सोचो अगर मैं तुमसे कहूं कि तुम्हारी जिंदगी की सबसे बड़ी लड़ाई बाहर की दुनिया से नहीं बल्कि तुम्हारे अपने दिमाग से है। तो क्या तुम मानोगे? हर सुबह जब तुम अलार्म बंद करके बस 5 मिनट और कहते हो। हर बार जब तुम अपने गोल्स को टालते हो। हर बार जब तुम जानते हुए भी गलत डिसीजन लेते हो। उसी पल तुम्हारी हार शुरू हो जाती है। और सच तो यह है कि ज्यादातर लोग जिंदगी में इसलिए नहीं हारते क्योंकि उनके पास टैलेंट नहीं होता बल्कि इसलिए हारते हैं क्योंकि उनके पास कंट्रोल नहीं होता। अपने थॉट्स पर
कंट्रोल, अपने इमोशंस पर कंट्रोल और अपने एकशंस पर कंट्रोल। और यही है असली गेम, मेंटल डिसिप्लिन का गेम। क्योंकि जिस दिन तुमने अपने माइंड को कंट्रोल करना सीख लिया, उस दिन से दुनिया तुम्हें कंट्रोल नहीं कर पाएगी। लेकिन सवाल यह है क्या तुम अपने दिमाग के मालिक हो या अभी भी उसके गुलाम हो? इस वीडियो में तुम जानोगे कि आखिर क्यों लोग डिसिप्लिन बनाए रखने में बार-बार फेल हो जाते हैं। कैसे तुम्हारा ब्रेन तुम्हें धोखा देता है और वो कौन से पावरफुल टेक्निक्स हैं जिनसे तुम अपने माइंड को रिप्रोग्राम करके एक अनस्टोपेबल इंसान बन सकते
हो। तुम सीखोगे कि कैसे बैड हैबिट्स को तोड़कर स्ट्रांग हैबिट्स बनाई जाती हैं। कैसे प्रोक्रेस्टिनेशन को हमेशा के लिए खत्म किया जाता है। और कैसे रोज के छोटे-छोटे एकशंस तुम्हें एक ऐसी लाइफ दे सकते हैं जहां डिसिप्लिन तुम्हारी आइडेंटिटी बन जाए। यह वीडियो सिर्फ नॉलेज नहीं है। यह एक ट्रांसफॉर्मेशन की शुरुआत है। लेकिन यह तभी पॉसिबल है जब तुम इसे अंत तक देखो क्योंकि हर अगला पार्ट तुम्हें पहले से ज्यादा पावरफुल बनाता जाएगा। इसलिए वीडियो को पूरा जरूर देखना। अगर तुम सच में अपनी लाइफ को नेक्स्ट लेवल पर ले जाना चाहते हो तो अभी इस
वीडियो को लाइक करो। कमेंट में लिखो आई विल कंट्रोल माय माइंड। ताकि तुम खुद से एक कमिटमेंट कर सको। और अगर तुम ऐसे ही पावरफुल बुक समरीज और लाइफ चेंजिंग कंटेंट चाहते हो तो बुक पीडिया चैनल को अभी सब्सक्राइब कर लो क्योंकि यहां हर वीडियो तुम्हें वह सिखाएगा जो स्कूल कभी नहीं सिखाता। अब तैयार हो जाओ क्योंकि आगे जो आने वाला है वो तुम्हारी सोच को हमेशा के लिए बदल देगा। चैप्टर वन अंडरस्टैंडिंग द पावर ऑफ मेंटल डिसिप्लिन। एक सवाल अगर तुम्हें अपनी जिंदगी बदलने का एक ही रास्ता दिया जाए सिर्फ एक स्किल जिसे मास्टर
करके तुम अपने हर गोल को अचीव कर सको तो वो क्या होगा? पैसा टैलेंट लक नहीं। असली जवाब है मेंटल डिसिप्लिन। क्योंकि यह वो ताकत है जो तुम्हें तब भी आगे बढ़ाती है जब तुम्हारा मन बिल्कुल नहीं करता। यह वो शक्ति है जो तुम्हें डिस्ट्रैक्शंस के शोर में भी फोकस्ड रखती है और यही वो इनविज़िबल फोर्स है जो ऑर्डिनरी लोगों को एक्स्ट्राऑर्डिनरी बना देती है। लेकिन यहां एक कड़वी सच्चाई छुपी है। ज्यादातर लोग डिसिप्लिन को समझते ही नहीं। वह सोचते हैं डिसिप्लिन का मतलब है खुद को फोर्स करना, पेन सहना या लाइफ को बोरिंग बना
लेना। लेकिन असल में डिसिप्लिन पनिशमेंट नहीं है। यह फ्रीडम का रास्ता है। तुमने शायद नोटिस किया होगा। जब तुम कुछ नया शुरू करते हो जैसे जिम जाना, पढ़ाई करना या कोई स्किल सीखना। शुरुआत में तुम बहुत मोटिवेटेड होते हो। लेकिन कुछ ही दिनों बाद वो एक्साइटमेंट गायब हो जाती है और तुम वापस अपने पुराने पैटर्न्स में लौट जाते हो। क्यों? क्योंकि तुम मोटिवेशन पर डिपेंड करते हो। और मोटिवेशन हमेशा टेंपरेरी होता है। यह आता है और चला जाता है। लेकिन डिसिप्लिन डिसिप्लिन वो सिस्टम है जो तुम्हें एक्शन लेने पर मजबूर करता है। चाहे तुम्हारा मूड
कैसा भी हो। और यही वो डिफरेंस है जो विनर्स और बाकी लोगों के बीच खड़ा होता है। अब इमेजिन करो तुम्हारा दिमाग एक बैटल फील्ड है। एक तरफ तुम्हारे गोल्स हैं। सक्सेस, फिटनेस, पैसा, रिस्पेक्ट और दूसरी तरफ तुम्हारी डिजायर्स हैं। कंफर्ट, लेजीने, डिस्ट्रैक्शंस, इंस्टेंट प्लेजर। और हर दिन हर मिनट तुम्हारे अंदर यह बैटल चलती रहती है। जब तुम Netflix को चूज़ करते हो। इंस्टेड ऑफ [संगीत] वर्किंग। जब तुम फोन स्क्रोल करते रहते हो। इंस्टेड ऑफ फोकसिंग। उस मोमेंट तुम अपनी ही डिजायर्स के आगे सरेंडर कर देते हो और धीरे-धीरे यह छोटी-छोटी हारें तुम्हारी आइडेंटिटी बना
देती हैं। तुम खुद को कन्विंस करने लगते हो कि मैं डिसिप्लिंड इंसान नहीं हूं। लेकिन सच यह है कि डिसिप्लिन कोई इनबॉर्न टैलेंट नहीं है। यह एक स्किल है जिसे ट्रेन किया जा सकता है। और यहां एक पावरफुल फैक्ट है। तुम्हारा ब्रेन हमेशा उस रास्ते को चुनेगा जो आसान हो क्योंकि उसका काम है एनर्जी बचाना। इसीलिए जब भी तुम्हें कोई मुश्किल काम करना होता है, तुम्हारा माइंड तुम्हें एक्सक्यूज देता है। कल से शुरू करूंगा। अभी मूड नहीं है। थोड़ा रेस्ट कर लेता हूं। यह सब ट्रिक्स हैं। तुम्हारा ब्रेन तुम्हें कंफर्ट ज़ोन में रखने की कोशिश
करता है। और अगर तुमने इन ट्रिक्स को पहचानना नहीं सीखा, तो तुम हमेशा उसी जगह फंसे रहोगे, जहां अभी हो। लेकिन एक ट्विस्ट है। जिस तरह तुम्हारा ब्रेन तुम्हें रोकता है, उसी तरह तुम उसे ट्रेन भी कर सकते हो। हर बार जब तुम डिसकंफर्ट चूज़ करते हो इंस्टेड ऑफ कंफर्ट। हर बार जब तुम एक्शन लेते हो डिस्पाइट फियर या लेजीनेस। तुम अपने ब्रेन को रिवायर कर रहे होते हो। तुम उसे सिखा रहे होते हो कि मैं कंट्रोल में हूं। और धीरे-धीरे डिसिप्लिन तुम्हारी हैबिट बन जाती है। फिर तुम्हें पुश करने की जरूरत नहीं पड़ती। तुम
खुद ही वह इंसान बन जाते हो जो एक्शन लेता है। सोचो अगर तुम हर दिन सिर्फ ये% बेटर बन जाओ सिर्फ एक छोटा डिसिप्लिंड एक्शन ले लो तो एक साल बाद तुम कहां होगे? और अगर तुम ऐसे ही एक्सक्यूसेस देते रहे प्रोक्रेस्टिनेट करते रहे तो एक साल बाद भी तुम वहीं खड़े होगे। सेम प्लेस, सेम स्ट्रगल्स, सेम रिग्रेट्स। और यही वह मोमेंट है जहां तुम्हें डिसीजन लेना है। क्या तुम अपने माइंड के स्लेव बने रहोगे या उसके मास्टर बनोगे? क्योंकि सच यह है दुनिया तुम्हें नहीं रोक रही। तुम्हारा माइंडसेट तुम्हें रोक रहा है। और जब
तक तुम अपने माइंड को कंट्रोल करना नहीं सीखोगे तब तक कोई भी स्ट्रेटजी, कोई भी नॉलेज तुम्हारे काम नहीं आएगा। इसलिए यह सिर्फ एक शुरुआत है। अभी तुमने सिर्फ समझा है कि डिसिप्लिन क्या है? लेकिन आगे आगे तुम जानोगे कि आखिर क्यों ज्यादातर लोग डिसिप्लिन बनाए रखने में फेल हो जाते हैं और वो हिडन रीज़ंस क्या हैं जो तुम्हें बार-बार पीछे खींच लेते हैं और यकीन मानो जब वो सच सामने आएगा तुम खुद को एक अलग नजर से देखने लगोगे। चैप्टर टू व्हाई मोस्ट पीपल फेल टू स्टे डिसिप्लिंड? तुमने कभी नोटिस किया है कि तुम
जानते हो क्या करना है। फिर भी करते नहीं हो। किताबें पढ़ ली, वीडियोस देख लिए, स्ट्रेटजीस समझ ली। लेकिन जब एक्शन लेने की बारी आती है, तुम रुक जाते हो। जैसे कोई इनविज़िबल फोर्स तुम्हें पीछे खींच लेती है। और सबसे खतरनाक बात यह है। धीरे-धीरे तुम खुद पर शक करने लगते हो। तुम सोचने लगते हो कि शायद तुम में ही कुछ कमी है। शायद डिसिप्लिन तुम्हारे बस की बात नहीं है। लेकिन सच्चाई इससे बिल्कुल अलग है। प्रॉब्लम तुम नहीं हो। प्रॉब्लम वो सिस्टम है जिससे तुम अपने माइंड को चला रहे हो। असल में ज्यादातर लोग
डिसिप्लिन इसलिए नहीं बना पाते क्योंकि वह एक बहुत बड़ी गलती करते हैं। वो मोटिवेशन को डिसिप्लिन समझ लेते हैं। जब तक मूड अच्छा है, एनर्जी हाई है, सब कुछ इजी लगता है। लेकिन जैसे ही मुश्किल आती है, जैसे ही डिसकंफर्ट आता है, सब कुछ टूट जाता है। क्योंकि मोटिवेशन इमोशंस पर चलता है और इमोशंस कभी स्टेबल नहीं होते। आज तुम इंस्पायर्ड हो, कल तुम टायर्ड हो। और अगर तुम्हारा सिस्टम इमोशंस पर बेस्ड है तो तुम्हारी कंसिस्टेंसी कभी स्टेबल नहीं रह सकती। और यहीं से शुरू होती है असली प्रॉब्लम। तुम्हारा ब्रेन तुम्हें शॉर्ट टर्म प्लेजर के
लिए प्रोग्राम करता है। जब तुम सोशल मीडिया स्क्रॉल करते हो, जंक फूड खाते हो या काम टालते हो, तुम्हें तुरंत डोपामिन मिलता है। एक इंस्टेंट रिवॉर्ड और तुम्हारा ब्रेन इस पैटर्न को याद कर लेता है। फिर हर बार जब तुम्हें कोई मुश्किल काम करना होता है, जैसे पढ़ाई, वर्कआउट या कोई इंपॉर्टेंट टास्क। तुम्हारा माइंड ऑटोमेटिकली उस डिसकंफर्ट से बचने की कोशिश करता है और तुम्हें इजी रास्ते की तरफ धकेल देता है। यही रीजन है कि तुम जानते हुए भी गलत चॉइससेस करते हो। लेकिन यहां एक और हिडन एनिमी है जिसका नाम है ऑल और नथिंग
थिंकिंग। तुम सोचते हो कि अगर मैं परफेक्ट नहीं कर सकता तो करने का कोई मतलब नहीं। अगर आज पूरा वर्कआउट नहीं कर सकता तो छोड़ देता हूं। अगर 2 घंटे पढ़ाई नहीं कर सकता तो आज स्किप कर देता हूं। और इसी सोच की वजह से तुम छोटे-छोटे एक्शंस की पावर को इग्नोर कर देते हो। जबकि असली डिसिप्लिन परफेक्शन में नहीं कंसिस्टेंसी में होता है। और अब सबसे बड़ा ट्रुथ जिसे बहुत कम लोग समझते हैं। डिसिप्लिन फेल इसलिए नहीं होता क्योंकि तुम वीक हो। डिसिप्लिन फेल होता है क्योंकि तुम एनवायरमेंट को कंट्रोल नहीं करते। अगर तुम्हारे
आसपास डिस्ट्रैक्शंस हैं, अगर तुम्हारा फोन हर 5 मिनट में नोटिफिकेशन दे रहा है। अगर तुम्हारे आसपास ऐसे लोग हैं जो खुद डिसिप्लिंड [संगीत] नहीं है, तो तुम चाहे जितनी कोशिश कर लो, तुम बार-बार फेल होगे। क्योंकि विल पावर लिमिटेड होती है। लेकिन एनवायरमेंट इनफिनिट इन्फ्लुएंस डालता है। सोचो। अगर तुम्हारे सामने हमेशा जंक फूड रखा हो तो हेल्थी खाना कितना मुश्किल हो जाता है और अगर तुम्हारा फोन हमेशा तुम्हारे पास हो तो फोकस करना कितना टफ हो जाता है। इसलिए सक्सेसफुल लोग सिर्फ अपने माइंड को कंट्रोल नहीं करते। वो अपने एनवायरमेंट को डिजाइन करते हैं। वो
डिस्ट्रैक्शंस को हटाते हैं, सिस्टम्स बनाते हैं ताकि उन्हें बार-बार विल पावर यूज ही ना करनी पड़े। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती क्योंकि एक और साइलेंट किलर है। आइडेंटिटी। अगर तुम अंदर से खुद को डिसिप्लिंड इंसान नहीं मानते, अगर तुम्हारी सेल्फ इमेज वीक है, तो तुम कितनी भी टेक्निक्स यूज कर लो, तुम वापस उसी वर्जन में लौट जाओगे। क्योंकि तुम्हारा बिहेवियर हमेशा तुम्हारी आइडेंटिटी के हिसाब से चलता है। अगर तुम सोचते हो मैं लेजी हूं। तो तुम्हारे एकशंस भी वैसे ही होंगे। लेकिन अगर तुम अपनी आइडेंटिटी बदल दो, अगर तुम खुद से कहो मैं डिसिप्लिंड
इंसान हूं। तो धीरे-धीरे तुम्हारे एक्शंस भी बदलने लगेंगे। अब एक पल के लिए सोचो क्या तुम सच में डिसिप्लिन नहीं बना पा रहे हो या तुम बस गलत तरीके से कोशिश कर रहे हो? क्या तुम अपने माइंड के खिलाफ लड़ रहे हो? या उसे समझकर उसे अपने फेवर में यूज कर रहे हो। क्योंकि जब तक तुम इन हिडन रीज़ंस को नहीं समझोगे तब तक तुम बार-बार वही मिस्टेक्स रिपीट करते रहोगे। लेकिन रुकना मत। क्योंकि अब जो आने वाला है वह इस पूरी गेम को बदल देगा। आगे तुम जानोगे कि आखिर कैसे अपने माइंड और इमोशंस
को कंट्रोल किया जाता है। कैसे उस इनर वॉइस को साइलेंस किया जाता है जो तुम्हें हर बार रोकती है और कैसे तुम अपने थॉट्स के मास्टर बन सकते हो? क्योंकि असली कंट्रोल वहीं से शुरू होता है। चैप्टर थ्री हाउ टू कंट्रोल योर माइंड एंड इमोशंस। कल्पना करो। रात के 2:00 बजे हैं। पूरा शहर सो रहा है। लेकिन तुम्हारा दिमाग नहीं। थॉट्स की आवाज इतनी तेज है कि साइलेंस भी शोर लगने लगता है। एक तरफ डाउट्स हैं, दूसरी तरफ फियर्स और बीच में तुम खड़े हो। कंफ्यूज्ड, स्टक, पावरलेस। कभी फ्यूचर की चिंता, कभी पास्ट का रिग्रेट।
और तुम बार-बार खुद से पूछते हो मैं अपने माइंड को कंट्रोल क्यों नहीं कर पा रहा? सच कहूं तो यही वो जगह है जहां ज्यादातर लोग हार मान लेते हैं। क्योंकि उन्हें लगता है कि उनके थॉट्स ही उनकी रियलिटी है। लेकिन यहीं पर एक हिडन ट्रुथ छुपा है। तुम अपने थॉट्स नहीं हो। तुम वो हो जो उन थॉट्स को ऑब्जर्व करता है। यही रियलाइजेशन गेम बदल देता है। क्योंकि जब तक तुम हर थॉट को सच मानते रहोगे तुम उसके कंट्रोल में रहोगे। लेकिन जिस दिन तुमने अपने थॉट्स को डिस्टेंस से देखना शुरू कर दिया। उसी
दिन से कंट्रोल तुम्हारे हाथ में आना शुरू हो जाएगा। तुम्हारा माइंड एक मशीन की तरह है जो हर सेकंड हजारों थॉट्स जनरेट करता है। जिनमें से ज्यादातर रैंडम होते हैं, यूजलेस होते हैं और कई बार नेगेटिव भी होते हैं। लेकिन प्रॉब्लम तब शुरू होती है जब तुम हर थॉट कोेंस देने लगते हो। हर इमोशन के पीछे भागने लगते हो। अब इमेजिन करो। तुम्हारा माइंड एक रेडियो स्टेशन है जिसमें अलग-अलग फ्रीक्वेंसीज चल रही हैं। कभी फियर, कभी एंगर, कभी लेजीनेस। और तुम अननोइंगली हर चैनल को सुनने लगते हो। लेकिन क्या होगा अगर तुम खुद डिसाइड करो
कि कौन सा चैनल सुनना है। यही है इमोशनल कंट्रोल। रिएक्शन नहीं, रिस्पांस चूज़ करना। क्योंकि इमोशंस खुद में प्रॉब्लम नहीं है। प्रॉब्लम है तुम्हारा रिएक्शन। जब तुम एंगर में इंपल्सिव डिसीजन लेते हो। जब तुम फियर की वजह से एक्शन अवॉइड करते हो तब तुम अपने इमोशंस के स्लेव बन जाते हो। लेकिन कंट्रोल का मतलब यह नहीं कि तुम इमोशंस को दबाओ। कंट्रोल का मतलब है उन्हें समझो, ऑब्जर्व करो और कॉन्शियसली डिसाइड करो कि तुम्हें क्या करना है। और इसके लिए सबसे पावरफुल टूल है अवेयरनेस। जब भी कोई स्ट्रांग इमोशन आए तुरंत रिएक्ट मत करो। बस
एक सेकंड रुक जाओ। खुद से पूछो मैं अभी क्या फील कर रहा हूं और क्यों? यह छोटा सा पॉज तुम्हें ऑटोमेटिक रिएक्शन से बाहर निकालता है और तुम्हें कॉन्शियस कंट्रोल देता है। यहां एक और डीप फैक्ट है। तुम्हारा ब्रेन हमेशा फमिलियर पैटर्न्स को रिपीट करता है। इसलिए अगर तुम बार-बार स्ट्रेस में पैनिकिक करते हो या लेजीनेस में काम टालते हो तो यह तुम्हारी हैबिट बन जाती है। लेकिन अच्छी बात यह है जिस तरह यह पैटर्न्स बने हैं उसी तरह यह बदले भी जा सकते हैं। हर बार जब तुम अपनी पुरानी हैबिट के खिलाफ जाते हो,
जैसे फियर के बावजूद एक्शन लेते हो या लेजीनेस के बावजूद काम शुरू करते हो। तुम अपने ब्रेन को नया सिग्नल दे रहे होते हो। तुम उसे रिवायर कर रहे होते हो। और यही वह मोमेंट होता है जहां रियल ग्रोथ शुरू होती है। क्योंकि ग्रोथ कंफर्ट जोन के बाहर होती है और तुम्हारा माइंड हमेशा तुम्हें कंफर्ट में रखना चाहता है। वो तुम्हें कन्विंस करेगा कि अभी सही टाइम नहीं है। थोड़ा और सोच लेते हैं कल से शुरू करेंगे। लेकिन यह सब इल्लुजंस हैं, डिस्ट्रैक्शंस हैं जो तुम्हें एक्शन लेने से रोकते हैं। अब एक सवाल जब अगली
बार तुम्हारा माइंड तुम्हें रोकेगा, तुम क्या करोगे? क्या तुम फिर से उसकी बात मान लोगे या इस बार तुम खुद को प्रूफ करोगे कि कंट्रोल तुम्हारे हाथ में है क्योंकि सच यह है डिसिप्लिन एकशंस से नहीं डिसीजंस से शुरू होता है और डिसीजन हमेशा तुम्हारे कंट्रोल में होता है। धीरे-धीरे जब तुम अपने थॉट्स और इमोशंस को समझने लगोगे, ऑब्जर्व करने लगोगे तो तुम नोटिस करोगे कि तुम्हारा माइंड तुम्हारा एनिमी नहीं तुम्हारा टूल बन गया है। और तब तुम्हें पुश करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। तुम नेचुरली फोकस्ड, काम और पावरफुल महसूस करोगे। लेकिन अभी जर्नी खत्म
नहीं हुई। क्योंकि आगे जो आने वाला है वो इस कंट्रोल को और भी गहरा बना देगा। तुम जानोगे कि आखिर विल पावर और सेल्फ कंट्रोल के पीछे की असली सच्चाई क्या है? क्यों कभी-कभी तुम्हारा विल पावर अचानक खत्म हो जाता है और कैसे तुम उसे अनलिमिटेड बना सकते हो? और यकीन मानो यह समझते ही तुम्हारी पूरी स्ट्रेटजी बदल जाएगी। चैप्टर फोर द ट्रुथ अबाउट विल पावर एंड सेल्फ कंट्रोल। सच सुनना चाहते हो। विल पावर उतनी स्ट्रांग नहीं है जितनी तुम समझते हो। और यही वो सच है जो तुम्हारी सारी प्लानिंग, सारे गोल्स और सारी मेहनत
को चुपचाप तोड़ देता है। तुम सोचते हो कि अगर तुम्हारे पास स्ट्रांग विल पावर होगी तो तुम कुछ भी कर सकते हो। लेकिन रियलिटी यह है कि विल पावर कोई अनलिमिटेड पावर नहीं है। यह एक लिमिटेड बैटरी की तरह है जो दिन भर के डिसीजंस, स्ट्रेस और डिस्ट्रैक्शन से धीरे-धीरे खत्म होती रहती है। और जब यह बैटरी लो हो जाती है तब तुम वही करते हो जो सबसे आसान होता है। वही जो तुम अवॉइड करना चाहते थे। सोचो सुबह तुम कितने डिसिप्लिंड होते हो। तुम प्लान बनाते हो। एनर्जी हाई होती है, फोकस शार्प होता है।
लेकिन जैसे-जैसे दिन गुजरता है, तुम टायर्ड होने लगते हो, डिसीजंस भारी लगने लगते हैं। और रात तक आते-आते तुम अपने ही रूल्स तोड़ देते हो। यह वीकनेस नहीं है। यह बायोलॉजी है। तुम्हारा ब्रेन हर डिसीजन में एनर्जी यूज करता है। और जितने ज्यादा डिसीजंस तुम लोगे, उतनी जल्दी तुम्हारी विल पावर ड्रेन होगी। इसीलिए सक्सेसफुल लोग ज्यादा विल पावर पर डिपेंड नहीं करते। वो अपने डिसीजंस को ऑटोमेट करते हैं। और यहीं आता है असली गेम चेंजर। सेल्फ कंट्रोल का असली मतलब खुद को रोकना नहीं है। बल्कि खुद को ऐसे एनवायरमेंट में डालना है जहां तुम्हें बार-बार
फाइट ही ना करनी पड़े। क्योंकि अगर हर बार तुम्हें टेंप्टेशन से लड़ना पड़ेगा तो एक ना एक दिन तुम हार जाओगे। लेकिन अगर टेंप्टेशन ही तुम्हारे सामने नहीं होगी तो तुम्हें लड़ने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। यही रीजन है कि कुछ लोग एफर्टलेसली डिसिप्लिंड दिखते हैं क्योंकि उन्होंने अपने लाइफ के रूल्स सेट कर दिए हैं। उनके पास फिक्स्ड रूटीनंस हैं, फिक्स्ड सिस्टम्स हैं जिससे उन्हें हर बार डिसीजन लेने की जरूरत नहीं पड़ती। जैसे अगर तुम्हारा वर्कआउट टाइम फिक्स है तो तुम हर दिन यह डिसाइड नहीं करते कि जाना है या नहीं। तुम बस जाते हो।
डिसीजन खत्म, कंफ्यूजन खत्म और एनर्जी बची रहती है। लेकिन यहां एक और डीप लेयर है जिसे बहुत कम लोग समझते हैं। और वो है डिसीजन फैटीग। हर बार जब तुम छोटे-छोटे डिसीजंस लेते हो, क्या पहनना है, क्या खाना है, कौन सा काम पहले करना है, तुम्हारा ब्रेन धीरे-धीरे थकता जाता है। और जब इंपॉर्टेंट डिसीजन लेने का टाइम आता है, जैसे काम शुरू करना, डिस्ट्रैक्शन अवॉइड करना। तब तुम्हारा ब्रेन ऑलरेडी एग्जॉस्टेड होता है और वह शॉर्टकट चूज़ करता है यानी कंफर्ट। अब सोचो क्या तुम अपनी जिंदगी को रैंडम डिसीजंस पर छोड़ रहे हो? या तुमने अपने
लिए रूल्स बनाए हैं क्योंकि रूल्स तुम्हें फ्रीडम देते हैं। जब तुम्हारे पास क्लियर रूल्स होते हैं तो तुम्हें हर बार सोचने की जरूरत नहीं पड़ती। तुम ऑटोमेटिकली सही एक्शन लेते हो और सबसे पावरफुल ट्रुथ विल पावर टेंपरेरी है। लेकिन सिस्टम्स परमानेंट है। अगर तुम सिर्फ विल पावर के भरोसे चलोगे तो तुम बार-बार फेल होगे। लेकिन अगर तुमने सिस्टम्स बना लिए तो सक्सेस ऑटोमेटिक हो जाएगी। यही रीजन है कि कुछ लोग बिना स्ट्रगल के कंसिस्टेंट रहते हैं क्योंकि उन्होंने अपने लाइफ को इस तरह डिजाइन किया है कि डिसिप्लिन उनके लिए डिफॉल्ट बन गया है। अब एक
मोमेंट के लिए रुक कर सोचो क्या तुम हर दिन अपने माइंड के साथ लड़ रहे हो या तुमने ऐसा सिस्टम बनाया है जो तुम्हें जीतने में हेल्प करता है क्योंकि जब तक तुम विल पावर पर डिपेंड करते रहोगे तुम हर दिन एक बैटल लड़ोगे और इवेंचुअली थक जाओगे लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती क्योंकि अब जो आने वाला है वो तुम्हारी सबसे बड़ी वीकनेस को टारगेट करेगा तुम्हारी हैबिट्स आगे तुम जानोगे कि कैसे बैड हैबिट्स तुम्हें साइलेंटली डिस्ट्रॉय कर रही है और कैसे तुम उन्हें ब्रेक करके अपने लाइफ में ऐसी पावरफुल हैबिट्स क्रिएट कर सकते
हो जो तुम्हें बिना एफर्ट के सक्सेस की तरफ धकेलेंगी और यहीं से तुम्हारी आइडेंटिटी सच में बदलनी शुरू होगी। चैप्टर फाइव ब्रेकिंग बैड हैबिट्स एंड बिल्डिंग स्ट्रांग वंस। मान लो तुमने फैसला कर लिया है कि अब तुम बदलोगे। अब तुम डिसिप्लिंड बनोगे। अब तुम वो इंसान बनोगे जो अपने गोल्स को अचीव करता है। लेकिन जैसे ही तुम शुरू करते हो कुछ दिन सब सही चलता है। फिर अचानक तुम वापस उसी पुराने पैटर्न में गिर जाते हो। वही हैबिट्स, वही डिस्ट्रैक्शंस, वही एक्सक्यूसेस। और फिर तुम खुद से कहते हो, मैं बदल ही नहीं सकता। लेकिन क्या
सच में प्रॉब्लम तुम हो या तुम्हारी हैबिट्स? सच्चाई थोड़ी अनकंफर्टेबल है। तुम अपने डिसीजन से नहीं अपनी हैबिट से डिफाइन होते हो। तुम्हारी डेली रूटीन, तुम्हारे छोटे-छोटे एक्शंस यही मिलकर तुम्हारी आइडेंटिटी बनाते हैं। और अगर तुम्हारी हैबिट्स वीक हैं तो चाहे तुम्हारे इंटेंशंस कितने भी स्ट्रांग क्यों ना हो, तुम आगे नहीं बढ़ पाओगे। क्योंकि हैबिट्स ही वह इनविज़िबल फोर्स हैं जो तुम्हें या तो सक्सेस की तरफ ले जाती हैं या धीरे-धीरे पीछे खींचती रहती हैं। अब सोचो तुम्हारी हर हैबिट एक लूप की तरह काम करती है। ट्रिगर एक्शन रिवॉर्ड जैसे ही कोई ट्रिगर आता है।
तुम्हारा ब्रेन ऑटोमेटिकली वही एक्शन रिपीट करता है। क्योंकि उसे रिवॉर्ड की आदत पड़ चुकी होती है। उदाहरण के लिए बोर्डम ट्रिगर है। फोन उठाना एक्शन है और डोपामिन रिवॉर्ड है और जितनी बार यह लूप रिपीट होता है, उतना ही यह स्ट्रांग होता जाता है और धीरे-धीरे तुम्हारा कंट्रोल कम होता जाता है। लेकिन यहां एक पावरफुल ट्विस्ट है। अगर हैबिट्स बन सकती हैं तो बदली भी जा सकती है। लेकिन इसके लिए तुम्हें ब्रूड फोर्स की जरूरत नहीं है। तुम्हें स्ट्रेटजी की जरूरत है। सबसे पहले तुम्हें अपने ट्रिगर्स को पहचानना होगा। वो मोमेंट्स जब तुम ऑटोमेटिकली गलत
डिसीजन लेते हो क्योंकि जब तक तुम ट्रिगर नहीं समझोगे तुम हैबिट को चेंज नहीं कर पाओगे। अब इमेजिन करो हर बार जब तुम डिस्ट्रैक्शन की तरफ जाने वाले हो। तुम खुद को रोक कर एक छोटा सा पॉज लेते हो और कॉन्शियसली एक डिफरेंट एक्शन चूज़ करते हो। शुरुआत में यह मुश्किल लगेगा। तुम्हारा माइंड रेजिस्ट करेगा। लेकिन हर बार जब तुम यह कॉन्शियस चॉइस लेते हो, तुम अपने ब्रेन को नया पैटर्न सिखा रहे होते हो। धीरे-धीरे यह नया एक्शन ही तुम्हारी नई हैबिट बन जाता है। लेकिन यहां एक और मिस्टेक होती है। लोग एक साथ सब
कुछ बदलने की कोशिश करते हैं। वो सोचते हैं कि कल से मैं पूरी तरह डिसिप्लिंड हो जाऊंगा। लेकिन यह अप्रोच ही गलत है। क्योंकि हैबिट्स ओवरनाइट नहीं बदलती। वो धीरे-धीरे इवॉल्व होती हैं। अगर तुम छोटे स्टेप्स से शुरू करोगे, जैसे सिर्फ 10 मिनट फोकस करना, सिर्फ एक छोटा टास्क पूरा करना, तो तुम्हारा ब्रेन इसे एक्सेप्ट करता है, रेजिस्ट नहीं करता। और यही है स्मॉल विंस की पावर। जब तुम छोटे-छोटे विंस कलेक्ट करते हो, तुम्हारा कॉन्फिडेंस बढ़ता है। तुम्हारी आइडेंटिटी शिफ्ट होती है और तुम खुद को एक डिसिप्लिंड इंसान के रूप में देखना शुरू कर देते
हो। और यही सबसे बड़ा चेंज होता है। क्योंकि जब आइडेंटिटी बदलती है तब हैबिट्स ऑटोमेटिकली फॉलो करती हैं। लेकिन एक और हिडन फैक्टर है जो तुम्हारी हैबिट्स को सीक्रेटली कंट्रोल करता है और वो है तुम्हारा एनवायरमेंट। अगर तुम्हारे आसपास डिस्ट्रैक्शंस हैं तो तुम बार-बार वही मिस्टेक्स करोगे। लेकिन अगर तुमने अपने एनवायरमेंट को स्मार्टली डिजाइन कर लिया जैसे फोन दूर रखना, वर्क स्पेस क्लीन रखना, डिस्ट्रैक्शंस हटाना तो गुड हैबिट्स फॉलो करना आसान हो जाता है। अब खुद से एक ऑनेस्ट सवाल पूछो। क्या तुम अपनी हैबिट्स को कंट्रोल कर रहे हो या तुम्हारी हैबिट्स तुम्हें कंट्रोल कर
रही हैं? क्योंकि अगर तुमने आज इन्हें चेंज नहीं किया तो यह धीरे-धीरे तुम्हारी पूरी जिंदगी शेप कर देंगी। लेकिन रुकना मत क्योंकि अभी सबसे बड़ा एनिमी बाकी है। वो एनिमी जो तुम्हारी हर प्लान, हर गोल, हर इंटेंशन को डिस्ट्रॉय कर देता है। प्रोक्रेस्टिनेशन आगे जो तुम जानने वाले हो वो तुम्हें उस इनविज़िबल ट्रैप से बाहर निकाल सकता है जिसमें ज्यादातर लोग पूरी जिंदगी फंसे रहते हैं। और यकीन मानो अगर तुमने इसे समझ लिया तो एक्शन लेना तुम्हारी नई आइडेंटिटी बन जाएगी। चैप्टर सिक्स, हाउ टू बीट प्रोक्रेस्टिनेशन एंड स्टे फोकस्ड। एक कड़वा सच। तुम लेजी नहीं
हो। तुम बस ट्रैप्ड हो। उस इनविज़िबल जाल में जिसका नाम है प्रोक्रेस्टिनेशन। वो पल याद करो जब तुमने सोचा था। बस 5 मिनट बाद शुरू करता हूं। और फिर वो 5 मिनट घंटों में बदल गए। फिर दिन खत्म हो गया। और तुम सिर्फ गिल्ट लेकर सो गए। यह सिर्फ टाइम वेस्ट नहीं है। यह धीरे-धीरे तुम्हारा सेल्फ रिस्पेक्ट खा जाता है। तुम्हारा कॉन्फिडेंस गिरा देता है। और सबसे खतरनाक बात तुम्हें यह यकीन दिला देता है कि तुम कुछ बड़ा नहीं कर सकते। लेकिन सवाल यह है आखिर हम प्रोक्रेस्टिनेट करते क्यों हैं? क्या यह सिर्फ आलस है?
नहीं। असली रीजन उससे कहीं डीपर है। जब भी तुम्हें कोई काम बड़ा, मुश्किल या अनक्लियर लगता है, तुम्हारा ब्रेन उसे थ्रेट की तरह देखता है और ऑटोमेटिकली तुम्हें बचाने की कोशिश करता है। वो तुम्हें डिस्ट्रैक्शन की तरफ धकेल देता है। ताकि तुम उस डिसकंफर्ट से दूर रह सको। इसलिए तुम काम डालते हो क्योंकि तुम वीक नहीं हो। बल्कि तुम्हारा माइंड तुम्हें सेफ रखने की कोशिश कर रहा है। लेकिन प्रॉब्लम यह है यह सेफ्टी तुम्हें ग्रो नहीं होने देती। क्योंकि हर बार जब तुम काम टालते हो, तुम अपने ब्रेन को सिखाते हो कि डिसकंफर्ट से भागना
ठीक है। और धीरे-धीरे यह तुम्हारी डिफॉल्ट हैबिट बन जाती है। फिर चाहे तुम कितना भी मोटिवेटेड क्यों ना हो। एक्शन लेना मुश्किल हो जाता है। अब इमेजिन करो अगर तुम इस पैटर्न को तोड़ सको। अगर तुम अपने ब्रेन को यह सिखा सको कि डिसकंफर्ट डेंजरस नहीं है बल्कि ग्रोथ का हिस्सा है तो क्या होगा? यही वो मोमेंट है जहां रियल ट्रांसफॉर्मेशन शुरू होती है। और इसके लिए सबसे पावरफुल टेक्निक है। स्टार्ट बिफोर योर रेडी। तुम्हें परफेक्ट मोमेंट का इंतजार नहीं करना है। तुम्हें मोटिवेशन का इंतजार नहीं करना है। तुम्हें बस शुरू करना है। क्योंकि एक्शन
क्लेरिटी लाता है और क्लेरिटी कॉन्फिडेंस बनाती है। जितना तुम सोचते रहोगे उतना ही काम बड़ा लगता जाएगा। लेकिन जैसे ही तुम पहला छोटा स्टेप लेते हो, रेजिस्टेंस टूटने लगता है। यही रीजन है कि छोटे एकशंस इतने पावरफुल होते हैं। अगर तुम सोचते हो कि मुझे 2 घंटे पढ़ना है तो तुम्हारा माइंड रेजिस्ट करेगा। लेकिन अगर तुम कहो मैं सिर्फ 5 मिनट पढूंगा तो तुम्हारा ब्रेन उसे एक्सेप्ट कर लेता है और अक्सर वह 5 मिनट 30 मिनट में बदल जाते हैं क्योंकि शुरुआत ही सबसे मुश्किल होती है लेकिन सिर्फ शुरुआत करना काफी नहीं है। तुम्हें फोकस
भी मेंटेन करना होगा और यहां आता है एक ब्रूटल [संगीत] ट्रुथ। तुम्हारा एनवायरमेंट तुम्हारे फोकस को डिफाइन करता है। अगर तुम्हारे आसपास डिस्ट्रैक्शंस हैं तो तुम चाहे जितना ट्राई कर लो तुम बार-बार ब्रेक हो जाओगे। इसीलिए फोकस कोई टैलेंट नहीं है। यह एक डिज़ कंडीशन है। जब तुम डिस्ट्रैक्शंस हटाते हो, जब तुम अपने वर्क स्पेस को क्लीन और डिस्ट्रैक्शन फ्री बनाते हो, तब फोकस ऑटोमेटिक हो जाता है। और एक पावरफुल हैक अपने काम को विज़िबल बना दो। जब तुम्हारे गोल्स क्लियर होते हैं, जब तुम्हें पता होता है कि अगला स्टेप क्या है? तो प्रोक्रेस्टिनेशन कम
हो जाती है। क्योंकि कंफ्यूजन प्रोक्रेस्टिनेशन को जन्म देता है और क्लेरिटी एक्शन को। अब एक पल के लिए खुद से पूछो। तुम सच में काम टाल रहे हो या तुम सिर्फ उस डर से भाग रहे हो जो उस काम के साथ जुड़ा है। क्योंकि ज्यादातर बार प्रॉब्लम काम नहीं होता। प्रॉब्लम वो फीलिंग होती है जो उस काम के साथ आती है। फियर, डाउट, अनसर्टेनिटी। लेकिन याद रखो करज का मतलब फियर का खत्म होना नहीं है। करज का मतलब है फियर के बावजूद एक्शन लेना। और हर बार जब तुम ऐसा करते हो, तुम अपने ब्रेन को
सिखाते हो कि तुम स्ट्रांगर हो, तुम कंट्रोल में हो। अब इमेजिन करो अगर तुमने प्रोक्रास्टिनेशन को हरा दिया, अगर तुमने एक्शन लेना, अपनी आइडेंटिटी बना लिया तो तुम्हारी लाइफ कितनी बदल सकती है। लेकिन अभी एक आखिरी पीस बाकी है। सबसे पावरफुल पीस। आगे तुम जानोगे कि कैसे डेली हैबिट्स और सिंपल रूटीनंस तुम्हें एक अनस्टोपेबल डिसिप्लिंड इंसान बना सकते हैं। बिना स्ट्रगल के, बिना फोर्स के और यहीं से तुम्हारी जिंदगी सच में ट्रांसफॉर्म होने वाली है। चैप्टर सेवन डेली हैबिट्स टू बिल्ड अनस्टोपेबल डिसिप्लिन। सोचो एक साल बाद का तुम कैसा दिखते हो? वही पुरानी आदतें, वही
अधूरे गोल्स, वही कल से शुरू करूंगा वाला वर्जन। या फिर एक ऐसा इंसान जो सुबह उठते ही क्लेरिटी के साथ काम पर लग जाता है जो डिस्ट्रैक्शंस के बीच भी फोकस्ड रहता है और जो हर दिन अपने गोल्स के करीब पहुंचता जा रहा है। फर्क सिर्फ एक चीज का है। तुम्हारी डेली हैबिट्स। सच्चाई यह है। सक्सेस किसी एक बड़े डिसीजन से नहीं आती। यह उन छोटे-छोटे एकशंस से बनती है जो तुम हर दिन रिपीट करते हो। लेकिन प्रॉब्लम यह है कि लोग डेली हैबिट्स को अंडरएस्टीमेट करते हैं। उन्हें लगता है कि इतना छोटा काम क्या
फर्क डालेगा और यहीं वो हार जाते हैं। क्योंकि छोटे एकशंस ही कंपाउंड होकर बड़े रिजल्ट्स बनाते हैं। लेकिन यह धीरे-धीरे होता है। इतना धीरे कि तुम्हें शुरुआत में कुछ चेंज महसूस ही नहीं होता। और यहीं पर पेशेंस की परीक्षा होती है क्योंकि तुम्हारा माइंड इंस्टेंट रिजल्ट्स चाहता है। अगर उसे तुरंत रिवॉर्ड नहीं मिलता तो वह इंटरेस्ट खो देता है। वो तुम्हें कन्विंस करता है कि इससे कुछ नहीं होगा और तुम बीच में ही छोड़ देते हो। लेकिन सच यह है डिसिप्लिन एक सीड की तरह है जिसे रोज पानी देना पड़ता है। भले ही शुरुआत में
कोई फल दिखाई ना दे। अब इमेजिन करो [संगीत] अगर तुमने अपनी डेली लाइफ में कुछ सिंपल लेकिन पावरफुल हैबिट्स डाल दी जैसे सुबह उठकर 10 मिनट प्लानिंग करना, दिन का एक क्लियर गोल सेट करना, डिस्ट्रैक्शंस को लिमिट करना और हर दिन अपने सबसे इंपॉर्टेंट टास्क पर फोकस्ड एक्शन लेना। तो धीरे-धीरे यह एकशंस तुम्हारी आइडेंटिटी बन जाते हैं। फिर तुम्हें खुद को पुश करने की जरूरत नहीं पड़ती। क्योंकि तुम वही इंसान बन जाते हो जो नेचुरली डिसिप्लिंड है। लेकिन यहां एक क्रूशियल बात है। हैबिट्स तभी टिकती हैं जब वह सिंपल और रियलिस्टिक हो। अगर तुम एकदम
से परफेक्ट बनने की कोशिश करोगे तो तुम जल्दी बर्न आउट हो जाओगे। इसलिए कंसिस्टेंसी को परफेक्शन से ऊपर रखो। हर दिन थोड़ा करो लेकिन करो जरूर। क्योंकि मिसिंग वन डे डजंट ब्रेक यू। लेकिन बार-बार छोड़ना तुम्हें वापस वहीं ले जाता है जहां से तुम शुरू हुए थे। और अब एक पावरफुल शिफ्ट डिसिप्लिन को एक बर्डन की तरह मत देखो। इसे अपनी आइडेंटिटी का हिस्सा बनाओ। जब तुम खुद से कहते हो मुझे डिसिप्लिन फॉलो करना है तो यह एक एक्सटर्नल प्रेशर बन जाता है। लेकिन जब तुम कहते हो मैं डिसिप्लिंड इंसान हूं तो यह तुम्हारी आइडेंटिटी
बन जाती है और आइडेंटिटी बेस्ड हैबिट्स सबसे स्ट्रांग होती हैं। क्योंकि तुम उन्हें निभाने के लिए मजबूर नहीं होते। तुम उन्हें नेचुरली फॉलो करते हो। अब खुद से एक सवाल पूछो। तुम हर दिन क्या रिपीट कर रहे हो? क्योंकि वही तुम्हारा फ्यूचर बना रहा है। अगर तुम हर दिन एक्सक्यूसेस रिपीट कर रहे हो तो तुम्हारा फ्यूचर भी वैसा ही होगा। लेकिन अगर तुम हर दिन छोटे-छोटे डिसिप्लिंड एकशंस रिपीट कर रहे हो तो तुम्हारा फ्यूचर अनस्टपेबल होगा। और यही इस पूरी जर्नी का सबसे पावरफुल ट्रुथ है। तुम ओवरनाइट नहीं बदलोगे। लेकिन अगर तुमने आज से छोटे-छोटे
चेंजेस शुरू कर दिए तो कुछ महीनों बाद तुम खुद को पहचान नहीं पाओगे। लेकिन आखिरी सवाल क्या तुम सच में बदलने के लिए रेडी हो या यह भी सिर्फ एक और वीडियो बनकर रह जाएगा क्योंकि नॉलेज तभी पावरफुल है जब वह एक्शन में बदलती है और एक्शन का डिसीजन सिर्फ तुम्हारे हाथ में है [गला साफ़ करने की आवाज़] अब डिसीजन तुम्हारा है वही पुरानी लाइफ या एक नया डिसिप्लिंड वर्जन क्योंकि जो आगे तुम्हारा इंतजार कर रहा है वो उसी चॉइस पर डिपेंड करता है जो तुम आज लेते हो लेते कंक्लूजन मान लो आज से एक
साल बाद तुम उसी जगह खड़े हो। वही हैबिट्स, वही एक्सक्यूसेस, वही रिग्रेट। और तुम पीछे मुड़कर सोच रहे हो। काश मैंने उस दिन खुद को बदल लिया होता। यह काश ही वह शब्द है जो जिंदगी भर इंसान को अंदर से तोड़ता रहता है। क्योंकि ओपोरर्चुनिटीज बार-बार नहीं आती। लेकिन डिसीजंस हर दिन आते हैं और हर छोटा डिसीजन तुम्हारी पूरी जिंदगी की दिशा तय करता है। अब तक तुमने समझ लिया है कि डिसिप्लिन क्या है? क्यों लोग फेल होते हैं? कैसे माइंड और इमोशंस को कंट्रोल किया जाता है? विल पावर की असली सच्चाई क्या है? हैबिट्स
कैसे काम करती हैं? और प्रोक्रेस्टिनेशन कैसे तुम्हें साइलेंटली पीछे खींचता है? लेकिन यह सब नॉलेज तब तक बेकार है जब तक तुम इसे एक्शन में नहीं बदलते क्योंकि दुनिया में सबसे बड़ा गैप नॉलेज और एक्शन के बीच होता है और जो लोग इस गैप को पार कर लेते हैं वही असली विनर्स बनते हैं। सच यह है तुम स्पेशल नहीं हो। लेकिन तुम कैपेबल हो। तुम्हारे अंदर भी वही ब्रेन है। वही पोटेंशियल है। फर्क सिर्फ इतना है कि कुछ लोग अपने माइंड को कंट्रोल करना सीख जाते हैं और कुछ लोग पूरी जिंदगी उससे कंट्रोलोल्ड रहते हैं।
और आज तुम्हारे सामने भी वही चॉइस खड़ी है। क्या तुम अपने माइंड के स्लेव बने रहोगे या उसके मास्टर बनोगे? याद रखो डिसिप्लिन कोई टैलेंट नहीं है। यह कोई गिफ्ट नहीं है। यह एक डिसीजन है जो तुम्हें हर दिन लेना पड़ता है। जब तुम टायर्ड हो, जब तुम डीमोटिवेटेड हो, जब तुम्हारा मन बिल्कुल नहीं करता तब भी एक्शन लेना ही डिसिप्लिन है। और यही वो मोमेंट होते हैं जो तुम्हारी आइडेंटिटी बनाते हैं। क्योंकि इजी डेज किसी को स्ट्रांग नहीं बनाते। मुश्किल दिन ही असली कैरेक्टर बनाते हैं। और सबसे पावरफुल बात तुम्हें परफेक्ट बनने की जरूरत
नहीं है। तुम्हें बस कंसिस्टेंट बनना है। अगर तुम हर दिन सिर्फ 1% बेटर बनते हो तो एक साल बाद तुम एक कंप्लीटली डिफरेंट इंसान बन चुके होगे। लेकिन अगर तुमने आज भी एक्शन नहीं लिया तो कुछ नहीं बदलेगा। तो अब खुद से एक आखिरी सवाल पूछो। क्या तुम रेडी हो उस पेन के लिए जो ग्रोथ के साथ आता है? या तुम उसी कंफर्ट में रहना चाहते हो जो धीरे-धीरे तुम्हें अंदर से खत्म कर देता है। क्योंकि सच यही है। या तो तुम डिसिप्लिन चूज़ करोगे या रिग्रेट तुम्हें चूज़ कर लेगा। अब डिसीजन तुम्हारा है।