क्या आपने कभी सोचा है कि महाभारत के महायुद्ध में सबसे शक्तिशाली योद्धा कौन था? अर्जुन, कर्ण या भीष्म पितामह नहीं। उस युद्ध में एक ऐसा भी योद्धा था। जिसके मात्र तीन बाण ही पूरी कौरव और पांडव सेना का विनाश करने के लिए पर्याप्त थे। एक ऐसा वीर जिसकी शक्ति के सामने स्वयं भगवान कृष्ण को भी लीला रचनी पड़ी। क्या होगा अगर मैं आपसे कहूं कि उस योद्धा को युद्ध लड़ने से पहले ही रोक दिया गया। क्यों? ऐसा क्या रहस्य था उस योद्धा की शक्ति में कि धर्म की स्थापना के लिए उसका बलिदान अनिवार्य हो गया
और उस बलिदान के बदले भगवान कृष्ण ने उसे ऐसा क्या वरदान दिया जिसका सीधा संबंध आज हम सबसे यानी कलयुग से है। आइए आज चलते हैं इतिहास के उन पन्नों में जहां भक्ति, शक्ति और रहस्य की एक ऐसी गाथा लिखी है जो आज भी प्रासंगिक है। द्वापर युग का अंतिम चरण था और धरती एक महाविनाश के मुहाने पर खड़ी थी। हस्तिनापुर का सिंहासन दो भागों में बंट चुका था। एक ओर थे धर्म और न्याय के प्रतीक पांडव और दूसरी ओर थे अधर्म, लोभ और अहंकार में डूबे कौरव। जब शांति के सारे मार्ग बंद हो गए
तो युद्ध ही एकमात्र विकल्प बचा। कुरुक्षेत्र की भूमि को रक्त से सींचने की तैयारी हो चुकी थी। देश विदेश के राजा महाराजा अपनी-अपनी सेनाओं के साथ किसी एक पक्ष से जुड़ रहे थे। उन्हीं दिनों सुदूर वनों में अपनी माता के साथ रहने वाले एक तेजस्वी युवक के कानों में भी युद्ध के नगाड़ों की गूंज पहुंची। यह कोई साधारण युवक नहीं था। यह था महाबली भीम का पौत्र और वीर घटोत्कच का पुत्र बरबरीक। उसके मुख पर सूर्य के समान तेज था। भुजाओं में सहस्त्र हाथियों का बल था और हृदय में अपनी माता के प्रति असीम भक्ति
थी। बरबरीक ने बचपन से ही अपनी माता मॉरवी से युद्ध की शिक्षा ली थी और उन्हें एक वचन दिया था। एक ऐसा वचन जो आगे चलकर इतिहास की सबसे बड़ी पहेली बनने वाला था। उसने वचन दिया था। हे माते मैं जीवन में सदैव हारने वाले पक्ष का ही साथ दूंगा। यह वचन उसकी करुणा और वीरता का प्रतीक था। लेकिन यही वचन धर्म की स्थापना में सबसे बड़ी बाधा भी बनने वाला था। बरबरीक ने भगवान शिव की घोर तपस्या करके उन्हें प्रसन्न किया था। और महादेव ने उसे तीन ऐसे दिव्य बाण प्रदान किए थे जो अपने
लक्ष्य को भेदकर चाहे वह कहीं भी छिपा हो वापस उसके तरकश में लौट आते थे। इन बाणों की शक्ति अमोग थी। अभेद्य थी। मात्र एक बाण से ही वह पूरी शत्रु सेना का सहार कर सकता था और दूसरा बाण चला दे तो तीनों लोकों में हाहाकार मच जाए। जब बरबरी को ज्ञात हुआ कि उसके पितामह पांडव कौरवों के विरुद्ध धर्म युद्ध लड़ रहे हैं। तो उसने भी इस युद्ध में भाग लेने का निश्चय किया। [संगीत] वह अपनी माता के चरणों में गया। उनका आशीर्वाद लिया। अपना दिव्य धनुष और वह तीन अमोग बाण लिए। और अपने
प्रिय नीले घोड़े पर सवार होकर कुरुक्षेत्र की ओर चल पड़ा। उसके मन में केवल एक ही धेय था। अपनी माता को दिया वचन निभाना और हारते हुए पक्ष को विजय दिलाना। जैसे ही बरबरीक ने अपनी यात्रा आरंभ की। सृष्टि में एक अजीब सी हलचल होने लगी। हवाएं तेज हो गई, आकाश में बादल घुमड़ने लगे। क्योंकि नियति जानती थी कि एक ऐसी शक्ति कुरुक्षेत्र की ओर बढ़ रही है जो युद्ध के परिणाम को पूरी तरह से बदल सकती है। द्वारिका में बैठे तीनों लोकों के स्वामी सर्वव्यापी सर्वज्ञानी भगवान श्री कृष्ण यह सब देख रहे थे। वे
जानते थे कि बरबरी कौन है? उसकी शक्ति क्या है? और उसका वचन क्या है? श्री कृष्ण ने अपनी दिव्य दृष्टि से भविष्य में झांका और जो उन्होंने देखा उससे वे चिंतित हो गए। उन्होंने देखा कि बरबरी कुरुक्षेत्र पहुंचता है और अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार वो कमजोर पक्ष को खोजता है। उस समय पांडवों की सेना कौरवों की तुलना में छोटी और कमजोर थी। बरबरीक पांडवों की ओर से लड़ने का निर्णय लेता है। वह अपना पहला बाण चलाता है और पलक झपकते ही कौरवों की आधी से अधिक सेना समाप्त हो जाती है। कौरवों का पलड़ा कमजोर हो
जाता है और पांडवों का पलड़ा भारी। अब बरबरीक अपनी प्रतिज्ञा से बंध जाता है। उसे हारते हुए पक्ष का साथ देना है और अब कौरव हार रहे थे। वह तुरंत पांडवों का पक्ष छोड़कर कौरवों की ओर से लड़ने लगता है और अपना दूसरा बाण चलाकर बची खुची पांडव सेना को समाप्त कर देता है। अंत में युद्ध भूमि पर कोई नहीं बचता ना कौरव ना पांडव केवल अकेला बरबरीक विजय खड़ा होता है। यह धर्म की स्थापना नहीं बल्कि संपूर्ण विनाश था। यह वह परिणाम नहीं था जिसके लिए इतना बड़ा आयोजन किया गया था। श्री कृष्ण जानते
थे कि धर्म की स्थापना के लिए पांडवों का जीतना और अधर्म का नाश होना आवश्यक है। बरबरी की उपस्थिति इस पूरे समीकरण को बिगाड़ रही थी। उसे रोकना ही होगा। लेकिन कैसे? जिस पर स्वयं महादेव की कृपा हो उसे कौन रोक सकता है? दोस्तों, कहानी का सबसे रहस्यमय मोड़ अब आने वाला है। अगर आपको बरबरी की यह अद्भुत गाथा पसंद आ रही है, तो कृपया इस वीडियो को एक लाइक जरूर करें और अगर आप हमारे चैनल पर नए हैं तो सब्सक्राइब का बटन दबाना ना भूलें। कमेंट में जय श्री श्याम अवश्य लिखें ताकि हमें पता
चले कि आप भी इस दिव्य कथा से जुड़ चुके हैं। अब आगे सुनिए कि भगवान ने क्या लीला रची। श्री कृष्ण ने एक योजना बनाई। वे एक साधारण वृद्ध ब्राह्मण का वेश धारण करते हैं। हाथ में एक लाठी लेते हैं और शरीर पर मामूली वस्त्र पहनकर बरबरीक के मार्ग में एक पेड़ के नीचे बैठ जाते हैं। जब बरबरीक अपने नीले घोड़े पर वहां से गुजरता है तो उसकी दृष्टि उस शांत और विनम्र दिख रहे ब्राह्मण पर पड़ती है। वो शिष्टाचारश घोड़े से उतरता है और ब्राह्मण को प्रणाम करता है। ब्राह्मण रूपी श्री कृष्ण मुस्कुराते हुए
पूछते हैं हे वीर युवक तुम कौन हो और इतनी तेज गति से कहां जा रहे हो तुम्हारे मुख का तेज तो किसी राजकुमार जैसा है लेकिन तुम्हारे कंधे पर यह केवल तीन बाण क्या तुम इन तीन बाणों से इतना बड़ा महाभारत का युद्ध लड़ने जा रहे हो उनके स्वर में एक हल्का सा उपहास था एक चुनौती थी बरबरीक ने बड़ी विनम्रता से उत्तर दिया हे ब्राह्मण देव मेरा नाम बरबरीक है और आप इन तीन बाणों को साधारण समझने की भूल ना करें। इनमें से मात्र एक ही बाण संपूर्ण शत्रु सेना का नाश करने के लिए
पर्याप्त है। मुझे दूसरे बाण का प्रयोग करने की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी। ब्राह्मण रूपी कृष्ण हंस पड़े। मुझे तुम्हारी बातों पर विश्वास नहीं होता। यदि तुम्हारी शक्ति में इतना ही दम है तो मुझे इसका प्रमाण दिखाओ। क्या तुम इस सामने खड़े पीपल के पेड़ के सारे पत्तों को एक ही बाण से भेज सकते हो? बरबरीक ने मुस्कुराकर चुनौती स्वीकार कर ली। वो जानता था कि उसकी शक्ति क्या है। उसने कहा अवश्य ब्राह्मण देव आप बस देखते जाइए। जैसे ही बरबरीक ने अपने तरकश से वह दिव्य बाण निकाला और धनुष पर चढ़ाया। श्री कृष्ण ने चुपके
से एक पीपल का पत्ता तोड़कर अपने पैर के नीचे दबा लिया। वे देखना चाहते थे कि यह बाण अपने लक्ष्य को खोजने में कितना समर्थ है। बरबरीक ने आंखें बंद की। मंत्रों का उच्चारण किया और बाण को छोड़ दिया। बाण एक अविश्वसनीय गति से निकला और एक-एक करके पेड़ के हर एक पत्ते को भेदता चला गया। ऐसा लग रहा था मानो बाण की हर पत्ते से कोई निजी शत्रुता हो। उसने पेड़ पर लगे मीन पर गिरे और हवा में उड़ रहे सभी पत्तों में छेद कर दिया। अपना कार्य पूरा करने के बाद वो बाण वापस
तरकश में नहीं लौटा बल्कि वह सीधे ब्राह्मण रूपी श्री कृष्ण के पैर के पास आकर चक्कर काटने लगा। बरबरीक यह देखकर चौंक गया। वह समझ गया कि कोई पत्ता छूट गया है। उसने ब्राह्मण से कहा, हे ब्राह्मण श्रेष्ठ कृपा करके अपना पैर हटाइए। लगता है कोई पत्ता आपके पैर के नीचे दबा है और यह बाण उसे भेदे बिना मेरे तरकश में वापस नहीं जाएगा। यदि आपने पैर नहीं हटाया तो यह आपके पैर को भेदता हुआ उस पत्ते तक पहुंच जाएगा। यह सुनते ही ब्राह्मण के वेश में खड़े श्री कृष्ण मुस्कुरा दिए। उनकी मुस्कान में पूरे
ब्रह्मांड का रहस्य छिपा था। बरबरीक समझ गया कि यह कोई साधारण ब्राह्मण नहीं है जो उसकी शक्ति के रहस्य को जानता है और जो उसके बाण के मार्ग में बाधा बनकर भी अविचलित खड़ा है वह कोई दिव्य पुरुष ही हो सकता है। उसने हाथ जोड़कर पूछा हे देव आप जो भी है कृपया अपने वास्तविक स्वरूप में आइए। एक साधारण ब्राह्मण में इतनी क्षमता नहीं हो सकती। बरबरी की प्रार्थना सुनकर वह वृद्ध ब्राह्मण धीरे-धीरे अपने वास्तविक स्वरूप में आने लगा। उसके चारों ओर एक दिव्य प्रकाश फैल गया और उसके स्थान पर अब मुरली मनोहर पीतांबर धारी
सुदर्शन चक्र धारण करने वाले स्वयं भगवान वासुदेव श्री कृष्ण खड़े थे। उन्हें अपने सामने देखकर बरबरी की आंखें खुली की खुली रह गई। वो अवाक रह गया। जिस भगवान के दर्शन के लिए ऋषि मुनि युगों तक तपस्या करते हैं। वे स्वयं उसके सामने खड़े थे। वह तुरंत उनके चरणों में गिर पड़ा। श्री कृष्ण ने उसे उठाया और कहा उठो वीर बरबरीक मैं तुम्हारी शक्ति और तुम्हारी विनम्रता दोनों से ही प्रसन्न हुआ। तुमने यह सिद्ध कर दिया कि इस युद्ध में तुमसे बड़ा कोई और योद्धा नहीं है। बरबरी की आंखों में आंसू थे। लेकिन उसका हृदय
यह जानने के लिए व्याकुल था कि भगवान ने उसे इस तरह क्यों रोका? उसने हाथ जोड़कर पूछा हे प्रभु यदि आप मेरी शक्ति से प्रसन्न हैं तो आपने यह लीला क्यों रची? मुझे युद्ध में जाने से क्यों रोका? श्री कृष्ण के मुख पर एक गंभीर भाव आ गया। उन्होंने जो रहस्य खोला वो बरबरी के पैरों तले जमीन खिसकाने वाला था। एक ऐसा रहस्य जो द्वापर से लेकर कलयुग तक के भाग्य को निर्धारित करने वाला था। भगवान कृष्ण ने बरबरीक से क्या कहा? उन्होंने बरबरीक से ऐसा क्या मांग लिया कि इतिहास में उसका नाम अमर हो
गया और उस मांग का कलयुग से क्या संबंध है? यह जानने के लिए आपको हमारी इस कहानी को पूरा देखना होगा। हम आपको विश्वास दिलाते हैं। आगे की कहानी आपके रोंगटे खड़े कर देगी और आपकी आंखों में आंसू ला देगी। यह जानने के लिए कि कैसे एक योद्धा कलयुग का सबसे बड़ा सहारा बना। हमारे साथ बने रह। इस कहानी को अपने परिवार और दोस्तों के साथ साझा करना ना भूलले। ताकि वे भी इस अद्भुत कथा का आनंद ले सके। अभी तक हमने देखा कि वीर बरबरी के सामने कोई साधारण ब्राह्मण नहीं। बल्कि स्वयं तीनों लोकों
के स्वामी भगवान श्री कृष्ण अपने विराट स्वरूप में प्रकट हो चुके थे। बरबरीक जो अपनी शक्ति के अभिमान में नहीं बल्कि अपनी शक्ति के विश्वास में जी रहा था। वो अपने आराध्य को अपने सामने देखकर अवाग था। नी शब्द था। उसकी आंखों से अविरल अश्रुधारा बह रही थी। आज उसकी यात्रा सफल हो गई थी। उसका जीवन धन्य हो गया था। लेकिन उसके मन में अब भी वही प्रश्न था। क्यों? प्रभु ने मुझे क्यों रोका? क्या भगवान कृष्ण सच में उसकी परीक्षा ले रहे थे? या इसके पीछे कोई ऐसा गहरा रहस्य था जो धर्म की स्थापना
के लिए अनिवार्य था और बरबरीक से भगवान ऐसा क्या मांगने वाले थे? जिसे सुनकर न सिर्फ बरबरीक बल्कि आने वाली हर पीढ़ी का हृदय काम जाएगा। आइए इस दिव्य रहस्य की अगली परत को खोलते हैं। भगवान श्री कृष्ण ने बरबरी को अपने चरणों से उठाया और उनके चेहरे पर एक साथ करुणा, गौरव और एक अनकही पीड़ा के भाव थे। उन्होंने कहा हे वीर शिरोमणि बरबरीक मैं तुम्हारी शक्ति, तुम्हारी भक्ति और तुम्हारी विनम्रता तीनों से ही परम प्रसन्न हूं। इसमें कोई संदेह नहीं कि तुम इस युग के सबसे महान और अजय योद्धा हो। तुम्हारे तरकश में
रखे यह तीन बाण काल के समान है जो एक बार छूट जाए तो सृष्टि का विनाश करके ही लौटे। बरबरीक ने हाथ जोड़कर कहा हे नारायण यह सब तो आपकी ही कृपा है। मैं तो केवल एक निमित्त मात्र हूं। पर हे प्रभु मेरे मन की इस दुविधा को शांत कीजिए। यदि आप मुझसे प्रसन्न हैं तो आपने मुझे कुरुक्षेत्र जाने से क्यों रोका? मेरे पितामह पांडव धर्म के लिए लड़ रहे हैं और मैं उनकी सहायता करना चाहता हूं। श्री कृष्ण के मुख पर एक हल्की रहस्यमय मुस्कान आई। उन्होंने कहा बरबरीक तुम्हारा हृदय पवित्र है और तुम्हारी
मंशा भी नेक है। लेकिन तुमने अपनी माता को जो वचन दिया है क्या तुम उसका अर्थ समझते हो? तुमने कहा है कि तुम सदैव हारने वाले पक्ष का साथ दोगे। बरबरीक ने दृढ़ता से कहा, हां प्रभु यह मेरा प्रण है और मैं इससे पीछे नहीं हट सकता। ब तब श्री कृष्ण ने उसे समझाया पुत्र इसी प्रण में धर्म की सबसे बड़ी बाधा छिपी है। आज पांडवों की सेना कौरवों की सेना से छोटी है। वे कमजोर है। तुम निहसंदेह उनका साथ देने जाओगे। जैसे ही तुम अपना पहला बाण चलाओगे, कौरवों की सेना का एक बड़ा भाग
नष्ट हो जाएगा और उनका पलड़ा हल्का हो जाएगा। उस क्षण पांडव पक्ष विजय होने लगेगा और कौरव पक्ष हारने लगेगा। तब तुम्हारी प्रतिज्ञा तुम्हें विवश कर देगी। तुम्हें हारते हुए कौरवों का साथ देना पड़ेगा। तुम फिर अपना बाण पांडवों की सेना पर चलाओगे और उन्हें नष्ट कर दोगे। फिर पांडव हारने लगेंगे और कौरव जीतने लगेंगे। तुम्हें फिर से पक्ष बदलना होगा। इस तरह तुम एक पक्ष से दूसरे पक्ष की ओर घूमते रहोगे और अंत में इस युद्ध भूमि पर ना कोई कौरव बचेगा ना कोई पांडव। केवल तुम अकेले जीवित रह जाओगे। और तुम्हारी विजय का
उत्सव मनाने वाला कोई नहीं होगा। यह धर्म की स्थापना नहीं। यह तो धर्म का ही विनाश हो जाएगा। इस युद्ध का उद्देश्य अधर्म का नाश करके धर्म को स्थापित करना है ना कि समस्त क्षत्रिय वंश का संहार करना। यह सुनकर बरबरीक सन्न रह गया। उसने कभी इस दृष्टिकोण से अपने वचन को देखा ही नहीं था। उसकी आंखें खुल गई। उसे समझ आ गया कि उसकी शक्ति और उसका वचन दोनों मिलकर धर्म की स्थापना में सहयोगी नहीं बल्कि बाधक बन रहे हैं। उसकी आंखों में पश्चाताप के आंसू आ गए। वह बोला हे प्रभु मुझे क्षमा करें।
मैं तो अज्ञानतावश धर्म का ही नाश करने जा रहा था। आपने मेरी आंखें खोल दी। अब आप ही बताइए मैं क्या करूं? मैं अपने वचन से भी बंधा हूं और युद्ध में भाग लिए बिना भी नहीं रह सकता। तब श्री कृष्ण के स्वर में एक असीम गंभीरता आ गई। उन्होंने कहा हे वीर हर महायज्ञ से पहले हर बड़े अनुष्ठान से पहले भूमि की शुद्धि के लिए संकल्प की पूर्ति के लिए एक बलि की आवश्यकता होती है। यह महाभारत का युद्ध भी एक महायज्ञ है और इस धर्म यज्ञ को निर्विघ्न संपन्न कराने के लिए युद्ध भूमि
की पूजा हेतु इस युग के सर्वश्रेष्ठ क्षत्रिय के शीश की बलि चाहिए। बरबरीक का हृदय एक क्षण के लिए धड़कना भूल गया। वह समझ गया कि भगवान उससे क्या कहना चाहते हैं। श्री कृष्ण ने अपनी बात पूरी की और हे घटोत्कच पुत्र इस समय तुमसे बड़ा क्षत्रिय तुमसे बड़ा वीर और तुमसे बड़ा दानी इस पूरी पृथ्वी पर कोई दूसरा नहीं है। इसलिए हे बरबरीक मैं एक ब्राह्मण के रूप में आज तुमसे तुम्हारा शीश दान में मांगता हूं। यह शब्द नहीं थे। यह ब्रह्मांड का सबसे भारी सत्य था। जो बरबरीक के कानों में गूंज रहा था।
एक क्षण के लिए चारों ओर सन्नाटा छा गया। हवा रुक गई। पक्षियों ने चहचहाना बंद कर दिया। बरबरीक ने अपनी आंखों से बहते आंसुओं को पोंछा और उसके चेहरे पर भय या दुख का कोई चिन्ह नहीं था। बल्कि एक असीम शांति और गौरव का भाव था। वह मुस्कुराया और बोला हे प्रभु यह तो मेरा परम सौभाग्य है जिस ईश्वर के दर्शन मात्र से जीवन सफल हो जाता है। वो स्वयं एक याचक बनकर मेरे द्वार पर आए हैं। इससे बड़ा सम्मान एक क्षत्रिय के लिए और क्या हो सकता है कि उसका जीवन उसका शीश स्वयं धर्म
की स्थापना के लिए काम आए। प्रभु यह शीश आपका ही है। आप इसे जब चाहे [संगीत] ले सकते हैं। बरबरीक का यह उत्तर सुनकर श्री कृष्ण की आंखें भी नम हो गई। वे अपने भक्त की महानता पर गदगद हो गए। बरबरीक ने आगे कहा परंतु हे प्रभु शीश दान करने से पहले मेरी एक अंतिम इच्छा है। मैंने अपने जीवन में युद्ध कला सीखी है और मेरी प्रबल इच्छा है कि मैं इस महायुद्ध को अपनी आंखों से आरंभ से लेकर अंत तक देखूं। मैं देखना चाहता हूं कि धर्म कैसे जीतता है और अधर्म का पतन कैसे
होता है। श्री कृष्ण ने करुणा से भरकर कहा तथास्तु बरबरीक तुम्हारा शीश कटने के बाद भी जीवित रहेगा और तुम्हारी आंखें यह पूरा युद्ध देखेंगी। तुम्हारा यह बलिदान युगों युगों तक याद रखा जाएगा। दोस्तों एक क्षण के लिए रुकिए और उस महान आत्मा के बारे में सोचिए जो अपनी शक्ति के शिखर पर था। जो चाहता तो पूरी दुनिया को जीत सकता था। लेकिन उसने धर्म के लिए अपने भगवान के एक वचन पर अपना शीश तक दान कर दिया। अगर बरबरी के इस सर्वोच्च बलिदान ने आपके हृदय को भी छू लिया है तो इस वीडियो को
एक लाइक करके अपना सम्मान प्रकट करें और कमेंट में हारे के सहारे की जय जरूर लिखें। आपकी यह श्रद्धा हमें ऐसी ही दिव्य कहानियां आप तक लाने की प्रेरणा देती है। और हां कहानी अभी खत्म नहीं हुई है। असली रहस्य तो अब खुलने वाला है। इसलिए अंत तक बने रहिएगा। फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष की द्वादशी का वह दिन इतिहास में अमर होने वाला था। बरबरीक ने पास के सरोवर में स्नान किया, पूजा की और अपने इष्ट देव का ध्यान करके अपनी ही तलवार से एक ही झटके में अपना शीश धर से अलग करके भगवान
श्री कृष्ण के चरणों में अर्पित कर दिया। वो शीश जब धरती पर गिरा तो देवताओं ने आकाश से पुष्प वर्षा की। श्री कृष्ण ने उस दिव्य शीश को अपने हाथों में उठाया और उसे अमृत से सींच दिया ताकि वह चेतना में रहे। फिर भगवान ने उस शीश को ले जाकर कुरुक्षेत्र के युद्ध मैदान के पास एक सबसे ऊंची पहाड़ी की चोटी पर स्थापित कर दिया। एक ऐसी जगह जहां से संपूर्ण युद्ध भूमि किसी मंच की तरह दिखाई दे रही थी। बरबरी की आंखें अब भी खुली थी और उनमें वही तेज था। वो शीश अब एक
मूक साक्षी बन चुका था जो इतिहास की सबसे बड़ी गाथा को अपनी आंखों से देखने के लिए तैयार था। उस शीश ने देखा कि कैसे भीष्म पितामह शरशया पर लेटे। कैसे द्रोणाचार्य का वध हुआ। कैसे कर्ण ने अपने प्राण त्यागे और कैसे अंत में अधर्म का प्रतीक दुर्योधन अपनी जंघा टूटने पर पीड़ा से करा रहा था। उस शीश ने सब कुछ देखा लेकिन कहानी यही खत्म नहीं होती। यह तो बरबरी के बलिदान की गाथा थी। अब सुनिए वो रहस्य जिससे कलयुग काम गया। युद्ध समाप्त हो चुका था। पांडवों की विजय हुई थी। लेकिन उस विजय
की कीमत बहुत बड़ी थी। हर कोई अपनी-अपनी वीरता का बखान कर रहा था। तब श्री कृष्ण ने कहा, इस युद्ध का सच्चा साक्षी कौन है? यह निर्णय हम नहीं बल्कि वह महान आत्मा करेगी जिसने पूरा युद्ध अपनी आंखों से देखा है। सभी पांडव उस पहाड़ी पर गए जहां बरबरी का शीश स्थापित था। उन्होंने शीश को प्रणाम किया और पूछा हे वीर आप ही बताइए। इस युद्ध में विजय का श्रेय किसे जाता है? तब उस शीश से आवाज आई। हे पांडवों मुझे तो पूरे युद्ध में कोई लड़ता हुआ नहीं दिखा। मुझे तो केवल भगवान कृष्ण का
सुदर्शन चक्र ही चलता हुआ दिखाई दे रहा था। जो अधर्मियों का संहार कर रहा था और मां महाकाली का खप्पर रक्तपान कर रहा था। आप सब तो केवल निमित्त मात्र थे। यह सुनकर पांडवों का अहंकार चूरचूर हो गया। उन्हें समझ आ गया कि यह विजय उनकी नहीं बल्कि स्वयं नारायण की थी। इस उत्तर से प्रसन्न होकर भगवान श्री कृष्ण ने बरबरीक के उस शीश को प्रणाम किया और वह वरदान दिया जो इस कहानी का सार है। उन्होंने कहा हे बरबरीक तुमने जो त्याग किया है वह अकल्पनीय है। तुम्हारा यह बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा। द्वापर में
तुमने अपना शीश देकर धर्म की रक्षा की है। अब सुनो कलयुग में तुम मेरे ही नाम से पूजे जाओगे। जब घोर कलयुग आएगा जब पाप और अधर्म अपने चरम पर होगा। जब लोग निराश और हताश होकर हर जगह से हार जाएंगे। तब तुम हारे का सहारा बनकर उनकी सहायता करोगे। कलयुग में तुम मेरे श्याम नाम से विख्यात होगे। और तुम्हारा यह शीश जहां प्रकट होगा वो खाटू नामक धाम बनेगा। जो भी भक्त सच्चे मन से आंखों में आंसू लेकर तुम्हारे द्वार पर आएगा तुम उसकी हर मनोकामना पूरी करोगे। जैसे तुमने अपना शीश मुझे बिना किसी
प्रश्न के दान कर दिया। वैसे ही तुम अपने भक्तों पर अपनी कृपा बिना किसी शर्त के बरसाओगे। कलयुग में मेरी सारी शक्तियां तुम्हारे अंदर समाहित होंगी। और तुम कलयुग के जागृत देव कहलाओगे। यह था वह रहस्य, यह था वो वरदान द्वापर का सबसे बड़ा दानी। कलयुग का सबसे बड़ा सहारा बनने वाला था। लेकिन दोस्तों, क्या आप जानते हैं कि युद्ध के बाद भगवान कृष्ण ने बरबरी के उस शीश का क्या किया? वो शीश कलयुग में खाटू की धरती पर कैसे और कब प्रकट हुआ? और कैसे एक गाय उस रहस्य को उजागर करने का कारण बनी?
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का सबसे बड़ा वरदान दिया कि तुम मेरे ही श्याम नाम से पूजे जाओगे और हारे का सहारा कहलाओगे। यह सुनकर देवता भी चकित थे और स्वयं काल भी उस रहस्य को सुनकर कांप गया था कि द्वापर का एक वीर कलयुग का ईश्वर बनकर पूजित होगा। लेकिन अब प्रश्न यह उठता है कि उस दिव्य शीश का क्या हुआ? भगवान कृष्ण ने अपने भक्त की उस अंतिम निशानी को कहां स्थापित किया? और कैसे हजारों वर्षों के बाद वो शीश कलयुग में हम जैसे साधारण मनुष्यों के बीच प्रकट हुआ। आइए आज इस कथा को उसकी पूर्णता तक पहुंचाते
हैं और जानते हैं उस रहस्य को जो आज भी राजस्थान की धरती पर एक जागृत सत्य के रूप में विद्यमान है। महाभारत का महायुद्ध समाप्त हो गया था। धर्म की स्थापना हो चुकी थी। लेकिन उसकी कीमत चुकाते-चुकाते हस्तिनापुर की भूमि विधवा हो गई थी। जब युद्ध के सारे क्रियाकर्म संपन्न हो गए और पांडव हस्तिनापुर के राजकाज में व्यस्त हो गए तब एक रात्रि भगवान श्री कृष्ण अकेले उस पहाड़ी पर गए जहां उन्होंने बरबरी का शीश स्थापित किया था। उन्होंने उस दिव्य शीश को अत्यंत नेह से अपने हाथों में उठाया। उस शीश की आंखों में अब
भी वही तेज, वही भक्ति और वही संतोष का भाव था। श्री कृष्ण ने कहा हे मेरे प्रिय भक्त तुमने अपना वचन निभाया तुमने धर्म की स्थापना में सबसे बड़ा योगदान दिया। अब मेरे वरदान के फलीभूत होने का समय आ रहा है। द्वापर युग अपनी समाप्ति की ओर है और शीघ्र ही घोर कलयुग का अंधकार इस धरती को निगलने का प्रयास करेगा। उस अंधकार में जब मेरे भक्त दिशाहीन हो जाएंगे। जब उन्हें कोई मार्ग नहीं सूझेगा तब उन्हें तुम्हारे प्रकाश की आवश्यकता होगी। भगवान ने उस शीश को अपने हृदय से लगाया और कहा परंतु उस समय
के आने में अभी विलंब है। अभी तुम्हें योग निद्रा में विश्राम करना होगा। तुम्हें उस समय तक प्रतीक्षा करनी होगी। जब तक धरती तुम्हें स्वयं पुकार ना ले। यह कहकर भगवान श्री कृष्ण उस शीश को लेकर पास में बहने वाली एक पवित्र नदी के तट पर पहुंचे जिसका नाम था रूपवती नदी। चांदनी रात में नदी का जल चांदी की तरह चमक रहा था। भगवान ने अपने पीतांबर से उस शीश को पछा और उसे प्रणाम करते हुए धीरे-धीरे नदी की बहती धारा में प्रवाहित कर दिया। वो शीश किसी साधारण पत्थर की तरह डूबा नहीं बल्कि एक
दिव्य प्रकाश के साथ जल में समाहित हो गया और नदी की लहरों ने उसे ऐसे स्वीकार किया जैसे कोई मां अपने पुत्र को अपनी गोद में ले रही हो। भगवान ने नदी को आदेश दिया कि वह इस दिव्य धरोहर की रक्षा करें। जब तक कि कलयुग में इसके पुनः प्रकट होने का सही समय ना आ जाए। और इस तरह वीर बरबरी का शीश द्वापर युग के अंतिम पलों में भविष्य के एक महान उद्देश्य के लिए जल में समाधस्त हो गया। समय का चक्र घूमता रहा। द्वापर युग समाप्त हुआ। भगवान श्री कृष्ण ने अपनी लीला समाप्त
की और अपने धाम को लौट गए। धरती पर कलयुग का आगमन हुआ। जैसा कि शास्त्रों में वर्णित था। कलयुग अपने साथ अधर्म, असत्य, लोभ और निराशा का अंधकार लेकर आया। धर्म का क्षय होने लगा। मनुष्य की आयु और पुण्य घटने लगे। लोग केवल अपनी इंद्रियों की तृप्ति में लग गए। चारों ओर हताशा और पीड़ा का साम्राज्य था। हजारों वर्ष बीत गए। रूपवती नदी भी समय के साथ अपना मार्ग बदलती हुई धरती के गर्भ में कहीं विलीन हो गई और अब उसे गर्भवती नदी के नाम से जाना जाने लगा। लोग बरबरी की कहानी भूल गए। उसके
बलिदान को भूल गए और भगवान कृष्ण के उस वरदान को भी भूल गए। धरती पर पाप का भार इतना बढ़ गया था कि अब भक्तों को सचमुच एक सहारे की आवश्यकता थी। एक ऐसे सहारे की जो हर हारे हुए का हाथ थाम सके और अब भगवान कृष्ण के उस वरदान के सत्य होने का समय आ चुका था। कलयुग के मध्य में राजस्थान की वीरभूमि पर एक छोटा सा गांव था खाटू। यह एक शांत और साधारण सा गांव था। इसी गांव में एक गाय थी। जो एक ग्वाले की थी। वो गाय प्रतिदिन चरने के लिए अन्य
गायों के साथ जाती थी। लेकिन शाम को जब वह लौटती तो उसके थनों में दूध नहीं होता था। ग्वाला कई दिनों तक यह देखकर परेशान रहा। उसे लगा कि कोई रास्ते में उसकी गाय का दूध धो लेता है। एक दिन उसने निश्चय किया कि वह सच्चाई का पता लगाकर रहेगा। वो छिपकर अपनी गाय के पीछेछे गया। उसने देखा कि उसकी गाय अन्य सभी गायों से अलग होकर एक विशेष स्थान पर एक छोटे से टीले पर जाकर खड़ी हो गई। ग्वाला आश्चर्यचकित रह गया जब उसने देखा कि उस गाय के थनों से दूध की धारा स्वतः
ही बहने लगी और उस टीले की भूमि में समाने लगी। यह कोई सामान्य घटना नहीं थी। यह एक चमत्कार था। ग्वाले ने दौड़कर यह बात गांव के मुखिया और अन्य लोगों को बताई। गांव वाले उस स्थान पर पहुंचे और यह चमत्कार देखकर वे भी दंग रह गए। यह बात धीरे-धीरे पूरे क्षेत्र में फैल गई और उस समय के खाटू के राजा राजा रूप सिंह चौहान के कानों तक भी पहुंची। राजा रूप सिंह एक धर्म प्रायण और न्यायप्रिय शासक थे। उन्हें जब इस चमत्कार का पता चला तो उनके मन में यह जानने की तीव्र इच्छा हुई
कि उस भूमि के नीचे ऐसा क्या रहस्य छिपा है जिसके लिए एक गाय भी अपनी ममता लुटा रही है। उस रात जब राजा रूप सिंह अपनी शैया पर इन्हीं विचारों में खोए हुए थे तो उन्हें एक स्वप्न आया। स्वप्न में एक दिव्य प्रकाश के बीच स्वयं भगवान श्री कृष्ण प्रकट हुए। उन्होंने राजा से कहा हे राजन जिस स्थान पर गाय का दूध स्वतः बह रहा है वह कोई साधारण भूमि [संगीत] नहीं है। उस भूमि के नीचे मेरे परम भक्त वीर बरबरीक का शीश दबा हुआ है। जिसे मैंने द्वापर युग में कलयुग के कल्याण के लिए
यहां सुरक्षित किया था। अब समय आ गया है कि तुम उस शीश को बाहर निकालकर उसे स्थापित करो और उसकी पूजा का विधान आरंभ करो। यह शीश कलयुग में मेरे श्याम स्वरूप में पूजा जाएगा और यह स्थान खाटू श्याम जी के नाम से एक महान तीर्थ बनेगा। जाओ उस भूमि का खनन करवाओ। मेरे भक्त को उसका सम्मान दो। यह कहकर भगवान अंतर्धान हो गए। राजा की नींद टूट गई। उनका शरीर कांप रहा था और आंखों में आश्चर्य और भक्ति के आंसू थे। उन्हें विश्वास हो गया था कि यह कोई साधारण स्वप्न नहीं बल्कि स्वयं प्रभु
का आदेश है। अगली सुबह राजा रूप सिंह अपने मंत्रियों, सैनिकों और गांव वालों के साथ उस चमत्कारी टीले पर पहुंचे। उन्होंने उस भूमि को प्रणाम किया और श्रमिकों को पूरी श्रद्धा और सावधानी के साथ उस स्थान पर खुदाई करने का आदेश दिया। पूरा गांव सांस रोके उस दृश्य को देख रहा था। जैसे-जैसे खुदाई गहरी होती गई, लोगों की उत्सुकता बढ़ती गई और फिर वो क्षण आया, फावड़ा एक कठोर चीज से टकराया। श्रमिकों ने सावधानी से मिट्टी हटाई और जो दृश्य सामने आया उसे देखकर सबकी आंखें भक्ति और आश्चर्य से चौंधिया गई। भूमि के गर्भ से
पत्थर का बना एक आध। भूत अलौकिक शीश प्रकट हुआ। वो शीश काले पत्थर का था। लेकिन उसके मुख पर एक दिव्य आभा थी। आंखें एक जीवंत लग रही थी और मुख पर एक शांत करुणामय मुस्कान थी। जिस दिन यह शीश प्रकट हुआ वो देवोठनी एकादशी का पवित्र दिन था। राजा और प्रजा समझ गए कि यह स्वयं भगवान श्याम का ही स्वरूप है। उन्होंने उस शीश को बड़े ही आदर और सत्कार के साथ बाहर निकाला और पूरे विधिविधान के साथ एक भव्य शोभा यात्रा निकालते हुए उसे अपने महल में ले गए। राजा ने उसी स्थान पर
जहां शीश प्रकट हुआ था। एक भव्य मंदिर का निर्माण आरंभ करवाया। सन 1027 ईसवी में राजा रूप सिंह चौहान और उनकी पत्नी नर्मदा कवर द्वारा उस मंदिर की नींव रखी गई और उसमें उस दिव्य शीश को स्थापित किया गया। दोस्तों, यह वही मंदिर है जिसे आज हम और आप श्री खाटूश्याम जी के मंदिर के नाम से जानते हैं। लेकिन कहानी का एक और रहस्य बाकी है। जब शीश की स्थापना हो गई तो प्रश्न उठा कि शीश की पूजा तो होगी पर धर का क्या? तब यह रहस्य खुला कि बरबरीक का धड़ राजस्थान के ही रिंगस
नामक स्थान के पास गिरा था और आज भी रिंगस में बाबा श्याम के धड़ की पूजा होती है। इसीलिए खाटू जाने वाले बहुत से भक्त पहले रिंगस में शीश नववाते हैं। अब इस कहानी का अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण भाग जो सीधे आपसे और मुझसे जुड़ा है। भगवान कृष्ण का वह वरदान तुम हारे का सहारा बनोगे। यह केवल एक वाक्य नहीं। यह कलयुग के हर दुखी, हर निराश हर पराजित व्यक्ति के लिए एक संजीवनी है। जब बरबरीक ने अपना शीश दान किया तो वह उस समय के सबसे बड़े दानी बने और जब उन्होंने कलयुग में भक्तों
का सहारा बनने का वरदान पाया तो वे सबसे बड़े ईश्वर बन गए। हारे का सहारा का अर्थ केवल युद्ध में हारना नहीं है। इसका अर्थ है जीवन की लड़ाई में हार जाना। जब कोई व्यापारी अपने व्यापार में सब कुछ गवा कर हार जाता है। जब कोई विद्यार्थी परीक्षा में असफल होकर हार जाता है। जब कोई रोगी अपनी बीमारी से लड़ते-लड़ते हार जाता है। जब कोई इंसान रिश्तों की उलझनों में टूट कर हार जाता है। जब किसी को चारों ओर अंधकार ही अंधकार दिखे और आशा की एक किरण भी ना मिले तब उस हारे हुए इंसान
का हाथ थामने के लिए जो शक्ति प्रकट होती है उसी का नाम है श्याम आज भी लाखों लोग अपनीपनी पीड़ा अपनीपनी झोली लेकर खाटू की उस पावन धरती पर जाते हैं। वे बाबा से कुछ मांगने नहीं बल्कि यह बताने जाते हैं कि बाबा मैं हार गया हूं। अब यह जीवन की गाड़ी आप ही चलाओ। और इतिहास साक्षी है। श्याम बाबा का दरबार साक्षी है कि जो भी उस चौखट पर सच्चे मन और विश्वास के साथ गया। वो कभी खाली हाथ नहीं लौटा। बरबरीक के वे तीन बाण आज भी उनके प्रतीक चिन्ह हैं। वे हमें याद
दिलाते हैं कि उनकी शक्ति आज भी उतनी ही है। पहला बाण उन दुष्टों का नाश करता है जो उनके भक्तों को सताते हैं। दूसरा बाण उनके भक्तों की रक्षा करता है और तीसरा बाण जो उन्होंने कभी चलाया नहीं वह शायद उन्होंने हम सबके लिए बचा कर रखा है कि जब भी कोई भक्त उन्हें पुकारेगा तो वे उसकी रक्षा के लिए स्वयं प्रकट हो जाएंगे। तो मित्रों यह थी कहानी एक वीर योद्धा बरबरी की जो अपने एक वचन और एक बलिदान से कलयुग के ईश वर खाटू नरेश शीश के दानी लखदातार और हम सबके प्यारे हारे
के सहारे बाबा श्याम बन गए। उनकी कहानी हमें सिखाती है कि धर्म के लिए किया गया त्याग कभी व्यर्थ नहीं जाता। यह हमें सिखाती है कि यदि विश्वास सच्चा हो तो पत्थर में भी प्राण आ जाते हैं। और सबसे बढ़कर यह हमें सिखाती है कि चाहे जीवन में कितना भी अंधकार क्यों ना हो हार मत मानो। क्योंकि खाटू में बैठा एक शीश का दानी हर हारे हुए का सहारा बनने के लिए तैयार है। अगर इस दिव्य कथा ने आपके हृदय को छुआ है तो इस कहानी को अपने प्रियजनों के साथ साझा अवश्य करें ताकि बाबा
श्याम का यह संदेश हर उस व्यक्ति तक पहुंचे जिसे आज एक सहारे की आवश्यकता है। कमेंट बॉक्स में प्रेम से लिखिए जय श्री श्याम और अपने जीवन की बागडोर उस हारे के सहारे को सौंप दीजिए। विश्वास मानिए वो आपको कभी हारने नहीं देगा। बोलो हारे के सहारे की जय। शीश के दानी की जय। श्री खाटू नरेश की जय।