की आर्कटिक में लोकेशन कुछ ऐसी है कि वह रशिया और अमेरिका के बिल्कुल सेंटर में मौजूद है। मिलिट्री के नजरिए से देखा जाए तो जो कोई ग्रीनलैंड पर होल्ड करेगा ऑटोमेटिकली उसका कंट्रोल पूरे आर्कटिक रीजन में बेहतर हो जाएगा। पर ग्रीनलैंड [संगीत] में ऑलरेडी अमेरिकन फोर्सेस मौजूद हैं। वहां की बडोफीक स्पेस बेस में आज भी 10,000 के करीब [संगीत] अमेरिकन सोल्जर्स मौजूद हैं। तो फिर उनको खतरा किस चीज का है? असल में ग्रीनलैंड है तो डेनमार्क के होल्ड में लेकिन वहां के रहने वाले लोग काफी अरसे से अपना अलग मुल्क चाहते [संगीत] हैं यानी के आजादी और डेनमार्क भी कोई पावरफुल किंगडम नहीं है। वह अपने बजट का आधा हिस्सा ग्रीनलैंड को फंड्स की सूरत में देते हैं। लेकिन उसके बावजूद भी वहां कोई आर्मी नहीं है। ट्रंप को खतरा है कि अगर कल को ग्रीनलैंड आजाद हो गया तो हो सकता है वह वहां अमेरिकन बेसिस हटाने की डिमांड कर दें या फिर किराया बहुत ज्यादा बढ़ा दें। तभी अमेरिका चाहता है कि ग्रीनलैंड का पूरा कंट्रोल उनके हाथ में आ जाए। दूसरी बात यह है कि ग्रीनलैंड की अपनी कोई आर्मी नहीं है। वहां डेनिश डिफेंस फोर्सेस हैं जो ट्रंप के ख्याल में काफी कमजोर हैं। ट्रंप ने तंजिया अंदाज में कहा है कि वह ग्रीनलैंड को दो कुत्तों वाली स्लेड से क्या ही प्रोटेक्ट करेंगे। बेशक ट्रंप की बात किसी हद तक सही हो लेकिन पूरी दुनिया को उनकी नियत पर शक है। क्योंकि अमेरिका का पास्ट इंप्रेशन ही कुछ ऐसा रहा है। इन्होंने इराक पर हमला किया। वेपंस ऑफ मास डिस्ट्रक्शन का बहाना बनाकर। पर असल में वहां कुछ नहीं मिला। 1964 में अमेरिका ने वियतनाम पर हमला किया। यह बहाना बनाकर कि वियतनामीज़ जहाजों ने गल्फ ऑफ टोंकि में अमेरिकन जहाज यूएसएस मेडॉक्स पर हमला किया है। लेकिन 2005 में भांडा फूटा और पता चला कि ऐसा कोई हमला नहीं हुआ था। 2011 में अमेरिका ने लीबिया को निशाना बनाया। कहा गया कि कर्नल कदाफी वहां नसल कुशी कर रहे हैं। जबकि बहुत से एक्सपर्ट्स मानते हैं कि असल में कर्नल कदाफी गोल्ड दीार करेंसी बनाकर डॉलर की मोनोपोली खत्म करना चाहते थे। यह सब इस नई करेंसी को रोकने के लिए किया गया। तो तारीख को देखते हुए इस बार भी ऐसा समझा जा रहा है कि ग्रीनलैंड को रशिया से खतरे का बहाना बनाकर अमेरिका वहां कब्जा करके सिर्फ सिक्योरिटी ही नहीं बल्कि बाकी रिसोर्सेज पर भी कब्जा करना चाहता है। सिक्योरिटी से हटकर बात की जाए तो ग्रीनलैंड दुनिया के उन चंद इलाकों में से एक है जहां रेयर अर्थ एलिमेंट्स के बहुत बड़े जखाय मौजूद हैं। यह मिनरल्स इतने अहम हैं कि आने [संगीत] वाली टेक्नोलॉजी के लिए इन्हें ऑक्सीजन कहा गया है। ग्रीनलैंड में एवरेज बर्फ की लेयर 2 कि.
मी. डीप है और क्योंकि यह बर्फ करोड़ों साल पुरानी है तो यकीनन यहां अनएक्सप्लर्ड [संगीत] रिसोर्सेज भी होंगे। जियोलॉजिकल सर्वेज के मुताबिक ग्रीनलैंड रेयर अर्थ एलिमेंट्स का आठवां बड़ा जखीरा है जिसमें नियोमियम है जिससे इलेक्ट्रिक गाड़ियों और टरबाइन के मैग्नेट्स बनते हैं। गैलियम है जो एआई चिप्स और रेडार सिस्टम्स में काम आता है। यूरेनियम है जो न्यूक्लियर एनर्जी में इस्तेमाल होता है और सिलिकॉन जो सेमीकंडक्टर्स और सोलर पैनल्स बनाने में फायदेमंद है। यह सारे एलिमेंट्स हमारी फ्यूचर टेक्नोलॉजी के लिए काफी फायदेमंद हैं। आपको यह बात जानकर हैरत होगी कि इस वक्त दुनिया में इन मिनरल्स की सप्लाई के 90% हिस्से पर चाइना का कंट्रोल है और रिसेंटली चाइना ने इन मिनरल्स की एक्सपोर्ट पर लिमिट्स भी लगाई हैं। ताकि वेस्टर्न कंट्रीज को प्रेशर में लाया जा सके। यह भी सच है कि आने वाले वक्त में वही सबसे ताकतवर तसवुर किया जाएगा जिसके पास इन मिनरल्स के ऊपर कंट्रोल होगा। यह भी एक वजह है कि ट्रंप ग्रीनलैंड के इन मिनरल्स को हासिल करके चाइना की मोनोपोली तोड़ना चाहते हैं। [संगीत] बताने की जरूरत तो नहीं है लेकिन सर्वे के मुताबिक सिर्फ नॉर्थ ईस्ट ग्रीनलैंड के नीचे ही 31 अरब बैरल्स ऑयल का जखीरा है और बाकी पूरे ग्रीनलैंड में कितना ऑयल है इसका अंदाजा आप खुद लगा लें। सिक्योरिटी, रेयर अर्थ एलिमेंट्स और ऑयल से हटकर इंटरनेट केबल्स की सिक्योरिटी भी एक बड़ी वजह है। जैसा कि आप जानते हैं कि दुनिया का इंटरनेट और कम्युनिकेशंस का निजाम समंदर के नीचे बिछी हुई केबल्स के जरिए चलता है। [संगीत] ग्रीनलैंड का मकाम ऐसा है कि यहां से गुजरने वाली केबल्स अमेरिका और यूरोप को आपस में जोड़ती हैं। रशिया की घोस्ट वेसल्स अक्सर इन केबल्स के आसपास देखी गई हैं। और अमेरिका को डर है कि जंग की सूरत में रशिया इन केबल्स को काटकर कम्युनिकेशन का निजाम धरम भरम कर सकता है। उनका मानना है कि अगर ग्रीनलैंड अमेरिका के पास होगा तो यूरोप और अमेरिका के बीच आर्कटिक [संगीत] समंदर में यह केबल्स भी महफूज़ रहेंगी। इसके अलावा अगर आप ग्लोब को देखें तो ग्रीनलैंड हमारी दुनिया के टॉप पर मौजूद है। यहां बी टू फीक स्पेस बेस है। जहां मौजूद है यूईडब्ल्यूआर यानी अपग्रेडेड अर्ली वार्निंग रडार। यह रशिया से निकलने वाले किसी भी इंटरकॉन्टिनेंटल बैलेस्टिक मिसाइल को लॉन्च के फौरन बाद डिटेक्ट कर सकता है। अगर इस मिसाइल को अमेरिका की तरफ फायर किया गया तो वह पेसिफिक या अटलांटिक ओशन के ऊपर से नहीं बल्कि ग्रीनलैंड के ऊपर से गुजरेगा। इसका मतलब है कि अगर अमेरिका की ग्रीनलैंड पर पकड़ नहीं होगी तो यह सीधा-साधा यूएस मेनलैंड को खतरा है। और सबसे अहम वजह जिसके बारे में कोई बात नहीं कर रहा वो है नया ट्रेड रूट। सदियों से इंसान एक ऐसे रास्ते की तलाश में है जो यूरोप और एशिया को जल्द अस जल्द मिला सके। पुराने जमाने में बहरी जहाजों को पूरे अफ्रीका या साउथ अमेरिका का चक्कर काट कर जाना पड़ता था। फिर स्विस और पेनामा कैनाल बनाए गए जिससे महीनों का सफर हफ्तों में बदल गया। लेकिन आर्कटिक ओशन का रास्ता हमेशा बर्फ से बंद रहा और यह रास्ता कार्गो शिप्स के लिए क्रॉस करना नामुमकिन समझा जाता था। अब ग्लोबल वार्मिंग की वजह से आर्कटिक [संगीत] की वह सदियों पुरानी सख्त बर्फ आहिस्ता-आहिस्ता पिघल रही है। इससे एक नया समंदरी रास्ता निकलता हुआ दिख रहा है जिसे नॉर्थ वेस्ट पैसेज कहते हैं। मिसाल के तौर पर अगर एक बहरी जहाज चाइना से लंदन जाना चाहता है तो स्विस कैनाल के बजाय इस नए आर्कटिक रास्ते से उसे तकरीबन 9000 कि. मी.
कम सफर करना पड़ेगा। इसका मतलब है कि ना सिर्फ करोड़ों डॉलर्स का फ्यूल बचेगा बल्कि सफर के 10-15 दिन भी बच जाएंगे। तो असल में यह मामला सिर्फ ग्रीनलैंड का नहीं बल्कि इस नए रास्ते को कंट्रोल करने का भी है। जो मुल्क इस रास्ते को कंट्रोल करेगा वह दुनिया की ग्लोबल ट्रेड का गेट कीपर कहलाएगा। रशिया के पास ऑलरेडी दुनिया का सबसे बड़ा आर्कटिक ओशन का साहिल है और वह अपने रास्ते पर टैक्स लगाना चाहता है। चाइना की बात की जाए तो वह यहां पोलर सिल्क रोड बनाना चाहता है। अब अमेरिका को डर है कि अगर वह पीछे रह गया तो दुनिया की ग्लोबल ट्रेड की चाबी रशिया और चाइना के हाथ में चली जाएगी जो कि अमेरिका का एक डरावना ख्वाब है। देखा जाए तो ग्रीनलैंड इस पूरे नए रास्ते की [संगीत] एंट्रेंस पर बैठा है। अगर अमेरिका ग्रीनलैंड का मालिक बन जाता है, तो वह इस नए समंदरी हाईवे के लिए एक टोल प्लाज़ा का काम करेगा और यह वक्त ज्यादा दूर भी नहीं है। एस्टीमेट्स के मुताबिक आने वाले 10 20 सालों में बर्फ मजीद पिघल जाएगी और शिपिंग इंडस्ट्री नॉर्थ वेस्ट पैसेज का रुख करने लगेगी। पर अगर अमेरिका ने ग्रीनलैंड हासिल कर लिया तो एक्सपर्ट्स का मानना है कि यह मामला ग्लोबल पॉलिटिक्स में एक नई जंग खड़ी कर सकता है। कैसे?